सामाजिक न्याय की अवधारणा व इसके लाभ विषय

In this page:


सामाजिक न्याय का अभिप्राय सामान्यत: समतावादी समाज या संस्था की स्थापना करने से है जो समानता, एकता तथा भाईचारा के सिद्धान्तों पर आधारित हो, मानवाधिकारों के मूल्यों को समझती हो तथा प्रत्येक मनुष्य की प्रतिष्ठा को पहचानने में सक्षम हो। सामाजिक न्याय व इसकी वर्तमान अवधारणा सर्वप्रथम 1840 में जेसुइट लुइगी टपरेली ने थामस एक्वैनस की शिक्षण विधियों के आधार पर दी थी। पुन: सामाजिक न्याय को 1848 में एन्टोनियो रोसमिनी-सरवाती ने भी इसी रूप में परिभाषित किया। सामाजिक न्याय के सन्दर्भ में अनेक विद्वानों के अलग - अलग दृष्टिकोण है जिन्हें मुख्यत: तीन रूपों में व्यक्त किया जा सकता है जो निम्नवत् है :-

सामाजिक अनुबन्ध स्वरूप - 

इस मत के अनुसार जो ज्यादा उत्पादक होगा वह ज्यादा सुख प्राप्त करेगा साथ ही जो उत्पादक नहीं होगा वह कष्ट सहेगा तथा वह समाज से बाहर हो जायेगा परन्तु अपनी खामियों के चलते यह मत सर्वव्यापी नहीं हैं

व्यवहारिक स्वरूप - 

इस मत के अनुसार, समाज वह संस्था है जो अपने सदस्यों के लिये व उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये वस्तुयें उपलब्ध कराता है। प्रत्येक सदस्य इसमें अकेला होता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य वस्तुओं एवं सेवाओं को ज्यादा से ज्यादा उत्पादित करना है। समाजकार्य इस मत को स्वीकार नहीं करता क्योंकि इसके अनुसार इस दृष्टिकोण को अपनाने से सामाजिक स्वार्थ के लिये व्यक्तिगत सुखों तथा सामूहिक सुखों का त्याग करना आवश्यक है। इस प्रकार यह मत व्यवसायीकरण को बढ़ावा देता है।

श्रद्धात्मक स्वरूप - 

इस मत के अनुसार, समाज व्यक्तियों के लिये सामाजिक व्यवस्थाओं के माध्यम से सम्मान का भाव निहित रखता है। समाज में सभी लोग समान है तथा संसाधनों पर सभी का समान अधिकार है। समाज का यह कर्तव्य है कि वह सभी को सुखी रहने का समान अवसर प्रदार करे। इसी मत के आधार पर मूल अधिकार, राजनीतिक समानता, अधिकारों का विल आदि पारित हुये तथा अस्तित्व मे आये।
सामाजिक न्याय मानवाधिकारों एवं समानता की अवधारणा पर आधारित है तथा साथ ही प्रगतिशील करों, आय तथा सम्पत्ति पुनर्वितरण के माध्यम से आर्थिक समतावाद को सम्मिलित करती है। सामाजिक न्याय सभी व्यक्तियों हेतु समान अवसर व सही परिस्थिति की अवस्था है। सामाजिक न्याय में भौतिक साधनों का समान वितरण, सामाजिक-शारीरिक-मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास सम्मिलित होता है। इसका उद्देश्य असमानता को हराकर तथा अस्वीकार करके समाज का पूर्ण रूप से उत्थान करना है। इसके दो लक्ष्य होते हैं -
  1. अन्याय का अन्त
  2. व्यक्ति के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक आदि स्तरों पर असमानता का अन्त
एक व्यक्ति के महत्व का विचार समाजकार्य के ही अन्तर्गत आता हैं यही विचार जब हम कोई समस्या समाधानित करते हैं तो वृहद रूप में उत्पन्न होकर वैयक्तिक सेवा कार्य के रूप में समस्या-समाधान में सहायता करता है। समाज कार्य यह मानता है कि व्यक्ति विभिन्न प्रकार की क्षमताओं का कोष है। यह व्यक्ति की योग्यता, सामाजिक, न्याय, कानूनी अधिकार, प्रजातन्त्र प्रणाली/संस्थानों आदि के माध्यम से आवश्यकताओं की पूर्ति पर बल देता है तथा साथ ही दूसरों के अधिकारों का हनन न हो इस पर भी ध्यान देता है। व्यक्ति को केवल निर्देशन व मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। उसे इस बात का पूरा अवसर मिलना चाहिये कि वो अपनी पूरी क्षमता दिखा सके।

सामाजिक कार्य के लिये सामाजिक न्याय एक मजबूत स्तम्भ की भाँति है। सामाजिक न्याय समानता, स्वतन्त्रता तथा एकता में विश्वास रखता है तथा शोषण के विरूद्ध है। कल्याण कार्यक्रमों को समाज के दबे-कुचले, शोषित वर्ग हेतु चलाया गया है तथा सामाजिक कानून असमानता व अन्याय से लड़ने हेतु लागू किये गये हैं।

सामाजिक न्याय के लाभ विषय

जैसा कि यह सर्वविदित है कि सामाजिक न्याय एक ऐसा विषय है जो समाज में सभी को आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक रूप से समान सिद्ध करता है। आज के परिवेश में समाज में व्याप्त सारी अनियमितताओं एवं बुराईयों के कारण जहॉ अधिकतर व्यक्ति किसी न किसी प्रकार से सामाजिक न्याय की भावना मात्र से भी परे है वही इस विषय का लाभ कुछ विशेष व्यक्तियों तक ही सीमित होकर रह गया है। जनसंख्या की वृद्धि तथा द्वितीयक सुखों की प्राप्ति की कामना ऐसे तत्व है जो अनायास ही समाज को सामाजिक न्याय से वंचित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे है। जिसके पास सामथ्र्य है वो सभी क्षेत्रों में आगे है तथा वंचितों का शोषण भी करता है।

इसके साथ ही कहीं न कहीं पूर्वी एवं पष्चिमी सभ्यताओं के मेल व आपसी स्वीकारिता के कारण भी कुछ स्तर तक सामाजिक न्याय की स्थिति परस्पर विचलित हो रही है। उदाहरणत: हम अगर खाप पंचायतों का मुददा ले तो सहज ही देखते है कि दो सभ्यताओं के मिलाप से समाज पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता है। भारत में सामाजिक न्याय को पूर्ण स्तर तक पाने व अपनाने के लिये सभी के पास कुछ न कुछ रूकावटें सम्मुख खड़ी है। कुछ विषय ऐसे है जहॉ न्याय की बात होती है तथा यदि वहॉ समानता एवं स्पष्टता सामने आ जाय तो सामाजिक न्याय की परिकल्पना को भारतीय परिवेश में सिद्ध किया जा सकता है किसी न किसी रूप में भारत के सभी नागरिक सामाजिक न्याय के लाभ विषयों से जुड़े हुये से प्रतीत होते है। यदि हम सामाजिक न्याय के लाभ विषय को स्पष्ट रूप से समझने की कोशिश करें तो आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय के लाभ विषय मुख्य रूप से निम्नवत् दिखायी पडते है-
  1. एच0आई0वी0/एड्स उन्मुख बालचिकित्सा 
  2. मादक दवा दुव्र्यवहार 
  3. लिंग आधारित भेदभाव 
  4. शहरी स्वच्छता की स्थिति 
  5. कूड़ा - कचरा प्रबन्धन 
  6. असंगठित श्रमिकों की समस्याये 
  7. शिक्षा का अधिकार 
  8. नगरीकरण की समस्या 
  9. अवयस्कों की अपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता 
  10. भारत में कुष्ठ रोग समस्या 
  11. भारत में औरतों की दुर्दशा 
  12. भ्रूण हत्या 
  13. शिशु मृत्यु दर 
  14.  खाप पंचायत 
  15. महिलाओं में धूम्रपान एवं मघपान 
  16. गरीबी 
  17. जन स्वास्थ्य तन्त्र 
  18. राज्यों में गरीबी का विकास 
  19. लिंग अनुपात 
  20. बाल दुव्र्यवहार 
  21. किशोरावस्था स्वास्थ्य कार्यक्रम 
  22. शिक्षा की स्थिति 
  23. सम्मान सुरक्षा हेतु हत्यायें 
  24. शिक्षा का एकीकरण 
  25. काम करने वाली महिलाओं की समस्यायें 
  26. भूखमरी 
  27. महिलाओं हेतु शिक्षा से जुड़ी समस्याये 
  28. वेष्यावृत्ति
  29. मद्यपान 
  30. बाल अपराध 
  31.  अस्पृश्यता 
  32. पेयजल समस्या 
  33. बाल कुपोषण 
  34. वृद्धावस्था की समस्यायें 
  35.  वैश्विक खाद्य भण्डार में कमी 
  36. जनसंख्या वृद्धि
  37. भारत में क्षयरोग 
  38. भारत में पोलियों 
  39. भारत में एड्स 
  40.  भिक्षावृत्ति 
  41. बाढ़ नियंन्त्रण 
  42. महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध
  43. किशोरों के प्रति बढ़ते अपराध 
  44. ग्रामीण परिवेश में स्वास्थ्य की स्थिति 
  45. जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण 
  46. रोजगार के नये आयाम 
  47. व्यवहारिक शिक्षा की स्थिति 
  48. भ्रष्टाचार 
  49. ग्रामीण सन्दर्भ में स्वच्छता की महत्ता
  50.  मातृ-मृत्यु दर एवं स्वास्थ्य स्थिति 
  51. व्यावसायिक शिक्षा की स्थिति 
  52. स्थायी विकास
  53. वर्ग संघर्ष 
  54. शिक्षा दर 
  55. महिला - सशक्तिकरण 
  56. दहेज व्यवस्था 
  57. बाल श्रम 
  58. ग्रामीण परिवेश में लड़कियों की शिक्षा स्थिति 
  59. बेरोजगारी 
  60. मानव-तस्करी 
  61. घरेलू दिशा 
  62. दलितों की स्थिति 
  63. प्रवसन

Comments