अधिगम (सीखने) का अर्थ एवं सिद्धान्त

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अनुक्रम

सीखने का अर्थ 

सीखना अनुभव व प्रशिक्षण द्वारा व्यिक्त्त के व्यवहार में परिवर्तन है।
अनुभव दो प्रकार का हो सकता है, प्रथम प्रकार का अनुभव बालक स्वयं ग्रहण
करता है जबकि दूसरे प्रकार का अनुभव, अन्य लोगों के अनुभव से लाभ उठाने
की श्रेणी में आता है। प्रशिक्षण के अन्तर्गत औपचारिक शिक्षा आती है। एक माँ
द्वारा जो शिक्षा दी जाती है वह औपचारिक व अनौपचारिक दोनों होती है।
जिसका मुख्य उद्देश्य बालक को सिखाना होता है। सीखने के फलस्वरूप
बालक के व्यवहार में स्थायी परिमार्जन होता है। विद्यालय का कार्य भी बालक
को सिखाना है। किंतु सीखने से आशय मात्र व्यवहार परिमार्जन नहीं। सभी प्रकार
के व्यवहार परिवर्तन को सीखना नहीं कहतें। सीखने से तात्पर्य व्यवहार में स्थायी
परिवर्तन से होता है और यह परिवर्तन बालक को वातावरण से समायोजित होने
में मद्द करते हैं।

                                                             अनुभव

                                                               (1) स्वयं के अनुभव
सीखना = व्यवहार में स्थायी परिवर्तन ーーーーーー
                                                               (2) दूसरों के अनुभव

                                                             प्रशिक्षण

अधिगम के सिद्धान्त

सीखने के अनेक सिद्धान्त है। प्रत्येक सिद्धान्त किसी न किसी परिस्थिति
की भली – भाँति व्याख्या करता है।

थार्नडाइक का संबधवाद का सिद्धान्त 

एडवर्ड ली थार्नडाइक ने सन् 1913 ई. मे प्रकाशित अपनी पुस्तक
‘एजुकेशनल साइकोलॉजी’ मे सीखने का एक नवीन सिद्धान्त प्रतिपादित किया
था। इसे उत्तेजक – प्रतिक्रिया सिद्धान्त या सीखने का संबंध सिद्धान्त भी कहते
है।

जब कोई व्यक्ति किसी कार्य को सीखना आरम्भ करता है तो उसके
सामने एक विशेष स्थिति या उत्तेजक होता है। यह स्थिति या उत्तेजक व्यक्ति
को एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया R करने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार
एक विशिष्ट स्थिति या उत्तेजक का एक प्रतिक्रिया विशेष के साथ बन्घन हो
जाता है। इस प्रकार के बन्धन के फलस्परूप व्यक्ति जब भविष्य में उस उत्तेजक
का अनुभव करता है तो वही प्रतिक्रिया दोहराता है।

उलझन – बक्स प्रयोग 

थार्नडाइक ने अपने सिद्धान्त के परीक्षण के
लिए बिल्लियों के ऊपर कई प्रयोग किये । एक प्रयोग में उसने एक भूखी बिल्ली
को उलझन बक्स में बन्द कर दिया था। जो एक खटके के दबने से बुलता था।
बक्स के बाहर मछली रख दी गयी थी। बाहर रखी हुई मछली ने भूखी बिल्ली के
लिए उत्तेजक का कार्य किया जिससे बिल्ली सक्रिय होकर मछली पाने के लिए
प्रतिक्रिया करने लगी। वह बाहर निकलने का प्रयास करने लगी। एक बार बिल्ली
का पंजा संयोग से खटके के ऊपर पड़ गया। फलत: वह बाहर आ गयी।
थार्नडाइक ने इस प्रयोग को लगभग सौ बार दोहराया और एक समय ऐसा आ
गया कि बिल्ली को उलझन बाक्स में बन्द कर देने पर वह बिना किसी त्रुटि के
खटके को दवाकर बक्स का दरवाजा खोलने लगी।थार्नडाइक ने सीखने के सिद्धान्त में तीन महत्पूर्ण नियमों का वर्णन किया
है जो  है-

  1. अभ्यास का नियम – यह नियम इस तथ्य पर आधारित है कि अभ्यास से
    व्यक्ति में पूर्णता आती है। अत: जब हम किसी पाठ या विषय का बार – बार
    दुहराते है तो उसे सीख जाते है। इसे थार्नडाइक ने उपयोग नियम कहा है।
    दूसरी तरफ जब हम किसी पाठ या विषय को दोहराना बन्द कर देते है तो उसे
    भूल जाते है। इसे इन्होंने अनुपयोग नियम कहा जाता है।
  2. अभ्यास का नियम – इस नियम के अनुसार यदि व्यक्ति शारीरिक व
    मानसिक रूप से तैयार होता है तो सीखना होता है।
  3. प्रभाव का नियम – थानर्ड ाइक के सिद्धान्त का यह सबसे महत्वपूर्ण नियम
    है। इस नियम के अनुसार व्यक्ति किसी अनुक्रिया या कार्य को उसके प्रभाव के
    आधार पर सीखता है। किसी कार्य या अनुक्रिया का प्रभाव व्यक्ति में या तो
    सन्तोषजनक होता है या खीझ उत्पन्न करने वाला। प्रभाव सन्तोषजनक होने पर
    व्यक्ति उसे सीख लेता है अन्यथा भूल जाता है।

पॉवलाव का अनुकूलित -अनुक्रिया सिद्धान्त

अनुकूलित – अनुक्रिया के सिद्धान्त का आधार शरीर क्रिया विज्ञान का
सिद्धान्त है। यह सिद्धान्त सम्बन्धवाद के इस सिद्धान्त को महत्व देता है कि
उत्तेजना और प्रतिक्रिया का संबंध होना ही सीखना है। इसके प्रतिपादक पॉवलोव
है। सभी प्राणियों में मूल रूप से प्रतिक्रिया तथा प्रवृत्तियाँ होती है जो उपयुक्त
उत्तेजक द्वारा गतिशील हो जाती है। आन्तरिक या बाहृय प्रेरणा के फलस्वरूप
उत्तेजक और अनुक्रिया में सम्बन्ध हो जाता है। इसी को सीखना कहते है। यदि
स्वाभाविक उत्तेजक के साथ कोई कृत्रिम उत्तेजक भी कई बार प्रदान किया
जाये तो कृत्रिम उत्तेजक का संबंध स्वाभाविक उत्तेजक से हो जाता है। इस
प्रकार कृत्रिम उत्तेजक के कारण स्वाभाविक उत्तेजक के समान हुई प्रतिक्रिया
को ‘सम्बद्ध प्रतिक्रिया’ या अनुकूलित प्रतिक्रिया कहते है।

उदाहरण – भोजन को देखकर कुत्ते के द्वारा लार जब भोजन के साथ
घंटी बजती है तो कुछ समय बाद छोटी सुनकर लार टपकाना।

स्किनर का क्रिया प्रसूत अनुबन्ध सिद्धान्त 

क्रियाप्रसूत अनुबन्धन सिद्धान्त का प्रतिपादन अमेरिका के मनोवैज्ञानिक
स्किनर ने 1938 में किया था। इस सिद्धान्त को नैमित्तिक अनुबन्ध सिद्धान्त भी
कहते है।

स्किनर के क्रिया – प्रसूत अनुबन्धन में सही अनुक्रिया को होना अधिक
महत्व रखता है। यहाँ केवल एक अस्वाभाविक या कृत्रिम उत्तेजक होता है जो
वांछित अनुक्रिया के बाद दिया जाता है तथा इस अनुक्रिया को पुनर्बलित कर
देता है। स्किनर ने अपने सिद्धान्त के आधार पर परम्परागत S-R सूत्र के RS
सूत्र में परिवर्तित कर दिया। सीखने की प्रक्रिया में उत्सर्जित अनुक्रियाओं पर जो प्रभाव पड़ता है उसे
समझने के लिए पुनर्बलन का सिद्धान्त सहायक है। इस सिद्धान्त के अनुसार
सीखने वाले का व्यवहार ही प्रबलन प्रात्त करने में सहायता करता है।

गथरी का प्रतिस्थापन का सिद्धान्त

दिया हुआ उत्तेजक अथवा उत्तेजको का संचय एक निश्चित अनुक्रिया
को निष्कर्षित करने की प्रवृत्ति रखता है और गथरी के अनुसार सीखना, इन
जन्मजात अथवा अर्जित अनुक्रियाओं को दूसरे अथवा प्रतिस्थापित उत्तेजकों की
ओर विस्तारित करने की क्रिया है।

गथरी के अनुसार – “एक उत्तेजक प्रतिमान जो एक प्रतिक्रिया के समय क्रियाशील है, यदि वह दोबारा होगा तो उस प्रतिक्रिया को उत्पादित करने की प्रवृत्ति रखेगा।”गथरी के अनुसार, इस प्रकार के सीखने के लिए केवल एक तत्व उत्तेजक और प्रतिक्रिया का समय में सामीप्य होना अनिवार्य है। एक सम्बन्ध, उत्तेजक तथा प्रतिक्रिया के एक बन्धन में पूर्णत: दृढ़ हो जाता है, किन्तु अम्यास में दोहराना कई प्रकार के सीखने के लिए आवश्यक होता है।

हल का क्रमबद्ध व्यवहार सिद्धान्त 

अमेरीकी मनोवैज्ञानिक, कलार्क एलण् हल का सिद्धान्त सम्बन्धवादी
मनोवैज्ञानिकों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हल ने अनेक प्रयोग किये और
उनके आधार पर अपने अनुसार सीखने की व्याख्या प्रस्तुत की। उसके सिद्धान्त
को क्रमबद्ध व्यवहार सिद्धान्त या हल का प्रबलन सिद्धान्त कहा गया। इसे
अन्तर्नोद न्यूनता का सिद्धान्त भी कहते हैं।

किसी आवश्यकता को दूर करना इस सिद्धान्त का मुख्य तत्व है। अपने
को पर्यावरण से समायोजित करने के लिए प्राणी किसी न किसी आवश्यकता का
अनुभव करता है। आवश्यकता को पूरा करने के लिए वह जो कुछ भी उस क्षण
से पहले अनुभव कर रहा होता है वह सब उसकी प्रतिक्रियाओं से सम्बद्ध हो
जाता है। यह सम्बद्ध प्रतिक्रिया आवश्यकता का अनुभव होने पर होती है।

हल के अनुसार सीखना आवश्यकता की पूर्ति की प्रक्रिया के द्वारा होता
है। हल ने चूहों पर अनेक प्रयोग किये। इन प्रयोगों के आधार पर उसने निष्कर्ष
निकाला कि उत्तेजना (S) और अनुक्रिया (X) के बीच सम्बन्ध अन्तर्नोद पर निर्भर
है। अन्तर्नोद आवश्यकता के कारण प्राणी में तनाव की स्थिति है। ऐसी स्थिति का
अनुभव होने पर प्राणी में अनेक उत्तेजनाएं उत्पन्न हो जाती है। जो उसे उद्देश्य
तक पहुंचाती है। इससे उनका तनाव कम हो जाता है और वह पुर्नबलन प्राप्त
करता है। वह इस प्रकार वह कार्य को सीख लेता है।

गेस्टाल्ट सिद्धान्त

गेस्टाल्ट सिद्धान्त एक जर्मन स्कूल की देन है। गेस्टाल्ट स्कूल का जन्म
सन 1920 ई0 में हुआ था। इस स्कूल में संबंधित व्यक्ति मैक्स वर्दीगर, कोहलर,
तथा कोफका है। वर्दीमर इस सिद्धान्त के प्रवर्तक है और कोहलर तथा कोफका
ने इस सिद्धान्त सिद्धान्त को आगे बढ़ाने का कार्य किया है। गेस्टाल्ट जर्मन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है समग्राकृति या पूर्ण
आकार। गेस्टाल्ट के प्रमुख सिद्धान्त इस प्रकार है-

  1.  मस्तिष्क में चीजों को व्यवस्थित करने का गुण होता है। यह विभिन्न
    वस्तुओं को तत्काल आकार-प्रकार और गुण प्रदान कर सकता है।
  2. हम किसी भी चीज को पूर्ण रूप या समग्र रूप से देखते हैं। यद्यपि यह
    विभिन्न भागों या अंगों से बनी होती है, फिर भी उनसे भिन्न होती है।
  3. यह सांख्यिकी में विश्वास नहीं करता है। मानव व्यवहार को गणितीय रूप
    से विश्लेषित नही किया जा सकता है। ये परिमाण की अपेक्षा गुणात्मकता
    में अधिक विश्वास करते है।
  4. ये मनोवैज्ञानिक वातावरण में विश्वास करते है और उसी को अधिक
    महत्व देते है। ये भौतिक वातावरण को अधिक महत्व नहीं देते।
  5. ये समाकृतिका के सिद्धान्त को मानते है।

कोहलन के अनुसार सीखना किसी स्थिति के समग्र या पूर्णरूप से
समझने का प्रतिफल है। इसका सम्बन्ध प्रत्यक्षीकरण से है। सीखने में प्राणी
सम्पूर्ण परिस्थिति को दृष्टि में रखकर समस्या का हल ढूंढने में सफल होता है।
इसके अन्तर्गत सीखने की क्रिया में सफलता प्राप्त करने के लिए या समस्या का
समाधान ढूंढने में अन्तदृष्टि या सूझ विद्यमान रहती है। इसलिए इसे अन्तदृष्टि
या सूझ का सिद्धान्त भी कहते है।
यह सिद्धान्त पशुओं की अपेक्षा मनुष्यों पर सफलतापूर्वक लागू किया जा
सकता है क्योंकि सूझ का सम्बन्ध बुद्धि, चिन्तन और कल्पना से होता है और यह
क्षमता पशुओं में कम होती है।

टालमैन का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त

टॉलमैन द्वारा प्रतिपादित सीखने के सिद्धान्त के अनुसार सीखने की
क्रिया में उद्देश्य का विशेष महत्व है। उसका विचार है कि प्राणी की सभी क्रियाएं
उद्देश्यपूर्ण या प्रयोजनपूर्ण होती है। सीखने की क्रिया में प्राणी का व्यवहार
उद्देश्यपूर्ण होता है। उदाहरार्थ भूखा कुत्ता अपने मालिक की विशिष्ट ध्वनि सुनकर
दौड़ना सीख जाता है। यहाँ पर कुत्ते का दौड़ना यांत्रिक नही है वरन किसी ज्ञान
पर आधारित है। यदि उत्तेजक में अर्थ नही जुड़ा रहता है तो किसी भी प्रकार
की प्रतिक्रिया नही होती है। टॉलमैन का विचार है कि उत्तेजक में उसी समय
अर्थ जुड़ता है जब वह किसी की आवश्यकता और उद्देश्य की पूर्ति में सहायक
होते है।

इस सिद्धान्त के अनुसार सीखने वाला उद्देश्यों की सम्प्राप्ति के लिये प्रतीकों का
अनुसरण करता है और विषय वस्तु में अर्थ सीखने का प्रयास करता है। टॉलमैन
यह मानता है कि सीखना ज्ञानात्मक मानचित्र बनाना है। टॉलमैन के विचार से
पुरस्कार, दण्ड एवं अनुबन्धन के प्रतीक है जो उसे यह ज्ञान देते हैं कि उसे कौन
सा मार्ग चुनना है। वे ऐसे प्रतिनिधि नही है जो उनसे संबंधित कार्यो को करा सके
या रोक सके।

क्षेत्रीय सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक कुर्त लेविन 1890-1947 हैं। उनका सिद्धान्त,
सीखने के ज्ञानात्मक सिद्धान्त के तुरन्त बाद स्थान दिया गया है।
लेविन के मत का आधार वातावरण में व्यक्ति की स्थिति है। लेविन ने
जीवन स्थल के आधार पर व्यक्ति के अनुभवों की व्याख्या की है। लेविन के
अनुसार जीवन स्थल, वह वातावरण है जिसमें व्यक्ति रहता है और उससे
प्रभावित होता है। किसी व्यक्ति का यह जीवन स्थल मनोवैज्ञानिक शक्तियों पर
निर्भर होता है।

लेविन के सिद्धान्त में भत्र्सना, लक्ष्य तथा अवरोधक प्रमुख तत्व है। किसी
व्यक्ति को लक्ष्य की संप्राप्ति के लिए अवरोधक को पार करना आवश्यक है। यह
अवरोधक मनोवैज्ञानिक अथवा भौतिक हो सकता है। व्यक्ति के जीवन स्थल में
अवरोधक के मनोवैज्ञानिक रूप से परिवर्तन होने के कारण सदैव नये निर्माण होते
रहते है।

निर्माणवाद

निर्माणवाद सीखने को दर्शन शास्त्र है। यह अधिगम की प्रक्रिया में अधिगमकर्ता
को महत्व देता है। इसके अनुसार अधिगमकर्ता अपने लिए प्रत्ययों का निर्माण
करता है, समस्या के बारे में अपने समाधान खोजता है। सीखना मानसिक संरचना
के निर्माण का परिणाम है जिसमें अधिगमकर्ता नयी सूचना को पुरानी सूचना से
अर्थपूर्ण ढंग से जोड़ता है। अत: सीखना अधिगमकर्ता की पृष्ठभूमि, विश्वासों व
मनोवृत्तियों से प्रभावित होते है।

निर्माणवाद में सीखने के सिद्धान्त-

  1. सीखना सक्रिय प्रक्रिया है जिसमें अधिगमकर्ता संवेदनाओं का प्रयोग
    करते हुए इनका अर्थपूर्ण निर्माण करता है
  2. जैसे-जैसे व्यक्ति सीखता जाता है, वह सीखने की प्रक्रिया को भी
    सीखता है। 
  3. इसके अनुसार सीखने के लिए मस्तिष्क तथा हाथ दोनों सक्रिय होना
    आवश्यक है।
  4. सीखने की प्रक्रिया में भाषा निहित होती है। 
  5. सीखना एक सामाजिक क्रिया है। सीखना हमारे अन्य लोगों से सम्बन्ध
    जैसे शिक्षण, संगी-साथी व परिवार पर निर्भर करता है। 
  6. सीखना किसी परिप्रेक्ष्य में होता है। हम अपने पूर्व ज्ञान, विश्वासों,
    पक्षपातों तथा भय के सम्बन्ध में सीखते है। 
  7. सीखने के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है। जितना ज्यादा हमारा ज्ञान
    होता है उतना ही हम सीखते है। 
  8. सीखना क्षणभर में नही हो जाता। सीखने में समय लगता है। 
  9. सीखने का मुख्य तत्व प्रेरणा है।
    निर्माणवाद के अन्तर्गत मुख्य रूप से प्याजे, बायगोत्सकी, बूनर तथा डीवी
    के अधिगम सम्बन्धी विचार आते है।

सीखने को प्रभावित करने वाले कारक

  1. सामान्य बुद्धि
  2. विशिष्ट बुद्धि
  3. व्यक्ति का पूर्व में अर्जित ज्ञान व कौशल
  4. परिवार का प्रभाव
  5. व्यक्ति का व्यक्तित्व, उदाहरण व्यक्ति के शील गुण, चिन्ता का स्तर आदि
  6. अधिगम के तरीके
  7. व्यक्ति का आत्म प्रत्यय
  8. संगी साथी का प्रभाव

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