गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन परिचय एवं रचनाएँ

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इनका जन्म 13 नबम्बर, 1917 में म.प्र. के शिवपुरी में हुआ था । इन्होंने बी.ए. तक
अध्ययन प्राप्त किया । आर्थिक संकटों के बावजूद इन्होंने अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच एवं वैज्ञानिक
उपन्यासों में विशेष रूचि ली । 11 सितम्बर 1964 में मृत्यु हु ।

गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाएँ-

  1. कविता संग्रह-’’चाँद का मुँह टेढ़ा हैं’’ तार सप्तक । 
  2. समीक्षा- एक पुनर्विचार, एक साहित्यिक डायरी, भारत इतिहास और
    संस्कृति, नये साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र । 
  3. कहानी संग्रह- काठ का सपना, सतह से उठता आदमी । 
  4. निबन्ध- नये निबन्ध, न कविता का आत्म संघर्ष । 
  5. उपन्यास-विपात्र ।

गजानन माधव मुक्तिबोध का भावपक्ष-

इनका काव्य चिन्तन प्रधान हैं । इन्होंने सामाजिक रूढ़ियों, अपूर्ण व्यक्तित्व,
अन्याय एवं शोषण का सदैव विद्रोह किया । मध्यम वर्गीय जीवन का विकास , उच्चवर्गीय
समाज द्वारा किये जाने वाले शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक शोषण को जीवन की सबसे
बड़ी विडम्बना बताया व इसे तोड़ने के प्रयास में जीवन में दु:ख व स्वत: दु:ख से व्यथित
थे। समाज में व्याप्त अत्याचार, भ्रष्टाचार, अन्याय के लिये पँूजीवादी व्यवस्था को
उत्तरदायी मानते हैं ।सत्य एवं यथार्थ की दृष्टि ने उन्हें माक्र्सवादी चेतना प्रदान की । उनके साहित्य
में व्यंग्य व तीखे प्रहारों का प्रमुख स्थान हैं ।

गजानन माधव मुक्तिबोध का कलापक्ष-

उन्होंने मुक्तक कविताएँ लिखी हैं । बिम्ब विधान और प्रतीक योजना उनकी प्रमुख
शैलियाँ हैं । एक वचन की कविताओं में समास समाहित हैं । इन्होंने परम्परागत प्रतीकों
को नये संदर्भ प्रदान किये जो सर्वथा नवीन किन्तु सार्थक अर्थ प्रदान करते हैं ।
ब्रह्मराक्षस, बरगद, शिशु, लकड़ी का रावण, अँधेरा आदि ऐसे प्रतीक हैं ।

गजानन माधव मुक्तिबोध कीभाषा-

इनकी भाषा में तत्सम् एवं तद्भव के रूप स्पष्ट हैं । लेकिन अंग्रेजी, फारसी, उर्दू
शब्दों का भी प्रयोग हुआ हैं । रहस्यवादी, वैज्ञानिक, शब्दावली का प्रयोग हुआ हैं । भाषा
पर उनका पूर्ण अधिकार हैं ।

गजानन माधव मुक्तिबोध केअलंकार-

इन्होंने अलंकार की मर्यादा स्वीकार नहीं की । उनके मुक्त छंद में आंतरिक तुकों
का एक विशिष्ट स्थान है।

गजानन माधव मुक्तिबोध का साहित्य में  स्थान-

स्व.मुक्तिबोध जिन मूल्यों के लिये संघर्ष करते रहे, उन मूल्यों की मानवता को
सदैव आवश्यकता रहेगी और इस संदर्भ में उनका साहित्य पथ प्रदर्शक रहेगा ।

गजानन माधव मुक्तिबोध का केन्द्रीय भाव-

‘मुझे कदम-कदम पर’ कविता में बताया गया है कि चौराहें मिलना बहुत अच्छा हैं।
ये रास्ते में संकट बनकर नही, बल्कि विकल्प बनकर हमारे सामने आते हैं। यानी हमारे
समक्ष जितने रास्ते होंगे, उतने ही विकल्प होंगे और हम उनमें से जो भी विकल्प चुनेंगे
वह अपने आप में अनेक अन्य विकल्प लिए हुए होगा। अत: जीवन के लिए किसी भी
अनुभव को व्यर्थ नही समझना चाहिए। सभी का अपना महत्व होता है। इस कविता में
कवि का दृष्टिकोण व्यवहारवादी हैं। अपनी बात अस्पष्ट रूप से कहने के लिए कवि ने
प्रतीकों का प्रयोग किया हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन परिचय एवं रचनाएँ

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