प्लेटो का जीवन परिचय एवं शिक्षा दर्शन

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महान् यूनानी दार्शनिक प्लेटो का जन्म 427 ई. पूर्व में एथेन्स के एक कुलीन परिवार में हुआ था। उनके पिता अरिस्टोन एथेन्स
के अन्तिम राजा कोर्डस के वंशज तथा माता पेरिकतिओन यूनान के सोलन घराने से थी। प्लेटो का वास्तविक नाम
एरिस्तोकलीज था, उसके अच्छे स्वास्थ्य के कारण उसके व्यायाम शिक्षक ने इसका नाम प्लाटोन रख दिया। प्लेटो शब्द का
यूनानी उच्चारण ‘प्लातोन’ है तथा प्लातोन शब्द का अर्थ चौड़ा-चपटा होता है। धीरे-धीरे प्लातोन के स्थान पर प्लेटो कहा
जाने लगा। वह आरम्भ से ही राजनीतिज्ञ बनना चाहता था लेकिन उसका यह स्वप्न पूरा न हो सका और वह एक महान्
दार्शनिक बन गया।

प्लेटो के जन्म के समय एथेन्स यूनान का महानतम राज्य था। लेकिन लगातार 30 वर्षों तक स्पार्टा और पलीपोनेशिया के साथ
युद्ध ने एथेन्स की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिला दी। 404 ई. पू. में एक क्रान्ति द्वारा एथेन्स में लोकतन्त्र के स्थान पर तीस निरंकुशों
का शासन स्थापित हुआ। प्लेटो को शासन में भाग लेने के लिए आमन्त्रित किया गया लेकिन उसने शासन में भाग लेने से इन्कार
कर दिया। शीघ्र ही दूसरी क्रान्ति द्वारा एथेन्स में तीस निरंकुशों के स्थान पर पुन: प्रजातन्त्र की स्थापना की गई। लेकिन इस
शासन के दौरान सुकरात की मृत्यु ने उसके दिल में प्रजातन्त्र के प्रति घृणा पैदा कर दी।

वह 18 या 20 वर्ष की आयु में सुकरात की ओर आकर्षित हुआ। यद्यपि प्लेटो तथा सुकरात में कुछ विभिन्नताएँ थीं लेकिन
सुकरात की शिक्षाओं ने इसे अधिक आकर्षित किया। प्लेटो सुकरात का शिष्य बन गया। सुकरात के विचारों से प्रेरित होकर
ही प्लेटो ने राजनीति की नैतिक व्याख्या की, सद्गुण को ज्ञान माना, शासन कला को उच्चतम कला की संज्ञा दी और विवेक
पर बल दिया। 399 ई0 पू0 में सुकरात को मृत्यु दण्ड दिया गया तो प्लेटो की आयु 28 वर्ष थी। इस घटना से परेशान होकर
वह राजनीति से विरक्त होकर एक दार्शनिक बन गए। उसने अपनी रचना ‘रिपब्लिक’ में सुकरात के सत्य तथा न्याय को उचित
ठहराने का प्रयास किया है। यह उसके जीवन का ध्येय बन गया। वह सुकरात को प्राणदण्ड दिया जाने पर एथेन्स छोड़कर
मेगरा में चला गया। क्योंकि वह लोकतन्त्र से घृणा करने लग गया था। मेगरा जाने पर 12 वर्ष का इतिहास अज्ञात है। लोगों
का विचार है कि इस दौरान वह इटली, यूनान और मिस्र आदि देशों में घूमता रहा। वह पाइथागोरस के सिद्धान्तों का ज्ञान
प्राप्त करने के लिए 387 ई0 पू0 में इटली और सिसली गया। सिसली के राज्य सिराक्यूज में उसकी भेंट दियोन तथा वहाँ के
राजा डायोनिसियस प्रथम से हुई। उसके डायोनिसियस से कुछ बातों पर मतभेद हो गए और उसे दास के रूप में इजारन
टापू पर भेज दिया गया। उसे इसके एक मित्र ने वापिस एथेन्स पहुँचाने में उसकी मदद की।

प्लेटो ने 386 ई. पू. में इजारन टापू से वापिस लौटकर अपने शिष्यों की मदद से एथेन्स में अकादमी खोली जिसे यूरोप का
प्रथम विश्वविद्यालय होने का गौरव प्राप्त है। उसने जीवन के शेष 40 वर्ष अध्ययन-अध्यापन कार्य में व्यतीत किए। प्लेटो की
इस अकादमी के कारण एथेन्स यूनान का ही नहीं बल्कि सारे यूरोप का बौद्धिक केन्द्र बन गया। उसकी अकादमी में गणित
और ज्यामिति के अध्ययन पर विशेष जोर दिया जाता था। उसकी अकादमी के प्रवेश द्वार पर यह वाक्य लिखा था- “गणित
के ज्ञान के बिना यहाँ कोई प्रवेश करने का अधिकारी नहीं है।” यहाँ पर राजनीतिज्ञ, कानूनवेता और दार्शनिक शासक बनने
की भी शिक्षा दी जाती थी।

डायोनिसियस प्रथम की मृत्यु के बाद 367 ई. पू. डायोनिसियस द्वितीय सिराक्यूज का राजा बना। अपने मित्र दियोन के कहने
पर वह वहाँ जाकर राजा को दर्शनशास्त्र की शिक्षा देने लग गया। इस दौरान राजा के चाटुकारों ने दियोन के खिलाफ बोलकर
उसे देश निकाला दिलवा दिया और उसकी सम्पत्ति व पत्नी जब्त कर ली। इससे नाराज प्लेटो एथेन्स वापिस चला गया।
361 ई. पू. में डायोनिसियस ने उसे दोबारा सिराक्यूज आने का निमन्त्रण दिया, परन्तु वह यहाँ आने को तैयार नहीं था, लेकिन
तारेन्तय के दार्शनिक शासक की प्रेरणा से वह वहाँ आकर डायोनियस को दर्शनशास्त्र का ज्ञान देने लग गया। लेकिन दोबारा
डायोनिसिथस व प्लेटो में सैद्धान्तिक बातों पर मतभेद हो गए और वह वापिस एथेन्स आ गया। इससे उसकी आदर्शवादिता
को गहरा आघात पहुँचा और वह व्यावहारिकता की ओर मुड़कर ‘The Laws’ नामक ग्रन्थ लिखने लग गया। अपने किसी शिष्य
के आग्रह पर वह एक विवाह समारोह में शामिल हुआ और वहीं पर सोते समय 81 वर्ष की अवस्था में उसकी मृत्यु हो गयी।

प्लेटो का जीवन-दर्शन 

प्लेटो अपने गुरू सुकरात की ही तरह यह मानते है कि समय की
आवश्यकता जीवन में एक नये नैतिक बन्धन (मोरल बॉन्ड) की है। प्लेटो ने
जीवन के लिए एक नए नैतिक आधार को तैयार करने की कोशिश की जिसमें
व्यक्ति को पर्याप्त अवसर हो तथा संस्थागत जीवन को भी उचित मान्यता
मिले। प्लेटो इस नए नैतिक बन्धन का आधार विचारों तथा सार्वभौमिक एवं
शाश्वत सत्य को मानते है। उनके अनुसार अच्छाइ ज्ञान या पूर्ण विचारों में
समाहित होता है जो कि ‘मत’ से भिन्न होता है।

प्लेटो एक आदर्शवादी चिन्तक थे जिन्होंने यथार्थ तथा अस्थायी की
उपेक्षा की है तथा सार्वभौम और स्थायी पर बल दिया है। प्लेटो के लिए
दृष्टिगोचर होने वाली वस्तुएँ कालसत्तात्मक (ऐहिक) है तथा अदृश्य वस्तुएँ ही
नित्य हैं। उसके प्रत्यय दिव्य उपपत्तियां है, तथा इनका अनुभव ही विज्ञान
अथवा ज्ञान है। इसके विपरीत वे लोग जो सिद्धान्तों का उनके मूर्त प्रतिमूर्तियों
से अलग बोध नहीं रखते, ऐसे संसार में रहते हैं, जिसे प्लेटो स्वापनिक स्थिति
कहते हैं। उनका वस्तुओं से परिचय मात्र ‘मत’ के समान होता है, वे यर्थाथ
का बोध तो रखते है, किन्तु सत् के ज्ञान से रहित होते है।

आदर्शवादी दर्शन भौतिक पदार्थ की तुलना में विचार को स्थायी और
श्रेष्ठ मानता है। प्लेटो महानतम आदर्शवादी शिक्षाशास्त्री थे। उनके अनुसार
पदार्थ जगत, जिसको हम इन्द्रियों से अनुभव करते हैं, वह विचार जगत का
ही परिणाम है। विचार जगत वास्तविक और अपरिवर्तनशील है। इसी से
भौतिक संसार का जन्म होता है। भौतिक पदार्थों का अन्त अवश्यम्भावी है।

विचार जगत का आधार प्रत्यय है। प्लेटो के अनुसार प्रत्यय पूर्ण होता
है और इन्द्रियों के सम्पर्क में आने वाले भौतिक वस्तु अपूर्ण। प्लेटो ने फेइडरस
में सुकरात से कहलवाया है कि सत्य या वास्तविकता का निवास मानव के
मस्तिष्क में होता है न कि बाह्य प्रकृति में। (रॉस: 61) ज्ञानी मानव वह है जो
दृष्टि जगत पर ध्यान न देकर प्रत्ययों के ज्ञान की जिज्ञासा रखता है- क्योंकि
प्रत्ययों का ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है। ज्ञान तीन तरह के होते है- (i)
इन्द्रिय-जन्य ज्ञान (ii) सम्मति जन्य ज्ञान तथा (iii) चिन्तन या विवेक जन्य
ज्ञान। इनमें से प्रथम दो अधूरा, अवास्तविक एवं मिथ्या ज्ञान है जबकि चिन्तन
या विवेकजन्य (प्रत्ययों का) ज्ञान इन्द्रियातीत होने के कारण वास्तविक, श्रेष्ठ
एवं अपरिवर्तनशील है। व्यक्ति किसी भी पदार्थ को अपनी दृष्टि से देखकर
उसकी व्याख्या करता है।- दूसरा व्यक्ति उसी पदार्थ की उससे भिन्न अर्थ
ग्रहण कर सकता है। इस तरह से सम्मति भिन्न हो सकती है। अत: इसे ज्ञान
कहना उचित नहीं है। प्लेटो ने रेखागणित के सिद्धान्तों को बेहतर ज्ञान कहा।
जैसे त्रिभुज की दो भुजा मिलकर तीसरी भुजा से बड़ी होती है- यह सभी
त्रिभुजों के लिए सही है। इससे भी अधिक श्रेष्ठ ज्ञान प्लेटो ने तत्व ज्ञान को
माना।

प्लेटो ने संसार को सत् और असत् दोनों का संयोग माना है। प्रत्ययों
पर आधारित होने के कारण संसारिक पदार्थ सत् है पर समरूपता का आभाव
एवं क्षणभंगुरता उसे असत् बना देता है। प्लेटो ने दृष्टि जगत को द्रष्टा की
क्रिया का फल माना है। प्लेटो आत्मा की अमरता को स्वीकार करते हुए इसे
परम विवेक का अंश मानता है।

नैतिक मूल्यों के सिद्धान्त को प्लेटो के संवाद में उच्च स्थान मिला है।
सोफिस्टों ने यह धारणा फैलायी थी कि गलत और सही परिस्थिति विशेष
पर निर्भर करता है। जो एक समय और स्थान पर सही है वह दूसरे समय
और स्थान पर गलत हो सकता है। प्लेटो सुकरात के माध्यम से इस
अवसरवादी विचारधारा का विरोध करते हुए कहते हैं कि नैतिक मूल्य शाश्वत
हैं। फेडो में प्लेटो ने सम्पूर्ण सुन्दरता, सम्पूर्ण अच्छाई तथा सम्पूर्ण महानता
की बात की है। इस संसार में जो भी सुंदर या अच्छा है वह इसी सम्पूर्ण
सुन्दरता या अच्छाई का अंश है। सर्वोच्च सत्य से ही अन्य जीव एवं पदार्थ
अपना अस्तित्व प्राप्त करते हैं।

यद्यपि प्लेटो ने सर्वोच्च सत्य या सत्ता को ईश्वर या गॉड के नाम से
नहीं पुकारा (रॉस,71) पर इसी परम सत्य का अंश मानव की आत्मा को
माना। प्लेटो के अनुसार इस संसार और जीवन से परे भी एक संसार और
जीवन है जो अधिक सत्य, अधिक सुंदर तथा अधिक वास्तविक है। आदर्श
जीवन का उद्देश्य शिवत्व (अच्छाई) एवं सुन्दरता प्राप्त करना बताता है ।

प्लेटो की रचनाएँ

काल के आधार पर चार भागों में बाँटी जा सकती हैं। प्रथम वर्ग में सुकरात से सम्बन्धित रचनाएँ हैं। इन
रचनाओं के विचार सुकरान्त के विचारों की ही अभिव्यक्ति है। अपोलॉजी (Apology), क्रीटो (Crito), यूथीफ्रो (Euthyphro),
जोर्जियस (Gorgias) आदि प्रथम वर्ग की रचनाएँ हैं। ये सभी रचनाएँ सुकरात की मृत्यु से सम्बन्धित हैं, प्रथम दो रचनाएँ राज्य
की आज्ञा का पालन तथा उसकी सीमा से सम्बन्धित हैं।
द्वितीय वर्ग की रचनाएँ 380 ई0 पू0 की है। ये प्लेटो के अपने विचारों से सम्बन्धित हैं। इस वर्ग में मीनो (Meno), प्रोटागोरस
(Protagoros), सिंपोजियम (Symposium), फेडो (Phaedo), रिपब्लिक (Republic) और फेड्रस (Phaedrus) आदि रचनाएँ
आती हैं। ये सभी रचनाएँ प्लेटो की चरमोत्कृष्ट साहित्यिक एवं दार्शनिक प्रतिभा को प्रतिबिम्बित करती है।
तीसरे वर्ग में संवाद या कथोपकथन (Dialogues) आते हैं जिनका सम्बन्ध प्लेटो की शैली, विचार और व्यक्तित्व से अधिक
द्वन्द्वात्मक पद्धति से है। पार्मिनीडिज (Parmenides), थीटिटस (Theaetetus), सोफिस्ट (Sophist), स्टेट्समैन (Statesman)
आदि रचनाएँ आती हैं।

अन्तिम वर्ग में फीलिबस (Philobus), टायमीयस (Timaeus), लॉज (Laws) आदि ग्रन्थ आते हैं। लॉज प्लेटो का अन्तिम ग्रन्थ
है। इस ग्रन्थ में सुकरात एक चरित्र के रूप में पूर्णत: विलीन हो जाता है।
इन रचनाओं में प्लेटो की सर्वोत्तम रचना रिपब्लिक (Republic) है जिसके द्वारा प्लेटो राजनीति, दर्शन, शिक्षा, मनोविज्ञान, कला,
नीतिशास्त्र आदि के क्षेत्र में एक मेधावी व सर्वश्रेष्ठ विचारक के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। यह रचना राजनीतिक चिन्तन के इतिहास
में प्लेटो की एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण व अमूल्य देन मानी जाती है।

प्लेटो की अध्ययन शैली और पद्धति

प्लेटो ने प्रत्येक विषय को स्पष्ट करने के लिए सशक्त, रोचक और आकर्षक संवाद शैली अपनाई है। उसकी रचनाओं में केवल
एक पात्र का दूसरे पात्र से वार्तालाप ही नहीें होता बल्कि दर्शन कविता के साथ, विज्ञान कला के साथ, सिद्धान्त व्यवहार के
साथ, राजनीति अर्थशास्त्र के साथ, भावना विवेक के साथ, शरीर आत्मा के साथ, व्यायाम संगीत के साथ स्वर में स्वर मिलाकर
बोलते हुए प्रतीत होते हैं। इसके चलते जहाँ प्लेटो को समझना कुछ कठिन होता है, वहाँ उन्हें पढ़ना उतना ही आनन्द देता
है। क्रॉसमैन ने लिखा है- “मैं जितना अधिक रिपब्लिक को पढ़ता हूँ, उतना ही इससे घृणा करता हूँ, फिर भी इसे बार-बार
पढ़े बिना अपने आप को रोक नहीं पाता हूँ।” उसके विचारों में औपन्यासिक रोचकता है। उसने पौराणिक दृष्टान्तों एवं कथाओं
को शामिल करके रचनाओं को और अधिक मनोरंजक बना दिया है। प्लेटो का दर्शनशास्त्र भव्य रूप में प्रकट हुआ है। अतएव
उसने ऐसी शैली अपनाई है जो सत्य और सौन्दर्य के समन्वय को प्रकट करती है।

प्लेटो ने अपने चिन्तन में अनेक पद्धतियों का प्रयोग किया है। ये पद्धतियाँ नैतिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक समस्याओं के
विश्लेषण के लिए प्रयोग में लाई गई हैं जिनमें प्रमख इस प्रकार से हैं –

प्लेटो की सबसे प्रमुख पद्धति द्वन्द्वात्मक पद्धति (Dialectical Method) है। प्लेटो ने यह पद्धति अपने गुरु सुकरात से ग्रहण की
है। प्लेटो ने रिपब्लिक, स्टेटसनैन, लॉज, क्रीटो आदि ग्रन्थों में इस पद्धति का प्रयोग किया है। यह पद्धति चिन्तन की वह पद्धति
है, जिसके द्वारा प्रश्नोत्तर एवं तर्क-वितर्क के आधार पर किसी सत्य की खोज की जाती है। इस पद्धति के द्वारा मस्तिष्क
में छिपे विचारों को उत्तेजित कर उन्हें सत्य की ओर ले जाने का प्रयास किया जाता है। इसलिए अपने मौलिक रूप में द्वन्द्वात्मक
(Dialectical) पद्धति का अर्थ वार्तालाप की प्रक्रिया से है; प्रश्न पूछने और उत्तर देने की शैली से है; तर्क-वितर्क की पद्धति
से है; किसी विषय पर अपना मत प्रकट करने और दूसरे के मत को जानने की विधि से है। वही व्यक्ति किसी विषय पर अपना
मत प्रकट कर सकता है, जिसे उस विषय का ज्ञान होता है। ग्रीक जगत में यह विधि कोई नई नहीं है। सुकरात ने कहा कि
जब लोगों में परस्पर एक साथ मिलाकर विचार करने की प्रथा आई, तभी इस विधि का जन्म हुआ। लेकिन प्लेटो ने इसे
वार्तालाप की प्रणाली मात्र न मानकर इसे सत्य की खोज करने की विधि माना, इस विधि का प्रयोग प्लेटो ने प्रचलित विश्वासों
व धारणाओं का खण्डन करके नए विश्वासों व धारणाओं की स्थापना हेतु किया। प्लेटो का विश्वास था कि एक विचार को
धराशायी करके ही दूसरे विचार को प्रतिष्ठित किया जा सकता है। बार्कर का मत है कि- “वैचारिक क्षेत्र में सत्य को तभी
एक विजयी के रूप में प्रतिष्ठित किया जा सकता है जब एक रुद्र विचार दूसरे विचार को निगलता है।” प्लेटो का विश्वास
था कि धीरे-धीरे ही सत्य की ओर बढ़ा जा सकता है। विशिष्ट विचार को ‘अनेक में एक’ और ‘एक में अनेक’ की खोज द्वारा
ही प्राप्त किया जा सकता है। यह विशिष्ट विचार ही सत्य है। सत्य की खोज ही इस पद्धति का उद्देश्य है। डायलेक्टिक की
उत्पत्ति इसी मौलिक तथ्य से होती है कि सभी वस्तुओं में एकता और अनेकता का सामंजस्य पाया जाता है। उसने अपने ग्रन्थ
रिपब्लिक में यह स्पष्ट कर दिया है कि किस प्रकार प्रत्येक वस्तु का रूप दूसरी वस्तुओं के रूप से जुड़ा होता है। सभी वस्तुओं
के रूप एक-दूसरे से मिलकर सत् या शिव का स्वरूप धारण करते हैं। प्लेटो ने संवाद प्रणाली के माध्यम से पात्रों के द्वारा
अन्तिम सत्य का पता लगाने की कोशिश की है। उसने संवाद-शैली को विचार क्रान्ति के सर्वोत्तम एवं रुचिकर साधन के रूप
में प्रयोग किया है। इससे पात्रों व श्रोताओं के दिमागों में सत्य को ठूँसने की आवश्यकता नहीं होती। प्लेटो ने इस पद्धति का
प्रयोग तीन उद्देश्यों के लिए किया है- (1) सत्य की खोज के लिए (2) सत्य की अभिव्यक्ति और प्रचार के लिए (3) सत्य की
परिभाषा के लिए।

द्वन्द्वात्मक पद्धति एक महत्त्वपूर्ण पद्धति होने के बावजूद भी आलोचना का शिकार हुई। आलोचकों ने कहा कि इस पद्धति में
प्रश्न अधिक पूछे जाते हैं, उत्तर कम दिए जाते हैं, इसलिए यह मस्तिष्क को भ्रांत करती है। यह सत्य को असत्य और असत्य
को सत्य सिद्ध कर सकती है। सत्य की प्राप्ति वाद-विवाद से न होकर मनन से ही हो सकती है। वाकपटुता के बल पर धूर्त
व्यक्ति समाज में अपना स्थान बना सकते हैं। यह पद्धति शंकाओं का समाधान करने की बजाय भ्रांति ही पैदा करती है। लेकिन
अनेक त्रुटियों के बावजूद भी इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि प्लेटो ने इसके आधार पर न्याय सिद्धान्त का प्रतिपादन
किया है। यह विचार और चिन्तन करने की शक्ति को उत्प्रेरित करने की क्षमता रखती है।

प्लेटो ने अपने राजनीतिक चिन्तन में निगमनात्मक पद्धति (Deductive Method) का भी काफी प्रयोग किया है। इस पद्धति का
सार यह है कि इसमें सामान्य से विशेष की ओर पहुँचा जाता है। इसका अर्थ यह है कि सामान्य सिद्धान्त के आधार पर विशेष
के सम्बन्ध में निष्कर्ष निकाले जाते हैं। प्लेटो ने दार्शनिक राजा का सिद्धान्त इसी पद्धति पर आधारित किया है। प्लेटो के
अनुसार, “सद्गुण ही ज्ञान है”। दार्शनिक ज्ञानी होते हैं, इसलिए वे सद्गुणी भी होते हैं और उन्हें ही शासक बनना चाहिए।
इसी पद्धति का प्रयोग करके प्लेटो ने वर्ग-सिद्धान्त, शिक्षा-सिद्धान्त और दार्शनिक शासक का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है।
प्लेटो ने अपने सामान्य सिद्धान्त के आधार पर परम्पराओं और रूढ़ियों को तिलांजलि देते हुए निगमनात्मक पद्धति का ही प्रयोग
किया है। इस पद्धति को सामान्य से विशिष्ट की ओर चलने वाली पद्धति भी कहा जाता है।

प्लेटो ने अपने चिन्तन में विश्लेषणात्मक पद्धति (Analytical Method) का भी प्रयोग किया है। इस पद्धति में वस्तु के मौलिक
तत्त्वों को अलग-अलग करके अध्ययन किया जाता है ताकि सम्पूर्ण वस्तु का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो सके। वह आत्मा के तीन तत्त्व
– विवेक, साहस एवं तृष्णा को मानकर, इनके पृथक्-पृथक् अध्ययन द्वारा मानव स्वभाव का वर्णन करता है। वह दार्शनिक
राजा, सैनिक और उत्पादक वर्ग के अलग-अलग अध्ययन के आधार पर इनसे निर्मित राज्य का विश्लेषण करता है।

प्लेटो ने अपने चिन्तन में सादृश्य विधि (Analogy Method) का भी प्रयोग किया है। उसने अपने सादृश्यों ओर पौराणिक कथाओं
का प्रयोग किया है। उसने इन्हें कहीं तो कलाओं से लिया है और कहीं पशु-जगत् से। रिपब्लिक में कुत्ते के सादृश्य को अनेक
स्थानों पर तर्क का आधार बनाया गया है कि जिस प्रकार चौकीदार के काम के लिए कुत्ता व कुत्तिया एक समान हैं, उसी
प्रकार राज्य के संरक्षक बनने के लिए पुरुष और स्त्री समान हैं। कलाओं के सादृश्य में वह राजनीति को कला मानता है।
अत: अन्य कलाओं की भाँति इसमें भी ज्ञान का आधार होना चाहिए। रिपब्लिक में दार्शनिक राजा की धारणा का आधार अन्य
कलाकारों के सादृश्य पर आधारित है। उसका मानना है कि प्रत्येक राजनीतिज्ञ को अपने कार्य का पूरा ज्ञान होना चाहिए।
उसका कहना है कि कलाकार की भाँति राजनीतिक कलाकार को भी व्यवहार के नियमों के प्रतिबन्ध से मुक्त रखना चाहिए।
इस पद्धति का अर्थ है कि प्रत्येक वस्तु का कुछ उद्देश्य है और वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयासरत है और
उसी की तरफ अग्रसर होती है। अर्थात् प्रत्येक वस्तु की गति उसे उद्देश्य द्वारा ही निरूपित होती है। प्लेटो के चिन्तन में उसके
शिक्षा सिद्धान्त का दार्शनिक आधार सोद्देश्यता ही है। अत: प्रत्येक वास्तविक राज्य का उद्देश्य आदर्श राज्य की तरफ उन्मुख
होना है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्लेटो ने अपने चिन्तन में संवाद शैली का प्रयोग करते हुए बहुत सी पद्धतियों
का अनुसरण किया है। उसकी द्वन्द्वात्मक पद्धति का हीगेल और माक्र्स के विचारों पर, सोद्देश्य पद्धति का अरस्तू, दाँते एवं ग्रीन
पर प्रभाव पड़ा है। प्लेटो की अध्ययन-पद्धति अनेक पद्धतियों का मिश्रण है। प्लेटो ने आवश्यकतानुसार सभी पद्धतियों का
प्रयोग किया है।

प्लेटो का शिक्षा-दर्शन 

सुकरात एवं प्लेटो के पूर्व सोफिस्टों का प्रभाव था पर उनकी शिक्षा
अव्यवस्थित थी तथा इससे कम ही व्यक्ति लाभान्वित हो सकते थे क्योंकि
सोफिस्टों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा नि:शुल्क नहीं थी और इस शुल्क को
चुकाने में कुछ ही लोग सक्षम थे। सोफिस्टों ने शिक्षा के उद्देश्य को सीधी
उपयोगिता से जोड़ दिया इससे भी वे लोगों की घृणा के पात्र बने। क्योंकि
ग्रीस की प्रबुद्ध जनता शिक्षा को अवकाश हेतु प्रशिक्षण मानती थी न कि
जीवन के भरण-पोषण का माध्यम। पेलोपोनेसियन युद्ध में एथेन्स की हार
को लोगों ने सोफिस्टों की शिक्षा का परिणाम माना। फलत: उनका प्रभाव
क्षीण हुआ और सुकरात तथा उसके योग्तम शिष्य प्लेटो को एक बेहतर
शिक्षा व्यवस्था के विकास के लिए उचित पृष्ठभूमि मिली।

मानव इतिहास में शिक्षा के सम्बन्ध में प्रथम पुस्तक प्लेटो द्वारा रचित
‘रिपब्लिक’ है। जिसे रूसो ने शिक्षा की दृष्टि से अनुपम कृति माना। इसके
अतिरिक्त ‘लाज’ में भी शिक्षा के सम्बन्ध में प्लेटो के विचार मिलते हैं।
तत्कालीन प्रजातंत्र हो या कुलीनतंत्र, राजनीति स्वार्थ पूर्ति का साधन बन गई
था। “ाड़यंत्रों, संघर्षो एवं युद्धों की जगह समदश्र्ाी शासन जो नागरिकों के
बीच सद्भावना को बढ़ा सके के महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्लेटो ने एक
नये समाज की रचना आवश्यक माना। इस तरह के समाज की रचना का
सर्वप्रमुख साधन प्लेटो ने शिक्षा को माना। समाज संघर्ष विहीन तभी होगा
जब अपने-अपने गुणों के अनुसार सभी लोग शिक्षित होंगे।

प्लेटो ने शिक्षा को अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय माना है। दि रिपब्लिक में
प्लेटो इसे युद्ध, युद्ध का संचालन एवं राज्य के शासन जैसे महत्वपूर्ण विषयों
में से एक मानता है। दि लॉज में शिक्षा को प्रथम तथा सर्वोत्तम वस्तु माना
है जो मानव को प्राप्त करनी चाहिए। दि क्रिटो में अपनी बात पर बल देते हुए
प्लेटो कहते हैं ‘‘वैसे मानव को बच्चों को जन्म नही देना चाहिए जो उनकी
उचित देखभाल और शिक्षा के लिए दृढ़ नहीं रह सकते।’’

जैसा कि हमलोग देख चुके हैं आदर्शवादी विचारक भौतिक जगत की
अपेक्षा आध्यात्मिक या वैचारिक जगत को अधिक वास्तविक और महत्वपूर्ण
मानते है। अंतिम या सर्वोच्च सत्य भौतिक जगत की अपेक्षा आध्यात्मिक या
वैचारिक जगत के अधिक समीप है क्योंकि ‘सत्य’ या ‘वास्तविक’ की प्रकृति
भौतिक प्रकृति न होकर आध्यात्मिक है। अत: आदर्शवादियों के लिए भौतिक
विज्ञानों की जगह मानविकी- यानि जो विषय स्वयं मानव का अध्ययन करता
है अधिक महत्वपूर्ण है। वस्तुनिष्ठ तथ्यों के अध्ययन की जगह संस्कृति कला,
नैतिकता, धर्म आदि का अध्ययन हमें सही ज्ञान प्रदान करता है।

शिक्षा का उद्देश्य 

प्लेटो शिक्षा को सारी बुराइयों को जड़ से समाप्त करने का प्रभावशाली
साधन मानता है। शिक्षा आत्मा के उन्नयन के लिए आवश्यक है। शिक्षा
व्यक्ति में सामाजिकता की भावना का विकास कर उसे समाज की आवश्यकताओं
को पूरा करने में सक्षम बनाती है। यह नैतिकता पर आधारित जीवन को जीने
की कला सिखाती है। यह शिक्षा ही है जो मानव को सम्पूर्ण जीव जगत में
सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने का गौरव प्रदान करता है। प्लेटो ने शिक्षा के निम्नलिखित
महत्वपूर्ण उद्देश्य बताये:-

  1. बुराइयों की समाप्ति एवं सद्गुणों का विकास:- अपने सर्वप्रसिद्ध
    ग्रन्थ रिपब्लिक में प्लेटो स्पष्ट घोषणा करता है कि ‘अज्ञानता ही
    सारी बुराइयों की जड़ है। सुकरात की ही तरह प्लेटो सद्गुणों के
    विकास के लिए शिक्षा को आवश्यक मानता है। प्लेटो बुद्धिमत्ता को
    सद्गुण मानता है। हर शिशु में विवेक निष्क्रिय रूप में विद्यमान रहता
    है- शिक्षा का कार्य इस विवेक को सक्रिय बनाना है। विवेक से ही
    मानव अपने एवं राष्ट्र के लिए उपयोगी हो सकता है।
  2. सत्य, शिव (अच्छाई एवं सुन्दर) की प्राप्ति:- प्लेटो एवं अन्य प्राच्य
    एवं पाश्चात्य आदर्शवादी चिन्तक यह मानते हैं कि जो सत्य है वह
    अच्छा (शिव) है और जो अच्छा है वही सुन्दर है। सत्य, शिव एवं
    सुन्दर ऐसे शाश्वत मूल्य हैं जिसे प्राप्त करने का प्रयास आदर्शवादी
    शिक्षाशास्त्री लगातार करते रहे हैं। प्लेटो ने भी इसे शिक्षा का एक
    महत्वपूर्ण उद्देश्य माना।
  3. राज्य को सुदृढ़ करना:- सुकरात एवं प्लेटो के काल में ग्रीस में
    सोफिस्टों ने व्यक्तिवादी सोच पर जोर दिया था। लेकिन आदर्शवादी
    शिक्षाशास्त्रियों की दृष्टि में राज्य अधिक महत्वपूर्ण है। राज्य पूर्ण
    इकाई है और व्यक्ति वस्तुत: राज्य के लिए है। अत: शिक्षा के द्वारा
    राज्य की एकता सुरक्षित रहनी चाहिए। शिक्षा के द्वारा विद्यार्थियों में
    सहयोग, सद्भाव और भातश्त्व की भावना का विकास होना चाहिए। 
  4. नागरिकता की शिक्षा:- न्याय पर आधारित राज्य की स्थापना के
    लिए अच्छे नागरिकों का निर्माण आवश्यक है जो अपने कर्तव्यों को
    समझें और उसके अनुरूप आचरण करें। प्लेटो शिक्षा के द्वारा नई
    पीढ़ी में दायित्व बोध, संयम, साहस, युद्ध-कौशल जैसे श्रेष्ठ गुणों का
    विकास करना चाहते थे। ताकि वे नागरिक के दायित्वों का निर्वहन
    करते हुए राज्य को शक्तिशाली बना सकें। 
  5. सन्तुलित व्यक्तित्व का विकास:- प्लेटो के अनुसार मानव-जीवन
    में अनेक विरोधी तत्व विद्यमान रहते हैं। उनमें सन्तुलन स्थापित
    करना शिक्षा का एक महत्वपूर्ण कार्य है। सन्तुलित व्यक्तित्व के
    विकास एवं उचित आचार-विचार हेतु ‘स्व’ को नियन्त्रण में रखना
    आवश्यक है। शिक्षा ही इस महत्वपूर्ण कार्य का सम्पादन कर सकती
    है। 
  6. विभिन्न सामाजिक वर्गों को सक्षम बनाना:- जैसा कि हमलोग
    देख चुके हैं प्लेटो ने व्यक्ति के अन्तर्निहित गुणों के आधार पर समाज
    का तीन वर्गों में विभाजन किया है। ये हैं: संरक्षक, सैनिक तथा
    व्यवसायी या उत्पादक वर्ग। दासों की स्थिति के बारे में प्लेटो ने
    विचार करना भी उचित नहीं समझा। पर ऊपर वर्णित तीनों ही वर्णों
    को उनकी योग्यता एवं उत्तरदायित्व के अनुरूप अधिकतम विकास की
    जिम्मेदारी शिक्षा की ही मानी गई। 

इस प्रकार प्लेटो शिक्षा को अत्यन्त महत्वपूर्ण मानता है। व्यक्ति और
राज्य दोनों के उच्चतम विकास को प्राप्त करना प्लेटो की शिक्षा का लक्ष्य है।
वस्तुत: शिक्षा ही है जो जैविक शिशु में मानवीय गुणों का विकास कर उसे
आत्मिक बनाती है। इस प्रकार प्लेटो की दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य अत्यन्त
ही व्यापक है।

पाठ्यक्रम 

हमलोग पहले ही देख चुके हैं कि आदर्शवादी शिक्षाशास्त्री मानविकी
या मानव-जीवन से सम्बन्धित ज्ञान को भौतिक ज्ञान से सम्बन्धित विषयों से
अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। उसके अनुसार जीवन के प्रथम दस वर्षों में
विद्यार्थियों को अंकगणित, ज्यामिति, संगीत तथा नक्षत्र विद्या का ज्ञान प्राप्त
करना चाहिए। गणित आदि की शिक्षा व्यापार की दृष्टि से न होकर उनमें
निहित शाश्वत सम्बन्धों को जानने के लिए होना चाहिए। संगीत के गणित
शास्त्रीय आधारों की सिफारिश करते हुए प्लेटो कहता है यह शिवम् एवं
सुन्दरम् के अन्वेषण में एक उपयोगी सत्य है। यदि इसका अन्य उद्देश्य को
ध्यान में रखकर अनुसरण किया जाए तो यह अनुपयोगी है।

इसके उपरांत विद्यार्थियों को कविता, गणित, खेल-कूद, कसरत,
सैनिक-प्रशिक्षण, शिष्टाचार तथा धर्मशास्त्र की शिक्षा देने की बात कही गई।
प्लेटो ने खेल-कूद को महत्वपूर्ण माना लेकिन उसका उद्देश्य प्रतियोगिता
जीतना न होकर स्वस्थ शरीर तथा स्वस्थ मनोरंजन प्राप्त करना होना
चाहिए। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क तथा आत्मा का निवास संभव है।
प्लेटो की शिक्षा व्यवस्था में जिम्नास्टिक (कसरत) एवं नृत्य को महत्वपूर्ण
स्थान प्राप्त है। प्लेटो ने इन दोनों के समन्वय का आग्रह किया है। वे मानते
थे कि ‘कसरत विहीन संगीतज्ञ कायर होगा, जबकि संगीत विहीन कसरती
पहलवान आक्रामक पशु हो जायेगा।’ प्लेटो ने नृत्य को कसरत का ही अंग
मानते हुए उसे युद्धकाल और शांतिकाल- दोनों में ही उपयोगी मानते हैं।

प्लेटो ने साहित्य, विशेषकर काव्य की शिक्षा को महत्वपूर्ण माना है।
काव्य बौद्धिक संवेदनशील जीवन के लिए आवश्यक है। गणित को प्लेटो ने
ऊँचा स्थान प्रदान किया है। रेखागणित को प्लेटो इतना अधिक महत्वपूर्ण
मानते थे कि उन्होंने अपनी शैक्षिक संस्था ‘एकेडमी’ के द्वार पर लिखवा रखा
था कि ‘जिसे रेखागणित न आता हो वे एकेडमी में प्रवेश न करें।’ इन विषयों
में तर्क का प्रयोग महत्वपूर्ण है- और सर्वोच्च प्रत्यय- ईश्वर की प्राप्ति में तर्क
सहायक है।

प्लेटो की शिक्षा-व्यवस्था में ‘डाइलेक्टिक’ या दर्शन का महत्वपूर्ण
स्थान है। प्लेटो के ‘डाइलेक्टिक’ में नीतिशास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान,
अध्यात्मशास्त्र, प्रशासन, कानून, जैसे विषय समाहित हैं। इनका अध्ययन
उच्चस्तरीय विद्यार्थियों को कराना चाहिए। यह प्लेटो की शिक्षा-व्यवस्था का
सर्वोच्च हिस्सा है। डाइलेक्टिक का अध्ययन वस्तुत: दार्शनिकों के लिए है जो
राज्य का संचालन करेंगे। दार्शनिक के पाठ्यविषय में प्लेटो संगीत तथा
व्यायाम जैसे विषयों को अपर्याप्त कह कर अस्वीकृत कर देता है, क्योंकि ये
विषय परिवर्तनीय हैं, इसके विपरीत जिन विज्ञानों का वह अन्वेषक है उन्हें सत्
की विवेचना करनी चाहिए: उनमें सर्वगत अनुप्रयोग तथा साथ ही चितनोन्मुख
बनाने की क्षमता होनी चाहिए। जिस पाठ्यक्रम की संस्तुति प्लेटो ने की उसमें
गणित, ज्यामिति, ज्योतिष विद्या (खगोल विज्ञान) सम्मिलित थे। हस्तकलाओं
को अपमानजनक कहकर बहिष्कश्त करने में वह अपनी कुलीन वर्गीय तथा
सीमित रूझान का परिचय देता है।

शिक्षा के स्तर 

प्लेटो ने आधुनिक मनोवैज्ञानिकों की तरह बच्चे के शारीरिक एवं
मानसिक विकास की अवस्था के आधार पर शिक्षा को विभिन्न स्तरों में
विभाजित किया है। ये विभिन्न स्तर हैं-
;

  1. शैशवावस्था:- जन्म से लेकर तीन वर्ष शैशव-काल है। इस
    काल में शिशु को पौष्टिक भोजन मिलना चाहिए और उसका
    पालण-पोषण उचित ढ़ंग से होना चाहिए। चूँकि प्लेटो के
    आदर्श राज्य में बच्चे राज्य की सम्पत्ति है अत: राज्य का यह
    कर्तव्य है कि वह बच्चे की देखभाल में कोई ढ़ील नहीं होने दे। 
  2. नर्सरी शिक्षा:- इसके अन्र्तगत तीन से छह वर्ष की आयु के
    बच्चे आते हैं। इस काल में शिक्षा प्रारम्भ कर देनी चाहिए।
    इसमें कहानियों द्वारा शिक्षा दी जानी चाहिए तथा खेल-कूद
    और सामान्य मनोरंजन पर बल देना चाहिए।
  3. प्रारम्भिक विद्यालय की शिक्षा:- इसमें छह से तेरह वर्ष के
    आयु वर्ग के विद्याथ्र्ाी रहते हैं। वास्तविक विद्यालयी शिक्षा इसी
    स्तर में प्रारम्भ होती है। बच्चों को राज्य द्वारा संचालित
    शिविरों में रखा जाना चाहिए। इस काल में लड़के-लड़कियों
    की अनियन्त्रित क्रियाओं को नियन्त्रित कर उनमें सामन्जस्य
    स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। इस काल में संगीत
    तथा नृत्य की शिक्षा देनी चाहिए। नृत्य एवं संगीत विद्याथ्र्ाी में
    सम्मान एवं स्वतंत्रता का भाव तो भरता ही है साथ ही स्वास्थ्य
    सौन्दर्य एवं शक्ति की भी वृद्धि करता है। इस काल में गणित
    एवं धर्म की शिक्षा भी प्रारम्भ कर देनी चाहिए। रिपब्लिक इसी
    अवधि में अक्षर-ज्ञान देने की संस्तुति करता है पर दि लॉज के
    अनुसार यह कार्य तेरहवें वर्ष में प्रारम्भ करना चाहिए। 
  4. माध्यमिक शिक्षा:- यह काल तेरह से सोलह वर्ष की उम्र की
    है। अक्षर ज्ञान की शिक्षा पूरी कर काव्य-पाठ, धार्मिक सामग्री
    का अध्ययन एवं गणित के सिद्धान्तों की शिक्षा इस स्तर पर दी
    जानी चाहिए।
  5. व्यायाम (जिमनैस्टिक) काल:- यह सोलह से बीस वर्ष की
    आयु की अवधि है। सोलह से अठारह वर्ष की आयु में युवक-युवती
    व्यायाम, जिमनैस्टिक, खेल-कूद द्वारा शरीर को मजबूत बनाते
    हैं। स्वस्थ एवं शक्तिशाली शरीर भावी सैनिक शिक्षा का
    आधार है। अठारह से बीस वर्ष की अवस्था में अस्त्र-शस्त्र का
    प्रयोग, घुड़सवारी, सैन्य-संचालन, व्यूह-रचना आदि की शिक्षा
    एवं प्रशिक्षण दिया जाता है। 
  6. उच्च शिक्षा:- इस स्तर की शिक्षा बीस से तीस वर्ष की आयु
    के मध्य दी जाती है। इस शिक्षा को प्राप्त करने हेतु भावी
    विद्यार्थियों को अपनी योग्यता की परीक्षा देनी होगी और केवल
    चुने हुए योग्य विद्याथ्र्ाी ही उच्च शिक्षा ग्रहण करेंगे। इस काल
    में विद्यार्थियों को अंकगणित, रेखागणित, संगीत, नक्षत्र विद्या
    आदि विषयों का अध्ययन करना था।
  7. उच्चतम शिक्षा:- तीस वर्ष की आयु तक उच्च शिक्षा प्राप्त
    किए विद्यार्थियों को आगे की शिक्षा हेतु पुन: परीक्षा देनी पड़ती
    थी। अनुत्तीर्ण विद्याथ्र्ाी विभिन्न प्रशासनिक पदों पर कनिष्ठ
    अधिकारी के रूप में कार्य करेंगे। सफल विद्यार्थियों को आगे
    पाँच वर्षों की शिक्षा दी जाती है। इसमें ‘डाइलेक्टिक’ या दर्शन
    का गहन अध्ययन करने की व्यवस्था थी। इस शिक्षा को पूरी
    करने के बाद वे फिलॉस्फर या ‘दार्शनिक’ घोषित हो जाते थे।
    ये समाज में लौटकर अगले पन्द्रह वर्ष तक संरक्षक के रूप में
    प्रशिक्षित होंगे और व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करेंगे। राज्य का
    संचालन इन्हीं के द्वारा होगा। 

शिक्षण-विधि 

प्लेटो के गुरू, सुकरात, संवाद (डायलॉग) द्वारा शिक्षा देते थे- प्लेटो
भी इसी पद्धति को पसन्द करते थे। प्लेटो ने संवाद के द्वारा मानव जीवन के
हर आयाम पर प्रकाश डाला है। एपालोजी एक अत्यधिक चर्चित संवाद है
जिसमें सुकरात अपने ऊपर लगाए गए समस्त आरोपों को निराधार सिद्ध करते
है। ‘क्राइटो’ एक ऐसा संवाद है जिसमें वे कीड़ो के साथ आत्मा के स्वरूप का
विवेचन करते हैं। प्लेटो अपने गुरू सुकरात के संवाद को स्वीकार कर उसका
विस्तार करता है। उसने संवाद को ‘अपने साथ निरन्तर चलने वाला संवाद’
कहा (मुनरो, 1947: 64)। सुकरात ने इसकी क्षमता सभी लोगों में पाई पर
प्लेटो के अनुसार सर्वोच्च सत्य या ज्ञान प्राप्त करने की यह शक्ति सीमित
लोगों में ही पायी जाती है। शाश्वत सत्य का ज्ञान छठी इन्द्रिय यानि विचारों
का इन्द्रिय का कार्य होता है। इस प्रकार सुकरात अपने समय की प्रजातांत्रिक
धारा के अनुकूल विचार रखता था जबकि इस दृष्टि से प्लेटो का विचार
प्रतिगामी कहा जा सकता है।

सार्वजनिक शिक्षा 

‘दि रिपब्लिक’ में शिक्षा के वर्गीय चरित्र को प्लेटो ने अपने अंतिम
कार्य ‘दि लॉज’ में प्रजातांत्रिक बनाने का प्रयास किया। वे ‘दि लॉज’ में
लिखते हैं ‘‘बच्चे विद्यालय आयेंगे चाहे उनके माता-पिता इसे चाहे या नहीं
चाहे। अगर माता-पिता शिक्षा नहीं देना चाहेंगे तो राज्य अनिवार्य शिक्षा की
व्यवस्था करेगी और बच्चे माता-पिता के बजाय राज्य के होंगे। मेरा नियम
लड़के एवं लड़कियों दोनों पर लागू होगा। लड़कियों का बौद्धिक एवं
शारीरिक प्रशिक्षण उसी तरह से होगा जैसा लड़कों का।’’ लड़कियों की
शिक्षा पर प्लेटो ने जोर देते हुए कहा कि वे नृत्य के साथ शस्त्र-संचालन भी
सीखें ताकि युद्ध काल में जब पुरूष सीमा पर लड़ रहे हों तो वे नगर की रक्षा
कर सकें। इस प्रकार मानव जाति के इतिहास में प्लेटो पहला व्यक्ति था
जिसने लड़के एवं लड़कियों को समान शिक्षा देने की वकालत की। इस दृष्टि
से वह अपने समय से काफी आगे था।

प्लेटो के शिक्षा दर्शन की सीमायें 

प्लेटो के आदर्श राज्य में शासक बनने वाले दार्शनिकों की शिक्षा
केवल एकांगी ही नहीं है अपितु उसकी उच्च शिक्षा की योजना समुदाय के
इसी वर्ग तक सीमित भी है। रक्षकगण केवल संगीत तथा व्यायाम की
सामान्य शिक्षा ही प्राप्त करते हैं, और शिल्पकारों को, जिन्हें राज्य-शासन में
भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई थी, या तो अपरिपक्व व्यावसायिक
प्रशिक्षण अथवा ‘कोई शिक्षा नहीं’ से संतुष्ट होना पड़ता है। शासक वर्ग तक
ही शिक्षा के लाभों को सीमित रखना आधुनिक प्रजातान्त्रीय शिक्षा के
विरूद्ध है।

शिक्षा एवं राज्य की सरकार में शिल्पकारों को भाग लेने से वंचित
रखने के कारण प्लेटो के राज्य को ‘आदर्श’ की संज्ञा नहीं देनी चाहिए।
न्यूमन (1887: 428) ने ठीक कहा है ‘‘सबसे अच्छा राज्य वह है जो पूर्ण स्र्वण
है, वह नहीं है जो स्र्वणजटित है… दस न्यायप्रिय मनुष्यों से अच्छा राज्य नहीं
हो जाता, राज्य की श्रेष्ठता का रहस्य इस तथ्य में निहित रहता है कि उसमें
उचित रीति से व्यवस्थित श्रेष्ठ नागरिकों का समुदाय हो। प्लेटो ने अपने
राज्य के तीन भागों में से किसी एक में भी वांछनीयतम जीवन को अनुभव किए
बिना उस सब की बलि दे दी है जो जीवन को प्राप्य बनाता है।’’ इस प्रकार
आदर्शवादी प्लेटो पर्याप्तरूपेण आदर्शवादी नहीं था।

प्राचीन यूनान में दास प्रथा काफी प्रचलित थी और बड़ी संख्या में दास
थे पर प्लेटो उनको सिविल सोसाइटी (नागरिक समाज) का हिस्सा नहीं
मानते थे, न ही उन्हें नागरिक का अधिकार देना चाहते थे। अत: उनकी शिक्षा
के संदर्भ में प्लेटो कुछ नहीं कहते। वस्तुत: वे उन्हें शिक्षा का अधिकारी नहीं
मानते थे और उनके लिए यह व्यवस्था की कि उन्हें पारिवारिक पेशे को ही
अपनाकर घरेलू कार्यों में लगे रहना चाहिए।
प्लेटो ने व्यावसायिक शिक्षा को महत्वहीन माना। उनका कहना था
कि शिक्षा तो केवल चिन्तन प्रधान-विषय की ही हो सकती है। वे शारीरिक
श्रम को निम्न स्तरीय कार्य मानते थे। दि लॉज में तो उन्होंने यहाँ तक
प्रावधान कर डाला कि अगर नागरिक अध्ययन की जगह किसी कला या
शिल्प को अपनाता है तो वह दण्ड का भागी होगा।

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12 Comments

Lokesh

Apr 4, 2018, 3:06 pm

सारगर्भित

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Unknown

Sep 9, 2018, 12:19 pm

chhan

Reply

Unknown

Sep 9, 2018, 6:18 pm

thanks for information…

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Unknown

Oct 10, 2018, 5:38 pm

यह अतुलनीय एवम् ज्ञानवर्धक जानकारी उपलब्ध करवाने हेतु धन्यवाद

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Unknown

Oct 10, 2018, 2:58 pm

Good

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Unknown

Nov 11, 2018, 2:29 am

Thanks for incredible knowledge

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Unknown

Dec 12, 2018, 4:16 am

Theory is best

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Unknown

Jan 1, 2019, 7:57 am

Thank you very much

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Unknown

Mar 3, 2019, 7:39 pm

Nice 👌👍👍

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Unknown

Mar 3, 2019, 8:45 am

Thank you so much

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Unknown

Sep 9, 2019, 2:33 pm

Thanks for this sir

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Unknown

Sep 9, 2019, 5:22 am

Thanks for this sir

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