समाज का शिक्षा पर प्रभाव

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शिक्षा पर समाज के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है, क्योंकि समाज शिक्षा
की व्यवस्था करता है। इस प्रभाव को जा सकता है-

समाज के स्वरूप का प्रभाव – 

समाज के स्वरूप का शिक्षा की पकृति
पर प्रभाव पड़ता है, जैसा समाज का स्वरूप होगा वह शिक्षा को वैसे ही
व्यवस्थित करता है। भारत लोकतांत्रिक देश है तो शिक्षा की प्रकृति उद्देश्यों
उसके संगठन एवं वातावरण में लोकतांत्रिक आदर्श प्रतीत होते हैं। तानाशाही
समाज की शिक्षा में अनुशासन व आज्ञाकारिता, आदि पर बल दिया जाता है।
समाजवादी देशों की शिक्षा में समाजवादी तत्व एवं स्वरूप दिखयी देता है।

सामाजिक परिवर्तन का प्रभाव – 

समाज की प्रस्थिति एवं स्वरूप जैसे तैसे
बदलता जाता है वैसे वैसे शिक्षा का रूप भी बदलता जाता है। भारत में
आदिकाल से धार्मिक शिक्षा दी जाती थी उसके पश्चात् समय के साथ आधुनिक युग आया और देश ने राजतंत्र से प्रजातंत्र में प्रवेश किया और शिक्षा में
लोकतंत्रीय आदर्श एवं मूल्य समावेशित हुये सामाजिक असमानता, कुरीतियों
एवं आर्थिक असमानता को दूर कर वर्ग विशेष के लिये शिक्षा व्यवस्था से सबके
लिये शिक्षा को मुख्य लक्ष्य माना गया और सभी को शिक्षा प्राप्त करने का पूर्ण
अधिकार प्राप्त कराया गया।

राजनैतिक दशाओं का प्रभाव –

किसी भी समजा की राजनैतिक दशा का
शिक्षा पर प्रभाव पड़ता है, क्योंकि राजनीति को मजबूत आधार शिक्षा प्रदान
करती है। अंग्रेज जब भारत आये तो उन्होनें अपने शासन को मजबूत आधार
देने के लिय शिक्षा व्यवस्था को अपने अनुसार ढालने का प्रयास किया और
इसके लिये निष्पन्दन का सिद्धान्त का अनुसरण कर आवश्यकतानुसार शिक्षा
देने का प्रयास किया कम्पनी के संचालकों का विश्वास था- कि ‘‘प्रगति उस
समय हो सकती है, जब उच्च वर्ग के उन व्यक्तियों को शिक्षा दी जाये जिसके
पास अवकाश है।’’ वैदिक युग में राजतंत्र था तो शिक्षा वर्ग विशेष के लिये थी
परन्तु प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में सभी आयु वर्ग, लिंग, जाति एवं धर्म के
लोगों को समान शिक्षा का अधिकार दिया गया है।

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आर्थिक दशाओं का प्रभाव – 

जिस समाज की आर्थिक दशा अच्छी हो ती
है वहां की शिक्षा व्यवस्था पर इसका प्रभाव पड़ता है। अमेरिका जैसे देश
विकसित हें तो वहां पर शिक्षा का प्रचार-प्रसार जल्दी हुआ और भारत जैसे देश
में हमें शिक्षा की सुविधा देने में वर्षों लग रहे हैं। आर्थिक रूप से सम्पन्न समाज
अच्छे विद्यालय खोलने में सक्षम रहता है, इसके फलस्वरूप व्यावसायिक, प्राविर्थिाक, प्रौद्योगिक, वैज्ञानिक आदि पक्षों का अधिक से अधिक विकास हेतु संसाधन
उपलब्ध रहता है। आर्थिक रूप से विपन्न देशों व समाजों की शिक्षा में भी यह
विपन्नता स्पष्ट दिखायी देती है।

सामाजिक आदर्शो, मूल्यो व आवश्यकताओ का प्रभाव – 

शिक्षा पर
सामाजिक आदर्शों का प्रभाव पड़ता है जैसे भारत में शिक्षा का स्वरूप पर डा0
राधाकृष्णन ने लिखा कि- ‘‘शिक्षा को व्यक्ति और समाज दोनों का उत्थान
करना चाहिये। तब हमारी शिक्षा व्यवस्था के उद्देश्यों, लक्ष्यों, शिक्षण विधियों
पाठ्यक्रम एवं शिक्षार्थी, शिक्षक के गुणों की संकल्पना पर इसका प्रभाव स्पष्ट
परिलक्षित होता है।’’ इस प्रकार भारतीय समाज की आवश्यकता है, गरीबी,
बेरोजगारी, को दूर करना असमानता की भावना दूर करना, और लोकतांत्रिक
मूल्यों का समावेश किया जाये तब इन तथ्यों को शिक्षा व्यवस्था के विभिन्न पक्षों
उद्देश्यों एवं पाठ्यक्रम में स्पष्ट समावेशित किया गया।

समाज के दृष्टिकोण का प्रभाव  – 

शिक्षा व्यवस्था में समाज के दृष्टिकोण
का प्रभाव पड़ता है, जैसे यदि समाज रूढ़िवादी दृष्टिकोण का है तो शैक्षिक
प्रशासन एवं अनुशासन व पाठ्यक्रम में इसका स्पष्ट छाप दिखायी देती
है।समाज के उदार दृष्टिकोण का प्रभाव वहॉ की शिक्षा व्यवस्था में देखी जा
सकती है। जैसे वैदिक युगीन समाज का दृष्टिकोण आध्यात्मिक था तब उस
समय शिक्षा व्यवस्था धािर्मक थी। इसी प्रकार से जनतांत्रिक दृष्टिकोणएंव
उदार शिक्षा का प्रभाव शिक्षा व्यवस्था में स्पण्ट दिखायी देता है। एच0ओड का
कथन है- ‘‘समाज और शिक्षा का एक दूसरे से पारस्परिक कारण और परिणाम
का सम्बंध है। किसी भी समाज का स्वरूप उसकी शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप को
निर्धारित करता है,

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