शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा, आवश्यकता, उद्देश्य एवं सिद्धान्त

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शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा

  1. ब्रेवर ने शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा देते हुए कहा है- ‘‘शैक्षिक निर्देशन व्यक्ति के बौद्धिक विकास में सहायता प्रदान करने का सचेतन प्रयत्न है’’, ‘‘शिक्षण या अधिगम के लिए किए गए सभी प्रयत्न शैक्षिक निर्देशन के अंग हैं।’’ ब्रेवर के अनुसार विद्यालय में प्रदान की जाने वाली प्रत्येक प्रकार की सहायता शैक्षिक निर्देशन है। ब्रेवर इस प्रकार शैक्षिक निर्देशन तथा संगठित शिक्षा में कोई अन्तर नहीं पाते हैं।
  2. जोन्स ने शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा इस प्रकार दी है, ‘‘शैक्षिक निर्देशन का सम्बन्ध विद्यालय, पाठ्यक्रम, पाठ्य विषय और विद्यालय जीवन के चयन तथा अनुकूलन हेतु छात्रों को दी जाने वाली सहायता से है।’’ लेकिन जोन्स शैक्षिक निर्देशन तथा शिक्षण को एक ही मानते हैं। एक स्थान पर वह कहते हैं, ‘‘प्रभावशाली शिक्षण जो कि निर्देशन भी है, समाज तथा विद्यालय से ही प्राप्त किया जा सकता है।’’ जोन्स से मिलती-जुलती परिभाषा होपकिंस द्वारा दी गयी है, ‘‘निर्देशन समस्त उचित अधिगम का एक अंग है अतएव अधिगम परिस्थितियों के कुशल प्रबन्ध में निर्देशन केन्द्रित होना चाहिए।’’
  3. आर्थर ई0 ट्रेक्सलर के अनुसार, ‘‘निर्देशन प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं की योग्यताएं, रूचियों और व्यक्तित्व सम्बन्धित गुणों को समझने, उनका सम्भावित विकास करने, उनको जीवन के उद्देश्यों से सम्बन्धित करने तथा अन्त में प्रजातांत्रिक, सामाजिक व्यवस्था के योग्य नागरिक की भांति पूर्ण तथा परिपक्व स्वनिर्देशन की स्थिति तक पहुंचने के योग्य बनाता है। अत: निर्देशन विद्यालय के प्रत्येक पहलू जैसे पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि, निरीक्षण, अनुशासन, उपस्थिति की समस्याएं, पाठ्य सहगामी क्रियाएं, स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यक्रम तथा समाज के सम्बन्ध से सम्बन्धित है।’’ ट्रेक्सलर ने अपनी परिभाषा के प्रारम्भ में तो निर्देशन का स्पष्ट रूप रखा है, परन्तु अन्त में उसने निर्देशन को विद्यालय के सभी कार्यों से जोड़ा है।
  4. रूथ स्ट्रेंग के अनुसार ‘‘व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य उद्देश्य छात्र को उपयोगी कार्यक्रम का चयन तथा उसमें प्रगति करने में सहायता देना है।’’
  5. जी0ई0 मायर्स के अनुसार, ‘‘शैक्षिक निर्देशन एक ऐसी प्रक्रिया है जो एक ओर तो विशिष्ट गुण वाले छात्रों में और दूसरी ओर अवसरों और आवश्यकताओं के विभिन्न समूहों में ऐसा सम्बन्ध स्थापित करती है, जिससे व्यक्ति के विकास और उसकी शिक्षा के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण होता है।’’ मायर्स द्वारा दी गई परिभाशा द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि निर्देशन द्वारा छात्र की विशेषताओं तथा शैक्षिक अवसरों के मध्य सम्बन्ध स्थापित किया जाता है।

शैक्षिक निर्देशन  की आवश्यकता

मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर शिक्षा के क्षेत्र में पहले की अपेक्षा अब अधिक परिवर्तन हुए हैं। व्यक्ति तथा समाज की आवश्यकताओं के आधार पर शिक्षा के उद्देश्य निश्चित होते हैं। समाज अधिक जटिल होता गया, विचारधारा में परिवर्तन हुए। उसके अनुसार ही शिक्षा के उद्देश्य तथा उन उद्देश्यों तक पहुंचने की विधि में भी परिवर्तन हुए। हमारे देश में भी प्राथमिक तथा माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में सुधार तथा पुर्नसंगठन हो रहा है। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली का प्रमुख दोष यह है कि यह मनुष्य को वास्तविक जीवन के लिए तैयार नही करती है। इन दृष्टियों से भी शैक्षिक निर्देशन आवश्यक है।

पाठ्य-विषयों का चुनाव 

‘माध्यमिक शिक्षा आयोग’ (1052-53) ने अपने प्रतिवेदन में विविध, पाठ्यक्रम का सुझाव दिया है। छात्रों में जब व्यक्तिगत विभिन्नता पायी जाती है, उनकी क्षमताएं, योग्यताएं, रूचियां समान नही होती, तो उनको एक ही पाठ्यक्रम का अध्ययन कराना उचित नही है। उस प्रतिवेदन के अनुसार कुछ आन्तरिक विषय तथा इनके अतिरिक्त कुछ वैकल्पिक विषय रखे गये हैं, जिनको 7 वर्गों में विभाजित किया गया है। इन वर्गों को चुनाव करना एक कठिन कार्य है। यहाँ विद्यालयों में छात्रों को विषयों के चयन करते समय किसी प्रकार का पथ-प्रदर्शन नही दिया जाता है। छात्रों को स्वयं के तथा पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में कोई ज्ञान नही होता है। वे नही जानते हैं कि किस विषय का किस वृत्ति से सम्बन्ध है। ये छात्र अपने माता-पिता के परामर्श से या स्वयं उन विषयों को चुन लेते हैं, जो उनको रूचिकर या सरल दिखते हैं। इस प्रकार गलत पाठ्यक्रम का चुनाव करने से छात्र अवरोधन तथा अपव्यय की समस्या को बढ़ाते हैं। गलत पाठ्यक्रम का चुनाव मुख्यत: दो कारणों से होता है :
  1. कम योग्यता तथा उच्च महत्वाकांक्षा के कारण पाठ्य-विषयों का गलत चुनाव करना। बहुत से छात्र, जिनकी बुद्धि-लब्धि कम होती है, विज्ञान या गणित आदि जैसे कठिन विषय चुन लेते हैं। इसका दुष्परिणाम एक ही कक्षा में बार-बार अनुत्तीर्ण होना होता है।
  2. उच्च योग्यता तथा निम्न महत्वाकांक्षा भी गम्भीर समस्याएं उत्पन्न करती हैं। अधिकांश छात्र प्रखर बुद्धि के होने पर सरल विषय चुन लेते है। इस तरह उनकी प्रखर बुद्धि का लाभ राष्ट्र या स्वयं उस छात्र को नही मिल पाता है। इसको रोकने के लिए शैक्षिक निर्देशन अति आवश्यक है।

अग्रिम शिक्षा का निश्चय 

हमारे देश में शैक्षिक निर्देशन के अभाव से छात्र अग्रिम शिक्षा का उचित निश्चय नही कर पाते हैं। हाईस्कूल परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के उपरान्त छात्रों के लिए यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि उनको व्यावसायिक विद्यालय में, औद्योगिक विद्यालय में या व्यापारिक विद्यालय में कहाँ जाना चाहिए। कभी-कभी छात्र गलत विद्यालयों में प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं। ऐसे विद्यालयों में बाद में वे समायोजित नही हो पाते हैं। छात्रों को उचित अग्रिम शिक्षा का निर्णय लेने के लिए शैक्षिक पथ-प्रदर्शन अवश्य दिया जाए।

अपव्यय तथा अवरोधन को दूर करना 

भारत में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर अधिक अपव्यय होता है। भारतीय संविधान के अनुसार 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बालकों के लिए शिक्षा अनिवार्य की गयी है लेकिन अधिकांश छात्र स्थायी साक्षरता प्राप्त किए बिना ही विद्यालय छोड़ देते हैं। बाह्य परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। यह अवरोधन भी दूसरे रूप में समय, धन तथा शक्ति का अपव्यय है। अपव्यय को दूर करने के लिए आवश्यक है कि छात्रों को निर्देशन दिया जाना चाहिए।

नवीन विद्यालय में समायोजन हेतु

बहुत से छात्र जब नवीन विद्यालय मे प्रवेश लेते हैं तो उनको वहां के नियमों का ज्ञान न होने से वे नवीन वातावरण में अपने को समायोजित करने में असफल पाते हैं। भारत में यह समस्या विकट रूप धारण किये हुए है। यहां की अधिकांश जनसंख्या गांव में निवास करती है। इन गांवों में उच्च शिक्षा का कोई प्रबन्ध नही होता है। ग्रामीण वातावरण में पले हुए छात्र जब नगरीय क्षेत्र के विद्यालयों में प्रवेश प्राप्त करते हैं, तो उनको इन विद्यालयों में नवीन वातावरण मिलता है। अधिकांश छात्र नवीन वातावरण में समायोजित न होने पर अध्ययन छोड़कर गांवों को लौट जाते हैं। शैक्षिक निर्देशन उपलब्ध होने पर छात्रों का कुसमायोजन रोका जा सकता हैं।

व्यवसायोंं का ज्ञान देना 

स्वतत्रंता प्राप्ति के उपरान्त देश के आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाई गई है। इन पंचवर्षीय योजनाओं ने हमारे नवयुवकों के लिए अवसरों का भण्डार खोल दिया है इन नवीन अवसरों का ज्ञान कम व्यक्तियों को है। भारत में छात्र बिना किसी अवसर की परवाह किये विद्यालयों में प्रवेश ले लेते हैं। उनको इस बात का ज्ञान नही होता कि कौन-सा पाठ्य-विषय किस व्यवसाय या सेवा की आधारशिला तैयार करता है। इसका कुपरिणाम भारत में ‘शिक्षित बेरोजगारं की समस्या है अगर विद्यालयों में निर्देशन द्वारा विभिन्न पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित अवसरों का ज्ञान दे दिया जाय तो बेरोजगारी की समस्या कुछ सीमा तक हल हो सकती है।

विद्यालय-व्यवस्था, पाठ्य्यक्रम तथा शिक्षण-विधि मेंं परिवर्तन

शिक्षा में पहले की अपेक्षा बहुत से परिवर्तन हुए हैं। पहले शिक्षा बौद्धिक विकास की एक प्रक्रिया मात्र थी। परन्तु आज यह व्यक्तिगत तथा सामाजिक समस्याओं के समाधान का एक साधन मानी जाती है। मौरिस के अनुसार निश्चयात्मक शिक्षा का, जो कि विभिन्न सामाजिक स्तर के व्यक्तियों को विभिन्न अवसर प्रदान करती है, रूप परिवर्तित होकर प्रजातन्त्रात्मक शिक्षा होता जा रहा है जो कि सभी व्यक्तियों को समान अवसर प्रदान करती है। साहित्यिक पाठ्यक्रम के स्थान पर विस्तृत, वैज्ञानिक तथा सामाजिक पाठ्यक्रम स्वीकार किया जा रहा है जो प्रतिदिन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। समाज तथा विद्यालय में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयत्म किये जा रहे हैं।
वर्तमान समय में शिक्षा बाल केन्द्रित हैं, जहाँ व्यक्तिगत विभिन्नता के सिद्धान्त पर अधिक बल दिया जाता है। ये सभी परिवर्तन शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता पर बल देते हैं।

शैक्षिक निर्देशन के उद्देश्य

विद्यालय जीवन में स्वयं को समायोजित करने मेंं विद्यार्थियों की सहायता करना 

शैक्षिक निर्देशन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों की इस प्रकार सहायता करना है जिससे वे विद्यालय पाठ्यक्रम तथा सम्बन्धित सामाजिक जीवन में स्वयं को समायोजित कर सकें। जब विद्यार्थी नवीन विद्यालयों में प्रवेश लेते हैं या ग्रामीण क्षेत्रों के बालक समुचित शिक्षा उपलब्ध न होने पर नगरों में स्थित विद्यालयों में प्रवेश लेते हैं तो उनको नया वातावरण व नया सामाजिक जीवन मिलता है। जिसमें वे स्वयं को समायोजित नही कर पाते तथा विभिन्न कठिनाइयों का अनुभव करते है। शैक्षिक निर्देशन नवीन वातावरण में समायोजन स्थापित करने में विद्यार्थियों की सहायता करता है। इसके अन्तर्गत निम्नलिखित बातों को सम्मिलित किया जा सकता है-
  1. पाठ्य विषयों के चयन में सहायता प्रदान करना। 
  2. उपयुक्त अध्ययन आदतों का निर्माण करना। 
  3. अन्य छात्रों के साथ सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने में सहायता करना।
  4. उपयोगी पुस्तकों के चयन में सहायता करना। 
  5. विभिन्न विषयों में प्रगति करने के लिए प्रोत्साहित करना।
  6. पाठ्य सहगामी क्रियाओं के चयन में सहायता प्रदान करना। 
  7. छात्रवृत्ति प्राप्त करने के सम्बन्ध में सहायता करना।

सम्भावित तथा इच्छित अग्रिम शिक्षा से सम्बन्धित सूूचनाएं प्राप्त करने में छात्रोंं की सहायता करना 

विद्यार्थियों के समक्ष यह समस्या उत्पन्न होती है कि वे किस विद्यालय में प्रवेश लें तथा किन विषयों का चुनाव करें। अत: आवश्यक है कि शैक्षिक निर्देशन के माध्यम से विद्यार्थियों को विद्यालय के वातावरण, नियमों तथा विषयों से सम्बन्धित जानकारियां उपलब्ध करायी जाएं।

व्यवसाय चयन में विद्यार्थियोंं का मार्ग दर्शन करना 

शिक्षा समाप्ति पर विद्यार्थियों को जीविकोपार्जन के लिए किसी न किसी व्यवसाय को अपनाना होता है किन्तु व्यवसायों से सम्बन्धित जानकारियों के अभाव में उनके समक्ष विकट समस्या उत्पन्न हो जाती है कि वह किस व्यवसाय का चयन करें? किस व्यवसाय के लिए कौन-कौन सी योग्यताएं आवश्यक हैं, कौन सा व्यवसाय उनकी योग्यताओं व क्षमताओं के अनुकूल है, वेतन, नौकरी की शर्ते, प्रगति की सम्भावनाएं इत्यादि से सम्बन्धित सूचनाएं उसे कहां से प्राप्त हो सकेंगी, इत्यादि। ये सभी प्रकार की सूचनाए विद्यार्थी तक पहुंचाने के लिए शैक्षिक निर्देशन का होना आवश्यक है।

विभिन्न प्रकार के विद्यालयों के कार्यों ओर उद्देश्योंं को जानने मेंं विद्यार्थियों की सहायता करना 

पाठ्यक्रम की विविधता तथा व्यवसायों में वृद्धि के परिणामस्वरूप भारत में भी विशिष्ट विद्यालयों की स्थापना हुई है। उदाहरणार्थ-बहुउद्देश्यीय विद्यालय, औद्यौगिक विद्यालय, व्यावसायिक विद्यालय, चिकित्सा विद्यालय, कृषि विद्यालय इत्यादि। इन विभिन्न प्रकार के विद्यालयों में विद्यार्थियों को उनकी मानसिक क्षमता, रूचियों व अभिरूचियों के आधार पर ही भेजा जा सकता है क्योंकि प्रत्येक विद्यालय के उद्देश्य एवं कार्य भिन्न-भिन्न हैं। अत: प्रत्येक विद्यालय सम्बन्धी समस्त जानकारियाँ प्राप्त करने में विद्यार्थियों की सहायता करना शैक्षिक निर्देशन का उद्देश्य है।

अपनी रूचि के विद्यालय में प्रवेश हेतु आवश्यक शर्तो व नियमों की जानकारी प्राप्त करने में विद्यार्थिर्यो की सहायता करना 

प्रत्यके विद्यालय की अपनी व्यवस्था पद्धति होती है तथा इसके प्रवेश के नियम एवं आधार निर्धारित होते है। भिन्न-भिन्न विषयों के आधार पर विद्यालय भी भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रवेश के लिए विशिष्ट विषयों की आवश्यकता होती है। कुछ विद्यालयों में प्रवेश के लिए पूर्व परीक्षा या साक्षात्कार या दोनों ही होते हैं और कुछ विद्यालय कम से कम वांछित शैक्षिक योग्यता के आधार पर प्रवेश देते हैं। अत: इन विद्यालयों के नियमों आदि से परिचित कराना शैक्षिक निर्देशन का लक्ष्य है जिससे विद्यार्थिर्यो अपनी क्षमता के अनुसार अपनी पसंद के विद्यालय में प्रवेश ले सकें।

विद्यार्थी को स्वयं की रूचियों, अभिरूचियों व योग्यताओं से अवगत कराना 

प्रत्यके विद्यार्थी की रूचियाँ, अभिक्षमताएँ व योग्यताएँ एक की अपेक्षा दूसरे से भिन्न होती है। किसी में बुद्धि अधिक होती है तो किसी में कम। वर्तमान समय में विद्यार्थियों को उनकी योग्यताओं, बौद्धिक क्षमताओं, रूचियों, अभिरूचियों व व्यक्तिगत शीलगुणों से अवगत कराने के लिए शैक्षिक निर्देशन अत्यन्त आवश्यक है।

प्रतियोगी परीक्षाओं से सम्बन्धित जानकारी प्रदान करना 

जोन्स के शैक्षिक निर्देशन का महत्वपूर्ण उद्देश्य विद्यार्थियों को विभिन्न केन्द्रीय व राज्य स्तरों पर होने वाली विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे आई0ए0एम0, पी0सी0एस0, आर0ए0एस0, बैकिंग सेवा इत्यादि के सम्बन्ध में जानकारियॉ प्रदान करना है जिससे वह प्रारम्भ से ही अपना रूझान इस ओर बना सकें। उपरोक्त सभी प्रकार की परीक्षाओं में केवल वही व्यक्ति उत्तीर्ण एवं चयनित होते हैं जो वास्तव में योग्य हैं।

विद्यालय के विभिन्न पाठ्यक्रमों से सम्बन्धित जानकारियाँ उपलब्ध कराना  

आज शिक्षा का क्षेत्र व्यापक होने के कारण पाठ्यक्रमों में भी विभिन्नता आई है। विद्यालयों मे विभिन्न प्रकार के पाठ्यक्रमों का अध्ययन कराया जाता है जैसे विज्ञान, कला, कृषि, वाणिज्य इत्यादि। इन पाठ्यक्रमों में भी नवीन विषयों को सम्मिलित किया जा रहा है। उपयुक्त जानकारी के अभाव में विद्याथ्र्ाी अनुचित पाठ्य विषयों का चयन कर लेते हैं जिनका प्रभाव उनके व्यवसाय पर पड़ता है। अत: यह आवश्यक है कि निर्देशन के माध्यम से विद्यार्थियों को विभिन्न पाठ्यक्रम एवं पाठ्य विषयों से सम्बन्धित समस्त आवश्यक जानकारियां प्रदान की जाएँ।

अन्य उद्देश्य

अधिगम विधियोंं मेंं सुधार करना -

 शैक्षिक निर्देशन का एक मुख्य उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापन विधियों का सुधार करना भी है। विद्यार्थियों में इतनी समझदारी नहीं होती कि वे अपने योग्यताओं व क्षमताओं के अनुरूप उपयुक्त अधिगम विधियों का चयन कर सकें।

प्रतिभाशाली एवं पिछड़े बालकोंं के लिए शिक्षा की व्यवस्था करना- 

शैक्षिक निर्देशन का उद्देश्य केवल सामान्य बालकों की सहायता करना ही नही है वरन् शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिभाशाली एवं पिछड़े बालकों की सहायता करना भी है। प्रतिभाशाली बालकों से तात्पर्य ऐसे बालकों से है जिनकी क्षमताएँ बौद्धिक शक्तियाँ, समायोजन, शैक्षिक उपलब्धि औसत बालकों से श्रेष्ठ होती है। निर्देशन के सफल एवं उपयोगी कार्यक्रमों द्वारा प्रतिभाशाली बालकों की योग्यताओं एवं क्षमताओं का पूर्ण विकास किया जाना चाहिए जिससे वे अपनी योग्यताओं के अनुरूप विशिष्ट व्यवसायों का चयन कर देश की उन्नति में अपना योगदान दे सकें। इसके विपरीत कुछ बालक ऐसे भी होते हैं जो कक्षा में किसी तथ्य को बार-बार समझाने पर भी नही समझ पाते हैं तथा औसत बालकों के समान प्रगति नही कर पाते हैं। इन्हें पिछड़े बालक कहते हैं। पिछड़ेपन के अनेक कारण हैं जैसे शारीरिक दोष, मानसिक क्षमताएँ, विद्यालय का वातावरण एवं परिस्थितियाँ, अनुशासनहीनता, विघटित परिवार एवं संवेगात्मक व सामाजिक परिस्थितियां इत्यादि। निर्देशन सेवाओं का उद्देश्य है कि वह पिछड़े बालकों की उचित सहायता करने तथा उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में सामान्य स्तर पर लाने के लिए उनकी पहचान करें तथा उपचारात्मक शिक्षा की व्यवस्था करने में सहायता करें।

आकांक्षा स्तर निर्धारित करने में सहायता करना - 

आकांक्षा स्तर का निर्धारण बालक की योग्यताओं एवं क्षमताओं के अनुरूप होना चाहिए। अत: शैक्षिक निर्देशन का उद्देश्य है कि वह छात्रों को आत्मबोध करायें जिससे वे अपनी योग्यताओं, क्षमताओं, रूचियों, आवश्यकताओं व कमियों को समझ सकें और आकांक्षा स्तर को वास्तविकता के आधार पर निर्धारित कर सकें। यदि आकांक्षाओं का निर्धारण वास्तविकता के आधार पर नही किया जाता है तो बाद में आकांक्षाए पूरी न होने पर विद्यार्थिर्यो को निराशा, कुंठा इत्यादि का सामना करना पड़ सकता है, जो समायोजन में बाधक है।

शैक्षिक निर्देशन के सिद्धान्त

विद्यालय तथा अभिभावक के मध्य सम्बन्ध का सिद्धान्त 

शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया की सफलता के लिए विद्यालय एवं अभिभावक में गहरा सम्बन्ध होना अति आवश्यक है क्योंकि विद्यार्थी से सम्बन्धित आवश्यक सूचनाएँ विद्यालय एवं अभिभावक से प्राप्त की जा सकती है।

सभी विद्यार्थियों के लिए समान निर्देशन की सुविधा प्रदान करने का सिद्धान्त 

शैक्षिक निर्देशन कुछ चयनित विद्यार्थियों के लिए नही वरन् सभी वर्गों आयु समूहों व सभी योग्यताओं एवं क्षमताओं वाले विद्यार्थियों के लिए होना चाहिए। शिक्षा के सभी स्तरों पर विद्यार्थियों को निर्देशन की आवश्यता होती है अत: उनको निर्देशन व सुविधाएं अवश्य उपलब्ध होनी चाहिए।

प्रमापीकृत परीक्षणों के प्रयोग का सिद्धान्त 

विद्यालय में विद्यार्थियों की समस्याओं का पता लगाने, उनकी रूचियों, योग्यताओं एवं अभिक्षमताओं को जानने व सम्बन्धित सूचनाओं को प्राप्त करने के लिए प्रमापीकृत परीक्षणों का प्रयोग किया जाना चाहिए। इन परीक्षणों के परिणामों से विद्यार्थियों की उपलब्धि के आधार पर किसी विशिष्ट पाठ्यक्रम में सफलता व असफलता के सम्बन्ध में भविष्यवाणी की जा सकती है। प्रमापीकृत परीक्षणों के द्वारा परिणाम अप्रमापीकृत परीक्षणों की अपेक्षा वस्तुनिष्ठ एवं श्रेष्ठ होते है।

गोपनीयता का सिद्धान्त 

निर्देशन प्रक्रिया में प्रार्थी की समस्याओ की गापे नीयता पर विषेश ध्यान दिया जाता है। प्रार्थी से सम्बन्धित कोई भी ऐसी सूचना किसी अन्य को न बतायी जाए जिससे कि वह स्वयं को अपने सहपाठियों से कमतर समझे।

अनुगामी अध्ययन का सिद्धान्त 

निर्देशन देने के पश्चात् निर्देशन की प्रभावशीलता ज्ञात करना आवश्यक है। निर्देशन की सफलता की जांच करने के लिए समय-समय पर यह जानना आवश्यक है कि व्यवसाय में लगे छात्र सफल हुए या नही। इसी से निर्देशन कार्यक्रमों की सफलता का पता चल जाता है। यदि अनुगामी अध्ययन न किया जाए तो निर्देशन सेवा का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।

उचित एवं सम्बन्धित सूचनाओं का सिद्धान्त 

निर्देशन व्यवसायिक क्षेत्र से सम्बन्धित हो या शैक्षिक क्षेत्र से, तब तक सम्भव नही है जब तक पर्याप्त मात्रा में सम्बन्धित एवं उपयुक्त सूचनाएं एकत्रित न की जाएँ। ये सूचनाएँ छात्र की बुद्धिलब्धि, शैक्षिक उपलब्धि, रूझान से सम्बन्धित होती है। इनके आधार पर ही निर्देशन प्रदान किया जाना चाहिए।

समस्या समाधान का सिद्धान्त 

किसी भी समस्या का समाधान, उसके भयंकर रूप धारण करने से पूर्व ही प्रारम्भ कर देना चाहिए क्योंकि समस्या के गम्भीर होने पर निर्देशन प्रक्रिया अधिक प्रभावशली सिद्ध नही हो सकेगी।

शैक्षिक निर्देशन की विधियां

 सामान्यतया शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने की विधियां दो वर्गों में विभक्त की जा सकती हैं-  1. व्यक्तिगत निर्देशन विधियां 2. सामूहिक निर्देशन विधियां ।

व्यक्तिगत निर्देशन विधियां 

व्यक्तिगत निर्देशन विधियों द्वारा निर्देशन व्यक्तिगत स्तर पर सम्पर्क स्थापित करके प्रदान किया जाता है। इसमें व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक, बौद्धिक तथा वैयक्तिक समस्याओं का अध् ययन किया जाता है। इसमें निम्नलिखित विधियों का अनुकरण किया जाता है-

प्राथमिक साक्षात्कार

विद्यार्थियों का व्यक्तिगत रूप से अध्ययन करने के लिए प्राथमिक साक्षात्कार किया जाता है। इस प्राथमिक साक्षात्कार में निर्देशन समिति के लिए विद्यार्थियों से सम्बन्धित विभिन्न सूचनाएं एकत्रित करना आवश्यक है।
  1. पारिवारिक वातावरण से सम्बन्धित। 
  2. शिक्षा एंव व्यवसाय सम्बन्धी योजनाओं के सम्बन्ध में। 
  3. अवकाश के समय में की जाने वाली क्रियाओं के सम्बन्ध में। 

विद्यार्थियों का संचित अभिलेख 

शैक्षिक निर्देशन के लिए विद्यार्थियों से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार की जानकारियों को एकत्रित किया जाता है तथा उन्हें रिकार्ड के रूप में सुरक्षित रखा जाता है। यही संचित अभिलेख है। संचित अभिलेख में निम्नलिखित सूचनाएं सम्मिलित की जाती हैं-
  1. छात्र का परिचय एवं विवरण।
  2. छात्र की बौद्धिक स्तर सम्बन्धी सूचनाएँ। 
  3. रूचियों एवं अभिरूचियों से सम्बन्धी सूचनाएँ। 
  4. शारीरिक एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचनाएँं। 
  5. मानसिक तथा उपलब्धि परीक्षण सम्बन्धी जानकारी। 
  6. पारिवारिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि। 
  7. पाठ्येत्तर क्रियाकलाप। 
  8. व्यक्तित्व सम्बन्धी अन्य विशिष्ट जानकारियां इत्यादि।

सामाजिक व आर्थिक अध्ययन 

विद्यार्थियों के घर, परिवार, पास-पड़ोस इत्यादि के बारे में सामाजिक व आर्थिक जानकारियां प्राप्त कर लेनी चाहिए। इसके लिए प्रश्नावलियां एवं सामाजिक आर्थिक स्तर मापनी का भी प्रयोग किया जा सकता है। 4. मनोवैज्ञानिक परीक्षण- शैक्षिक निर्देशन के लिए विद्यार्थियों के विभिन्न व्यक्तित्व शील गुणों के सम्बन्ध में जानने के लिए मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है। ये परीक्षण हो सकते हैं-
  1. बुद्धि परीक्षण 
  2. अभिरूचि परीक्षण 
  3. रूचि परिसूची 
  4. उपलब्धि परीक्षण 
  5. व्यक्तित्व परीक्षण 
  6. स्वास्थ्य परीक्षण
विद्यार्थियों के स्वास्थ्य का परीक्षण भी आवश्यक है। ऐसा माना जाता है कि ‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है।’ अत: विद्यार्थियों के स्वास्थ्य परीक्षण की नियमित एवं समुचित व्यवस्था होनी चाहिए जिससे बाह्य व आंतरिक बीमारियों तथा कमजोरियों का पता चल सकें। विद्यालय जीवन का अध्ययन-विद्यार्थियों के विद्यालय जीवन का अध्ययन करना भी अत्यन्त आवश्यक है जिससे विद्यार्थियों से सम्बन्धित निम्नलिखित जानकारियां प्राप्त हो सकें-
  1. विद्यार्थियों ने किन-किन विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की है।
  2. उसने किन विषयों को पढ़ने में रूचि दिखाई है। 
  3. किस विषय में कितने अंक प्राप्त किए है।
  4. पाठ्य सहगामी क्रियाओं के प्रति उसकी क्या रूचि है। 
  5. उसकी रूचि-अरूचि क्या है?
  6.  शिक्षा व शिक्षकों के प्रति कैसा दृष्टिकोण है? इत्यादि उपरोक्त समस्त जानकारियाँ, संचित अभिलेख पत्र द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं और इन्हीं के आधार पर विद्यार्थियों को शिक्षा सम्बन्धी निर्देशन प्रदान किया जा सकता है। 

    सामूहिक निर्देशन विधियां

    कभी कभी ऐसी परिस्थितियां व कठिनाइयां उत्पन्न हो जाती है जब विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से निर्देशन प्रदान किया जाता है। सामूहिक निर्देशन विधियां हैं-
    1. अनुस्थापन वार्ताएं -निर्देशक व अन्य विद्वानों द्वारा विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से शैक्षिक निर्देशन के महत्व को समझाया जाता है। उनकी शिक्षा सम्बन्धी विभिन्न समस्याओं की विस्तृत चर्चा की जाती है जिससे विद्यार्थियों स्वयं अपनी समस्याओं के सम्बन्ध में गहनता से सोचने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। विद्यार्थियों को निर्देशन हेतु मानसिक रूप से तैयार करने के पश्चात् निर्देशन देना सदैव प्रभावी होता है।
    2. पाश्र्वचित्र निर्माण -विद्यार्थियों से सम्बन्धित समस्त सूचनाएं एकत्रित कर लेने के पश्चात् एक पाश्र्वचित्र तैयार कर लेना चाहिए। यह ग्राफ पेपर पर बना हुआ एक रेखाचित्र होता है जिसमें विद्यार्थियों की योग्यताओं, क्षमताओं तथा अन्य परीक्षणों के परिणामों के स्तर को प्रदर्शित किया जाता है। तत्पश्चात् इस पाश्र्वचित्र के आधार पर विद्यार्थियों से सम्बन्धित सूचनाओं का निष्कर्ष निकाला जाता है।
    3. विद्यालय से विद्यार्थियों के सम्बन्ध में सूचनाएं एकचित्र करना -शैक्षिक निर्देशन के लिए विद्यार्थियों के सम्बन्ध में सूचनाएं एकत्रित करने के लिए विद्यालय एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धियों का ज्ञान उनके द्वारा विभिन्न परीक्षाओं में प्राप्त अंकों से हो जाता है। अध्यापकों के साथ साक्षात्कार करके विद्यार्थियों की रूचियों, योग्यताओं, कौशलों, आदतों, व्यक्तित्व सम्बन्धी अन्य विशेषताओं व पाठ्यसहगामी क्रियाओं में रूचि आदि के सम्बन्ध में विभिन्न सूचनाएं प्राप्त हो सकती हैं। अत: निर्देशन के लिए सूचनाएं एकत्रित करते समय विद्यालय एवं अध् यापक की सहायता अवश्य ली जानी चाहिए।
    4. परिवार से विद्यार्थियों के सम्बन्ध में सूचनाएं एकत्रित करना -बच्चों की जीवन में सबसे अधिक निकटता परिवार में अपने माता-पिता से ही होती है। जन्म से ही माता-पिता अपनी आंखों के समक्ष उनको विकसित होते हुए देखते हैं तथा निरन्तर उनकी प्रगति के लिए सोचते रहते हैं। वे बच्चों की आदतों, रूचियों, अभिरूचियों व कठिनाइयों को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं अत: बालकों की भावी शैक्षिक एवं व्यावसायिक योजनाओं के बारे में वे अच्छी तरह से बता सकते हैं। यह सूचनाएं घर जाकर, वार्ता द्वारा व पत्र व्यवहार द्वारा सम्पर्क स्थापित करके प्राप्त की जा सकती हैं।
    5. सम्मेलन -विद्यार्थियों से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार की सूचनाओं से प्राप्त निष्कर्षों को शैक्षिक निर्देशन समिति के समक्ष रखा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी राय प्रस्तुत करता है तथा आपसी विचार-विमर्श के पश्चात् एक सर्वमान्य निर्णय पर पहुंचते हैं। यह निर्णय निर्देशन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है तथा विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित करता है।
    6. रिपोर्ट तैयार करना -सम्मलेन मे लिए गए निर्णय के आधार पर निर्देशन समिति प्रत्येक विद्यार्थियों के सम्बन्ध में विस्तृत रिपोर्ट तैयार करती है। यह रिपोर्ट विद्यार्थियों के माता-पिता, अभिभावक एवं विद्यालय अधिकारियों को दी जाती है जिससे वे विद्यार्थियों की कार्य योजना में सहायता कर सकें।
    7. अनुवत्त्री कार्य -अनुवर्ती कार्य से तात्पर्य है जिन विद्यार्थियो को निर्देशित किया गया है उनका निरन्तर मूल्यांकन करते रहना, जिससे यह पता चल सके कि उन्हें जिस शिक्षा को ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था, उसमें वे सफलता प्राप्त कर रहे हैं या नही। यदि विद्यार्थियों की सफलता संतोषजनक नही है तो हमें यह समझना चाहिए कि हमारी निर्देशन पद्धति दोषपूर्ण है और उस कमी को जानकर दूर करने का प्रयास करना चाहिए। दूसरे शब्दों मे अनुवर्ती कार्य निर्देशन-कार्यक्रम व्यवस्था को सुधारने एवं इसकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने के लिए अति आवश्यक है।

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    1. Can you provide some notes of guidance and counseling in the form of flow chart .....I think that will much help .....

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