व्यक्तित्व के सिद्धांत और व्यक्तित्व आकलन की विधियां

मनोविज्ञान में व्यक्तित्व का अध्ययन एक महत्वपूर्ण विषय है। व्यक्ति के व्यक्तित्व को समझने के लिए कई मनोवैज्ञानिकों ने अपने अपने मत एवं सिद्धांत प्रस्तुत किये हैं। इसमें जर्मन मनोवैज्ञानिक क्रेत्समर, विलियम शेल्डन, आलपोर्ट, सिग्मण्ड फ्रायड तथा मास्लो के व्यक्तित्व सिद्धांत की संक्षेप में जानकारी प्राप्त करेंगे।

व्यक्तित्व का अर्थ

व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्तित्व का अंग्रेजी अनुवाद 'Personality' है जो लैटिन शब्द Persona से बना है तथा जिसका अर्थ मुखौटा होता है, जिसे नाटक करते समय कलाकारों द्वारा पहना जाता था। इस शाब्दिक अर्थ को ध्यान में रखते हुए व्यक्तित्व को बाहरी वेशभूषा और और दिखावे के आधार पर परिभाषित किया गया है। 

इसे मनोवैज्ञानिकों द्वारा अवैज्ञानिक घोषित किया गया और तदन्तर अनेक परिभाषाएँ दी गई है। परन्तु ऑलपोर्ट द्वारा दी गई परिभाषा को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।

व्यक्तित्व की परिभाषा

ऑलपोर्ट (1937) के अनुसार, “व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोशारीरिक तन्त्रो का गतिशील या गत्यात्मक संगठन है जो वातावरण में उसके अपूर्व समायोजन को निर्धारित करते है।” 

ऑलपोर्ट की इस परिभाषा मे व्यक्तित्व के भीतरी गुणों तथा बाहरी गुणों को यानी व्यवहार को सम्मिलित किया गया है। परन्तु ऑलपोर्ट ने भीतरी गुणों पर अधिक बल दिया है।

व्यक्तित्व के सिद्धांत

व्यक्तित्व का सम्पूर्ण अध्ययन करने के लिए कई सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ। इन सिद्धांतों में से निम्न चार सिद्वान्तों का संक्षेप में वर्णन करेंगे। 
  1. व्यक्तित्व का प्रकार सिद्धांत
  2. व्यक्तित्व शील गुण सिद्धांत
  3. मनोगत्यात्मक या मनोविश्लेषण सिद्धांत
  4. मानवीय सिद्धांत 
उपरोक्त प्रकार के सिद्धांतों के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व का वर्गीकरण और उसका अध्ययन किया जा सकता है।

1. व्यक्तित्व प्रकार सिद्धांत 

क्रेत्समर एवं शेल्डन व्यक्तित्व वर्गीकरण 

क्रेत्समर, जो कि एक जर्मन मनोचिकित्सक थे, ने जर्मनी में कई मनोरोगियों के अध्ययन से व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया। अपनी एक शोध पुस्तक ‘‘फिजिक एण्ड करेक्टर’’ में व्यक्ति के शारीरिक गठन एवं स्वभाव के आधार पर व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया। उसने व्यक्तित्व के चार प्रमुख प्रकार बताए-
  1. पुष्टकाय प्रकार 
  2. कृशकाय प्रकार
  3. तुन्दिल प्रकार 
  4. मिश्रकाय प्रकार
1. पुष्टकाय प्रकार  इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों में शारीरिक गठन अच्छा होता है। इनके कंधे चैड़े, पीठ सीधी और हाथ-पांव की पेशियां अच्छी तरह विकसित होती है। इस प्रकार का व्यक्ति स्वभाव में साहसी, निर्भीक तथा प्रभुत्व की इच्छा रखने वाला होता है। उसकी रुचियां सफलता प्राप्त करने में होती है। 

ये सक्रिय ज्यादा रहते है, आराम से अधिक कार्य को महत्व देते है। ये व्यक्ति समाज में अधिक सफल होते है। इस वर्ग के व्यक्तियों में मनोविदलन रोग होने की सम्भावना अधिक होती है।

2. कृशकाय प्रकार - इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्ति का शरीर दुबला-पतला और लम्बा होता है,
अर्थात् उसका शरीर कृश होता है। उसकी मुखाकृति, गर्दन, रीढ़ की हड्डी आदि में पतलेपन और लम्बाई का प्रभाव स्पष्ट होता है। ऐसा व्यक्ति दूसरों की आलोचना करने वाला होता है। परन्तु स्वयं की आलोचना उसे असहनीय होती है, अर्थात् जब दूसरे उसकी आलोचना करते है तो वह इस बात को बहुत ही बुरा मानता है। 

ये व्यक्ति भावुक शांत और एकांत प्रिय होते है। इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्ति में मनोविदलता या मनोभाजन मानसिक रोग होने की प्रबल सम्भावना होती है।

3. तुन्दिल प्रकार - क्रेत्समर के अनुसार इस प्रकार के व्यक्तित्ववान व्यक्तियों के शरीर मे तोंद की प्रधानता होती है तथा ये कद में ठिगने, हट्टे-कट्टे, गोल-मटोल होते है। इनकी धड़ और शारीरिक गुहाएं बड़ी होती है। सीना और कंधे अच्छी गोलाई लिए हुए होते है। इनकी गर्दन तथा हाथ-पैर छोटे होते है और ये नाटे कद के होते है। इनकी बढ़ी हुई तोंद, गोल चिकना चेहरा, छोटी बांहे तथा टांगे उसकी तुन्दिल प्रकार के व्यक्तित्व की परिचायक है। 

ये व्यक्ति मिलनसार, हंसमुख तथा मैत्री रखने वाले होते है। ये व्यक्ति बड़े बातूनी होते है अर्थात् उन्हें बातें करने में बड़ा आनन्द आता है। ये लोग आराम पसन्द भी होते है। इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों की मनोस्थितियां जल्दी-जल्दी बदलती रहती है। 

अतः क्रेत्समर ने ऐसे व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों की चित्त-प्रकृति को चक्रीयवृत्ति  कहा है। ऐसा व्यक्ति सुख और दुःख में भी अधिक प्रभावी होता है। ऐसे व्यक्तियों में उत्साह-विशाद नामक रोग होने की सम्भावना अधिक होती है।

4. मिश्रकाय प्रकार - क्रेत्समर के अनुसार इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों का शरीर का गठन बेलोचदार तथा असामान्य होता है। इनके व्यक्तित्व में ऊपर वर्णित तीनों प्रकार का मिश्रण पाया जाता है। क्रेत्समर के अनुसार अधिकतर मानसिक रोगियों के शरीर की बनावट मिश्रकाय प्रकार की होती है। इनके शारीरिक विकास में कई प्रकार की असामान्यताएं पायी जाती है।

शेल्डन का व्यक्तित्व वर्गीकरण

क्रेत्समर के व्यक्तित्व वर्गीकरण को मनोवैज्ञानिको ने उनके वर्गीकरण आंशिक रूप से सही और आंशिक रूप से गलत पाया। कई शोध अध्ययनों में उनका वर्गीकरण खरा नहीं उतरा तथा उनके द्वारा किये गए व्यक्तित्व वर्गीकरण में सभी व्यक्तियों का वर्गीकरण नहीं किया जा सकता।

अमेरिका के चिकित्सक शेल्डन (1942) ने भी शरीर के प्रकार और चित्त प्रकृति का अध्ययन किया। उसने शरीर की रचनाओं में तीन घटकों को प्रधान माना है। इन तीन घटकों में जिस घटक की शरीर में प्रधानता है उसके अनुसार उस व्यक्ति का व्यक्तित्व होगा। उसने पहला घटक स्थूलकाय का या एण्डोमाॅर्फी माना है। दूसरा घटक मध्यकाय का या मीजोमाॅर्फी का व तीसरा घटक है लम्बकाय या एक्टोमाॅर्फी। 

जिस व्यक्ति के शरीर में स्थूलकायता या एण्डोमाॅर्फी की प्रधानता होती है तो उसका शरीर स्थूल होता है और यदि मध्यकायता या मीजोमाॅर्फी घटक की प्रधानता होती है तो शारीरिक बनावट मध्यकाय होती है। लम्बकायता, एक्टोमाॅर्फी प्रधान घटकों वाले शरीर की बनावट लम्बकाय होती है। 

इस तरह शेल्डन ने व्यक्तियों को घटकों के आधार पर निम्न तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है-
  1. स्थूलकाय या गोलाकार या अंतरंग प्रधान 
  2. मध्यकाय या आयताकार या काय प्रधान 
  3. लम्बाकार या लम्ब प्रमस्तिष्क प्रधान 
शेल्डन द्वारा वर्गीकृत उपरोक्त तीनों प्रकार के व्यक्तित्वों के लक्षणों का संक्षेप मे वर्णन हम आगे करेंगे।

1. स्थूल काय या गोलाकार या अंतरंग प्रधान -  इस वर्ग वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व अंतरंग प्रधान होता है। इनमें अपनी दिनचर्या रहन-सहन और कार्य करने के ढंग विशेष लक्षणों युक्त होते है। इनके मुख्य लक्षणों मे (1) आराम प्रेमी (2) मंद प्रतिक्रिया (3) चाल ढाल में शिथिलत (4) भोजनप्रिय (5) पाचन-क्रिया में आनंद (8) अविवेकी मिलनसारिता-(6) जन-प्रेमी (7) शिष्टाचार का प्रेमी (8) अविवेकी मिलनसारिता (9) प्यार और अनुमोदन की चाह (10) जन अभिविन्यास (11) भाव प्रवणता (12) सहिष्णुता (13) आत्म संतोष (14) गहन निंद्रा (15द्ध समन्वयवादी (16)निश्चल एवं सरल स्वभाव ;17) दुःख में संगी-साथी की तलाश (18) पारिवारिक प्रेमी

2. मध्यकाय प्रधान व्यक्तित्व - इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों का शरीर पुष्ट सुडौल एवं सुगठित होता है।
इनकी शारीरिक शक्ति पर्याप्त विकसित होती है। इनकी मांसपेशियां एवं हड्डियां भी पर्याप्त विकसित एवं शक्तिशाली होती है। इन लोगों मे खेलकूद में भाग लेने की रुचि रहती है। इनके शरीर पर चोट आदि का प्रभाव कम पड़ता है। ये अपने शरीर की देखभाल पर अधिक ध्यान देते है। अपने शरीर को पुष्ट सुगठित एवं ओजस्वी बनाये रखने के लिए व्यायाम और अन्य शारीरिक क्रियाएं करते रहते है। इस प्रकार के व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों में
प्रायः जो गुण पाए जाते हैं वे निम्न प्रकार के हैं -

1. शारीरिक-श्रम और कार्य-प्रेमी 2. ओजस्विता और नेतृत्व 3. चाल-ढाल में स्वाग्रही 4. व्यायाम-मनोरंजन प्रेमी 5. पढ़ाई-लिखाई से दूर 6. साहसी एवं संकटपूर्ण अवसर का प्रेमी 7. वार्तालाप में निर्भीक 8. प्रभुत्व वाला 9. दृढ़ हृदय 10. धर्मभीरुता का अभाव 11.प्रतियोगिता में आक्रामक 12. सवृत स्थानभीति 13 कोलाहल प्रेमी 14. ऊंचा और स्पष्ट स्वर 15. अतिपरिपक्व शरीर 16. कष्ट एवं पीड़ा के प्रति उदासीन 17. कठिनाई में भी सक्रियता 18. चिंतन में रूढि़वादिता

3. प्रमस्तिष्क प्रधान व्यक्तित्व - प्रमस्तिष्क प्रधान व्यक्तित्व वाले व्यक्तियों को लम्ब प्रमस्तिष्क प्रधान व्यक्तित्व वाला व्यक्ति भी कहते है। शारीरिक दृष्टि से ये लम्बे दुबले एवं पतले होते हैं। ये सही ढंग से पोशाक पहनते हैं। ये चिन्तनशील होते हैं परंतु शारीरिक शक्ति में कमजोर होते हंै। यह श्रमसाध्य कार्य कम करते हैं। शेल्डन द्वारा प्रमस्तिष्क प्रधान व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के जो लक्षण बताये गये है उनको संक्षेप में नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है-

1. शारीरिक क्रिया 2. तत्काल प्रतिक्रिया 3. चाल-ढाल में संयम 4. एकांत प्रेमी 5. सीमित सामाजिक संबंध एवं जन- भीति 6. मानसिक क्रियाशीलता-लम्ब प्रमस्तिष्क प्रधान व्यक्ति में अत्यधिक मानसिक क्रियाशीलता पायी 7. भावात्मक गोपनीयता8. संकोची स्वभाव 9. विवृत-स्थान-भीति 10. अनिश्चित अभिवृत्ति 11. आदत से बचाव 12. संवेदनशील 13. गहरी निंद्रा का अभाव-इस वर्ग के व्यक्तित्व वाले व्यक्ति गहरी एवं सुख की नींद नहीं सो पाता 14. निरन्तर थकान का अनुभव 15. संयमित वाणी 16. अंतर्मुखी 17. विपत्ति में एकांत की आवश्यकता 18. नित्य युवापन 19. शिष्टाचार प्रेमी

2. मनोश्लेषिक सिद्धांत

सिगमण्ड फ्रायड (1856 - 1939) ने करीब - करीब 40 साल के अपने नैदानिक अनुभवों के बाद व्यक्तित्व के जिस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है, उसे व्यक्तित्व का मनोवैश्लेषिक सिद्धांत कहा जाता है। मनोवैश्लेषिक सिद्धांत मानव प्रकृति या स्वभाव के बारे में कुछ मूल पूर्वकल्पनाओं पर आधारित है। इनमे से निम्नांकित प्रमुख है-

1. मानव व्यवहार वाह्यय कारकों द्वारा निर्धारित होता है तथा ऐसे व्यवहार अविवेकपूर्ण, अपरिवर्तनशील, समस्थितिक है।

2. मानव प्रकृति पूर्णता, शरीरगठनी तथा अप्रलक्षता जैसी पूर्व कल्पनाओं से हल्के - फुल्के ढंग से प्रभावित होती है।

3. मानव प्रकृति आत्मनिष्ठ की पूर्वकल्पना से बहुत कम प्रभावित होती है। इन पूर्व कल्पनाओं पर आधारित मनोवैश्लेषिक सिद्धांत की व्याख्या निम्नलिखित तीन मुख्य भागों मे बॉट कर की जाती है-
  1. व्यक्तित्व की संरचना
  2. व्यक्तित्व की गतिकी
  3. व्यक्तित्व की विकास
1. व्यक्तित्व की संरचना - फ्रायड ने व्यक्तित्व की संरचना का वणर्न करने के लिए निम्नलिखित दो मॉडल का निर्माण किया है -
  1. आकारात्मक मॉडल
  2. गत्यात्यक मॉडल या संरचनात्मक मॉडल
1. आकारत्मक मॉडल- मन का आकारात्मक मॉडल से तात्पर्य वैसे पहलू से होता है जहाँ संघर्षमय परिस्थिति की गत्यात्मकता उत्पन्न होती है। मन का यह पहलू सचमुच में व्यक्तित्व के गत्यात्मक शक्तियों के बीच होने वाले संघर्षो का एक कार्यस्थल होता है। फ्रायड ने इसे तीन स्तरों में बॉटा है- चेतन, अर्द्धचेतन तथा अचेतन।
  1. चतेन - चेतन से तात्पर्य मन के वैसे भाग से होता है जिसमे वे सभी अनूभूतियाँ एवं सेवेदनाएँ होती है जिनका संबंध वर्तमान से होता है। 
  2. अर्द्धचेतन - इसमें वैसी इच्छाएँ, विचार, भाव आदि होते है जो हमारे वर्तमान चेतन या अनुभव में नही होते है परन्तु प्रयास करने पर वे हमारे चेतन मन में आ जाते है।
  3. अचेतन - हमारे कछु अनुंभव इस प्रकार के होते है जो न तो हमारी चेतन मे होते हैं और न ही अर्द्धचेतन में । ऐसे अनुभव अचेतन में होते है। फ्रायड के अनुसार पर अचेतन अनुभूतियों एवं विचारों का प्रभाव हमारे व्यवहार पर चेतन एवं अर्द्धचेतन की अनुभूतियों एवं विचारों से अधिक होता है।
2. गत्यात्मक या संरचनात्मक मॉडल- फ्रायड के अनुसार मन के गत्यात्मक मॉडल से तात्पर्य उन साधनों से होता है जिनके द्वारा मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न मानसिक संघर्षो का समाधान होता है। ऐसे साधन या प्रतिनिधि तीन है -उपाहं (id), अहं (ego), तथा पराहं (Super ego),
  1. उपाह  (id) - यह व्यक्तित्व का जैिवक तत्व है जिनमें उन प्रवृत्तियों की भमार होती है जो जन्मजात होती है तथा जो असंगठित, कामुक, आक्रमकतापूर्ण तथा नियम आदि को मानने वाली नही होती है। उपाहं की प्रवृत्तियाँ “आनन्द सिद्धांत” द्वारा निर्धारित होती है।
  2. अहं - मन के गत्यात्मक पहलू का दूसरा पम्रुख भाग अहं है। अहं मन का वह हिस्सा है जिसका संबंध वास्तविकता से होता है।
  3. पराहं - पराहं को अहं से ऊँचा भी कहा गया है। जैसे -जैसे बच्चा बडा़ होते जाता है वह अपना तादात्म्य माता - पिता के साथ स्थापित करते जाता है। जिसके परिणामस्वारूप वह यह सीख लेता है कि क्या अनुचित है तथा क्या उचित है। इस तरह के सीखने से पराहं के विकास की शुरूआत होती है।
2. व्यक्तित्व की गतिकी - फ्रायड के अनुसार मानव जीव एक जटिल तन्त्र है जिसमें शारीरिक ऊर्जा तथा मानसिक उर्जा दोनों ही होते है। फ्रायड के अनुसार इन दोनों तरह की ऊर्जाओं का स्पर्श बिन्दु उपाहं होता है। फ्रायड व्यक्तित्व की गत्यात्मक पहलुओं जैसे - मूलप्रवृत्तियों, चिन्ता तथा मनोरचनाओं का वर्णन होता है।
  1. मलू प्रवृत्ति - मलू प्रवृत्ति का तात्पर्य वैसे शारीरिक उत्तेजनाओं से होता है, जिसके द्वारा व्यक्ति के सभी तरह के व्यवहार निर्धारित किये जाते है। फ्रायड ने मूल प्रवृत्तियों को मूल्त: दो भागो में बाँटा - (i) जीवन मूल प्रवृत्ति - (ii) मृत्यु मूल प्रवृत्ति अपने विशेष अहमियत के कारण फ्रायड ने जीवन मूल प्रवृत्ति से मौन मूलप्रवृत्ति को अलग करके वर्णन किया है। मौन मूल प्रवृत्ति के ऊर्जा बल को लिबिडो कहा गया है जिसकी अभिव्यक्ति सिर्फ लैगिक क्रियाओं के रूप में होती है।
  2. चिन्ता - चिन्ता एक ऐसी भावात्मक एवं द:ुखद अवस्था होती है जो अहं को आलम्बित खतरे से सतर्क करता है ताकि व्यक्ति वातावरण के साथ अनुकूली ढंग से व्यवहार कर सके। फ्रायड ने चिन्ता के तीन प्रकार बतलायें है।
  3. अहं रक्षात्मक प्रक्रम - अहं रक्षात्मक प्रक्रम के विचार का प्रतिपादन सिगमण्ड फ्रायड ने किया परन्तु इसकी सूची उनकी पुत्री अन्ना फ्रायड तथा अन्य नव फ्रायडियन मनोवैज्ञानिकों ने तैयार की यह प्रक्रम अहं को चिन्ताओं से बचा पाता है। रक्षात्मक प्रक्रमों का प्रयोग सभी व्यक्ति करते है परन्तु इसका प्रयोग अक्तिाक करने पर व्यक्ति के व्यवहार में बाहयता एवं स्नायुविकृति का गुण विकसित होता है।
3. व्यक्तित्व का विकास  - फ्रायड ने व्यक्तित्व विकास की व्याख्या दो दृष्टिकोण से किया है। पहला दृष्टिकोण इस बात पर बल डालता है कि वयस्क व्यक्तित्व बाल्यवस्था के भिन्न-भिन्न तरह की अनुभूतियों द्वारा नियंत्रित होती है तथा दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार जन्म के समय लैंगिग ऊर्जा बच्चों में मौजूद होती है जो विभिन्न मनोलैगिंग अवस्थाओं से होकर विकसित होती है। 

फ्रायड के इस दूसरे दृष्टिकोण को मनोलैंगिक विकास का सिद्धांत कहा जाता है। फ्रायड द्वारा प्रतिपादित मनोलैंगिक विकास के सिद्धांत की पाँच अवस्थाएँ क्रम में निम्नांकित है -
  1. मुखावस्था
  2. गुदावस्था
  3. लिंग प्रधानावस्था
  4. अव्यक्तावस्था
  5. जननेन्द्रियावस्था

3. कार्ल रोजर्स का व्यक्तित्व सिद्धांत

कार्ल रोजर्स का सिद्धांत घटना विज्ञान या सांवृत्तिकशास्त्र के नियमों पर आधारित है। सांवृत्तिकशास्त्र वह शास्त्र होता है जिसमें व्यक्ति की अनुभूतियों, भावों एवं मनोवृत्तियों तथा उनके अपने बारे में या आत्मन् के बारे में तथा दूसरों के बारे में व्यक्तिगत विचारों का अध्ययन विशेष रूप से किया जाता है। रोजर्स के सिद्धांत को मानवतावादी आन्दोलन के अन्तर्गत एक पूर्णत: सांवृत्तिक सिद्धांत माना गया है। 

रोजर्स के व्यक्तित्व सिद्धांत को आत्म सिद्धांत या व्यक्ति केन्द्रित सिद्धांत भी कहलाता है। रोजर्स के व्यक्तित्व सिद्धांत को निम्नांकित भागों में बांटा जा सकता है-
  1. व्यक्तित्व के स्थायी पहलू
  2. व्यक्तित्व की गतिकी
  3. व्यक्तित्व का विकास
1. व्यक्तित्व के स्थायी पहलू - रोजर्स का व्यक्तित्व सिद्धान्त उनके द्वारा प्रतिपादित क्लायंट केन्द्रित मनोचिकित्सा से प्राप्त अनुभूतियों पर आधारित है। उनके सिद्धान्त का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति में होने वाले परिवर्तनों एवं वर्धनों का अध् ययन करना है। इन्होंने व्यक्तित्व के दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर बल डाला है- प्राणी एवं आत्मन
  1. प्राणी - रोजर्स के अनुसार पा्रणी एक ऐसा दैिहक जीव है जो शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक दोनों ही तरह से कार्य करता है। प्राणी सभी तरह की अनुभूतियों का केन्द्र होता है। इन अनुभूतियों में अपने दैहिक गतिविधियों से संबंक्तिात अनुभूतियां तथा साथ ही साथ बाºय वातावरण की घटनाओं के प्रत्यक्षण की अनुभूतियां दोनों ही सम्मिलित होती है। सभी तरह की चेतन और अचेतन अनुभूतियों के योग से जिस क्षेत्र का निर्माण होता है, उसे प्रासंगिक क्षेत्र कहते हैं।
  2. आत्मन - रोजर्स का व्यक्तित्व सिद्धान्त का यह सबसे महत्वपूर्ण संप्रत्यय है। धीरे-धीरे अनुभव के आधार पर प्रासंगिक क्षेत्र का एक भाग अधिक विशिष्ट हो जाता है और इसे ही रोजर्स ने आत्मन कहा है। आत्मन व्यक्तित्व की अलग विमा नही होता है बल्कि आत्मन का अर्थ ही सम्पूर्ण प्राणी से होता है।
2. व्यक्तित्व की गतिकी - रोजर्स ने अपने व्यक्तित्व गतिकी की व्याख्या करने के लिए एक महत्वपूर्ण अभिप्रेरक का वर्णन किया है जिसे उन्होंने वस्तुवादी प्रवृत्ति (actualizing tendency) कहा है। रोजर्स के अनुसार वस्तुवादी प्रवृत्ति से तात्पर्य प्राणी में सभी तरह की क्षमताओं को विकसित करने की जन्मजात प्रवृत्ति से होता है जो व्यक्ति को अपने आत्मन को उन्नत बनाने तथा प्रोत्साहन देने का काम करता है।

3. व्यक्तित्व का विकास - रोजर्स ने फ्रायड एवं एरिक्सन की भाँति व्यक्तित्व का को अवस्था सिद्धान्त प्रतिपादित नही किया है। उन्होंने व्यक्तित्व के विकास में आत्मन तथा व्यक्तित्व की अनुभूतियों में संगतता को महत्वपूर्ण बताया है। जब इन दोनों में अर्थात व्यक्ति की अनुभूतियों तथा उनके आत्म संप्रव्यय के बीच अन्तर हो जाता है तो इससे व्यक्ति में चिन्ता उत्पन्न होती है। असंगता के अन्तर से उत्पन्न इस चिन्ता की रोकथाम के लिए व्यक्ति कुछ बचाव प्रक्रियाएं प्रारम्भ कर देता है। इसे प्रतिरक्षा की संज्ञा दी गयी है।

4. एब्राहम मास्लो का मानवीय सिद्धांत

एब्राहम मैसलो मानवतावादी मनोविज्ञान के आध्यात्मिक जनक माने गए है। मैसलो ने अपने व्यक्तित्व सिद्धांत में प्राणी के अनूठापन का उसके मूल्यों के महत्व पर तथा व्यक्तिगत वर्धन तथा आत्म निर्देश की क्षमता पर सर्वाधिक बल डाला है। इस बल के कारण ही उनका मानना है कि सम्पूर्ण प्राणी का विकास उसके भीतर से संगठित ढंग से होता है। इन आन्तरिक कारकों की तुलना में बाºय कारकों जैसे गत अनुभूतियों का महत्व नगण्य होता है।

1. व्यक्तित्व एवं अभिप्रेरण का पदानुक्रमिक मॉडल- मैसलो के व्यक्तित्व सिद्धांत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसका अभिप्रेरण सिद्धांत है। इनका विश्वास था कि अधिकांश मानव व्यवहार की व्याख्या को न को व्यक्तिगत लक्ष्य पर पहुंचने की प्रवृत्ति से निर्देशित होता है। मैसलों का मत था कि मानव अभिप्रेरक जन्मजात होते है और उन्हें प्राथमिकता या शक्ति के आरोही पदानुक्रम में सुव्यवस्थित किया जा सकता है। ऐसे अभिप्रेरकों को प्राथमिकता या शक्ति के आरोही क्रम में इस प्रकार बतलाया गया है-
व्यक्तित्व एवं अभिप्रेरण का पदानुक्रमिक मॉडल
इनमें से प्रथम दो आवश्यकताओं अर्थात शारीरिक या दैहिक आवश्यकता तथा सुरक्षा की आवश्यकता को निचले स्तर की आवश्यकता तथा अन्तिम तीनआवश्यकताओं अर्थात संबंद्धता एवं स्नेह की आवश्यकता, सम्मान की आवश्यकता तथा आत्म सिद्धि की आवश्यकता को उच्च स्तरीय आवश्यकता कहा है। इस पदानुक्रम मॉडल में जो आवश्यकता जितनी ही नीचे है, उसकी प्राथमिकता या शक्ति उतनी ही अधिक मानी गयी है।

व्यक्तित्व आकलन की विधियां

व्यक्तित्व आंकलन की प्रमुख तीन विधियां होती है-
  1. व्यक्तिगत प्रविधि      
  2. वस्तुनिष्ठ प्रविधि      
  3. प्रक्षेपण प्रविधि 

1. व्यक्तिगत प्रविधि 

जब मूल्यांकनकर्ता की व्यक्तिगत विशेषताएं मूल्यांकन प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं तो वे व्यक्तिगत विधि कहलाती है। इसके अन्तर्गत प्रमुखत: साक्षात्कार विधि, जीवन इतिहास विधि आत्मकथा, व प्रश्नावली विधि आती है। साक्षात्कार विधि- साक्षात्कार विधि की सहायता से शोधकर्ता प्रयोज्य के स्वयं के अनुभवों के बारे में अच्छी सूझ उत्पन्न कर सकता है और इस प्रकार व्यक्ति के उन सार्थक पक्षों के बारे में जान सकता है जिनके बारे में अन्य किसी संगठित व पूर्व निर्धारित परीक्षण द्वारा नही जाना जा सकता है।

जीवन इतिहास विधि- इस विधि में बालकों की समस्याओं का अध्ययन करने के लिये एक केश विवरण या इतिहास तैयार किया जाता है। बालक द्वारा पिछले क वर्षो में की गयी अन्त: क्रियाओं का एक विशेष रिकार्ड तैयार किया जाता है। इन अन्त:क्रियाओं का विश्लेषण करके बालक के बारे में समस्त जानकारी प्राप्त की जाती है। इसमें बालक के बारे में समस्त सूचनायें संकलित की जाती है।

2. वस्तुनिष्ठ प्रविधि

इसमें मूल्यांकनर्ता की व्यक्तिगत विशेषताएं मूल्यांकन की प्रक्रिया को प्रभावित नही करती है। इसके अन्तर्गत आने वाली प्रमुख विधियाँ- निरीक्षण विक्रिा, समाजमिति, व्यक्तित्व प्रश्नावली मापनियाँ, कोटिक्रम मापनी, आदि आते हैं।

व्यक्तित्व प्रश्नावली - कुछ मनोवैज्ञानिकों द्वारा व्यक्तित्व को मापने हेतु प्रमापीकृत प्रश्नावलियों का निर्माण किया गया है जिनकी सहायता से लोगों के शीलगुणों के बारे में जाना जा सकता है। उदाहरणार्थ- 16 व्यक्तित्व गुण (16 PF) - यह प्रमुख मनोवैज्ञानिक कैटल द्वारा निर्मित है। इसके माध्यम से किसी भी व्यक्ति के 16 शीलगुणों के बारे में बताया जा सकता है। इसका भारत में अनुकरण एस0डी0 श्रीवास्तव ने किया है जिसमें 187 कथन है। प्रत्येक कथन के समक्ष तीन विकल्प हमेशा, कभी-कभी व कभी नही है। इनमें से प्रत्येक कथन के लिए व्यक्ति को एक विकल्प चुनना होता है।

 इसके पश्चात स्टेन्सिल कुंजी की सहायता से व्यक्ति द्वारा चयनित उत्तरों को अंक प्रदान किए जाते हं। सभी प्रतिक्रियाओं के लिए दिए गये अंकों को जोड़कर प्राप्तांक निकाला जाता है और इस प्रप्तांक के आधार पर स्टेन स्कोर ज्ञात किया जाता है। इस स्टेन स्कोर के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व का विवरण प्रस्तुत किया जाता है।

समाजमिति- इस विधि द्वारा पत््रयके व्यक्ति के आपसी स्वीकार व तिरस्कार की बारम्बारता द्वारा सामूहिक संरचना का अध्ययन किया जाता है। यह एक समूह के व्यक्तियों में आपसी सम्बन्धों का अध्ययन करती है। यह समूह में व्यक्ति की स्थिति व उसके स्तर को बताती है। इसके माध्यम से एक बड़े समूह में व्याप्त छोटे-छोटे समूहों की भी जानकारी मिलती है। इसके माध्यम से निम्न बातों को जाना जा सकता है। 

3. प्रक्षेपण प्रविधि 

यह प्रक्षेपण के प्रत्यय पर आधारित है। फ्रायड के अनुसार प्रक्षेपण एक ऐसी अचेतन प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने अपूर्ण विचारों, मनोवश्त्तियों, इच्छाओं, संवेगों तथा भावनाओं को दूसरे व्यक्तियों या वस्तुओं पर आरोपित करता है। इसके अन्तर्गत आने वाले प्रमुख परीक्षण इस प्रकार है-
  1. रोर्शाक इंक ब्लाट परीक्षण
  2. थीमेटिक अपरशैप्सन परीक्षण
  3. वाक्यपूर्ति परीक्षण
  4. रोजनबिग पिक्चर फ्रस्टेशन परीक्षण
  5. ड्रा ए मैन परीक्षण

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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