व्यक्तित्व का अर्थ, प्रकार एवं सिद्धान्त

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मनोवैज्ञानिकों द्वारा व्यक्तित्व की विभिन्न परिभाषाएं दी गई है। परिभाषाओं के क्रम में सबसे पुरानी परिभाषा व्यक्तित्व शब्द की उत्पत्ति से सम्बिन्ध् त संप्रत्यय पर आधारित है। व्यक्तित्व का अंग्रजी अनुवाद 'Personality' है जो लैटिन शब्द Persona से बना है तथा जिसका अर्थ मुखौटा होता है, जिसे नाटक करते समय कलाकारों द्वारा पहना जाता था। इस शाब्दिक अर्थ को ध्यान में रखते हुए व्यक्तित्व को बारही वेशभूषा और और दिखावे के आधार पर परिभाषित किया गया है। इसे मनोवैज्ञानिकों द्वारा अवैज्ञानिक घोषित किया गया और तदन्तर अनेक परिभाषाएँ दी गई है। परन्तु ऑलपोर्ट द्वारा दी गई परिभाषा को सर्वाधिक मान्यता प्रात्त है।

ऑलपोर्ट (1937) के अनुसार, “व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोशारीरिक तन्त्रो का गतिशील या गत्यात्मक संगठन है जो वातावरण में उसके अपूर्व समायोजन को निर्धारित करते है।” ऑलपोर्ट की इस परिभाषा मे व्यक्तित्व के भीतरी गुणों तथा बाहरी गुणो को यानी व्यवहार को सम्मिलित किया गया है। परन्तु ऑलपोर्ट ने भीतरी गुणों पर अधिक बल दिया है। व्यक्तित्व को निम्नलिखित रूप में विश्लेषित किया जा सकता है - 
  1. मनोशारीरिक तन्त्र - व्यक्तित्व एक ऐसा तन्त्र है जिसके मानसिक तथा शारीरिक दोनो ही पक्ष होते है। यह तन्त्र ऐसे तत्वो का एक गठन होता है जो आपस में अन्त: क्रिया करते है। इस तन्त्र के मुख्य तत्व शीलगुण, संवेग, आदत, ज्ञानशक्ति, चित्तप्रकृति, चरित्र, अभिप्रेरक आदि हैं जो सभी मानसिक गुण हैं परन्तु इन सब का आधार शारीरिक अर्थात व्यक्ति के ग्रन्थीय प्रक्रियाएँ एवं तंत्रिकीय प्रक्रियाएँ है।
  2. गत्यात्मक संगठन- गत्यात्मक संगठन से तात्पर्य यह होता है कि मनोशारीरिक तन्त्र के भिन्न-भिन्न तत्व जैसे शीलगुण, आदत आदि एक-दूसरे से इस तरह संबंधित होकर संगठित है कि उन्हें एक-दूसरे से पूर्णत: अलग नहीं किया जा सकता है। इस संगठन में परिवर्तन सम्भव है।
  3. संगतता- व्यक्तित्व में व्यक्ति का व्यवहार एक समय से दूसरे समय में संगत होता है। संगतता का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति का व्यवहार दो भिन्न अवसरों पर भी लगभग एक समान होता है। व्यक्ति के व्यवहार में इसी संगतता के आधार पर उसमें अमुक शीलगुण होने का अनुमान लगाया जाता है।
  4. वातावरण में अपूर्व समायोजन का निर्धारण- प्रत्येक व्यक्ति में मनोशारीरिक गुणों का एक ऐसा गत्यात्मक संगठन पाया जाता है कि उसका व्यवहार वातावरण में अपने-अपने ढंग का अपूर्व होता है। वातावरण समान होने पर भी प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार, विचार, होने वाला संवेग आदि अपूर्व होता है। जिसके कारण उस वातावरण के साथ समायोजन करने का ढंग भी प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग होता है।
अर्थात् यह कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व में भिन्न-भिन्न शीलगुणों का एक ऐसा गत्यात्मक संगठन होता है जिसके कारण व्यक्ति का व्यवहार तथा विचार किसी भी वातावरण में अपने ढंग का अर्थात् अपूर्व होता है।

व्यक्तित्व के उपागम

व्यक्तित्व के स्वरूप की व्याख्या करने के लिए विभिन्न तरह के उपागमों के अन्तर्गत विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है, जिनमें प्रमुख है -

प्रकार उपागम -

प्रकार सिद्धान्त व्यक्तित्व का सबसे पुराना सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति को विभिन्न प्रकारों में बांटा जाता है और उसके आधार पर उसके शीलगुणों का वर्णन किया जाता है।
मार्गन, किंग, विस्ज तथा स्कोपलर के अनुसार व्यक्तित्व के प्रकार से तात्पर्य, “व्यक्तियों के एक ऐसे वर्ग से होता है जिनके गुण एक-दूसरे से मिलते जुलते है। जैसे-अन्तर्मुखी एक प्रकार है और जिन व्यक्तियों को इसमें रखा जाता है उनमें कुछ सामान्य गुण जैसे-संकोचशीलता, सामाजिक कार्यो में अरूचि, लोगो से कम मिलना-जुलना पाया जाता है।”

शारीरिक गुणों के आधार पर -

  1. हिप्पोक्रेटस ने शरीर द्रवों के आधार पर - व्यक्तित्व के चार प्रकार बताएं है। इनके अनुसार शरीर में चार मुख्य द्रव पाये जाते है - पीला पित्त, काला पित्त, रक्त तथा कफ या श्लेष्मा। प्रत्येक व्यक्ति मे इन चारों द्रवो में से कोई एक द्रव अधिक प्रधान होता है और व्यक्ति का स्वभाव या चिन्तप्रकृति इसी की प्रधानता से निर्धारित होता है।
  2. क्रेश्मर का वर्गीकरण - क्रेश्मर एक मनोवैज्ञानिक थे जिन्होने व्यक्तित्व के चार प्रकार बताए जोकि निम्नवत् है -
    1. स्थूलकाय प्रकार - ऐसे व्यक्ति का कद छोटा होता है तथा शरीर भारी एवं गोलाकार होता है, गर्दन छोटी और मोटी होती है। इनका स्वभाव सामाजिक और खुशमिजाज होता है। 
    2. कृशकाय प्रकार - इस तरह के व्यक्ति का कद लम्बा होता है परन्तु वे दुबले पतले शरीर के होते है। ऐसे व्यक्तियों के शरीर की माँसपेशियाँ विकसित नही होती है। स्वभाव चिड़चिड़ा होता है तथा सामाजिक उत्तरदायित्व से दूर रहने की प्रवृति अधिक होती है
    3. पुष्टकाय प्रकार - ऐसे व्यक्ति की माँसपेिशयाँ काफी विकसित एवं गठी होती है। शारीरिक कद न तो अधिक लम्बा होता है न अधिक मोटा। शरीर सुडौल और सन्तुलित होता है। इनके स्वभाव में न अधिक चंचलता होती है और न अक्तिाक मन्दन इन्हें काफी सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है। 
    4. विशालकाय प्रकार - इसमें उपरोक्त तीनों प्रकार के गुण मिले - जुले रूप में पाये जाते है।
  3. शेल्डन का वर्गीकरण - शेल्डन ने 1990 में शारीरिक गठन के आधार पर सिद्धान्त दिया, जिसे सोर्मेटोटाइप सिद्धान्त कहा गया। शेल्डन ने व्यक्तित्व के तीन प्रकार बताये है-
    1. एण्डोमार्फी - इस प्रकार के व्यक्ति मोटे एवं नाटे दिखता है। इस तहर के शारीरिक गठन वाले व्यक्ति आरामपसंद, खुशमिजाज, सामाजिक तथा खाने - पीने की चीजों में अधिक अभिरूचि दिखाने वोले होते है। 
    2. मेसोमार्फी - ऐसे लोगों की हडिड्याँ व माँसपेिशयॉ काफी विकसित होती है। तथा शारीरिक गठन काफी सुडौल होता है। 
    3. एक्टोमार्फी - ऐसे व्यक्तियों का कद लम्बा तथा दुबले पतले होते है। माँसपेशियाँ अविकसित तथा शारीरिक गठन इकहरा होता है। इन्हें अकेले रहना और लोगों से कम मिलना जुलना पसन्द है।

मनोवैज्ञानिक गुणो के आधार पर-

युंग (1923) ने व्यक्तित्व के दो प्रकार बताये-
  1. बर्हिमुखी - इस तरह के व्यक्ति की अभिरूचि विशेषकर समाज के कार्यो की ओर होती है। वह अन्य लोगों से मिलना जुलना पसन्द करता है तथा प्राय: खुशमिजाज होता है। 
  2. अन्तर्मुखी - ऐसे व्यक्ति में बहिमुर्खी के विपरीत गुण पाये जाते है। इस तरह के व्यक्ति बहुत लोगों से मिलना जुलना पसंद नही करते है और उनकी दोस्ती कुछ ही लोगों तक सीमित होती है। इसमें आत्मकेन्द्रिता का गुण अधिक पाया जाता है। 
आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अधिकतर मनुष्यों मे दोनों श्रेणियों के गुण पाये जाते हैं अर्थात एक परिस्थिति में वे बहिर्मुखी व्यवहार करते है और अन्य में अन्तर्मुखी। ऐसे व्यक्तियों को उभयमुखी कहा जाता है।

शीलगुण उपागम -

शीलगुण सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति की संरचना भिन्न - भिन्न प्रकार के शीलगुण से ठीक वैसी बनी होती है जैसे एक मकान की संरचना छोटी - छोटी ईंट से बनी होती है। शीलगुण का समान्य अर्थ होता है व्यक्ति के व्यवहारों का वर्णन। जैसे- सतर्क, सक्रिय और मंदित आदि। शीलगुण सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति का व्यवहार भिन्न-भिन्न शीलगुणों द्वारा नियन्त्रित होता है जो प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद रहते है। शीलगुण सिद्धान्त में निम्नलिखित मनोवैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण योगदान है-

आलपोर्ट का योगदान - 

ऑलपोर्ट का नाम शीलगुण सिद्धान्त के साथ मुख्य रूप से जुड़ा है। यही कारण है कि ऑलपोर्ट द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व के सिद्धान्त को ‘ऑलपोर्ट का शीलगुण सिद्धान्त’ कहा जाता है। इन्होने शीलगुणों को दो भागो में बाँटा है -
  1. सामान्य शीलगुण - सामान्य शीलगुण से तात्पर्य वैसै शीलगुणों से होता है जो किसी समाज संस्कृति के अधिकतर लोगों में पाया जाता है। 
  2. व्यक्तिगत शीलगुण - यह अधिक विवरणात्मक होता है तथा इससे संभ्रान्ति भी कम होता है। ऑलपोर्ट के अनुसार व्यक्तिगत प्रवृत्ति तीन प्रकार की होती है-
    1. कार्डिनल प्रवृत्ति - इस तरह की व्यक्तिगत प्रवृत्ति व्यक्तित्व का इतना प्रमुख एवं प्रबल गुण होता है कि उसे छिपाया नहीं जा सकता है और व्यक्ति के प्रत्येक व्यवहार की व्याख्या इस तरह से कार्डिनल प्रवृत्ति के रूप में आसानी से की जा सकती है।
    2. केन्द्रीय प्रवृत्ति- यह सभी व्यक्तियो में पायी जाती है। पत््रयेक व्यक्ति में 5 से 10 ऐसी प्रवृत्तियां होती हैं जिसके भीतर उसका व्यक्तित्व अधिक सक्रिय रहता है। इन गुणों को केन्द्रीय प्रवृत्ति कहते हैं जैसे सामाजिकता, आत्मविश्वास आदि।
    3. गौण प्रवृत्ति - गौण प्रवृत्ति वैसे गुणों को कहते है जो व्यक्तित्व के लिए कम महत्वपूर्ण, कम संगत, कम अर्थपूर्ण तथा कम स्पष्ट होते है। जैसे - खाने की आदत, केश शैली आदि। एक व्यक्ति के लिए कोई प्रवृत्ति केन्द्रीय प्रवृत्ति हो सकती है वहीं दूसरे के लिए गौण प्रवृत्ति हो सकती है।

कैटल का योगदान - 

शीलगुण सिद्धान्त में ऑलपोर्ट के बाद कैटल का नाम महत्वपूर्ण माना गया है। कैटल ने प्रमुख शीलगुणों की शुरूआत ऑलपोर्ट द्वारा बतलाये गए 18,000 शीलगुणों में से 4,500 शीलगुणों को चुनकार किया। बाद में, इनमें से समानार्थ शब्दों को एक साथ मिलाकर इसकी संख्या उन्होने 200 कर दी और फिर बाद में विशेष सांख्यिकीय विधि यानी कारक विश्लेषण के सहारे अन्तर सहसंबंध द्वारा उसकी संख्या 35 कर दी कैटल ने शीलगुणो को दो भागों में विभाजित किया है।
  1. सतही शीलगुण - इस तरह का शीलगुण व्यक्तित्व के ऊपरी सतह या परिधि पर होता है यानी इस तरह के शीलगुण ऐसे होते है जो व्यक्ति के दिन - प्रतिदिन की अन्त: क्रिया में आसानी से अभिव्यक्त हो जाते है।
  2. स्रोत या मूल शीलगुण - कैटल के अनुसार मलू शीलगुण व्यक्तित्व की अधिक महत्पूर्ण संरचना है तथा इसकी संख्या सतही शीलगुण की अपेक्षा कम होती है। मूल शीलगुण सतही शीलगुण के समान, व्यक्ति के दिन प्रतिदिन की अन्त: क्रिया में स्पष्ट रूप से व्यक्त नही हो पाते है।

मनोश्लेषिक सिद्धान्त -

सिगमण्ड फ्रायड (1856 - 1939) ने करीब - करीब 40 साल के अपने नैदानिक अनुभवों के बाद व्यक्तित्व के जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है, उसे व्यक्तित्व का मनोवैश्लेषिक सिद्धान्त कहा जाता है। मनोवैश्लेषिक सिद्धान्त मानव प्रकृति या स्वभाव के बारे में कुछ मूल पूर्वकल्पनाओं पर आधारित है। इनमे से निम्नांकित प्रमुख है-
  1. मानव व्यवहार वाह्यय कारकों द्वारा निर्धारित होता है तथा ऐसे व्यवहार अविवेकपूर्ण, अपरिवर्तनशील, समस्थितिक है।
  2. मानव प्रकृति पूर्णता, शरीरगठनी तथा अप्रलक्षता जैसी पूर्व कल्पनाओं से हल्के - फुल्के ढंग से प्रभावित होती है।
  3. मानव प्रकृति आत्मनिष्ठ की पूर्वकल्पना से बहुत कम प्रभावित होती है। इन पूर्व कल्पनाओं पर आधारित मनोवैश्लेषिक सिद्धान्त की व्याख्या निम्नलिखित तीन मुख्य भागों मे बॉट कर की जाती है-
    • व्यक्तित्व की संरचना
    • व्यक्तित्व की गतिकी
    • व्यक्तित्व की विकास

व्यक्तित्व की संरचना -

फ्रायड ने व्यक्तित्व की संरचना का वणर्न करने के लिए निम्नलिखित दो मॉडल का निर्माण किया है -(i) आकारात्मक मॉडल (ii) गत्यात्यक मॉडल या संरचनात्मक मॉडल
  1. आकारत्मक मॉडल- मन का आकारात्मक मॉडल से तात्पर्य वैसे पहलू से होता है जहाँ संघर्षमय परिस्थिति की गत्यात्मकता उत्पन्न होती है। मन का यह पहलू सचमुच में व्यक्तित्व के गत्यात्मक शक्तियों के बीच होने वाले संघर्षो का एक कार्यस्थल होता है। फ्रायड ने इसे तीन स्तरों में बॉटा है- चेतन, अर्द्धचेतन तथा अचेतन।
    1. चतेन - चेतन से तात्पर्य मन के वैसे भाग से होता है जिसमे वे सभी अनूभूतियाँ एवं सेवेदनाएँ होती है जिनका संबंध वर्तमान से होता है। 
    2. अर्द्धचेतन - इसमें वैसी इच्छाएँ, विचार, भाव आदि होते है जो हमारे वर्तमान चेतन या अनुभव में नही होते है परन्तु प्रयास करने पर वे हमारे चेतन मन में आ जाते है।
    3. अचेतन - हमारे कछु अनुंभव इस प्रकार के होते है जो न तो हमारी चेतन मे होते हैं और न ही अर्द्धचेतन में । ऐसे अनुभव अचेतन में होते है। फ्रायड के अनुसार पर अचेतन अनुभूतियों एवं विचारों का प्रभाव हमारे व्यवहार पर चेतन एवं अर्द्धचेतन की अनुभूतियों एवं विचारों से अधिक होता है।
  2. गत्यात्मक या संरचनात्मक मॉडल- फ्रायड के अनुसार मन के गत्यात्मक मॉडल से तात्पर्य उन साधनों से होता है जिनके द्वारा मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न मानसिक संघर्षो का समाधान होता है। ऐसे साधन या प्रतिनिधि तीन है -उपाहं (id), अहं (ego), तथा पराहं (Super ego),
    1. उपाह  (id) - यह व्यक्तित्व का जैिवक तत्व है जिनमें उन प्रवृत्तियों की भमार होती है जो जन्मजात होती है तथा जो असंगठित, कामुक, आक्रमकतापूर्ण तथा नियम आदि को मानने वाली नही होती है। उपाहं की प्रवृत्तियाँ “आनन्द सिद्धान्त” द्वारा निर्धारित होती है।
    2. अहं - मन के गत्यात्मक पहलू का दूसरा पम्रुख भाग अहं है। अहं मन का वह हिस्सा है जिसका संबंध वास्तविकता से होता है।
    3. पराहं - पराहं को अहं से ऊँचा भी कहा गया है। जैसे -जैसे बच्चा बडा़ होते जाता है वह अपना तादात्म्य माता - पिता के साथ स्थापित करते जाता है। जिसके परिणामस्वारूप वह यह सीख लेता है कि क्या अनुचित है तथा क्या उचित है। इस तरह के सीखने से पराहं के विकास की शुरूआत होती है।

व्यक्तित्व की गतिकी - 

फ्रायड के अनुसार मानव जीव एक जटिल तन्त्र है जिसमें शारीरिक ऊर्जा तथा मानसिक उर्जा दोनों ही होते है। फ्रायड के अनुसार इन दोनों तरह की ऊर्जाओं का स्पर्श बिन्दु उपाहं होता है। फ्रायड व्यक्तित्व की गत्यात्मक पहलुओं जैसे - मूलप्रवृत्तियों, चिन्ता तथा मनोरचनाओं का वर्णन होता है।
  1. मलू प्रवृत्ति - मलू प्रवृत्ति का तात्पर्य वैसे शारीरिक उत्तेजनाओं से होता है, जिसके द्वारा व्यक्ति के सभी तरह के व्यवहार निर्धारित किये जाते है। फ्रायड ने मूल प्रवृत्तियों को मूल्त: दो भागो में बाँटा - (i) जीवन मूल प्रवृत्ति - (ii) मृत्यु मूल प्रवृत्ति अपने विशेष अहमियत के कारण फ्रायड ने जीवन मूल प्रवृत्ति से मौन मूलप्रवृत्ति को अलग करके वर्णन किया है। मौन मूल प्रवृत्ति के ऊर्जा बल को लिबिडो कहा गया है जिसकी अभिव्यक्ति सिर्फ लैगिक क्रियाओं के रूप में होती है।
  2. चिन्ता - चिन्ता एक ऐसी भावात्मक एवं द:ुखद अवस्था होती है जो अहं को आलम्बित खतरे से सतर्क करता है ताकि व्यक्ति वातावरण के साथ अनुकूली ढंग से व्यवहार कर सके। फ्रायड ने चिन्ता के तीन प्रकार बतलायें है।
  3. अहं रक्षात्मक प्रक्रम - अहं रक्षात्मक प्रक्रम के विचार का प्रतिपादन सिगमण्ड फ्रायड ने किया परन्तु इसकी सूची उनकी पुत्री अन्ना फ्रायड तथा अन्य नव फ्रायडियन मनोवैज्ञानिकों ने तैयार की यह प्रक्रम अहं को चिन्ताओं से बचा पाता है। रक्षात्मक प्रक्रमों का प्रयोग सभी व्यक्ति करते है परन्तु इसका प्रयोग अक्तिाक करने पर व्यक्ति के व्यवहार में बाहयता एवं स्नायुविकृति का गुण विकसित होता है।

व्यक्तित्व का विकास - 

फ्रायड ने व्यक्तित्व विकास की व्याख्या दो दृष्टिकोण से किया है। पहला दृष्टिकोण इस बात पर बल डालता है कि वयस्क व्यक्तित्व बाल्यवस्था के भिन्न-भिन्न तरह की अनुभूतियों द्वारा नियंत्रित होती है तथा दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार जन्म के समय लैंगिग ऊर्जा बच्चों में मौजूद होती है जो विभिन्न मनोलैगिंग अवस्थाओं से होकर विकसित होती है। फ्रायड के इस दूसरे दृष्टिकोण को मनोलैंगिक विकास का सिद्धान्त कहा जाता है। फ्रायड द्वारा प्रतिपादित मनोलैंगिक विकास के सिद्धान्त की पाँच अवस्थाएँ क्रम में निम्नांकित है -
  1. मुखावस्था
  2. गुदावस्था
  3. लिंग प्रधानावस्था
  4. अव्यक्तावस्था
  5. जननेन्द्रियावस्था

कार्ल रोजर्स- व्यक्तित्व का सांवृत्तिक सिद्धान्त

कार्ल रोजर्स का सिद्धान्त घटना विज्ञान या सांवृत्तिकशास्त्र के नियमों पर आधारित है। सांवृत्तिकशास्त्र वह शास्त्र होता है जिसमें व्यक्ति की अनुभूतियों, भावों एवं मनोवृत्तियों तथा उनके अपने बारे में या आत्मन् के बारे में तथा दूसरों के बारे में व्यक्तिगत विचारों का अध्ययन विशेष रूप से किया जाता है। रोजर्स के सिद्धान्त को मानवतावादी आन्दोलन के अन्तर्गत एक पूर्णत: सांवृत्तिक सिद्धान्त माना गया है। रोजर्स के व्यक्तित्व सिद्धान्त को आत्म सिद्धान्त या व्यक्ति केन्द्रित सिद्धान्त भी कहलाता है। रोजर्स के व्यक्तित्व सिद्धान्त को निम्नांकित भागों में बांटा जा सकता है-
  1. व्यक्तित्व के स्थायी पहलू
  2. व्यक्तित्व की गतिकी
  3. व्यक्तित्व का विकास

व्यक्तित्व के स्थायी पहलू- 

रोजर्स का व्यक्तित्व सिद्धान्त उनके द्वारा प्रतिपादित क्लायंट केन्द्रित मनोचिकित्सा से प्राप्त अनुभूतियों पर आधारित है। उनके सिद्धान्त का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति में होने वाले परिवर्तनों एवं वर्धनों का अध् ययन करना है। इन्होंने व्यक्तित्व के दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर बल डाला है- प्राणी एवं आत्मन
  1. प्राणी - रोजर्स के अनुसार पा्रणी एक ऐसा दैिहक जीव है जो शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक दोनों ही तरह से कार्य करता है। प्राणी सभी तरह की अनुभूतियों का केन्द्र होता है। इन अनुभूतियों में अपने दैहिक गतिविधियों से संबंक्तिात अनुभूतियां तथा साथ ही साथ बाºय वातावरण की घटनाओं के प्रत्यक्षण की अनुभूतियां दोनों ही सम्मिलित होती है। सभी तरह की चेतन और अचेतन अनुभूतियों के योग से जिस क्षेत्र का निर्माण होता है, उसे प्रासंगिक क्षेत्र कहते हैं।
  2. आत्मन - रोजर्स का व्यक्तित्व सिद्धान्त का यह सबसे महत्वपूर्ण संप्रत्यय है। धीरे-धीरे अनुभव के आधार पर प्रासंगिक क्षेत्र का एक भाग अधिक विशिष्ट हो जाता है और इसे ही रोजर्स ने आत्मन कहा है। आत्मन व्यक्तित्व की अलग विमा नही होता है बल्कि आत्मन का अर्थ ही सम्पूर्ण प्राणी से होता है।

व्यक्तित्व की गतिकी- 

रोजर्स ने अपने व्यक्तित्व गतिकी की व्याख्या करने के लिए एक महत्वपूर्ण अभिप्रेरक का वर्णन किया है जिसे उन्होंने वस्तुवादी प्रवृत्ति (actualizing tendency) कहा है। रोजर्स के अनुसार वस्तुवादी प्रवृत्ति से तात्पर्य प्राणी में सभी तरह की क्षमताओं को विकसित करने की जन्मजात प्रवृत्ति से होता है जो व्यक्ति को अपने आत्मन को उन्नत बनाने तथा प्रोत्साहन देने का काम करता है।

व्यक्तित्व का विकास- 

रोजर्स ने फ्रायड एवं एरिक्सन की भाँति व्यक्तित्व का को अवस्था सिद्धान्त प्रतिपादित नही किया है। उन्होंने व्यक्तित्व के विकास में आत्मन तथा व्यक्तित्व की अनुभूतियों में संगतता को महत्वपूर्ण बताया है। जब इन दोनों में अर्थात व्यक्ति की अनुभूतियों तथा उनके आत्म संप्रव्यय के बीच अन्तर हो जाता है तो इससे व्यक्ति में चिन्ता उत्पन्न होती है। असंगता के अन्तर से उत्पन्न इस चिन्ता की रोकथाम के लिए व्यक्ति कुछ बचाव प्रक्रियाएं प्रारम्भ कर देता है। इसे प्रतिरक्षा की संज्ञा दी गयी है।

एब्राहम मैसलो: व्यक्तित्व का मानवतावादी सिद्धान्त -

एब्राहम मैसलो मानवतावादी मनोविज्ञान के आध्यात्मिक जनक माने गए है। मैसलो ने अपने व्यक्तित्व सिद्धान्त में प्राणी के अनूठापन का उसके मूल्यों के महत्व पर तथा व्यक्तिगत वर्धन तथा आत्म निर्देश की क्षमता पर सर्वाधिक बल डाला है। इस बल के कारण ही उनका मानना है कि सम्पूर्ण प्राणी का विकास उसके भीतर से संगठित ढंग से होता है। इन आन्तरिक कारकों की तुलना में बाºय कारकों जैसे गत अनुभूतियों का महत्व नगण्य होता है।

व्यक्तित्व एवं अभिप्रेरण का पदानुक्रमिक मॉडल- 

मैसलो के व्यक्तित्व सिद्धान्त का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसका अभिप्रेरण सिद्धान्त है। इनका विश्वास था कि अधिकांश मानव व्यवहार की व्याख्या को न को व्यक्तिगत लक्ष्म पर पहुंचने की प्रवृत्ति से निर्देशित होता है। मैसलों का मत था कि मानव अभिप्रेरक जन्मजात होते है और उन्हें प्राथमिकता या शक्ति के आरोही पदानुक्रम में सुव्यवस्थित किया जा सकता है। ऐसे अभिप्रेरकों को प्राथमिकता या शक्ति के आरोही क्रम में इस प्रकार बतलाया गया है-

व्यक्तित्व एवं अभिप्रेरण का पदानुक्रमिक मॉडल-
इनमें से प्रथम दो आवश्यकताओं अर्थात शारीरिक या दैहिक आवश्यकता तथा सुरक्षा की आवश्यकता को निचले स्तर की आवश्यकता तथा अन्तिम तीनआवश्यकताओं अर्थात संबंद्धता एवं स्नेह की आवश्यकता, सम्मान की आवश्यकता तथा आत्म सिद्धि की आवश्यकता को उच्च स्तरीय आवश्यकता कहा है। इस पदानुक्रम मॉडल में जो आवश्यकता जितनी ही नीचे है, उसकी प्राथमिकता या शक्ति उतनी ही अधिक मानी गयी है।

व्यक्तित्व आंकलन

व्यक्तित्व आंकलन की प्रमुख तीन प्रविधियां होती है-
  1. व्यक्तिगत प्रविधि      
  2. वस्तुनिष्ठ प्रविधि      
  3. प्रक्षेपण प्रविधि 

व्यक्तिगत प्रविधि -

जब मूल्यांकनकर्ता की व्यक्तिगत विशेषताएं मूल्यांकन प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं तो वे व्यक्तिगत विधि कहलाती है। इसके अन्तर्गत प्रमुखत: साक्षात्कार विधि, जीवन इतिहास विधि आत्मकथा, व प्रश्नावली विधि आती है। साक्षात्कार विधि- साक्षात्कार विधि की सहायता से शोधकर्ता पय्रोज्य के स्वयं के अनुभवों के बारे में अच्छी सूझ उत्पन्न कर सकता है और इस प्रकार व्यक्ति के उन सार्थक पक्षों के बारे में जान सकता है जिनके बारे में अन्य किसी संगठित व पूर्व निर्धारित परीक्षण द्वारा नही जाना जा सकता है।

जीवन इतिहास विधि- इस विधि में बालकों की समस्याओं का अध्ययन करने के लिये एक केश विवरण या इतिहास तैयार किया जाता है। बालक द्वारा पिछले क वर्षो में की गयी अन्त: क्रियाओं का एक विशेष रिकार्ड तैयार किया जाता है। इन अन्त:क्रियाओं का विश्लेषण करके बालक के बारे में समस्त जानकारी प्राप्त की जाती है। इसमें बालक के बारे में समस्त सूचनायें संकलित की जाती है।

वस्तुनिष्ठ प्रविधि-

इसमें मूल्यांकनर्ता की व्यक्तिगत विशेषताएं मूल्यांकन की प्रक्रिया को प्रभावित नही करती है। इसके अन्तर्गत आने वाली प्रमुख विधियाँ- निरीक्षण विक्रिा, समाजमिति, व्यक्तित्व प्रश्नावली मापनियाँ, कोटिक्रम मापनी, आदि आते हैं।

व्यक्तित्व प्रश्नावली - कुछ मनोवैज्ञानिकों द्वारा व्यक्तित्व को मापने हेतु प्रमापीकृत प्रश्नावलियों का निर्माण किया गया है जिनकी सहायता से लोगों के शीलगुणों के बारे में जाना जा सकता है। उदाहरार्थ- 16 व्यक्तित्व गुण (16 PF) - यह प्रमुख मनोवैज्ञानिक कैटल द्वारा निर्मित है। इसके माध्यम से किसी भी व्यक्ति के 16 शीलगुणों के बारे में बताया जा सकता है। इसका भारत में अनुकरण एस0डी0 श्रीवास्तव ने किया है जिसमें 187 कथन है। प्रत्येक कथन के समक्ष तीन विकल्प हमेशा, कभी-कभी व कभी नही है। इनमें से प्रत्येक कथन के लिए व्यक्ति को एक विकल्प चुनना होता है। इसके पश्चात स्टेन्सिल कुंजी की सहायता से व्यक्ति द्वारा चयनित उत्तरों को अंक प्रदान किए जाते हं। सभी प्रतिक्रियाओं के लिए दिए गये अंकों को जोड़कर प्राप्तांक निकाला जाता है और इस प्रप्तांक के आधार पर स्टेन स्कोर ज्ञात किया जाता है। इस स्टेन स्कोर के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व का विवरण प्रस्तुत किया जाता है।

समाजमिति- इस विधि द्वारा पत््रयके व्यक्ति के आपसी स्वीकार व तिरस्कार की बारम्बारता द्वारा सामूहिक संरचना का अध्ययन किया जाता है। यह एक समूह के व्यक्तियों में आपसी सम्बन्धों का अध्ययन करती है। यह समूह में व्यक्ति की स्थिति व उसके स्तर को बताती है। इसके माध्यम से एक बड़े समूह में व्याप्त छोटे-छोटे समूहों की भी जानकारी मिलती है। इसके माध्यम से निम्न बातों को जाना जा सकता है।मुख्यत: लिखित बातों की जानकारी दो तरह से प्राप्त की जा सकती है-
  1. सोशियोंमीट्रिक मेट्रिशस
  2. सोशियोंग्राम


A
     
C ↔ B 
                     ↖ 
              ↑         D
  E

प्रक्षेपण प्रविधि -

यह प्रक्षेपण के प्रत्यय पर आधारित है। फ्रायड के अनुसार प्रक्षेपण एक ऐसी अचेतन प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने अपूर्ण विचारों, मनोवश्त्तियों, इच्छाओं, संवेगों तथा भावनाओं को दूसरे व्यक्तियों या वस्तुओं पर आरोपित करता है। इसके अन्तर्गत आने वाले प्रमुख परीक्षण इस प्रकार है-
  1. रोर्शाक इंक ब्लाट परीक्षण
  2. थीमेटिक अपरशैप्सन परीक्षण
  3. वाक्यपूर्ति परीक्षण
  4. रोजनबिग पिक्चर फ्रस्टेशन परीक्षण
  5. ड्रा ए मैन परीक्षण

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