गौतम बुद्ध का जीवन परिचय, उपदेश और चार आर्य सत्य

बौद्ध मत की स्थापना गौतम बुद्ध ने की थी। गौतम बुद्ध के माता-पिता ने उनका नाम सिद्धार्थ रखा था। गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। और उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के मुखिया थे तथा उनकी माँ का नाम माया था जो कोलिया गण की राजकुमारी थीं। उनका जन्म नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी (आधुनिक रुमिन्डै) नामक स्थान पर हुआ था। यह जन्म नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी वन में हुआ था जो कपिलवस्तु से लगभग 14 मील की दूरी पर है। कालान्तर में यहीं पर सम्राट अशोक ने एक स्तम्भ स्थापित करवाया था जिस पर आज भी ‘हिद बुझे जाते साक्यगुनिति हिद भगवा जातेति’ (यहां शाक्य मुनि बुद्ध उत्पन्न हुए थे यहां भगवान उत्पन्न हुए थे) पढा जा सकता है। जन्म के सातवें दिन इनकी माता का निधन हो गया एवं इनका पालन पोषण सौतेली मां गौतमी ने किया। यह जानकारी हमें अशोक के एक स्तम्भ लेख के द्वारा मिलती है। 

16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह यशोधरा (इनके अन्य नाम गोपा, बिंना तथा भद्रकच्छा भी उल्लिखित है) से कर दिया। इनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। किन्तु सिद्धार्थ प्रसन्न न हुए वरन् उसे मोह-बंधन मानकर ‘राहू’ कहा और उसका नाम राहुल रख दिया। 

उन्होंने सांसरिक दु:खों से निवृति का मार्ग खोजने के लिए अपनी पत्नी तथा शिशु का सोते हुए ही छोड़ कर 29 वर्ष की अवस्था में गृहत्याग कर दिया इस घटना को बौद्ध साहित्य में महाभिनिष्कमण कहा जाता है।

इन्होंने 29 वर्ष की अवस्था में गृह-त्याग किया और 35 वर्ष की उम्र में कठोर तपस्या के बाद ‘गया’ में, पीपल के वृक्ष के नीचे, निरंजना नदी के तट पर, वैषाख पूर्णिमा के दिन ध्यान लगाया। आठ दिन की समाधि के उपरान्त 35 वर्ष की आयु में वैसाखी मास की पूर्णिमा की रात्रि को उन्हें सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई। इससे वे बौद्ध (ज्ञानी) अर्थात बुद्ध कहलाए तथा गया ‘बौद्ध गया’ के रूप में विख्यात हो गया। ज्ञान-प्राप्ति के बाद उन्होंने पहला उपदेश ऋषिपतन (सारनाथ) में पांच शिष्यों को दिया जो ‘धर्म-चक्र परिवर्तन’ के नाम से जाना जाता है। यहीं पर प्रथम बुद्ध संघ की स्थापना हुई। 

सारनाथ के बाद वे मगध गए जहां के शासक बिम्बिसार ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। अजातशत्रु, कौशल नरेश प्रसेनचित, धनी व्यापारी अनाथपिड़क इत्यादि के अतिरिक्त बुद्धे पिता, मौसी, पत्नी व पुत्र ने भी इस धर्म को स्वीकार कर लिया। 40 वर्ष तक विभिन्न क्षेत्रों में प्रचार करते हुए, कुशीनगर में 80 वर्ष की अवस्था में उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ।

बुद्ध की वास्तविक जन्म तिथि वाद-विवाद का विषय है परन्तु अधिकतर विद्वानों द्वारा इसको लगभग 566 बी.सी.ई. माना गया है। यद्यपि उनका जीवन शाही ठाठ-बाट में व्यतीत हो रहा था, लेकिन यह गौतम के मस्तिष्क को आकर्षित करने में असफल रहा। पारम्परिक स्रोतों के अनुसार एक बूढ़े आदमी, एक बीमार व्यक्ति, एक मृत शरीर तथा एक संन्यासी को देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ। मानव जीवन के दुखा ंे ने गौतम पर गहरा प्रभाव डाला। मानवता को दुखां े से मुक्त कराने की खोज में उन्होंने  29 वर्ष की आयु में अपने घर, पत्नी तथा बेटे का परित्याग कर दिया। गौतम ने संन्यासी की भांति घमू -घमू कर छः वर्ष व्यतीत किए। उन्होंने  वैशाली के अलारा कालमा से ध्यान करने और उपनिषदों की शिक्षा प्राप्त की। परन्तु उनकी यह शिक्षा गौतम को अन्तिम मुक्ति के लिए राह न दिखा सकी, ता े उन्होंने पाचं ब्राह्मण सन्यासियों के साथ उनका भी परित्याग कर दिया। 

बुद्ध ने कठोर संयम को अपनाया और सत्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न कठोर यातनाएँ सहन कीं। अंततः इन सबका त्याग करके वे उरूवेला (आधुनिक बोधगया के पास निरंजना नदी के किनारे) गये और एक पीपल के वृक्ष (बौद्ध वृक्ष) के नीचे ध्यान मग्न हो गये। यहाँ अपनी ध्यान अवस्था के उनचासवें दिन उन्हें ‘‘सर्वोच्च ज्ञान’’ की प्राप्ति हुई। तब से उनको ‘‘बुद्ध’’ (ज्ञानी पुरुष) या ‘‘तथागत्’’ (वह जो सत्य को प्राप्त करे) कहा जाने लगा। यहाँ से प्रस्थान करके वे वाराणसी के पास सारनाथ में एक हिरन उद्यान पहुँचे जहाँ पर उन्होंने अपना पहला धर्मोंपदेश दिया जिसको ‘‘धर्मचक्र प्रवर्तन’’ (धर्म के चक्र को घुमाना) के नाम से जाना जाता है। अश्वजित, उपालि, मोगल्लान, सारिपुत्र और आनन्द दृ ये बुद्ध के पहले पांच शिष्य थे। बुद्ध ने बौद्ध संघ का सूत्रपात किया।

उन्होंने अपने अधिकतर धर्मोंपदेश श्रावस्ती में दिए। श्रावस्ती का धनी व्यापारी अनथपिण्डिक उनका शिष्य हुआ और उसने बौद्ध मत के लिए उदार दान दिया। जल्द ही उन्होंने अपने धर्म प्रवचन के प्रचार के लिए बहुत से स्थानों का भ्रमण करना शुरू कर दिया। वे सारनाथ, मथुरा, राजगीर, गया और पाटलिपुत्र गये। बिम्बिसार, अजातशत्रु (मगध), प्रसेनजीत (कोसल) और उदयन (कौशाम्बी) के राजाओं ने उनके सिद्धान्तों को स्वीकार किया तथा वे उनके शिष्य बन गये। वह कपिलवस्तु भी गये और उन्होंने अपनी धाय माता व बेटे राहुल को भी अपने सम्प्रदाय मं े परिवर्तित किया। मल्ल गणों की राजधानी कुशीनगर (उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में स्थित कसिया) में 80 वर्ष की आयु में (486 बी.सी.ई.) बुद्ध की मृत्यु हो गई। 

गौतम बुद्ध
भगवान गौतम बुद्ध 

गौतम बुद्ध के उपदेश और चार आर्य सत्य

गौतम बुद्ध के मूलभूत उपदेश निम्नलिखित में संकलित हैं:
  1. चार आर्य सत्य, और
  2. अष्टांगिक मार्ग
क) निम्नलिखित चार आर्य सत्य हैं:
  1. संसार दुःखों से परिपूर्ण है।
  2. सारे दुःखों का कोई न कोई कारण है। इच्छा, अज्ञान और मोह मुख्यतः दुःख के कारण हैं।
  3. इच्छाओं का अन्त मुक्ति का मार्ग है।
  4. मुक्ति (दुःखों से छुटकारा पाना) अष्टांगिक मार्ग द्वारा प्राप्त की जा सकती है।
ख) अष्टांगिक मार्ग में निम्नलिखित सिद्धांत समाहित हैं:
  1. सम्यक् दृष्टि: इसका अर्थ है कि इच्छा के कारण ही इस संसार में दुःख व्याप्त है। इच्छा का परित्याग ही मुक्ति का मार्ग है।
  2. सम्यक् संकल्प: यह लिप्सा और विलासिता से छुटकारा दिलाता है। इसका उद्देश्य मानवता का े प्रेम करना और दूसरों को प्रसन्न रखना है।
  3. सम्यक् वाचन: अर्थात् सदैव सच बोलना।
  4. सम्यक् कर्म: इसका तात्पर्य है स्वार्थरहित कार्य करना।
  5. सम्यक् जीविका: अर्थात् व्यक्ति को ईमानदारी से अर्जित साधनों द्वारा जीवन-यापन करना चाहिए।
  6. सम्यक् प्रयास: इससे तात्पर्य है कि किसी को भी बुरे विचारों से छुटकारा पाने के लिए इन्द्रियों पर नियंत्रण होना चाहिए। कोई भी मानसिक अभ्यास के द्वारा अपनी इच्छाओं एवं मोह को नष्ट कर सकता है।
  7. सम्यक् स्मृति: इसका अर्थ है कि शरीर नश्वर है और सत्य का ध्यान करने से ही सांसारिक बुराइयां े से छुटकारा पाया जा सकता है।
  8. सम्यक् समाधि: इसका अनुसरण करने से शान्ति प्राप्त होगी। ध्यान से ही वास्तविक सत्य प्राप्त किया जा सकता है।
बौद्ध मत ने कर्म के सिद्धान्त पर बल दिया, जिसके अनुसार वर्तमान का निर्णय भूतकाल के कार्य करते हैं। किसी व्यक्ति की इस जीवन और अगले जीवन की दशा उसके कर्मों पर निर्भर करती है।

प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। अपने कर्मों को भोगने के लिए हम बारबार जन्म लेते हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी भी तरह का पाप नहीं करता है तो उसका पुनर्जन्म नहीं होगा। इस प्रकार बुद्ध के उपदेशों का अनिवार्य तत्व या सार ‘‘कर्म-दर्शन’’ है।

बुद्ध ने निर्वाण का प्रचार किया। उनके अनुसार यही प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अंतिम उद्देश्य है। इसका तात्पर्य ह ै सभी इच्छाओं से छुटकारा, दुःखों का अन्त जिससे अन्ततः पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है। इच्छाओं की समाप्ति की प्रक्रिया के द्वारा कोई भी निर्वाण पा सकता है। इसलिए बुद्ध ने उपदेश दिया कि इच्छा ही वास्तविक समस्या है। पूजा और बलि इच्छा को समाप्त नहीं कर सकेंगे। इस प्रकार वैदिक धर्म में हाने े वाले अनुष्ठानों एवं यज्ञों
के विपरीत बुद्ध ने व्यक्तिगत नैतिकता पर बल दिया। 

बुद्ध ने न ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारा और न ही नकारा। यह व्यक्ति और उसके कार्यों के विषय में अधिक चिन्तित थे। बौद्ध मत ने आत्मा के अस्तित्व को भी स्वीकार नहीं किया। 

इनके अतिरिक्त बुद्ध ने अन्य पक्षों पर भी बल दिया: 
  • बुद्ध ने प्रेम की भावना पर बल दिया। अहिंसा का अनुसरण करके प्रेम को सभी प्राणियों पर अभिव्यक्त किया जा सकता है। यद्यपि अहिंसा के सिद्धांत को बौद्ध मत में अच्छी तरह से समझाया गया था, परन्तु इसको इतना महत्व नहीं दिया गया जितना कि जैन मत में।
  • व्यक्ति को मध्य मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। कठोर संन्यास एवं विलासी जीवन दोनों से बचना चाहिए।
बौद्ध धर्म का थोड े़ ही समय में एक संगठित धर्म के रूप में उद्भव हुआ और बुद्ध के उपदेशों को संग्रहीत किया गया। बौद्ध धर्म के इस सगं ्रहीत साहित्य (उपदेशों का संग्रह-पिटक) को तीन भागों  में बांटा  गया है:
  1. सुत्त-पिटक में पांच निकाय हैं जिनमें धार्मिक सम्भाषण तथा बुद्ध के संवाद संकलित हैं। पांचवें निकाय में जातक कथायें (बुद्ध के पूर्व जन्मों से सम्बद्ध कहानियाँ) हैं।
  2. विनय पिटक में भिक्षुओं के अनुशासन से संबंधित नियम हैं।' 
  3. अभिधम्म-पिटक में बुद्ध के दार्शनिक विचारों का विवरण है। 

बौद्ध धर्म के सम्प्रदाय

भगवान् गौतम बुद्ध के अनुसार अव्याकृत प्रश्न निम्न हैं – संसार शाश्वत है या अशाश्वत, संसार शान्त है या अनन्त, आत्मा और शरीर में भेद है या अभेद, मृत्यु के बाद तथागत का स्तित्व रहता है या नहीं इत्यादि । इन प्रश्नों को भगवान गौतम बुद्ध ने निरर्थक समझा; क्योंकि इन प्रश्नों का दु:ख तथा दु:ख निरोध से कोई सम्बन्ध नहीं, ये प्रश्न सम्बोधि के लिए उपयुक्त नहीं । तथागत ने अव्याकृत को एक अत्यन्त व्यावहारिक दृष्टान्त से स्पष्ट किया है- किसी आदमी को अत्यन्त विषाक्त तीर लगा हो तो उसे शीघ्र तीर निकालने वाले वैद्य के पास ले जाने की आवश्यकता है, न कि यह प्रश्न करना की तीर मारने वाला व्यक्ति क्षत्रिय था या ब्राह्मण या शूद्र, अथवा तीर मारने वाले का नाम गोत्र क्या, अथवा तीर मारने वाला लम्बा या नाटा था इत्यादि ? ये सभी प्रश्न निरर्थक हैं, अव्याकृत हैं। केवल चार आर्य-सत्य ही सार्थक हैं, व्याकृत हैं, क्योंकि येनिर्वेद, विराम, निरोध, उपशम, सम्बोधि और निर्वाण के लिए है। अत: बौद्ध-धर्म का प्रारम्भिक स्वरूप अत्यन्त व्यावहारिक है।

तथागत के महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध-धर्म में तो तत्व-सम्बन्धी ऊहापोह प्रारम्भ हुआ और धीरे-धीरे दार्शनिक विवादों को जन्म होने लगा। फलत: बौद्ध-धर्म अनेक सम्प्रदायों में विभक्त हो गया। मुख्य रूप से बौद्ध-दर्शन के चार सम्प्रदाय माने गये हैं –

  1. वैभाषिक – ब्राह्मार्थ प्रत्यक्षवाद
  2. सौत्रान्त्रिक – ब्राह्मार्थानुमेयवाद
  3. योगाचार – विज्ञानवाद
  4. माध्यमिक – शून्यवाद

इन चारों में ब्राह्मप्रत्यक्षवाद और ब्राह्मानुमेयवाद हीनयान के अन्तर्गत है तथा विज्ञानवाद और शून्यवाद महायान के अन्तर्गत है।

Bandey

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