गौतम बुद्ध का जीवन परिचय, उपदेश, चार आर्य सत्य

कौशल देश के उतर में कपिलवस्तु शाक्य क्षत्रियों का एक छोटा-सा गणराज्य था। यहाँ शुद्धोदन नामक एक राजा राज्य करते थे। 563 ई.पू. इन्ही शुद्धोदन की कोलियवंशीय पत्नी महामाया अथवा मायादेवी के गर्म से गौतम बुद्ध  का जन्म हुआ था। यह जन्म नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी वन में हुआ था जो कपिलवस्तु से लगभग 14 मील की दूरी पर है। कालान्तर में यहीं पर सम्राट अशोक ने एक स्तम्भ स्थापित करवाया था जिस पर आज भी ‘हिद बुझे जाते साक्यगुनिति हिद भगवा जातेति’ (यहां शाक्य मुनि बुद्ध उत्पन्न हुए थे यहां भगवान उत्पन्न हुए थे) पढा जा सकता है। जन्म के सातवें दिन इनकी माता का निधन हो गया एवं इनका पालन पोषण सौतेली मां गौतमी ने किया। 
इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। 

16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह यशोधरा (इनके अन्य नाम गोपा, बिंना तथा भद्रकच्छा भी उल्लिखित है) से कर दिया। इनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। किन्तु सिद्धार्थ प्रसन्न न हुए वरन् उसे मोह-बंधन मानकर ‘राहू’ कहा और उसका नाम राहुल रख दिया। 

उन्होंने सांसरिक दु:खों से निवृति का मार्ग खोजने के लिए अपनी पत्नी तथा शिशु का सोते हुए ही छोड़ कर 29 वर्ष की अवस्था में गृहत्याग कर दिया इस घटना को बौद्ध साहित्य में महाभिनिष्कमण कहा जाता है।

इन्होंने 29 वर्ष की अवस्था में गृह-त्याग किया और 35 वर्ष की उम्र में कठोर तपस्या के बाद ‘गया’ में, पीपल के वृक्ष के नीचे, निरंजना नदी के तट पर, वैषाख पूर्णिमा के दिन ध्यान लगाया। आठ दिन की समाधि के उपरान्त 35 वर्ष की आयु में वैसाखी मास की पूर्णिमा की रात्रि को उन्हें सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई। इससे वे बौद्ध (ज्ञानी) अर्थात बुद्ध कहलाए तथा गया ‘बौद्ध गया’ के रूप में विख्यात हो गया। ज्ञान-प्राप्ति के बाद उन्होंने पहला उपदेश ऋषिपतन (सारनाथ) में पांच शिष्यों को दिया जो ‘धर्म-चक्र परिवर्तन’ के नाम से जाना जाता है। यहीं पर प्रथम बुद्ध संघ की स्थापना हुई। 

सारनाथ के बाद वे मगध गए जहां के शासक बिम्बिसार ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। अजातशत्रु, कौशल नरेश प्रसेनचित, धनी व्यापारी अनाथपिड़क इत्यादि के अतिरिक्त बुद्धे पिता, मौसी, पत्नी व पुत्र ने भी इस धर्म को स्वीकार कर लिया। 40 वर्ष तक विभिन्न क्षेत्रों में प्रचार करते हुए, कुशीनगर में 80 वर्ष की अवस्था में उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ।

गौतम बुद्ध का जीवन परिचय
भगवान गौतम बुद्ध 

गौतम बुद्ध के उपदेश

भगवान बुद्ध के उपदेशों का सारांश उनके चार आर्य-सत्यों में निहित है। ये चार आर्य-सत्य ही तथागत-धर्म तथा दर्शन के मूलाधार हैं । बोधि प्रप्त होने के बाद बुद्ध ने सर्वप्रथम हन्हीं चार आर्यसत्यों को उपदेश सारनाथ में दिया था। अत: ये चारों आर्यसत्य सर्वप्रथम धम्मचक्क पवत्तन सुत्त (सारनाथ में प्रथम उपदेश) में पाये जाते हैं। 

प्रथम उपदेश में केवल इन आर्य-सत्यों का दिग्दर्शन कराया गया है। इन आर्य-सत्यों की विस्तृत व्याख्या ‘महावग्ग’ में की गयी है। ‘महावग्ग’ में इन आर्य-सत्यों को ही बौद्धदर्शन की आधार शिला बतलायी गयी हैं। तात्पर्य यह है कि धर्म और दर्शन दोनों के आधार आर्य-सत्य ही हैं। इन आर्य-सत्यों, का महत्व बतालाते हुए भगवान् ‘महापरिनिर्वाण सुत्त’ में कहते हैं : भिक्षुाओं, इन चार आर्य-सत्यों को भली भांति न जानने के कारण ही मेरा ओर तुम्हारा संसार में जन्म-मरण और दौड़ता दीर्घकाल से जारी रहा । इस आवागमन के चक्र में हम सभी दु:ख भोगते रहे। विभिन्न योनियों में भटकते रहे । अब इनका ज्ञान हो गया। दु:ख का समूल विनाश हो गया, अब आवागमन नहीं होना है।

गौतम बुद्ध के चार आर्य सत्य

  1. दुख, 
  2. दु:ख-समुदाय, 
  3. दु:ख-निरोध (निर्वाण), और 
  4. दु:ख निरोध-मार्ग अर्थात् निर्वाण-मार्ग। 
सरल शब्दों में हम कह सकते हैं : सांसारिक जीवन दु:खों से परिपूर्ण है, दु:खों का कारण है, दु:खों से परिपूर्ण है, दु:खों का कारण है, दु:खों का अन्त है और दु:ख अन्त का उपाय है ।

बौद्ध दर्शन के सम्प्रदाय

भगवान् गौतम बुद्ध के अनुसार अव्याकृत प्रश्न निम्न हैं – संसार शाश्वत है या अशाश्वत, संसार शान्त है या अनन्त, आत्मा और शरीर में भेद है या अभेद, मृत्यु के बाद तथागत का स्तित्व रहता है या नहीं इत्यादि । इन प्रश्नों को भगवान गौतम बुद्ध ने निरर्थक समझा; क्योंकि इन प्रश्नों का दु:ख तथा दु:ख निरोध से कोई सम्बन्ध नहीं, ये प्रश्न सम्बोधि के लिए उपयुक्त नहीं । तथागत ने अव्याकृत को एक अत्यन्त व्यावहारिक दृष्टान्त से स्पष्ट किया है- किसी आदमी को अत्यन्त विषाक्त तीर लगा हो तो उसे शीघ्र तीर निकालने वाले वैद्य के पास ले जाने की आवश्यकता है, न कि यह प्रश्न करना की तीर मारने वाला व्यक्ति क्षत्रिय था या ब्राह्मण या शूद्र, अथवा तीर मारने वाले का नाम गोत्र क्या, अथवा तीर मारने वाला लम्बा या नाटा था इत्यादि ? ये सभी प्रश्न निरर्थक हैं, अव्याकृत हैं। केवल चार आर्य-सत्य ही सार्थक हैं, व्याकृत हैं, क्योंकि येनिर्वेद, विराम, निरोध, उपशम, सम्बोधि और निर्वाण के लिए है। अत: बौद्ध-धर्म का प्रारम्भिक स्वरूप अत्यन्त व्यावहारिक है।

तथागत के महापरिनिर्वाण के बाद बौद्ध-धर्म में तो तत्व-सम्बन्धी ऊहापोह प्रारम्भ हुआ और धीरे-धीरे दार्शनिक विवादों को जन्म होने लगा। फलत: बौद्ध-धर्म अनेक सम्प्रदायों में विभक्त हो गया। मुख्य रूप से बौद्ध-दर्शन के चार सम्प्रदाय माने गये हैं –

  1. वैभाषिक – ब्राह्मार्थ प्रत्यक्षवाद
  2. सौत्रान्त्रिक – ब्राह्मार्थानुमेयवाद
  3. योगाचार – विज्ञानवाद
  4. माध्यमिक – शून्यवाद

इन चारों में ब्राह्मप्रत्यक्षवाद और ब्राह्मानुमेयवाद हीनयान के अन्तर्गत है तथा विज्ञानवाद और शून्यवाद महायान के अन्तर्गत है।

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