सातवाहन वंश का इतिहास

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सातवाहन वंश का संस्थापक ‘सिमुक’ था। सिमुक के बाद उसका छोटा भाई कन्ह (कृष्ण) राजा बना क्योंकि सिमुक पुत्र शातकर्णि अवयस्क था। कृष्ण के पश्चात सिमुक का अवयस्क पुत्र श्री शातकर्णि (प्रथम शातकर्णि) शासक हुआ। शातकर्णि प्रथम प्रारम्भिक सातवाहन नरेशो  में सबसे महान था। उसने अंगीय कुल के महारठी त्रनकयिरों की पुत्री नागविका के साथ विवाह किया। नागनिका ने नानाधाट अभिलेख से शातकर्णि प्रथम के शासन-काल के विषय में महत्वपूर्ण सूचनायें मिलती है। शातकर्णि प्रथम पश्चिमी मालवा, अनूप (नर्मदा घाटी) तथा विदर्भ के प्रदेशो की विजय की। उत्तरी कोंकण तथा गुजरात के कुछ भागो को जीतकर उसने अपने राज्य में मिला लिया था। हाथीगुम्फा लेख से पता चलता है कि अपने राज्यारोहण के दूसरे वर्ष उसने कलिंग नरेश खाखेल के शातकर्णि विपरीत अभियान किया परन्तु वापस लौटना पड़ा। यह अभियान एक धावा मात्र था। शातकर्णि प्रथम ने दो अश्वमेध तथा राजसूय यज्ञों का अनुष्ठान किया। उसने ‘दक्षिणापथपति’ तथा ‘अप्रतिहतचक्र’ जैसी महान उपाधियाँ धारण की। शातकर्णि प्रथम से लेकर गौतमीपुत्र शातकर्णि के उदय पूर्व तक का लगभग एक शताब्दी का काल सातवाहनों के हृास का काल है।

पुराणो  के अनुसार गौतमीपुत्र शातकर्णि सातवाहन वश्ं ा का 23 वाँ राजा था। उसके पिता का नाम शिवस्वाति तथा माता का नाम गौतमी बलश्री था। राज्यारोहड़ के 17 वे वर्ष एक बड़ी सेना के साथ क्षहरात नरेश नहपान तथा उषावदात को पराजित कर मारे डाला। अपनी विजय के बाद उसने नासिक के बौद्ध संध को ‘अजकालकिय’ नामक क्षेत्र दान में दिया था। तत्पश्चात कार्ले के भिक्षु संघ को उसने ‘करजक’ नामक ग्राम दान में दिया। यह पहले उषावदात के अधिकार में था। क्षहरातो  के साथ-साथ शक, यवन, पहलव आदि विदेशी जातियो  को पराजित कर या तो मार डाला या अपने साम्राज्य से बाहर भगा दिया। नासिक गुहालेख से ज्ञात होता है कि ऋषिक (कृष्णा नदी का तटीय प्रदेश), अस्मक (गोदावरी का तटीय प्रदेश), मूलक (पैठन का समीपवर्ती भाग), सुराष्ट्र (दक्षिणी काठियावाड़), कुकुर (पश्चिमी राजपूताना), अपरान्त (उत्तरी कोकं ण), अनूप (नर्मदा घाटी), विदर्भ (बरार), आकर (पूर्वी मालवा), अवन्ति (पश्चिमी मालवा) का क्षेत्र उसके प्रत्यक्ष शासन में था। नासिक प्रशस्ति में उसे विन्ध्य, ऋक्षवत (मालवा के दक्षिण का विन्ध्यपर्वत का भाग), पारियात्र (पश्चिमी विन्ध्य तथा अरावली), सहृअ (नीलगिरि के उत्तर का पश्चिमी घाट), मलय (त्रावनकोर पहाड़ियाँ), महेन्द्र (पूर्वी घाट) आदि पर्वतों का स्वामी कहा गया हैं। इसी प्रशस्ति में यह भी कहा गया है कि उसके वाहनों (अश्वों) ने तीनो समुद्रो का जल पिया था। यहाँ तीनो  समुद्रो  से तात्पर्य बगं ाल की खाड़ी, अरव सागर तथा हिन्द महासागर से है। वह क्षत्रियों के दर्प को चूर्ण करने वाला एकच्छत्र शासक था जिसने ‘राजराज’ ‘महाराज’ ‘स्वामी’ आदि उपाधियाँ धारण की थी। उसका शासन काल 106-130 ई तक था।

गौतमी पुत्र शतकर्णि

गौतमी पुत्र शतकर्णि सातवाहन वंश का सबसे पराक्रमी राजा था । शकों के आक्रमण के कारण सातवाहन राज्य छिन्न-भिन्न हो गया और उसने सातवाहन वंश की गौरव और प्रतिष्ठा को आगे बढाया, उसका पुत्र पुलमावि के अभिलेख में उसकी विजयों का उल्लेख मिलता है । वह महान विजेता एवं प्रजा पालक था ।

वाशिष्टी पुत्र पुलमावि

गौतमी पुत्र शतकर्णि के पश्चात वाशिष्टी पुत्र पुलमावि शासक बना । पुराण में उसे प्रबोमा भी कहा गया है । पुलमावि के शासन काल में सातवाहन संघर्ष पुन: प्रारम्भ हो गया । रूद्रदामन के जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख ज्ञात होता है कि उसने दक्षिणापथपति शातकर्णि को दो बार हराया पुलमावि ने महाक्षत्रप रूद्रदामन की पुत्री के साथ विवाह किया था । उसने प्रतिष्ठान को अपनी राजधानी बनाया । पुलमावि ने ‘महाराज’ और दक्षिणापलेश्वर की उपाधि धारण की ।

यज्ञश्री सतकर्णि

सातवाहन वंश का अन्तिम शासक यज्ञश्री सतकर्णि था । वह महान विजेता शासक था । उसने शको को परास्त किया उसका साम्राज्य पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर अरख सागर तक फैला था । यज्ञश्री सतकर्णि की मृत्यु के पश्चात् सातवाहनो का पतन प्रारम्भ हो गया । महाराष्ट्र अमीरों और दक्षिण भारत पर इक्ष्वाकुओं और पल्लवी ने अधिकार कर लिया । इस प्रकार तीसरी शताब्दी ईस्वीं में सातवाहन शक्ति समाप्त हो गयी ।
मौर्यो ने उत्तर भारत मे प्रथम साम्राज्य स्थातिप किया था । सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण मौर्य साम्राज्य का विघटन हो गया । साम्राज्य के उत्तर पश्चिमी भाग पर यूनानियों, शकों, पार्थियनों और कुषाणों के अधिकार कर लिया था । मगध और उसके आस-पास के प्रदेश पर शुंग वंश ने अपना आधिपत्य जमाया । कुछ समय बाद काण्व वंश के शासक ने शुंग शासक को हटाकर मगध पर अधिकार जमा लिया ।

दक्षिण और मध्य भारत भी मौर्य साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण अंग था । यहां मौर्यो के उत्तराधिकारी सातवाहन बने जिन्हें आंध्र भी कहा जाता है । नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थापित इस राज्य को सबसे पुराना और महत्वपूर्ण राज्य समझा जा सकता है । यह साम्राज्य लगभग 28 ईसा पूर्व से 219 ई. तक सत्ता में रहा और इसने शासन प्रबंध परम्पराएं धरोहर रूप में छोड़ी । विस्तार की दृष्टि से यह मौर्य साम्राज्य से छोटा था परन्तु सुसंगठित था । इसलिए इसने उत्तर से किसी भी विदेशी को दक्षिण में नहीं जाने दिया ।

सातवाहनों का उद्भव और शासन तिथिक्रम 

सातवाहनों के मूल निवास और उनके शासन तिथि क्रम के विषय में विद्वानों में बहुत मतभेद है । परन्तु अभिलेखों और सिक्कों के प्रमाण के आधार पर कहा जाता है कि सातवाहनों का उद्भव प्रतिष्ठान (महाराष्ट्र के वर्तमान पैठान) के आस-पाास हुआ था । बाद में वे कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में फैले । इसीलिए यह वंश आंध्र कहा गया । जहां तक सातवाहनों की शासन तिथि क्रम का संबंध है मत्स्य पुराण के अनुसार इस वंश के 30 राजाओ शातकर्णीने लगभग 4000 वर्ष तक शासन किया । वायु पुराण के अनुसार इस वंश के 19 राजाओं ने 300 वर्ष तक शासन किया । साधारणतया वायु पुराण का मत स्वीकार किया जाता है । सातवाहनों के उद्भव और मूल निवास के विषय में विद्वानों में मतभेद है । विश्वास किया जाता है कि सातवाहनों का मूल निवास पश्चिमी भारत था । साधारणतया यह माना जाता है कि इस वंश के 19 राजाओं ने 300 वर्ष तक शासन किया था ।

राजनीतिक इतिहास 

सातवाहन वंश का प्रथम शासक सिमुक था । वह 28 ईसापूर्व गद्दी पर बैठा था और उसने 23 वर्ष तक शासन किया । पुराणों के अनुसार सिमुक ने मध्य-भारत के कुछ भाग पर अपना अधिपत्य जमा लिया था । उसने प्रतिष्ठान को अपनी राजधानी बनाया । सिमुक का उत्तराधिकारी उसका भाई कृष्ण था जिसने 5 ईसा पूर्व से 13 ईस्वी तक 18 वर्ष राज्य किया । उसने अपना राज्य नासिक तक बढ़ाया । नासिक अभिलेख मे शातकर्णीउसे कान्हा कहा गया है ।

प्रारम्भिक सातवाहनों में सबसे महान शासक शातकर्णी प्रथम था । वह कृष्ण का उत्तराधिकारी था । उसने 13 से 32 ई. तक शासन किया । उसने सातवाहनों की सत्ता को सर्वोच्च बनाया । प्रसिद्ध नानघाट अभिलेख मे शातकर्णीशातकर्णी की सफलताओं का उल्लेख है । इसमें उसे दक्षिणपथपति (दक्षिण का स्वामी) कहा गया है । उसके समय के जो सिक्के मिले हैं उन पर श्रीशत अकिंत है । शातकर्णी प्रथम ने पश्चिमी मालवा और उसके दक्षिण का क्षेत्र-अनुभा ‘‘नर्मदा घाटी’’ और विदर्भ (बरार) तथा पूर्वी मालवा विलय कर ऐश्वर्य प्राप्त किया । उसने 20 वैदिक अनुष्ठान और यज्ञ किए जिनमें एक राजसूय और दो अश्वमेघ यज्ञ शामिल थे । इस प्रकार शातकर्णी प्रथम ने सम्राट का पद धारण किया । तथापि सातवाहन साम्राज्य की प्रगति और सम्पन्नता सातकण्र्ाी प्रथम के साथ समाप्त हो गई । शक पश्चिमी भारत में अपना राज्य स्थापित कर चुके थे । उन्होंने सातवाहनों से पवूर् ी और पश्चिमी मालवा, उत्तरी कोंकण, उत्तरी महाराष्ट्र और दक्षिण महाराष्ट्र छीन लिया था । गौतमीपुत्र शातकर्णी (106-130 ई.) ने सातवाहनों के ऐश्वर्य को पुन: प्राप्त किया । उसे शक, यवन और पàन का नष्ट करता-सिथियनों, इण्डो-यूनानियों और पथियनों का नष्ट करता और सातवहानो शातकर्णीका कुल यश और प्रतिष्ठा स्थापित करने वाला कहा गया है । उसे विन्ध्य और पूर्वी घाट का स्वामी भी कहा जाता है । उसने शक वंश के नेता नहपान को पराजित कर शकों की सत्ता नष्ट कर दी । यह उसकी एक महत्वपूर्ण सफलता थी । इसका प्रमाण है नासिक जिले में जोगलथेम्बी में मिला सिक्कों का ढेर । इसमें नहपान द्वारा जारी किए ऐसे बहुत से सिक्के है जिन पर गौतमीपुत्र शातकर्णी द्वारा फिर से ढालने के चिन्ह है । उसने शकों से वे प्रांत पुन: प्राप्त कर लिए थे जो कभी शकों ने सातवाहनों से छीन लिए थे । ये प्रान्त थे- पूर्वी और उत्तरी मालवा, नर्मदा घाटी, विदर्भ (बरार) उत्तरी महाराष्ट्र और उत्तरी कोंकण । गौतमीपुत्र शातकर्णी ने शकों से पश्चिमी भारत का प्रान्त जीतकर अपने साम्राज्य मे शातकर्णीशामिल कर लिया था । गौतमीपुत्र शातकर्णी का उत्तराधिकारी वाशिष्टीपुत्र पुलुमावि (130-150 ई.) था । यही पहला सातवाहन शासक था जिसके सिक्के और अभिलेख आंध्र में पाए गए हैं । वाशिष्टीपुत्र ने न केवल अपने पिता से प्राप्त साम्राज्य को बनाए रखा वरन् उसे बढ़या भी । उसने दक्षिणापथ स्वामी और महाराजा की उपाधि भी धारण की ।

वाशिष्टीपुत्र की मृत्यु के बाद सातवाहनों और शंकों में कोणकण तट और मालवा को लेकर संघर्ष छिड़ गया । पश्चिमी भारत के शक शासक रूद्रदमन ने सातवाहनों को दो बार पराजित किया । तथापि उसने सातवाहन वंश को समूल नष्ट नहीं किया क्योंकि सातवाहन वंश के एक राजा से उसकी पुत्री का विवाह हुआ था । रूद्रदमन ने मालवा, दक्षिणी गुजरात, उत्तरी कोणकण और नर्मदा नदी पर महिषमति प्रदेश विजय किया । इस प्रकार कुल काल के लिए सातवाहन वंश को ग्रहण सा लग गया था ।

बाद के सातवाहन शासकों में केवल यज्ञश्री (165-194 ई.) ही एक महान् शासक हुआ । उसके काल में साम्राज्य काफी बड़ा था । उसने शकों को हटाकर उन क्षेत्रों को पुन: प्राप्त कर लिया था जो कभी सातवाहनों के हाथ से निकल गए थे । शकों के सिक्कों से मिलते-जुलते उसके सिक्के पश्चिमी भारत में पाए गए हैं । इनसे पता चलता है कि उसने शकों को पराजित किया था । यज्ञश्री के कुछ सिक्कों पर जहाज का चित्र अंकित है । इससे संकेत मिलता है कि उसे नौ-परिवहन से प्रेम था और उसका समुद्र पर भी प्रभुत्व था । उसका शासन काल शकों और सातवाहनों के बीच संघर्ष का अंतिम दौर था ।

बाद के शासक शायद इतने निर्बल थे कि वे सारे साम्राज्य पर अपना अधिकार नहीं रख पाए थे । साम्राज्य नई शक्तियों में बंट गया । पश्चिम में नासिक के आस-पास के क्षेत्र अमीरों ने अधिकार कर लिया था । कृष्णा-गन्दूर क्षेत्र पर इक्ष्वाकू स्वतंत्र राज्य बन गया था । दक्षिण-पश्चिमी भाग में चुट्टु तंश शिक्त्शाली हो गया था । उन्होंने अपना अधिकार उत्तर पूर्व में भी बढ़ा लिया था । दक्षिण पूर्वी भाग पल्लवों के अधीन था । इस प्रकार सातवाहन साम्राज्य का विघटन होने लगा और तीसरी शताब्दी ईस्वी में सातवाहनों की सत्ता समाप्त हो गई । सातवाहनों ने 28 ईसा पूर्व राज्य किया । आरम्भिक शासकों में सिमुक, कृष्णा और शातकर्णी प्रथम थे । शातकर्णी प्रथम के उत्तराधिकारियों से शकों ने बहुत से क्षेत्र छीन लिए थे। गौतमीपुत्र शातकर्णी ने शकों के राजा नहपान को हराकर फिर से सातवाहनियों का ऐश्वर्य प्राप्त किया था । वाशिष्टीपुत्र ने सातवाहनों के आधिपत्य को आन्ध्र क्षेत्र तक बढ़ाया । यज्ञश्री शातकर्णी ने सातवाहनों के आधिपत्य को आन्ध्र क्षेत्र तक बढ़ाया । यज्ञश्री शातकर्णी ने शकों को पराजित कर उन क्षेत्रों को प्राप्त कर लिया था जो कभी शकों ने अपने अधीन कर लिए थे । उसकी मृत्यु के बाद सातवाहन साम्राज्य का विघटन हो गया और तीसरी शताब्दी में सातवाहनों की सत्ता समाप्त हो गई ।

सातवाहन शासन प्रबंध 

सातवाहन राजाओं ने अपने साम्राज्य में एक सुदृढ़ शासन प्रबंध की व्यवस्था की थी और इसीलिए वे विदेशियों को दक्षिण से आने से रोक सके । धर्म शास्त्रों के आदर्शो के अनुरूप उन्होंने राजतंत्रात्मक शासन स्थापित किया था । फिर भी उन्होंने स्थानीय और ग्रामीण संस्थाओं को स्वशासन का अधिकार दे रखा था ।

शासन का प्रमुख राजा था । कुषाणों की भांति सातवाहन राजाओं को ईश्वरीय शक्तियां प्राप्त थी । उसकी तुलना राम, अर्जुन और भीम से की जाती थी । राजा का मूल्य कर्तव्य साम्राज्य की सुरक्षा करना और उसे बढ़ाना था । युद्ध के समय वही सेनानायक होता था । शासन कार्य में उसकी सहायता के लिए अमात्य, सचिव, महापात्र और प्रतिहार जैसे अधिकारी थे । सामन्तों की तीन श्रेणियां थी- राजा, महाभोज और महारथी, सेनापति । सेनापति का पद महत्वपूर्ण था । वह सेना का संचालन करने के साथ प्रान्तीय शासक (राज्यपाल) भी होता था । सातवाहन अभिलेखों में कटक और स्कंधावर जैसे शब्दों का आम प्रयोग किया गया है । इससे ही पता चलता है कि सातवाहन शासन का सैनिक चरित्र था । ये सैनिक शिविर और उपनिवेश होते थे जो अस्थायी राजधानी और प्रशासनिक इकाई के रूप में कार्य करते थे ।

समस्त सातवाहन साम्राज्य जपनदों (प्रान्तों) और आहरों (जिलों) में बंटा हुआ था । कुछ आहरों का उत्तरदायित्व अमात्यों पर था । कहीं-कहीं आहर महामात्र के नियन्त्रण में होते थे । सातवहान काल में नगर प्रशासन का उत्तरदायित्व निगम जैसी संस्थाओं के हाथ में था । गांव का प्रबंध ग्राम पंचायत करती थी जिसकी सहायता के लिए ग्रामिक नाम का एक अधिकारी होता था। गोल्मिक नामक अधिकारी ग्रामीण क्षेत्र में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखता था । सातवाहन काल में ब्राम्हणों और बौद्ध भिक्षुओं को कर मुक्त भूमि देने की प्रथा थी । यह भूमि राजकीय अधिकारियों के हस्तक्षेप से मुक्त थी । भू-स्वामी ही कर वसूल करते और शान्ति बनाए रखते थे । इस प्रकार अनुदान या उपहार में मिली भूमि पर ये स्वतन्त्र शासक के समान थे। भूमि अनुदान प्रथा से सातवाहन शासन काल में सामन्तवाद को प्रोत्साहन मिला । शक्तिशाली सामन्तों का उदय ही अन्य में सातवाहनों के साम्राज्य के विघटन के लिए उत्तरदायी सिद्ध हुआ। सातवाहन शासन का प्रमुख राजा था । समस्त साम्राज्य जनपदों, आहरों और ग्रामों में बंटा हुआ था । सातवाहन राजा नागरिक अधिकारियों और धार्मिक व्यक्तियों को कर मुक्त भूमि देते थे। वे अपने क्षेत्र में कर वसूल करते और व्यवस्था बनाए रखते थे । सातवाहन प्रशासन सैनिक चरित्र का था ।

आर्थिक दशा 

सातवाहन काल में आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण उन्नति हुई । विदेशी व्यापार और आन्तरिक अर्थव्यवस्था समृद्ध थी । अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था । सातवाहन अभिलेखों में बहुधा गाय, भूमि और गांव उपहार रूप में देने का उल्लेख आता है । इससे पता चलता है कि भूमि और कृषि कितनी महत्वपूर्ण थी । लोहे के औजारों और धान रोपने की जानकारी ने कृषि उत्पादन बढ़ाने में बहुत योगदान दिया। चावल मुख्य भोजन था । यहां धान के अतिरिक्त गेहूं, दाल, ज्वार, बाजरा, लौंग, तिल, काली मिर्च और कपास की भी खेती की जाती थी । राजा कृषि उत्पादन का 1/6 भाग किसानों से कर के रूप में लेता था । यह ‘भाग’ कहलाता था । जो भूमि राजकीय कर्मचारियों या धार्मिक व्यक्तियों को अनुदान रूप में मिली होती थी उसका लगान भूमि-स्वामी ही लेते थे । इस लगान पर राजा का कोई अधिकार नहीं होता था। राजा ‘भोग’ नामक कर भी वसूल करता था । खानों और नमक भण्डारों पर राजा का एकाधिकार था ।

सातवाहन काल में उद्योग और शिल्प उन्नत दशा में थे । समकालीन प्रमाणों में कुम्हार (मिट्टी का काम करने वाले) तेली (तेल बनाने वाले) बढ़ई (बांस का काम करने वाले) लोहार और सुनार आदि शिल्पकारों का उल्लेख है । प्रत्येक व्यवसाय श्रेणी (गिल्ड) में संगठित था । इसका प्रमुख श्रेष्ठी या सेठी कहलाता था । श्रेणी धर्म या गिल्ड के नियमों को कानूनी दर्जा प्राप्त था । श्रेणी के सदस्यों को सुरक्षा के साथ-साथ मान-प्रतिष्ठाा भी मिलती थी । श्रेणी की मुख्य विशेषता थी बैंकों की भांति रूपये का लेन-देन करना । यह जनसाधारण से धन लेती और उन्हें ऋण देती थी । श्रेणी लोकहित के लिए मन्दिर, बाग, विश्रामगृह आदि बनवाती थी । राज्य भी प्रत्यक्ष रूप में श्रेणी के कार्यो में रूचि लेता था ।

सातवाहन काल में मौद्रिक अर्थव्यवस्था (पूंजीवादी अर्थव्यवस्था) विकसित हुई थी । सातवाहनों के कम मूल्य के अनेक सिक्के साम्राज्य के बहुत बड़े भाग में मिले है । इसी काल में अनेक समृद्ध नगरों का विकास हुआ । प्रतिष्ठान, नासिक, जूनागढ़ और वैजयन्ती जैसे नगर व्यापारिक केन्द्र बन गए । ‘पीरिप्लस’ आफ दि एरिथियन सी’ नामक पुस्तक में भढौच, सोपरा और कल्याणी नामक बन्दरगाहों का उल्लेख मिलता है । सातवाहनों की सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के कारण व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला । सातवाहन पश्चिमी तट से पश्चिमी देशों से व्यापार करते थे । व्यापार उन्नत था । पोरिप्लस आफ द एरिथियन सी’ नामक पुस्तक के अनुसार सारे भारत और चीन में चीजें पहले भडोच मे शातकर्णीएकत्र की जाती थीं और फिर वहां से रोम साम्राज्य को भेजी जाती थी । इसी पुस्तक के अनुसार भारत से हाथी दांत, (रेशम) सिल्क, कालीमिर्च, धागा, हीरे और मोती निर्यात किए जाते थे । रोम साम्राज्य से आयात की जाने वाली वस्तुएं थी- पुखराज, टिन, सीसा, चकमक पत्थर, शीश और सोने चांदी के सिक्के । दर्शन दक्षिण में लोकप्रिय हो चुका था । सातवाहन शासकों का दावा है कि उन्होंने अश्वमेघ, बाजपेय और राजसूय जैसे वैदिक अनुष्ठान तथा यज्ञ किए थे । शातकर्णी प्रथम ने ब्राम्हणों को गाय, हाथी, धन आदि दक्षिणा रूप में दिए । आपको याद होगा कि ब्राम्हणों को भूमि भी उपहार रूप में दी गई थी । सातवाहन शासकों ने बौद्ध धर्म को भी प्रोत्साहन दिया था । इस काल के बहुत से स्तूप और चैत्य व्यापारियों द्वारा दिए गए दान े स े ही बने थे । इस काल में बौद्ध धर्म की  लोकप्रियता  को सिद्ध करते है नासिक, कार्ले, अमरावती और नागर्जुकोंडा के स्मारक । जब जैन धर्म उत्तर में अपना प्रभुत्व खो बैठा तो सातवाहन काल में दक्षिण मे शातकर्णीस्थापित हुआ।

कुछ विद्वानों के मतानुसार राजा सिमुक जैन धर्म का अनुयायी था । पशु, वृक्ष, पर्वत और नदियों में देवी शक्ति मानी जाने लगी और गाय और सर्प की पूजा योग्य माना गया । जिस प्रकार कैलश पर्वत को शिव से जोड़ा हुआ है उसी प्रकार विष्णुकुण्ठ को विष्णु से माना जाने लगा । सातवाहन शासकों के अधीन दक्षिणी भाग मे शातकर्णीवैदिक धर्म लोकप्रिय बन गया था । सातवाहन राजा ब्राम्हण होने का दावा करते थे । इन्होंने बौद्ध और जैन धर्म को प्रोत्साहन दिया । इस काल की अनेक बौद्ध गुफाएं खोज निकाली गई है । वृक्षों और पशुओं की पूजा का प्रचलन था । खानों और नदियों को पवित्र माना जाता था ।

सांस्कृतिक विकास 

सातवाहन राजा कला और साहित्य के महान पोषक थे । इस काल की कला में प्रचलित धार्मिक विश्वास अभिव्यक्त किए जाते थे । सातवाहन शासकों के संरक्षण में अनेक बौद्ध बिहार और चैतय बने । नासिक और कर्ले के विहार बहुत प्रसिद्ध है । ये सुन्दर निर्माण एक ही चट्टान को काट कर तैयार किए गए थे । इस काल में अनेक स्तूप भी बनाए गए । अमरावती और नागार्जुनकोंडा के स्तूप अधिक महत्वपूर्ण है । अमरावती का स्तूप मूर्तियों से सजा है । ये मूर्तियां युद्ध के जीवन के विभिन्न दृश्य प्रदर्शित करती है जो कलाकृतियाँ स्मारकों पर दिखाई देती हैं । ये कला और मूर्तिकला के उन्नत होने का प्रमाण है ।

सातवाहन शासक प्राकृत भाषा के संरक्षक थे । मौर्यकाल की भांति सभी अभिलेख प्राकृत भाषा में रचे गए और ब्राम्हणी लिपि में लिखे गए थे । साहित्य रचनाओं में प्रसिद्ध हैं- सातवाहन राजा हाल द्वारा छद्मनाम से लिखी गई, 700 पद्यों वाली ‘गाथा सप्तशती’ और गुणाध्या द्वारा लिखित ‘वृहत् कथा’ ।

सातवाहन काल में कला और साहित्य का विकास उच्च कोटि का था । वास्तुकला के सुन्दर नमूने हैं, बौद्ध चैतय, बिहार और स्तूप जो एक ही चट्टान को काटकर बनाए गए है । साहित्य के क्षेत्र में कहा जा सकता है कि सातवाहन राजाओं न े प्राकृत भाषा को संरक्षण प्रदान किया ।

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