वाकाटक वंश का इतिहास

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अनुक्रम
सातवाहनों के पतन के बाद पश्चिमी और दक्षिणी भारत पुन: छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त
हो गया । आन्तरिक कलह के कारण शक क्षत्रपों की शिक्त् का हास हो गया सर्वोच्च शक्ति के
अभाव में वाकाटक वंश के शासको ने पश्चिमी और दक्षिणी भारत में अपनी सत्ता की स्थापना की।
तीसरी से छठी शताब्दी ई. तक वाकाटकों ने पश्चिमी और दक्षिणी भारत में शासन किया । वे गुप्तों
के समकालीन थे ओर सातवाहनों के पश्चात् दक्षिण भारत में शासन करने वाली राजवंशों में
सर्वश्रेष्ठ और सम्मानीय थे । वाकाटक ब्राह्मण जाति और विष्णुभद्र गोत्र के थे । अजन्ता अभिलेख में विन्ध्यशक्ति को
द्विज कहा गया है । सम्भवत: वाकाटकों की शक्ति का अभ्युदय ईसा की तीसरी शताब्दी के
उत्तरार्द्ध में हुआ ।

राजा प्रवरसेन

वाकाटक विन्ध्यशक्ति भारशिव नागो का सामन्त था । इसी का बेटा प्रवरसेन था । प्रवरसेन
बड़ा शक्तिशाली राजा हुआ उसकी मुख्य विजय मालवा, गुजरात और काठियावाड़ थे । यहां पर
शक महाक्षत्रप का राज्य था इसे प्रवरसेन ने मिटाया ।

रूद्रसेन

335 ई. के लगभग प्रवरसेन की मृत्यु के बाद उसका पोता रूद्रसेन वाकाटक राजगद्दी में
बैठा । हमेशा पारिवारिक विवाद में उलझा रहा आरै युद्ध करता रहा और अपने बड ़े साम्राज्य को
सम्भाल नहीं पाया ।

पृथ्वीसेन

रूद्रसेन के बाद पृथ्वीसेन (350 से 365) ई. तक वाकाटक राजा बना इसका पुत्र रूद्रसेन
द्वितीय था । पृथ्वीसेन का सम्बन्ध गुप्तों से किसी न किसी रूप में हमेशा रहा । इसलिये उसने
अपनी कन्या प्रभावती गुप्ता का विवाह रूद्रसेन द्वितीय के साथ कर दिया । रूद्रसेन की मृत्यु के
बाद प्रभावती गुप्ता ने स्वयं शासन का सूत्र अपने हाथों ले लिया । इस समय पाटलिपुत्र में जिस
शक्तिशाली गुप्त साम्राज्य का विकास हो रहा था । उसके प्रताप के सम्मुख इन वाकाटकों की
शक्ति सर्वथामन्द पड़ गयी थी, और ये गुप्त साम्राज्य के अन्तर्गत अधीनस्थ राजाओं के रूप में रह
गये थे ।

तीनों राज्यों के पतन के बाद दक्षिण में नई शिक्त्यों का उदय हुआ, इन शिक्त्यों के बीच
300 से 750 ई. तक परस्पर संघर्ष चलता रहा । ये शक्तियां थी बादामी के चालुक्य, कांची के
पल्लव और मदूरा के पाण्ड्य । ये सभी ईस्वी की छठी शताब्दी में प्रसिद्ध हुए । ये प्रभुसत्ता, राज्य
विस्तार और लूटमार के लिए आपस में लड़ते रहे ।

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