दूर शिक्षा में अनुसंधान

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अनुसंधान किसी विषय क्षेत्र को सम्बन्धित समस्या का सर्वागीण विश्लेषण हैं। वास्तव में अनुसंधान वह प्रक्रिया है जिसमें प्रदत्तों के विश्लेषण के आधार पर किसी समस्या के विश्वसनीय समाधान को ज्ञात किया जाता है। आप जानते है कि यह एक व्यक्तिगत एवं सुनियोजित प्रक्रिया है जिसके द्वारा मानवीय ज्ञान में वृद्धि की जाती है और मानव जीवन को सुगम तथा भावी बनाया जाता है।

वास्तव में इसमें नवीन तथ्यों की खोज की जाती है तथा नवीन सत्यों का प्रविपादन किया जाता है। अनुसंधान में कार्यों द्वारा प्रचीन प्रत्ययों तथा तथ्यों का नवीन अर्थापन किया जाता है। अंग्रेजी में अनुसंधान को ‘‘रिसर्च’’ कहा जाता है व दो शब्द से मिलकर बना है रि+सर्च ‘‘रि’’ का अंग्रेजी में अर्थ है बार-बार तथा ‘‘सर्च’’ शब्द का अर्थ है ‘‘खोजना’’। अंग्रजी का यह शब्द अनुसंधान की प्रक्रिया को प्रस्तुत करता है जिसमें शोधाथ्र्ाी पूर्व किसी तथ्य को बार-बार देखता है जिसके सम्बन्ध में प्रदत्तों को एकत्रित्र करता है तथा उनके आधार पर उसके सम्बन्ध में निष्कर्ष निकालता है।

अनुसंधान की परिभाषायें 

  1. जार्ज जे मुले के अनुसार- ‘‘शैक्षिक समस्याओं के समाधान के लिए व्यवस्थित रूप में बौद्धिक ढंग से वैज्ञानिक विधि के प्रयोग तथा अर्थापन को ‘अनुसंधान’ कहते हैं। इसके विपरीत यदि किसी व्यवस्थित अध्ययन के द्वारा शिक्षा में विकास किया जाय तो उसे शैक्षिक अनुसंधान कहते है।’’
  2. मेकग्रेथ तथा वाटसन ने ‘अनुसंधान’ की एक व्यापक परिभाषा दी है :- ‘‘अनुसंधान एक प्रक्रिया है, जिसमें खोज प्रविधि का प्रयोग किया जाता है, जिसके निष्कषोर्ं की उपयोगिता हो, ज्ञान वृद्धि की जाय, प्रगति के लिए प्रोत्साहित करे, समाज के लिए सहायक हो तथा मनुष्य को अधिक प्रभावशाली बना सकें। समाज तथा मनुष्य अपनी समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से हल कर सकें।’’
  3. जॉन0डब्लू0बैस्ट के अनुसार :- ‘‘अनुसंधान अधिक औपचारिक, व्यवस्थित, तथा गहन प्रक्रिया है जिसमे वैज्ञानिक विधि विश्लेषण को प्रयुक्त किया जाता है। अनुसंधान में व्यवस्थित स्वरूप को सिम्म्लित किया जाता है जिसके फलरूप निष्कर्ष निकाले जाते है और उनका औपचारिक आलेख तैयार किया जाता है।’’
  4. डब्लू0 एस0 मुनरो के अनुसार :- ‘‘अनुसंधान की परिभाषा समस्या के अध्ययन विधि के रूप में की जा सकती है जिसके समाधान आंशिक तथा पूर्ण रूप में तथ्यों एवं प्रदत्तों पर आधारित होते है। शोध कार्यों में तथ्य-कथनों, विचारों, ऐतिहासिक तथ्यों, आलेखों पर आधारित होते है, प्रदत्त प्रयोगों तथा परीक्षाओं की सहायता से एकत्रित किये जाते है। शैक्षिक अनुसंधानों का अन्तिम उद्देश्य यह होता है कि सिद्धान्तों की शैक्षिक क्षेत्र में क्या उपयोगिता है। प्रदत्तों का संकलन तथा व्यवस्ािा शोध कार्य नहीं है। अपितु एक प्राथमिक आवश्यकता है।’’
  5. ‘रेडमेन एवं मोरी के अनुसार :- ‘‘नवीन ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यवस्थित प्रयास ही अनुसंधान है।’’
  6. पी0एम0कुक0 के अनुसार :- ‘‘अनुसंधान किसी समस्या के प्रति र्इमानदारी, एवं व्यापक रूप में समझदारी के साथ की गर्इ खोज है, जिसमें तथ्यों, सिद्धान्तों तथा अर्थों की जानकारी की जाती है। अनुसंधान की उपलब्धि तथा निष्कर्ष प्रामाणिक तथा पुष्टियोग्य होते हैं जिससे ज्ञान में वृद्धि होती है।’’

अनुसंधान की सामान्य विशेषतायें 

  1. अनुसंधान की प्रक्रिया से नवीन ज्ञान की वृद्धि एवं विकास किया जाता है। 
  2. इसमें सामान्य नियमों तथा सिद्धान्तों के प्रतिपादन पर बल दिया जाता है। 
  3. अनुसंधान की प्रक्रिया वैज्ञानिक, व्यवस्थित तथा सुनियोजित होती है। 
  4. इसमें विश्वसनीय तथा वैध प्रविधियों को प्रयुक्त किया जाता है। 
  5. यह तार्किक तथा वस्तुनिष्ठ प्रक्रिया है। 
  6. अनुसंधान की प्रक्रिया में प्रदत्तों के आधार पर परिकल्पनाओं की पुष्टि की जाती है। 
  7. इसमें व्यक्तिगत पक्षों, भावनाओं तथा विचारों (रूचियों) को महत्व नही दिया जाता है। इन प्रभावों के लिए सावधानी रखी जाती है।
  8. शोध-कार्य में गुणात्मक तथा परिमाणात्मक प्रदत्तों की व्यवस्था की जाती है और उनका विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं। 
  9. शोध-कार्य में धैर्य रखना होता है तथा इसमें शीघ्रता नही की जा सकती है। 
  10. प्रत्येक शोध-कार्य की अपनी विधि तथा प्रविधियां होती है जो शोध के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होती है। 
  11. शोध-कार्य का आलेख सावधानीपूर्वक तैयार किया जाता है तथा शोध प्रबन्ध तैयार किया जाता है। 
  12. प्रत्येक शोध-कार्य से निष्कर्ष निकाले जाते है और सामान्यीकरण का प्रतिपादन किया जाता है।

शिक्षा अनुसंधान का अर्थ एवं परिभाषा 

शिक्षा का मुख्य लक्ष्य बालकों के व्यवहार मे विकास एवं परिवर्तन करना है अनुसंधान तथा शिक्षण क्रियाओं द्वारा इन लक्ष्यों की प्राप्ति की जाती है। शिक्षण की समस्याओं तथा बालकों के व्यवहार के विकास सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन करने वाली प्रक्रिया को शिक्षा अनुसंधान कहते है। इस प्रकार शिक्षा अनुसंधान के प्रमुख मानदण्ड अधोलिखित हैं :-
  1. शिक्षा के क्षेत्र में नवीन ‘तथ्यों’ की खोज नवीन सिद्धान्तों तथा सत्यों का प्रतिपादन करना अर्थात् नवीन ज्ञान की वृद्धि करना। 
  2. नवीन ज्ञान की शिक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक उपयोगिता होनी, चाहिए, जिससे शिक्षण अभ्यास में सुधार तथा विकास करके प्रभावशाली बना सकें। 
  3. शिक्षा अनुसंधान की समस्या क्षेत्र-शिक्षण या बालक विकास होना चाहिए। 
  4. शिक्षा अनुसंधान की समस्या का स्वरूप इस प्रकार हो जिसका प्रत्यक्षीकरण किया जा सकें तभी उसकी उपयोगिता हो सकती है। 
शिक्षा-अनुसंधान की अनेकों परिभाषायें उपलब्ध हैं परन्तु यहां पर कुछ महत्वपूर्ण तथा व्यापक परिभाषाओं का उल्लेख किया गया हैं-
  1. एफ0एल0 भिटनी के अनुसार- ‘‘शिक्षा-अनुसंधान का उद्देश्य शिक्षा की समस्याओं का समाधान करके उनमें योगदान करना है जिसमे वैज्ञानिक विधि, दार्शनिक विधि तथा चिन्तन का प्रयोग किया जाता है। वैज्ञानिक स्तर पर विशिष्ट अनुभवों का मूल्यांकन और व्यवस्था की जाती है। इसके अन्तर्गत परिकल्पनाओं का प्रतिपादन किया जाता है। इनकी पुष्टि से सिद्धान्तों का प्रतिपादन होता है, इसमें निगमन चिन्तन किया जाता है। दार्शनिक शोध विधि में व्यापक सामान्यीकरण किये जाते है जिसमें सत्य एवं मूल्यों का प्रतिस्थापन किया जाता है।’’ भिटनी ने अपनी इस परिभाषा में दो प्रकार के शिक्षा अनुसंधानों का उल्लेख किया है-वैज्ञानिक तथा दार्शनिक। वैज्ञानिक शोधकार्यो से नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता है और दार्शनिक शोध-कार्यों से नवीन सत्यों का प्रतिस्थापन किया जाता है।’’
  2. मोनरों के अनुसार :- ‘‘शिक्षा अनुसंधान का अन्तिम लक्ष्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन करना और शिक्षा के क्षेत्र में नवीन प्रक्रियाओं का विकास करना।’’ मोनरों ने ‘शिक्षा अनुसंधान’ में नवीन सिद्धान्तों के प्रतिपादन के साथ उनकी उपयोगिता को भी महत्व दिया। शोध निष्कार्षों की व्यावहारिक उपयोगिता ‘शिक्षा अनुसंधान’ का प्रमुख मानदण्ड माना जाता है।
  3. डब्लू0एम0 टैवर्स के अनुसार शिक्षा अनुसंधान की परिभाषा :- ‘‘शिक्षा अनुसधान वह प्रक्रिया है जो शैक्षिक परिस्थितियों में व्यवहार विज्ञान का विकास करती है।’’ शिक्षा अनुसंधानों का अन्तिम लक्ष्य शिक्षण सिद्धान्तों तथा अधिनियमों का प्रतिपादन करना और शिक्षा की प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाना है।

शिक्षा अनुसंधान के उद्देश्य 

शिक्षा अनुसंधान की समस्याओं में विविधता अधिक है इसलिए इसके प्रमुख चार उद्देश्य होते हैं :
  1. सैद्धान्तिक उद्देश्य :- शिक्षा अनुसंधान में वैज्ञानिक शोध कार्यों द्वारा नये सिद्धान्तों तथा नये नियमों का प्रतिपादन किया जाता है। इस प्रकार के शोध-कार्य व्याख्यात्मक होते है। इनके अन्तर्गत चरों के सह-सम्बन्धों की व्याख्या की जाती है। इस प्रकार के शोध कार्यों से प्राथमिक रूप से नवीन ज्ञान की वृद्धि की जाती है।, जिनका उपयोग शिक्षा की प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने में किया जाता है।
  2. तथ्यात्मक उद्देश्य :- शिक्षा के अन्तर्गत एेि तहासिक शोध-कार्यों द्वारा नये तथ्यों की खोज की जाती हैं इनके आधार पर वर्तमान को समझने में सहायता मिलती है। इन उद्देश्यों की प्रकश्ति वर्णनात्मक होती है, क्योंकि तथ्यों की खोज करके, उसका अथवा घटनाओं का वर्णन किया जाता है। नवीन तथ्यों की खोज शिक्षा-प्रक्रिया के विकास तथा सुधार में सहायक होती है।
  3. सत्यात्मक उद्देश्य :- दार्शानिक ‘शोध’ कार्यों द्वारा नवीन सत्यों का प्रतिस्थापन किया जाता है। इनकी प्राप्ति अन्तिम प्रश्नों के उत्तरों से की जाती है। दार्शनिक शोध-कार्यों द्वारा शिक्षा के उद्दश्यों, सिद्धान्तों तथा शिक्षण विधियों तथा पाठ्यक्रम की रचना की जाती है। शिक्षा प्रक्रिया के अनुभवों का चिन्तन बौद्धिक स्तर पर किया जाता है जिससे नवीन सत्यों तथा मूल्यों का प्रतिस्थापन किया जाता है।
  4. व्यावहारिक उद्देश्य :- शिक्षा अनुसंधान के निष्कर्षों का व्यावहारिक प्रयागे होना चाहिये, परन्तु कुछ शोध-कार्यों मे केवल उपयोगिता को ही महत्व दिया जाता है, ज्ञान के क्षेत्र से योगदान नही होता है। इन्हे विकासात्मक अनुसंधान भी कहते है। क्रियात्मक अनुसंधान से शिक्षा की प्रक्रिया में सुधार तथा विकास किया जाता है अर्थात् इनका उद्देश्य व्यावहारिक होता है। स्थानीय समस्या के समाधान से भी इस उद्देश्य की प्राप्ति की जाती है।

शिक्षा-अनुसंधान का वर्गीकरण

 शिक्षा-अनुसंधान के उद्देश्यों से यह स्पष्ट है कि शैक्षिक अनुसंधानों का वर्गीकरण कर्इ प्रकार से किया जा सकता है। प्रमुख वर्गीकरण के मानदण्ड अधोलिखित हैं :-

योगदान की दृष्टि से :- 

शोध-कार्यों के यागे दान की दृष्टि से शैक्षिक-अनुसंधानों को दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-
  1. मौलिक अनुसंधान :- इन शोध-कार्यों द्वारा नवीन ज्ञान की वश् िद्ध की जाती है- नवीन सिद्धान्तों का प्रतिपादन नवीन तथ्यों की खोज, नवीन सत्यों का प्रतिस्थापन होता है। मौलिक अनुसंधानों से ज्ञान क्षेत्र में वृद्धि की जाती है। इन्हें उद्देश्यों की दृष्टि से तीन वर्गों में बांटा जा सकता है-
    1. प्रयोगात्मक शोध-कार्यों से नवीन सिद्धान्तों तथा नियमों का प्रतिपादन किया जाता है। सर्वेक्षण-शोध भी इसी प्रकार का योगदान करते है। 
    2. ऐतिहासिक शोध कार्यों से नवीन तथ्यों की खोज की जाती है, जिनमें अतीत का अध्ययन किया जाता है और उनके आधार पर वर्तमान को समझने का प्रयास किया जाता है। 
    3. दार्शनिक शोध कार्यों से नवीन सत्यों एवं मूल्यों का प्रतिस्थापन किया जाता है। शिक्षा का सैद्धान्तिक दार्शनिक-अनुसंधानों से विकसित किया जा सकता है।
  2. क्रियात्मक अनुसंधान :- इस प्रकार के शोध-कार्यों से स्थानीय समस्याओं का अध्ययन किया जाता है, जिससे शिक्षण की प्रक्रिया में सुधार तथा विकास किया जाता है। इनसे ज्ञान-वृद्धि नही की जाती है। इन्हें प्रयोगात्मक अनुसंधान भी कहते है।

शोध-उपागम की दृष्टि से :-

 शोध-कार्यों में तथ्यों का अध्ययन करने के लिए दो उपागमों का प्रयोग किया जाता है- अनुदैध्र्य उपागम तथा कटाव-उपागम।
  1. अनुर्दध्र्य-उपागम :- यह शब्द वनस्पति विज्ञान से लिया गया है जब किसी पौध का अध्ययन बीज बोने से लेकर फल आने तक किया जाता है तब उसे अनुर्दघ्र्य-उपागम कहा जाता है। ऐतिहासिक, इकार्इ तथा उत्पति सम्बन्धी अनुसंधान विधियों में इसी उपागम का प्रयोग किया जाता है।
  2. कटाव-उपागम :- यह शब्द भी वनस्पति विज्ञान का है। जब किसी पौधे के तन,े पत्ती या जड़ तथा अन्य किसी अंग के स्वरूप का अध्ययन करना होता है तब किसी पौधे के उस अंग का कटाव करके अध्ययन कर लिये जाते हैं। तब उसे कठाव-उपागम की संज्ञा दी जाती है। इसमें समय का महत्व नही होता है। प्रयोगात्मक, तथा सर्वेक्षण विधियों में इस उपागम का प्रयोग किया जाता है।

शिक्षा-अनुसंधान के कार्य 

शिक्षा अनुसंधान के अधोलिखित प्रमुख कार्य होते हैं-
  1. शिक्षा अनुसंधान का प्रमुख कार्य शिक्षा की प्रक्रिया में सुधान तथा विकास करना है। यह कार्य ज्ञान के प्रसार से किया जाता है। 
  2. शिक्षा की प्रक्रिया के विकास के लिए आन्तरिक सोपान नवीन में वृद्धि करना तथा वर्तमान ज्ञान में सुधार करना है। 
शैक्षिक विकास का सम्बन्ध शिक्षा के विभिन्न पक्षों में होता है-
  1. शिक्षा के विशिष्ट क्षेत्र में ज्ञान में वृद्धि करना, उसमें सुधार करना तथा प्रसार करना है। 
  2. शिक्षा की समस्याओं का समाधान करना, छात्रों के अधिगम में विकास करना। शिक्षण की प्रभावशाली प्रविधियों का विकास करना। 
  3. शिक्षा प्रशासन तथा शिक्षा प्रणाली में अनुसंधान प्रक्रिया द्वारा सुधार तथा विकास करना। शैक्षिक अनुसंधान प्रक्रिया द्वारा शिक्षा के सिद्धान्तों तथा अभ्यास में योगदान करना है। शिक्षा शास्त्रियों को शैक्षिक प्रक्रिया के विकास हेतु नवीन प्रविधियों के प्रयोग में ‘शिक्षा-अनुसंधान’ सहायता करती है। 

शिक्षा-अनुसंधान की विशेषतायें 

  1. शोध-कार्य का मुख्य आधार शिक्षा दर्शन होता है। शिक्षा वैज्ञानिक प्रक्रिया भी दर्शन पर आधारित होती है।
  2. शिक्षा-अनुसंधान की प्रक्रिया कल्पनाशक्ति तथा अन्तर्द्दष्टि पर आधारित होती है। 
  3. शिक्षा-अनुसंधान में साधारण अन्त:अनुसंधान उपागम का प्रयोग किया जाता है। 
  4. शिक्षा-अनुसंधान में निगमन तार्किक चिन्तन प्रक्रिया को प्रयोग किया जाता है।
  5. शिक्षा-अनुसंधान के निष्कर्षों से शिक्षा-प्रक्रिया को उत्तम तथा प्रभावशाली बनाया जाता है। 

दूरस्थ शिक्षा में अनुसंधान की भूमिका 

दूरस्थ शिक्षा के विषय में आप जानते हैं कि यह एक नवाचार है। यह परम्परागत शिक्षा व्यवस्था से पूर्णतया भिन्न है इसलिए मानव में इसके प्रचार-प्रसार में यह तथ्य भी ध्यातव्य है कि यह वास्तविक रूप में शिक्षा के उद्देश्यों को कैसे पूरा करेगी। अनुसंधान सर्वदा ही किसी भी व्यवस्था को नित नयी नवीन मार्गदर्शन देते है और यह व्यवस्था में नया आयाम देते है। दूर शिक्षा में भी अनुसंधान की भूमिका हो कि प्राप्त निष्कर्षों एवं परिणामों से :-
  1. दूरस्थ शिक्षा के नियोजन को नया स्वरूप मिले और प्रभावकारी नियोजन सुनिश्चित हो सकें।
  2. दूरस्थ शिक्षा में अनुसंधान इसको पुर्नसगंठित करने के लिए आवश्यक है।
  3. इसके द्वारा दूर शिक्षा को समय-समय पर पाठ्यक्रम के संचालन, सम्पादन निर्माण में गुणवत्ता सुनिश्ति किया जा सकता है।
  4. दूरस्थ शिक्षा को स्वशिक्षण सामाग्री की उपयोगिता एवं गुणवत्ता सुनिश्चित करने में आसानी होगी। 
  5. यह दूरस्थ शिक्षा के संगठन व्यवस्था को प्रभावकारी बनाने में सहायक होगें।
  6. इसके द्वारा दूरस्थ शिक्षा में आवश्यक सम्प्रेषण प्रणाली सुनिश्चित की जा सकती है।
  7. पूर्व की इकार्इ में हम दूर अध्येताओं की समस्याओं के विषय में पढ़ चुकें है। अनुसंधान हमें इन समस्याओं के सही उपाय सुझाने का प्रयास करते हैं। 
  8. अनुसंधान के निष्कर्ष दूर संचार माध्यमों के उपयोग के स्तर को बताने के साथ इनके प्रयोग हेतु उपायों को भी प्रदर्शित करते है।

दूरस्थ शिक्षा में अनुसंधान हेतु आवश्यक क्षेत्र 

दूरस्थ शिक्षा में अनुसंधान कर्इ स्तरों पर किये जा सकते हैं जो कि इसके विविध पक्षों से सम्बन्धित है और उन स्तरी को हम विभाजित कर सकते हैं।

दूरस्थ शिक्षा में अनुसंधान हेतु आवश्यक क्षेत्र

दूर शिक्षा में अनुसंधान के विविध मुद्दे 

दूर शिक्षा में अनुसंधान हेतु अनेक मुद्दे भी है जैसे कि-

प्रशासनिक स्तर पर 

  1. दूर शिक्षा के प्रोन्नति एवं विकास हेतु आवश्यक अभिवश्त्ति।
  2.  दूर शिक्षा में सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबन्धन हेतु की समस्या।
  3. अध्ययन केन्द्रों में शिक्षण अधिगम वातावरण निर्माण हेतु आवश्यक चुनौतियां।
  4. दूर शिक्षा के विकास हेतु प्रशासकों के अभिवश्त्ति एवं जागरूकता सम्बन्धी व समस्यायें। 
  5. मातश् संस्था एवं अध्ययन केन्द्रों में सम्बन्ध स्थापन की समस्या। 
  6. अध्ययन केन्द्रों में भौतिक संसाधनों की आपूर्ति की समस्यायें।
  7. अध्ययन केन्द्रों को सम्पूर्ण सहयोग की समस्या।
  8. अध्ययन केन्द्रों की निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण की समस्या।
  9. परामर्श सत्रों के गुणवत्तापूर्ण प्रबन्धन को सुनिश्चित करने की समस्या। 
  10. पाठ्यक्रम निर्माण एवं विकास की समस्या। 
  11. दूर अध्येताओं से सम्प्रेषण की समस्या। 

शिक्षक स्तर पर 

  1. दूर अधिगम के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का अभाव।
  2. दूर अध्येताओं के प्रति कम लगाव, कम सम्बन्ध व कम अभिप्रेषण की समस्या। 
  3. दूर अध्येताओं को शिक्षण हेतु उचित माध्यम का अभाव।
  4. संचार एवं तकनीकी मध्यमों द्वारा शिक्षण के प्रति अभिवश्त्ति।
  5. दूर अध्येताओं के साथ उचित सम्प्रेषण का अभाव।
  6. दूर अध्येताओं के लिए स्व अधिगम सामग्री के निर्माण के प्रति लगाव। 
  7. दूरस्थ माध्यम द्वारा शिक्षण हेतु कौशल सम्बन्धी समस्या।
  8. परामर्श सत्रों के आयोजन को सम्बन्धित समस्यायें। 
  9. दत्त कार्यों को उचित मूल्यांकन हेतु कौशल। 
  10. दूर अध्येताओं को प्रतिपुष्टि से सम्बन्धित समस्या। 

दूर अध्येता के स्तर पर 

  1. मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा के प्रति नकारात्मक/सकारात्मक दृष्टिकोण।
  2. मुक्त शिक्षा के प्रति रूचि एवं अभिप्रेषण।
  3. दूर शिक्षा के छात्र सहायता सेवाओं के प्रति दृष्टिकोण। 
  4. परामर्शदाताओं से सहयोग की समस्या।
  5. सम्प्रेषण सम्बन्धी समस्या। 
  6. सवशिक्षण सामग्री के प्रयोग से सम्बन्धित समस्या।
  7. दत्त कार्यों को करने, प्रस्तुत करने के प्रति अभिवश्त्ति।
  8. आधुनिक संचार माध्यमों को प्रयोग करने हेतु दक्षता की समस्या। 
  9. मुद्रित स्वशिक्षण सामग्री के प्रति उचित दृष्टिकोण।
  10. पूरक शिक्षण सामग्री एकत्र करने के प्रति दृष्टिकोण। 
  11. प्रयोगात्मक कार्यों से सम्बन्धित समस्या। 
  12. मूल्यांकन व्यवस्था के प्रति दृष्टिकोण। » अध्ययन केन्द्रों के दी गयी सुविधा। 
  13. दूर शिक्षा प्राप्त करने मे लगने वाले खर्च से सम्बन्धित दृष्टिकोण। 

दूर शिक्षा में अनुसंधान से लाभ 

दूर शिक्षा में अनुसंधान के विभिन्न् मुद्दों के विषय में हम पूर्व में पढ़ चुके है। अब ये देखना चाहिये कि इन विषयों पर अनुसंधान से दूर शिक्षा व्यवस्था कैसे लाभाविन्त होगी।

प्रबन्धन स्तर 

  1. भारतीय आवश्यकताओं एवं परिप्रेक्ष्य में दूरस्य शिक्षा व्यवस्था को पुनसंगठन करना। 
  2. दूर शिक्षा कार्यक्रम की उद्देश्य एवं समस्याओं को दूर करना सम्भव होगा। 
  3. मातश्संस्था एवं अध्ययन केन्द्रों के मध्य समन्वय स्थापित हो पायेगा।
  4. निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण तंत्र की स्थापना हो सकेगी। 
  5. अध्ययन केन्द्रों में उपयोगी माननीय एवं भौतिक संसाधन की व्यवस्था सुनिश्चित होगी। 

पाठ्यक्रम विकास 

दूर शिक्षा में पाठ्यक्रम की गुणवत्ता एवं विकास सुनिश्चित किया जा सकेगा।
  1. शिक्षण अधिगण प्रक्रिया का पुर्नसंगठन हो पायेगा। » पाठ्यक्रम में शारीरिक, सामाजिक, संज्ञानात्मक, सर्वेगात्मक तथा अध्यात्मिक पक्षों का समावेशन सुनिश्चित होगा। 
  2. अध्येता आवश्यकता के अनुसार विविध प्रकार के पाठ्यक्रमों का निर्माण एवं विकास हेतु आवश्यक सहयोग। 

सम्प्रेषण सामग्री 

अनुसंधान से सम्प्रेषण प्रक्रिया पर यह प्रभाव पड़ेगा।
  1. स्वशिक्षण सामग्री के पुर्निमाण एवं विकास को सुनिश्चित करना। 
  2. दत्त कार्यों के स्तर एवं प्रकार को सुनिश्चित किया जाना।
  3. अध्येता के अनुसार आधुनिक संचार माध्यमों के प्रभावी उपयोग हेतु प्रबन्ध सुनिश्चित करना। 
  4. उपबोधकों एवं अध्येताओं के लिए दूर संचार माध्यमों के प्रभावी प्रयोग हेतु प्रशिक्षण की व्यवस्था। 

सम्प्रेषण प्रक्रिया 

दूर शिक्षा में अनुसंधान से सम्प्रेषण प्रक्रिया पर यह प्रभाव पड़ेगा-
  1. दूर अध्येता एवं उपबोधक/दूर अध्यापक के साथ सहयोगात्मक रवैया अपनायें जाने हेतु रणनीति तैयार हो सकेंगे। » प्रभावी सम्प्रेषण सत्रों के आयोजन हेतु मार्गदर्शन मिलेगी। 
  2. उपयोगी पाठ्यवस्तु के निर्माण एवं सम्प्रेषण का आधर मिलेगा। 
  3. उपबोधकों के शिक्षण तकनीकी को सम्बन्धित किया जा सकेगा। 
  4. विद्याथ्र्ाी सहयोग सेवाओं को तंत्र की प्रभावकारिता सुनिश्चित हो सकेगी।
  5. अध्येताओं को प्रभावी प्रतिदृष्टि प्रदान की जा सकेगी। 
  6. स्वशिक्षण सामग्री के उचित प्रयोग की विधा अध्येताओं में विकसित की जा सके। 

परीक्षण प्रक्रिया 

दूर शिक्षा में अनुसंधान -
  1. दूर शिक्षा में मूल्यांकन प्रक्रिया को प्रभावी बना पायेगें। 
  2. अध्येता उपयोग के अनुकुल मूल्यांकत सुनिश्चित किया जा सकेगा। 
  3. सत्त आंकलन एवं मूल्यांकन का आधार तैयार होगा।
  4. मूल्यांकन तंत्र में गुणवत्त सुनिश्चित की सकेगी। 
दूर शिक्षा में अनुसंधान की अति आवश्यकता है मुक्त विश्वविद्यालय इसके विभिन्न पक्षों में अनुसंधान हेतु अनुदान प्रदान करते है। परन्तु इस क्षेत्र मे और ध्यान दिय जाने की आवश्यकता है।

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