मानव विकास की अवधारणा, उद्देश्य एवं महत्व

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किसी देश के सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक उत्थान में, उस देश में उपलब्ध मानव संसाधन अथवा आर्थिक रूप से क्रियाशील जनसंख्या की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मानव शक्ति का आकार तथा उसका गुणात्मक स्वरूप देश के विकास की दिशा, एवं विकास के पथ को निर्धारित करती है। मानव ही उत्पादन का साधन बन कर आर्थिक विकास को गति प्रदान करता है। 1990 में सर्वप्रथम प्रकाशित मानव विकास प्रतिवेदन ने मानव विकास को, लोगों के सामने, विकल्प के विस्तार की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया है। इनमें सवार् िधक महत्वपूर्ण है विस्तृत और स्वस्थ जीवन, शिक्षा प्राप्ति और अच्छा जीवन स्तर को पाना। अन्य विकल्प हैं, राजनीतिक स्वतंत्रता, मानवाधिकारों का आश्वासन और आत्म-सम्मान के विविध तत्व। ये सभी जरूरी विकल्प हैं जिनके अभाव में दूसरों अवसरों में बाधा पड़ती है। अत: मानव विकास, लोगों के विकल्पों में विस्तार के साथ-साथ प्राप्त होने वाले कल्याण के स्तर को ऊँचा करने की प्रक्रिया है। पॉल स्ट्रीटन ने ठीक ही लिखा है कि मानव विकास की संकल्पना, मानव को कर्इ दशकों के अतंराल के बाद पुन: केन्द्रीय मंच पर प्रस्थापित करती है। इन बीते दशकों में तकनीकी संकल्पनाओं की भूल-भुलैया में यह बुनियादी दृष्टि अस्पष्ट बनी है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री महबूब उल हक, जिनके निर्देशन में सर्वप्रथम मानव विकास सूचकांक का निर्माण किया गया था, के अनुसार, ‘‘मानव विकास में सभी मानवीय विकल्पों का विस्तार आ जाता है। ये विकल्प चाहे आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अथवा राजनीतिक हों।’’ यह कभी-कभी कहा जाता है कि आय में वृद्धि से अन्य सभी विकल्पों का विस्तार होता है, किन्तु यह सत्य नहीं है। मानव के सामने अनेक विकल्प हैं, जो आर्थिक कल्याण से कहीं आगे जाते हैं। ज्ञान, स्वास्थ्य, स्वच्छ भौतिक पर्यावरण, राजनीतिक स्वतंत्रता और जीवन के सरल आनन्द आय पर निर्भर नहीं है।

अत: संकुचित अर्थों में मानव विकास का अर्थ है, मानव की शिक्षा तथा प्रशिक्षण पर व्यय करना जबकि विस्तृत अर्थ में, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा समस्त सेवाओं पर किये जाने वाले व्यय से लगाया जाता है।

मानव विकास उद्देश्य 

  1. सामाजिक नीति, कार्यक्रम व सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए एक एकीकृत उपागम को अपनाना व क्रियान्वित करना, 
  2. मानव विकास व सामाजिक विकास में उन्नति के लिए राष्ट्रीय स्तर की क्षमताओं का निर्माण करना, 
  3. मानव विकास से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार के नेटवर्क व साझेदारियों को विकसित करना व सशक्त बनाना, 
  4. सामाजिक व मानव विकास से संबंधित कार्यक्रमों व सेवाओं को बेहतर बनाना व उनमें सामन्जस्य स्थापित करना,
  5. बेहतर मानव-विकास के लिए ज्ञान व उपागमों को सुदृढ़ बनाना, 
  6. प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च स्तर पर शिक्षा की उपयुक्त व्यवस्था करना, 
  7. प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा देना तथा उसकी समुचित व्यवस्था करना, 
  8. कार्य-प्रशिक्षण को बढ़ावा देना, तथा 
  9. ऐसी स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था करना जो लोगों की जीवन-प्रत्याशा, शक्ति, उत्साह तथा कार्यक्षमता में वृद्धि कर सकें। 

मानव विकास का महत्व 

किसी देश का आर्थिक विकास उस देश में उपलब्ध मानव पूँजी के स्टॉक तथा संचय की दर पर निर्भर करता है। विकासशील देशों में नियोजित आर्थिक विकास की प्रक्रिया में मानव के विकास पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता। यही कारण है कि इन देशों में विकास के वांछित लक्ष्य नहीं प्राप्त हो पाते है तथा वहाँ विकास की दर निम्न रहती है। आज अधिकांश विकासवादी अर्थशास्त्री इस बात के पक्षधर है कि मानव-पूँजी में अधिक से अधिक विनियोग किया जाना चाहिए ताकि आर्थिक विकास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक मानव संसाधन का समुचित विकास किया जा सके।

किसी भी देश की जनसंख्या का जितना अधिक हिस्सा शिक्षित, कुशल एवं प्रशिक्षित, होकर रोजगार में लगा हुआ है, वह देश उतना ही तेजी से विकास करेगा। आर्थिक विकास की दृष्टि से भौतिक पूँजी की अपेक्षा मानव पूँजी को कहीं अधिक महत्वपूर्ण समझा जाता है क्योंकि मानवीय साधनों की कुशलता एवं दक्षता पर ही आर्थिक विकास का ढांचा खड़ा किया जा सकता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मार्शल का भी विचार था कि ‘‘सबसे मूल्यवान पूँजी वह है जो मानव-मात्र में विनियोजित की जाये।’’

पॉल स्ट्रीटन के अनुसार-
  1. मानव विकास ऊँची उत्पादकता का साधन है। भली प्रकार से पोषित, स्वस्थ, शिक्षित, कुशल और सतर्क श्रम शक्ति सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्पादक परिसंपत्ति है। अत: पोषण, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा में निवेश उत्पादकता के आधार पर उचित है। 
  2. यह मानव पुनरूत्पादन को धीमा करके परिवार के आकार को छोटा करने में सहायता पहुँचाता है। यह सभी विकसित देशों का अनुभव है कि शिक्षा के स्तर में सुधार, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता और बाल मृत्यु दर में कमी से जन्म दर में गिरावट आती है। शिक्षा में सुधार से लोगों में छोटे परिवार के प्रति चेतना पैदा होती है और स्वास्थ्य में सुधार व बाल मृत्यु दर में कमी से लोग ज्यादा बच्चों की जरूरत महसूस नहीं करते।
  3. भौतिक पर्यावरण की दृष्टि से भी मानव विकास अच्छा है। गरीबी में वनों के विनाश, रेगिस्तान के विस्तार और क्षरण में कमी आती है। 
  4. गरीबी में कमी से एक स्वस्थ समाज के गठन, लोकतंत्र के निर्माण और सामाजिक स्थिरता में सहायता मिलती है। 
  5. मानव विकास से सामाजिक उपद्रवों को कम करने में सहायता मिलती है और इससे राजनीतिक स्थिरता बढ़ती हैं।

मानव विकास के सूचक 

मानव विकास एक वृहद् अवधारणा है जिसके अन्तर्गत विभिन्न सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक तत्व आते हैं। किन्तु UNDP ने मानव विकास के मुख्यत: तीन सूचक बतायें हैं -
  1. जीवन प्रत्याशा अर्थात् एक विस्तृत और स्वस्थ जीवन। जिस देश के नागरिकों की औसत आयु जितनी अधिक होगी वह देश उतना ही अधिक विकसित समझा जायेगा। 
  2. ज्ञान अर्थात् एक देश में विभिन्न शिक्षण संस्थानों में नामांकन कराने वाले लोगों की संख्या। किसी देश में बालिग साक्षरता दर और समग्र प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च नामांकन के अनुपात के द्वारा इसको मापा जाता है। 
  3. आर्थिक विकास अर्थात् प्रति व्यक्ति आय। लोगों का आर्थिक विकास मानव विकास का एक अन्य सूचक है जो लोगों का अच्छा जीवन स्तर दर्शाता है। एक देश में लोगों की प्रति व्यक्ति आय जितनी अधिक होगी उस देश में मानव-विकास उतना ही अधिक होगा।

मानव विकास के सिद्धान्त 

सिगमण्ड फ्रायड : व्यक्तित्व का मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त 

फ्रायड ने करीब 40 साल के अपने नैदानिक अनुभवों के बाद व्यक्तित्व के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इस सिद्धान्त की व्याख्या तीन मुख्य भागों में बांट कर की जाती है :-
  1. व्यक्तित्व की संरचना।
  2. व्यक्तित्व की गतिकी।
  3. व्यक्तित्व का विकास।

व्यक्तित्व की संरचना- 

फ्रायड ने व्यक्तित्व की संरचना का वर्णन करने के लिए निम्नांकित दो प्रारूपों का निर्माण किया है-
  1. आकारात्मक प्रारूप- मन के आकारात्मक पारूप से तात्पर्य पहलू से होता है जहाँ संघर्षमय परिस्थिति की गत्यात्मकता उत्पन्न होती है। फ्रायड ने इसे तीन स्तरों में बांटा है- चेतन, अर्द्धचेतन, तथा अचेतन।
  2. गत्यात्मक या संरचनात्मक प्रारूप- इससे तात्पर्य उन साधनों से होता है जिनके द्वारा मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न मानसिक संघषोंर् का समाधान होता है। ऐसे साधन या प्रतिनिधि तीन है :-
    1. उपाहं- यह व्यक्तित्व का जैविक तत्व है जिनमें प्रवृत्तियों की भरमार होती है जो जन्मजात होती है तथा जो असंगठित, कामकु , आक्रामकतापूर्ण तथा नियम आदि को मानने वाली नहीं होती है। उपाहं की प्रवृत्तियां ‘‘आनन्द सिद्धान्त’’ द्वारा निर्धरित होती हैं। 
    2. अहं- अहं मन का वह हिस्सा है जिसका संबंध वास्तविकता से होता है तथा जो बचपन में उपाहं की प्रवृत्तियों से ही जन्म लेता है। अहं वास्तविकता सिद्धान्त द्वारा नियंत्रित होता है तथा वातावरण की वास्तविकता के साथ इसका संबंध सीधा होता है। 
    3. पराहं- पराहं को व्यक्तित्व की नैतिक शाखा में माना गया है जो वयक्ति को यह बतलाता है कि कानै कार्य अनैि तक है यह आदर्शवादी सिद्धान्त द्वारा निदेर् िशत एवं नियंत्रित होता है। 

व्यक्तित्व की गतिकी

फ्रायड के अनुसार मानव जीव एक जटिल तंत्र है जिसमें शारीरिक ऊर्जा तथा मानसिक ऊर्जा दोनों ही होते हैं। शारीरिक ऊर्जा से व्यक्ति शारीरिक क्रियायें जैसे- दौड़ना, साँस लेना, लिखना आदि क्रियायें करता है तथा मानसिक ऊर्जा से व्यक्ति मानसिक कार्य जैसे-स्मरण, प्रत्यक्ष चिन्तन आदि करता है। फ्रायड के अनुसार इन दोनों तरह की ऊर्जाओं का स्पर्श बिन्दू उपाहं होता है। फ्रायड ने इन ऊर्जाओं से सम्बन्धित कुछ ऐसे संप्रत्यय का विकास किया है जिनसे व्यक्तित्व के गत्यात्मक पहलुओं जैसे- मूलप्रवृत्ति, चिन्ता तथा मनोरचनाओं का वर्णन होता है।

व्यक्तित्व का विकास- 

फ्रायड ने व्यक्तित्व के विकास की व्याख्या दो दृष्टिकोण से की है। पहला दृष्टिकोण इस बात पर बल डालता है कि वयस्क व्यक्तित्व बाल्यावस्था के भिन्न-2 तरह की अनुभूतियों द्वारा नियंत्रित होती है तथा दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार जन्म के समय लैंगिक ऊर्जा बच्चों में मौजूद होती है जो विभिन्न मनोलैंगिक अवस्थाओं से होकर विकसित होती है। फ्रायड के इस दूसरे दृष्टिकोण को मनोलैंगिक विकास का सिद्धान्त कहा जाता है। इस सिद्धान्त की 5 अवस्थाएं क्रम में निम्नांकित हैं:-
  1. मुखावस्था 
  2. गुदावस्था 
  3. लिंग प्रधानावस्था 
  4. अव्यक्तावस्था 
  5. जननेन्द्रियावस्था 
मनोलैंगिक अवस्थाओं से होकर व्यक्ति की लैंगिक ऊर्जा का धीरे-धीरे विकास होता जाता है जिससे व्यक्ति बाल्यावस्था के निष्क्रियता को त्याग कर वयस्कावस्था में सामाजिक रूप से उपयोगी एवं सुखमय जीवन जीता है।

एडलर का वैयक्तिक मनोविज्ञान का सिद्धान्त 

एडलर का मत है कि प्रत्येक व्यक्ति मुख्य रूप से एक सामाजिक न कि जैविक प्राणी होता है। व्यक्तित्व का निर्धारण वैयक्तिक सामाजिक वातावरण तथा उनक अन्त: क्रियाओं द्वारा न कि जैविक आवश्यकताओं द्वारा निर्धारित होता है। यौन को एडलर ने व्यक्तित्व निर्धारिण का उतना महत्वपूर्ण कारक नहीं माना जितना कि फ्रायड ने माना था।

एडलर के सिद्धान्त का का एक महत्वपूर्ण पूर्वकल्पना यह है कि सभी मनोवैज्ञानिक घटनाएँ व्यक्ति के भीतर आत्म-संगत ढंग से एकीकृत होती है। इस पूर्वकल्पना के तहत उनके सिद्धान्त में व्यक्तित्व के मौलिक एकता पर पर्याप्त बल डाला गया है। इसी तरह से विभिन्नताएं एवं विषमता एक आत्म-संगत संपूर्णता में संगठित हो जाती हैं। एडलर ने अपने सिद्धान्त में यह बतलाया कि मन तथा शरीर, चेतन तथा अचेतन एवं तर्क तथा संवेग में कोर्इ स्पष्ट अतंर करना संभव नहीं हैं।

एडलर का मत था कि व्यक्ति का व्यवहार व्यक्तिगत अनुभूतियों द्वारा नहीं बल्कि कल्पना या भविष्य प्रत्याशाओं द्वारा पे्ररित होता है।

एडलर के सिद्धान्त में जीवन शैली को एक महत्वपूर्ण भाग माना गया है। जीवन शैली में सिर्फ व्यक्ति का जीवन लक्ष्य ही नहीं बल्कि उसक आत्म-संप्रत्यय, दूसरों के प्रति भाव तथा पर्यावरण के अन्य वस्तुओं के प्रति मनोवृत्ति आदि भी सम्मिलित होता है। व्यक्ति की जीवन शैली, पर्यावरण, आनुवांशिकता, सफलता के लक्ष्य, सामाजिक अभिरूचि तथा सृजनात्मक शक्ति आदि का प्रतिफल होता है। जीवन शैली को एक प्रमुख नियंत्रण बल एडलर ने माना है।

सुल्लीवान का व्यक्तित्व सिद्धान्त 

सुल्लीवान का मत था कि व्यक्ति जन्म से ही वातावरण के विभिन्न वस्तुओं एवं व्यक्तियों के साथ अन्त: क्रिया करता है और उस अन्त:क्रिया से उसके व्यवहार का निर्धारण होता है । व्यक्ति का विकास इन्ही अन्तर वैयक्तिक व्यवहार के संदर्भ में होता है।

इनके अनुसार मानव एक ऐसा ऊर्जा तंत्र है जो आवश्यकताओं द्वारा उत्पन्न तनावों को हमेशा कम करने की कोशिश करता है। उन्होंने तनाव को दो भागों में बांटा है। आवश्यकताओं द्वारा उत्पन्न तनाव तथा चिन्ता द्वारा उत्पन्न तनाव जब व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को संतुष्ट नहीं कर पाता है जो उससे एक विशेष अवस्था उत्पन्न होती है, जिससे भावशून्यता विकसित होती है। सुल्लीवान ने व्यक्तित्व विकास की सात अवस्थाओं का वर्णन किया है।

इनका मत है कि व्यक्तित्व में परिवर्तन विकास के किसी भी अवस्था में हो सकता है, परन्तु ऐसे परिवर्तन एक अवस्था से दूसरी अवस्था के अंतरण में सर्वाधिक होता है। एक बच्चा दूसरों का किस तरह से प्रत्यक्षण करता है और वह दूसरों के प्रति किस तरह की प्रतिक्रिया करता है, पर व्यक्तित्व का विकास निर्भर करता है जो व्यक्तित्व विकास के विभिन्न अवस्थाओं को एक सूत्र में बांधता है। उनके द्वारा बतलाये गए व्यक्तित्व का विकास की सात अवस्थाएं निम्नांकित है -
  1. शैशवास्था 
  2. बाल्यावस्था 
  3. तरूणावस्था 
  4. प्राक् किशोरावस्था 
  5. आरम्भिक किशोरावस्था
  6. उत्तर किशोरावस्था 
  7. परिपक्वता 
सुल्लीवान ने व्यक्तित्व विकास में सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों पर बल डाल कर यह स्पष्ट कर दिया कि ये कारक व्यक्तित्व के एक प्रमख्ु ा निर्धारक है। सुल्लीवान पहले ऐसे नव-फ्र्रायडवादी है जिन्होंने व्यक्तित्व के विकास की व्याख्या में जन्म से लेकर परिपक्वता तक की अवधि का एक चरणबद्ध वर्णन किया है ।

इरिक इरिक्सन :- व्यक्तित्व का मनोसामाजिक सिद्धान्त 

इरिक्सन के सिद्धान्त का केन्द्रीय बिन्दु यह है कि मानव का विकास कर्इ पूवर् िनश्चित अवस्थाएं जो सर्वजनीन होती है  से होकर होता है । जिस प्रक्रिया द्वारा वे अवस्थाएं विकसित होती है। वह विशेष नियम द्वारा नियंत्रित होती है। इस नियम को पश्चजात नियम कहा जाता है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘चाइल्डहुड एण्ड सोसाइटी’ में इरिक्सन ने मनोसामाजिक अहं विकास के आठ अवस्थाएं बतलायी हैं, और पश्चजात् नियम के अनुसार विकास की प्रत्येक अवस्था होने का एक आदर्श समय होता है और प्रत्येक अवस्था एक क्रम में एक के बाद एक आती है और उनमें व्यक्तित्व का विकास जैविक परिपक्वता तथा सामाजिक एवं ऐतिहासिक बलों के अन्त: क्रिया के फलस्वरूप होता है । इनके सिद्धान्त को निम्नांकित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-
  1. प्रत्येक मनोसामाजिक अवस्था में एक संक्रान्ति होता है। संक्रान्ति से तात्पर्य व्यक्ति के जीवनकाल के एक ऐसा परिवर्तन बिंदु से होता है जो उस अवस्था में जैविक परिपक्वता तथा सामाजिक मांग दोनों के अन्त: क्रिया के फलस्वरूप व्यक्ति में उत्पन्न होता है। 
  2. प्रत्येक मनोसामाजिक संक्रान्ति में धनात्मक तथा ऋणात्मक दोनों ही तत्व होते हैं। प्रत्येक अवस्था में उसके जैविक परिपक्वता तथा नये-नये सामाजिक मांग के कारण संघर्ष का होना इरिक्सन अवश्यभावी मानते है। यदि इस संघर्ष को व्यक्ति संतोषजनक ढंग से समाधान कर लेता है तो इससे उसके विकसित अहं मे ऋणात्मक तत्व अवशोषित हो जाते है और व्यक्तित्व विकास अवरूद्ध होने की संभावना कम हो जाती है। 
  3. मनोसामाजिक विकास की प्रत्येक अवस्था में संक्रान्ति का समाधान कर लेने पर व्यक्ति में एक विशेष मनोसामाजिक शक्ति की उत्पत्ति होती है जिसे इरिक्सन ने ‘सदाचार’ की संज्ञा दी है। 
  4. प्रत्येक मनोसामाजिक अवस्था का निर्माण उससे पहले की अवस्था में हुए विकासों से संबंधित होता है।
  5. इरिक्सन द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व सिद्धान्त में मनोसामाजिक विकास की आठ अवस्थाओं के नाम इस प्रकार है :- 
    1. शैशवास्था: विश्वास बनाम अविश्वास 
    2. प्रारंभिक बाल्यावस्था: स्वतंत्रता बनाम लज्जाशीलता 
    3. खेल अवस्था: पहल शक्ति बनाम दोशिता 
    4. स्कूल अवस्था: परिश्रम बनाम हीनता 
    5. किशोरावस्था: अहं पहचान बनाम भूमिका संभ्राति 
    6. तरूण वयस्कावस्था: घनिष्ठ बनाम विलगन 
    7.  मध्य वयस्कावस्था: जननात्मकता बनाम स्थिरता 
    8. परिपक्वता: अहं सम्पूर्ण बनाम निराशा

कर्ट लेविन: व्यक्तित्व का क्षेत्र सिद्धान्त 

इस सिद्धान्त की एक सामान्य पूर्वकल्पना यह है कि प्राणी का व्यवहार उन सभी कारकों द्वारा प्रभावित होता है जो उसके क्षेत्र या वातावरण में उपस्थित होते हैं। लेविन ने व्यक्ति सिद्धान्त को निम्नांकित तीन प्रमुख भागों में समझा जा सकता है-
  1. व्यक्तित्व की संरचना
  2. व्यक्तित्व की गतिकी
  3. व्यक्तित्व का विकास

व्यक्तित्व की संरचना- 

लेविन ने व्यक्तित्व की संरचना की व्याख्या करने के लिए गणित के एक विशेष शाखा जिसे संस्थिति विज्ञान जाता है, का सहारा लिया। इस आधार पर उन्होंने व्यक्तित्व की संरचना को निम्नांकित चार भागों में बांटा :-
  1. व्यक्ति
  2. मनोवैज्ञानिक वातावरण
  3. जीवन समष्टि
  4. वास्तविकता के स्तर

व्यक्तित्व की गतिकी- 

लेविन ने कुछ गत्यामक संप्रत्ययों का प्रतिपादन किया है  जिनसे यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि किसी भी दी गयी परिस्थिति में व्यक्ति किस तरह का व्यवहार करता है। ऐसे गत्यात्मक संप्रत्ययों में निम्नांकित प्रमुख है :-
  1. ऊर्जा
  2. तनाव
  3. आवश्यकता
  4. कर्षण शक्ति
  5. सदिश ।

व्यक्तित्व का विकास-

लेविन ने व्यक्तित्व के विकास की व्याख्या करने के लिए निम्नांकित दो तरह के प्रत्ययों को महत्वपूर्ण बतलाया है :-
  1. व्यवहारात्मक परिवर्तन- लेविन के अनुसार जैसे-जैसे व्यक्ति का विकास होते जाता है अर्थात् उसकी आयु में वृद्धि हो जाती है, उसमें तरह-तरह के व्यवहारिक परिवर्तन होते जाते हैं। शिशुओं के व्यवहार में पूरे शरीर में एक विसरित क्रिया होती हैं जिसे उन्होंने साधारण अन्तर निर्भरता कहा है।
  2. विभेदीकरण एवं एकीकरण- लेविन ने विभेदीकरण को परिभाषित करते हुए कहा है कि इससे तात्पर्य संपूर्ण व्यक्ति के स्वतंत्र हिस्सों या भागों में वृद्धि से होता है। परंतु व्यक्तित्व का विकास सिर्फ विभेदीकरण की प्रक्रिया से अपने आप में ही अधूरा ही रह जाता है क्योंकि इससे यह स्पष्ट नहीं होता है कि उम्र बीतने के साथ व्यक्ति का व्यवहार क्यों अधिक संगठित एवं समन्वित होता चला जाता है। इस पक्ष की व्याख्या करने के लिए उन्होंने एकीकरण के संप्रत्यय का प्रतिपादन किया। इसके माध्यम से लेविन यह व्याख्या कर सकने में समर्थ हो पाये है कि व्यक्ति तथा मनोवैज्ञानिक पर्यावरण के विभिन्न क्षेत्र एक पदानुक्रम ढंग से संगठित होकर करता है। इस तरह के संगठन का स्पष्ट अभाव हमें शिशुओं के व्यवहार में मिलता है परन्तु व्यस्कों में इस तरह का अभाव एकीकरण की प्रक्रिया क संपन्न हो जाने से नहीं मिलता है।

एब्राहम मैसलो : व्यक्तित्व का मानवतावादी सिद्धान्त 

मैसलो ने अपने सिद्धान्त में प्राणी के अनूठापन का उसके मूल्यों के महत्व पर तथा व्यक्तिगत वर्धन तथा आत्म-निर्देश की क्षमता पर सर्वाधिक बल डाला है। इस बल के कारण ही उनका मानना है कि संपूर्ण प्राणी का विकास उसके भीतर से संगठित ढंग से होता है। इन आन्तरिक कारकों की तुलना में वाºय कारणों जैसे आनुवांशिकता तथा गत अनुभूतियों का महत्व नगण्य होता है। अधिक बल दिये जाने के कारण उनके सिद्धान्त को व्यक्तित्व का सम्पूर्ण-गत्यात्मक सिद्धान्त भी कहा गया है। मैसलो के सिद्धान्त को निम्नांकित दो मुख्य भागों में प्रस्तुत किया जा सकता है :-

व्यक्तित्व एवं अभिप्रेरण का पदानुक्रमिक मॉडल- 

इनका विश्वास था कि अधिकांश मानव व्यवहार की व्याख्या कोर्इ न कोर्इ व्यक्तिगत लक्ष्य पर पहंचु ने की पव्र ृत्ति से निदेर् िशत होता है मानव अभिप्रेरक जन्मजात होते है और उन्हें प्राथमिकता या शक्ति के आरोही पदानुक्रम सुव्यवस्थित किया जा सकता है। ऐसे अभिपेर्र कों को पा्र थमिकता या शक्ति के आरोही क्रम में इस प्रकार बतलाया गया है।
  1. शारीरिक या दैहिक आवश्यकता
  2. सुरक्षा की आवश्यकता
  3. संबद्धता एवं आवश्यकता 
  4. सम्मान की आवश्यकता
  5. आत्म-सिद्धि की आवश्यकता 

स्वस्थ व्यक्तित्व - 

आत्मसिद्ध व्यक्ति का विकास मैसलो के सिद्धान्त की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह सिद्धान्त मानसिक रूप् से स्वस्थ व्यक्तियों के अध्ययन पर आधारित है। मैसलो ने इन व्यक्तियों की पहचान करने के लिए कुछ विशेषताओं का वर्णन भी किया है। मैसलो ने अपने व्यक्तित्व सिद्धान्त में यह भी बतलाया है कि व्यक्ति में आत्म-सिद्ध को किस तरह से प्रोत्साहित किया जा सकता है। इन्होंने आत्म सिद्ध को बढ़ाने या प्रोत्साहित करने के लिए स्कूल को सबसे उत्तम स्थान बतलाया है और कहा है कि छात्रों को अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने में रूचियुक्त व्यवसाय की खोज करने तथा उत्तम मूल्यों का समझने के लिए किये गए प्रयासों से आत्म-सिद्ध का विकास होता है।

बी.एफ. स्कीन्नर व्यक्तित्व का व्यवहारात्मक सीख का सिद्धान्त 

स्कीन्नर के लिए मानव व्यक्तित्व, उद्दीपकों के प्रति सीखे गए अनुक्रियाओं का एक संग्रहण एवं स्पष्ट व्यवहारों या आदत तंत्रों का एक समुच्चय है। इसलिए व्यक्तित्व से स्कीन्नर का तात्पर्य सिर्फ उन व्यवहारों से होता है, जिसे वस्तुनिष्ठ रूप से पेक्ष््र ाण किया जाए या जिसमें आसानी से हेर-फेर किया जा सके।

स्कीन्नर का सिद्धान्त कुछ सिद्धान्तों जैसे मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त, संज्ञानात्मक सिद्धान्त तथा मानवतावादी सिद्धान्त का विरोधी है। स्कीन्नर ने व्यक्तित्व की व्याख्या करने में आतंरिक प्रक्रियाओं जैसे-प्रणोद, अभिपेर्र कों तथा अचेतन आदि के महत्व को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इनका पेक्ष््र ाण नहीं किया जा सकता है।

स्कीन्नर ने मानव जीव को एक रिक्त जीव कहा है। रिक्त जीव कहने का उद्देश्य मानव व्यवहार की उत्पत्ति में आतंरिक प्रक्रियाओं की भूमिकाओं पर कटाक्ष करना तथा इस बात पर बल डालना था कि मानव जीव के भीतर कुछ भी ऐसा नहीं होता है जो वैज्ञानिक ढंग से व्यक्ति के व्यवहारों की व्याख्या कर सके। इनके सिद्धान्त की एक विशेषता यह भी है कि इन्होंने अपना अध्ययन सामान्य, असामान्य या असाधारण व्यक्तियों पर न करके पशुओं पर विशेषकर चूहों एवं कबूतरों पर किया और कहा कि चूंकि उनके सिद्धान्त का संबंध सभी तरह के व्यवहारों से है अत: इन पशुओं के व्यवहार का अध्ययन करके मानव के व्यवहारों को भी आसानी से समझा जा सकता है। स्कीन्नर के व्यक्तित्व सिद्धान्त मानव प्रकृति के कुछ खास पहलुओं जैसे-निर्धार्यता, अधिभूतवाद, पर्यावरणीयता, परिवर्तनशीलता वस्तुनिष्ठता प्रतिक्रियाशीलता तथा ज्ञेयता पर अधिक बल डालता है तथा अन्य पहलुओं जैसे विवेकपूर्ण तथा समस्थिति विषमस्थिति को पूर्णरूपेण अस्वीकृत किया है क्योंकि स्कीन्नर ने मानव व्यवहार के आतंरिक स्रोतों पर बल नहीं दिया है ।

इनके अनुसार व्यक्तित्व का अध्ययन व्यक्ति के जननिक प्रष्ठभूमि तथा विशिष्ट शिक्षण इतिहास का क्रमबद्ध एवं परिशुद्ध मूल्यांकन के आधार पर संभव है।

अल्बर्ट बाण्डुरा- सामाजिक संज्ञानात्मक का सिद्धान्त 

स्टैण्डफोर्ट के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बाण्डुरा अपने सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धान्त जिस औपचारिक रूप से सामाजिक सीख का सिद्धान्त कहा जाता है, में दावा करते हैं कि मानव एक ज्ञानात्मक जीव है जिसकी सक्रिय सूचनात्मक प्रक्रिया उसके सीखने, व्यवहार तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बाण्डरु ा कहते है कि मनुष्य के सीखाने की प्रक्रिया चूहे के सीखने की प्रक्रिया से बहुत भिन्न होती है। क्योंकि मनुष्य में चूहें की तुलना में कही अधिक ज्ञानात्मक क्षमताएं होती है। सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धान्त एक सीख संबंधी सिद्धान्त है जो इस धारणा पर आधारित है कि मनुष्य दूसरों को देखकर सीखता है तथा मनुष्य की वैचारिक प्रक्रिया व्यक्तित्व की समझ पर केन्द्रित है। यह सिद्धान्त व्यक्ति की नैतिक क्षमता वे नैतिक प्रदर्शन के मध्य अंतर पर जोर देता है।

‘मनुष्य दूसरों को देखकर सीखता है’ इस बात को अच्छी तरह समझाने के लिए बाण्डुरा ने एक प्रयोग किया जिसे ‘बोबो गुड़िया का व्यवहार: आक्रामकता का एक अध्ययन कहा जाता है। इस प्रयोगों में बाण्डुरा ने बच्चों के समूह को एक वीडियों दिखाया जिसमें उग्र व हिंसक क्रियाएं थी इस प्रयोग के माध्यम से बाण्डुरा ने निष्कर्ष निकाला कि जिन बच्चों ने वह हिंसक वीडियों देखा था उन्हें गुडियायें अधिक आक्रामक व हिसंक प्रतीत होती थीं बजाय उन बच्चों के जिन्होंने वह वीडियों नहीं देखा था। यह प्रयोग सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धान्त को स्पष्ट करता है क्योंकि यह बताता है कि किस प्रकार मनुष्य मीडिया में देखी गर्इ घटनाओं के प्रत्युत्तर में व्यवहार करता है। इस प्रयोग के संबंध में बच्चों ने हिंसा के प्रकार के प्रत्युत्तर में व्यवहार किया जिसे उन्होंने सीधे वीडियो देखकर सीखा था। बैण्डुरा द्वारा प्रतिपादित सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धान्त निम्नांकित दो मुख्य प्रस्तावनाओं पर आधारित हैं :-
  1. अधिकतर मानव व्यवहार अर्जित होते है, अर्थात व्यक्ति उन्हें अपने जीवन-काल में सीखता है।
  2. मानव व्यवहार के सम्पोषण एवं विकास की व्याख्या करने के लिए सीखने का नियम पर्याप्त हैं। 
बैण्डुरा के सिद्धान्त को औपचारिक रूप से सामाजिक-सीख का सिद्धान्त भी कहा जाता है। इस सिद्धान्त में मानव स्वभाव के कुछ खास-खास पूर्वकल्पनाओं जैसे-विवेकपूर्णता, पर्यावरणीयता परिवर्तनशीलता तथा ज्ञेयता आदि पर अधिक बल डाला गया हैं बैण्डुरा का मत है कि व्यक्ति दूसरों के व्यवहारों का पेक्ष््र ाण करके तथा उसे दोहराकर वैसा ही व्यवहार करना सीख लेता है। इस संबंध मेंं बैण्डुरा रॉंस तथा राँस ने एक लेाकप्रिय प्रयोग किया है। इस प्रयोग में स्कूल के बच्चों को वयस्क द्वारा तीन से चार फीट की एक गुड़िया जिसे बोबो गुड़िया का नाम दिया गया था, को उछालते हुए मारते हुए एवं उसके प्रति आक्रामकता करते हुए दिखलाया गया। जब इन बच्चों को उसी गुड़िया के साथ अकेला छोड़ दिया गया तो देखा गया कि उनके द्वारा भी वैसा ही आक्रामक व्यवहार उस गुड़िया के प्रति दिखलाया गया। बाद के प्रयोगों में जब बच्चों के टेलीविजन पर ऐसे ही आक्रामक दृश्य दिखलाये गए तो उनका व्यवहार उन बच्चों की तुलना में अधिक आक्रामक हो गए जिन्हें ऐसे दृश्य टेलीविजन पर नहीं दिखलायें गए थे।

बैण्डुरा के सिद्धान्त में अन्योन्यनिर्धार्यता का संप्रत्यय एक काफी महत्वपूर्ण संप्रत्यय है। इसके माध्यम से बैण्डुरा यह स्पष्ट करना चाहते थे कि मानव व्यवहार संज्ञानात्मक, व्यवहारात्मक तथा पर्यावरणी निर्धारकों के बीच सतत अन्योन्य अन्त: क्रिया का एक प्रतिफल होता है। इस तरह क अन्योन्य अन्त: क्रिया की प्रक्रिया को बैण्डुरा ने अन्योन्य निर्धार्यता की संज्ञा दी है।

मानव विकास की अवस्थाएं 

समाज वैज्ञानिकों मानव विकास की अवस्थाओं को गर्भधारण से लेकर पूरे जीवनकाल को निम्नांकित 10 भागों में विभाजित किया है।
  1. पूर्वप्रसूतिकाल - यह अवस्था गर्भधारण से प्रारम्भ होकर जन्म तक की होती है। 
  2. शैशवावस्था -यह अवस्था जन्म से प्रथम 10-14 दिनों तक की है। 
  3. बचपनावस्था - यह अवस्था जन्म के दो सप्ताह से प्रारंभ होकर दो साल तक की होती है।
  4. बाल्यावस्था - यह अवस्था 2 साल से प्रारम्भ होकर 10 या 12 साल तक की होती है। बालिकाओं में 10 वर्ष तक तथा बालकों में यह 12 वर्ष तक होती है। इसे मनोवैज्ञानिकों ने निम्नांकित दो भागों में बांटा है - 
    • प्रारंभिक बाल्यावस्था : यह अवस्था 2 साल से प्रारंभ होकर साल तक की होती है। 
    • उत्तर बाल्यावस्था : यह अवस्था 6 वर्ष से प्रारंभ होकर बालिकाओं में 10 वर्ष की उम्र तक तथा बालकों में 6 वर्ष से प्रारंभ होकर 12 वर्ष की उम्र तक होती है। इस अवस्था से बालक-बालिकाओं में यौन परिपक्वता आ जाती है । 
  5. तरूणावस्था या प्राकृकिशोरावस्था - लड़कियों में यह अवस्था 11 वर्ष से 13 की तथा लड़कों में यह अवस्था 12 साल 14 की होती है। इस अवस्था में बालिका का शरीर एक वयस्क के शरीर का रूप ले लेता है। 
  6. प्रारंभिक किशोरावस्था - यह अवस्था 13-14 साल से प्रारंभ होकर 17 साल तक की होती है। इस अवस्था में शरीरिक विकास तथा मानसिक विकास बालकों में अधिकतम होता है और उनमें विवेक तथा उचित-अनुचित का खयाल अधिक नहीं रहता है। 
  7. परवत्र्ती किशोरावस्था -यह अवस्था 17 साल से 19-20 साल तक की होती है। इस अवस्था में बालक पूर्णरूपेण शरीरिक तथा मानसिक रूप से स्वतंत्र हो जाता है और अपने भविष्य के बारे में तरह-तरह की योजनाएँ बनाना शुरू कर देता है। बालक तथा बालिकाओं में विपरीत लिंग के व्यक्तियों के प्रति अभिरूचि अधिक हो जाती है । 
  8. प्रारंभिग वयस्कता - यह अवस्था 21 साल से 40 साल की होती है। इस अवस्था में व्यक्ति शादी कर अपनी घर-परिवार बसाता है और किसी व्यवसाय में लग जाता है तथा आने आत्मविकास को मजबूत कर आगे बढ़ता है। 
  9. मध्यावस्था - यह अवस्था 40-60 साल की होती है । इसमें व्यक्ति द्वारा अपनी पूर्वप्राप्त उपलब्धि तथा आकांक्षाओं को काफी सुदृढ़ किया जाता है। 
  10. बुढ़ापा या सठियावस्था - यह अवस्था 60 साल से मृत्यु तक की होती है। इस अवस्था में शरीरिक तथा मानसिक शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होती है और सामाजिक कार्यो में व्यक्ति का लगाव कम होता है चला जाता है। 

मानव विकास : नीतियाँ व कार्यक्रम 

मानव विकास की अवधारणा मानवीय विकास से संबंधित है जिसका मुख्य उद्देश्य किसी भी राष्ट्र से जनसंख्या के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक पक्षों को प्रभावित करना है। चूँकि मानवीय विकास एक बृहद् अवधारणा है अत: इसके अंतर्गत समाज के विभिन्न वर्गों व उनसे संबंधित मुद्दों को ध्यान में रखते हुए नीतियों एवं कार्यक्रमों का निर्माण किया जाता है।

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