एनजीओ (NGO) में खाते बनाना और वित्तीय विवरण तैयार करना

अनुक्रम
एन0 जी0 ओ0 में खाता बनाने और वित्तीय विवरण तैयार करने के लिये कुछ प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है जिसका हम यहॉ वर्णन कर रहे हैं ताकि आपको एन0 जी0 ओ0 में खाता बनाने और वित्तीय विवरण तैयार करने के लिये आवश्यकताओं को समझा सके। बैंक अकाउंट खोलने के लिए, एक व्यक्ति को कोई ऐसा बैंक चनु ना होता है। जो अच्छी सेवाएं प्रदान करता हो। तब उससे एक आवेदन पत्र ले लिया जाता है। संचालन समिति/ट्रस्टियों को चाहिए कि वे उस चुने हुए बैंक में बैंक खाता खोलने के लिए एक प्रस्ताव पास करें और यह निर्णय लें कि उसका संचालन कौन करेगा। यह सुझाव दिया जाता है कि इसके लिए दो व्यक्तियों को हस्ताक्षर करने के लिए प्राधिकृत किया जाए।यह आकउंट सोसायटी/ट्रस्ट के नाम खोला जाए, किसी एक व्यक्ति के नाम में नहीं। आवेदन पत्र को पूरी तरह से भरकर उस पर किसी मौजूदा अकाउंट होल्डर (खाता धारक) से परिचय-समर्थन प्राप्त कर लेना चाहिए। इस आवेदन पत्र को अकाउंट खोलने के लिए पास किए गए निर्णय की एक सत्य प्रति के साथ और साथ ही सोसायटी के बाईलाज/ट्रस्ट की ट्रस्टडीड की एक-एक प्रतिलिपि के साथ बैंक में खाता खोलने के लिए पेश करना चाहिए। बैंक में खाता खोलने के लिए निधार् िरत कम से कम रकम पे-इन-स्लिप के साथ बैंक में जमा कर दी जाए। बैंक अकाउंट (खाता) देगा, एक अकाउंट नम्बर दे देगा और एक पासबुक और एक चैकबुक जारी कर देगा। स्थानीय अंशदान और विदेशी अंशदान के लिए अलग-अलग बैंक अकाउंट खोले जाएं। जब भी बैंक में रकम जमा करानी हो, नकद चैक या ड्राफ्ट के जरिये, तो एक पे-इन-स्लिप भरनी चाहिए, उस पर अकाउंट नम्बर लिख दिया जाए और उसे बैंक में पेश कर दिया जाए। उसकी काउंटर फोयल पर बैंक से रसीद (पावती) प्राप्त करके उसे अपने रिकार्ड में सुरक्षित रख लेना चाहिए। चैक बुक किसी प्राधिकृत व्यक्ति की सुरक्षित निगरानी में रखी जाए। जहां तक हो सके, सिर्फ क्रास करके अकाउंटपेई चैक ही जारी किए जाएं (सिवाय सेल्फ चैक के)।

खाते बनाना 

एक ट्रस्ट/एसोसिएशन को अपने वित्तीय लेन-देन का रिकार्ड रखने के लिए खातों की उचित और नियमित पुस्तकें रखनी चाहिए। खाते डबल एंट्री सिस्टम से तैयार करने चाहिएं और नियमित रूप से एक ही लेखाकरण विधि को अपनाया जाना चाहिए, चाहे वह cash method हो या mercantile method।

कानूनी आवश्यकताएं : सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के अतर्गत सोसाइटियों का अकाउंट व्यवस्थित रखना चाहिए और वार्षिक रिटर्न राजिस्ट्रार आफ सोसाइटीज के कार्यालय में भेजनी चाहिए। वित्तीय विवरणों के फार्म और उनकी विषय वस्तु विनिर्दिष्ट नहीं है। भारतीय ट्रस्ट अधिनियम के अधीन ट्रस्टियों को निश्चित ही ट्रस्ट की सम्पत्ति के साफ और सही अकाउंट रखने होते हैं। उन्हें सभी उचित समयों पर लाभाविन्त व्यक्तियों के मांगने पर ट्रस्ट की सम्पत्ति की धनराशि और स्थिति के बारे में पूरी-पूरी और सही जानकारी देनी चाहिए। धर्मार्थ और धार्मिक ट्रस्ट अधिनियम के अधीन कोई भी व्यक्ति, किसी भी सार्वजनिक ट्रस्ट के मामले में ट्रस्ट के अकाउंट के ब्यौरे मांग सकता है। आयकर अधिनियम के अंतर्गत, चैरिटेबल संगठनों को छूट प्राप्त करने के लिए उचित अकाउंट व्यवस्थित रखने चाहिए और उनकी लेखा परीक्षा भी करा लेनी चाहिए।

लेखाकरण अवधि : लेखाकरण अवधि 12 महीने की अवधि की होती है, जो सामान्यतया एक वित्तीय वर्ष (पहले वर्ष की 1 अप्रैल से अगले वर्ष की 31 मार्च तक) की होती है जिसके लिए खाते बनाये जाने चाहिए। कुछ अपवादिक मामलों में (जैसे कि जब किसी संस्था की स्थापना वर्ष के दौरान की गई हो तो स्थापना के पहले वर्ष के लिए खाते तैयार करने के लिए) लेखाकरण अवधि बदल सकती है (अर्थात् यह 12 महीने से कम या ज्यादा भी हो सकती है)

खातों के प्रकार : मूल रूप से खाते तीन प्रकार के होंते है- वास्तविक (real), निजी (personal), और नामित (nominal)। वास्तविक खाते वस्तुओं से संबंधित होते हैं जैसे कि अचल परिसम्पत्तियां, माल, नगदी, बैंक आदि। देनदारों और लेनदारों आदि (debtors and creditors) के खाते निजी खाते कहे जाते है।ं नामित खातें में आय, व्यय, हानि और लाभ आते हैं।

लेखाकरण के मूल सिद्धान्त : निजी खाते: जो लेन-देन व्यक्तियों, व्यापारियों निकायों या अन्य संगठनों के साथ किये जाते हैं, उन्हें निजी खाते से संबंधित (transaction) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। निजी खातों के अंतर्गत कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के कुछ प्राप्त करता है या उसे देता है इस तरह के लेन-देन के लिए नियम यह है- प्राप्तकर्ता के नाम डालो और देने वाले के नाम जमा करो।

उदाहरण के तौर पर, अगर A ने B को कुछ रकम दी है। तो, A की पुस्तकों में B के नाम रकम डाली जाएगी। क्योंकि B प्राप्तकर्ता है, और B की पुस्तकों में A के नाम रकम डाली जाएगी क्योंकि A देने वाला है।

वास्तविक खाते: बाकी लेन-देन वास्तविक खातों में अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है। इसमें वे सभी लेन-देन शामिल होंगे, जो व्यापार में पावतियों को चाहे वे सम्पत्तियों, वस्तुओं या सेवाओं से की हों और व्यापार की सभी बहिर्गामी अदायगियों को दर्शाते हैं। वास्तविक खातों में लेन-देन दर्ज करने का मूल सिद्धान्त यह है- जो आया हो उसे नाम से दिखाओ और जो बाहर गया हो उसे जमा में दिखाओ ।

उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यापारिक संस्थान कुछ सामान खरीदता है तो यह सामान को प्राप्त करना दर्शाता है, और सामान खरीदने के नाम में दिखाया जाना चाहिए। जबकि, बिक्री यह दर्शाती है कि कुछ वस्तुएं और अन्य सामग्री स्टाक से बाहर गई हैं इसलिए बिक्री को व्यापार की पुस्तकें में जमा में दिखाया जाना चाहिए।

नामित खातें: व्यापार के जो लेन-देन खचर् करने या हानि से संबंधित हं,ै या आय अर्जित करने या लाभ से संबंधित हैं उन्हें नामित खातों के वर्ग में रखा जाता है। नामित खातों में लेन-देन करने का मूल सिद्धान्त यह है- सभी खर्चों और हानियों के नामों में डालों और सभी आय या लाभों को जमा में डालो । उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति अपने कर्मचारी को एक महीने के वेतन की अदायगी के तौर पर 500 रुपये खर्च करता है तो वह रकम व्यय दर्शाती है और इसे व्यापार खातों के नाम में दिखाना चाहिए। इसी तरह कमीशन प्राप्त होना ब्याज पाना आय को दर्शाता है, इसलिए इसे खातों के जमा में दिखाना चाहिए। इस तरह, लेखाकरण की डबल एंट्री प्रणाली के सिद्धान्त नीचे दिये गये हैं।

अकाउंट का प्रकार प्रकृति (Nature) नाम (Debit) जमा(Credit)
1. निजी (Personal)व्यक्ति/इकाइयां प्राप्तकर्ता दाता
2. वास्तविम (Real)परिसम्पत्तियां/देनदारियां जो प्राप्त हो जो बाहर जाए
3. नामित (Nominal) व्यय/आय Expenditure/Incomeसभी खर्च और हानियां सभी आय और लाभ

दृष्टांत 
XYZ ट्रस्ट में एक दिन निम्न घटनांए और लेन-देन हुए :-
  1. नकद 1,000 रुपये के छैब् खरीदे गए। 
  2. 2,000रु. नकद के शेयर बेचे गए। 
  3. ट्रस्ट के एक कर्मचारी श्री ।को नकद 500 रुपये बतौर वेतन दिय गए। 
  4. डिबेंचरों पर पा्र प्त ब्याज का 1,000 रुपये का चैक बैंक में जमा करा दिया गया। 
लेन देन लेखाकरण नियम लेखा प्रविष्टि रकम
1.(क) NSC खरीदने का अर्थ
NSC प्राप्त हुए

(ख) नकद रकम निकाली गई
क्योंकि नकद रकम से NSC खरीदे गये।
नाम डाले जो प्राप्त होता है।

जमा करें-जो निकासी हैं
नाम डालें में निवेश

जमा करें-नकदी
1,000रु

1,000रु
2.(क) नकद बिक्री का अर्थ हैं
नकदी प्राप्त हुई

(ख) बिक्री का अर्थ है शेयर
बाहर गए
नाम डालें जो प्राप्त होता है

जमा करें जो निकासी हो
नाम डालें में निवेश

जमा करें शेयर में निवेश
2,000रु

2,000रु
3.(क) वेतन ट्रस्ट का एक खर्च है

(ख) वेतन नकद दिया गया
अर्थात् नकद रकम निकाली
नाम डालें सभी खर्च और हानियां

जमा करें जो निकासी हो
नाम डालें वेतन में

जमा करें नकदी
500रु

500रु
4.(क) प्राप्त किया गया चैंक
बैंक में जमा कराया गया

(ख) डिबेंचर पर ब्याज एक आय
है
नाम डालें जो प्राप्त होता है

जमा करें सभी आय या लाभ
नाम डालें बैंक खाता

जमा करें ब्याज खाता
1,000रु

1,000रु

उपर्युक्त से यह पता लगता हैं कि हर एक लेन-देन के दो पहलू है। इस प्रकार हर नाम का एक बराबर जमा भी है। लेन-देन के क्रमानुसार लिखे गए इस नाम और जमा रिकार्ड को इन लेन-देन की प्रविष्टि कहा जाता है। नाम मूल्यों का योग हमेश जमा मूल्यों के जोड़ के बराबर होता है।

खाता 

खाता किसी मद या व्यक्ति या किसी आय का खर्च से संबंधित लेन-देन का एक औपचारिक प्रस्तुतीकरण है। खाता, आमतौर पर र्फाम में तैयार किया जाता है। जिसमें बाई तरफ के भाग के नाम भाग और दायें तरफ के भाग को जमा भाग कहा जाता है।

उपयुक्त खाता शीर्षक का चयन करना : एक ट्रस्ट कई मदों में और कई व्यक्तियों के साथ कार्य व्यापार करता है। इसको कई तरह के लेन-देन करने पड़ते हैं और कई तरह के खर्च करने पड़ते है। हालांकि हर एक लेन-देन का दर्ज करना पड़ता है, परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे उपयुक्त खाता शीर्षक के अंतर्गत दर्ज किया जाए। चूंकि ऐसा संभव और व्यवहार्य नहीं है कि हर एक लेन-देन के लिए एक अलग खाता खोला जाए, इसलिए कुछ चुने गए खाते खोलें जाएं और हर एक खाते से संबंधित लेन-देन को तत्संबंधित खाते में दर्ज कर दिया जाए। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति दो बिजली के बल्ब, एक साबुन, चार बाल प्वाइंट पैन और एक राइटिंग पैड खरीदता है तो हर एक मद के लिए एक अलग खाता खोलना उपयुक्त नहीं होगा। इसके बदले, एक ‘‘रख रखाव संबंधी खर्च खाता’’ खोला जाता है और उसमें बल्ब और साबुन के खर्च नाम कर दिये जाते है। इसी तरह बाल पांइट पैन आरै राइटिंग पैड दोनों को ‘‘प्रिटिंग और स्टेशनरी खर्च खाते’’ में डाला जाता है। अगले दिन यदि वह कुछ दस्तावेजों की फोटो कापियां करवाता है तो इस खर्च को भी ‘‘ प्रिटिंग और स्टेशनरी खर्च खाते’’ में नाम कर दिया जाए।

विभिन्न छोटे-छोटे खर्चों के लिए आमतौर पर ‘‘विविध खर्च खाता’’ या ‘‘ सामान्य खर्च खाता’’ नाम का एक अलग खाता खोल दिया जाता है। इस खाते में सिर्फ वही खर्च दर्ज किए जाएं जो कि बहुत छोटे-छोटे हों या कभी-कभी किए जाते हों, और वे मौजूदा किसी भी खाते के अंतर्गत वर्गीकृत न किए गए हों। उपयुक्त खाता शीर्षकों के अंतर्गत लेन-देन का वर्गीकरण सिर्फ वास्तविक और नामित खातों में संभव है। निजी खातों के मामले में हर एक व्यक्ति या पार्टी का, जिसके साथ कार्य व्यापार किया जाता है, एक अलग खाता होना चाहिए।

मुख्य लेखाकरण रिकार्ड 

हालांकि आम तौर पर सभी, ट्रस्ट/एसोसिएशन अपने आकार, प्रकार और क्रियाकलापों के आधार पर कैश बुक और लेजर रखते हैं, फिर भी, नीचे लिखी खाता-पुस्तकें आवश्यक समझी जाती हैं:-
  1. पेटी कैश बुक 
  2. मुख्य कैश बुक (सामान्यता बैंक कालम के साथ) 
  3. जनरल लेजन 
  4. जर्नल 
  5. विनिवेश 
  6. विनिवेश रजिस्टर 
  7. स्थायी परिसम्पति रजिस्टर 
  8. स्टाक (माल खाता) रजिस्टर 
ट्रस्ट/एसोसिएशन को विदेशी अंशदान सरकारी अनुदान, कुछ स्थानीय एजेंसियों से प्राप्त अनुदान और विदेशी एजेंसियों से प्राप्त अनुदान के संबंध में अलग-अलग खाता पुस्तकों के सेट रखने चाहिए। इस बारे में, निम्नलिखित रजिस्टर रखे जा सकते है’-
  1. कार्यपालक करने वाली एजेंसियों/अधिकारियों/वालंटीयरों को दिये जाने वाली ‘अग्रिम राशि’ का रजिस्टर।
  2. ग्राट-इन-एड अनुसार/योजना अनुसार रजिस्टर जिसमें योजना का विवरण, आरम्भ करने की तारीख समापन/अवधि समाप्ति की तारीख प्राप्त किए गए फंड, खर्च के स्वीकृत शीर्षों के अंतर्गत किए गए खर्च का ब्यौरा, तत्संबधी बजट आबटंन के साथ दिखाया गया हो।
  3. एक राजिस्टर जिसमें विभिन्न क्रियाकलापों/कार्यक्रमों/योजनाओं के लिए तत्संबंधित आबंटित बजट के प्रतिरूप किए गए खर्च आदि की प्रगति का पुनरीक्षण किया गया है। 
  4. स्थायी अग्रिम अकाउंट (पैटी कैश बुक और क्षतिपूर्ति वाउचर्स)। 
डबल एंट्री प्रणाली के अतंर्गत किसी लेन-देन को रिकार्ड करना सबसे पहले एक वाउचर से शुरू होता है। उसके बाद िराकर्ड की प्रमुख पुस्तकों में एक एंट्री की जाती है अर्थात् वह एंट्री जर्नल या कैश बुक में की जाती है। उसे लेजर में दर्ज किया जाता है और प्रत्येक खाते का शेष निकालकर वित्तीय विवरणों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रणाली के अंतर्गत जो मुख्य दस्तावेज और खाता पुस्तकें रखनी जरूरी है, उनके बारे में नीचे चर्चा की गई है’-

वाउचर 

यह बहुत जरूरी है कि खाता पुस्तकों में दर्ज किए गए हर एक लेन-देन के उचित समर्थन में लेनदेन को प्रमाणित करने वाला एक दस्तावेज होना चाहिए। इसे वाउचर का नाम दिया जाता है। अत: वाउचर उस लेन-देन को समर्थन देने वाला एक प्रमाणिक दस्तावेज है। ये दस्तावेज आन्तरिक और बाहरी कोई भी हो सकता है। ट्रस्ट/सोसाइटी के संबंध में यह सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है कि:
  1. सभी खर्चों ाके प्राधिकृत किया गया हो और उन्हें जांच लिया गया है। 
  2. किसी भी धोखाधड़ी, गलती या गलत प्रयेग से बचने के लिए आवश्यक बचाव के तरीके अपनाए जाने चाहिए 
  3. एक दक्ष लेखाकरण संचालन प्रक्रिया को अपनाया जाना चाहिए। इन सभी के लिए वाउचर प्रणाली के द्वारा उपयुक्त रिकॉड रखे जाने चाहिए। 
एक वाउचर किसी लेन-देन का एक लिखित प्राधिकरण है, उसका लेखाकरण रिकार्ड है। और उसकी अदायगी आदि का साबूत है।

अदायगी : इन वाउचरों का प्रयोग सभी अदायगियों और अन्य नकद भुगतान किये गए खर्चों के लिए किया जाता है। खर्चों के मामले में जहां तक हो सकें, उन खर्चों के समर्थन में कैश मैमो या बिल आदि भी नत्थी कर दिये जाने चाहिए।

बैंक वाउचर : कभी-कभी बैंक आदयगी का रिकार्ड रखने के लिए एक अलग वाउचर डाला जाता है। बैंक अदायगी के वाउचर का फार्म भी वैसा ही होता है। जसै ा कि नकद अदायगी का वाउचर होता है। लेकिन जिस बैंक के माध्यम से भुगतान किया गया, उस बैंक का नाम, चैक नम्बर और तारीख संबंधी जानकारी भी उस वाउचर में दी जानी चाहिए।

रसीद : यह वाउचर सभी तरह की रकम की प्राप्तियों का रिकार्ड रखने के लिए तैयार किया जाता है। चाहे वह नकद हो या चैक द्वारा प्राप्त हो, और वे चाहे किसी भी खाते के हों। कभी-कभी कैश बुक में दर्ज करने के लिए भुगतान कर्त्ता को दी गई रसीद की एक अतिरिक्त प्रतिलिपि वाउचर के तौर पर इस्तेमाल में लाई जाती है। अदायगी और रसीद वाउचरों के नमूने नीचे दिये गये हैं:-

अदायगी वाउचरों के नमूने 
अदायगी वाउचरों के नमूने

रसीद वाउचरों के नमूने 
रसीद वाउचरों के नमूने


कैश बुक : कैश बुक सभी पावतियों और अदायगियों का एक रिकार्ड होता है, और इसे दैनिक आधार पर तैयार किया जाता है, और इसमें हर रोज के अन्त में या किसी निर्धारित अवधि के अन्त में (जो कि एक महीने के अवधि से अधिक न हो) उपलब्ध कैश शेष दिखाया जाता है। कैश बुक में सभी नकद लेन-देन का रिकार्ड रखा जाता है। कैश बुक को सामान्यतया दो भागों में बांटा जाता है।
  • बाई तरफ के भाग में दिन प्रतिदिन के आधार पर सभी नकद पावतियों को रिकार्ड किया जाता हैं चाहे वह ट्रस्ट द्वारा प्राप्त किए गए ऋण, या आय या सदस्यों का चंदा हों। 
  • दाये तरफ का भाग में सभी तरह की अदायगियां रिकार्ड की जाती है। चाहे वे खर्च के लिए की गई अदायगियां हो या ऋण की वापसी हो या ट्रस्टियों द्वारा निकाला गया फंड हो।
  • दिन के अन्त में पिछले बकाया कैश सहित पावती भाग का कुल योग अदायगी भाग के योग में अधिक होता है और उन दोनों में जो अन्तर होता है वह अन्तिम बकाया रकम होता है। 
कैश बुक का नमूना नीचे दिया गया हैं और इसमें दृष्टान्त भी दिया गया है जिसमें कैश बुक में रिकार्ड किए गए लेन-देन रिकार्ड किए गए हैं।
दृष्टान्त
1.8.2009 X,Y और Z सदस्यों ने अपना वार्षिक चन्दा
1000 रुपये प्रति व्यक्ति जमा कराया
2.8.2009 दवाइयां खरीदी गई-600 रुपये नकद
3.8.2009 दान प्राप्त हुआ-800 नकद रुपये
4.8.2009 पिछले महीने का वेतन दिया गया, 2000 रुपये
5.8.2009 बिजली का बिल प्राप्त हुआ- 1500 रुपये
6.8.2009 सरकारी अनुदान चैक द्वारा प्राप्त हुआ- 30,000 रुपये

कैश बुक

कैश बुक


टिप्पणी : 5 तरीख को बिजली के बिल की प्रति और6 तरीख को चैक द्वारा अनुदान को कैश बुक में नहीं दिखाया जाएगा, लेकिन जब बिल की अदायगी हो जाएगी और चैक बैंक में जमा करा दिया जाएगा तो इनकी एंट्री कैशबुक में कर दी जाएगी। 

कैश बुका का फार्म सामान्यतया उपरोक्त जैसा ही होता है। परन्तु कहीं-कहीं कैश बुक में कुछ प्रचलित भिन्नताएं पाई जाती है इनको नीचे स्पष्ट किया गया है।

पैटी कैश बुक: मुख्य कैश बुक के अतिरिक्त शाखा कार्यालय, विक्रय कार्यालय आदि में एक पैटी कैश बुक भी रखी जाती है। जिसमें बार-बार होने वाली छोटी पावतियां और अदायगियों को रिकार्ड किया जाता है। पैटी कैश बुक की पावतियां और अदायगियों का मासिक या एक अवधि का सार मुख्य कैशबुक में रिकार्ड कर दिया जाता है। पैटी कैश बुक का एक नमूना दिया गया है। इसे आम तौर पर कालमों के आधार पर तैयार किया जाता है। विभिन्न प्रकार की अदायगियों के अलग-अलग कालम होते हैं।

पैटी कैश बुक का एक नमूना
दिनांकपावतियांविवरणकुल रकमकिराया और
भाड़ा
प्रिटिग और
स्टेशनी
अन्य
रु. पैं.रु. पैं.रु. पैं.रु. पैं.रु. पैं.

खर्च के कालम व्यापार की जरूरत के मुताबिक उपयुक्त रूप से बदले जा सकते हैं।

जर्नल 

एक जर्नल को ‘मूल एंट्रियों की बुक’ भी कहा जाता है, और जहां खाते मर्केटाइल आधार पर रखे जाते हं,ै वहां जर्नल रखना अनिवार्य है। जर्नल में दी गई एट्री एक औपचाारिक रिकार्ड होता है और यह उस लेन-देन को तत्संबंधी लेजन खाते में दर्ज करने की भी प्राधिकृत करता है। लेजर खाते में कोई भी डेबिट या क्रेडिट तब तक दर्ज नहीं किया जा सकता जब तक कि उस लेन-देन की पूरी एंट्री पहले जर्नल में रिकार्ड न कर दी गई हो। जर्नल का समीकरण करने की जरूरत नहीं है क्योंकि सभी डेबिट का योग हमेशा सभी क्रेडिट के योग के बराबर होता है। एक जर्नल का नमूना नीचे दिया गया है:-

जर्नल का नमूना दिनांक विवरण लेजर पृ.सं. डेबिट रकम क्रेडिट रकम रु. पैं. रु. पैं. एक जर्नल में लेन-देन को दर्ज करते समय निम्नलिखित मुद्दों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए:
  • हर एक लेन-देन के लिए पहले कालम में तारीख के साथ महीना और वर्ष भी लिख दिया जाए। 
  • विवरण के कालम में खाते का नाम लिखा जाए जिसमें डेबिट करना है यह नाम तारीख के कालम के बिल्कुल पास लिखा जाए और रकम डेबिट रकम को कालम में लिखी जाए। 
  • जिस खाते में क्रेडिट करना हो उसका नाम सीधे डेबिट अकाउंट के नीचे लिखा जाए, लेकिन आधा इंच या एक इंच दाए और लिखा जाए ताकि यह पता लगे कि यह डेबिट से अलग है, और रकमे क्रेडिट कालम में लिख दी जाए। 
  • जर्नल में दी गई एंट्रियों के बीच में लाइन खाली छोड़ दी जाए ताकि दो अलग-अलग लेन-देनों को साफ-साफ देखा जा सके। जर्नल में एंट्री रिकार्ड के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए अनुच्छेद खाते लिखने की प्रक्रिया खाता पुस्तक देखें। 

लेजर 

लेजर मुख्य खाता पुस्तक है। इसमें लेन-देन और अन्य कार्य व्यापार को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है और सार रूप में लिखा जाता है। तात्पर्य यह है कि विभिन्न प्रकार के खर्चों से संबंधित सभी लेन-देन विभिन्न खातों में रिकार्ड किए जाएं ताकि वह विशेष प्रकार के खर्च एक ही जगह पर दिखाई दें। लेजर में जो एंट्रियां की जाती हैं उनका मूल आधार कैश बुक आरै जर्नल होता है। एक लेजर अकाउंट या तो में T- form तैयार किया जाता है या नीचे दिये गए प्रारूप में तैयार किया जाता है।

लेजर का नमूना
दिनांक विवरणपृ.सं. डेबिट रकम क्रेडिट रकम शेष रकम
रु. पैं. रु. पैं. Dr. or
Cr.रु. पैं.

आरम्भिक एंट्रियां: लेखाकरण वर्ष के सामाप्ति पर, खाता पुस्तकों में अन्तिम एंट्री कर के बंद कर दी जाती है। अगले वर्ष के लिए खाता पुस्ताकों का एक नया सैट तैयार किया जाता है। वर्ष के प्रारम्भिक दिन ट्रस्ट को अपने जर्नल में प्रारम्भिक एंट्री दर्ज कर देनी चाहिए। इस तरह वे पिछले वर्ष की किताबों से नए वर्ष की किताबों में विभिन्न खातों के जो प्रारम्भिक शेष आन्तरित करते हैं, उन्हें रिकार्ड किया जाता है।

        बुक्स में की गई प्रारम्भिक एंट्री सामान्यतया इस प्रकार दिखाई जाती है: 
        उपलब्ध नकदी (Cash in hand A/C)         Dr.         1,5000
         बैंक में नकदी (Cash in hand A/C)         Dr.         1,5000 
        निवेश A/C Dr. 1,5000 फर्नीचर A/C         Dr.         1,5000 
        मोटर कार A/C         Dr.                 1,5000 
        To देय खर्च A/C                 4,100 
        To बैंक ओवर ड्राफ्टA/C                 20,800 
        To कार्पस फंड A/C                 23,700
        (ये परिसंपत्तियों और देनदारियों के प्रारम्भिक शेष हैं जिन्हें पिछले खाता पुस्तकों सें आगे लिया गया है।

लेजर खाता 

खाता एक औपचाारिक प्रस्तुतीकरण है जिसमें किसी एक मद या व्यक्ति या आया या व्यय संबंधी लेन-देन दर्शाया जाता है। खाता आम तौर पर ‘ज्श् फार्म में तैयार किया जाता है। इसमें बाई तरफ के भाग को डेबिट भाग कहा जाता है और दाई तरफ के भाग को क्रेडिट भाग कहा जाता है। सभी खाते (सिवाय कैश या बैंक के, जो कैश बुक में रखे जाते हैं) इस अंतरण प्रक्रिया को पोस्ंिटग कहा गया है।

लेजर में ऐंट्री : मूल लेखा पुस्तकों में रिकार्ड किए गए सभी लेन-देन की डेबिट तथा क्रेडिट रकमों को लेजर के उपयुक्त लेखों में अंतरित कर दिया जाता है। इस अंतरण प्रक्रिया को पोस्टिंग कहा जाता है।

लेजर का शेष निकालना: जब किसी खाते में संबंधित लेन-देन रिकार्ड कर दिये जाते है। तो आवश्यक हो जाता है कि अन्तिम स्थिति का पता लगाया जाए। उदाहरण के लिए अगर कोई एक व्यक्ति अनेक परिणामों (संख्याओं) में कुछ सामान सप्लाई करता है, और इसी तरह अदायगियां भी अनेक बार की जाती है तो यह पता लगाना जरूरी हो जाता है कि किसी एक समय पर उसे कितनी रकम देय है या उससे वापिस ली जानी है। यह उस खाते के समीकरण की मदद से ही किया जाता है। समीकरण प्रतिदिन, सप्ताह,तिमाही,वार्षिक, किसी भी समय कारोबार की जरूरत के मुताबिक किया जा सकता है।

किसी एक खाते के एक तरफ के भाग की गई एंट्रियों का कुल योग अगर उस खाते के दूसरी तरफ के भाग में की गई एंट्रियों के कुल योग से अधिक हो तो उस अधिक राशि को उस खाते का शेष कहते है। अगर डेबिट भाग क्रेडिट भाग से अधिक हो तो वह डेबिट बंलै ेस दर्शाता हैं और अगर क्रेडिट भाग डेबिट भाग हो तो क्रेडिट बंलै ेस दर्शाता है।

डेबिट बैलेंस का अर्थ है: 
  1. निजी खातों में मामले में तात्पर्य है कि उस व्यक्ति ने वह रकम ट्रस्ट को देनी है। 
  2. वास्तविक खातों के मामले में तात्पर्य है कि ट्रस्ट कुछ सम्पत्ति का मालिक है। 
  3. नामित खातों के मामलों में तात्पर्य है कि ट्रस्ट से कुछ रकम की हानि हुई है या ट्रस्ट ने कुछ खर्च किया है। 
क्रेडिट बैंलेस का अर्थ 
  1. निजी खातों के मामले में ट्रस्ट ने वह रकम उस व्यक्ति को देनी है। 
  2. वास्तविक खातों के मामले में ट्रस्ट ने उतनी सम्पत्ति छोड़ दी है, और 
  3. नामित, खातों के मामले में ट्रस्ट ने कुछ आय अर्जित की है। 
लेजर में सभी खातों के बंलै ेस एक निधार् िरत अवधि पर निश्चित कर लिये जाते हैं आरै उन्हें बैंलेंस कालम में लिख दिया जाता है साथ ही यथानुसार क्रेडिट या डेबिट भी लिख दिया जाता है। बैंक सामाधान विवरण : सैद्धान्तिक रूप से कहा जाए तो बैंक खाते का शेष (या कैश बुक के बैंक कालम का शेष) एक विशेष तारीख के दिन बैंक द्वारा बनाए गए ग्राहक के खाते के शेष से बैक पास बुक/विवरण के मुताबिक, मेल खाना चाहिए। परन्तु कई बार ये आपस में मेल नहीं खाते अगर कोइ्र गलती न भी हो तो भी अन्तर आ ही जाता है। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते है।
  1. चैक प्राप्त हो जाते हैं और उन्हें बैंक अगाउंट में दर्ज भी कर दिया जाता है परन्तु उन्हें रकम वसूली के लिए बैंक नहीं भेजा जाता। इस मामले में लेजर के मुताबिक बैंक बैलेंस, बैंक के विवरण के मुताबिक बनाए गए बैलेंस से अधिक होगा।
  2. चैक जारी कर दिया जाते हैं आरै बैंक अकाउंट में दर्ज भी कर दिये जाते है परन्तु उन्हें रकम वसूली के लिए बैंक में पेश नहीं किया जाता ह। इस मामले में लेजर में जो बैंक बलै ेस होगा वह बैंक के विवरण के बैलेंस से कम होगा।
  3. ब्याज बैंक द्वारा क्रेडिट कर दिया जाता है। लेकिन उसे लेखा पुस्तकों में रिकार्ड में नहीं किया जाता बैंक खातों की यथार्थता और सही-सही होने की जांच करने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि बैंक वलै ेंस बैंक के विवरण से मेल खाता हैं इसलिए एक बैंक समाधान विवरण तैयार किया जाता है। ताकि अन्तर के कारणों का पता लगाया जा सके। अत: बैंक समाधान विवरण तैयार करना एक महत्वपूर्ण नियंत्रण की तकनीक है। 
बैंक समाधन विवरण तयै ार करने की तकनीक बहतु आसान है। कैश बुक या पास बुक के बैलेंस से शुरू करें और फिर यह देखें कि दूसरी किताबों में क्या किया गया हैं और क्या नहीं किया गया है। अत: अगर कोई व्यक्ति कैश बुक के बैलेंस से शुरू करता हैं तो उसे पास बुक की एंट्रीज के साथ उनका मिलान करना होता है। बैंक समाधान विवरण का नमूना नीचे दिया गया है

बैंक समाधान विवरण दिनांक 31..............................................20......................................................को कैश बुक के मुताबिक बैलेंस 

जोडे़   चैक जारी किए गए लेकिन वसूली के बैंक में पेश नहीं किए 
          गए- चैक नं. दिनांक पार्टी         रकम ............... ............... 


जोडे़   ब्याज जो पास बुक में क्रेडिट कर दिया गया
           पर कैश बुक में रिकार्ड नहीं किया गया         .............. .............. 

घटायें   चैक प्राप्त हुए और बैंक में जमा कर दिये गए पर उनकी निकासी नहीं हुई 
          चेक नं. दिनांक पार्टी रकम         ............. ............... 

घटायें   बैंक शुल्क जो पास बुक में डेबिट कर दिया गया परन्तु उसे 
            कैश बुक में रिकार्ड नहीं किया गया।         .................. ................. 


पास बुक के मुताबिक बैलेंस         ...................


वित्तीय विवरण तैयार करना 

किसी ट्रस्ट/एसोसिएशन की खाता पुस्तकों में निम्नलिखित वित्तीय विवरण तैयार की जाती है। यह विवरण आमतौर पर हर एक वित्तीय वर्ष के अन्त में नियमित रूप से तैयार की जाती है।

1. ट्रायल बैलेंस- ट्रायल बैलेंस डेबिट और क्रेडिट बैलेंसों की सूची होती है। इस मुख्य कैश बुक और लेजर से एक निर्दिष्ट समय पर तैयार किया जाता है। क्योंकि डबल एंट्री प्रणाली के अंतर्गत हर एक डेबिट का तत्संबंधी एक क्रेडिट होता है। इसलिए ट्रायल बैलेंस के डेबिट को योग क्रेडिट के योग के बराबरा होना चाहिए। अगर दोनों के योग मेल खा जाते हैं तो प्रत्यक्ष रूप से यह सिद्ध हो जाता है। कि किताबें गणित की दृष्टि से सहीं हैं। हालांकि यह यथार्थता का अन्तिम प्रमाण नहीं है। अगर ट्रायल बैलेंस मेल नहीं खाता तो भूल-चूक को ढूंढना पडे़गा।

2. आय और व्यय खाता: आय और व्यय खाता संबंधित अवधि की आय और खर्च का सार होता है। इसमें मूल हास और बकाया का प्रावधान भी होता है। पिछले वर्ष या आगामी वर्षों संबंधी मदों पर इसमें विचार नहीं किया जाता है। इसमें सिर्फ गैर-पूंजीगत मदों को ही ध्यान में रखा जाता है। इसमें कोई पूंजीगत लेन-देन नहीं दिखाए जाते है। खर्च को डेबिट भाग में रिकार्ड किया जाता है। आय को क्रेडिट भाग में दिखाया जाता है। इसमें होना प्रकट करता है आय और व्यय खातें में यदि कोई अधिशेष घाटा तो उसे बैलेंस शीट में अन्तरित कर दिया जाता है और पूंजी निवेश फंड में समायोजित कर लिया जाता है।

3. बैलेंस शीट- बैलेंस शीट में संगठन की वित्तीय स्थिति की झलक मिलती है इसमें परिसम्पत्तियां देनदारियों और उसका निवल धन (कार्पस फंड अन्य फंड, रिजर्व और सरप्लस) प्रकट होते है। बैलेंस शीट पावतियों और अदायगियों के खाते और आय व्यय के खाते के आधार पर तैयार की जाती है। पावतियों और अदायगियों के खातें आय और व्यय खाता और बैलेंस शीट के नमूने नीचे दिए गये है।

पावतियों और अदायगियों का खाता 
पावतियां                       श्रकम            अदायगिया            श्रकम 
To आरिम्भक शेष                       By खर्चे            
To सदस्यों का चन्दा                       By पूंजीगत खर्च            
To आदान                       By निवेश            
To आय                       By ऋण और अग्रिम            
To सरकारी अनुदान                      By अन्तिम शेष            
To ऋण और अग्रिम                       
To निवेश की बिक्री या वसूली                    

आय और व्यय खाता 
आय                   श्रकम आय                   रकम 
To आय संबंधी व्यय (इसमें देय खर्च शामिल हैं              By सदस्यों का चन्दा 
परन्तु पूर्वदत्त खर्च शामिल नहीं है) 
To परिसम्पत्तियों/निवेश की बिक्री पर घाटा                   By आदान या सरकारी अनुदान (कार्पस फंड अन्य                                                                                                                                विशिष्ट फंड में दिये गये 
                                                                                  दान के अतिरिक्त) 
To मूल्य हृास                                                              By आय (इसमें प्राप्त होने 
                                                                                   वाली आय शामिल हैं परन्तु पूर्व 
                                                                                   प्राप्त आय शामिल नहीं हैं 
To खर्च से अधिक आय की राशि जो बैलेंस शीट            By परिसम्पत्तियों/निवेश की बिक्री पर लाभ
                                                                                  को आन्तरित कर दी गई है। 
                                                                                 By आय से अधिक खर्च की राशि जो बैलेंस शीट को 
                                                                                 अन्तरित कर दी गई हैं

बैलेंस शीट 
देनदारियां                   रकम परिसम्पत्तियां                   रकम 
कार्पस फंड अन्य विशिष्ट/प्रोजेक्ट                     अचल परिसम्पत्तियां जमा 
 फंड                                                               राशि, ऋण और 
                                                                       अग्रिम विविध देनदार

                                                        
खर्च से अधिक आय की राशि                         माल बाकी पूर्वदत्त
                                                                    कैश और बैंक
विविध देनदान  ऋण 
और अग्रिम देय खर्चें                                       बैलेंस                                                                     
                                                                    आय से अधिक खर्च की राशि


पावतियों और अदायगियों के खाते से आय और व्यय खाता तैयार करने के विभिन्न चरण 

  1. पावतियों और अदायगियों के खाते से प्रारम्भिक और अन्तिम कैश/बैंक इतिशेषों को छोड़ दे। 
  2. पावतियों और अदायगियों के खाते में पंजीगत प्रकार की सभी मदें छोड़ दें। 
  3. पिछले वर्ष या आगामी वर्ष की आय और व्यय यदि कोई हो, तो उसे अवश्य निकाल दिया जाए। 
  4. मूल्य हृास, बट्टे खाते की रकम आदि को, जिसकी अदायगी नकद नहीं की जाती केवल आय और व्यय में ही लेने चाहिए। 
  5. पावतियों और अदायगियों के अकाउंट में दर्शाई गई पूंजीगत प्रकार की सभी मदों को, जिन्हें आय और व्यय में खाते में नहीं दिखाया गया है, बैलेंस शीट में दिखाया जाना चाहिए। 

आय और व्यय से संबंधित विशेष मदों का विवेचन 

प्रवेश शुल्क अगर प्रेवश शुल्क की रकम कम हो तो इसे आय माना जा सकता है।आम तौर पर स्कूल और कालेजों के मामले में, प्रेवश शुल्क या दाखिले फीस को आय माना जा सकता है। क्लब और मामले में भी प्रवेश शुल्क को आय माना जा सकता है। क्योंकि कई सदस्यगण प्रतिवर्ष पव्र ेश पाते हैं और कई सदस्यता छोड़ जाते हैं। परन्तु सामान्यतया, क्लबों के मामले में इसे पूंजीगत धन में जमा किया जाता है, क्योंकि कुछ विशिष्ट संख्या में ही सदस्यों को प्रवेश मिलता है, और सदस्यता भी प्रतिबन्धित होती है।प्रयोग में लाए गए खेलकूद का सामान और समाचार पत्र की बिक्री-इन्हें आय माना जाना चाहिए।

आजीवन सदस्यता- यह शुल्क बार-बार प्राप्त नहीं होता। इस रकम को पूंजीगत फंड में जमा किया जाना चाहिए, क्योंकि सदस्य क्लब की सेवाओं का लाभ पूरे जीवन भर तक के लिए प्राप्त कर सकेगा।

वसीयत संपदा- वसीयत संपदा की रकम, सामान्यतया, पूंजीगत धन में जमा की जाती है, क्योंकि यह आवर्ती नहीं है (अर्थात बार-बार प्राप्त नहीं होती रहती)। फिर भी ऐसी छोटी रकमों को आय माना जा सकता है।

पुरानी परिसम्पत्तियों की बिक्री - इससे होने वाले किसी भी लाभ या हानि को आय और व्यय खाते में दियाखा जाता है।

दृष्टांत :एक स्पोर्ट्स क्लब के 31 मार्च 2009 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए पावतियों और अदायगियों का खाता नीचे दिया गया है।

पावतियांरु.रु.
 To आजीवन सदस्यता3,000 By टूर्नामेट1,800
 To प्रवेश शुल्क5,000 By फर्नीचर 4,200
 To टूर्नामेंट शुल्क20,000 By  ठल भवन 80,000
 To आदान1,00,0000 By वेतन3,600
 To चन्दा प्राप्ति6,400 By क्रिकेट पर खर्च 2,280
 To ब्याज 400 By बीमा 720
 To अन्य प्राप्तियां  2,000 By बागवानी 340

 By मुद्रण (प्रिटिंग) 560 
 By विविध खर्च 300
  By बैलेंस c/d 36,000
    7,0000
 1,36,800    1,36,800

अनुसूचियां 

वित्तीय विवरण सिर्फ सार होते हैं और इनके समर्थन में विस्तृत जानकारी अनुसूचियों के रूप में या अन्य विवरणों में दी जाती हैं जहां कहीं भी आवश्यक हों।
  1. परिसम्पत्तियों की अनुसूची , इसमें वर्ष के दौरान अधिग्रहीत की गई परिसम्पत्तियों और वर्ष के दौरान मूल्य हृास को भी शामिल किया जाता है। 
  2. ग्रांट/सबसिडी और विशेष शीर्षों के अंतर्गत प्राप्त आय की अनुसूची, इसमें विदेशी अंशदान भी शामिल होता है और हर एक शीष्र के अतंर्गत किया गया खर्च भी दिखाया जाता है।
  3. बैंक में रखे गए फंड पर अर्जित ब्याज की अनुसूची 
  4. प्रतिष्ठान खर्चों की अनुसूची 
  5. अन्य प्रशासनिक खर्चों की अनुसूची। 

विधिक पुस्तकें 

सोसाइटीज राजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1860 के अधीन रजिस्टर्ड सोसाइटियों को निम्नलिखित दो विधिक पुस्तकें तैयार करनी होती है।
  1. मिनट्स बुक : मिनट्स बुक में आम बैठकों संचालन समिति की बैठकों और अन्य बोर्ड या कार्यकारी परिषदों की बैठकों की कार्यवाहियों का सार होता है। विभिन्न निकायों की बैठकों की कार्यवाहियों को अलग-अलग मिनट्स बुक में रिकार्ड करना चाहिए। विस्तृत जानकारी के लिए अध्याय मिनट्स देखें।
  2. सदस्यता रजिस्टर : सदस्यता रजिस्टर के हर एक सस्दय के प्रवेश की तारीख, नाम, कारोबार, सदस्यता से हटाने की तारीख आदि संबंधित विस्तृत जानकारी दी जाती है

सरकारी अनुदानों के लिए लेखाकरण 

अनुदान निम्नलिखित रूप में प्राप्त हो सकते है:
  1. प्रवर्तकों के अंशदान के रूप में 
  2. किसी खास परिसम्पत्तिय का अधिग्रहण करने के लिए पूंजीगत ग्रांट-इन-एड के रूप में 
  3. गैर-मौद्रिक परिसम्पत्तियों के रूप में पूंजीगत ग्रांट के रूप में 
  4. कुछ खास खर्चों को पूरा करने के लिए गैर-पूंजीगत ग्रांट के रूप में 
  5. सामान्य गैर-पूंजीगत ग्रांट के रूप में। अनुदानों का विमोचन खास उद्देश्यों के लिए या कुछ खास कार्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है और ऐसे अनुदानों के विमोचन के साथ कुछ शर्तें भी जुड़ी हुई शर्तों को अनुकूलता से परिचालन करने में सक्षम हो और उसे अन्तत: प्राप्त कर पाना निश्चित हो। 
  • सामान्यतया ग्रांट-इन-एड को उपार्जन के आधार पर अर्थात् उसकी वास्तविक प्राप्ति का इंतजार किये बिना, खातों में लिख लेना चाहिए। 
  • अगर ग्रांट प्रवर्तकों के अंशदान के रूप में प्राप्त होती है, तो इसे बैलेंस शीट में कैपिटल रिजर्व के तौर पर दिखाया जाएगा। जब इसे वापस करना हो या वास्तव में वापिस कर दिया गया हो, तो इसे कैपिटल रिजर्व से कम करके दिखाया जाएगा। 
  • गैर-मौद्रिक परिसम्पत्ति (पूरी या भाग में) के रूप में ग्रांट को उसकी नामित मूल्य पर दिखाया जाएगा और अगर उसके एक भाग की अदायगी की गई है तो उस रकम को भुगतान दिखाया जाएगा। 
  • अगर वह सामान्य उद्देश्य की ग्रांट के रूप में प्राप्त हुई हो, तो इसे आय के रूप में दिखाया जाएगा। 
  • रकम वापसी : अगर कोई रकम शर्ते पूरी न करने के कारण या किसी अन्य कारण से वापस करनी हो या वापस कर दी गई हो, तो वह रकम संबंधित ग्रांट के शेष में से घटा कर दिखाई जाएगी।

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