एन0 जी0 ओ0 में परियोजना प्रबन्धन

अनुक्रम
किसी एन0 जी0 ओ0 में परियोजना प्रबन्धन का खास महत्व होता है क्योंकि यही वह माध्यम होता है जिसके द्वारा किसी परियोजना को कार्यान्वित किया जाता है।सरकार अथवा अन्य साधनों से प्राप्त अनुदान द्वारा जनता के हित में ये गैर सरकारी संगठन कार्य करते है और इसका समस्त ब्यौरा सम्बन्धित अनुदानित संस्था को अनुदान देने वाले निकाय को सौपना पड़ता है। इस परिपेक्ष् में प्रस्तुत अध्याय एक प्रयास है कि आपको यह बताया जा सके कि एन0 जी0 ओ0 में परियोजना प्रबन्धन का क्या महत्व है व यह किस प्रकार से सुव्यवस्थित रूप से संचालित की जाती है।

प्रबन्ध अवधारणा 

प्रबंध की अवधारणा को स्पष्ट करने हेतु कुछ व्यापक उपयोगी परिभाषाएँ हैं जो कि निम्नलिखित है - हेराल्ड कून्स्ज के अनुसार “पब्रध औपचारिक रूप से संगठित समूहों में लोगों के माध्यम से और उनसे कार्य करवाने की कला है। यह ऐसी कला है जिसमें लोग व्यक्तिगत रूप से अलग-अलग कार्य करते हुए सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सहयोग करते हैं । साथ ही यह ऐसी कला है जो कार्य निष्पादन में आने वाली बाधाओं को हटाते हुए, लक्ष्यों तक पहुँचने में दक्षता का इष्टतम प्रयोग करना सीखती है।” पीटर ड्रकर के अनुसार “प्रबंध एक बहु-प्रयोजनीय अंग है जो व्यापार का प्रबंध करता है, प्रबंधक का प्रबंध करता है और कामगार तथा कार्य का प्रबंध करता है। “स्टोनर एवं वेंकेल ने प्रबन्ध की परिभाषा इस प्रकार की है, “यह संगठन के सदस्यों के प्रयासों की योजना बनाने, उन्हें संगठित करने, उनका नेतृत्व करने और नियंत्रित करने तथा निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सभी अन्य संगठनात्मक संसाधनों का उपयोग करने की प्रक्रिया है। “उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्रबंध एक कला है यद्यपि बहुत से लोगों का इस बात पर बल है कि इसमें विज्ञान का तत्व भी शामिल है।

परियोजना प्रबन्धन 

परियोजना प्रबन्ध संस्थान (यू.एस.ए.) ने परियोजना प्रबन्ध को परिभाषित करते हुए बताया कि यह एक ऐसा प्रयत्न है जो कि विशेष उत्पाद या सेवाओं का सृजन करना है । यह विशिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु मानवीय एवं गैर मानवीय संसाधनों को प्रयुक्त करने का विशिष्ट तरीका है । किसी परियोजना के निम्न तत्व होते हैं :-
  1. उद्देश्य एवं उपयोगिता 
  2. इससे जुड़े कार्यकलाप
  3. समयावधि 
  4. उसमें लगने वाली लागत 

परियोजना प्रबन्ध की संकलपनाएँ 

परियोजना प्रबन्ध से सम्बन्धित ज्ञान के क्षेत्र में 9 निकायों की पहचान परियोजना प्रबन्ध संस्थान द्वारा की गयी है। ये हैं :-
  1. स्वीकृत प्रबन्धन 
  2. अवसर प्रबन्धन 
  3. समय प्रबन्धन 
  4. लागत प्रबन्धन 
  5. गुणवत्त्ाा प्रबन्धन 
  6. जोखिम प्रबन्धन 
  7. मानव संसाधन प्रबन्धन 
  8. संचार प्रबन्धन 
  9. उपलब्धि प्रबन्धन 

परियोजना प्रबन्ध की प्रक्रिया 

परियोजना प्रबन्ध प्रक्रिया के तहत किसी परियोजना के विस्तार से लेकर उसकी समाप्ति तक अपनायी जाने वाली समस्त चरण एवं गतिविधियाँ इसका हिस्सा होती हैं । परियोजना में अपनायी जाने वाली विभिन्न प्रक्रियाएँ निम्न हैं :-
  1. शुरूआती प्रक्रिया
  2. नियोजन की प्रक्रिया 
  3. निष्पादन की प्रक्रिया 
  4. नियन्त्रणकारी प्रक्रिया 
  5. समापन की प्रक्रिया 

प्रबन्ध प्रक्रिया 

प्रबंध प्रक्रिया के मुख्य कार्य जिसका उल्लेख लूथर एच. गुलिक ने किया निम्न हैं :-
  1. योजना बनाना 
  2. संगठित करना 
  3. स्टॉफ की व्यवस्था करना 
  4. निर्देश देना
  5. नियंत्रण करना
  6. समन्वयन करना 
  7. रिपोर्ट तैयार करना 
  8. बजट बनाना 
1) योजना बनाना :-इच्छित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु तथा इसकी प्रप्ति के लिए दिशा का निर्धारण इसके अन्तर्गत किया जाता है ।

2) संगठित करना :- इसके अन्तर्गत निम्नलिखित को समाहित किया जाता है :-
  • उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक क्रियाओं का निर्धारण 
  •  कार्यकलाप समूहों का गठन 
  • प्रबन्धन एवं कार्यकलाप समूहों के बीच समन्वयन 
3) स्टॉफ की व्यवस्था करना :- प्रबन्धकीय और गैर-प्रबन्धकीय स्तर पर स्टॉफ की नियुक्ति करना महत्वपूर्ण प्रकार्य है । इसमें ध्यान रखने योग्य है कि नियुक्ति करते समय लोगों की तकनीकी और क्रियात्मक सामथ्र्य के साथ ही उनकी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को समझना ।

4) निर्देशन :- इसके तहत वांछित लक्ष्य की प्राप्ति हेतु नेतृत्व, सम्प्रेषण, अभिप्रेरणा तथा पर्यवेक्षण प्रदान करना शामिल है ।

5) समन्वयन :- किस संगठन के विभिन्न विभागों को दिए गए कार्यकलापों तथा संगठन के उद्देश्यों के बीच समन्वयन स्थापित करना ।

6) रिपोर्ट करना :- प्रबन्धन को विभिन्न विभागों और खंडों को दिए गए कार्यों तथा उनके निष्पादन संबंधी सूचना को संग्रहित रखना आवश्यक होता है । निष्पादित किए गए कार्यों, तथा निष्पादन में हुयी प्रगति को रिपोर्ट में शामिल किया जाता है । इसके लिए आवश्यक है कि प्रबंधन एक अच्छी रिपोर्ट प्रणाली बनाए ।

7) बजट बनाना :- बजट, ससांधनों के आंवटन तथा विभिन्न कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधनों को प्राप्त कराने को दर्शाता है ।

8) नियंत्रण :- इसके अन्तर्गत वह कार्यकलाप शामिल होते हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि घटनाएँ पूर्व नियोजित पथ से विचलित नहीं हों । इसमें प्रगति पर निगरानी तथा आवश्यक होने पर सुधारात्मक कार्यवाही भी शामिल होती है । इस प्रक्रिया के माध्यम से संशोधन तथा नई योजनाओं के निर्माण के लिए भी जानकारी प्राप्त होती है ।

परियोजना पहचान 

परियोजना की पहचान हेतु निम्नलिखित प्रश्नों को दृष्टिगत रखना चाहिए :-
  1. क्या भौतिक अवस्थिति, विन्यास, संरेखण आदि सहित इसकी तकनीकि विशेषताएँ प्रथम दृश्य युक्ति संगत है ? 
  2. क्या अपेक्षित कच्चे माल और ऊर्जा की वास्तविक और संभावित उपलब्धता के आधार पर उसके सकल प्रचालन के लिए सामग्री की स्थिति मौजूद है? 
  3. क्या अपेक्षित मुख्य जनशक्ति वहां पहले से उपलब्ध है अथवा उसके शीघ्र विकास के लिए परिस्थितियाँ मौजूद हैं ? 
  4. क्या जो परियोजना बना रहे हैं उसकी लोगों को आवश्यकता है, लोगों की उसमें भागीदारी किस हद तक सुनिश्चित की गयी है ? 
  5. क्या आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता है ? 
यदि उपरोक्त का उत्त्ार सकारात्मक है तो परियोजना का कल्पना को मूर्त रूप देने के लिए परियोजना का ब्लू पिंट्र बनाया जाना चाहिए । परियोजना की पहचान हम क्यों, कौन, कहाँ, कैसे आदि प्रश्नों को ध्यान में रखते हुए कर सकते हैं । परियोजना क्यों शुरू करना चाहते   है उसका उद्देश्य एवं लक्ष्य क्या है, इसके लिए उपलब्ध संसाधन कहाँ से उपलब्ध होंगे, परियोजना का क्रियान्वयन कैसे होगा, परियोजना की आवश्यकता क्या है, कौन लोग इससे लाभान्वित होंगे, उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि क्या है इसको दृष्टिगत रखना चाहिए। परियोजना पहचान और अन्तिम रूप से परियोजना चयन की प्रक्रिया निम्न चरणों में सम्पन्न होती है ।

परियोजना चक्र के चरण गतिविधियां विवेचना (1) परियोजना का निरूपण संकल्पना का निरुपण परियोजना की आवश्यकता का निर्धारण विश्लेषण उपरोक्त आवश्यकताओं की प्राप्ति हेतु, संसाधनों की पहचान प्रस्ताव इसमें यह दर्शाया जाता है कि उपरोक्त आवश्यकताओं की पूर्ति परियोजना गतिविधिओं के माध्यम से किस प्रकार तरह होगी। तार्किकता परियोजना से होने वाले लाभ और वित्तीय लागत का मूल्यांकन समझौता परियोजना का वह बिन्दु जिस पर उसको प्रयोजित करने वाले की स्वीकृति प्राप्त होती है। परियोजना का क्रियान्वयन शुरुआत संसाधनों को जुटाना और परियोजना दल को इकट्ठा करना क्रियान्वयन प्रस्तावित गतिविधियों को लागू करना समापन निर्धारित समय/धन या निर्धारित गतिविधिओं के पूर्ण होने पर हैन्डओवर प्रोजेक्ट से होने वाली प्राप्तियों को उपयोगकर्ता को प्रदान करना परियोजना का विकास पुर्नरावलोकन सभी लाभग्राही को होने वाली प्राप्तियों की पहचान अपनायी गयी प्रक्रियाओं में सुधार की जहां आवश्यकता है को चिन्हित करना, प्राप्त सूचनाओं को एकत्र कर भविष्य में उसको उपयोगी बनाने के लिए व्यवस्थित रूप में लेखांकन करना

प्रथम चरण :- 
  1. व्यवहार्यता एवं तकनीकी विश्लेषण 
  2. पूर्व व्यवहार्यता अध्ययन 
  3. तकनीकी विश्लेषण 
द्वितीय चरण :- बाजार एवं मांग सम्बन्धी विश्लेषण : इस चरण में मात्रात्मक एवं गुणात्मक पद्धतियों के माध्यम से मांग का पूर्वानुमान लगाया जाता है ।

तृतीय चरण :- इसमें उपलब्ध आर्थिक एवं विित्त्ाय तत्वों का विश्लेषण किया जाता है। इस हेतु विभिन्न विधियों का उपयोग किया जाता है जोकि निम्न है :-
  1. भुगतान वापसी की अवधि :-इस विधि से यह पता चलता है कि परियोजना अपनी निवेश लागत वापस करने में कितना समय लेगा। जितना कम समय भुगतान वापिसी का होगा, परियोजना की व्यवहार्यता उतनी ही अधिक होगी । 
  2. शुद्ध लाभ का वर्तमान मूल्य:यह किसी निवेश योजना की आर्थिक व्यवहार्यता का परिचायक है । 
  3. आय की आंतरिक दर 
  4. निवेश पर औसत प्रति लाभ :-निवेश पर औसत प्रतिलाभ वे कुल लाभ हैं जो निवेश से पैदा होगा।
इसका आंकलन निम्न चरणों के तहत किया जा सकता है :-
  1. सबसे पहले परियोजना काल में कुल नकदी अंतर्वाह का पता करें । 
  2. तत्पश्चात् कुल नकदी अंतर्वाह से प्रारम्भिक निवेश घटाएँ इससे हमें परियोजना जीवन में कुल निवल आय का पता लग जाएगा ।
  3. इसके बाद परियोजना काल के वर्षों से कुल निवल आय को विभाजित कर औसत वार्षिक आय का पता करें । 
  4. इसके बाद प्रारंभिक निवेश और औसत वार्षिक आय का अनुपात ज्ञात करें इससे हमें निवेश पर औसत प्रतिलाभ का पता लग जाएगा । 
यदि प्रतिलाभ धनात्मक आता है तो परियोजना स्वीकार्य है ।

लाभ-लागत अनुपात :.इसका प्रयोग अलग-अलग लागत वाली एक से अधिक प्रतियोगी परियोजनाएँ होने पर किया जाता है । लागत के वर्तमान मूल्य और लाभ के वर्तमान मूल्य का अनुपात यदि एक से अधिक आता है तो परियोजना स्वीकार्य की जानी चाहिए, ऐसा हम एकमात्र परियोजना के संदभर् में कर सकते हैं । एक से अधिक परियोजनाओं में से एक परियोजना के चयन हेतु लाभ/लागत अनुपात का घटते क्रम में सूची बनाकर सर्वाधिक अनुपात वाली परियोजना को चुनते हैं ।

चतुर्थ चरण :-विस्तृत परियोजना रिपोर्ट
इसमें निम्न शामिल होता है :-
  1. बाजार नियोजन 
  2. यंत्र एवं प्रक्रिया प्रविधि
  3. परियोजना की अवस्थिति
  4. वातावरणीय प्रभावों का आंकलन
  5. क्रियात्मक पक्ष 
  6. विित्त्ाय पक्ष 
  7. सामाजिक आर्थिक पक्ष 
  8. विस्तृत परियोजना रिपोर्ट का मूल्यांकन एक अच्छी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में उसके उद्देश्यों एवं सीमाओं का जिक्र परियोजना के क्रियान्वयन के पहले ही कर लिया जाता है ।

परियोजना निर्माण 

परियोजना निर्माण में वे सभी कार्य शामिल हैं जो परियोजना को उस बिन्दु तक लाने के लिए आवश्यक हैं, जिस पर बहुत सावधानी से समीक्षा या मूल्यांकन शुरू किया जा सकता है और यदि परियोजना चुन ली जाती है तो कार्यान्वयन भी किया जाता है । परियोजना की तैयारी में पहले सोपान के रूप में व्यवहार्यतर अध्ययन शुरू किया जाना चाहिए । ऐसा करने से यदि विस्तृत उन्नत योजना बनाने में भी सहायता प्राप्त होती है ।

परियोजना निर्माण की प्रक्रिया दो चरणों में पूर्ण होती है :-

चरण एक :- इसमें परियोजना निर्माण के समय पहचान किए जाने वाले परियोजना क्षेत्र की विशेषताओं के बारे में निम्न के सम्बन्ध में जानकारी एकत्र करना शामिल है :-

1) भौतिक विशेषताएँ:- 
• भौगोलिक अवस्थिति
• जलवायु
• भूस्थलाकृति
• जल संसाधन

2) आर्थिक विशेषताएँ :- 
• कृषि और पशुधन संसाधन
• आर्थिक क्रियाकलाप सम्बन्धी जानकारी
• मासिक आय

3) सामाजिक विशेषताएँ :- 
• जनसंख्या आप्रवासन
• सामाजिक सेवाओं की उपलब्धता
• स्वास्थ्य और शिक्षा की उपलब्धता

4) मूलभूत आधारिक संरचना :- 
• सड़क, बिजली, संचार

5) संस्थागत सुविधाएँ :- 
• फाइनेंशियल
• मार्केट

उपरोक्त के आधार पर उस क्षेत्र की विद्यमान प्रस्थिति का आंकलन करना संभव हो सकेगा जहाँ परियोजना स्थित होगी और जिन आधारों परपरियोजना शुरू होगी ।

अगला चरण :- इसमें कार्यकलापों और सामान्य सुविधाओं, उनकी प्रावस्था निर्धारण, लागत और वित्त्ा पोषण के तरीकों के ब्यौरे तैयार करना शामिल है। इसके लिए महत्वपूर्ण रूपरेखा जिसे परियोजना निर्माण के समय ध्यान रखना चाहिए निम्नलिखित है :-
  1. परियोजना विवरण 
  2. घटकों के ब्यौरे :- कार्य और सामान्य सुविधाएँ 
  3. परियोजना के विभिन्न चरणों का निर्धारण 
  4. लागत अनुमान 
  5. वित्त्ा पोषण 
  6. संगठन और प्रबंध 
  7. उत्पादन, मार्केट और विित्त्ाय संभावनाएँ 
  8. लाभ और औचित्य 
  9. शेष मुद्दे 
  10. अनुलग्नक 

परियोजना चक्र 

परियोजन चक्र किसी परियोजना के अन्तर्गत विभिन्न गतिविधियों एवं उनकी तीव्रता के सम्बन्ध में सामान्य विचार का बोध कराता है। प्रत्येक परियोजना को इन आयामों के तहत देखा जाता है :-
  1. तकनीकी आयाम
  2. वाणिज्यिक आयाम
  3. सामाजिक-आर्थिक आयाम
  4. पर्यावरणीय आयाम
  5. प्रबन्धकीय आयाम
परियोजना चक्र में विभिन्न चरणों में अपनायी गयी गतिविधियों की तीव्रता को नीचे दर्शाये गए चित्र के माध्यम से स्पष्ट किया गया है ।

प्रथम अवस्था व्यवहार्यता द्वितीय अवस्था प्रारूप तृतीय अवस्था कार्यान्वयन चतुर्थ अवस्था समापन समय गतिविधियों की तीव्रता परियोजना की प्रत्येक अवस्था में परियोजना प्रबन्धक को उपरोक्त बताए गए विभिन्न आयामों का पालन ध्यान से करना चाहिए जिससे परियोजना सफलतापूर्वक सम्पन्न हो सके। परियोजना की विभिन्न अवस्थाओं का विस्तृत विवरण निम्न है :-

प्रथम अवस्था :- व्यवहार्यता 
यह अवस्था किसी परियोजना का महत्वपूर्ण घटक होती है । इसमें सबसे पहले आपूर्ति आवश्यकताओं की पहचान की जाती है । इसके पश्चात् इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रारूप तैयार किया जाता है और परियोजना का निर्माण किया जाता है । प्रारूप तैयार करते समय उपलब्ध अवसरों एवं पर्यावरण के सम्बन्ध में प्रारम्भिक जानकारी एकत्र की जाती है । इसके बाद यह आंकलन किया जाता है कि परियोजना के प्रारूप को स्वीकार किया जाए या नहीं । आंकलन निम्न को ध्यान में रखकर किया जाता है :-
  1. आवश्यकता की पहचान
  2. विकल्पों की पहचान
  3. परियोजना विचार के बारे में प्राथमिक व्यवहार्यता की स्थापना
  4. विकल्पों का मूल्यांकन
  5. लागत संबंधी निर्णय
(ii) परियोजना प्रारूप :-परियोजना की लागत को विस्तृत रूप से आंकलित करना चाहिए । परियोजना के क्रियान्वयन में समयावधि का भी आंकलन जरूरी है । परियोजना के प्रारूप अवस्था की अन्तिम परिणति विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डी.पी.आर.) के रूप में होती है । इस डी.पी.आर. का पुर्नमूल्यांकन विित्त्ाय संस्था द्वारा किया जाता है ।

(iii) कार्यान्वयन अवस्था :- इस अवस्था में डी.पी.आर. में उल्लिखित विचारों में मूर्तरूप दिया जाता है। इस अवस्था में गतिविधियों की तीव्रता चरम पर होती है । अत: यह अवस्था किसी भी परियोजना का महत्वपूर्ण अंश है । इसलिए जरूरी है कि विभिन्न गतिविधियों पर सतत् निगरानी एवं नियंत्रण रखा जाए । साथ ही समय रहते यदि आवश्यक हो संशोधित क्रियाएँ एवं यदि इस दौरान कोई दुविधा हो तो उन्हें भी दूर किया जाए ।

(iv) समापन :- इस अवस्था में उत्पन्न उपलब्ध सुविधाओं का उपयोग किया जाता है साथ ही साथ उन व्यक्तियों की पहचान की जाती है जो समस्त कार्यकलापों, रखरखाव को सुनिश्चित कर सकें । इसके लिए उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण भी दिया जाता है । अंत में नयी तैयार सुविधाओं को संचालन हेतु प्रशिक्षित लोगों को सांपै दिया जाता ह ै । साथ ही परियोजना में लगे लोगों को हटा लेते है।

परियोजना चक्र 

परियोजना को संकल्पना से परिचालन की स्थिति तक पहुंचाने में विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरना पड़ता है । ये अवस्थाएँ परियोजना का जीवन चक्र बनाती हैं ।इस चक्र की शुरूआत परियोजना के विचार से होती है । जो कि संबंधित विभाग, ग्रामसभा, लक्ष्य समूह, विकास कार्यों में लगी स्वैच्छिक संगठन, तकनीकी अनुसंधान समूह या केन्द्रीय योजना एजेंसी के माध्यम से आता है ।परियोजना का विचार आने पर इसकी रूपरेखा तैयार करना इस चक्र का अगला चरण होता है । इसके लिए ध्यान रखने योग्य बातें निम्न हैं :-
  1. परियोजना की उपयोगिता के आधार पर इसका विश्लेषण 
  2. स्थानीय कारकों भौतिक, सामाजिक, सांस्कृति का आंकलन 
रूपरेखा तैयार हो जाने के तदुपरान्त यदि परियोजना स्वीकार करने योग्य पाई जाती है तो इसे कार्यान्वयन के लिए संस्तुति प्रदान कर दी जाती है । परियोजना के कार्यान्वयन के अन्त में परिणामों का मूल्यांकन भी आवश्यक है जिससे इसके उद्देश्यों की पूर्ति तक सम्भव हुई है का आंकलन सम्भव हो सके।

परियोजना के जीवन चक्र का निरुपण 

परियोजना चक्र के चरणगतिविधियांविवेचना
(1)
परियोजना का निरूपण
संकल्पना का
निरुपण
परियोजना की आवश्यकता का निर्धारण 

विश्लेषण उपरोक्त आवश्यकताओं की प्राप्ति हेतु,
संसाधनों की पहचान

प्रस्ताव इसमें यह दर्शाया जाता है कि उपरोक्त
आवश्यकताओं की पूर्ति परियोजना गतिविधिओं
के माध्यम से किस प्रकार तरह होगी।

तार्किकतापरियोजना से होने वाले लाभ और वित्तीय
लागत का मूल्यांकन

समझौतापरियोजना का वह बिन्दु जिस पर उसको
प्रयोजित करने वाले की स्वीकृति प्राप्त होती है।
परियोजना का क्रियान्वयनशुरुआतसंसाधनों को जुटाना और परियोजना दल को
इकट्ठा करना

क्रियान्वयन प्रस्तावित गतिविधियों को लागू करना

समापननिर्धारित समय/धन या निर्धारित
गतिविधिओं के पूर्ण होने पर

हैन्डओवर
Handover
 प्रोजेक्ट से होने वाली प्राप्तियों को
client/उपयोगकर्ता को प्रदान करना 
परियोजना का विकास पुर्नरावलोकन
(Review)
सभी लाभग्राही को होने वाली प्राप्तियों की
पहचान

 Feedback अपनायी गयी प्रक्रियाओं में सुधार की जहां
आवश्यकता है को चिन्हित करना,
 प्राप्त सूचनाओं को एकत्र कर भविष्य में उसको
उपयोगी बनाने के लिए व्यवस्थित रूप में
लेखांकन करना
       

परियोजना प्रबंधन की सफलता को निर्धारित करने वाले कारक 

सामान्यत: परियोजना की सफलता निर्धारित समय, निर्धारित लागत में, तकनीकी विशिष्टताओं के आधार पर आंकी जाती है । परन्तु कुछ शोधों से यह पता चला है कि परियोजना की सफलता का आंकलन उसके उद्देश्यों की प्राप्ति एवं उससे सम्बन्धित विभिन्न लोगों के अनुभवों के आधार पर भी किया जाता है। किसी परियोजना की सफलता के निर्धारण हेतु निम्न महत्वपूर्ण कारक हैं :-
  1. परियोजना की व्यवहार्यता का गहन अध्ययन जिससे कोई भी महत्वपूर्ण तत्व अनदेखा न रहे जाये । 
  2. विस्तृत परियोजना रिपोर्ट सम्बन्धित संस्था द्वारा परियोजना के क्रियान्वयन के पहले स्वीकृत की जाए । 
  3. परियोजना के विभिन्न चरणों में परियोजना प्रबंधक तथा उसके दल कि सक्रिय भागीदारी हो । 
  4. एक ऐसा संगठन जिसमें संचार तथा नियंत्रण प्रणाली चुस्त हो । 
  5. परियोजना से सम्बन्धित विभिन्न अभिकरणों के मध्य उसकी परस्पर भूमिकाओं, दायित्वों, सीमाओं की स्पष्ट समझ । 
  6. कोई असंतोष यदि है तो उसकी जल्द पहचान तथा परियोजना के दौरान उसका निस्तारण ।
  7.  पर्याप्त एवं समय पर वित्त्ा की उपलब्धता । 
  8. यदि परियोजना के आरम्भ से अंत तक लक्ष्यों से कोई भटकाव या विलगाव होता है तो इस हेतु उपयुक्त क्रियाओं को करना चाहिए तथा आवश्यक है नियमित रूप से अपने को आद्यतन रखना चाहिए । 

परियोजना प्रबन्धन के 7-एस

प्रबन्धन के मुददों को 7-एस ढांचा के तहत समझा जा सकता है इस को मैककिन्जी और कम्पनी ने विस्तार दिया। परियोजना प्रबन्धन के तत्वों को 7-एस को माध्यम से निम्न रूप से व्याख्यायित कर सकते है।

तत्व व्याख्या
1.Strategy (रणनीति)परियोजना की आवश्यकता और उसे किस प्रकार सम्पन्न किया
जाएगा।
2- Structure (संरचना)परियोजना के क्रियान्वयन हेतु, संगठनात्मक ढांचा का उपयोग।
3- System (प्रणाली)गतिविधियो की रूपरेखा, अनुरक्षण और नियंत्रण हेतु, अपनायी
जानेवाली प्रणाली
4- Staff (कर्मचारी) परियोजना में जो लोग काम करेगें उनका चयन, नियुक्ति, प्रबन्धन और
नेतृत्व प्रदान करना।
5- Skills (निपुणताएं)प्रबन्धकीय और प्रविधि सम्बन्धी निपुणतांए जो कि परियोजना प्रबन्धक
और कर्मचारियों में होनी चाहिए।
6- Style (तरीका,ढंग)लोगांे में सामूहिकता की भावना से कार्य करना तथा यह महसूस करना
कि वे दल के महत्वपूर्ण सदस्य है।
7- Stakeholderलाभग्राहीव्यक्ति और समूह जिनकी परियोजना प्रक्रिया में रूचि है या भाग ले
रहें तथा उससे होने वाली प्राप्तियों से सम्बन्धित है

सन्दर्भ - प्रोजेक्ट मैनेजमेंट द्वारा हार्वे मेयलर, पिर्यसन एडयूकेशन, एरिया इस प्रकार में देखते हैं 7 एस का ढांचा प्रबन्धन से सम्बन्धित उन मुददों को इंगित करना है जिन पर में गौर करना चाहिए।
Tag: ,
Share:

Comments

Post a Comment