समाज कल्याण प्रशासन की अवधारणा, प्रकृति एवं कार्य

समाज के प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति उचित ढ़ग से करना, जिससे कि वह सुखी और सन्तोषजनक जीवन व्यतीत कर सके, कल्याणकारी राज्य का प्रमुख उद्देश्य है। प्रभावकारी सेवाओं को विस्तृत स्तर पर लागू करने के लिए, योजना, निर्देशन, समन्वय और नियंत्रण का सामूहिक प्रयास किया जाता है। समाज कार्य की सेवाओं को व्यावसायिक स्वरूप प्रदान करने के लिए भी यह आवश्यक है कि समाज कार्यकर्ताओं को आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान किया जाये। समाज कार्य सेवाओं को प्रदान करने में आवश्यक प्रशासनिक एवं नेतृत्व दक्षता के लिए कार्यकर्ता को इस ज्ञान और कौशल का प्रयोग करके सेवाओं को और प्रभावकारी बनाया जा सकता है। अत: यह आवश्यक है कि समाज कार्यकर्ताओं को एक व्यवस्थित ज्ञान एवं तकनीकी कौशल प्रदान किया जाये।

समाज कल्याण प्रशासन की अवधारणा 

समाज कल्याण प्रशासन समाज कार्य की एक प्रणाली के रूप में कार्यकताओं को प्रभावकारी सेवाओं हेतु ज्ञान एवं कौशल प्रदान करता है। यद्यपि समाज कल्याण प्रशासन , समाज कार्य की द्वितीयक प्रणाली मानी जाती है परन्तु प्रथम तीनों प्राथमिक प्रणालियों, वैयक्तिक सेवा कार्य, सामूहिक सेवा कार्य, तथा सामुदायिक संगठन की सेवाओं में सेवाथ्र्ाी को सेवा प्रदान करने हेतु समाज कल्याण प्रशासन की आवश्यकता पड़ती है। समाज कल्याण प्रशासन का आशय जन सामान्य के लिए बनायी गयी एवं सामुदायिक सेवाओं जैसे स्वास्थ्य, आवास शिक्षा और मंनोरजन के प्रशासन से है। इसे समाज सेवा प्रशासन के पर्यायवाची शब्द के रूप मे समझा जाता है।

समाज कल्याण प्रशासन की प्रकृति 

समाज कल्याण प्रशासन विज्ञान तथा कला दोनों हैं। एक विज्ञान के रूप में इसके क्रमबद्ध ज्ञान होता है जिसका उपयोग सेवाओं को अधिक प्रभावी बना देता है। विज्ञान के रूप में इसके निम्न तत्व प्रमुख है नियोजन, संगठन, कार्मियों की भर्ती, निर्देशन, समन्वय, प्रतिवेदन, बजट तथा मूल्यांकन। कला के रूप में समाज कल्याण प्रशासन में अनेक निपुणताओं तथा प्रविधियों का उपयोग होता है जिसके परिणाम स्वरूप उपयुक्त सेवाओं को प्रदान सम्भव होता है। समाज कल्याण प्रशासन की निम्न प्रमुख विषेशतायें है:-
  1. प्रशासन कार्यो को पूरा करने के लिए की जाने वाली एक प्रक्रिया है। समाज कल्याण प्रशासन में स्वास्थ्य, शिक्षा आवागमन, आवास, स्वच्छता, चिकित्सा, आदि सेवाओं को प्रभावकारी बनाया जाता है। 
  2. समाज कल्याण प्रशासन की संरचना में एक उच्च-निम्न की संस्तरणात्मक व्यवस्था होती है। कर्मचारियों की स्थिति के अनुसार उनके कार्य तथा शक्तियाँ निर्धारित होती है। 
  3. नेतृत्व निर्णय लेने की क्षमता, शक्ति, संचार आदि प्रशासकीय प्रक्रिया के प्रमुख अंग है। 
समाज कल्याण प्रशासन मूलरूप से निम्न क्रियाओं से सम्बन्धित है:- 
  1. राज्य के सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करन के लिए ऐसी नीति निर्धारित करना जिससे संगठनल में कार्यरत जनशक्ति एकीकृत रूप से कार्य कर सके। 
  2. सेवाओं के प्रभावपूर्ण प्रावधान के लिए संगठनात्मक संरचना की रूपरेखा तैयार करना। 
  3. संसाधनों, कर्मचारीगण तथा आवश्यक प्रविधियों का प्रबन्ध करना।
  4. आवश्यक ज्ञान एवं निपुणताओं से युक्त मानव संसाधन का प्रबन्ध करना।
  5. उन क्रिया-कलापों को सम्पादित करवाना जिनसे अधिकतम संतोषजनक ढ़ग से लक्ष्य की प्राप्ति हो सके। 
  6. ऐसा वातावरण तैयार करना जहाँ आपसी मेल-मिलाप तथा प्रगाढ़ता बढ़े एवं कर्मचारी कार्य करने की प्रक्रिया के दौरान में सुख अनुभव करें। 
  7. किये जाने वाले कार्यो को निरन्तर मूल्यांकन करना। 

समाज कल्याण प्रशासन के कार्य 

समाज कल्याण प्रशासन न केवल संस्था के कार्यो को सम्पादित करता है बल्कि वह संस्थओं को निरन्तर उन्नति की दिशा में बढ़ाने का प्रयास भी करता है। वारहम के विचार से समाज कल्याण प्रशासन के निम्न कार्य है:-
  1. संस्था के उद्देश्य को पूरा करना समाज कल्याण प्रशासन संस्था की नीतियों को कार्यान्वित करता है। नीतियों को केवल प्रषासनिकप्रक्रिया द्वारा ही कार्यरूप प्रदान किया जा सकता है। वह नीतियों के निर्धारण में भी भाग लेता है जिससे संस्था के उद्देश्यों तथा नीतियों में एकरूपता बनी रहे। 
  2. संस्था की औपचारिक संरचना का निर्माण करना समाज कल्याण प्रशासन का दूसरा कार्य सम्पेष््र ाण व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए औपचारिक संरचना का निर्माण करना होता है, कर्मचारियों के लिए मानदण्ड निर्धारित करना होता है, तथा उन्ही के अनुसार कार्य सम्बन्ध विकसित करना होता है।
  3. सहयोगात्मक प्रयत्नों को प्रोत्साहन प्रदान करना प्रशासन का कार्य संस्था में ऐसा वातावरण तैयार करना होता है जिससे कर्मचारीगण पारस्परिक सहयोग से अपने उत्तरदायित्वों को पूरा कर सकें। यदि कहीं भी संघर्ष के बीज पनपने लगें तो उनकों तुरन्त नष्ट कर देना आवश्यक होता है। कर्मचारियों के मनोबल को ऊँचा बनाये रखने के हर सम्भव प्रयत्न किये जाने आवश्यक होते है। 
  4. संसाधनों की खोज तथा उपयोग करना किसी भी संस्था के लिए अर्थ शक्ति तथा मानव शक्ति दोनों आवश्यक होती है। संस्था तभी अपने उत्तरदायित्वों को पूरा कर सकती है जब उसके पास पर्याप्त धन हो तथा दक्ष कर्मचारी हों। आर्थिक स्त्रोतों का पता लगाकर उनके समुचित उपयोग करने की व्यवस्था का कार्य प्रशासन हो होता है। वित्त पर नियंत्रण रखने का कार्य भी उसी का होता है। वह अपनी शक्तियों को हस्तांतरित भी करता है जिससे दूसरे अधिकारी इस शक्ति का उपयोग कर सके। 
  5. अधीक्षण का मूल्यांकन प्रशासन संस्था के कार्यो के लिए उत्तरदायी होता है। अत: वह इसकी सभी गतिविधियों पर दृष्टि रखता है। वह संस्था के कर्मचारियों की आवश्यक तानुसार सहायता करता है तथा दिशा निर्देश देता है। वह सदैव कार्य प्रगति का लेखा-जोख रखता है। वह कार्यो का मूल्यांकन निरन्तर करता रहता है। 
लूथर गलिक ने समाज प्रशासन के कार्यो का वर्णन करने के लिए जादुर्इ सूत्र ‘पोस्डकार्ब’ प्रस्तुत किया है जिसका तात्पर्य है नियोजन करना, संगठन करना, कर्मचारी नियुक्ति, निर्देशित करना, समन्वय करना, प्रतिवेदन प्रस्तुत करना तथा बजट तैयार करना।

समाज कल्याण प्रशासन के सिद्धान्त 

यद्यपि समाज कल्याण प्रशासन में किसी आधिकारिक अथवा सरकारी तौर पर संस्थापित प्रशासकीय मापदण्डों का अभाव है, तदापि निम्नलिखित सिद्धान्तों को समाज कल्याण व्यवहार एवं अनुभव होने के कारण सामान्य मान्यता दी गई है एवं जिनका पालन सुप्रशासित सामाजिक अभिकरणों द्वारा किया जाता है-
  1. समाज कल्याण अभिकरण के उद्देश्यों कार्यो का स्पष्ट रूप से वर्णन होना चाहिए। 
  2. इसका कार्यक्रम वास्तविक आवश्यक ताओं पर आधारित होना चाहिए, इसका कार्यक्षेत्र एवं भू-क्षेत्र उस सीमा तक जिसमें यह प्रभारी तौर पर कार्य कर सकती है सीमित होना चाहिए, यह समुदाय के संसाधनों, प्रतिरूपों एवं समाज कल्याण अवाष्यकताओं से सम्बन्धित होना चाहिए, यह स्थिर होने की अपेक्षा गतिमान होना चाहिए तथा इसे बदलती हुर्इ आवश्यक ताओं को पूरा करने के लिए बदलते रहना चाहिए। 
  3. अभिकरण सुसंगठित होना चााहिए, नीति निर्माण एवं क्रियान्वन में स्पष्ट अन्तर होना चाहिए, आदेश की एकता, अर्थात् एक ही कार्यकारी अध्यक्ष द्वारा प्रषासकीय निदेषन, प्रशासन की सामान्य योजना अनुसार कार्यो का तर्कयुक्त विभाजन, सत्ता एवं दायित्व का स्पष्ट एवं निश्चित सममनुदेशन, तथा संगठन की भी इकाइयों एवं स्टाफ सदस्यों का प्रभारी समन्वय।
  4. अभिकरण को उचित कार्मिक, नीतियों एवं अच्छी कार्यदशाओं के आधार पर कार्य करना चाहिए। कर्मचारियों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर होनी चाहिए तथा उन्हें समुचित वेतन दिया जाना चाहिए। कर्मचारियों वर्ग अभिकरण की आवश्यक ताओं को पूरा करने के लिए मात्रा एवं गुण में पर्याप्त होना चाहिए। 
  5. भिकरण मानक सेवा की भावना से ओतप्रोत होकर कार्य करे, इसे उन व्यक्तियों एवं उनकी आवश्यक ताओं की समुचित जानकारी होनी चाहिए जिनकी यह सेवा करना चाहता है। इसमें स्वतंत्रता, एकता एवं प्रजातंत्र की भावना भी होनी चाहिए। 
  6. अभिकरण से सम्बन्धित सभी में कार्य की ऐसी विधियों एवं मनोवृत्तियों विकसित होनी चाहिए जिससे उचित जन सम्पर्क का निमाण हो।
  7. अभिकरण का वार्षिक बजट होना चाहिए। लेखा रखने की प्रणाली ठीक होनी चाहिए। एवं इसके लेखों का सुयोगय व्यावसायिक एजेंसी द्वारा जिसका अपना कोर्इ हित नही है, परीक्षण होना चाहिए। 
  8. यह अपने रिकार्ड को ठीक प्रकार से सरल एवं विस्तार से रखे जो आवश्यक ता के समय सुगमता ये उपलब्ध हो सके। 
  9. इसकी लिपिकिय एवं अनुरक्षण सेवाएँ भी मात्रा एवं गुण में पर्याप्त तथा क्रियान्वयन में दक्ष होनी चाहिए। 
  10.  अभिकरण उपयुक्त अन्तराल पर स्वमृल्यांकन करे। गत वर्ष की अपनी सफलताओं एव असफलताओं का अपनी वर्तमान प्रस्थिति एवं कार्यक्रमों का, उद्देश्यों एवं संस्थापित मानदण्डों के अनुसार मापित अपने निष्पादन का, अपनी शक्ति एवं कमजोरियों का अपनी वर्तमान समस्याओं का तथा अपनी सेवा को बेहतर बनाने के लिए अगले उपायों का लेखा-जोखा लेने के लिए। 

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