सामुदायिक संगठन की प्रणालियां एवं कार्यविधियां

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सामुदायिक संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति उन संस्थाओं द्वारा, जो सामुदायिक संगठन में लगी रहती है। विशेष प्रकार के क्रियाकलापों द्वारा की जाती है। क्रियाकलापों और विधि या प्रणाली के भेद को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है। क्रियाकलाप एक विशेष परियोजना या सेवा होती है जो प्रणली के प्रयोग होने के परिणामस्वरूप् की जाती है। क्रियाकलाप वह वस्तु है जो की जाती है। और विधि या प्रणाली वह तरीका है जिसके द्वारा कोई भी क्रियाकलाप किया जाता है।

सामुदायिक संगठन की विधियॉ या प्रणालियॉ 

लेन ने सामुदायिक संगठन की विधियों या प्रणालियों का उल्लेख किया है-
  1. निरन्तर केन्द्रीकृत अभिलेख एक प्रणाली है जिसका प्रयोग सामुदायिक संगठन में किया जाता है।
  2. नियोजन, मुख्य रूप से दो या दो से अधिक संस्थाओं के लिए, दूसरी प्रणाली है जिसका प्रयोग सामुदायिक संगठन में किया जाता है। 
  3. तीसरी प्रणाली जिसका प्रयोग सामुदायिक संगठन में किया जाता है वह है विशेष अध्ययन या सर्वेक्षण।
  4. संयुक्त बजट बनाना अर्थात् वित्त व्यवस्था का नियोजन, चौथी प्रणाली है जिसका प्रयोग सामुदायिक संगठन में किया जाता है। 
  5. सामुदायिक संगठन प्रक्रिया में शिक्षा, अर्थनिरूपण और जनसम्पर्क सम्बन्धी प्रणालियों का प्रयोग किया जाता है जैसे दैनिक पत्रों, वार्शिक प्रतिवेदनों, रेडियों, नुमाइशों, पुस्तकों आदि द्वारा प्रचार। 
  6. सामुदायिक संगठन प्रक्रिया की प्रणालियों के रूप में कोश इकट्ठा करने के लिए संयुक्त अभियाानों का प्रयोजन और ऐसे अभियानों का चलाया जाना।
  7. संगठन की प्रणालियों का प्रयोग। 
  8. क्षेत्रीय सेवा या अन्य तरीके से अन्त:अभिकरण परामर्श सामुदायिक संगठन की एक सामान्य प्रणाली है। 
  9.  समूहिक विचार विमर्श, कन्फ्रेन्स प्रक्रिया का विकास और प्रयोग। 
  10. दो संस्थानों की आपसी विलीनता के लिए वार्ता द्वारा समझौते को प्रोत्साहित करना। 
  11. संयुक्त रूप से सेवाओं का दिया जाना एक सामान्य प्रणाली है। 
  12. सामाजिक क्रिया द्वारा सामाजिक विधानों को प्रोत्साहित करना। 
यदि प्रणाली को ज्ञान, सिद्धान्तों एवं निपुणताओं पर आधारित विशेष प्रकार की कार्यरीति माना जाये, तो समाज कार्य की सभी प्रणालियों, व्यक्तिगत समाज कार्य, समूह समाज कार्य और सामुदायिक संगठन की एक समान आधार-शिला है। परन्तु कार्यप्रणाली या कार्यरीति के रूप में प्रणाली के अर्थ, ज्ञान और सिद्वान्तों के समिश्रण से अधिक व्यापक हो जाते है। इसके मूल अर्थ यह है: किसी एक क्रियाकलाप में ज्ञान और सिद्धान्तों का प्रयोग इस ढंग से करना कि बहुत ही प्रभावशाली तरीकों से परिवर्तन आ जाये। प्रणाली का अर्थ होता है किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए परिचित कार्यविधियों का व्यवस्थित प्रयोग।  समाज कार्य में सामुदायिक संगठन की प्रणालियों का विकास अभ्यासकर्त्ताओं के प्रयासों से हुआ। सामुदायिक संगठन की निम्नलिखित कार्यविधियों का उल्लेख मेकनील ने किया है-
  1. प्रशासकीय एवं प्रक्रिया अभिलेखन 
  2. अनुसंधान 
  3. परामर्श 
  4. सामूहिक काफ्रेन्स 
  5. कमेटी कार्य 
  6. अर्थ निरूपण 
  7. प्रशासन 
  8. साधनों का संगहण 
  9. संधिवार्ता या समझौते की बात-चीत 
सामुदायिक विकास के साहित्य का अध्ययन करने से जिन मौलिक प्रक्रियाओं या विधियों या कार्यविधियों या ज्ञान होता है वह समाज कार्य के सिद्वान्तों और अभ्यास से बहुत निकट सम्बन्ध रखती है। यह प्रक्रियाएं या विधियाँ और उनका विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों और संकट में पीड़ित व्यक्तियों की सहायता के लिए प्रयोग समाज कार्य से इनकी समानता दर्शाता है।

सामुदायिक विकास के मानवीय सम्बन्धों में इन प्रक्रियाओं की व्याख्या सर्वेक्षण द्वारा इस प्रकार की गई है:-
  1. स्थानीय समुदाय का ज्ञान ग्रहण करना और इसकी स्वीकृति प्राप्त करना। 
  2. स्थानीय समुदाय के विषय में सूचनाएँ एकत्र करना। समुदाय के विषय में तथ्यात्मक सूचनाएँ जैसे जनसंख्या का आकार, आयु लिंग व्यवसाय, आर्थिक स्तर, आदि सम्बन्धी ज्ञान।
  3. स्थानीय नेता की पहचान। 
  4. समुदाय को यह समझने के लिए उद्यीपन और प्रेरणा देना कि उसके सामने समस्याएँ हैं। 
  5. व्यक्तियों को अपनी समस्याओं के विषय में विचार-विमर्श करने में सहायता देना।
  6. व्यक्तियों को अपनी सबसे अधिक महत्वपूर्ण समस्याओं को पहचानने में यहायता देना। 
  7. आत्म-विश्वास की पालना। 
  8. समाज कार्य का मौलिक उद्देश्य व्यिक्यों, समूहों और समुदाय में विश्वास का विकास करना, अपनी आवश्यकता की पूर्ति के साधनों का प्रयोग करने में सहायता देना है।
  9. एक क्रियात्मक कार्यक्रम के विषय में निर्णय लेना।
  10. समुदायिक शक्तियों और साधनों की पहचान। व्यक्तियों को अपनी समस्याओं के समाधान में अपनी शक्तियों और साधनों को पहचानने और उन्हें गतिमान करने में सहायता देना। 
  11. व्यक्तियों को अपनी समस्याओं के समाधान कायोर्ं में निरन्तर लगे रहने में सहायता देना। 
  12. व्यक्तियों को अपनी सहायता आप करने की क्षमता में वृद्धि करना।

सामुदायिक संगठन के चरण 

जिस प्रकार व्यक्तिगत समाज कार्य के अभ्यास में चरणों के होने का विचार रखा गया है जैसे अध्ययन, निदान और उपचार तीन प्रमुख चरण है, उसी प्रकार सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया में भी चरणों की व्याख्या की गयी है। यही चरण सामुदायिक संगठन के अन्तर्गत किसी भी सामुदायिक संगठन परियोजना के संदर्भ में प्रमुख चरण माने जाते है। लिन्डमैन ने लगभग 700 सामुदायिक परियोजनाओं का अध्ययन करके 10 चरणों की व्याख्या की है। सामुदायिक संगठन में यह चरण निम्नलिखित है। इनके वर्गीकरण में समाजशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण मिलता है:
  1. आवश्यकता की चेतना : समुदाय के अन्दर या बाहर का कोई व्यक्ति आवश्कता का प्रकटन करता है जो बाद में एक निश्चित परियोजना का रूप ले लेती है।
  2. आवश्कता की चेतना का प्रसार समुदाय के अन्दर कोई समूह या संस्था के अन्दर कोई नेता अपने समूह या समूह के एक भाग को इस आवश्यकता की वास्तविकता के विषय में विश्वास दिलाता है।
  3. आवश्यकता की चेतना का प्रक्षेपण : समुदाय का जो समूह आवश्यकता की पूर्ति में रूचि रखता है, वह आवश्यकता की चेतना का समुदाय के नेताओं पर प्रक्षेपण करता है और उन्हें आवश्यकता की पूर्ति के लिये तैयार करता है जिससे आवश्यकता की चेतना एक सामान्य रूप ग्रहण कर लेती है। 
  4. आवश्यकता को तुरन्त पूरा करने का भावनात्मक आवेग : एक भावानात्मक आवेग का उत्पन्न होना और उस आवश्यकता को तुरन्त पूरा करने के लिये कुछ प्रभावशाली सहायता जुटाई जाती है। 
  5. (आवश्यकता की पूति के लिये) समाधानों का प्रस्तुतीकरण : आवश्यकता की पूर्ति के लिये अन्य समाधानों को समुदाय के सामने रखा जाता है। 
  6. (आवश्यकता की पूर्ति के) समाधानों में संघर्ष: विभिन्न प्रकार के विरोधी समाधान या सुझावों को प्रस्तुत किया जाता है और विभिन्न समूह इनमें किसी एक का समर्थन करते है। 
  7. अन्वेशण या जॉच पड़ताल : विशेषज्ञों की सहायता से परियोजना या समस्या की जॉच की जाती है। 
  8. समस्या के विषय में वाद-विवाद : एक विशाल सभा या कुछ व्यक्तियों के सम्मुख परियोजना या समस्या को प्रस्तुत किया जाता है और वह समूह जो अधिक प्रभाव रखते है अपनी योजनाओं की स्वकृति लेने का प्रयास करते है। 
  9. समाधानों का एकीकरण : जो भी समाधान सुझाव के रूप में सामने रखे जाते है उनकी परीक्षा करके सभी के अच्छे पक्ष चुनकर एक नया समाधान निकाला जाता है। 
  10. अस्थायी प्रगति के आधार पर समझौता: कुछ समूह अपनी-अपनी योजना का कुछ भाग त्याग देते है जिसके फलस्वरूप एक समझौता हो जाता है और उसी समझौते के आधार पर कार्य आरम्भ किया जाता है। 
यह आवश्यक नही कि सभी परियोजनाएॅ इन्ही चरणों के अनुसार ही कार्य रूप में आती है। क्रॉस के अनुसार सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया में छ: प्रमुख चरण देखे जा सकते हैं, जैसे-
  1. सेवा के उद्देश्यों का एक निश्चित कथन एवं विवरण। 
  2. तथ्यों की खोज : समस्याग्रस्त व्यक्तियों की विशेषताओं, समुदायिक साधनों और सेवाओं की समर्थताएॅ आदि। 
  3. साधनों और आवश्यकताओं के बीच वांछित समायोजन के संदर्भ में प्रदान की जा सकने वाली सेवाओं की रूपरेखा।
  4. अस्थायी योजना और चुनी गई सेवाओं की वैधता का परीक्षण करने के लिये जनता के सामने उसे प्रस्तुत करना।
  5. मुख्य योजना का विकास जो अस्थायी योजना से अलग होती है और जो परीक्षण पर आधारित अनुभवों के कारण विकसित की जाती है। 
  6. अन्तिम चरण में इस मुख्य योजना को सेवा में बदला जाता है या सेवा में कार्यन्वित किया जाता है। इसमें वर्तमान सेवाओं का पुन: संगठन, वर्तमान सेवाओं का स्तर ऊँचा करना या उनका विस्तार करना या बिल्कुल नई सेवाओं का निर्माण करना सम्मिलित है। 
सैन्डरसन और पौलसन के अनुसार सामुदायिक संगठन के सात प्रमुख चरण है जो इस प्रकार है:-
  1. समुदाय का विश्लेषण एवं निदान : जिसमें समुदाय के विषय में पूरी जानकारी प्राप्त की जाती है। समुदाय के ढांचे, जनसंख्या का आकार, व्यावहारिक विशेषताओं और प्रमुख सामाजिक शक्तियों के विषय में जानकारी प्राप्त की जाती है। सामुदायिक प्रथाओं, परम्पराओं जनरीतियों, मनोवृत्तियों, सम्बन्धों, संघर्शों नेताओं, परस्पर विरोधी शक्तियों आदि के विषय में ज्ञान प्राप्त किया जाता है।
  2. गतिकी : सामान्य आवश्यकताओं के प्रति, सामान्य रूचि का विकास और समुदाय को क्रियाशील बनाने के लिये उनमें उन्नति की इच्छा और वर्तमान परिस्थिति से असन्तुश्टि विकसित की जाती है। 
  3. परिस्थिति की परिभाषा : समुदाय के विश्लेषण और निदान और उसकी गतिकी को ध्यान में रखकर सामुदायिक परिस्थित की पुन: परिभाषा करके यह निश्चित किया जाता है कि समुदाय के लिये क्या वॉछित है और उसे किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्तियों, समूहों, संस्थाओं एवं संगठनों का मत मालूम किया जाता है और इन सब तथ्यों को सामने रखकर सामुदायिक परिस्थिति को पुन: परिभाशित किया जाता है। 
  4. औपचारिक संगठन : समुदाय का संगठन समुदाय के आकार और वर्तमान संगठनों की जटिलता को देखकर बनाया जाता है। जब समुदाय बड़ा होता है और उसमें संगठनों की संख्या अधिक होती है तो जो संगठन बनाया जाता है वह समन्वयात्मक रूप रखता है और उसमें उद्देश्य सभी संगठनों को संगठित किया जाना और उनमें समन्वय लाना होता है।
  5. सर्वेक्षण: औपचारिक संगठन के बाद सामुदायिक दशाओं को समझने के लिए सर्वेक्षण किया जाता है। इसका उद्देश्य समुदाय के विषय में तथ्यों को ज्ञात करना होतो है। आरम्भ में एक या दो समस्याओं पद ही ध्यान दिया जाना लाभदायक होता है। इन समस्याओं के सुलझाने के लिए सर्वेक्षण द्वारा तथ्य एकत्रित किए जाते है। 
  6. कार्यक्रम : जिन आवश्यकताओं के पूरा करने में सदस्यों की सबसे अधिक रूचि होती है और जिनकी संतुष्टि में न्यूनतम संघर्श की सम्भावना हो, उसी की पूर्ति के लिये सबसे पहले कार्यक्रम बनाया जाता है। इस अनुभव से जब समुदाय संगठित हो जाता है तो लम्बी अवधि के कार्यक्रम बनाये जाते है। कार्यक्रम की निर्माण में समुदाय के सभी सदस्यों और समूहों को योजना के विषय में अपना मत प्रकट करने और विचार- की सुविधा दी जाती है। 
  7. नेतृत्व : एक प्रभावशाली नेतृत्व के बिना कार्यक्रम का होना पर्याप्त नही होता। समुदाय में से ही नेतृत्व का उत्तरदायित्व स्वीकार करना आवश्यक माना जाता है। बाहर का व्यक्ति समुदाय में चेतना उत्पन्न कर सकता है परन्तु नेतृत्व प्रदान करने का उत्तरदायित्व समुदाय का अपना होता है।  यूनाइटेड नेशन्स ने सामुदायिक विकास और सामुदायिक संगठन को एक दूसरे की पूरक आवधाणाएॅ माना है। दोनों के सिद्धान्तों, विधियों और चरणों का विश्लेषण करने से दोनों के सिद्धान्तों, विधियों और चरणों में समानता देखी जा सकती है। 
टेलर ने सामुदायिक विकास के निम्नलिखित चरणों और विधियों की व्याख्या की है जो समुदाय संगठन के चरणों और विधियों से मेल खाती है:
  1. सामुदायिक विकास का पहला चरण समुदाय के सदस्यों द्वारा समान अनुभूत आवश्यकताओं के विषय में व्यवस्थित विचार विमर्श करना। 
  2. समुदायिक विकास का दूसरा चरण समुदाय द्वारा चयन की गई प्रथम स्वयं-सहायता परियोजना को पूरा करने के लिए व्यवस्थित नियोजन करना है। 
  3. सामुदायिक विकास का तीसरा चरण स्थानीय सामुदायिक समूहों की भौतिक, आर्थिक एवं सामाजिक समर्थताओं को जुटाना और उन्हें गतिमान करना है।
  4. सामुदायिक संगठन का चौथा चरण समुदाय में आकांक्षाओं का सृजन और समुदाय के सुधार हेतु अतिरिक्त परियोजनाओं को चलाने के लिए निर्णय लेना है।

सामुदायिक कल्याण नियोजन 

नियोजन सामुदायिक संगठन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। स्वास्थ्य और कल्याण के लिये नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति, समूह एवं समुदाय चेतन रूप् से उन दशाओं, कार्यक्रमों और सुविधाओं को निर्धारित करने, उनकी स्थापना और उन्हें बनाये रखने का प्रयास करते हैं जो उनकी दृष्टि में वैयक्तिक एवं सामूहिक जीवन को भंग होने से बचा सकते हैं और सभी व्यक्तियों के लिए एक उच्च स्तर के कल्याण को सम्भव कर सकते हैं। सामुदायिक नियोजन की परिभाषा में जनता द्वारा समर्थन को जुटाना, आवश्यक सूचनाआं का प्रसार, उपयुक्त कमेटियों की नियुक्ति, विरोधी भावों का सुना जाना, उनका विश्लेषण और विरोधी भावों में समझौता सभी कुछ सम्मिलित हैं। सामुदायिक नियोजन में उन्हीं प्रणालियों का प्रयोग होता है जिनका प्रयोग सामुदायिक संगठन में होता है और जैसा समाज कार्य इन्हें समझता और इनका प्रयोग करता है। स्वास्थ्य और समाज कल्याण के ठोस नियोजन में समुदाय के मौलिक तथ्यों और शक्तियों का प्रयोग होता है। समुदायिक नियोजन छोटे स्थानीय क्षेत्रों, नगरों, जनपदों और क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है। नियोजन का अर्थ है कि भविश्य में जो प्रयास किये जाने हैं, उनका पहले से ही प्रतिपादन किया जाना। नियोजन का अर्थ है कि समाज कल्याण के कार्यक्रम किन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये किये जाने हैं, उन्हें स्पष्ट किया जाना है और उसे कैसे किया जाना है अर्थात् उसे करने के लिये किस प्रणाली या विधि का प्रयोग किया जाएगा। वह क्रियाकलाप कितना अच्छा किया जाना है, अर्थात् प्रणाली या करने की विधि में किस स्तर की गुणता और विशेषज्ञता होगी। किस प्रकार क्रियाकलाप का समर्थन किया जायेगा। इन सबको एक साथ पहले से ही निर्धारित कर लिया जाता है।

नियोजन तो एक सुस्थापित तथ्य होता है। एक सामूहिक और परस्पर निर्भर समाज अपने सदस्यों को अच्छा जीवन प्रदान करने के लिये, अन्तिम रूप से, अपनी नियोजन प्रक्रियाओं पर निर्भर रहता है। नियोजन का अर्थ है सामुदायिक जीवन के क्षेत्रों में क्रमबद्ध चिन्तन लाना क्योंकि नियोजन चिन्तन का चेतन और सोद्देष्य निर्देशन होता है जिससे उन उद्देश्यों, जिन पर समुदाय में समझौता हो, की पूर्ति के लिये तर्कपूर्ण साधनों का सृजन किया जा सके। नियोजन में सदैव और अनिवार्य रूप से प्राथमिकताएँ निर्धारित की जाती हैं और मूल-निर्णय लेने पड़ते हैं। नियोजन उन मानवीय समस्याओं से निपटने का मौलिक और प्रधान तरीका है जो हमारे सामने आती हैं। नियोजन एक दृष्टिकोण होता है, एक मनोवृत्ति है और ऐसी मान्यता है जो हमें यह बताती है कि हमारे लिए क्या संभव है कि हम अपने भाग्य के विषय में अनुमान लगा सकते हैं भविश्यवाणी कर सकते हैं उसे निर्देशित कर सकते हैं और उसे नियंत्रित कर सकते हैं। जब हम सामुदायिक नियोजन की धारणा को स्वीकार की लेते हैं तो हम अपने दर्शनशास्त्र की व्याख्या करते हैं या व्यक्तियों और उनके द्वारा अपने भविश्य को नियंत्रित करने की क्षमता के विषय में अपना पूर्ण मत प्रगट करते हैं। नियोजन के लिये व्यावसायिक कार्यकर्त्ता और विशेष निपुणताओं की आवश्यकता पड़ती है और इस निपुणता का प्रयोग नियोजन के पांच पक्ष दर्शाता है :-
  1. व्यावसायिक निपुणता एक निरन्तर प्रक्रिया की स्थापना के लिये आवश्यक है जिसके द्वारा सामुदायिक समस्याओं को पहचाना जाता है। 
  2. व्यावसायिक निपुणता तथ्यों के संकलन हेतु एक प्रक्रिया की स्थापना के लिये आवश्यक होती है जिससे समस्या से संबंधित सभी सूचनाओ का सरला से प्रसार किया जा सके। 
  3. योजना के प्रतिपादन के लिये एक कार्यात्यक प्रणाली का सृजन करने के लिये व्यावसायिक निपुणता का प्रयोग किया जाना आवश्यक होता है। 
  4. योजना का प्रतिपादन सामुदायिक संगठन की सम्पूर्ण प्रक्रिया में एक बिन्दु-मात्र ही होता है। इस प्रतिपादन के पहले और बाद में क्या होता है वह अधिक महत्वपूर्ण होता है। 
  5. योजना के कार्यान्वयन में कार्यविधियों के निर्धारित करने में व्यावसायिक निपुणत की आवश्यकता पड़ती है। 
नियोजन शून्य में नहीं किया जाता। इसके लिए उद्देश्य चाहिये। योजना के परिणामस्वरूप कुछ उपलब्धियां होनी चािहेये। उद्देश्य तो एक मानचित्र होते हैं जो हमें यह दिखाते हैं कि हमें कहां जाना है और हम किन रास्तों से जा सकते है। हमें उस समुदाय का पूरा ज्ञान  होना चाहिये जहाँ हम सामुदायिक संगठन के अभ्यास के लिये जाते हैं। समाज कार्य के कार्य, समुदाय में संस्था या अभिकरण की भूमिका, समूह की विशिष्ट आवश्यकताएँ और व्यक्तियोंकी विशिष्ट आवश्यकताएँ चार प्रमुख क्षेत्र हैं जो उद्देश्यों के निर्धारण में हमारी सहायता करते हैं।

समुदाय में मनोवैज्ञानिक तत्परता का सृजन करने और उसमें नियोजन करने की इच्छा का सृजन करने के लिये सहायता दी जानी चाहिये। यह समझना आवश्यक है कि नियोजन एक सकारात्मक प्रक्रिया है न कि एक नकारात्मक प्रक्रिया। नियोजन के प्रति यह भय नहीं चाहिये कि इसमें एक परम नियंत्रण होता है। आंशिक नियोजन करना सही नहीं होता।

नियोजन के सिद्धान्त 

नियोजन के सिद्धान्तों में प्रशासन के जिन निम्न महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का उल्लेख टे्रकर ने किया है वह सामुदायिक संगठन के अभ्यास में भी उतनी ही महत्ता रखते हैं।
  1. प्रभावशाली होने के लिये नियोजन उन व्यक्तियों की अभिरूचियों और आवश्यकताओं से, जिनसे संस्था बनती है, उत्पन्न होना चाहिए। 
  2. प्रभावशाली होने के लिये नियोजन में वह लोग जो नियोजन से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होगें योजना के बनाये जाने में भागीदार होने चाहिये। 
  3. अधिक प्रभावशाली होने के लिये, नियोजन का एक पर्याप्त तथ्यात्मक आधार होना चािहेये।
  4. अधिक प्रभावशाली योजनाएँ उस प्रक्रिया से जन्मती हैं जिसमें आमने-सामने सम्पर्क की प्रणालियों और अधिक औपचारिक कमेटी कार्य की प्रणालियों की मिश्रण होता है। 
  5. परिस्थतियों की भिन्नता के कारण नियोजन प्रक्रिया का व्यक्तिकरण और विशिष्टीकरण किया जाना चाहिए। अर्थात् स्थानीय परिस्थिति के अनुसार ही योजनाएँ बनायी जानी चाहिये।
  6. नियोजन में व्यावसासिक नेतृत्व की आवश्यकता पड़ती है। 
  7. नियोजन मे स्वयंसेवकों, अव्यावसायिक व्यक्तियों, सामुदायिक नेताओं के साथ-साथ व्यावसायिक कार्यकत्र्ताओं के प्रयासों की भी आवश्यकता पड़ती है। 
  8. नियोजन में दस्तावेजों को रखने और पूर्ण अभिलेखन की आवश्यकता पड़ती है जिससे विचार-विमर्श के परिणामों को निरंतरता और निर्देशन के लिये सुरक्षित रखा जा सके। 
  9. नियोजन में विद्यमान योजनाओं और साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिये और हर बार प्रत्येक नई समस्या को लेकर आरम्भ से ही कार्य आरम्भ नहीं करना चाहिये।  
  10. नियोजन क्रिया के पूर्व चिन्तन पर निर्भर करता है। 
नियोहन में सहभागिता/भागीदारी के महत्व को कम नहीं समझना चाहिये। समुदाय के सदस्यों को नियोजन की प्रक्रिया में और योजना के कार्यान्वयन के सभी चरणों पर भाग लेना चाहिये। केन्द्रीकरण और विशेषज्ञता के कारण व्यक्ति भाग लेने में कठिनाई अनुभव करते हैं। यह सब सहभागिता में बाधाएँ हैं। इन्हें दूर किया जाना चाहिये। नियंत्रण केन्द्र और कार्यस्थल में निकट सम्र्पक होना चाहिये। समुदाय के सदस्यों द्वारा नियोजन और योजनाओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहन देने के लिए संचार की सभी विधियों का प्रयोग किया जाना चाहिए। जनता में निश्क्रियता की भावना को समाप्त किया जाना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब यह समझने का प्रयास किया जाए कि किस सीमा तक समुदाय के सदस्य समुदाय की प्रकृति और उसकी विशेषताओं और समस्याओं को समझते हुए उनके समाधान के प्रयासों में भाग लेने के उरदात्वि को समझते है; किस सीमा तक समुदाय संचार के माध्यम स्थापित करता है जिसस विचारों, मतों, अनुभवों, योगदानों को दूसरों तक पहुंचाया जा सके; किस सीमा तक समुदाय के सदस्य और कार्यकारिणी के सदस्य आदि सरलता और प्रभावशाली तरीके से सभी कार्यों में भाग लेते हैं; किस सीमा तक भाग लेने से सदस्यों को आत्म-संतुष्टि होती है और किस प्रकार कार्यकर्त्ता इस भागीदारी की प्रक्रिया का निर्देशन करते हैं।

सामुदायिक परिषद तथा सामुदायिक दान पेटी 

अमरीका के नगरों तथा महानगरों में सामुदायिक परिशदें तथा सामुदायिक दान पेटियां सामुदायिक संगठन की प्राथमिक एवं प्रमुख इकाइयां मानी जाती है। सामुदायिक कल्याण परिशदें बहुत अच्छा कार्य कर रही है। ये तीन प्रकार की है:-
  1. परम्परागत सामाजिक संस्थाओं की परिशदें 
  2. सामुदायिक कल्याण परिशदें 
  3. विशेषीकृत परिशदें। 
पहली प्रकार की परिशदें समाज कल्याण विभाग से सम्बन्धित है। सामुदायिक कल्याण परिशदें सामान्य तथा समाज कल्याण से सम्बन्धित है तथा वे प्राय: सामाजिक क्रिया में लगी रहती है। वे सामाजिक संस्थाओं को समन्वित भी करती है। साथ ही साथ ये परिशदें स्वास्थ्य परिशदें एवं कल्याण कार्यक्रमों में सुधार भी लाती है। विशेषीकृत कौन्सिलें इन दोनों परिवार एवं बाल कल्याण, शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य, पुनर्वासन, युवा सेवाओं जैसे सुधारात्मक कार्यक्रमों का आयोजन करती है।

परिशदें ऐच्छिक संस्थायें होती है जिनका कार्य तथ्यों का पता लगाना, नियोजन करना, वार्तालाप को प्रारम्भ करना तथा बढ़ाना, टोली भावना को प्रोत्साहन देना, संस्थाओं की कार्यात्मकता को बढ़ाना, जन सम्बन्धों को अधिक उपयोगी बनाना तथा सामाजिक क्रिया  को प्रोत्साहन देना होता है। सामुदायिक दानपेटियां आज के वित्तीय संगठनों का प्रतिरूप है। इनका महत्वपूर्ण कार्य संस्थाओं को वित्तीय सहायता देने के लिए धनराशि एकत्रित करना है। इसके अतरिक्त ये दानपेटियां जनता से सामाजिक कल्याण की संस्थाओं को सहायता करने की अपील भी करती है।

सामुदायिक विकास तथा सामुदायिक संगठन 

सामुदायिक विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सामान्य रूप से आर्थिक तथा सामाजिक उन्नति करने का प्रयास किया जाता। समुदाय स्वयं इन उपायों को करता है ताकि इसकी आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति में सुधार हो सके। सामुदायिक विकास में मानव कल्याण के लिए दो प्रकार की शक्तियों का एकीकरण होना आवश्यक होता है। ये शक्तियां है :
  1. सहयोग, आत्म सहायता, आत्मसात करने की योग्यता, तथा शक्ति। 
  2. सामुदायिक तथा आर्थिक क्षेत्र से सम्बन्धित तकनीकी ज्ञान की उपलब्धता। 
सामुदायिक विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा जनता के प्रयासों को शासकीय सत्ता के साथ एकीकृत कर समुदाय की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक दशाओं में सुधार लाया जाता है। सामुदायिक विकास के निम्न तत्व उल्लेखनीय है: -
  1. कार्यकलाप समुदाय की मूल आवश्यकताओं से सम्बन्धित हो। काय्र का सीधा सम्बन्ध लोगों की अनुभूत आवश्यकताओं से सम्बन्धित हो। 
  2. बहुउद्देशीय कार्यक्रम अधिक प्रभावी होते है।
  3. जनसमुदाय की मनोवृत्तियों में बदलाव लाना आवश्यक होता है।
  4.  स्थानीय नेतृत्व को प्रोस्साहन दिया जाना चाहिए। 
  5.  महिलाओं तथा युवकों की कार्यक्रम में सहभागिता सफलता की ओर ले जाता है। 
  6. स्वेच्छिक संस्थाओं के स्रोतों का अधिक से अधिक उपयोग किया जाना चाहिए। 
सामुदायिक विकास तथा सामुदायिक संगठन में अन्तर है। सामुदायिक विकास कार्यक्रम सरकार द्वारा आर्थिक विकास के लिए जनता के बीच चलाये जाते है। यहॉ पर लोगों की आर्थिक दशा को सुधारने पर अधिक बल दिया जाता है। इसके लिए सरकार द्वारा दक्ष सेवायें प्रदान की जाती है। सामुदायिक संगठन द्वारा समुदाय की अनुभव की जाने वाली आवश्यकताओं एवं सामुदायिक संसाधनों में समायोजन स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। सामुदायिक एकीकरण तथा परस्पर सहयोग पर अधिक बल दिया जाता है।

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