सामुदायिक संगठन में निपुणता

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अनुक्रम
सामुदायिक संगठन समाज कार्य की एक प्रणाली है। एक प्रणाली का अर्थ ज्ञान और सिद्धान्तों का योग ही नही है। प्रणाली का अर्थ ज्ञान और सिद्धान्तों का एक क्रियाकलाप में इस प्रकार प्रयोग कि उससे परिवर्तन हो जाए। यही निपुणता कहलाती है। इसे वर्जीनिया रॉबिन्सन (Virginia Robinson) ने किसी विशेष पदार्थ में परिवर्तन की एक प्रक्रिया को इस प्रकार गतिमान करने और उसे नियन्त्रण में रखने की क्षमता कहा है जिससे परिवर्तन जो पदार्थ में आता है वह उस पदार्थ की योग्यता और गुणता के प्रयोग से प्रभावित हो।

सामुदायिक संगठन में निपुणता का आशय

जॉनसन के अनुसार प्रत्येक व्यवसाय की अपनी-अपनी निपुणताएॅ होती हैं। निपुणताओं का मानकीकरण नहीं किया जा सकता। निपुणता में कार्यकर्त्ता और विषय की क्षमता सम्मिलित होती है उसके अनुसार क्षमता निम्न तरीकों से सामने आती है:-

  1. जिस तरीके से सौहार्द या घनिश्ठता स्थापित की जाती है:
  2. जिस तरीके से व्यक्तियों की अपनी भावनाओं को निर्मुक्त करने में और प्रतिरोध पर काबू पाने में सहायता दी जाती है:
  3. जिसे तरीके से व्यक्तियों को वैयत्तिक एवं सामाजिक प्रबोध का विकास करने और वांछित सामाजिक उद्देश्यों के लिये संप्रेरित किया जाता है;
  4. जिस तरीके से व्यक्तियों को अपने विचार स्पष्ट करने और अपने उद्देश्यों की व्याख्या करने में सहायता दी जाती है;
  5. जिस तरीके से समाज कल्याण सम्बन्धी आवश्यकताओं, साधनों और कार्यक्रम का ज्ञान व्यक्तियों को उनके प्रयोग के लिये दिया जाता है;
  6. जिस तरीके से विचारों की एकता और एकीकरण प्रयास के आधार के रूप में प्राप्त किया जाता है; और 
  7. जिस तरीके के उद्देश्यों की ओर गति को बनाये रखा जाता है।

सामुदायिक संगठन में निपुणताओं और कार्यविधियों का उल्लेख करते हुए राव ने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों में दक्षता से कार्य करने के लिए सामुदायिक कार्यकर्त्ता को समाज कार्य की मौलिक प्रणालियों में अपने प्रशिक्षण पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है जिसमें उसकी मनोवृतियॉ, ज्ञान और प्रबोध और अभ्यास सम्मिलित होते है। सामुदायिक संगठन में कार्यकर्त्ता के ज्ञान का आधार सामुदायिक प्रक्रियाओं जैसे सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक स्तरीकरण, नेतृत्व, सामूहिक गतिकी आदि पर होता है। सबसे अधिक महत्पूर्ण सामाजिक अन्त:क्रियाओं (सकारात्मक एवं नकारात्मक) और सामाजिक नियन्त्रण के साधनों का ज्ञान होता है। राव ने जॉनसन का हवाला देते हुए सामुदायिक संगठन कार्यकर्त्ता में कर्इ प्रकार की निपुणताओं का होना अनिवार्य बताया है जैसे (1) व्यक्तियों, समूहों और समुदाय के आन्तरिक सम्बन्धों का निर्माण और उन्हें बनाये रखने की योग्यता; (2) उर्पयुक्त समय को देखकर व्यावसायिक निर्णय के प्रयोग की मौलिक निपुणता; (3) समुदाय में रूचि के कम होने या समाप्त होने के प्रति संवेदनशीलता (4) समुदाय के कल्याण सम्बन्धी योजना को कब आरम्भ किया जाए और कब प्रयास को रोका जाए, इसकी सूझ-बूझ; और (5) सामान्य उद्देश्यों के लिये सामूहिक चिंतन को विकसित करने और उसका प्रयोग करने में निपुणताओं में राव ने जिनको माना है वह है:-

साक्षात्कार और परामर्श में निपुणता

एक समाज कार्यकर्ता को साक्षात्कार एवं परामर्श सम्बन्घी समस्त जानकारी होनी चाहिये ताकि वह साक्षात्कार के दौरान उन सभी पहलुओं को शामिल कर सकें जो उस कार्य हेतु अति आवश्यक है और जो उद्देश्य पूर्ति हेतु सहजता प्रदान करते हैं। एक सामुदायिक कार्यकर्ता को साक्षात्कार की निपुणताओं एवं कौशलों का बड़ी निपुणता से पालन करना चाहिए। समुदाय की आवश्यकताओं एवं समस्याओं का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये। परामर्श के दौरान निश्पक्षता से कार्य संपादित करना चाहिये। कि कुशल परामर्शदाता सदैव ही परामर्श की कुशलताओं का प्रयोग करते हुए कार्य करता है।

अभिलेखन एवं प्रतिवेदन में निपुणता

प्रत्येक कार्य की कुशलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका अभिलेखन कितने प्रभावी ढ़ग से एवं कुशाग्रता से किया गया है। अभिलेखन की प्रभाविकता से ही कार्य संपादन एवं सार्थकता प्राप्त की जा सकती है।एक कुशल अभिलेखनकर्ता को ,अभिलेखन के 51 दौरान समाज कार्य की निपुणताओं का पूर्ण ज्ञान आवश्यक होता है जिसके द्वारा अभिलेखन को प्रभावी ढ़ग से सम्पादित किया जा सकता है।अभिलेखन एवं प्रतिवेदन की निपुणता से एक समाज कार्य कर्ता अपने कार्यकुशलताओं का प्रयोग करते हुए कार्य प्रतिपादित करता है।

अनुसंधान की विधियों में निपुणता

आंकडे एकत्रित करते समय समाज कार्य कर्ता अनुसंधान की प्रविधियों का प्रयोग करता है जिससे उसे कार्य क्षेत्र से सम्बधित तथ्यपरक एवं वास्तविक आंकडे एकत्रित किये जा। प्राथमिक एवं द्वितीय आंकडों के संग्रहण में अनुसंधान कर्ता को क्षेत्र से सम्बन्धित आंकड़ों के संग्रहण में प्राथमिक एवं द्वितीय विधियों का प्रयोग करता है।जो कि आगे चलकर समस्या समाधान में प्रभावकारी भूमिका निभातें है। अत: एक समाज कार्य कर्ता को आंकडों के संग्रहण के दौरान अनुसंधान की प्रविधियों का प्रयोग करते हुए तथ्यों का संग्रहण करना चाहिये जो कि वास्तविक अनुसंधान में सहायक सिद्द होते है।

नीति निर्धारण

एक समाज कार्य कर्ता को नीति निर्धारण के समय वस्तुनिश्ठता के साथ कार्य सम्पादित करना चाहिये क्योंकि एक सामाजिक कार्य कर्ता नीति निर्धारण के समय समस्या के समस्त पहलुओं के ज्ञान के पश्चात ही नीति का निर्धारण करता है जोकि उसे समस्या समाधान में सहायक होती है।

कार्यक्रम नियोजन, कल्याण साधनों का न्यायोचित आवंटन

कार्यक्रम नियोजन में एक सामाजिक कार्य कर्ता का यह सर्वोपरि दायित्व होता है कि वह कार्यक्रम नियोजन के समय बिना भेदभाव के कल्याण के साधनों का न्यायोचित आवंटन करें ताकि लाभ का अंश सभी में समान रूप से वितरित हो सके। समुदाय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम नियोजन किया जाना चाहिये।

कमेटी संगठन, प्रशासकीय कार्यविधियों में निपुणता

एक सामाजिक कार्य कर्ता को सामुदायिक संगठन की प्रभाविकता को बनाए रखने के लिए एवं कल्याण के साधनों का न्यायोचित आवंटन करने हेतु प्रशासकीय कार्यविधियों में निपुणता होना अति आवश्यक है जिससे कि एक सामाजिक कार्य कर्ता सरकारी योजनाओं से सामुदायिक जन को लाभान्वित करा सके एवं सरकारी योजनाओं का सामुदायिक स्तर पर समानता से वितरण करा सकने में सार्मथ्यदाता की भूमिका निभाना तथा लोगों को सरकारी योजनाओं से अवगत कराना ताकि वे अपना लाभ सुनिश्चत कर सके।

सामाजिक नीति के निर्धारण में विधायिक स्तरों का ज्ञान

कर्इ बार देखने में आता है कि सामुदायिक स्तर पर योजनाओं के लाभान्वितों को लाभ का पूरा अंश नहीं मिल पाता है एवं स्थानीय स्तर पर अनेक प्रकार के भ्रष्टाचार व्याप्त रहते है 52 जिससे लाभ सही रूप् में आम जन तक नहीं पहुॅच पाता है अत: ऐसे में यदि एक सामुदायिक कार्य कर्ता को योजनाओं की पूर्ण जानकारी एवं विधायिक स्तरों का ज्ञान होगा तो सामुदायिक स्तर पर योजनाओं के लाभ को आम हित तक सुनिश्ति किया जा सकेगा।

सामुदायिक संगठन में कार्यकर्ता की भूमिका

सभी समाज कार्य की भाँति सामुदायिक संगठन कार्य में भी सम्बन्धों का कुशलतापूर्वक प्रयोग एक प्रमुख उपकरण के रूप में किया जाता है जिससे कार्यकर्ता अधिक संतोशजनक रहन-सहन की प्राप्ति के लिए अपने आप का चतन और नियत्रित प्रयोग सुदाय की सहायता के लिए करता है। व्यक्तिगत समाज कार्य कार्यकर्ता और समूह समाज कार्यकर्ता की भाँति उसे भी अपने आपक ाक और पनी सम्प्रेरणाओं का ज्ञान होना चाहिए और नियत्रंण और जोड-तोड़ की भावनाओं का ज्ञान होना चाहिए। उन परिस्थितियों में जब समुदाय में उचच स्तरीय सरकारी और निजी संस्थाएँहों और उनमें समन्वय हो तो कार्यकर्ता में प्रशासन, वित्त, कमेटी कार्य नियोजान और नीति को कार्य रूप देने की निपुणता और अनुभव भी होना चाहिए।

कार्यकर्ता समुदाय को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता देता है उसे पूरे समुदाय या उस भाग, जिसमें उसे कार्य करने को कहा गया है, का पूरा ज्ञान होना चाहिए। उसे अपनी और समुदाय क प्राधिकार की प्रकृति का ज्ञान होना चाहिए। से इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि किस प्रकार व्यक्तियों और समूहों क साथ कार्य किया जाता है और उसके कार्य करने का क्या उद्देश्य है। वह व्यक्तियों और उनके औपचारिक और अनौपचारिक संगठनों को साथ मिलने और आपस में सहयोग करने मे सहायता देता है। सामुदायिक संगठन में विभिन्न प्रकर के क्रियाकलाप और विधियाँ सम्मिलित हैं। इसमें कर्इ प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं। इन कार्यो को सफलता से करने के लिये कार्यकर्ता को कर्इ प्रकार ज्ञान और अनुभव की आवश्यकता पड़ती है। कार्यकर्ता के व्यक्तिगत गुण और विशेषताएँ, सामान्य शिक्षा और अनुभव मिलकर उसे समुदाय में अपनी भूमिका निभाने में सहायता करते हैं। डनहम के अनुसार कार्यकर्ता को अपनी भूमिका को सफलता से निभाने के लिये निम्नलिखित बातों की आवश्कता पड़ती है –

  1. व्यक्तियों से निपटने के लिये अनुभव की आवश्यकता।
  2. समाज कल्याण क्षेत्र और स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर के समाज कल्याण साधनों का अच्छा कार्यात्मक ज्ञान ।
  3. सामुदायिक संगठन का प्रबोध और कार्यात्मक ज्ञान सामुदायिक संगठन के अभ्यास में निपुणता ।
  4. व्यक्तिगत गुण जैसे-र्इमानदारी,हिम्मत,सवेगात्मक संतुलन एवं समायोजन कल्पना, वस्तुनिश्ठता आदि।
  5. सामुदायिक संगठन का एक ठोस दर्शनशास्त्र।

रौस ने सामुदायिक संगठन में व्यावसायिक कार्यकर्ता की चार प्रमुख भूमिकाएँ बतायी हैं –

  1. कार्यकर्ता एक पथ प्रदर्शक के रूप में
  2. एक सामथ्र्यदाता के रूप में
  3. एक विशेषज्ञ के रूप में
  4. एक सामाजिक चिकित्सक के रूप में

1. कार्यकर्ता एक पथ प्रदर्शक के रूप में :सामुदायिक संगठन में व्यावसायिक कार्यकर्ता एक पथ प्रदर्शक के रूप में प्राथमिक भूमिका निभाता हुआ समुदाय को अपने उद्देश्यों को निश्चित करने और प्राप्त करने में साधनों का पता लगाने में सहायता करता है। समुदाय को अपने विकास को खुद निर्धारित की गयी दिशा की ओर बढ़ने में सहायता देता है। अपने ज्ञान और भूतपूर्व अनुभव के आधार पर समुदाय को अपनी दिशा को चयन करने में सहायता देता है। वह समुदाय को अपने निजी स्वार्थो के लिए उपयोग नहीं करता और न ही अपने स्वार्थ के लिए समुदाय में जोड़-तोड़ करता है। पथ प्रदर्शक के रूप में उसकी भूमिका निम्नलिखित दृष्टिकोण लिये होती है।

  • पहल :पथ प्रदर्शक की भूमिका में हस्तक्षेप न करने की नीति नहीं होती। यदि कोर्इ समुदाय सहायता लेने खुद नहीं आता तो कार्यकर्ता खुद समुदाय के पा पहुचने में पहल करता है, वहस् थानीयय पहल को प्रोत्साहन देता है पर एक निश्क्रिय व्यक्ति नहीं बना रहता। कुछ परिस्थितियों में वह समुदाय में असन्तोष की भावना लाने में पहल करता है। जिससे समुदाय की अवांछनीय दशाओं में सुधार लाया जा सकें।
  • वस्तुनिश्ठा: वह समुदाय की दशाओं के प्रति वस्तुनिश्ठता का भाव रखता है।
  • समुदाय से तादात्मीकरणरू वह समुदाय के किसी एक भाग के साथ नहीं मिलता। वह समूह की अपेक्षा सम्पूर्ण समुदाय में अपने आपको सम्मिलित करता है और इस प्रकर किसी एक भाग या किसी एक समूह या वर्ग के चुंगल में नहीं फंसता।भूमिका की स्वीकृति: कार्यकर्ता अपनी भूमिका को स्वीकार करता है और उसे आसानी और सुखद भावना से निभाता है।
  • भूमिका के अर्थनिरूपण : कार्यकर्ता अपनी भूमिका के अर्थ स्पष्ट करता है जिससे वह समुदाय द्वारा ठीक से समझी जा सकें।

2. एक सामथ्र्यदाता के रूप में : सामथ्र्यदाता के रूप में कार्यकर्ता की भूमिका केवल संगठन की प्रक्रिया को सफल बनाना है। परन्तु यह भूमिक इतनी ही विस्तृत एव जटिल होती है जितनी कोर्इ परिस्थिति जटिल होती है। यह भूमिका निम्नलिखित दृष्टिकोण लिए होती हे।

  • असंतोश को केन्द्रित करना : कार्यकर्ता समुदाय की दशाओं के प्रति असंतोश को जागृत करके और उस केन्द्रित करने में समुदाय की सहायता करता है। वह समुदाय के सदस्यों को अपने भीतर झांकने में और सामुदायिक जीवन के विषय में अपनी गहन भावनओ की खोज करने में सहायता देत है और उन्हें इन भावनाओं के स्फुटीकरण में सहायता देता है। जिन बातों के विषय में घोर मतभेद होता है उनका स्पष्टीकरण करता है और समुदाय में सहयोग की भावना का विकास करने में सहायता देता है।संगठन को प्रोत्साहित करना: बहुत से समुदाय ऐसे होते हैं जो आसानी से संगठित होने की दिशा में नहीं चल पाते। नगरीय समुदायों में उदासीनता का एक सामाजिक दोष होता है और इसके साथ शिथिलता का तत्व होता है। इसलिए कार्यकर्ता का समुदाय में धैर्य के साथ संगठन लाने में सहायता करनी चाहिए क्योंकि इस प्रकार के समुदायों में सामुदायिक संगठन की प्रक्रिया बहुत धीमे-धीमे होती है।
  • अच्छे अन्र्तवयैक्तिक सम्बन्धों को बढ़ावा देना: कार्यकर्ता समुदाय के सदस्यों के अच्छे अन्र्तवैयक्तिक सम्बन्धों के प्रति संतुष्टि की मात्रा को बढ़ाने और सहकारिता की भावना में वृद्धि करने में सहायता देता है। सामुदायिक संगठन के प्रथम चरणो में कार्यकर्ता ही विभिन्न समूहों के बीच एक मात्र कड़ी के रूप में कार्य करता है और विभिन्न समूहों के आपस में मिलने का माध्यम बनता है।
  • सामान्य उद्देश्यों पर बल: व्यावसायिक कार्यकर्ता समुदायिक साधनां और प्रभावशाली नियोजन का विकास करने के लिए सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति पर बल देता है। एक सामर्थदाता के रूप में कार्यकर्ता की भूमिका समुदाय के नेताओं के माध्यम से समुदाय को अपनी समर्थताओं की िनुयक्ति में सहायता देना है। वह व्यक्तियों को सामाकि समस्याओं के विषय में अपनी चिन्ता व्यक्त करने का अवसर देता है। समुदाय को एकत्र करता ह और प्रयासा में सहाकारिता लाकर संतुष्टि प्राप्त करने में सहायता देता है। वह खुद समुदाय का नेतृत्व नहीं करता। वह केवल स्थानीय प्रयास को ही प्रोत्साहन देता है। वह समुदाय में संगठन और क्रिया या प्रयास करने का उत्तरदायित्व नहीं लेता वरन् समुदाय के सदस्य जो इसका उत्तरदायित्व ग्रहण करते है उन्हें उत्साह और सहयोग देता है।

3. कार्यकर्ता एक विशेषज्ञ के रूप में : एक विशेषज्ञ के रूप में कार्यकर्ता समुदाय की सूचना और अनुभव के आधार पर परामर्श देता है। विशेषज्ञ के रूप में वह अनुसंधान के निश्कर्श या अनुसंधान पर आधारित सूचनाएॅं, प्राविधिक अनुभव, साधन सामग्री, कार्य प्रणालियों के विषय में परामर्श आदि उपलब्ध करता है। वह समुदाय को उससे सम्बन्धित तथ्यों और साधनों का ज्ञान कराता है। समुदाय को क्या करना और क्या नही करना चाहिए इस सम्बन्धी सिफारिष नहीं करता बल्कि ऐसी सूचना और सामग्री उपलब्ध कराता है जिसके आधार पर समुदाय खुद निर्णय ले कि उसे क्या करना चाहिए। एक विशेषज्ञ के रूप में वह सामाजिक तथ्यों को समुदाय के सामने रखता है। कार्यकर्ता की यह भूमिका निम्नलिखित दृष्टिकोण लिये होती है।

  • सामुदायिक निदान: कार्यकर्ता समुदाय के विश्लेषण एवं निदान में एक विशेषज्ञ के रूप में सहायता देता है। बहुत से समुदाय अपनी संरचना और संगठन का ज्ञान नहीं रखते। कार्यकर्ता समुदाय की विशेषताओं को समुदाय को बताता है।
  • अनुसंधान निपुणता : कार्यकर्ता को अनुसंधान की विधियों में निपुण होना चाहिये स्वतन्त्र रूप से समुदाय के अध्ययन और अनुसंधान नीति के प्रतिपादन के योग्य होना चाहिए। 
  • दूसरे समुदाय के विषय में जानकारी : कार्यकर्ता को अन्य समुदायों में हुए अध्ययन, अनुसंधान और प्रयोगात्मक कार्यो का पूरा ज्ञान होना चाहिये । इन पर आधारित उपयोगी सिद्धान्तों के विषय में उसे समुदाय को जानकारी देनी चाहिए जिससे वह अन्य समुदायों के अनुभवों से लाभाविन्त हो सके और उन गलतियों से बच सके जो दूसरे समुदायों ने की हो। 
  • प्रणालियों या विधियों सम्बन्धी परामर्श : कार्यकर्ता को संगठन और इसकी कार्यविधियों का विशेष ज्ञान (expert knowledge) होता है। वह सामुदाकि संगठन के पहले चरणों में समुदाय के सभी प्रमुख समूहों को प्रतिनिधत्व देने की सलाह दे सकता है।
  • प्राविधिक सूचना : कार्यकर्ता को पूर्ण जानकारी होनी चाहिए जिससे वह तकनीकी योजनाओं में साधन सामग्री समुदाय को दे सके। अर्थात् से ज्ञान होना चाहिये कि कौन सी सामग्री या पदार्थ जो परियोजना के लिए आवश्यक है, कहा और कैसे मिल सकते है। उसे सरकारी विभागों, निजी संस्थाओं, अन्र्तराष्ट्रीय संगठनों और विशेषज्ञों की सेवाएँ प्राप्त करन के पूरे तरीकों का ज्ञान होना चाहिए।
  • मूल्याकंन : सामुदायिक संगठन में जो भी सामूहिक कार्य किये जाते हं ै उनका मूल्यांकन समुदाय के सामने रखने की योग्यता उसमें होनी चाहिए।

4. कार्यकर्ता एक सामाजिक चिकित्सक के रूप में: समुदाय में कुछ व्यावसायिक कार्यकर्ता एक सामाजिक चिकित्स के रूप में कार्य करते हैं। चिकित्सा का अर्थ यहाँ सामुदायिक चिकित्सा से है। यह चिकित्सा समुदाय के स्त पर होती है। इसका अर्थ सम्पूर्ण समुदाय का निदान और उपचार है। कार्यकर्ता उन सामाजिक शक्तियों एवं निशेध विचारें का पता लगाता है जो समुदाय में विघटन लाते है और संघर्श उत्पन्न करते है। एक सामाजिक चिकित्सक के रूप में वह समुदाय को यह बताता है कि वह संघर्श को किस प्रकार दूर करे और किस प्रकार समुदाय में एकता और अनुरूपता उत्पन्न करें। समुदाय के निदान के लिए उसे सम्पूर्ण समुदाय या उसके विभिन्न भागों की उत्पत्ति और इतिहास का ज्ञान होना चाहिये तथा उसे समुदाय की प्रकृति और विशेषताओं का ज्ञान होना चाहियें।

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