कर्मचारी भविष्य-निधि एवं प्रकीर्ण प्रावधान अधिनियम, 1952

अनुक्रम

अधिनियम का नाम, विस्तार, उद्देश्य तथा लागू होना 

औद्योगिक विकास के साथ ही कुछ नियोजकों ने अपने कर्मकारों के कल्याण के लिए भविष्य निधि स्कीम लागू किये। लेकिन ऐसी योजनाएं शुद्ध रूप से प्राइवेट और ऐच्छिक थीं। छोटे उद्योगों में कार्यरत मजदूर इस लाभ से वंचित थे। इससे असन्तोष और ईश्र्या होना स्वाभाविक था। ऐसी योजना के सम्पादन की खोजबीन करने के लिए ‘‘लेबर इन्वेस्टीगेशन कमिटी’’ गठित की गई। 11 फरवरी, 1948 में एक प्राइवेट बिल संविधान सभा में पेश की गई ताकि नियोजक प्रतिष्ठानों के कुछ वर्गो को नियोजक भविष्य निधि प्रदान करें। केन्द्रीय श्रम मंत्री के आश्वासन पर कि सरकार महसूस करती है कि ऐसा विधेयक लाया जाए जिससे औद्योगिक प्रतिष्ठानों समेत वाणिज्यिक अन्डरटेकिंग के कर्मकार ऐसी योजना का लाभ पा सके। इसके लिए व्यापक विधेयक लाया जाएगा। इस पर प्राइवेट विधेयक वापस ले लिया गया। 5 नवम्बर, 1951 को भारत सरकार ने ‘इम्प्लाइज प्राविडेन्ट फन्ड्स आर्डीनेन्स’ जारी किया जिस पर स्टैन्डिग लेवर कमिटी ने विचार-विमर्ष कर लिया था। इसका स्थान लोक सभा में पेश बिल ने लिया। संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद 4 मार्च, 1952 को राष्ट्रपति की मन्जूरी मिलने पर इसने अधिनियम का रूप ग्रहण कर लिया।

समुचित सरकार - 

‘समुचित सरकार’ से अभिप्राय है (1) केन्द्रीय सरकार के नियन्त्रण में या उससे सम्पृक्त प्रतिष्ठान या महापतन खान या तेल क्षेत्र या नियन्त्रित उद्योग (या एक से अधिक राज्यों में विभाग या शाखायें रखने वाले उद्योग) या संस्थान के निमित 186 केन्द्रीय सरकार, और (2) दूसरे स्थापनों के निमित राज्य सरकार ही समुचित सरकार मानी जाएगी।

प्राधिकृत अधिकारी -

प्राधिकृत अधिकारी से तात्पर्य केन्द्रीय भविष्य निधि आयुक्त, अतिरिक्त केन्द्रीय भविष्य निधि आयुक्त, उपभविष्य निधि आयुक्त, क्षेत्रीय आयुक्त अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा शास्कीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अधिकृत किए जाने वाले अधिकारी से है।

मूल मजदूरी - 

ये अभिप्राय सभी उपलब्धियां से है, जिसे कि कर्मकार ने अवकाश या कार्यवाही में नियोजन के अनुबन्ध की सभी शर्तो के अनुसार अर्जित किया है। मेसर्स ब्रिज एण्ड रूपस क0 बनाम ऑफ इण्डिया के मामले में निर्धारित किया गया कि इसमें प्रोडक्शन बोनस सम्मिलित करने का केन्द्रीय सरकार का निर्णय सही नहीं था। पक्षकारों के बीच हुए करार के फलस्वरूप देय विशेष भत्ता मजदूरी नहीं ह। स्पेशल् एलाउन्स मूल मजदूरी का भाग है। लेकिन इसमें सम्मिलित नही है। -
  1. किसी खाद्यान्न रियायत का उचित मूल्य 
  2. नियोजक द्वारा की गई भेंटे या उपहार 
  3. कोई मंहगाई भत्ता (अर्थात् ऐसे समस्त भुगतान चाहे उनको कोई भी नाम दिया जाय, जो किसी कर्मकार को निर्वाह व्यय में वृद्धि के कारण देय हो) मकान-भाड़ा भत्ता, अधिक समय भत्ता, अधिक समय भत्ता, बोनस कमीशन या ऐसा ही कोई अन्य भत्ता जो कर्मचारी को उसके नियोजक की बावत देय हो, या ऐसे नियोजन में किए गए काम के सम्बन्ध में देय हो। 
अंशदान से अभिप्राय ऐसे अंशदान से है जो किसी परियोजना के अन्तर्गत किसी सदस्य की बावत देय है या किसी ऐसे कर्मचारी के बारे में देय है जिस पर जीवन बीमा योजना लागू होती है।

नियन्त्रित उद्योग से मतलब उस उद्योग से है जिसका संघ सरकार द्वारा नियन्त्रण केन्द्रीय अधिनियम द्वारा लोक हित में अभीश्ट होना घोषित किया जा चुका है।

नियोजक से तात्पर्य - 

  1. किसी प्रतिष्ठान के निमित जो एक कारखाना है, इसका स्वामी या अधिभोगी (दखलकार) से है और इसमें ऐसे स्वामी या दखलकार का अभिकर्ता मृत स्वामी या मृत अधिभोगी का विधिक प्रतिनिधि भी शामिल है और जहाँ कोई व्यक्ति कारखाना अधिनियम, 1948 की उपधारा (7) (1) क्रिया-कलाप के अधीन कारखाने के प्रबन्धक के रूप में नामित किया गया है वहां ऐसा नामित व्यक्ति आता है, तथा 
  2. किसी अन्य स्थापन के सम्बन्ध में वह व्यक्ति या वह प्राधिकारी जिसका स्थापन के क्रिया-कलाप पर अन्तिम नियन्त्रण है और जहां कथित क्रिया-कलाप किसी प्रबन्धक, प्रबन्ध निदेशक या प्रबन्ध-अभिकर्ता को सौपे गये है; वहां ऐसा प्रबन्धक, प्रबन्ध-संचालक या प्रबन्ध अभिकर्ता/सिविल प्रोसीजर कोड के आर्डर 40 के प्रावधानों के अन्तर्गत किसी आस्थान के लिए नियुक्त रिसीवर नियोजक माना जायेगा, यदि उसका प्रतिष्ठान तथा उसके विद्यमान कर्मचारी-वृन्द पर नियन्त्रण रहता है क्योंकि उसकी चल और अचल सम्पत्ति पर उसका कब्जा होता है। पी0एफ0 के अंशदान की मांग उससे की जा सकती है। 

कर्मकार -

कर्मकार से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है, जो शारीरिक या अन्य काम करने के लिये किसी भी स्थापन में मजदूरी पर नियोजित है और जो प्रत्यक्षत: या परोक्ष रूप से नियोजक से अपनी मजदूरी पाता है और इसमें वह व्यक्ति भी शामिल समझा जायेगा; जो उस स्थापन के काम में या काम के सम्बन्ध में किसी ठेकेदार द्वारा या उसके माध्यम से नियोजित हो।

छूट प्राप्त कर्मचारी से ऐसा कर्मचारी अभिप्रेत है जिस पर कोई योजना या बीमा योजना लागू होती है, यदि धारा 11 के अन्तर्गत प्राप्त छूट न मिली होती। छूट प्राप्त अधिश्ठान से तात्पर्य है कोई अभिश्ठान जिसके निमित धारा 17 के अन्तर्गत किसी परियोजना के समस्त या किन्हीं उपबन्धों के लागू होने से छूट प्रदान की गई है, चाहे ऐसी छूट स्थापन को या उसमें कार्यरत व्यक्तियों के वर्ग को दी गई है।

कारखाना से अभिप्राय अपनी परिसीमाओं सहित किसी ऐसे परिसर से है, किसी भी उद्योगालय से हे, जिसमें उसके निकटतम भाग की सम्मिलित है जिसके किसी भाग में चाहे विद्युत-शक्ति की सहायता से या बिना उसके अभिनिर्माण प्रक्रिया की जा रही है या सामान्यतया इस तरह की जाती है। कारखाने में यहाँ बीड़ी बनाने वालों का निवास स्थान भी सम्मिलित समझा जायेगा, क्योंकि उनका बीड़ी बनाने का काम फैक्टरी में इसी प्रकार काम किए जाने का एक अभिन्न अंग है और वे बनी बीड़ियां बीड़ी निर्माता फैक्टरी में लाते है, जहाँ उन्हें दिये जाने वाले कच्चे माल का रजिस्टर होता है, प्रबन्धकीय प्रशासनिक स्टाफ रहता है। उनमें भी ‘मास्टर और सर्वेन्ट’ का सम्बन्ध होता है।

  1. निधि फण्ड - निधि से अभिप्राय किसी योजना के अन्तर्गत स्थापित निधि से है। सन् 1976 Deposit Linked Insurance Fund में इसमें जोड़ दिया गया।
  2. परिवार पेंशन योजना - से तात्पर्य धारा 6क के अधीन इम्प्लाइज फैमिली पेंशन स्कीम से है।
  3. परिवार पेंशन निधि - परिवार पेंशन योजना के अन्तर्गत स्थापित परिवार पेंशन फण्ड से है।
  4. बीमा विधि - से अभिप्राय डिपाजिट लिंक्ड इन्श्योरेन्स फण्ड से है जिसकी स्थापना धारा 6 (ग) की उपधारा (2) में की गई है।
  5. बीमा योजना - ये तात्पर्य धारा 6 (ग) की उपधारा (1) के अन्तर्गत निर्मित इम्प्लाइज डिपोजिट लिंक्ड इन्श्योरेंस स्कीम से है।
  6. उद्योग - उद्योग से अभिप्राय प्रथम अधिसूची में निदिष्ट किसी उद्योग से है और उसमें धारा 4 के अधीन अधिसूचना द्वारा अनुसूची में जोड़ा गया संलग्न काई अन्य उद्योग भी सम्मिलित है।
  7. अभिनिर्माण या अभिनिर्माण प्रक्रम से तात्पर्य किसी वस्तु या पदार्थ का प्रयोग, बिक्री, परिदान या व्ययन की दृष्टि से उसका निर्माण, परिवर्तन, अलंकरण, निहन, धुलाई, उन्मूलन, विघटन या अन्यथा अभिक्रियान्वयन या अनुकूलन करने के लिए किसी प्रक्रिया से है। मरम्मत करने, आभूशित करने, फिनिशिंग, फैकिंग, आइलिंग, धोने, सफाई करने, तोड़ने, विनश्ट करने आदि में बरतने के लिये कोई प्रक्रम।
  8. सदस्य - सदस्य से अभिप्राय फण्ड के सदस्य से है।
  9. कारखाने के अधिभोगी (कब्जेदार) से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसका कारखाने पर अन्तिम नियन्त्रण होता है और जहां कथित मामले किसी प्रबन्ध-अभिकर्ता को सौंप दिये गए हैं, वहां ऐसा प्रबन्ध-अभिकर्ता उस कारखाने का अधिभोगी समझा जायेगा।
  10. प्रतिष्ठान - जहां किसी प्रतिष्ठान के विभिन्न विचार है या उसकी शाखाएं हैं, चाहे उसी स्थान पर स्थित है या भिन्न-भिन्न स्थान पर ऐसी सभी शाखाएं या विभाग उसी प्रतिष्ठान के अंग माने जाएंगें।

नियोजक का दायित्व, शासितयाँ एवं प्रक्रिया 

ऐसे व्यापक एवं प्रभावशाली प्रावधान बनाये गए हैं, जिनसे नियोजक नियमोल्लंघन या अधिनियम के सिद्धान्त के विपरीत कोई अपराध करके शास्त्रियों से मुक्त न रह सके। निम्न ढंग से नियोजक दायित्वाधीन होगा -
  1. जब वह समयानुसार भविष्य अंशनिधि को विहित ढंग से जमा नहीं करता है तो इसके लिए 1 वर्ष तक का कारावास तािा 10000 रुपये से कम का जुर्माना नहीं होगा। 
  2. जब नियोजक चालू महीने बीतने के बाद फण्ड जमा करने में जान-बूझकर अधिक विलम्ब करता है। फण्ड की रकम नकद, चेक या ड्राफ्ट में भी जमा की जा सकती है। यदि उद्योग किये जाने वाले स्थान पर रिजर्व बैंक या स्टेट बंकै या उनकी शाखा नहीं, तो अन्य बैंक में फण्ड सम्बन्धी राशि नहीं जमा होगी। उसे उक्त बैंक में से किसी एक में ही किया जाना अनिवार्य होगा। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के प्रकाश में क्या अब उक्त बैंक में से किसी एक में ही किया जाना अनिवार्य होगा। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के प्रकाश में क्या अब अन्य बैंकों में भी यह राशि जमा की जा सकेगी, इसके विषय में अभी कोई स्पष्टीकरण नहीं प्राप्त हुआ है। 
  3. जब नियोजक किसी रकम को अदत्त रखता है, जो विधिक रूप में देय हो या की गई हो। शोध्य राशि का निर्णय सेन्ट्रल प्राविडेन्ट फण्ड कमिश्नर या डिप्टी कमिश्नर फण्ड या कोई रीजनल प्राविडेन्ट फण्ड कमिश्नर करने की क्षमता रखता है। नियोजक से शोध्य रकम सरकार द्वारा वैसे ही वसूल की जायेगी, जैसे भू-राजस्व। देय राशि को अदत्त रखने पर नियोजक जिम्मेदार होगा। 
  4. नियोजक के धारा 11 के उपबन्धों के प्रतिकूल कार्य करने पर उसे दण्ड का भागी बनाया जायेगा। सभी ऋणों के भुगतान का प्रश्न उठने पर फण्ड के लिए योगदान को प्राथमिकता दी जायेगी। यदि नियोजक कर्मकारी के और अपने योगदान को जमा न करके अन्य ऋणों का भुगतान करता है, तो क्या उसे दण्ड का भागी बनाया जाना न्यायोचित न होगा ? 
  5. कोई भी नियोजक, जब फण्ड के लिए योगदान की राशि को कर्मकारों की मजदूरी से कटौती करेगा, वह उत्तरदायी होगा। प्रत्यक्ष रूप से किसी भी प्रकार नियोजक अपने आर्थिक भार को नियोजिती वर्ग पर नहीं लाद सकता, उसे अपने कर्त्तव्य का निर्वाह तो करना ही पड़ेगा। अपने हिस्से के किये जाने वाले योगदान को वह कर्मचारियों को मजदूरी से नहीं काट सकता। कटौती करने पर उसे दोषसिद्ध किया जायेगा। 
  6. निरीक्षकों के आदेश का पालन न करने पर नियोजक दण्डित किया जायगा। जब उससे रजिस्टर, अभिलेख-रिकार्ड या अन्य आवश्यक कागजात निरीक्षण के लिए मांगे जाते हैं, जब उससे आदेशानुसार कार्य करने की अपेक्षा की जाती है। चूंकि, निरीक्षक लोकसेवक माने जाते है।, इसलिये उनकी अवमानना या अवैधानिक ढंग से उनके कार्य में व्यवधान डालना दण्डनीय होगा। 
  7. जब नियोजक अपने यहां नियोजित कर्मकार के स्थापन में काम छोड़कर अन्यत्र चले जाने पर उसके फण्ड को हस्तान्तरित नहीं करता। जैसा कि नियमत: उसे धारा 17 (अ) अनुसार कर देना चाहिये। 
भविष्य निधि पर ब्याज भी देय होता है - समय-समय पर ब्याज की दरों में परिवर्तन होता रहता है। पहले यह दर 12): थी लेकिन कोई नतीजा न निकल सका। वाम दल भी 10 प्रतिशत से कम पर राजी नहीं रहे। अन्ततोगत्वा सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि के केन्द्रीय बोर्ड की सिफारिश पर 4 करोड़ से अधिक ग्राहकों को 2006-07 के दौरान उनकी जमाराशि पर 8.5 प्रतिशत ब्याज देने की अधिसूचना 20 अक्टूबर, 2007 को केन्द्र सरकार ने जारी कर दी। सभी क्षेत्रीय निधि आयुक्तों को इस फैसले पर अमल सुनिश्चित और सम्बन्धित वर्ष का वार्षिक लेखा बयान भी तैयार करने और बताने का निर्देश दे दिया गया है।

अंश जमा न करना आर्थिक अपराध और गैर जमानती अपराध होगा शासितयों और प्रक्रियाओं का उल्लेख धारा 14 (अ), 14 (ब) तथा धारा 8 में किया गया है। उनके उपबन्धों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि दण्ड विधान -
  1. नियोजकों के लिए तथा 
  2. निगमित निकायों या विधिक व्यक्तियों जैसे कम्पनी, मिल्स और कारखाने के लिए लागू होगा। 
धारा 14 में उपबन्धित है कि समुचित रूप से कर्त्तव्यों के निर्वाह न करने पर किस प्रकार से शासित का प्रयोग किया जायेगा। उसके अनुसार जो कोई भी अपने द्वारा अदायगी किये जाने की बात को टालने के प्रयोजन से या इस अधिनियम या स्कीम के अधीन किसी अन्य व्यक्ति को भुगतान न करने के योग्य बनाता है, या जान बूझकर कोई मिथ्या-विवरण या अभ्यावेदन प्रस्तुत करता है, या ऐसा कराने का या किये जाने का कारण बनता है, तो उसे एक वर्ष तक का कारावास या 5000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों प्रकार का दण्ड दिया जा सकता है।

धारा 14 क ख स्पष्ट करती है कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, 1973, में अन्तर्निहित किसी बात के होते हुए भी नियोजक द्वारा अंशदान की भुगतान में त्रुटि से सम्बन्धित अपराध, जो इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय है, संज्ञेय होगा।

कम्पनियों द्वारा अपराध- 

नियोजकों को दण्डित करने के विधान के साथ ही कम्पनी-जैसे निगमित निकायों को भी दोषभागी बनाने तथा दण्ड देने की व्यवस्था धारा 14 (क) में की गई है। यदि इस अधिनियम या स्कीम या बीमा स्कीम के अधीन अपराध करने वाला व्यक्ति कम्पनी हो तो प्रत्येक जो उस उल्लंघन के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह 190 कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित होने के भागी होंगे।

अधिनियम के अन्तर्गत प्राधिकारीगण- 

अधिनियम के अन्तर्गत मुख्य रूप से सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज, स्टेट बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज, कमिश्नर्स और निरीक्षक-जैसे प्राधिकारियों का उल्लेख तथा निरीक्षकों के सम्बन्ध में अध्याय 7 में विस्तार में उनकी नियुक्ति, अधिकार एवं कर्त्तव्य पर विचार किया गया है। सबसे उच्च अधिकार वाला सेन्ट्रल बोर्ड ही होता है। स्टेट बोर्ड का नम्बर दूसरा है।

सेन्ट्रल बोर्ड की स्थापना, सदस्य-संख्या और कार्य [धारा 5(क)] 

इसमें व्यक्ति सदस्य होंगे -
  1. केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त एक अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष। अध्यक्ष बोर्ड का सर्वोच्च अधिकारी होगा और उसकी अध्यक्षता और सर्वेक्षण में सारे कार्य-कलाप सम्पन्न होंगे। उसकी संख्या सदैव एक रहेगी। वह पूर्ण रूप से स्वतन्त्र व्यक्ति होगा।
  2. पांच से अनधिक ऐसे व्यक्ति होंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अपने अधिकारियों में से नियुक्त किए जाएंगे।
  3. केन्द्रीय भविष्य निधि आयुक्त पदेन।
  4. 15 से अनधिक ऐसे व्यक्ति, जिनकी नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जायेगी और वे ऐसे राज्यों का प्रतिनिधित्व करेंगे जैसा कि सरकार विनिर्दिष्ट करें।
  5. ऐसे स्थापनों के नियोजकों के प्रतिनिधित्व करने वाले दस व्यक्ति, जहां कि यह परियोजना लागू है, जिनकी नियुक्ति केन्द्रीय सरकार नियोजकों के ऐसे संगठनों के परामर्श से करेगी जैसा केन्द्रीय सरकार इस प्रयोजन से मान्यता प्रदान करे।

केन्द्रीय बोर्ड को निर्देश देने की शक्ति - 

धारा 20 के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार समय-समय पर केन्द्रीय बोर्ड को ऐसा निर्देश दे सकती है जो वह इस अधिनियम के उचित प्रबन्ध के लिए आवश्यक समझे। ऐसे निर्देश दिये जाने पर केन्द्रीय बोर्ड ऐसे निर्देशों के अनुसार कार्य करेगा। केन्द्रीय बोर्ड अपने आय और व्यय के हिसाब को उचित एवं निर्धारित तरीके एवं प्रयोग में रखेगा जो भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक द्वारा अंकेक्षित किये जाएंगे। वे आय-व्यय सम्बन्धी पुस्तकें, विलों, दस्तावेजों, कागजातों को मांगने एवं प्रस्तुत करवाने और केन्द्रीय बोर्ड के कार्यालय का निरीक्षण भी कर सकेंगे। केन्द्रीय बोर्ड का कर्त्तव्य होगा कि वह अपने कार्य-कलापों की वार्षिक रिपोर्ट, प्रतिवेदन केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करे और सरकार उसकी एक प्रति अंकेक्षित खाते, और उसके साथ ही महालेखा परीक्षक एवं नियन्त्रक की रिपोर्ट केन्द्रीय बोर्ड की टिप्पणी के साथ संसद के प्रत्येक सदन में प्रस्तुत करेगी।

स्टेट बोर्ड 

  1. केन्द्रीय परिषद के समान ही केन्द्रीय सरकार को सदस्यों की नियुक्ति एवं स्टेट बोर्ड का गठन निर्दिष्ट करने की शक्ति प्रदान की गई है। धारा 5 (ख) के अनुसार केन्द्रीय सरकार किसी भी राज-सरकार से परामर्श लेने के पश्चात् शास्कीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा उस राज्य के लिए स्टेट बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज का गठन ऐसे ढंग से कर सकती है जैसा कि स्कीम में उपबन्धन किया जाये। 
  2. कोई भी स्टेट-बोर्ड ऐसे अधिकारों का प्रयोग करेगा और ऐसे कर्त्तव्यों की अनुपालना करेगा जो समय-समय पर केन्द्रीय सरकार उसे सुपुर्द करे। 
  3. वे शर्ते और दशाएं जिनके अधीन स्टेट-बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति होगी और उसकी मीटिंग का स्थान, समय और प्रक्रिया वह होगी जो योजना में उपबन्धित की जाये। अन्य बात के विषय में भी स्कीम में प्रावधान बनाया जा सकता है। 

न्यासी बोर्ड का निगमित निकाय होना - 

धारा 5(ग) में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि धारा 5(क) और 5(ख) के अन्तर्गत गठित बोर्ड, इसे गठित करने वाली अधिसूचना में निर्दिष्ट नाम से एक निगमित निकास होगा, जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और एक कामन सील होगी। उक्त नाम से वह वाद प्रस्तुत कर सकेगा और उसके विरुद्ध वाद संस्थित किया जा सकेगा। सेन्ट्रल बोर्ड तथा स्टेट-बोर्ड की देख-रेख में निधि का प्रशासन होगा। उसमें सहायता प्रदान करने के प्रयोजन से भिन्न-भिन्न अधिकारियों की नियुक्ति की जायेगी, जिसका उल्लेख यहां पर कर देना समीचीन होगा।

कार्यकारिणी समिति - 

धारा 5(क) क के अन्तर्गत कार्यकारिणी समिति के गठन सम्बन्धी उपबन्ध प्रस्तुत किए गए है : जो निम्न प्रकार से है -

केन्द्रीय सरकार शास्कीय राजपत्र में अधिसूचना जारी कर कार्यकारी समिति के गठन व उसके कार्य प्रारम्भ करने की तिथि का प्रकाशन करेगी। इसका गठन निम्न प्रकार से होगा -
  1. एक अध्यक्ष जो केन्द्रीय सरकार द्वारा केन्द्रीय बोर्ड के सदस्यों में से नियुक्त किया जाएगा, 
  2. दो व्यक्ति जो केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 5(1) के अधीन नियुक्त किये जाएंगे, 
  3. नियोजकों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन व्यक्ति, 
  4. कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन व्यक्ति, 
  5. भविष्य निधि आयुक्त पदेन। 

अधिकारियों की नियुक्ति - 

(1) अधिनियम की धारा 5 (ख) में केन्द्रीय सरकार को कतिपय अधिकारियों की नियुक्ति सम्बन्धी शक्तियां प्रदान की गई है जो निम्नवत हैं- केन्द्रीय सरकार धारा 5 (द) के अनुसार एक सेन्ट्रल-प्राविडेन्ट फण्ड कमिश्नर की नियुक्ति करेगी, जो केन्द्रीय बोर्ड का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होगा। लेकिन आयुक्त उस बोर्ड के सामान्य नियन्त्रण और अधीक्षण के अधीन ही अपना कार्य करेगा। स्मरणीय है कि बोर्ड का सर्वोच्च प्रशास्कीय-अधिकारी उसका अध्यक्ष होगा और अध्यक्ष तथा आयुक्त दोनों एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। पहले का मुख्य कार्य कार्यपालिकीय होता है, जब कि दूसरे का प्रशासनिक।
  1. केन्द्रीय सरकार भविष्य निधि आयुक्त को उसके कर्त्तव्यों के निर्वहन में सहायता देने के लिए एक वित्तीय सलाहकार एवं मुख्य लेखाधिकारी नियुक्त कर सकेगी। 
  2. केन्द्रीय सरकार उतने अतिरिक्त, आयुक्त, उपायुक्त, निदेशक, रीजनल प्राविडेन्ट फण्ड कमिष्नर्स और ऐसे अन्य अधिकारियों जिन्हें वह योजना में निर्दिष्ट किए 192 अनुसार कुछ परिवार पेंशन योजना और बीमा योजना के कुशल प्रशासन के लिए आवश्यक समझे, नियुक्त कर सकेगा।
  3. कार्य का आबंटन कार्य-पद्धति को सरल बना देता है और कार्य आसानी से सम्पन्न किया जा सकता है। इसी बात को ध्यान में रखकर सेन्ट्रल प्राविडेण्ट फण्ड कमिश्नर के सहायतार्थ अन्य सहायक अधिकारियों की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाती है जो सेन्ट्रल प्राविडेन्ट फण्ड कमिश्नर के अधीन और अधीक्षण में कार्य करेंगे। 
  4. केन्द्रीय सरकार उक्त अधिकारियों की नियुक्ति करते समय केन्द्रीय लोक सेवा आयोग से परामर्श लेकर ही कोई घोषणा करेगी। परन्तु निम्न नियुक्तियों के लिए ऐसा परामर्श लेना आवश्यक नहीं होगा - (अ) एक वर्ष से अनधिक कार्यवाही के लिए, या (ब) यदि नियुक्ति किये जाने के समय वह व्यक्ति - 
    1. इण्डियन ऐडमिनिस्टे्रटिव सर्विस का सदस्य है; या 
    2. केन्द्रीय सरकार की सेवा में है, या राज्य-सरकार के अधीन सेवारत है या सेन्ट्रल बोर्ड प्रथम या द्वितीय वर्ग का है। 
  5. सम्बन्धित राज्य सरकार का अनुमोदन लेकर स्टेट-बोर्ड ऐसे स्टाफ की नियुक्ति कर सकता है, जिन्हें वह आवश्यक समझे। 
  6. सेन्ट्रल प्राविडेन्ट फण्ड कमिश्नर, अतिरिक्त डिप्टी फण्ड कमिश्नर और रीजनल प्राविडेन्ट फण्ड कमिश्नर की नियुक्ति करने का ढंग, वेतन एवं भत्ते, अनुशासन तथा अन्य सेवा की शर्ते ऐसी होंगी, जैसाकि केन्द्रीय सरकार विनिर्दिष्ट करे और इस प्रकार का वेतन भत्ता फण्ड से प्रदेय होगा। 
  7. केन्द्रीय बोर्ड के अन्य प्राधिकारियों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति की पद्धति, वेतन तथा भत्ते, अनुशासन तथा सेवा की अन्य शर्ते वैसी ही होगी, जैसा कि सेन्ट्रल बोर्ड केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से निर्दिष्ट करें। 
  8. अतिरिक्त केन्द्रीय भविष्य निधि आयुक्त, उपायुक्त, प्रादेशिक सहायक आयुक्त केन्द्रीय बोर्ड के अन्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भर्ती की पद्धति, उनके वेतन और भत्ते, अनुशासन तथा सेवा की अन्य शर्ते वे होगी जो केन्द्रीय बोर्ड द्वारा उन नियमों और आदेशों को ध्यान में रखते हुए जो केन्द्रीय सरकार के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के आधारित वेतनमान के लिए उपयोग में लिए जाते रहे हों। 
  9. राज्य बोर्ड के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भर्ती की पद्धति, वेतन और भत्ते अनुशासन और सेवा की अन्य शर्ते वे होंगी जो सम्बद्ध राज्य सरकार के अनुमोदन में वह बोर्ड निर्दिष्ट करे।
केन्द्रीय बोर्ड या उसकी कार्यकारिणी समिति राज्य बोर्ड की कार्यवाही कुछ आधारों पर अवैध नहीं मानी जाएगी - केन्द्रीय बोर्ड या कार्यकारिणी समिति या राज्य बोर्ड द्वारा की गई या किया गया कोई कार्य या कार्यवाही रिक्तता की स्थिति के आधार पर एकमात्र आधार प्रश्नगत होता है या केन्द्रीय बोर्ड या कार्यकारिणी समिति या राज्य बोर्ड के गठन में किसी त्रुटि के आधार पर प्रश्नास्पद नहीं बनाया जा सकता।

प्रत्यायोजन - धारा 5(ड.) में सेन्ट्रल बोर्ड, केन्द्रीय सरकार तथा स्टेट बोर्ड सम्बन्धित राज्य सरकार से पूर्वानुमोदन लेकर अपने अध्यक्ष को या किसी भी अधिकारी की ऐसी शर्तो और परिसीमाओं के अधीन, यदि कोई हो, जैसा कि वह यह निर्दिष्ट करे, अपने ऐसे अधिकारों या कर्त्तव्यों का प्रत्यायोजन कर सकेगा, जैसा कि वह योजना के कुशल प्रशासन के लिए आवश्यक समझे।

कर्मचारी भविष्य निधि अपीलीय अधिकरण - 

ऐसे ट्रिब्यूनल की अधिकारिता कार्य आदि के लिए जोड़ी गई नई धाराएं 7 डी0 से 7 क्यू0 तक में प्रावधान किया गया है।
  1. केन्द्रीय सरकार आफीशियल गजट में विज्ञप्ति द्वारा ऐसे एक या अनेक अधिकरण का गठन कर सकेगी जो इस अधिनियम द्वारा अधिकरण को प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करेंगे तथा कर्त्तव्यों का निर्वहन करेंगे। ऐसे अधिकरण की अधिकारिता क्षेत्र, तथा उसमें आने वाले प्रतिष्ठानों का उल्लेख नोटीफिकेशन में किया जाएगा। 
  2. अधिकरण में केन्द्र सरकार द्वारा केवल एक व्यक्ति ही नियुक्त किया जायगा। 
  3. कोई भी व्यक्ति अधिकरण के पीठासीन अधिकारी पद के लिए अर्ह नहीं होगा। अ) जब तक वह हाईकोर्ट का जज नहीं रह चुका है, या है या नियुक्ति के लिए अर्ह है। ब) या डिस्ट्रिक्ट जज नहीं रहा है, या है या नियुक्ति के लिए अर्ह है। 

कार्यकाल - 

पद धारण की तिथि से 5 वर्ष या 62 वर्ष आयु जो भी पहले हो।

पद-त्याग (7एफ0) - 

अधिकरण का पीठासीन अधिकारी लिखित हस्ताक्षरित नोटिस केन्द्र सरकार को सम्बोधित करके पद-त्याग कर सकता है। केन्द्र सरकार द्वारा मुक्त न होने तक वह काम करता रहेगा, कम से कम नोटिस प्राप्ति के तीन महीने तक या जब तक सम्यक रूप से नियुक्त उसका उत्तराधिकारी नहीं आ जाता या उसका कार्यकाल समाप्त नहीं हो जाता जो भी पहले हो।

अधिकांश का स्टाफ ;(7H) - 

केन्द्र सरकार अधिकरण को उसके काम में सहायता के लिए इतनी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त करेगी जैसा वह उचित समझे। जो पीठासीन अधिकारी के सामान्य अधीक्षण में अपना कार्य सम्पन्न करेगें। उनकी सेवा शर्ते, वेतन, भत्ते आदि वही होंगे जो निर्धारित हों। िट्व्यूनल में अपील (71) कोई भी उपस्थित व्यक्ति निम्न आदेश या नोटीफिकेशन के विरुद्ध अपील कर सकता है -
  1. किसी प्रतिष्ठान में अधिनियम लागू करने की राजपत्र में जारी अधिसूचना, 
  2. प्रथम अनुसूची में समाविष्ट करने वाले मदों की अधिसूचना, 
  3. नियोजक से शोध्य राशि के निर्धारण का आदेश, 
  4. रिब्यू के लिए आदेश, इस्केप्ड एमाउन्ट या निर्धारण सम्बन्धी आदेश, नियोजक से क्षतिपूर्ति वसूलने सम्बन्धित आदेश - अपील विहित शुल्क प्रारूप और समय के अनुरूप की जाएगी। 

अधिकरण की प्रक्रिया- 

अपने बैठने के स्थान, अपनी शक्तियों के प्रयोग और कर्त्तव्यों के निर्वाह से उद्भूत सभी मामलों को विनियमित करने का उसे अधिक होगा।

विधि व्यवसायी की सहायता - 

अपीलकर्ता अधिकरण के समक्ष स्वत: या अपने अधिवक्ता के माध्यम से उपसंजात हो सकता है, जो उसके च्वायस का होगा। केन्द्र या 194 राज्य सरकार अधिकरण के समक्ष सरकार की ओर से पैरवी करने के लिए अधिवक्ता नियुक्त कर सकेगी।

अधिकरण का आदेश -

पक्षकारों को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के बाद अधिकरण ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जैसा वह उचित समझे। वह उस आदेश को जिसके विरुद्ध अपील की गई है, अनुमोदित, संशोधित या निरस्त कर सकता है या उचित निर्देश देकर पुन: विचारण के लिए वापस भेज सकता है और नये साक्ष्य लेने को कह सकता है। अपने द्वारा पारित आदेश को अधिकरण पांच वर्ष के भीतर रिकार्ड पर दृष्य गलती को सुधार या अपील के पक्षकार द्वारा ध्यान आकृष्ट किये जाने पर संशोधन कर सकता है। यदि संशोधन नियोजक के दायित्व को या शोध्य राशि को बढ़ाने वाला है तो नियोजक को सुनवाई का अवसर अवश्य दिया जाएगा। अधिकरण अपने आदेश की सत्य प्रतिलिपि अपील के पक्षकारों को भेजेगा। अधिकरण द्वारा अन्तिम रूप से निस्तारित आदेश को किसी न्यायालय में प्रश्नास्पद नहीं बनाया जा सकेगा।

रिक्त स्थानों की पूर्ति- 

यदि किसी कारण से पीठासीन अधिकारी का स्थान रिक्त होता है तो उसे भरने के लिए सरकार अधिनियम के प्रावधान के अनुसार नियुक्ति करेगी और प्रक्रिया वहां से प्रारम्भ होगी जब स्थान भरा गया। आदेश की अन्तिमता- पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति तथा अधिकरण का कोई कार्य या प्रक्रिया को उसके गठन में किसी दोष के आधार पर प्रश्नास्पद नही किया जा सकेगा। अपील करने पर शोध राशि का जमा करना- अधिकरण अपील तभी ग्रहण करेगा जब धारा 7 क में निर्धारित शोध्य राशि का 75 प्रतिशत जमा कर दिया गया है। कारण बताते हुए अभिकरण जमा की जाने वाली को कम या मुक्त कर सकता है।
  1. कुछ आवेदनों का अधिकरण को सौंपा जाना- धारा 19 क में केन्द्र सरकार के समक्ष लम्बित आवेदन अधिकरण के पास अन्तरित कर दिए जाएगें मानो वे अपीलें हों।
  2. नियोजक द्वारा देय ब्याज - नियोजक धनराशि के शोध्य हो जाने तथा वास्तविक भुगतान के बीच की अवधि के लिए 12 प्रतिशत या अधिक ब्याज देगा।
  3. अधिनियम के अन्तर्गत सरकार के अधिकार- धारा 21 केन्द्रीय सरकार को नियम बनाने की शक्ति प्रदान करती है।
    1. सरकार का प्रथम अधिकार किसी भी स्थापन में अधिनियम को लागू करने की राजपत्र में अधिसूचना जारी करके घोषित करना है। लेकिन उससे प्रभावित होने वाले नियोजकों या प्रतिष्ठानों को कम से कम दो मास पूर्व-सूचना देना आवश्यक है। 
    2. सरकार अधिनियम को वहाँ भी लागू करने का अधिकार रखती है जहाँ नियोजक और उसके अधीन बहुसंख्यक कर्मकार एक समझौता करके इसके लागू करने के लिए सरकार के पास आवेदन प्रस्तुत करते है, चाहे भले भी वहाँ काम करने वालों की संख्या 20 से कम ही हो।
    3. सरकार को सामान्य प्राविडेण्ट फण्ड रखने वाले प्रतिष्ठानों में यह अधिनियम लागू करने का अधिकार है, जिसका प्रयोग वह शास्कीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा कर सकता है, जैसा कि धारा 3 में उपबन्धित है। 
    4. उपर्युक्त रीति से केन्द्रीय सरकार प्रथम अनुसूची में अन्य मामलों को समाविश्ट करने का निर्देश दे सकती है, जिसकी बावत प्राविडेण्ट फण्ड स्कीम लागू की जा सकेगी। अनुसूची में अन्य उद्योगों को इस अधिनियम की परिधि में लाने का एकमात्र अधिकार केन्द्रीय सरकार को ही प्राप्त है। 
    5. धारा 5 के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार को कर्मकार भविष्य-अंशनिधि योजना विनिर्मित करने का अधिकार है। योजना की योजना उसी के आदेश और निर्देश के अनुसार ही कार्यान्वित की जायेगी। 
    6. सेन्ट्रल बोर्ड एवं स्टेट बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के गठन का अधिकार भी केन्द्रीय सरकार को प्राप्त है। इतना ही नहीं, जितने भी आवश्यक संख्या में सदस्य होगें, उन सभी की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार ही करेगी। उसके उच्च कार्यपालकीय अधिकारियेां की नियुक्ति केन्द्रीय लोक सेवा आयोग के परामर्श से की जायेगी। राज्य सरकार से मन्त्रणा लेकर केन्द्रीय सरकार उस राज्य के लिए स्टेट ऑफ ट्रस्टीज की स्थापना कर सकती है। 
    7. फण्ड के कार्य सफल संचालन के उद्देश्य से केन्द्रीय सरकार सेन्ट्रल फण्ड कमिश्नर, डिप्टी प्राविडेण्ट फण्ड कमिश्नर तथा रीजनल प्राविडेण्ट फण्ड कमिश्नर की नियुक्ति तथा उनके वेतन, मंहगाई-भत्ते, सेवा-दशाओं के सम्बन्ध में नियम बना सकती है। 
    8. केन्द्रीय सरकार कर्मकारों द्वारा फण्ड में योगदान की दर में वृद्धि करने का अधिकार रखती है। 
    9. शास्कीय पर अधिसूचना द्वारा केन्द्रीय सरकार योजना को रूपभेदित करने के अधिकार का प्रयोग कर सकती है। 
    10. नियोजक से शोध्य रकम को सरकार (केन्द्र या राज्य) भू-राजस्व की भांति वसूल कर सकती है। 
    11. निरीक्षकों की नियुक्ति करने का अधिकार समुचित सरकार को प्राप्त है। धारा 13 में यह बात स्पष्ट है कि समुचित सरकार ऐसी संख्या में निरीक्षकों की नियुक्ति कर सकती है, जैसा कि वह उचित और आवश्यक समझे। 
    12. धारा 14 (ब) में समुचित सरकार को जिससे दोनों, केन्द्रीय तथा राज्य सरकारें अभित्रेत है, नियोजक से क्षतिपूर्ति वसूल करने का अधिकार प्राप्त है। यह क्षतिपूर्ति बकाया रकम की 25 प्रतिशत के बराबर हो सकती है। 
    13. अधिनियम के सभी या कुछ प्रावधानों से किसी उद्योग या प्रतिष्ठान वर्ग को धारा 16(2) के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार ही छूट दे सकती है। 
    14. शक्ति के प्रत्यायोजन का अधिकार- समुचित सरकार यह निर्देश दे सकती है कि अधिनियम या अन्य किसी स्कीम के अन्तर्गत जिस क्षेत्राधिकार या शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है वह ऐसे मामलों के विषय में और ऐसी दशाओं के अधीन, यदि कोई हो जैसा कि निर्देश में निर्दिष्ट किया जाय, अन्य प्राधिकारियों द्वारा भी प्रयुक्त की जा सकती है। लेकिन इस विषय में दोनों सरकारों के प्रत्यायोजन की शक्ति अपने-अपने क्षेत्राधिकार तक ही सीमित है, अर्थात् - यदि समुचित सरकार केन्द्रीय सरकार है, तो उस शक्ति के प्रयोग का अधिकार ऐसे अधिकारी या ऑफीसर को प्रदान किया जायेगा, जो उसके अधीन हो। 196 राज्य-सरकारें भी अपने अधीन प्राधिकारियों को शक्ति का प्रत्यायोजन करने में सर्वथा सक्षम है। 
    15. कठिनाइयाँ दूर करने की शक्ति (धारा 22)- यदि इस अधिनियम के उपबन्धों के समुचित ढंग से संचालन करने में कोई कठिनाई विशेष रूप से जब कोई शंका निम्नलिखित के बारे में उत्पन्न होती है कि- 
      1. क्या कोई प्रतिष्ठान, जो कारखाना है, प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट उद्योग में कार्यरत है, या 
      2. क्या कोई प्रतिष्ठान-विशेष ऐसे प्रतिष्ठान-वर्ग के अन्तर्गत आता है, जहाँ कि अधिनियम की धारा 1 की उपधारा (3) के खण्ड (ब) के अनुसार अधिसूचना लागू होती है; या 
      3. किसी प्रतिष्ठान में नियोजित व्यक्ति की संख्या; या 
      4. किसी प्रतिष्ठान के स्थापित होने पर कितने साल व्यतीत हो गये हैं; या 
      5. क्या नियोजक द्वारा प्राप्त लाभ की कुछ मात्रा कम कर दी गई है, जिस पाने का अधिकार था। 
    16. भविष्य-निधि एकाउण्ट मेन्टेन करने के लिए कुछ नियोजकों को अधिकृत करना (धारा 19)- नई धारा 16 (भविष्य-निधि एकाउन्ट मेन्टेन करने के लिए कुछ नियोजकों को अधिकृत करना) सरकार को अधिकार प्रदान करती है कि यदि ऐसे प्रतिष्ठान के जिसमें एक सौ या अधिक कर्मकार नियोजित है नियोजक और बहुसंख्यक कर्मकार आवेदनपत्र देते हैं तो सरकार लिखित आदेश द्वारा प्रतिष्ठान से सम्बन्धित भविष्य निधि एकाउन्ट मेन्टेन करने के लिए अधिकृत कर सकती है। उन शर्तो तथा निबन्धनों के अधीन जो स्कीम में स्पेसीफाइड हो। 
    17. भविष्य निधि के अधिक लाभ अर्जित करने का सरकार का अधिकार है - कोष में से कुछ राशि को अन्य क्षेत्रों में लगाकर कोष की वृद्धि करना सरकार के अधीन है। वर्तमान कोष की 80 हजार करोड़ रुपये के 15 प्रतिशत राशि को शेयर बाजार और म्युचुअल फंडों में निवेश की अनुमति सरकार ने दे दी है। लेकिन इ0 पी0 एफ0 ट्रस्टी बोर्ड के सदस्य इस पर एकमत नहीं है। 
अधिनियम के अन्तर्गत कर्मकारों को प्राप्त अधिकार एवं लाभ- प्राविडेन्ट फण्ड ऐक्ट जो प्रारम्भ में केवल छ: उद्योगों सीमेन्ट, सिगरेट, विद्युत यान्त्रिक, सामान्य इन्जीनियरिंग के उत्पाद, लोहे-इस्पात, कागज तथा वस्त्र उद्योग में लागू होने का उद्देश्य ही कर्मकारों को निधि-सम्बन्धी लाभ पहुंचाना है। अब इसका व्यापक विस्तार हो गया है। इसके अतिरिक्त उसमें उल्लिखित अन्य लाभों का भी उपभोग नियोजित कर सकता है -
  1. प्राविडेन्ट फन्ड से दोहरा लाभ - कर्मकार अपने अंशदान की जितनी राशि कटवाता है, उतनी ही राशि उसके नाम वाले फण्ड के खाते में नियोजक भी जमा करेगा। अत: उसका ठीक दोगुना उसे भविष्य में प्राप्त होगा। इस प्रकार अधिनियम के अन्तर्गत कर्मकार को दोहरा लाभ प्राप्त है। 
  2. फण्ड सदैव सभी प्रकार की विधिक कार्यवाहियों से अग्रप्रभावित रहेगा- धारा 10 में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि न्यायालय के आदेश के तहत कोई धनराशि निम्न भांति कुर्क नहीं की जा सकती है- किसी सदस्य के नाम भविष्य निधि में या किसी छूट-प्राप्त कर्मकार के नाम भविष्य निधि में वह राशि जो जमा है किसी प्रकार से समनुदिश्ट की जमा रकम किसी प्रकार अन्तरित या भारित किये जाने के योग्य न होगी और उस सदस्य या छूट-प्राप्त कर्मकार द्वारा उपगत ऋण या दायित्व के सम्बन्ध में किसी न्यायालय की डिग्री या आदेश के अधीन कुर्की के लिए बाध्य नहीं की जा सकेगी। 
  3. अंशदान के भुगतान को अन्य ऋणों पर प्राथमिकता- धारा 11 अंशदान के भुगतान को प्राथमिकता प्रदान करती है। उसके अनुसार जहाँ कोई नियोजक दिवालिया हो गया है या यदि कम्पनी है और उसके समापन का आदेश दिया जा चुका है, तो देय रकम जो - 
    1. किसी स्थापन के सम्बन्ध में, जिसमें योजना लागू होती है, किसी योगदान की बाबत जो कि निधि में देय है, हर्जाने के निमित जिसका धारा 15 (2) के अन्तर्गत जमा राशि का हस्तान्तरण अपेक्षित है या ऐसे आभारों के सम्बन्ध में जो इस अधिनियम के किसी दूसरे उपबन्ध के अधीन उस नियोजक के द्वारा देय है, नियोजक से प्राप्त है, या 
    2. छूट प्राप्त प्रतिष्ठान की बाबत किसी भविष्य अंश-निधि के योगदान के निमित नियोजक के प्राविडेन्ट फण्ड के नियमों के अधीन धारा 14 (ब) के अन्तर्गत निर्दिष्ट किसी शर्त के अधीन समुचित सरकार को प्रभार के रूप में नियोजक द्वारा देय हो; ऐसी रकमें अन्य ऋणों की अपेक्षा भुगतान में प्राथमिकता रखेंगी, जहाँ तक दिवालिया के सामानों के वितरण या कम्पनी के समापन के समय उसकी आस्तियाँ, जैसा भी हो, के वितरण का सम्बन्ध होता है। 
  4. नियोजक द्वारा वेतन की कटौती न किये जाने का लाभ - धारा 12 के अनुसार किसी भी स्थापन या उद्योग का कोई भी नियोजक, जहाँ कि योजना लागू होती है, केवल फण्ड में अंशदान देने या इस अधिनियम या स्कीम के अन्तर्गत किसी प्रभार संदाय करने के अपने दायित्व के कारण ही योजना में अपने हिस्से के दिये जाने वाले अंशदान की राशि प्रत्यक्षत: या परोक्षत: नही काटेगा। 
  5. नियोजक द्वारा की गई त्रुटियों के विरुद्ध लाभ - नियोजक की त्रुटियों और अपराधों की ओर कर्मकार सम्बन्धित निरीक्षक का ध्यान आकृष्ट कर सकते हैं और तब वह उचित कार्यवाही करेगा। 
  6. अपने एकाउन्ट के हस्तान्तरण का भी कर्मकारों को लाभ - धारा 17 (अ) के अनुसार नियोजक का यह परम कर्तव्य होता है कि वह उस कर्मकार के अर्जित फण्ड की राशि को वहां हस्तान्तरित कर दें, जहाँ वह पूर्व नियोजक को छोड़कर दूसरे स्थान पर नियोजन पा गया है। कर्मकार इस अधिनियम के लाभ से केवल स्थान या उद्योग या स्थापन-परिवर्तन के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता। फण्ड का ट्रान्सफर केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्दिष्ट अवधि में ही कर दिया जायेगा। निम्न शर्तो का होना आवश्यक है कि - 
    1. कर्मकार एक नियोजन का परित्याग करता है। 
    2. एक नियोजन को छोड़कर दूसरे स्थान पर काम पा गया है।
    3. परिव्यक्त नियोजन और पुनपर््राप्त नियोजन दोनों स्थानों पर फण्ड-स्कीम लागू है। 
    4. कर्मकार का संचित दण्ड पूर्व नियोजक के पास रह गया है और भुगतान नहीं हुआ है। 
    5. कर्मकार अपने फण्ड के अन्तरण की इच्छा प्रकट करता है। 
    6. दूसरे नियोजन का भविष्य अंश निधि सम्बन्धी नियम ट्रान्सफर की अनुज्ञा देते हों। 
    7. दूसरे नये नियोजक के स्थान पर भी उनके नाम में फण्ड का खाता है। 
    8. ट्रान्सफर केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्दिष्ट समय में ही किया जाता है। 
  7. फेमिली-पेन्षन स्कीम का लाभ - इसके अतिरिक्त सन् 1971 से फेमिली के पेन्षन फण्ड का लाभ भी प्रत्येक कर्मकार को देने की योजना बनायी गयी है, जो 1 मार्च, 1971 से लागू हुई। 
  8. डिपाजिट लिंक्ड इन्शोरेन्स स्कीम का लाभ- 1 अगस्त, 1976 से लागू इस योजना का, जिसमें कुल 22 पैरा हैं, भी कर्मकार लाभ उठा सकते हैं, जिसे बनाने का अधिकार केन्द्रीय सरकार को लेवर प्राविडेन्ट फण्ड लाज (अमेण्डमेन्ट) ऐक्ट, 1976 के तहत प्राप्त हुआ। इसी का लाभ उठाकर सरकार ने इस योजना को धारा 6 (ग) जोड़कर क्रियान्वित किया और यह योजना वहाँ लागू की गई, जिन प्रतिष्ठानों में मुख्य अधिनियम लागू होता है। इसके लिए एक डिपाजिट लिंक्ड इन्ष्योरेन्स फण्ड की स्थापना की गई। उसमें नियोजिती की ओर से नियोजक को अंशदान करना होगा और सरकार नियोजक द्वारा देय अंशदान की राशि स्वयं जमा करेगी। 
  9. भविष्य अंश-निधि से कर्मकार ऋण ले सकता है और आसान किस्तों में उसको भुगतान करता रहेगा। इस निधि के खाते से धन निकालने की प्रणाली के उदारीकरण का प्रस्ताव विचाराधीन है।
  10. भविष्य निधि को आयकर के प्रयोजन हेतु मान्यता - अधिनियम की धारा 9 के अनुसार भारतीय आयकर अधिनियम, 1922 के प्रयोजनों के लिए यह समझा जायेगा कि निधि उस अधिनियम के अध्याय 9-क के प्रयोजन हेतु मान्यता प्राप्त भविष्य निधि है किन्तु उक्त अध्याय की कोई भी बात इस प्रकार प्रभावशील नहीं होगी कि वह उस योजना के जिसके अधीन विधि स्थापित की गई है किसी ऐसे उपबन्ध को जो इस अध्याय के या उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों में से किसी के विरुद्ध हो, प्रभावहीन बना दे। 
स्थापन के अन्तरण की स्थिति में दायित्व - जहाँ स्थापन के सम्बन्ध में कोई नियोजक विक्रय, दान या अनुज्ञापन द्वारा या किसी भी अन्य रीति से उस स्थापन का पूर्णत: या अंशत: अन्तरण कर देता है, वहाँ नियोजक और वह व्यक्ति, जिसे इस प्रकार स्थापन अन्तरित किया गया है, ऐसे अन्तरण की तिथि तक नियोजक द्वारा इस अधिनियम योजना, या परिवार पेंशन या बीमा योजना के किसी उपबन्ध के अधीन देय अंशदान और अन्य राशियों का भुगतान करने के लिए सम्मिलित रूप से और पृथकत: उत्तरदायी होंगे परन्तु अन्तरिती का दायित्व उसके द्वारा ऐसे अन्तरण से अभिप्राप्त प्राप्तियों के मूल्य तक ही सीमित होगी।

निरीक्षक 

निरीक्षकों की नियुक्ति - 

समुचित सरकार द्वारा निरीक्षकों की नियुक्ति की घोषणा शास्कीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा की जाएगी। उनकी संख्या कितनी होगी, यह संरकार के विवेकाधीन है। ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें वह उचित समझती है, इस अधिनियम, योजना परिवार पेंशन या बीमा योजना के प्रयोजन के लिए निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी और उनकी अधिकारिता सुनिश्चित कर सकेगी। कार्य की अधिकता को देखते हुए सरकार आवश्यकतानुसार यथेष्ट संख्या में निरीक्षकों की नियुक्ति और उसके साथ ही उनके क्षेत्राधिकार को भी विनिर्दिष्ट करेगी, जिससे कि तद्विषयक कोई पारस्परिक मतभेद न उत्पन्न हो और निरीक्षक अपने-अपने क्षेत्राधिकार से भली-भांति परिचित रहें और अपना कार्य संभाल लें। संहिता द्वारा विहित विधि के अनुसार कुछ औपचारिकताओं को निरीक्षक पूरा करेगा जैसे -
  1. परिसर में जाने के पहले अधिकारियों तथा तलाशी के साक्षियों की तलाशी। यह एक परम्परा है ताकि यह सन्देह न रहे कि तलाशी लेने वाला दल ऐसी कोई चीज साल ले जाकर चुपके से निकाल कर दिखा सके कि यह चीज परिसर में प्राप्त हुई है। 
  2. तलाशी किये जाने वाले परिसर में स्थानीय न्यूनतम दो संप्रान्त व्यक्तियों को बुलाना और उन्हें तलाशी का साथी बनाना। 
  3. तैयार की जाने वाली सूची पर उनका हस्ताक्षर करना। 
  4. तलाशी लिए जाने वाले स्थान के स्वामी या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति को तलाशी के समय साथ में रहने देना। 
  5. तैयार की गई सूची की हस्ताक्षरित प्रतिलिपि परिसर-स्वामी को देना। यदि तलाशी ली जाने वाली महिला है, तो उसकी तलाशी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 12 के अनुसार की जानी चाहिये। 
यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम योजना के अधीन नियुक्त किए गए किसी निरीक्षक को, उसके कर्त्तव्यों के निर्वहन में बाधा पहुंचाता है, या निरीक्षक द्वारा निरीक्षण के लिए कोई अभिलेख प्रस्तुत करने में असफल रहता है तो उसे 6 मास तक का कारावास या 1000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा।

निरीक्षक : लोक-सेवक - 

धारा 13 (3) से यह स्पष्ट है कि प्रत्येक निरीक्षक भारतीय दण्ड संहिता की धारा 21 के अर्थ में लोक-सेवक समझा जायगा। अनावश्यक ढंग से उसकी कार्यवाही में व्यवधान डालने वाला व्यक्ति दण्ड का भागी होगा। इसके अतिरिक्त धारा 18 में उन्हें कुछ अन्य प्रकार का भी विशेषाधिकार प्राप्त है। उससे अधिनियम या परियोजना के अन्तर्गत निरीक्षक या अन्य व्यक्ति द्वारा सद्भाव में किये गये किसी भी कार्य के लिए कोई कार्यवाही नही की जायेगी। अपनी पदीय प्रास्थिति में किये गये कार्यो के लिए निरीक्षक दायित्वाधीन नहीं होगा।

ठेका श्रम विनियमन अधिनियम 1970 

ठेकाश्रम के विनियमन हेतु ठेकाश्रम विनियमन और उत्सादन अधिनियम, 1970 में पारित किया गया जो 10 फरवरी, 1970 से प्रभावी हुआ। इसका उद्देश्य ठेके पर काम करने वाले श्रमिकों को शोषण से बचाना है। श्रमिकों के स्वास्थ्य और कल्याण हेतु 200 समुचित व्यवस्था सुनिश्चित कराना अधिनियम का उद्देश्य है। बीस या बीस से अधिक कर्मकार जिस प्रतिष्ठान में कार्यरत है। या थे उन पर यह अधिनियम लागू होगा। लेकिन समुचित सरकार चाहे तो इसे कम कार्यरत कर्मकारों वाले प्रतिष्ठान में भी शास्कीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा लागू कर सकती है। आन्तरायिक या आकस्मिक प्रकृति के स्थापनों पर यह लागू नहीं होगा। इस सम्बन्ध में सरकार का निश्चय अन्तिम होगा। यह अधिनियम सार्वजनिक निजी नियोजकों तथा सरकार पर लागू होता है। इसे असंवैधानिक नहीं माना गया यद्यपि कि यह ठेकेदारों पर कतिपय निर्बन्धन और दायित्व अधिरोपित करता है। स्थापन में कार्य/परिणाम सम्पन्न कराने के लिए श्रमिकों को उपलब्ध कराने वाला ठेकेदार (उपठेकेदार समेत) तथा उनके माध्यम से काम करने के लिए उपलब्ध व्यक्ति ठेका श्रमिक कहलाता है उसे भाड़े पर रखा जाता है। स्थापन का यहाँ व्यापक अर्थ है जहाँ अभिनिर्माण प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है। प्रधान नियोजक धारा 1 उपधारा (छ) में परिभाषित है, नाम निर्दिष्ट इससे अभिप्रेत है। केन्द्रीय सरकार केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड (ठेकाश्रम) गठित करती है। इसमें एक अध्यक्ष, मुख्य श्रम आयुक्त, केन्द्रीय सरकार, रेल खान आदि के कम से कम 11 या अधिकतम 17 प्रतिनिधि होंगे। कर्मकारों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों की संख्या प्रधान नियोजकों के प्रतिनिधियों से कम नहीं होगी। इसकी सलाह मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं होगी।

ओंकार प्रसाद वर्मा बनाम मध्य प्रदेश राज्य के निर्णय मं उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि इस प्रश्न पर विचार करने का कि संविदा श्रम उत्सादित कर दिया अथवा नहीं एकान्तिक अधिकार समुचित राज्य सरकार के क्षेत्र में आता है, वह धारा 10 में उल्लिखित प्रक्रिया इसके लिए अपना सकेगी। ऐसे प्रश्न का निर्धारण न तो श्रम न्यायालय, न ही रिट कोर्ट ही कर सकेगी। लेकिन जहाँ यह बात उठाई गई है कि ठेकेदार और प्रबन्ध के द्वारा (बीच) की गई संविदा दिखावटी है तो स्टील एथारिटी ऑफ इण्डिया लि0, के आलोके में औद्योगिक एडजुडीकेटर कथित विवाद को निर्धारित करने का हकदार होगा। ठेकाश्रम समाप्त करने का सरकार का प्रशासनिक अधिकार है। लेकिन उत्सादन हेतु खूब सोच-समझकर नोटीफिकेषन जारी करना चाहिए। उल्लेखनीय है कि इस अधिनियम से सम्बन्धित किसी मामले पर एकान्तिक क्षमाधिकारिता समुचित सरकार की होती है। न तो श्रम न्यायालय ने ही रिट कोर्ट कथित उत्सादन के प्रश्न को निर्धारित/निण्र्ाीत कर सकती है।

राज्य सरकार राज्य स्तर पर सलाह देने के लिए राज्य सलाहकार (ठेकाश्रम) बोर्ड गठित करेगी इन दोनों के सदस्यों की पदावधि, सेवा की अन्य शर्ते, अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तथा रिक्त स्थानों के भरने की रीति ऐसी होगी जो निर्धारित की जाये। वे बोर्ड समितियां गठित करने की शक्ति रखते हैं। धारा 6 के अनुसार सरकार अपने राजपत्रित अधिकारों को ठेकाश्रम पर नियोजित करने वाले स्थापनों के पूंजीकरण करने के लिए नियुक्त करेगी और उनके क्षेत्राधिकार की सीमा भी निश्चित कर देगी। निर्धारित अवधि में आवेदन देने पर तथा सारी शर्तो के पूरा रहने पर पंजीकरणकर्ता पंजीकरण करके प्रमाणपत्र जारी करेगा जो लाइसेन्सिंग का काम करेगा। पर्याप्त कारणों से सन्तुष्ट होने पर विलम्ब से प्रस्तुत किये गये आवेदन पर अधिकारी विचार कर सकेगा। अनुचित ढंग से प्राप्त किये गये पंजीकरण का प्रधान नियोजक सुनवाई का अवसर प्रदान करके तथा सरकार के पूर्व अनुमोदन से प्रतिसंहरण भी किया जा सकेगा। धारा 9 के अनुसार पंजीकरण रह होने पर ठेका श्रमिकों को नियोजित नहीं किया जायेगा। धारा 10 के अन्तर्गत समुचित सरकार ठेका श्रमिकों के नियोजन पर प्रतिशेध लगा सकेगी।

समुचित सरकार धारा 11 के अन्तर्गत अनुज्ञापन अधिकारियों की यथेष्ठ संख्या में उनकी सीमाओं को निर्धारित करते हुए नियुक्ति करेगी। बिना लाइसेन्स लिए ठेकाश्रम के माध्यम से कार्य नहीं कराया जायेगा। सेवा शर्तो जेसे काम के घण्टों आदि, तथा निर्धारित सिक्योरिटी राशि जमा करने के बारे में सरकार नियम बनायेगी। उसका प्रधान नियोजक को अनुपालन करना होगा। अनुज्ञापन अधिकारी समय पर अनुज्ञापन् की धारा 13 के अधीन निर्धारित फीस देने पर नवीनीकरण कर सकेगा। अनुज्ञप्ति के दुव्र्यपदेशन, महत्वपूर्ण तथ्यों के गोपन, नियमोल्लंघन से प्राप्त किये जाने की दशा में उसका प्रतिसंहरण, निलम्बन तथा संशोधन भी किया जा सकेगा। धारा 15 के अधीन किसी आदेश से व्यथित हुआ व्यक्ति 30 दिन के भीतर सरकार द्वारा नाम निर्देशित व्यक्ति अपील अधिकारी के यहां अपील कर सकेगा।

धारा 16 में सरकार ठेका श्रमिकों के कल्याण तथा स्वास्थ्य के लिए जलपान गृहों की व्याख्या के लिए नियोजकों को आदेश देगी। खाद्य पदार्थो का विवरण तथा मूल्य आदि के बारे में दिशा निर्देश देगी। धारा 18 के अन्तर्गत विश्राम कक्षों तथा रात में रुकने के लिए स्वच्छ आरामदेह प्रकाशयुक्त आनुकल्पिक आवासों की व्यवस्था करने का नियोजक का दायित्व होगा। इसके अलावा स्वास्थ्यप्रद पेय जल की आपूर्ति, पर्याप्त संख्या में शौचालय, मूत्रालय, धुलाई की सुविधाएं उपलब्ध कराना होगा। इसके अलावा स्वास्थ्यप्रद पेय जल की आपूर्ति, पर्याप्त संख्या में शौचालय, मूत्रालय, धुलाई की सुविधाएं उपलब्ध कराना होगा। धारा 20 के अनुसार फस्र्ट एड फैसिलिटीज की व्यवस्था होगी। इन सुविधाओं के लिए प्रधान नियोजक उपगत व्ययों का प्रधान नियोजक ठेकेदार से वसूल कर सकता है। धारा 21 के अनुसार मजदूरी का भुगतान ठेकेदारों पर होता। इसमें ओवर टाइम वेज भी सम्मिलित होगी। कम भुगतान करने पर प्रधान नियोजक शेष राशि का भुगतान करके ठेकेदार से वसूल करने का हकदार होगा। इण्डियन एयर लाइन्स बनाम केन्द्रीय सरकार श्रम न्यायालय, के निर्णयानुसार ठेका श्रमिक मजदूरी न पाने की दशा में मुख्य नियोजक से मजदूरी मांग सकते हैं।

धारा 22 में दण्ड की व्यवस्था की गई है। जो कोई निरीक्षक के कार्य में बाधा पहुंचायेगा या निरीक्षण हेतु रजिस्टर देने से इन्कार करेगा वह तीन माह के कारावास या पांच सौ रुपये जुर्माना या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा। निर्बन्धनों, अनुज्ञप्ति की शर्तो का उल्लंघन करने वाला नियोजक तीन माह के कारावास तथा एक हजार रुपये जुर्माना या दोनों से दण्डित होगा। प्रथम उल्लंघन के दोषसिद्ध होने पर उसके जारी रहने पर एक सौ रुपये प्रतिदिन के लिए धारा 23 के अन्तर्गत दण्ड दिया जा सकेगा। उल्लंघन सिद्ध करने का भार शिकायतकर्ता पर होगा। कम्पनी के मामले में धारा 25 के अन्तर्गत कम्पनी का भारसाधक तथा उसके प्रति उत्तरदायी व्यक्ति दण्डित किया जा सकेगा। इसमें निदेशक, प्रबन्धक, प्रबन्ध अभिकर्ता, आदि आते हैं। प्रेसीडेन्सी मजिस्टे्रट या फ़र्स्ट क्लास मजिस्टे्रट से अवर कोई भी न्यायालय दण्डनीय अपराधों का संज्ञान या विचारण नहीं करेगा। अपराध किये जाने की तिथि से निरीक्षक द्वारा या उसकी लिखित पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने वाले व्यक्ति द्वारा परिवाद 90 दिन के भीतर दाखिल किये जाने पर विचारण किया जायेगा अन्यथा नहीं। निरीक्षकों की जांच आदि करने, लोक 202 अधिकारी की सहायता लेने, किसी व्यक्ति से परीक्षा करने, कार्य बांटने वाले का नाम, पता जानने रजिस्टर आदि को जब्त करने या उनकी प्रतिलिपियां लेने का अधिकार होगा।

रजिस्टरों या अन्य अभिलेखों को बनाये रखने का दायित्व धारा 29 के अन्तर्गत प्रधान नियोजक का होगा जिनमें मजदूरी भुगतान आदि की प्रविष्टियां और अन्य वांछित जानकारियां आदि दी गई होती है। धारा 30 अधिनियम से असंगत विधियों और करारों के प्रभाव पर प्रकाश डालती है। अन्य विधियों में प्रदान की गई सुविधाओं से इस अधिनियम के अन्तर्गत दी जाने वाली सुविधाएं किसी भी दशा में कम नहीं होंगी। धारा 31 समुचित सरकार को अधिनियम के कुछ निर्बन्धनों से कुछ समय किसी स्थापनों या ठेकेदारों को छूट देने की शक्ति प्रदान करती है। धारा 32 पंजीकरणकर्ता अधिकारी, अनुज्ञापन अधिकारी या केन्द्रीय या राज्य बोर्ड के सदस्य या सेवक द्वारा अधिनियम के नियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक किये गये कार्य के लिए अभियोजन या विधिक कार्यवाही नहीं हो जायेगी। यह धारा उन्हें संरक्षण प्रदान करती है। धारा 33 केन्द्र सरकार को राज्य सरकार को निर्देश देने की तथा धारा 34 अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी बनाने में आने वाली कठिनाईयों को दूर करने की तथा धारा 34 नियम बनाने की शक्ति प्रदान करती है।

दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले- ‘समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धान्त’ दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले श्रमिकों पर भी लागू होता है चाहे उनकी नियुक्ति स्थायी स्कीम में हो या अस्थायी स्कीम में, मजदूरी भुगतान में अन्तर अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत विभेदकारी माना जायेगा। एक लम्बी अवधि के बाद ऐसे श्रमिकों को स्थायी माना जाना चाहिए।

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