मजदूरी से संबंधित अधिनियम

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श्रमिकों के लिए केवल मजदूरी की मात्रा ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि उसकी अदायगी के तरीके, मजदूरी-भुगतान के अंतराल, उससे कटौतियां तथा उसके संरक्षण से संबद्ध अन्य कई बातें भी महत्वपूर्ण होती है। मजदूरी की संरक्षा से संबद्ध कानूनों के बनाए जाने के पहले मजदूरी के भुगतान में कई तरह के अनाचार हुआ करते थे। उदाहरणार्थ, श्रमिकों की इच्छा नही रहते हुए भी नियोजक उन्हें मजदूरी नकद के बदले प्रकार में लेने के लिए बाध्य करते थे। मजदूरी-भुगतान के लिए कोई निश्चित अवधि भी नहीं रहती थी। कई नियोजक तो अपनी इच्छा से एक लंबी अवधि, यहाँ तक कि कई महीनों के बीत जाने पर ही मजदूरी का भुगतान किया करते थे। नियोजक कार्य से अनुपस्थिति, खराब काम, औजारों या समानों की क्षति, नियमों और आदेशों के उल्लंघन, वस्तुओं या सेवाओं की आपूर्ति आदि कई बहानों से मजदूरी से मनमाने ढंग से कटौतियां भी किया करते थे। इन कटौतियों के फलस्वरुप कभी-कभी तो श्रमिकों की मजदूरी की पूरी राशि से भी हाथ धोना पड़ता था। मजदूरी-भुगतान से संबद्ध इन अनुचित और और स्वेच्छाचारी अनाचरों से श्रमिकों के बीच असंतोष निरंतर बढ़ता गया। औद्योगिकीकरण के प्रसार तथा मजदूरी के संरक्षण की समस्या निरंतर गंभीर और व्यापक होती गई। मजदूरी की अदायगी से संबद्ध अनाचार को रोकने के लिए अलग-अलग देशों में मजदूरी की संरक्षा के लिए कानून बनाए गए। इन्हीं कानूनों में मजदूरी अधिनियम, 1936 भी था जिसके बारे में अग्रलिखित चर्चा कर रहे हैं।

मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936

विस्तार 

प्रारंभ में यह अधिनियम कारखानों और रेलवे-प्रशासन में काम करने वाले ऐसे कर्मचारियों के साथ लागू था, जिनकी मजदूरी 200 रुपये प्रतिमाह से अधिक नही थी। बाद में इसे कई अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा नियोजनों में लागू किया गया। इनमें मुख्य हैं - (1) ट्राम पथ सेवा या मोटर परिवहन-सेवा, (2) संघ की सेना या वायुसेना या भारत सरकार के सिविल विमानन विभाग में लगी हुई वायु-परिवहन सेवा के अतिरिक्त अन्य वायु परिवहन सेवा, (3) गोदी, घाट तथा जेटी (4) यांत्रिक रूप से चालित अंतर्देशीय जलयान (5) खान, पत्थर-खान या तेल-क्षेत्र, (6) कर्मशाला या प्रतिष्ठान, जिसमें प्रयोग, वहन या विक्रय के लिए वस्तुएं उत्पादित, अनुकूलित तथा विनिर्मित होती है, तथा (7) ऐसा प्रतिष्ठान, जिसमें भवनों, सड़कों, पुलों, नहरों या जल के निर्माण, विकास या अनुरक्षण से संबंद्ध कोई कार्य या बिजली या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन, प्रसारण या वितरण से संबंद्ध कोई कार्य किया जा रहा हो।

श्रमिकों के लिए केवल मजदूरी की मात्रा ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि उसकी अदायगी के तरीके, मजदूरी-भुगतान के अंतराल, उससे कटौतियां तथा उसके संरक्षण से संबद्ध अन्य कई बातें भी महत्वपूर्ण होती है।जो न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के दायरे में आते हैं। इस शक्ति का प्रयोग कर कई राज्य सरकारों ने इस अधिनियम को कृषि तथा कुछ अन्य असंगठित नियोजनों में भी लागू किया है। इस तरह, आज मजदूरी भुगतान अधिनियम देश के कई उद्योगों, नियोजनों और प्रतिष्ठानों में लागू है। यह अधिनियम उपर्युक्त प्रतिष्ठानों या उद्योगों में 142 ऐसे कर्मचारियों के साथ लागू है, जिनकी मजदूरी 6500 रु0 प्रतिमाह से अधिक नही है।

मजदूरी की परिभाषा 

मजदूरी भुगतान अधिनियम में ‘मजदूरी’ की परिभाषा निम्नांकित प्रकार से दी गई है- मजदूरी का अभिप्राय उन सभी पारिश्रमिक (चाहे वेतन, भत्ते या अन्य रूप में) से है, जिन्हें मुद्रा के रूप में अभिव्यक्त किया गया है या किया जा सकता है और जो नियोजन की अभिव्यक्त या विवक्षित शर्तो के पूरी किए जाने पर नियोजित व्यक्ति को उसके नियोजन या नियोजन के दौरान किए गए काम के लिए देय होता है। ‘मजदूरी’ के अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित होते हैं -
  1. किसी अधिनिर्णय या पक्षकारों के बीच किए गए समझौते या न्यायालय के आदेश के अधीन देय पारिश्रमिक; 
  2. ऐसा पारिश्रमिक जिसके लिए नियोजित व्यक्ति अतिकाल कार्य या छुट्टी के दिनों या अवधि के लिए हकदार है; 
  3. ऐसा कोई पारिश्रमिक (चाहे उसे बोनस या किसी अन्य नाम से पुकारा जाए) जो नियोजन की शर्तो के अधीन देय होता है; 
  4. ऐसी कोई राशि जो नियोजित व्यक्ति को उसकी सेवा की समाप्ति पर किसी कानून, संविदा या लिखित के अधीन कटौतियों के साथ या कटौतियों के बिना देय होती है तथा उसकी अदायगी के लिए अवधि की व्याख्या नही की गई है; या 
  5. ऐसी कोई राशि जिसके लिए नियोजित व्यक्ति किसी लागू कानून के अधीन बनाई गई योजना के अंतर्गत हकदार होता है। 
अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ‘मजदूरी’ की परिभाषा के अंतर्गत निम्नलिखित को सम्मिलित नही किया जाता - 
  1. ऐसा बोनस, जो नियोजन की शर्तो, अधिनिर्णय, पक्षकारों के बीच समझोते या न्यायालय के आदेश के अधीन देय नही है; 
  2. आवास-स्थान, प्रकाशा, जल, चिकित्सकीय परिचर्या, अन्य सुख-सुविधा का मूल्य, ऐसी सेवा का मूल्य जिसे राज्य सरकार के सामान्य या विशेष आदेश द्वारा मजदूरी की गणना से अपवर्जित कर दिया गया हो; 
  3. नियोजक द्वारा किसी पेंशन या भविष्य निधि के अंशदान के रूप में दी गई तथा उस पर प्राप्त किया जाने वाला सूद; 
  4. यात्रा-भत्ता या यात्रा-संबंधी रियायत का मूल्य; 
  5. किसी नियोजित व्यक्ति को उसके नियोजन की प्रकृति के कारण उस पर पड़े विशेष व्यय को चुकाने के लिए दी गई धनराशि; या 
  6. ऊपर के भाग (4) में वर्णित राशि को छोड़कर नियोजन की समाप्ति पर दिया जाने वाला उपादान। 

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 

भारत सरकार द्वारा 1944 में नियुक्त श्रमिक जाँच समिति ने देश के विभिन्न उद्योगों में श्रमिकों की मजदूरी और उनके अर्जन का अध्ययन किया और बताया कि लगभग सभी उद्योगों में मजदूरी की दरें बहुत ही निम्न है। समिति ने अनुभव किया कि उस समय तक देश के प्रधान उद्योगों में भी श्रमिकों की मजदूरी में सुधार लाने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए गए। स्थायी श्रम-समिति तथा भारतीय श्रम-सम्मेलन में देश के कुछ उद्योगों और नियोजनों में कानूनी तौर पर मजदूरी नियत करने के प्रश्न पर 1943 और 1944 में विस्तार से विचार-विमर्ष किए गए। समिति और सम्मेलन दोनों ने कुछ नियोजनों में कानून के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी की दरें नियत करने और इसके लिए मजदूरी नियतन संयंत्र की व्यवस्था की सिफारिश की ।इन अनुशंसाओं को ध्यान में 148 रखते हुए भारत सरकार ने 1948 में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम बनाया, जो उसी वर्ष देश में लागू हुआ। अधिनियम में समय-समय कुछ संशोधन भी किए गए है। अधिनियम के मुख्य उपबंधों की विवेचना नीचे की जाती है।

परिभाषाएँ 

‘मजदूरी’ का अभिप्राय ऐसे सभी पारिश्रमिक से है, जिसे मुद्रा में अभिव्यक्त किया जा सकता है तथा जो नियोजन की संविदा (अभिव्यक्त या विवक्षित) की शर्तो को पूरी करने पर नियोजित व्यक्ति को उसके नियोजन या उसके द्वारा किए जाने वाले काम के लिए देय होता है। मजदूरी में आवासीय भत्ता सम्मिलित होता है, लेकिन उसमें निम्नलिखित नहीं होते -
  1. आवास-गृह, प्रकाश और जल की आपूर्ति तथा चिकित्सकीय देखभाल का मूल्य; 
  2. समुचित सरकार के सामान्य या विशेष आदेश द्वारा अपवर्जित किसी अन्य सुख-सुविधा या सेवा का मूल्य; 
  3. नियोजक द्वारा किसी पेंशन निधि, भविष्य निधि या किसी सामाजिक बीमा-योजना के अंतर्गत दिया गया अंशदान; 
  4. यात्रा-भत्ता या यात्रा रियायत का मूल्य; 
  5. नियोजन की प्रकृति के कारण किसी नियोजित व्यक्ति को विशेष खर्च के लिए दी जाने वाली राशि; या 
  6. सेवोन्मुक्ति पर दिया जानेवाला उपदान 

कर्मचारी - 

‘कर्मचारी’ का अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से है, जो किसी ऐसे अनुसूचित नियोजन में कोई काम (कुशल, अकुशल, शारीरिक या लिपिकीय) करने के लिए भाड़े या पारिश्रमिक पर नियोजित हैं, जिसमें मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत की जा चुकी है। कर्मचारी की श्रेणी में ऐसा बाहरी कर्मकार भी सम्मिलित है, जिसे दूसरे व्यक्ति द्वारा उसके व्यवसाय या व्यापार के लिए बनाने, साफ करने, धोने, बदलने, अलंकृत करने, पूरा करने, मरम्मत करने, अनुकूलित करने या अन्य प्रकार से विक्रय हेतु प्रसंस्कृत करने के लिए वस्तु या सामग्री दी जाती है, चाहे वह प्रक्रिया बाहरी कर्मकार के घर पर या अन्य परिसरों में चलाई जाती हो। कर्मचारी की श्रेणी में ऐसा कर्मचारी भी सम्मिलित है, जिसे समुचित सरकार ने कर्मचारी घोषित किया हो, लेकिन इसके अंतर्गत संघ के सशस्त्र बलों का सदस्य शामिल नहीं है।

समुचित सरकार - 

‘समुचित सरकार’ का अभिप्राय हैं - (1) केन्द्र सरकार या रेल प्रशासन के प्राधिकार द्वारा या अधीन चलाए गए किसी अनुसूचित नियोजन के संबंध में या किसी भवन, तेलक्षेत्र या महापत्तन या केंद्रीय अधिनियम द्वारा स्थापित किसी निगम के संबंध में - केंन्द्रीय सरकार तथा (2) अन्य अनुसूचित नियोजनों के संबंध में - राज्य सरकार।

नियोजक - 

‘नियोजक’ का अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से हैं, जो या तो स्वयं या अन्य व्यक्ति के द्वारा या तो अपने किसी अन्य व्यक्ति के लिए या अधिक कर्मचारियों को ऐसे किसी अनुसूचित नियोजन में नियोजित करता है, जिसके लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें इस अधिनियम के अधीन नियत की जा चुकी है। ‘नियोजक’ के अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित हैं -
  1. कारखाना-अधिनियम 1948 के अधीन कारखाना का प्रबंधक; 
  2. अनुसूचित नियोजन में सरकार के नियंत्रण के अधीन वह व्यक्ति या प्राधिकारी, जिसे सरकार ने कर्मचारियों के पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए नियुक्त किया है। जहाँ इस प्रकार के किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को नियुक्त नहीं किया गया है, वहाँ विभागाध्यक्ष को ही नियोजक माना जाएगा; 
  3. किसी स्थानीय प्राधिकारी के अधीन ऐसा व्यक्ति, जिसे कर्मचारियों के पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए नियुक्त किया गया है। अगर वहाँ इस तरह का कोई व्यक्ति नहीं है, तो उस स्थानीय प्राधिकारी के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी को नियोजक समझा जाएगा; तथा 
  4. अन्य स्थितियों में ऐसा व्यक्ति, जो कर्मचारियों के पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए या मजदूरी देने के लिए स्वामी के प्रति उत्तरदायी है। 

विस्तार 

अधिनियम की अनुसूची से उन नियोजनों का उल्लेख है, जिनमें करने वाले श्रमिकों के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत की जा सकती है। प्रारंभ में अधिनियम की अनुसूची के भाग एक में सम्मिलित नियोजन थे - (1) ऊनी गलीचे या दुषाले बुननेवाले प्रतिष्ठान, (2) धानकुट्टी, आटा-मिल या दाल-मिल, (3) तंबाकू (जिसके अंतर्गत बीड़ी बनाना भी शामिल है) का विनिर्माण, (4) बागान, जिसमें सिनकोना, रबर, चाय और कहवा सम्मिलित है, (5) तेल-मिल, (6) स्थानीय प्राधिकार, (7) पत्थर तोड़ने या फोड़ने के काम, (8) सड़कों का निर्माण या अनुरक्षण तथा भवन-संक्रियाएं, (9) लाख-विनिर्माण, (10) अभ्रक संकर्म, (11) सार्वजनिक मोटर परिवहन तथा (11) चर्म रंगाईशाला और चर्म विनिर्माण।

अधिनियम की अनुसूची के भाग दो में सम्मिलित नियोजन है - कृषि या किसी प्रकार के कृषिकर्म में नियोजन, जिसमें जमीन की खेती या उसे जोतना, दुग्ध-उद्योग, किसी कृषि या बागबानी की वस्तु का उत्पादन, उसकी खेती, उसे उगाना और काटना, पषुपालन, मधुमक्खीपालन या मुर्गीपालन तथा किसी किसान द्वारा या किसी कृषिक्षेत्र पर कृषिकर्म संक्रियाओं के आनुशंगिक या उनसे संयोजित (जिसमें वन-संबंधी या लकड़ी काटने से संबद्ध संक्रियाएं तथा कृषि-पैदावार को बाजार के लिए तैयार करने और भंडार या बाजार में देने या ढोने के कार्य शामिल है) कोई भी क्रिया सम्मिलित है।

मजदूरी की न्यूनतम दरों का नियतन और पुनरीक्षण 

न्यूनतम मजदूरी-दरों का नियतन - 

समुचित सरकार (अपने-अपने अधिकार-क्षेत्र में केंद्रीय या राज्य सरकार) के लिए अधिनियम की अनुसूची में उल्लिखित तथा उसमें शामिल किए जाने वाले अन्य नियोजनों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत करना आवश्यक है। अनुसूची के भाग 2 में सम्मिलित नियोजनों, अर्थात् कृषि एवं संबद्ध क्रियाओं में समुचित सरकार पूरे राज्य की जगह केवल राज्य के विशेष भागों या विशिष्ट 150 श्रेणी या श्रेणियों के नियोजनों (पूरे राज्य या उसके किसी भाग) के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत कर सकती है। 

अलग-अलग अनुसूचित नियोजनों, एक ही अनुसूचित नियोजन में अलग-अलग प्रकार के कामों, वयस्कों, तरुणों, बालकों और शिक्षुओं तथा अलग-अलग क्षेत्रों के लिए मजदूरी की अलग-अलग दरें नियत की जा सकती है। मजदूरी की न्यूनतम दरें घंटे, दिन, महीने या अन्य कालावधि के लिए नियत की जा सकती है। जहाँ मजदूरी की दैनिक दर नियत की गई है। वहाँ उसे मासिक मजदूरी के रूप में गणना तथा जहाँ मासिक नियत की गई है, वहाँ उसे दैनिक मजदूरी के रूप में गणना के तरीकों का भी उल्लेख किया जा सकता है। जिन नियोजनों में मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 लागू है, उनमें मजदूरी कालावधि उसी अधिनियम के अनुसार निर्धारित की जाएगी। नियत की जाने वाली मजदूरी-दरें निम्नलिखित प्रकार की हो सकती है। - 
  1. मजदूरी की मूल दर और परिवर्ती निर्वाहव्यय-भत्ता; 
  2. निर्वाहव्यय-भत्ता के सहित या रहित मजदूरी की मूल दर तथा अनिवार्य वस्तुओं की रियायती दरों पर आपूर्ति के नकद मूल्य; या 
  3. ऐसा सर्वसमावेशी दर, जिसमें मूल दर, निर्वाहव्यय-भत्ता तथा रियायतों के नकद मूल्य सम्मिलित हों। 

न्यूनतम मजदूरी दरों के नियतन की प्रक्रिया - 

अधिनियम में अनुसूचित नियोजनों में पहली बार मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत करने की दो प्रक्रियाओं की व्यवस्था है। पहली प्रक्रिया में समुचित सरकार समिति या समिति के सहायतार्थ विभिन्न क्षेत्रों के लिए उपसमितियों का गठन कर सकती है। समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखकर सरकार संबंद्ध नियोजन के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें ‘राजपत्र‘ में प्रकाशित कर नियत कर देती है।
दूसरी विधि में समुचित सरकार किसी अनुसूचित नियोजन में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरों के प्रस्ताव प्रभावित हो सकने वाले व्यक्तियों के सूचनार्थ राजपत्र में प्रकाशित कर देती है और उन्हें प्रकाशन की तिथि से दो महीने के अंदर अपने अभ्यावेदन देने का मौका देती है। इस संबंध में प्राप्त किए गए सभी अभ्यावेदनां पर विचार करने के बाद सरकार संबंद्ध अनुसूचित नियोजन के लिए मजदूरी की न्यूनतम दरें राजपत्र में प्रकाशित कर नियत कर देती है। दोनों में किसी भी प्रक्रिया द्वारा नियत की गई मजदूरी की दरें राजपत्र में अधिसूचना के प्रकाशन के तीन महीने की अवधि के बीत जाने के बाद लागू हो जाती है।

न्यूनतम मजदूरी दरों का पुनरीक्षण - 

नियत की गई न्यूनतम मजदूरी दरों की पुनरीक्षण के लिए भी वे ही विधियां अपनाई जाती है, जो उन्हें नियत करने के लिए हैं। मजदूरी दरों के पुनरीक्षण के लिए भी समिति और उपसमिति का गठन या राजपत्र में प्रस्तावों की अधिसूचना के प्रकाशन की विधि का प्रयोग किया जा सकता है। संशोधित मजदूरी की न्यूनतम दरें भी अलग-अलग अनुसूचित नियोजनों, एक ही अनुसूचित नियोजन में अलग-अलग प्रकार के कामों, वयस्कों, तरुणों और शिक्षुओं तथा अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग हो सकती है। ये दरें भी तीन प्रकार की हो सकती है। - (1) मजदूरी की मूल दर और अलग से परिवर्ती निर्वाहव्यय-भत्ता, (2) निर्वाहव्यय-भत्ता के सहित या उनके बिना मजदूरी की मूल दर तथा अनिवार्य वस्तुओं की रियायती दरों पर आपूर्ति के नकद मूल्य, तथा (3) ऐसी सर्वसमावेशी दर, जिसमें मूल दर, निर्वाहव्यय-भत्ता तथा रियायतों के नकद मूल्य सम्मिलित हों।

स्मिति, उपसमिति, सलाहकार बोर्ड और केंद्रीय सलाहकार बोर्ड - 

समिति, उपसमिति तथा सलाहकार बोर्ड प्रत्येक में समुचित सरकार द्वारा मनोनीत अनुसूचित नियोजनों के नियोजकों और कर्मचारियों के प्रतिनिधि बराबर-बराबर की संख्या में, तथा अधिकतम एक-तिहाई की संख्या में स्वतंत्र व्यक्ति होगें। स्वतंत्र व्यक्तियों में एक को समुचित सरकार अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेगी। सलाहकार बोर्ड का काम समितियों और उपसमितियों के कार्यो को समन्वित करना तथा न्यूनतम मजदूरी-दरों के नियत किए जाने और उनमें संशोधन लाने के संबंध में समुचित सरकार को सलाह देना है। केंद्रीय सलाहकार बोर्ड की नियुक्ति केंद्रीय सरकार करती है। केंद्रीय सलाहकार बोर्ड में भी अनुसूचित नियोजनों के नियोजकों और कर्मचारियों के प्रतिनिधि बराबर-बराबर के अनुपात में तथा अधिकतम एक-तिहाई की संख्या में स्वतंत्र व्यक्ति होंगे। इन सभी सदस्यों को केंद्रीय सरकार मनोनीत करेगी। केंद्रीय सरकार स्वतंत्र व्यक्तियों में एक को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेगी। केंद्रीय सलाहकार बोर्ड का मुख्य काम मजदूरी की न्यूनतम दरों को नियत करने या उनमें संशोधन लाने तथा अधिनियम के अंतर्गत अन्य विषयों के बारे में सलाह देना तथा सलाहकार बोर्डो के कार्यो को समन्वित करना है।

प्रकार में मजदूरी - 

इस अधिनियम के अंतर्गत नियत की गई मजदूरी को नकद देना आवश्यक है, लेकिन जहाँ मजदूरी को पूर्णत: या आंशिक रूप में प्रकार में देने का प्रचलन है, वहाँ समुचित सरकार इस तरह से भुगतान दे सकती है। प्रकार में मजदूरी तथा अनिवार्य वस्तुओं की रियायती दरों पर आपूर्ति के नकद मूल्य का निर्धारण विहित तरीके से करना आवश्यक है। जहाँ कर्मचारी मात्रानुपाती कार्य पर नियोजित है तथा जिसके लिए न्यूनतम कालानुपाती मजदूरी ही नियत की गई है, वहाँ उसे मात्रानुपाती मजदूरी दर के हिसाब से मजदूरी दी जाएगी।

न्यूनतम मजदूरी का भुगतान - 

किसी भी अनुसूचित नियोजन में, जिसमें मजदूरी की दरें नियत की जा चुकी है।, नियत की गइर् मजदूरी से कम दरों पर मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा सकता। नियत की गई मजदूरी से केवल वे ही कटौतियाँ की जा सकती है।, जो सरकार द्वारा अधिकृत की गई हो। जिन नियोजनों में मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 लागू है, उनमें उसी अधिनियम के उपबंधों के अनुसार मजदूरी से कटौतियां की जा सकती है। समुचित सरकार को मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 के उपबंधों को राजपत्र में अधिसूचना द्वारा उन अनुसूचित नियोजनों में लागू करने की शक्ति प्राप्त है।, जिनमें मजदूरी की न्यूनतम दरें नियत की गई है।

दो या अधिक वर्गो के कामों के लिए मजदूरी - 

अगर किसी कर्मचारी से दो या अधिक प्रकार के काम लिए जाते है।, जिनके लिए मजदूरों की विभिन्न दरें नियत की गई है।, तो उसे प्रत्येक काम के लिए अलग-अलग दरों से मजदूरी दी जाएगी।

सामान्य कार्य के घंटों आदि का नियतन 

कर्मचारियों के लिए दैनिक कार्य के घंटों, अंतराल, साप्ताहिक विश्राम तथा अवकाश-दिवस के कार्य के लिए भुगतान-संबंधी उपर्युक्त उपबंध केवल विहित सीमाओं और विहित शर्तो के अनुसार ही लागू होते है। -
  1. अत्यावष्यक काम पर या आपातकालीन स्थिति में काम करने वाले कर्मचारी; 
  2. प्रारंभिक या अनुपूरक प्रकृति के कामों पर नियोजित कर्मचारी, जिन्हें निर्धारित अवधि की सीमाओं के बाद भी काम करना जरूरी होता है; 
  3. ऐसे कर्मचारी, जिनका नियोजन मूलत: आंतरायिक है; 
  4. ऐसे कर्मचारी, जिनका काम तकनीकी कारणों से कर्त्तव्यकाल के समाप्त होने के पहले ही किया जाना जरूरी होता है; या 
  5. ऐसे कर्मचारी, जो उन कार्यो पर नियोजित है, जिन्हें प्राकृतिक शक्तियों की अनियमित क्रियाओं के अलावा अन्य समयों में नही किया जा सकता। 
आगे कोई कर्मचारी नियोजक के लोप के कारण निर्धारित कार्य के दैनिक घंटों से कम घंटों के लिए काम करता है, तो भी उसे पूरे दिन के लिए नियत मजदूरी-दर से भुगतान किया जाएगा। लेकिन, अगर वह अपनी अनिच्छा से या अन्य विहित परिस्थितियों के कारण पूरे समय तक काम नहीं करता, तो वह पूरे दिन के लिए मजदूरी का हकदार नहीं होता।

 अन्य उपबंध 

  1. संविदा द्वारा त्याग पर रोक - ऐसी कोई भी संविदा या समझौता, चाहे वह इस अधिनियम के पहले या बाद में किया गया हो, जिसके द्वारा कोई कर्मचारी इस अधिनियम के अंतर्गत मजदूरी की न्यूनतम दर, विशेषाधिकार या रियायत को छोड़ देता है या घटा देता है, वह अकृत और शून्य होता है। 
  2. दाबे - प्राधिकारी को गवाही लेने, गवाहों की उपस्थिति के लिए बाध्य करने, और दस्तावेजों को पेश करने के लिए सिविल प्रक्रिया-संहिता, 1908 के अधीन सिविल न्यायालय की सभी शक्तियाँ प्राप्त रहती है। प्राधिकारी को दंड प्रक्रिया-संहिता के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा। न्यूनतम मजदूरी या अन्य रकम के बकाए की राशि के दावे से संबद्ध आवेदन कई कर्मचारी मिलकर एक साथ भी दे सकते है।, लेकिन ऐसी स्थिति में हर्जाने की अधिकतम राशि न्यूनतम मजदूरी के बकाए की स्थिति में कुल राशि के दसगुने से अधिक और अन्य स्थितियों में प्रतिव्यक्ति 10 रु0 से अधिक नहीं हो सकती। प्राधिकारी किसी अनुसूचित नियोजन में बकाए से संबंद्ध अलग-अलग दिए गए कई आवेदनों पर एक आवेदन के रूप में भी विचार कर सकता है। 
  3. असंवितरित रकमों का भुगतान - अगर किसी कर्मचारी की मृत्यु के कारण उसे इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अंतर्गत देय न्यूनतम मजदूरी या अन्य रकम की राशि का भुगतान नहीं किया जा सका हो, तो नियोजक के लिए इस राशि को प्राधिकरी के पास जमा करना आवश्यक होगा। प्राधिकारी जमा की गई इस राशि का व्यवहार विहित तरीके से करेगा।
  4. जिस्टरों और रिकॉर्डो का अनुरक्षण - अनुसूचित नियोजनों में नियोजकों के लिए अपने कर्मचारियों से संबद्ध ब्योरे, उनके कार्य, दी जानेवाली मजदूरी, मजदूरी की रसीद तथा अन्य विवरणियों के लिए रजिस्टर और रिकॉर्ड रखना आवश्यक है। उनके लिए कर्मचारियों को दी जाने वाली सूचना की समुचित व्यवस्था करना भी अनिवार्य है। समुचित मजदूरी-पुस्तिकाओं या मजदूरी-पर्चियों को दिए जाने के संबंध में नियम बना सकती है।
  5. वादों का वर्णन - निम्नलिखित स्थितियों में कोई भी न्यायालय बकाए की मजदूरी या अन्य रकम की वसूली के लिए किसी भी वाद को विचारार्थ नहीं ले सकता - 
    • अगर दावे की राशि के लिए वादी या उसकी ओर से आवेदन इस अधिनियम के अंतर्गत नियुक्त प्राधिकारों के पास दिया जा चुका हो; 
    • अगर प्राधिकारी ने दावे की राशि के संबंध में वादी के पक्ष में निर्देश दिए हो; 
    • अगर प्राधिकारी के निदेशानुसार दावे की राशि वादी को देय नही है; या 
    • अगर दावे की राशि इस अधिनियम के अधीन वसूल की जा सकती हो। 
  1. निरीक्षक - केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निरीक्षकों की नियुक्ति और उनके कार्य की स्थानीय सीमाओं का निर्धारण कर सकती है। निरीक्षक को भारतीय दंडसंहिता के अर्थ में लोकसेवक समझा जाता है। निरीक्षक द्वारा किसी दस्तावेज या वस्तु को उपस्थित करने की माँग करने पर उसे प्रस्तुत करना संहिता की धाराओं 175 और 176 के अनुसार कानूनी रूप से अनिवार्य होता है। 
  2. कुछ अपराधों के लिए शासितयाँ - अगर नियोजक किसी कर्मचारी को नियत की गई न्यूनतम मजदूरी से कम दर पर या उसे देय अन्य रकम से कम का भुगतान करता है या कार्य के घंटों या विश्राम-दिवस से संबद्ध नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसे अधिकतम 6 महीने के कारावास या 500 रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जा सकता है। लेकिन, नियोजक को दंडित करते समय न्यायालय के लिए दावे से संबद्ध मामलों में उस पर लगाए गए हर्जाने की राशि को ध्यान में रखना आवश्यक है। जहाँ अधिनियम या उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के उल्लंघन के लिए दंड का उल्लेख नहीं किया गया है, वहाँ अपराध के लिए नियोजक को अधिकतम 500 रुपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। 
  3. अपराधों का संज्ञान - अगर कोई शिकायत न्यूनतम मजदूरी या अन्य रकम के बकाए से संबद्ध हो और उस संबंध में प्राधिकारी ने उसे पूर्ण या आंशिक रूप में स्वीकृत कर दिया हो, तो कोई भी न्यायालय समुचित सरकार या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी की स्वीकृति के बिना उस शिकायत पर विचार नहीं कर सकता। अगर कोई शिकायत शासितयों से संबद्ध हो, तो न्यायालय उस पर केवल निरीक्षक द्वारा शिकायत करने या उसकी स्वीकृति पर ही विचार कर सकता है। उल्लिखित शासितयों के बारे में शिकायत इसके लिए मंजूरी दी जाने से एक महीने के अंदर और अन्य प्रकार की शासितयों के लिए अपराध के अभिकथित दिन से 6 महीने के अंदर ही की जा सकती है। 
  4. छूट और अपवाद - समुचित सरकार को मजदूरी संबंधी अधिनियम के उपबंधों को अंशक्त कर्मचारियों के साथ लागू नहीं होने से संबद्ध निदेश देने की शक्ति प्राप्त है। अगर किसी अनुसूचित नियोजन में कर्मचारियों का इस अधिनियम में नियत की गई मजदूरी की दरां से अधिक दर पर मजदूरी मिलती है, या उनकी सेवा की शर्ते और दशाएँ इस अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित शर्तो और दशाओं से ऊँचे स्तर की हैं, तो समुचित सरकार इन कर्मचारियों, प्रतिष्ठानों, या किसी क्षेत्र में अनुसूचित नियोजन को अधिनियम के संबद्ध उपबंधों से छूट दे सकती है। 
  5. केंद्रीय सरकार द्वारा निदेश देने की शक्ति - इस अधिनियम के समुचित निष्पादन के लिए केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को निदेश दे सकती है। 
  6. नियम बनाने की शक्ति - केन्द्र सरकार को केंद्रीय सलाहकार बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, कामकाज के संचालन के लिए प्रक्रिया, मतदान के तरीके, सदस्यता में आकस्मिक रिक्तियों के भरे जाने और कामकाज के लिए आवश्यक गणपूर्ति के संबंध में नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है।

समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 

विस्तार 

अधिनियम सारे भारत में लागू है। केन्द्रीय सरकार को इसे विभिन्न स्थापनों या नियोजनों में लागू करने की शक्ति प्राप्त है। अब तक यह अधिनियम देश के अधिकांश उद्योगों, स्थापनों या नियोजनों में लागू किया जा चुका है। अगर किसी अधिनिर्णय, समझौते या सेवा की संविदा या किसी अन्य कानून के उपबंध इस अधिनियम के उपबंधों के विरोध में हों, तो वहाँ इसी अधिनियम के उपबंध लागू होंगे।

पुरुष और स्त्री-कर्मकारों को समान पारिश्रमिक देने के संबंध में नियोजक का दायित्व 

किसी स्थापना या नियोजन में कोई भी नियोजक एक ही या समान कार्य पर लगे किसी भी कामगार को उन दरों से कम अनुकूल दरों पर मजदूरी, चाहे वह नकद हो या प्रकार में, नहीं देगा, जिन दरों से वैसे ही काम पर लगे दूसरे लिंग के कामगारों को देय होती है। इन उपबंधों के अनुपालन के लिए कोई भी नियोजक किसी कामगार को देय पारिश्रमिक की दर को घटा नही सकता। जिस स्थापन या नियोजन में इस अधिनियम के लागू होने के पहले पुरुष और स्त्री-कामगारों को एक ही या समान कार्य के लिए देय पारिश्रमिक की दरों में केवल लिंग के आधार पर ही भिन्नता रही है, वहाँ इस अधिनियम के लागू होने पर उच्चतम दरें ही लागू रहेंगी। अधिनियम के अधीन एक ही या समान प्रकृति के कार्य से ऐसे कार्य का बोध होता है, जिसे अगर पुरुष या स्त्री द्वारा समान दशाओं में किया जाए, तो उसमें वांछित कोषल, प्रयास या दायित्व समान हो, तथा उसमें किसी पुरुष या स्त्री द्वारा किए जाने के लिए कोषल, प्रयास या दायित्व-संबंधी भिन्नताएं नियोजन की शर्तो एवं दशाओं के प्रयोजनों के लिए व्यावहारिक महत्व के नहीं हो। 

स्त्री और पुरुष कामगारों की भरती और नियोजन की शर्तो में भेदभाव करने का प्रतिशेध 

उन स्थितियों को छोड़कर जहाँ स्त्रियों के नियोजन को प्रतिशिद्ध या प्रतिवंधित किया गया है, इस अधिनियम के प्रारंभ होने पर कोई भी नियोजक एक ही या समान प्रकृति के कार्य पर भरती करते समय स्त्रियों के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं करेगा। स्त्रियों के साथ भेदभाव की मनाही भरती के उपरांत सेवा की दशाओं जैसे पदोन्नति, प्रशिक्षण या स्थानांतरण के संबंध में भी की गई हैं। लेकिन, भेदभाव-संबंधी उपर्युक्त उपबंध अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, भूतपूर्व सैनिकों, छंटनी किए गए कर्मचारियों या अन्य वर्ग या श्रेणी के व्यक्तियों से संबंद्ध प्राथमिकताओं या आरक्षण के साथ लागू नही होगें। 

सलाहकार समिति 

स्त्रियों को रोजगार के अधिकाधिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से केन्द्रीय या राज्य सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में एक या अधिक सलाहकार समितियों का गठन कर सकती है। सलाहकार समिति में समुचित सरकार द्वारा मनोनीत कम-से-कम 10 सदस्य होगे, जिनमें आधी स्त्रियां होगी। समिति का मुख्य कार्य केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट प्रतिष्ठानों या नियोजनों में स्त्रियों को नियोजित किए जा जा सकने के संबंध में सलाह देना है। सलाह देते समय सलाहकार समिति को कतिपय बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है; जैसे - सम्बद्ध प्रतिष्ठान या नियोजन में नियोजित व्यक्तियों की संख्या, कार्य की प्रकृति, कार्य के घंटे, नियोजन के लिए स्त्रियों की उपयुक्तता, स्त्रियों को रोजगार के अधिकाधिक अवसर उपलबध कराने की आवश्यकता तथा समिति द्वारा समझी जाने वाली अन्य सुसंगत बातें। समिति की सिफारिशों पर विचार करने तथा संबद्ध व्यक्तियों को अभ्यावेदन का समुचित अवसर प्रदान करने के बाद समुचित सरकार स्त्री-कामगारों के नियोजन के संबंद्ध में निर्देश दे सकती है। 

विशिष्ट मामलों में अधिनियम का लागू नहीं होना 

जहां किसी कानून के अंतर्गत महिलाओं के नियोजन की शर्तो और दशाओं से संबद्ध विशेष व्यवहार की व्यवस्था है, वहां इस अधिनियम के उपबंध लागू नही होंगे। जहाँ बच्चों के जन्म या संभावित जन्म या सेवा-निवृत्ति, विवाह या मृत्यु से संबद्ध नियोजन की शर्तो एवं दशाओं के संबंध में महिलाओं के लिए विशेष व्यवस्था की गई है, वहां भी इस अधिनियम के उपबंध लागू नहीं होंगे।

घोषणा करने की शक्ति 

जहाँ समुचित सरकार इस बात से संतुष्ट है कि किसी स्थापन या नियोजन में पुरुष और महिला-कामगारों के पारिश्रमिक में अंतर लिंग के अलावा अन्य कारकों से हैं, वहाँ वह इस संबंध में घोषणा कर सकती है, तथा इस तरह 156 के अंतर के सिलसिले में नियोजक के किसी भी कृत्य को इस अधिनियम के उपबंधों का उल्लघंन नही समझा जाएगा। 

दावे और शिकायतें 

अधिनियम के अधीन दावों एवं शिकायतों तथा निर्धारण के प्रयोजन के लिए समुचित सरकार प्राधिकारी की नियुक्ति कर सकती है। ऐसा पदाधिकारी से निम्न कोटि का पदाधिकारी नहीं होगा। ऐसे दावों या शिकायतों को विहित तरीके से करना आवश्यक है। प्राधिकारी के लिए दावे या शिकायत के संबंध में आवेदक तथा नियोजक को सुनवाई का अवसर प्रदान करना आवश्यक है। ऐसे प्रत्येक प्राधिकारी को साक्ष्य लेने, गवाहों को उपस्थित होने के लिए बाध्य करने तथा दस्तावेजों को पेश करवाने के संबंध में सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त है। प्राधिकारी के निर्णय से विक्षुब्ध व्यक्ति आदेश के दिन से 30 दिनों के अंदर सरकार द्वारा नियुक्त अपील-प्राधिकारी के पास अपील कर सकता है। 

निरीक्षक  

अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में केन्द्रीय एवं राज्य सरकारें इस अधिनियम तथा इसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुपालन से संबंद्ध जांच के लिए निरीक्षकों की नियुक्ति कर सकती है। निरीक्षक भारतीय दंडसंहिता के अधीन लोकसेवक होता है। निरीक्षक को अपने अधिकार क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं में अग्रलिखित शक्तियाँ प्राप्त रहती है- (1) किसी भी भवन, कारखाना, परिसर या जलयान में प्रवेश करने की शक्ति, (2) नियोजक से कामगारों के नियोजन से संबद्ध रजिस्टर या अन्य दस्तावेजों को पेश करवाने की शक्ति, (3) अधिनियम के उपबंधों के अनुपालन के संबंध में किसी व्यक्ति के साक्ष्य लेने की शक्ति, (4) किसी कामगार के संबंध में नियोजक, उसके अभिकर्ता या सेवक से पूछताछ करने की शक्ति, तथा (5) किसी रजिस्टर या अन्य दस्तावेज से नकल लेने की शक्ति। 

शक्तियाँ 

अधिनियम के अंतर्गत कई कृत्यों या लोपों के लिए दोषी व्यक्तियों को कारावास या जुर्माने या दोनों से दंडित किया जा सकता है। विहित रजिस्टर या दस्तावेज के अनुरक्षण या उसे पेश करने में विफलता तथा साक्ष्य या कर्मकारों के नियोजन से संबंद्ध वांछित सूचना देने में विफलता या संबंद्ध व्यक्तियों को सूचनाएं देने से रोकने के दोषी व्यक्ति को एक महीने तक के कारावास या 10 हजार रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जा सकता है। भरती, पदोन्नति, स्थानान्तरण, प्रशिक्षण आदि में स्त्रियों के साथ भेदभाव करना या पुरुष और स्त्री-कर्मकारों को एक ही या समान कार्य के लिए असमान मजदूरी देना या सलाहकार समिति द्वारा स्त्री-कर्मकारों के संबंध में दिए गए निर्देशों का पालन नहीं करना 10 हजार से 20 हजार रुपये तक के जुर्माने या 3 महीने से एक वर्ष तक के कारावास या दोनों से दंडनीय है। निरीक्षक के समक्ष रजिस्टर, दस्तावेज या सूचना नहीं प्रस्तुत करने के दोषी व्यक्ति को 500 रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। 

अन्य उपबंध 

अधिनियम के कुछ अन्य महत्वपूर्ण उपबंध है - 
  1. रजिस्टरों का अनुरक्षण - प्रत्येक नियोजक के लिए अपने कर्मकारों के संबंध में विहित रजिस्टरों और दस्तावेजों का रखना आवश्यक है। 
  2. कंपनियों द्वारा अपराध - जहाँ अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा की गई हो, वहाँ ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध के समय कंपनी के व्यवसाय के संचालन के प्रभार में हो या कंपनी के प्रतिदायी हो, अपराध के लिए दोषी समझा जाएगा और उसके विरुद्ध अभियोग चलाया जाएगा और दंडित किया जाएगा। लेकिन, अगर ऐसा व्यक्ति यह साबित कर देता है कि अपराध उसके ज्ञान के बिना किया गया हो या उसने उसे रोकने के लिए तत्परता दिखाई हो, तो उसे दंडित नहीं किया जाएगा। अगर यह पाया जाता है कि अपराध कंपनी के किसी निदेशक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता या उपेक्षा के कारण हुआ है, तो उसे ही दंडित किया जाएगा। 
  3. अपराध का संज्ञान - अधिनियम के अंतर्गत किसी अभियोग का विचारण मेट्रोपोलिटन दंडाधिकारी या प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी से अन्यून कोटि का न्यायालय ही कर सकता है। अधिनियम के अंतर्गत अभियोग का संज्ञान न्यायालय द्वारा अपने स्वयं के ज्ञान या समुचित सरकार या अधिकृत पदाधिकारी द्वारा की गई शिकायत के आधार पर ही किया जा सकता है। इस तरह की शिकायत अपराध से क्षुब्ध व्यक्ति या कोई मान्यता-प्राप्त कल्याण संस्था या संगठन भी कर सकता है। 
  4. नियम बनाने की शक्ति-अधिनियम के उपबंधों को लागू करने के प्रयोजनों के लिए केन्द्र सरकार विहित विषयों से संबंद्ध नियम बना सकती है। 

ठेका श्रम विनियमन अधिनियम, 1970 

ठेकाश्रम के विनियमन हेतु ठेकाश्रम (विनियमन और उत्सादन अधिनियम, 1970 में पारित किया गया जो 10 फरवरी, 1970 से प्रभावी हुआ। इसका उद्देश्य ठेके पर काम करने वाले श्रमिकों को शोषण से बचाना है। श्रमिकों के स्वास्थ्य और कल्याण हेतु समुचित व्यवस्था सुनिश्चित कराना अधिनियम का उद्देश्य है। बीस या बीस से अधिक कर्मकार जिस प्रतिष्ठान में कार्यरत है। या थे उन पर यह अधिनियम लागू होगा। लेकिन समुचित सरकार चाहे तो कम कार्यरत कर्मकारों वाले प्रतिष्ठान में भी शास्कीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा लागू कर सकती है। आन्तरायिक या आकस्मिक प्रकृति के स्थापनों पर वह लागू नहीं होगा। इस सम्बन्ध में सरकार का निश्चय अन्तिम होगा। यह अधिनियम सार्वजनिक निजी नियोजकों तथा सरकार पर लागू होता है। इसे असंवैधानिक नहीं माना गया यद्यपि कि यह ठेकेदारों पर कतिपय निर्बन्धन और दायित्व अधिरोपित करता है। स्थापन में कार्य/परिणाम सम्पन्न कराने के लिए श्रमिकों को उपलब्ध कराने वाला ठेकेदार (उपठेकेदार समेत) तथा उनके माध्यम से काम करने के लिए उपलब्ध व्यक्ति ठेका श्रमिक कहलाता है उसे भाड़े पर रखा जाता है। स्थापन का यहां व्यापक अर्थ है जहाँ अभिनिर्माण प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है। प्रधान नियोजक धारा 1 उपधारा (छ) में परिभाषित है, नाम निर्दिष्ट इससे अभिप्रेत है। केन्द्रीय सरकार केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड (ठेकाश्रम) गठित करती है। इसमें एक अध्यक्ष, मुख्य श्रम, आयुक्त, केन्द्रीय सरकार, रेल, खान आदि के कम से कम 11 या अधिकतम 17 प्रतिनिधि होंगे। कर्मकारों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों की संख्या प्रधान नियोजकों के प्रतिनिधियों से कम नहीं होगी। इसकी सलाह मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं होगी। राज्य सरकार राज्य स्तर पर सलाह देने के लिए राज्य सलाहकार (ठेकाश्रम) बोर्ड गठित करेगी इन दोनों के सदस्यों की पदावधि, सेवा की अन्य शर्ते, अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तथा रिक्त स्थानों के भरने की रीति ऐसी होगी जो निर्धारित की जाये। वे बोर्ड समितियाँ गठित करने की शक्ति रखते हैं। धारा 6 के अनुसार सरकार अपने राजपत्रित अधिकारी को ठेकाश्रम पर नियोजित करने वाले स्थापनों के पूंजीकरण करने के लिए नियुक्त करेगी और उनके क्षेत्राधिकार की सीमा भी निश्चित कर देगी। निर्धारित अवधि में आवेदन देने पर तथा सारी शर्तो के पूरा रहने पर पंजीकरणकर्ता पंजीकरण करके प्रमाणपत्र जारी करेगा जो लाइसेन्सिंग का काम करेगा। पर्याप्त कारणों से सन्तुष्ट होने पर विलम्ब से प्रस्तुत किये गये आवेदन पर अधिकारी विचार कर सकेगा। अनुचित ढंग से प्राप्त किये गये पंजीकरण का प्रधान नियोजक सुनवाई का अवसर प्रदान करके तथा सरकार के पूर्व अनुमोदन से प्रतिसंहरण भी किया जा सकेगा। धारा 9 के अनुसार पंजीकरण रद्द होने पर ठेका श्रमिकों को नियोजित नहीं किया जायेगा। धारा 10 के अन्तर्गत समुचित सरकार ठेका श्रमिकों के नियोजन पर प्रतिशेध लगा सकेगी। 

समुचित सरकार धारा 11 के अन्तर्गत अनुज्ञापन अधिकारियों की यथेश्ठ संख्या में उनकी सीमाओं को निर्धारित करते हुए नियुक्ति करेगी। बिना लाइसेन्स लिए ठेकाश्रम के माध्यम से कार्य नहीं कराया जायेगा। सेवा शर्तो जैसे काम के घण्टों आदि, तथा निर्धारित सिक्योरिटी राशि जमा करने के बारे में सरकार नियम बनायेगी। उसका प्रधान नियोजक को अनुपालन करना होगा। अनुज्ञापन अधिकारी समय पर अनुज्ञापन की धारा 13 के अधीन निर्धारित फीस देने पर नवीनीकरण कर सकेगा। अनुज्ञप्ति के दुव्र्यपदेशन, महत्वपूर्ण तथ्यों के गोपन, नियमोल्लंघन से प्राप्त किये जाने की दशा में उसका प्रतिसंहरण, निलम्बर तथा संशोधन भी किया जा सकेगा। धारा 15 के अधीन किसी आदेश से व्यथित हुआ व्यक्ति 30 दिन के भीतर सरकार द्वारा नाम निर्देशित व्यक्ति अपील अधिकारी के यहाँ अपील कर सकेगा। 

धारा 16 में सरकार ठेका श्रमिकों के कल्याण तथा स्वास्थ्य के लिए जलपान गृहों की व्यवस्था के लिए नियोजकों को आदेश देगी। खाद्य पदार्थो का विवरण तथा मूल्य आदि के बारे में दिशा निर्देश देगी। धारा 18 के अन्तर्गत, विश्राम कक्षों तथा रात में रुकने के लिए स्वच्छ आरामदेह प्रकाशयुक्त आनुकल्पिक आवासों की व्यवस्था करने का नियोजक का दायित्व होगा। इसके अलावा स्वास्थ्यप्रद पेय जल की आपूर्ति, पर्याप्त संख्या में शौचालय, मूत्रालय, धुलाई की सुविधाएं उपलब्ध कराना होगा। धारा 20 के अनुसार फस्र्ट एड फैसिलिटीज की व्यवस्था होगी। इन सुविधाओं के लिए प्रधान नियोजक उपगत व्ययों का प्रधान नियोजक ठेकेदार से वसूल कर सकता है। धारा 21 के अनुसार मजदूरी का भुगतान ठेकेदारों पर होता। इसमें ओवर टाइम वेज भी सम्मिलित होगी। कम भुगतान करने पर प्रधान नियोजक शेष राशि का भुगतान करके ठेकेदार से वसूल करने का हकदार होगा। इण्डियन एयर लाइन्स बनाम केन्द्रीय सरकार श्रम न्यायालय, के निर्णयानुसार ठेका श्रमिक मजदूरी न पाने की दशा में मुख्य नियोजक से मजदूरी माँग सकते हैं। 

धारा 22 में दण्ड की व्यवस्था की गई है। जो कोई निरीक्षक के कार्य में बाधा पहुंचायेगा या निरीक्षण हेतु रजिस्टर देने से इन्कार करेगा वह तीन माह के कारावास या पांच सौ रुपये जुर्माना या दोनों से दण्डित कया जस सकेगा। निर्बन्धनों, अनुज्ञप्ति की शर्तो का उल्लंघन करने वाला नियोजक तीन माह के कारावास तथा एक हजार रुपये जुर्माना या दोनों से दण्डित होगा। प्रथम उल्लंघन के दोषसिद्ध होने पर उसके जारी रहने पर एक सौ रुपये प्रतिदिन के लिए धारा 23 के अन्तर्गत दण्ड किया जा सकेगा। उल्लंघन सिद्ध करने का भार शिकायतकर्ता पर होगा। कम्पनी के मामले में धारा 25 के अन्तर्गत कम्पनी का भारसाधक तथा उसके प्रति उत्तरदायी व्यक्ति दण्डित किया जा सकेगा। इसमें निदेशक, प्रबन्धक, प्रबन्ध अभिकर्ता, आदि आते हैं। प्रेसीडेन्सी मजिस्टे्रट या फस्र्ट क्लास मजिस्टे्रट से अवर कोई भी न्यायालय दण्डनीय अपराधों का संज्ञान या विचारण नहीं करेगा। अपराध किये जाने की तिथि से निरीक्षक द्वारा या उसकी लिखित पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने वाले व्यक्ति द्वारा परिवाद 90 दिन के भीतर दाखिल किये जाने पर विचारण किया जायेगा अन्यथा नहीं। निरीक्षकों की जांच आदि करने, लोक अधिकारी की सहायता लेने, किसी व्यक्ति से परीक्षा करने, कार्य बांटने वाले का नाम-पता जानने, रजिस्टर आदि को जब्त करने या उनकी प्रतिलिपियां लेने का अधिकार होगा। 

रजिस्टरों या अन्य अभिलेखों को बनाये रखने का दायित्व धारा 29 के अन्तर्गत प्रधान नियोजक का होगा जिसमें मजदूरी भुगतान आदि की प्रविश्टियां और अन्य वांछित जानकारियां आदि दी गई होती है। धारा 30 अधिनियम से असंगत विधियों और करारों के प्रभाव पर प्रकाश डालती है। अन्य विधियों में प्रदान की गई सुविधाओं से इस अधिनियम के अन्तर्गत दी जाने वाली सुविधाएं किसी भी दशा में कम नहीं होगी। धारा 31 समुचित सरकार को अधिनियम के कुछ निर्बन्धनों से कुछ समय किसी स्थापनों या ठेकेदारों को छूट देने की शक्ति प्रदान करती है। धारा 32 पंजीकरणकर्ता अधिकारी, अनुज्ञापन में सद्भावपूर्वक किये गये कार्य के लिए अभियोजन या विधिक कार्यवाही नहीं की जायेगी। यह धारा उन्हें संरक्षण प्रदान करती है। धारा 33 केन्द्र सरकार को राज्य सरकार को निर्देश देने की तथा धारा 34 अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी बनाने में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने की तथा धारा 34 नियम बनाने की शक्ति प्रदान करती है। 

दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले - ‘‘समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धान्त’’ दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले श्रमिकों पर भी लागू होता है चाहे उनकी नियुक्ति स्थायी स्कीम में हो या अस्थायी स्कीम में, मजदूरी भुगतान में अन्तर अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत विभेदकारी माना जायेगा। एक लम्बी अवधि के बाद ऐसे श्रमिकों को स्थायी माना जाना चाहिए। 

बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 

अधिनियम का मुख्य उद्देश्य कुछ उद्योगों व संस्थानों में काम करने वाले व्यक्तियों के लिए बोनस के भुगतान की व्यवस्था कराना तथा उससे सम्बन्धित अन्य मामलों को सुलझाना है। यह अधिनियम पूरे देश में फैले हुए उन सब कारखानों और संस्थानों पर लागू होता है जिनमें लेखा-वर्ष की अवधि में किसी भी दिन 20 या उससे अधिक कर्मचारी काम करते है। अधिनियम, शिक्षार्थियों को छोड़कर काम पर लगे उन सभी कर्मचारियों पर लागू होता है जिनका मासिक वेतन या मजदूरी 1,600 रुपये तक है किन्तु 1985 में यह सीमा 1,600 रु0 से बढ़ाकर 2,500 रु0 प्रतिमाह कर दी गई थी। जिन संस्थानों तथा व्यक्तियों पर यह अधिनियम लागू नहीं होता, वे हैं भारतीय जीवन 160 बीमा निगम, नाविक गोदी कर्मचारी, केन्द्र व राज्य सरकारों तथा स्थानीय प्राधिकरणों के औद्योगिक संस्थान, भारतीय रेड क्रास सोसाइटी, समाज कल्याण संस्थायें (यदि ये लाभ हेतु स्थापित किए गए हैं), विश्वविद्यालय, शिक्षा संस्थायें, अस्पताल, इमारती कार्यो में ठेके के श्रमिक, भारतीय रिजर्व बैंक, औद्योगिक वित्त निगम तथा अन्य वित्तीय संस्थायें, भारतीय यूनिट ट्रस्ट, अन्तर्देषीय जल यातायात संस्थान जो अन्य किसी देश से गुजरने वाले मार्गो पर कायर् करते है।, सरकारी क्षेत्र के किसी भी संस्थान के कर्मचारी किन्तु सरकारी क्षेत्र के उन उद्यमों को छोड़कर जो विभाग द्वारा नहीं चलाये जाते तथा निजी क्षेत्र के संस्थानों से 20 प्रतिशत की सीमा तक स्पर्धा करते है। इसके अतिरिक्त, अधिनियम ऐसे कर्मचारियों पर भी लागू नहीं होगा जिन्होनें लाभ अथवा उत्पादन बोनस की अदायगी के लिए 29 मई 1965 से पूर्व अपने मालिकों से समझौता कर लिया है। अधिनियम में उल्लिखित बोनस सूत्र 1964 के उस विशेष दिन से लागू होगा जिस दिन से संस्था के हिसाब का वर्ष आरम्भ होता है। अधिनियम की मुख्य धारायें जिन बातों से सम्बन्धित हैं, वे हैं - (1) बोनस के लिए पात्रता, (2) न्यूनतम तथा अधिकतम बोनस की अदायगी, (3) बोनस के भुगतान के लिए समय की सीमा, (4) बोनस से कटौती, (5) कुल लाभों की तथा बोनस के रूप में वितरण योग्य उपलब्ध देशी की गणना आदि। 

जहाँ तक बोनस के लिये पात्रता का सम्बन्ध है, अधिनियम की परिधि में आने वाले किसी भी संस्थान का ऐसा कोई भी कर्मचारी, अधिनियम की धाराओं के अनुसार अपने मालिक से बोनस पाने का अधिकारी होता है जिसने किसी भी लेखा वर्ष में कम से कम 30 दिन काम किया हो। यदि किसी कर्मचारी को संस्थान में जालसाजों, हिंसक व्यवहार, चोरी, दुर्विनियोग या तोड़-फोड़ करने के कारण नौकरी से पृथक कर दिया गया हो तो उसे बोनस प्राप्ति के अयोग्य माना जायेगा। जबरी छुट्टी के दिनों, मजदूरी सहित छुट्टियों, मातृत्व कालीन छुट्टियों अथवा स्थायी व्यावसायिक चोट के कारण अनुपस्थिति के दिनों को कर्मचारी के काम करने के दिनों के रूप में ही माना जायेगा। नये स्थापित संस्थानों के कर्मचारी भी उस लेखा-वर्ष से बोनस पाने के अधिकारी होंगे जिस वर्ष कि उन्हें लाभ हो अथवा छठे लेखा वर्ष से जबकि वे अपना उत्पादित सामान बेचना आरम्भ करें, इनमें से जो भी पहले हो। जहाँ तक बोनस का न्यूनतम तथा अधिकतम मात्रा का सम्बन्ध है, अधिनियम में 1980 में संशोधन करके इस बात की व्यवस्था कर दी गई है कि प्रत्येक श्रमिक को स्थायी रूप से मजदूरी का 8.33 प्रतिशत या 100 रुपये (60 रु0 उन कर्मचारियों के लिये जिनकी आयु 15 वर्ष से कम है), जो भी अधिक हो न्यूनतम बोनस के रूप में मिलेगा। अधिकतम बोनस श्रमिक के वेतन या मजदूरी का 20 प्रतिशत होगा। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रारम्भ में न्यूनतम बोनस वेतन या मजदूरी के 4 प्रतिशत की दर से देय था परन्तु अनेक संशोधित अधिनियमों के माध्यम से यह सीमा बढ़ाकर 8 1/3 प्रतिशत या 80 रु0, (बाद में ये 80 रु0 बढ़ाकर 100 रु0 किये गये), जो भी अधिक हो, कर दी गई। 8 1/3 प्रतिशत अब न्यूनतम बोनस का स्थायी प्रतिशत बन गया है। अधिनियम के अनुसार बोनस पाने के अधिकारी वे कर्मचारी होते हैं जो 2,500 रु0 प्रतिमाह वेतन या मजदूरी प्राप्त करते हैं। किन्तु बोनस भुगतान की गणना उसी प्रकार की जायेगी जैसे उनका वेतन या मजदूरी 1,600 रु0 प्रतिमाह हो। इस उद्देश्य के लिये वेतन या मजदूरी से आशय महँगाई भत्ते सहित उस मूल मजदूरी से है जो कर्मचारियों को देय होती है परन्तु इसमें अन्य भत्ते तथा समयोपरि कार्य का भुगतान सम्मिलित नहीं होता। 

बोनस के भुगतान की समय सीमा के सम्बन्ध में अधिनियम में कहा गया है कि कर्मचारी को बोनस के रूप में देय सभी धनराशियां सामान्यत: लेखा वर्ष की समाप्ति के आठ माह के अन्दर दे दी जायेगी। बोनस के सम्बन्ध में यदि विवाद हो तो बोनस का भुगतान विवाद के निपटारे या पंचाट की घोषणा की तिथि से एक माह के अन्दर कर दिया जायेगा। परन्तु सरकार उचित एवं वैध कारणों के आधार पर मालिक द्वारा बोनस के भुगतान की अवधि को दो वर्ष तक बढ़ा सकती है। 

जहाँ तक बोनस से कटौतियां करने का सम्बन्ध है, मालिक को अधिकार है कि वह किसी कर्मचारी के गलत आचरण के कारण हुई वित्तीय हानि की धनराशि को उसी लेखा वर्ष में कर्मचारी के बोनस में से काट ले। अधिनियम मालिक को यह अनुमति भी प्रदान करता है कि वह पहले ही अदा कर दिये गये रिवाजी या अन्तरिम बोनस का समायोजन अधिनियम के अनुसार दिये जाने वाले बोनस में कर सके। 

कुल लाभ की गणना तथा बोनस के रूप में देय उपलब्ध अधिभार के सम्बन्ध में अधिनियम की धाराओं में उस विधि का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार कुल लाभ की गणना, उपलब्ध अधिभार का निर्धारण तथा ऐसी अधिभार की शुद्ध गणना हेतु पूर्व खर्चो का निर्धारण किया जायेगा। पूर्व खर्चो में मूल्य ह्मस, प्रत्यक्ष कर, विकास निधि, पूंजी पर प्रतिफल और कार्य करने वाले साझेदारों तथा प्रोप्राइटरों का पारिश्रमिक, सम्मिलित है। अधिनियम की इन धाराओं में समय-समय पर संशोधन किया जाता रहा है।

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