विधिशास्त्र तथा विधिक सिद्धान्त का अर्थ, परिभाषा

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अनुक्रम
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा समूह में रहना उसकी नैसर्गिक प्रवृत्ति है।
यह नैसर्गिक प्रवृत्ति मनुष्य को अन्य मनुष्यों से सम्बन्ध रखने को बाध्य करती है।
सामाजिक जीवन इन्हीं संबंधों पर आधारित है। इन सामाजिक संबंधों को व्यवस्थित
रखने के लिए मनुष्य के व्यवहार पर नियंत्रण रखना आवश्यक होता है। यही कारण है
कि विधि या उन नियमों का जन्म हुआ जो मनुष्य के आचरण को नियंत्रित एवं
सुव्यवस्थित रख सकें तथा समाज में शान्ति व्याप्त हो सके। विधि के नियम मनुष्य के
पारस्परिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक है। विधिक नियमों का जन्म किस प्रकार
हुआ इस पर व्यापक मतान्तर हैं। कुछ विधिशास्त्री विधि के नियमों को दैवीय मानते हैं
तथा कछु इनको प्राकृतिक की संज्ञा देते हैं। आधुनिक यगु में विधिक नियमों का निर्माण
राज्य द्वारा किया जाता है। राज्य, विधिक नियमों के माध्यम से नागरिकों को उनके
कर्तव्यों एवं अधिकारों का बोध कराते हैं तथा अनुचित आचरण एवं व्यवहार के लिए
दंडित करते हैं। तात्पर्य है कि विधि एक ऐसा माध्यम है जिसकी सहायता से राज्य
नागरिकों के आचरण, संव्यवहार तथा क्रिया कलाप पर नियंत्रण रखते हुए समाज में
शान्ति व्यवस्था, की स्थापना तथा न्याय प्रदान करता है।

उपरोक्त विधिक नियमों को, विधि के अध्ययन के अन्तर्गत एक पृथक विषय के
रूप में स्थान दिया गया है जिसको विधिशास्त्र कहा जाता है।

विधिशास्त्र एवं विधिक सिद्धान्त का अर्थ 

‘विधिशास्त्र‘ शब्द की उत्पत्ति दो लैटिन शब्दों ‘ज्यूरिस’ (Juris) और ‘प्रूडेंशिया’
(Prudentia) के योग से हुई है। ‘ज्यूरिस’ शब्द का अर्थ विधि से है जबकि पू्रडेंशिया
शब्द का अर्थ है ज्ञान। इस प्रकार विधिशास्त्र (Jurisprudence) का शाब्दिक अर्थ ‘विधि
का ज्ञान’ है। यथार्थ में यह विधि का ज्ञान मात्र न होकर विधि का क्रमबद्ध ज्ञान है
इसीलिये सामण्ड (Salmond) ने विधिशास्त्र को ‘विधि का विज्ञान’ (Science of Law)
निरूपित किया है। यहाँ ‘विज्ञान’ से आशय विषय के क्रमबद्ध अध्ययन से है। मोयली
(Moyle) के मतानुसार विधिशास्त्र का अन्तिम लक्ष्य साधारणत: वही है जो किसी अन्य
विज्ञान का होता है। यही कारण है कि विधिशास्त्र को विधि-सिद्धान्तों का सूक्ष्म एवं
क्रमबद्ध अध्ययन कहा जाता है। फिट्जेराल्ड (Fitzgerald) विधिशास्त्र को विधि के
विज्ञान के रूप में एक विशेष प्रकार की खोजबीन या जाँच-पड़ताल मानते हैं। इस
खोजबीन का उद्देश्य विधि एवं विधिक प्रणाली के आधारभूत सिद्धान्तों को निश्चित
करना है। परन्तु इस खोजबीन की प्रकृति अमूर्त, सामान्य और सैद्धान्तिक है।

विधिशास्त्र (Jurisprudence) तथा विधिक सिद्धान्त या विधि के सिद्धान्त (Legal
theory) का प्रयोग कभी समान अर्थों तथा कभी असमान अर्थों में हुआ है। पाउण्ड
(Pound), पैटन (Paton), डायस (Dias), सामण्ड (Salmond) आदि की विधिशास्त्र की
पुस्तकों के शीर्षक में ‘विधिशास्त्र‘ शब्द का प्रयोग किया गया है जबकि फ्रीडमैन
(Friedman) तथा फिंच (Finch) की पुस्तकों का शीर्षक ‘विधिक सिद्धान्त’ है।

प्रथम दृश्ट्या दो अलग-अलग भावार्थों के प्रयोग से प्रतीत होता है कि दोनों के
अर्थ एवं परिक्षेत्र अलग-अलग हैं। ऐसा विधि के विश्लेशण, विवरण एवं निरूपण के
दृष्टिकोणों के कारण प्रतीत होता है। ऐंग्लो सैक्सन देशों तथा ब्रिटिश कालोनियों में
विधिशास्त्र का अर्थ एक विशेष प्रकार के विश्लेशणात्मक अध्ययन से लिया गया है जो
तार्किकता पर आधारित यथास्थितिवादी विधिक प्रणाली का अध्ययन प्रस्तुत करता है।
यह बेन्थम् (Bentham), आस्टिन (Austin), केल्सन (Kelsen) की परम्परा मानी जा
सकती है। यह अध्ययन शुद्धत: तार्किक एवं अनुभवाश्रित है जिसका कार्य स्थिरता एवं
विधिक न्याय निश्चित करना है। यह विधि के उद्देश्यों पर ध्यान नहीं देता है।

इसके विपरीत महाद्वीपीय विधिशास्त्रियों का दृष्टिकोण विधिक सिद्धान्त की
व्याख्या करना है जिसमें दार्शनिक, नैतिक एवं सामाजिक प्रभावों का समावेश है। इसी
कारण इहरिंग (Ihering), स्टैमलर (Stammler), ड्यूगिट (Duiguit), कोहलर
(Kohler), जेनी (Geny) तथा अमरीकी विधिशास्त्रियों ने सजीव विधि, सतत् परिवर्तनीय
विषयवस्तु के साथ विधि, आवश्यकताओं और हितों, सामाजिक बलों तथा प्रक्रिया के
संदर्भ में विधि की व्याख्या की। यह अध्ययन मात्र विश्लेशणात्मक या संकल्पनात्मक
(Conceptual) अध्ययन न होकर मूल्यांकन एवं दार्शनिक दृष्टिकोण पर आधारित है
जिसमें नैतिक, सामाजिक एवं मानवीय तत्वों की भूमिका को उचित स्थान दिया गया है।
फ्रीडमैन ने स्पष्ट किया है कि उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्व विधिक सिद्धान्त मुख्य रूप से
दर्शन, धर्म, नीतिशास्त्र तथा राजनीति से उत्पन्न था क्योंकि महान विधि विचारक प्रमुख
रूप से दार्शनिक, पादरी या राजनीतिज्ञ थे। तत्पष्चात ऐसे विधिक सिद्धान्त का अभ्युदय
हुआ जो विधिक अनुसंधानों, प्रणालियों एवं व्यवसायिक शिक्षणों पर आधारित था।
फ्रीडमैन का यह मानना है कि विधिक सिद्धान्त एक ओर दर्शन से जुड़ा है तो दूसरी
ओर राजनीतिक सिद्धान्त से। इसका प्रारम्भ कभी दर्शन से होकर राजनीतिक सिद्धान्त
की सहायक भूमिका के साथ आगे बढ़ता है तो कभी राजनीतिक सिद्धान्त से प्रारम्भ
होकर दर्शन की सहायक भूमिका के साथ अग्रसर होता है। परन्तु उनके अनुसार विधिक
सिद्धान्त की विचारधारा के अन्तर्गत दर्शन के तत्वों में विश्व में मनुष्य की स्थिति का
प्रतिबिम्बन और सर्वोत्तम समाज के लिए आवश्यक विचारों का समावेश होना चाहिए।
विधिक सिद्धान्त का मुख्य कार्य विधि की दार्शनिक अवधारणाओं का परीक्षण एवं
विश्लेशण है जो स्वयं दार्शनिक, राजनीतिक एवं विभिन्न वैचारिक गुत्थियों से मिश्रित है।
फ्रीडमैन, हार्ट (Hart), फुलर (Fuller), रोनॉल्ड ड्वॉरकिन (Ronald Dworkin) आदि
के अध्ययन, विधिक सिद्धान्त का उदाहरण है।

वास्तव में विधिशास्त्र एंव विधि के सिद्धान्त में अन्तर मात्र विचार तथा भ्रम पर
आधारित है। क्योंकि दोनों की विषयवस्तु, ध्येय और उद्देश्य पृथक्करणीय नहीं है।
दोनों में किया जाने वाला अन्तर मात्र अनुभूति (Emphasis) तथा क्षेत्र विस्तार (Range)
का है, विषयवस्तु (Content) का नहीं। दोनों सामान्य तौर से विधि की प्रकृति, विधि को
प्रभावित करने वाले सामाजिक, आर्थिक और राजनीति तत्वों और विभिन्न विधिक
अवधारणाओं एवं सिद्धान्तों के मूल्यांकन की तरीकों की दृष्टि से समान है। विधिशास्त्र
के अद्यतन विधिशास्त्रियों ने इस तत्व को समझकर दोनों का समान अर्थ में प्रयोग किया
है। फिन्च का मानना है कि चाहें विधिशास्त्र का अर्थ विधिक अवधारणाओं या
संकल्पनाओं, अधिकार, अधिपत्य, स्वामित्व, निगम आदि का अध्ययन माना जाये, चाहे
विधिक सिद्धान्त का तात्पर्य स्वयं विधि का अध्ययन माना जाए, दोनों में समानता है।
विधिशास्त्र और विधि के सिद्धान्त के भेद को, समयगत विकास के परिप्रेक्ष्य में
विधिशास्त्र की उदार परिभाषा कर, विश्लेशणात्मक दायरे के संकुचन से उन्मुक्ति दे कर
और उद्देश्यों, मूल्यांकन एवं विधि से इतर विषयों के प्रभाव को सम्मिलित कर मिटा
दिया गया है। विधिशास्त्र मात्र विधिक अवधारणाओं के विश्लेशण तक संकुचित न रह
कर विधि के दर्शन को भी अध्ययन की विषयवस्तु मानता है जिसके एक दूसरे से
संबंधित तीन उद्देश्य है- मूल्यांकन (विश्लेशण), सामान्य संष्लेशण, और तार्किक
बुद्धिपरक तरीके द्वारा विधिक संकल्पनाओं में सुधार। डायस के अनुसार विधिशास्त्र का
अध्ययन मात्र विधि के विवरण या प्रतिपादन (म्गचवेपजपवद) से संबंधित नहीं है बल्कि
इसका अर्थ विधि के संबंध में अनुसंधान या निरूपण (Disquisition) से है।

विधिशास्त्र की परिभाषायें 

प्रसिद्ध रोमन विधिवेत्ता अल्पियन (Ulpian) ने ‘डायजेस्ट’ नामक अपने ग्रन्थ में
विधिशास्त्र को उचित एवं अनुचित का विज्ञान (Science of just and unjust) कहा है।
यह परिभाषा ‘विधिशास्त्र‘ शब्द की उत्पत्ति की अनुकूलता पर प्रकाष डालती है, परन्तु
यह इतनी अधिक व्यापक है कि इसे नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र आदि के
प्रति भी लागू किया जा सकता है।

प्रसिद्ध दार्शनिक सिसरो (Cicero) ने विधिशास्त्र की परिभाषा देते हुए इसे ‘ज्ञान
का दार्शनिक पक्ष’ कहा है।

सामंड (Salmond) के अनुसार प्राथमिक दृष्टि से विधिशास्त्र में समस्त कानूनी
सिद्धान्तों का समावेश है। यह विधि का ज्ञान है, इसलिये इसे व्यावहारिक विधि के
प्राथमिक सिद्धान्तों का विज्ञान भी कहा गया है। सामंड के विचार से विधि
न्यायशास्त्रियों द्वारा लागू की जाती है तथा यह धार्मिक कानून या नैतिकता सम्बन्धी
नियमों से भिन्न है। विधि को देश-विदेश की सीमा में न्यायालय तथा न्यायाधिकरणों
द्वारा लागू किया जाता है तथा इसका उल्लंघन किये जाने पर शास्ति (Sanction) की
व्यवस्था होती है, अत: यह व्यावहारिक ज्ञान की शाखा है।

सामंड ने विधिशास्त्र की व्याख्या दो अर्थों में की है। विस्तृत अर्थ में विधिशास्त्र
से उनका अभिप्राय नागरिक विधि के विज्ञान (Science of civil law) से है, जिसके
अन्तर्गत समस्त विधिक सिद्धान्तों का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। सिविल विधि से
उनका आशय उस विधि विशेष से है जो किसी देश द्वारा अपने निवासियों के प्रति लागू
की जाती है और जिसे उस देश के नागरिक, अधिवक्ता और न्यायालय मानने के लिये
बाध्य होते हैं। इस प्रकार सामंड के अनुसार विधिशास्त्र ऐसी विधियों का विज्ञान है
जिन्हें न्यायालय लागू करते हैं।

सामंड ने सिविल विधि के विज्ञान के रूप में विधिशास्त्र के निम्नलिखित तीन
रूप बताये हैं –

  1. विधिक प्रतिपादन (Legal exposition) :- इसका प्रयोजन किसी काल-विशेष में
    प्रचलित वास्तविक विधि की विषय-वस्तु का वर्णन करना है।
  2. विधिक इतिहास (Legal history) :-इसका प्रयोजन उस ऐतिहासिक कार्यवाही
    का वर्णन करना है जिससे विधि-प्रणाली विकसित होते हुए वर्तमान अवस्था को
    प्राप्त हुई है। 
  3. विधायन विज्ञान (Science of legislation) :-इसका उद्देश्य विधि का इस
    प्रकार निरूपण करना है, जैसी कि वह होनी चाहिए। 

सामंड के अनुसार उपर्युक्त दूसरे अर्थ में विधिशास्त्र की विषय-वस्तु अत्यन्त
संकीर्ण है। इस अर्थ में विधिशास्त्र नागरिक विधि के प्राथमिक सिद्धान्तों का विज्ञान है।
इससे उनका आशय विधि के उन मूलभूत सिद्धान्तों से है जो विभिन्न देशों की नागरिक
विधियों का आधार-स्तम्भ होते हैं। इस प्रकार सामंड का यह स्पष्ट मत है कि
विधिशास्त्र में विधि-विशेष का अध्ययन नहीं किया जाता, वरन् विधियों के आधारभूत
सिद्धान्तों का कार्य-कारण विषयक क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है, जो किसी विषय को
‘शास्त्र‘ में परिवर्तित करने के लिये आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि इस दृष्टिकोण से
सामंड की परिभाषा अन्य परिभाषाओं की तुलना में अधिक सरल, स्पष्ट तथा व्यवहारिक
प्रतीत होती है।

आंग्ल विधि-शास्त्री जॉन ऑस्टिन (John Austin) ने विधिशास्त्र को ‘वास्तविक
विधि का दर्शन’ कहा है। उनके मतानुसार विधिशास्त्र का वास्तविक अर्थ है विधिक
संकल्पनाओं का प्रारूपिक विश्लेशण करना (Formal analysis of legal concepts)
परन्तु बकलैंड (Buckland) ने ऑस्टिन की इस परिभाषा को अत्यन्त संकीर्ण मानते हुए
कहा है कि वर्तमान समय में विधिशास्त्र की परिभाषा अधिक विस्तृत होनी चाहिए। इस
दृष्टि से जूलियस स्टोन (Julius Stone) द्वारा दी गयी परिभाषा अधिक तर्कसंगत प्रतीत
होती है। उन्होंने विधिशास्त्र को ‘अधिवक्ताओं की बाह्यदर्षिता’ (Lawyer’s
extroversion) निरूपित किया है। इसका आशय यह है कि वर्तमान ज्ञान के अन्य
स्रोतों के आधार पर अधिवक्तागण विधि की अवधारणाओं, आदर्शों तथा पद्धतियों का जो
परीक्षण करते हैं, उसे विधिशास्त्र की विषय-वस्तु कहा जा सकता है। जूलियस स्टोन ने
विधिशास्त्र की विषय-वस्तु को तीन वगोर्ं में विभक्त किया है जिन्हें क्रमश: (1)
विश्लेशणात्मक विधिशास्त्र, (Analytical Jurisprudence), (2) क्रियात्मक विधिशास्त्र
(Functional Jurisprudence) तथा (3) न्याय के सिद्धान्त कहा गया है।

हालैंड (Holland) ने विधिशास्त्र को वास्तविक विधि का औपचारिक विज्ञान
(formal science of positive law) निरूपित किया है। इस विषय के प्रति व्यावहारिक
दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने विधिशास्त्र को विधि के प्रचलित नियमों, विचारों तथा
सुधारों से सम्बन्धित शास्त्र माना है। उनका विचार है कि ‘‘विधिशास्त्र भौतिक नियमों
की बजाय विधि के नियमों द्वारा शास्ति होने वाले मानवीय व्यवहारों से ही अधिक
सम्बन्ध रखता है।’’

उल्लेखनीय है कि हालैंड द्वारा दी गई विधिशास्त्र की परिभाषा में प्रयुक्त
‘वास्तविक विधि’ (Positive law) का आशय सामंड की परिभाषा में प्रयुक्त ‘सिविल
विधि’ (civil law) से बहुत कुछ मिलता-जुलता है। वास्तविक विधि से अभिप्राय
सामायिक सम्बन्धों को विनियमित रखने वाले ऐसे कानूनों से है जो राज्य द्वारा निर्मित
होते है तथा न्यायालयों द्वारा लागू किये जाते हैं। ऐसे नियमों को ही सामण्ड ने
व्यावहारिक विधि (civil law) कहा है। हालैण्ड ने विधिशास्त्र को ‘औपचारिक विज्ञान’
इसलिये कहा है क्योंकि इस शास्त्र में उन नियमों का अध्ययन समाविश्ट नहीं है जो
स्वयं पार्थिव सम्बन्धों से उत्पन्न हुए हैं अपितु इसमें उन सम्बन्धों का अध्ययन किया
जाता है, जो वैध नियमों द्वारा क्रमबद्ध रूप में संचाालित किये जाते हैं। इस प्रकार यह
विज्ञान भौतिक विज्ञान (Material Science) से भिन्न है।

जे0सी0गे ्र (J.C. Gray) के अनुसार विधिशास्त्र विधि का विज्ञान है जिसके
अन्तर्गत न्यायालय द्वारा लागू किये जाने वाले क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित नियमों और उनमें
सन्निहित सिद्धान्तों का अध्ययन किया जाता है।
ग्रे ने हालैण्ड द्वारा दी गई विधिशास्त्र की परिभाषा की आलोचना करते हुए उसे
संकीर्ण तथा केवल सांकेतिक निरूपित किया है। उनका कथन है कि विधिशास्त्र केवल
औपचारिक विज्ञान नहीं है बल्कि यह एक पार्थिव विज्ञान भी है, अत: इसे वैध सम्बन्धों
और विधिक नियमों का विज्ञान कहा जा सकता है।

गे ्र के अनुसार विधिशास्त्र विधि के
विवेचन पर बल देता है, अत: इसके स्वाभाविक स्वरूप को हालंडै की परिभाषा तक
सीमित रखना उचित नहीं है।

पैटन (Paton) के अनुसार विधिशास्त्र विधि अथवा विधि के विभिन्न प्रकारों का
अध्ययन है जबकि ऐलन (Allen) ने विधिशास्त्र को विधि के मूलभूत सिद्धान्तों का
वैज्ञानिक संश्लेशण कहा है।

डायस ने विधिशास्त्र को ‘‘विधिक प्रशिक्षण एवं शिक्षा’’ के रूप में स्वीकार किया
है। इस दृष्टि से उन्होंने विधिशास्त्र में चार प्रमुख बातों का समावेश किया है जो क्रमश:
इस प्रकार है-

  1. विधि सम्बन्धी संकल्पनाएँ (concepts relating to law) 
  2. विधि की संकल्पना (concept of law) 
  3. विधि का सामाजिक प्रयोजन (social function of law) तथा 
  4. विधि का उद्देश्य (purpose of law)। 

विख्यात विधिशास्त्री ली (Lee) का विचार है कि विधिशास्त्र एक ऐसा विधान है
जो मौलिक सिद्धान्तों को अभिनिश्चित करने का प्रयास करता है तथा जिसकी
अभिव्यक्ति विधि में पाई जाती है।

जी0डब्ल्यू0 कीटन (Keeton) ने विधिशास्त्र को विधि के सामान्य सिद्धान्तों का
ज्ञान मात्र माना है। उनके मतानुसार यह शास्त्र विधि के सामान्य सिद्धान्तों का व्यापक
अर्थ में अध्ययन करते हुए उनके क्रमबद्ध विकास का मार्ग प्रषस्त करता है।

विनोग्रैडॉफ (Vinogradoff) ने विधि के प्रति ऐतिहासिक दृष्टिकोण अपनाते हुए
विधिशास्त्र की परिभाषा दी है। उनके अनुसार विधिशास्त्र की उत्पत्ति राष्ट्रों के इतिहास
में उनकी वास्तविक विधि में पाई जाने वाली विशमताओं से हुई है, जिनका उद्देश्य
विधिक अधिनियमों एवं न्यायिक निर्णयों में निहित सामान्य सिद्धान्तों को खोज निकालना
है।

समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र (Sociological Jurisprudence) के प्रणेता डीन रास्को
पाउण्ड (Dean Roscoe Pound) ने विधिशास्त्र की परिभाषा देते हुए कहा है कि
‘‘विधिशास्त्र विधि का ज्ञान है।’’ यहाँ विधि से तात्पर्य न्यायिक अर्थों में है, अर्थात्
विधिशास्त्र ऐसे सिद्धान्तों का संकलन है जो न्याय की स्थापना के लिये निर्मित किये
गये हैं और जिन्हें न्यायालयों द्वारा मान्य और लागू किया जाता है। रास्को पाउण्ड ने
विधिशास्त्र के सामाजिक पहलू पर विशेष जोर दिया है। मानव-जीवन में न्याय की
अपनी महत्ता है। न्यायविहीन समाज में मनुष्य को जीवन निर्वाह करना कठिन हो
जायेगा, इसलिये विधिशास्त्र को महत्वपूर्ण मानते हुए रास्को पाउण्ड ने इसे न्याय की
स्थापना करने वाले सिद्धान्तों का विज्ञान माना है।

विधिशास्त्र की प्रकृति तथा विशेषतायें 

अनेक विद्वानों ने विधिशास्त्र को विधि का विज्ञान निरूपित किया है। विचारणीय
प्रश्न यह है कि क्या विधिशास्त्र को विज्ञान की कोटि में रखा जा सकता है? विधिशास्त्र
की विभिन्न परिभाषाओं के अनुसार इसके अन्तर्गत विधि से संबंधित पहलुओं का
व्यवस्थित, क्रमबद्ध तरीके से अध्ययन किया जाता है। जैसा कि ऑस्टिन और उसके
पष्चात्वर्ती विधिशास्त्रियों ने कहा है कि विधिशास्त्र में प्रथाओं तथा सामाजिक व नैतिक
मान्यताओं को कोई स्थान नहीं है क्योंकि ये विधि की संकल्पना को धूमिल करती हैं।
इसलिये प्रमाणवादी विचारकों (Positivists) ने विधि को संप्रभु का आदेश निरूपित
किया ताकि उसमें निश्चितता, तर्कसंगतता एवं व्यावहारिकता बनी रहे जो विज्ञान की
किसी भी शाखा के प्रमुख तत्व हैं। विधिशास्त्र के अध्ययन के प्रति अपनाई जाने वाली
यह पद्धति उसे विज्ञान के बहुत निकट लाकर खड़ा करती है।

अगस्त कॉम्टे (August Comte) ने विधिशास्त्र के अध्ययन में कल्पनाओं तथा
रूढ़िवादी परम्पराओं पर आधारित मान्यताओं को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए उसके
प्रति विश्लेशणात्मक एवं अन्वेशणात्मक पद्धति अपनाएं जाने पर बल दिया जो कि किसी
भी विज्ञान के प्रमुख लक्षण होते हैं। तत्पष्चात् बीसवीं सदी की यथाथर्व ादी विचारधारा
के प्रवर्तकों ने विधिशास्त्र के अन्तर्गत विधि के अध्ययन को सामजिक परिवेश में किये
जाने पर जोर दिया तथा इसी तारतम्य में रास्को पाउंड ने विधि (जो कि विधिशास्त्र की
विषय वस्तु है) को सामाजिक यांत्रिकी (Social Engineering) निरूपित किया। इसी
विचारधारा को आगे चलकर इहरिंग, इहर्लिच (Ehrlich), माक्र्स (Marx), वेबर (Weber)
तथा होम्स (Holmes) आदि ने बढ़ाया तथा विधि को सामाजिक परिवर्तन का एक
सषक्त माध्यम निरूपित किया। विधिशास्त्र के प्रति सकारात्मक रूख अपनाये जाने के
कारण इसे विज्ञान की कोटि में रखा जाना ही उचित होगा।
विधिशास्त्र अपनी निम्नलिखित विशेषताओं के कारण विधि के अन्य विषयों से
भिन्न है।

  1. विधि की अनेक तथा अधिकतर विधाओं में निश्चित नियम है जो संहिताकृत
    (codified) भी होते हैं। जैसे भारतीय संविदा विधि के नियम या भारतीय दण्ड
    संहिता। परन्तु विधिशास्त्र की विषयवस्तु के संबंध में इस तरह के निश्चित नियम
    नहीं पाए जाते हैं। 
  2. विधि के अन्य विषयों के लिए निश्चित प्राधिकारिक स्रोत मिल जाते हैं
    जैसे-विधायन, न्यायिक निर्णय आदि। भारतीय संविधान के अध्ययन के लिए
    अधिनियमित भारतीय संविधान या दण्ड विधि के अध्ययन के लिए अधिनियमित
    भारतीय दण्ड संहिता प्राप्त है। अपकृत्य विधि मुख्यता प्राधिकारिक न्यायिक
    निर्णयों पर आधारित है, परन्तु विधिशास्त्र के संबंध में निश्चित प्राधिकारिक स्रोत
    नहीं पाया जाता है। 
  3. विधि पाठ्यक्रम के अन्य विषयों की तरह, विधिशास्त्र का व्यवहारिक समस्याओं के
    निराकरण में कोई विशेष महत्व नहीं है। उदाहरण स्वरूप कोई संविदा करता है
    या संपत्ति अन्तरण करता है और कोई समस्या उत्पन्न हो जाती है तो उस
    समस्या का निराकरण संविदा विधि या संपत्ति अन्तरण अधिनियम का सहारा
    लेकर न्यायालय के माध्यम से किया जा सकता है। विधिशास्त्र का इस प्रकार
    का व्यवहारिक महत्व नहीं है। विधिशास्त्र की विशेषता इसका सैद्धान्तिक होना
    है। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि विधिशास्त्र महत्वहीन है। वास्तव में
    विभिन्न नियमों के मूलभूत तत्वों का निर्धारण विधिशास्त्र में ही होता है।
    उदाहरणत: संविदा विधि में या संपत्ति अन्तरण में किसी पक्ष के साथ अन्याय न
    हो, यह मूलभूत नियम, विधिशास्त्र से ही उपजा है। 
  4. विधिशास्त्र सभी संकल्पनाओं का एक मूल, सामान्य, तात्विक तथा व्यापक चित्रण
    प्रस्तुत करता है। जैसे कि संविदा या अपकृत्य विधि में देखा जाता है कि एक
    पक्ष का दूसरे पक्ष के विरूद्ध क्या अधिकार है। विधिशास्त्र में यह अध्ययन किया
    जाता है कि अधिकार क्या है, इसकी विषयवस्तु, स्रोत, तत्व तथा प्रयोजन क्या
    है। विधिशास्त्र इन प्रश्नों पर विचार करता है कि नियमों के लिए क्या तत्व
    अपेक्षित हैं कि विधिक नियम बन सके अथवा वे कौन से तत्व हैं जो विधि को
    नैतिकता, शिष्टाचार आदि से अलग करते हैं।

विधिशास्त्र का क्षेत्र 

विधिशास्त्र विधि का अध्ययन है जो सतत् विकासशील एवं परिवर्तनीय है अतएव
विधिशास्त्र के क्षेत्र की सीमा का रेखांकन सरल नहीं है। विधिशास्त्र के अध्ययन का
विस्तार क्षेत्र, विधि के क्रमश: विकास, विधि एवं विधिक प्रणाली के अध्ययन के तरीकों,
विधि से संबंधित नवीन प्रश्नों एवं सामाजिक चुनैतियों के साथ बढ़ता जाता है। संभवत:
इसी कारण अमरीकी विधिशास्त्री कार्ल लेवेलिन (Karl Llewellyn) ने कहा कि
‘‘विधिशास्त्र उतना ही विस्तृत है जितनी विस्तृत विधि है। यह विधि से भी ज्यादा
विस्तृत है।’’

विधिशास्त्र के क्षेत्र को अनेक विधिशास्त्रियों ने अपने अध्ययन के आधार पर
अपने ढंग से प्रस्तुत किया है। अनिरूद्धप्रसाद के अनुसार इसका विस्तार क्षेत्र वास्तविक
विध्यात्मक विधि के अध्ययन से प्रारम्भ होकर विधिक समस्याओं के वैज्ञानिक अन्वेशण
(Jurimatrix), विधि के संष्लेशण एवं विधिवेत्ताओं की वाह्यदर्षिता की दूरी तय करते
हुए पूर्ण अन्तर्विधा विषय के रूप में बदल गया है।

ऑस्टिन और केल्सन ने कठोर रूप में कही जाने वाली विध्यात्मक विधि के
विश्लेशण तक विधिशास्त्र के क्षेत्र को निश्चित कर उच्चतर विधि और नैतिकता को
इसके क्षेत्र से बाहर किया। इन विधिशास्त्रियों ने ‘विधि जैसी है’(Law as it is) का
अध्ययन किया तथा विधि की उपयोगिता, प्रयोजन, अच्छाई या बुराई पर ध्यान देना
अनावष्यक तथा वर्जित माना। प्रमाणवादी विचारधारा के पष्चातवर्ती विचारकों ने
विधिशास्त्र के क्षेत्र को इतना संकुचित नहीं रखा तथा ‘विधि कैसी होनी चाहिए’ ;(Law as ought to be) को सम्मिलित कर विधिशास्त्र का क्षेत्र विस्तृत किया। ऐतिहासिक
विचारधारा के विधिशास्त्रियों ने समाज के संदर्भ में विधि के विकास को मूल्यांकित
किया। समाज के सन्दर्भ में विधिशास्त्र का अध्ययन समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र के
विकास में सहायक सिद्ध हुआ और विधिशास्त्र के अन्तर्गत विधि और विधिक संस्थाओं
के सामाजिक उद्भव, विधि का समाज पर प्रभाव, विधि का समाज में कार्य और विधि
की वैधता के सामाजिक आधारों पर इसके क्षेत्र को विस्तृत किया गया।

विधिशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र के विकासक्रम में यह अनुभव किया गया कि विधि
का उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति एवं पारस्परिक हितों में संतुलन को कायम
करना है। अत: विधि को अध्ययन की अन्य विधाओं के ज्ञान से अलग नहीं रखा जा
सकता है। विधि का अन्य विधाओं के साथ मेलजोल आवष्यभावी हो गया। फ्रीडमैन ने
माना कि विधिक सिद्धान्त का एक छोर दर्शन तथा दूसरा छोर राजनीतिक सिद्धान्त से
जुड़ा हुआ है। रैडक्लिफ ने स्पष्ट किया कि विधिशास्त्र इतिहास, अर्थशास्त्र,
समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र का भाग है। विधिशास्त्र की अन्तर्विधा अपेक्षा के
कारण ही जूलियस स्टोन (Julius Stone) ने विधिशास्त्र को विधिवेत्ता की बाह्यदर्षिता
अर्थात विधि से इतर विषयों के अध्ययन से प्राप्त विधिवेत्ता के ज्ञान के आलोक में विधि
का अध्ययन माना। अन्तत: यही कहना सर्वाधिक उचित होगा कि विधिशास्त्र का क्षेत्र
विधि पर आधारित होने के कारण सदैव खुले सिरे वाला (Open ended) अध्ययन है।
जैेस-जैसे नवीन सामाजिक तथा वैज्ञानिक प्रवृत्तियों का विकास होगा, वैसे-वैसे
विधिशास्त्र के अध्ययन का क्षेत्र भी विकसित होता रहेगा।

विधिशास्त्र के अध्ययन की विधियाँ 

पारम्परिक तौर पर विधिशास्त्र के अध्ययन की विश्लेशणात्मक, ऐतिहासिक,
तुलनात्मक, नीतिशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय तथा आलोचनात्मक विधियाँ मानी गयी हैं।
विश्लेशणात्मक तरीके के माध्यम से विधिक अवधारणाओं का तार्किक ढंग से विश्लेशण
एवं उनका आपसी संबंध निश्चित कर तार्किक रूप से सुसंगत प्रणाली (Logically
self consistent system) का निर्माण किया जाता है। विधि की इस तार्किकता का
लाभ यह है कि विधिक व्यवस्था के अध्ययन में निश्चितता कायम की जा सकती है।
इस तरीके ने संकल्पनाओं की परिभाषा के क्षेत्र में सर्वश्रेश्ठ योगदान दिया है। परन्तु
इसकी कमी यह है कि यह एक समय विशेष में पाई जाने वाली विधि का सूक्ष्मतम
विश्लेशण करता है परन्तु विधि के भविष्यकालीन विकास के संबंध में इसका
योगदान नगण्य है। ऐतिहासिक अध्ययन के तरीके में विधिक प्रणाली के विकास का
परीक्षण किया जाता है। यह तरीका विधि में होने वाले परिवर्तनों और उन तत्वों की
विवेचना करता है जिन्होंने विधि के परिवर्तन को प्रभावित किया है। इस पद्धति का लाभ
है कि यह लोगों को भूतकाल की भूलों को दोहराने से रोकता है। इस पद्धति की कमी
है कि यह भूतकाल को अतिषयता में उचित ठहराने का प्रयास करता है। तुलनात्मक
अध्ययन की पद्धति में विधि की विभिन्न प्रणालियों के मध्य समानताओं और विभेदों को
उजागर किया जाता हैं। नीतिशास्त्रीय पद्धति में विधि के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर
विधि की बुराईयों को दूर किया जाता है। इसकी कमी है कि इस तरीके में विधि और
नैतिकता का परिक्षेत्र अनिश्चित रहता है। समाजशास्त्रीय अध्ययन के तरीके के माध्यम
से समाज के परिप्रेक्ष्य में विधि के अध्ययन का प्रयास किया जाता है। विधिशास्त्र के
अध्ययन की आलोचनात्मक पद्धति में विधिशास्त्र का अध्ययन भविश्य को ध्यान में रखकर
किया जाता है।

वर्तमान समय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में अपनाए गये
तरीकों के माध्यम से विधिशास्त्र का अध्ययन किया जा रहा है। जिसमें मुख्यत: दो
पद्धतियाँ है- अनुभव निरपेक्ष (A priori) तथा अनुभव सापेक्ष या अनुभवाश्रित (A
posteriori).

अनुभव निरपेक्ष :- 

यह पद्धति मानती है कि पहले से ही चेतना में निहित ज्ञान का
अस्तित्व अनुभवजन्य ज्ञान के पूर्व और उससे स्वतंत्र है। काण्ट (ज्ञंदज) का यह मानना
था कि ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान असत्य है। इसका परिप्रतिवर्तन करके काण्ट ने
संवेदनग्राहिता के (देश तथा काल) और विवेक (कारण, आवश्यकता) के अनुभव निरपेक्ष
रूपों को प्रामाणिक ज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया। अत: इस सिद्धान्त के अनुसार
मनोभाव (Notions), तर्क वाक्य (propositions) और मूल कल्पनायें (postulates)
अनुभव के बिना सत्य और आवश्यक मान लिए जाते हैं और ये अनुभव से पूर्व हैं। दूसरे
शब्दों में ये अनुभव से प्राप्त नहीं होते हैं फिर भी वैध माने जाते हैं। अत्याधुनिक अर्थ में
इसका प्रयोग उन मनोभावों, तर्क वाक्यों और मूल कल्पनाओं के लिए किया गया है जो
अध्ययन की जा रही विधिक प्रणाली अथवा विचारों के तरीकों से बाहर स्थित हैं।
केल्सन का ‘मूल मानक’ (Grund Norm) तथा हार्ट का ‘मान्यता का सिद्धान्त’ (Rule
of Recognition) इसके उदाहरण हैं।

अनुभव सापेक्ष या अनुभवाश्रित :- 

यह उस ज्ञान का द्योतक है जो अनुभव से प्राप्त होता
है। यह अनुभव निरपेक्ष की भाँति मात्र तर्क से प्राप्त नहीं हो सकता है। इसकी सत्यता
की परख के लिए मात्र तर्क पर्याप्त नहीं हैं। तर्क के अतिरिक्त तथ्यों या अनुभव का
सहारा लेना होता है, जो प्रत्यक्ष ज्ञान या अनुभूति, साक्ष्य और अन्तर्ज्ञान पर आधारित
होते हैं। अनुभव निरपेक्ष तथा अनुभव सापेक्ष अध्ययन के तरीकों में मूल भेद यह है कि
अनुभव निरपेक्ष सामान्यीकरण से प्रारम्भ होता है जिसके प्रकाश में तथ्यों का परीक्षण
किया जाता है, जब कि अनुभव सापेक्ष तथ्यों से सामान्यीकरण की ओर अग्रसर होता
है। अनुभव निरपेक्ष सामान्यीकरण को अनुभव सिद्ध खोजबीन पर बनाया जाना अपेक्षित
है और अनुभव सिद्ध खोजबीन अक्सर प्रारम्भिक स्तर पर अनुभव निरपेक्ष संकल्पना से
बहुत हद तक सहूलियत पाती है। अत: दोनों तरीकों का प्रयोग लगातार होता रहता है।
डायस ने स्पष्ट कहा है कि इन दो तरीकों में एक दूसरे की अपेक्षा ज्यादा सत्य या
ठीक होने का प्रश्न नहीं उठता है और न ही उन्हें एक दूसरे से अलग रखने का प्रश्न
उठता है। वे दोनों उपयोगी हैं और दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। प्रश्न मात्र यह है
कि कौन ज्यादा महत्वपूर्ण होगा जो एक वरीयता का विषय है।

विधिशास्त्र का वर्गीकरण 

विधिशास्त्रियों ने विधिशास्त्र को अपनी-अपनी धारणा के अनुसार विभिन्न वगोंर् में
विभाजित किया है। जॉन ऑस्टिन (John Austin) ने विधिशास्त्र को सामान्य विधिशास्त्र
तथा विशिष्ट विधिशास्त्र के रूप में विभाजित करते हुए यह स्पष्ट किया है कि दोनों के
क्षेत्र भिन्न-भिन्न तथा निश्चित हैं।

सामंड के अनुसार विशिष्ट अर्थ में विधिशास्त्र को तीन भागों में विभक्त किया जा
सकता है, जिन्हें उन्होंने क्रमश: विधिशास्त्र की विश्लेशणात्मक (Analytical), ऐतिहासिक
(Historical) तथा नैतिक (Ethical) शाखा कहा है।
विख्यात आंग्ल-विधिवेत्ता जर्मी बेन्थम (Jeremy Bentham) के अनुसार
विधिशास्त्र को दो भागों में, अर्थात् व्याख्यात्मक (Expository) तथा मूल्यांकात्मक
(Censorial) विधिशास्त्र के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। वर्तमान में विधिशास्त्र
को सामाजिक अभियांत्रिकी (Social Engineering) के रूप में स्वीकार किया गया है।

सामान्य एवं विशिष्ट विधिशास्त्र 

ऑस्टिन ने विधिशास्त्र को दो भागों में विभाजित किया है- (1) सामान्य तथा
(2) विशिष्ट। उनके मतानुसार सामान्य विधिशास्त्र के अन्तर्गत विधि के उन सभी
उद्देश्यों, सिद्धान्तों, धारणाओं और विभेदों का वर्णन रहता है जो समस्त विधि-प्रणाली
में समान रूप से पाये जाते हैं। विधि की प्रणालियों से ऑस्टिन का आशय ऐसी परिपक्व
और सुस्थापित प्रणालियों से है जो अपनी तर्क-शक्ति एवं परिपक्वता के कारण प्रौढ़
वैधानिक व्यवस्था के रूप में विकसित हो चुकी हैं। यही कारण है कि सामान्य
विधिशास्त्र को सैद्धांतिक विधिशास्त्र भी कहा गया है। इसके विपरीत विशिष्ट विधिशास्त्र
एक संकीर्ण विज्ञान है जिसके अंतर्गत किसी ऐसी वर्तमान या भूतकालीन
विधिक-प्रणाली का अध्ययन किया जाता है जो किसी राष्ट्र विशेष तक ही सीमित रही
है। इसीलिये विशिष्ट विधिशास्त्र को व्यावहारिक विधिशास्त्र या राष्ट्रीय विधिशास्त्र भी
कहा गया है। ऑस्टिन ने सामान्य विधिशास्त्र को ‘सकारात्मक विधि का दर्शन’
(Philosophy of positive law) कहा है। यहाँ ‘दर्शन’ शब्द से उनका अभिप्राय
वैज्ञानिक अध्ययन से है। उनके विचार से सामान्य विधिशास्त्र का आशय ऐसी विधियों
के तत्वों और उद्देश्यों की विवेचना से है जो सभी विधिक व्यवस्थाओं में समान रूप से
पाई जाती है जबकि विशिष्ट विधिशास्त्र किसी देश-विदेश की व्यावहारिक
विधिक-प्रणाली या उसके किसी अंष का विज्ञान है।

उल्लेखनीय है कि अनेक विधिवेत्ताओं ने ऑस्टिन द्वारा किये गये विधिशास्त्र के
उपर्युक्त विभाजन की आलोचना की है जिनमें हालैण्ड तथा सामण्ड प्रमुख हैं। हालण्ै ड
के विचार से विधिशास्त्र को सामान्य और विशिष्ट विधिशास्त्र के रूप में विभाजित करना
उचित नहीं है। उनका तर्क है कि ‘विशिष्ट विधिशास्त्र‘ की कल्पना पूर्णत: भ्रामक है।
उनके मतानुसार ऑस्टिन ने विधिशास्त्र को ‘विशिष्ट’ इसलिये बताया है, क्योंकि इसकी
विषय-वस्तु विशिष्ट है न कि इस कारण कि यह एक ‘विशिष्ट विज्ञान’ है। हालैण्ड का
स्पष्ट मत है कि किसी विज्ञान का निर्माण सामान्य प्रतिपादनों (General Propositions)
से ही होता है। विज्ञान को अधिक सुदृढ़ आधार देने के लिये यह आवश्यक है कि
वैज्ञानिक अपने तथ्यों को अधिक विस्तृत क्षेत्र से एकत्रित करें और उनसे अपने निश्कर्श
निकालें। आशय यह है कि किसी विज्ञान का सीमित क्षेत्र में पर्यवेक्षण करना उचित नहीं
है। उसका क्षेत्र जितना विस्तृत होगा, निश्कर्श उतने ही सही होंगे। अत: हालैण्ड का मत
है कि ‘विधिशास्त्र‘ को बिना किसी विशेषण के ही सम्बोधित किया जाना चाहिए तथा
उसे विधि के आधारभूत सिद्धान्तों (Basic Principles of Law) का विज्ञान कहना
अधिक उचित होगा। अपने तर्क की पुश्टि में एक उदाहरण देते हुए हालैण्ड कहते हैं कि
इंग्लैण्ड का भू-गर्भशास्त्र (Geology) सामान्य भू-गर्भशास्त्र से भिन्न नहीं हो सकता है,
क्योंकि विज्ञान चाहे किसी क्षेत्र-विशेष में किये गये परीक्षण पर ही आधारित क्यों न हो,
परन्तु उसकी विषय-वस्तु तथा लक्षण समस्त संसार में एक समान होंगे। ठीक इसी
प्रकार इंग्लैण्ड की विधि पर आधारित आंग्ल विधिशास्त्र समस्त विष्व के लिये लागू हो
सकता है क्योंकि यह ब्रिटेनवासियों के स्वभाव में निहित प्रवृत्तियों के अध्ययन पर अपनी
विषय-सामग्री को आधारित करेगा। ये मानव-प्रवृत्तियाँ अन्य स्थानों पर भी एक समान
होंगी क्योंकि ये मानव-स्वभाव से सम्बन्धित हैं, न कि मानव की परिस्थितियों से। परन्तु
निवेदित है कि हालैण्ड द्वारा दिये गये इस दृश्टान्त की सार्थकता सन्देहास्पद प्रतीत
होती है क्योंकि सभी देशों की विधि-व्यवस्था एक जैसी नहीं होती। जैसा कि ब्राइस
(Bryce) ने कहा है ‘‘किसी भी देश की विधि-व्यवस्था उस देश की आर्थिक और
सामाजिक परिस्थितियों का परिणाम होती है। स्थानीय परिस्थितियों का प्रभाव
देश-विदेश की बौद्धिक क्षमता पर भी पड़ता है जिसकी अभिव्यक्ति वहाँ की
विधि-प्रणाली में मिलती है।’’

सामण्ड ने भी ऑस्टिन के ‘सामान्य और विशिष्ट’ विधिशास्त्र के भेद की
आलोचना की है। सामण्ड के विचार से सामान्य विधिशास्त्र के अन्तर्गत विधिक सिद्धान्तों
के सामान्य रूप का नहीं, अपितु विशिष्ट विधि पद्धति के सामान्य अथवा मूल तत्वों का
अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिये यद्यपि न्यायिक पूर्वोक्तियों (Judicial
precedents) का प्रयोग आंग्ल-विधि व्यवस्था का एक प्रमुख सिद्धान्त है तथापि इस
नियम को किसी भी अन्य देश की विधि-व्यवस्था में अपनाया जाना उतना ही उचित
होगा जितना कि वह इंग्लैण्ड में है। तात्पर्य यह है कि सामान्य विधिशास्त्र का प्रयोजन
विधि-प्रणालियों का सामान्य रूप से अध्ययन करना ही नहीं है अपितु किसी विधि पद्धति
के सामान्य एवं आधारभूत तत्वों का अध्ययन करना भी है। सामण्ड के इस विचार पर
टिप्पणी करते हुए एलेन ने कहा है कि इस दृष्टिकोण से केवल ‘विशिष्ट विधिशास्त्र‘ ही
विधिशास्त्र का एकमात्र रूप माना जाना चाहिए।

विश्लेशणात्मक, ऐतिहासिक तथा नैतिक विधिशास्त्र 

विशिष्ट अर्थ में विधिशास्त्र को तीन भागों में विभाजित किया गया है जिन्हें
सामण्ड ने क्रमश: विश्लेशणात्मक (Analytical), ऐतिहासिक (Historical) एवं नैतिक
(Ethical) विधिशास्त्र कहा है। उल्लेखनीय है कि विधि के विविध पहलुओं में इतना
घनिश्ठ सम्बन्ध है कि इनका पृथक विवेचन करने से विधिशास्त्र का विषय ही अपूर्ण रह
जायेगा। अत: विधिशास्त्र के अध्ययन के लिये इन तीनों का समावेश आवश्यक है।

विश्लेशणात्मक विधिशास्त्र से आशय विधियों के प्राथमिक सिद्धान्तों का विश्लेशण
करना है। इस विश्लेशण में उनके ऐतिहासिक उद्गम अथवा विकास या नैतिक महत्व
आदि का निरूपण नहीं किया जाता है। विधिशास्त्र की इस शाखा के प्रणेता जॉन
ऑस्टिन थे जिन्होंने विधि-विज्ञान की विभिन्न समस्याओं के प्रति इस शाखा के विचारों
का प्रतिपादन अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘प्राविन्स ऑफ ज्यूरिसप्रुडेन्स डिटरमिन्ड’ में किया जो
सर्वप्रथम सन् 1832 में प्रकाशित हुई थी। इस शाखा के अन्य समर्थक मार्कबी
(Markby), एमॉस (Amos), हॉलैण्ड (Holland) तथा सामण्ड (Salmond) हैं।

विधिक पद्धति के प्राथमिक सिद्धान्तों तथा आधारभूत संकल्पनाओं के इतिहास को
‘ऐतिहासिक विधिशास्त्र‘ कहा गया है। सर्वप्रथम प्रसिद्ध विधिशास्त्री सैविनी ने विधिशास्त्र के प्रति ऐतिहासिक दृष्टिकोण अपना कर ऐतिहासिक विधिशास्त्र का
सूत्रपात किया। इंग्लैण्ड के सर हेनरी मेन (Sir Henry Maine) को ब्रिटिश ऐतिहासिक
विधिशास्त्र का संस्थापक माना जाता है। इस शाखा का उद्देश्य विधि के उद्गम,
विकास तथा विधि को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों के सामान्य सिद्धान्तों को
प्रतिपादित करना है। इसमें उन विधिक धारणाओं तथा सिद्धान्तों के उद्गम तथा विकास
का समावेश है जिन्हें विधिशास्त्र की विषय सामग्री में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

विश्लेशणात्मक विधिशास्त्र तथा ऐतिहासिक विधिशास्त्र में मुख्य भेद यह है कि
विश्लेशणात्मक विधिशास्त्र राज्य के प्रति अपने सम्बन्ध को ही विधि का सबसे महत्वपूर्ण
पहलू समझता है। इसके अन्तर्गत विधि को राज्य के संप्रभुताधारी का समादेश
(Command) माना गया है। इसीलिये इसे विधि की आदेशात्मक शाखा (Imperative
School) भी कहा जाता है। विश्लेशणात्मक विधिशास्त्र के समर्थक विधि के भूत अथवा
भविश्य पर ध्यान नहीं देते बल्कि वे विधि के केवल वर्तमान रूप का ही विश्लेशण करते
हैं।

ऐतिहासिक विधिशास्त्री राज्य के प्रति विधि के सम्बन्ध को विशेष महत्व न देकर
उन सामाजिक प्रथाओं को अधिक महत्व देते है जिनसे विधि का निर्माण हुआ है।
ऐतिहासिक विधिशास्त्र समाज की प्राचीन विधिक संस्थाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित
करता है। इसके अनुसार आदर्श विधि एक ऐसा रूढ़िजन्य नियम है जिसका विकास
ऐतिहासिक आवश्यकता तथा लोकप्रिय प्रणाली से सहज रूप में हुआ है। दूसरे शब्दों में,
ऐतिहासिक विधिशास्त्र के अन्तर्गत यह अध्ययन किया जाता है कि वर्तमान विधिक
धारणाओं का विकास कब, कैसे और किन विभिन्न अवस्थाओं में हुआ तथा इनके
अस्तित्व में आने के क्या कारण थे? साथ ही यह देखना भी आवश्यक होता है कि
इनका वर्तमान रूप क्या है? सारांष यह है कि विश्लेशणात्मक विधिशास्त्र वर्तमान कानूनी
विचारों के विश्लेशण को महत्व देता है जबकि ऐतिहासिक विधिशास्त्र इन कानूनी विचारों
की उत्पत्ति तथा विकास का पता लगाने की ओर ध्यान केन्द्रित करता है। इस संदर्भ में
यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि विधिक इतिहास (Legal History) को ही
ऐतिहासिक विधिशास्त्र (Historical Jurisprudence) मानना नितान्त भूल होगी। इन
दोनों के क्षेत्र भिन्न हैं। विधिक इतिहास उन विभिन्न चरणों को प्रस्तुत करता है जिनसे
होकर कोई विधि-पद्धति विकसित होती हुई वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुई हो परन्तु
ऐतिहासिक विधिशास्त्र किसी विशेष विधिक पद्धति के इतिहास का विवेचन मात्र न
होकर विधिक पद्धति के प्राथमिक सिद्धान्तों एवं उसकी आधारभूत धारणाओं का इतिहास
है।

नैतिक विधिशास्त्र का सम्बन्ध विधि के नैतिक पहलू से है। विधि कैसी है अथवा
कैसी थी, इसका विवेचन करना नैतिक विधिशास्त्र का कार्य नहीं है वरन् इसका मुख्य
कार्य यह है कि विधि कैसी होनी चाहिए। इसका उद्देश्य न्याय की स्थापना से
सम्बन्धित विषयों का अध्ययन करना है। इसीलिये सामण्ड ने नैतिक विधिशास्त्र को
नीतिशास्त्र और विधिशास्त्र का सामान्य आधार माना है। इसके अन्तर्गत न्याय की
धारणाओं तथा न्याय और विधि के पारस्परिक सम्बन्धों का विवेचन किया जाता है।
नैतिक विधिशास्त्र का मुख्य उद्देश्य यह है कि वह विधि के लक्ष्यों का निर्धारण करे
और उन आदर्षवादी तथ्यों की खोज करे जिन्हें समाज स्वीकार करना चाहता है।
सामण्ड के अनुसार नैतिक विधिशास्त्र के अन्तर्गत निम्नलिखित बातों का समावेश है-

  1. विधि और न्याय के परस्पर सम्बन्धों का निर्धारण 
  2. विधि के सिद्धान्तों का ज्ञान 
  3. न्याय की स्थापना के लिये आवश्यक साधनों की खोज 
  4. न्याय और विधि की विषय-वस्तु और उनके क्षेत्रों का निर्धारण तथा 
  5. विश्लेशण पद्धति के मूलभूत सिद्धान्तों के नैतिक महत्व का परिणाम। 

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि यदि विश्लेशणात्मक विधिशास्त्र विधि के
वर्तमान स्वरूप को अधिक महत्व देता है तो नैतिक विधिशास्त्र आदर्श विधि को
सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानता है। यधपि विधि शास्त्र की उपर्युक्त तीनों शाखाएँ एक दूसरे
से भिन्न हैं तथापि विधि शास्त्र के अध्ययन में इनमें से किसी की भी अनदेखी नहीं की
जा सकती अन्यथा इस विषय का अध्ययन ही अधूरा रह जायेगा।

व्याख्यात्मक तथा मूल्यांकात्मक विधिशास्त्र 

सुप्रसिद्व आंग्ल- विधिवेत्ता जर्मी बेन्थम के अनुसार विधिशास्त्र को दो भागों में
रखा जा सकता है। व्याख्यात्मक तथा मूल्यांकात्मक। व्याख्यात्मक विधि शास्त्र इस बात
की व्याख्या करता है कि विधि क्या है मूल्यांकात्मक विधि शास्त्र का उददेश्य यह स्पष्ट
करता है कि विधि कैसी होनी चाहिए बेन्थम ने व्याख्यात्मक विधि शास्त्र को दो भागों में
विभाजित किया है-(1) प्राधिकारिक (Authoritative) जिसका सृजन विधायी शक्ति से
होता है, अर्थात जिसे विधान मण्डल से शक्ति प्राप्त होती है, तथा (2) अप्राधिकारिक
(Unauthoritative) जो विधिक साहित्य से अपनी सामग्री प्राप्त करता है। अप्राधिकारिक
व्याख्यात्मक विधिशास्त्र को पुन: दो भागों में वर्गीकृत किया गया है-स्थानीय तथा
सार्वभौमिक। स्थानीय (Local) अप्राधिकारिक विधिशास्त्र में किसी देश-विदेश का
विधि-साहित्य समाविश्ट रहता है, जबकि सार्वभौमिक (Universal) अप्राधिकारिक
विधिशास्त्र में समस्त विश्व की विधि-सामग्री का समावेश रहता है।

बेन्थम के अनुसार व्याख्यात्मक विधिशास्त्र का संबन्ध ‘विधि जैसी है’ से है न कि
‘विधि जैसी होनी चाहिए’ से। दूसरे शब्दों में विधि का नैतिकता या अनैतिकता का कोई
सरोकार नहीं होता है, वह तो केवल प्रचलित विधि के विश्लेशण से संबन्धित रहती है।
बेंथम के इन विचारों का उल्लेख उनकी कृति-’लिमिट्स ऑफ ज्यूरिसपु्रडेंस डिफाइन्ड’
में मिलता है, जो उनके द्वारा सन् 1782 में लिखी गयी थी, लेकिन जिसे एवरेट
(Everett) ने सन् 1945 में प्रकाशित कराया। इस कृति में बेन्थम ने प्राकृतिक विधि की
आलोचना करते हुए संप्रभु के आदेश को ही वास्तविक विधि माना तथा इसका
अनुपालन किये जाने पर बल दिया। इस दृष्टि से यह कहना अनुचित न होगा कि
विधिशास्त्र की विश्लेशणात्मक विचारधारा के वास्तविक प्रजनक बेन्थम थे कि न जॉन
आस्टिन।

हॉलैण्ड ने विधिशास्त्र के उक्त वर्गीकरण की आलोचना करते हुए कहा है कि
विधिशास्त्र को इस प्रकार विशेषणों सहित सम्बोधित करना उचित नहीं है। उनका मत
है कि वर्तमान विधि में सुधार हो सके, इस दृष्टि से इसकी आलोचना करना विधिशास्त्र
का कार्य क्षेत्र नहीं है वरन् यह विधायन (Legislation) का विषय है।

समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र 

समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र की संकल्पना अपेक्षाकृत आधुनिकतम है। इसका
उद्भव उन्नीसवीं सदी में हुआ जब मानव यह अनुभव करने लगा कि समाज के विकास
के लिये उसे सामाजिक अनुशासन में रहकर आपसी सहयोग का मार्ग अपनाना नितान्त
आवश्यक है। वर्तमान में मनुष्य के वैयक्तिक पक्ष के बजाय सामाजिक पक्ष पर अधिक
जोर दिया जाने लगा है। विधि का सामाजिक परिवर्तनों से निकटतम सम्बन्ध होने के
कारण वह मानव के इस बदले हुए दृष्टिकोण से अप्रभावित हुए बिना न रह सका।
फलत: विधिशास्त्र की एक नई पद्धति का प्रादुर्भाव हुआ जो समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र
के नाम से विकसित हुई। इसके अन्तर्गत विधि के सामाजिक पहलू पर अधिक जोर
दिया गया है।

समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र को ‘हितों का विधिशास्त्र (Jurisprudence of
Interest) भी कहा गया है क्योंकि प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य यही है कि
मनुष्य के हितों का संरक्षण एवं संवर्धन हो सके। विधि के प्रति इस दृष्टिकोण को
अपनाने वाले विधिशास्त्रियों का विचार है कि मानव के परस्पर विरोधी हितों में समन्वय
स्थापित करना विधिशास्त्र का प्रमुख कार्य है। जर्मन विधिशास्त्री रूडोल्फ इहरिंग ने इस
विचारधारा को अधिक विकसित किया है। उनके अनुसार विधि न तो स्वतंत्र रूप से
विकसित हुई है और न वह राज्य की मनमानी देन ही है। वह विवेक (Reason) पर भी
आधारित नहीं हैं बल्कि समीचीनता (Expediency) पर आधारित है क्योंकि इसका मूल
उद्देश्य समाज के परस्पर विरोधी हितों में टकराव की स्थिति को समाप्त कर उनमें
समन्वय और एकरूपता स्थापित करना है।

समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र के विधिशास्त्रियों के अनुसार न्यायालयों के लिये यह
आवश्यक है कि विधि के अमूर्त और लेखबद्ध स्वरूप पर विशेष जोर न देकर उसके
व्यावहारिक पहलू पर अधिक बल दें अर्थात् वे उन सामाजिक आवश्यकताओं और
उद्देश्यों की जाँच करें जो सम्बन्धित कानून पारित होने के लिए कारणीभूत हुए हैं।

समाजशास्त्रीय विधिशास्त्र को अमेरिका में प्रबल समर्थन प्राप्त हुआ है। प्रसिद्ध
अमेरिकी विधिशास्त्री डीन रास्को पाउण्ड ने तो विधिशास्त्र को ‘सामाजिक अभियन्त्रिकी’
(Social engineering) की संज्ञा दी है। इस विचारधारा के अनुसार विधिशास्त्र के
अन्तर्गत मुख्यत: दो बातों का अध्ययन किया जाता है- (1) मानव और उसके व्यवहारों
पर विधि का क्या प्रभाव पड़ता है; तथा (2) मानव के संव्यवहार विधि को किस प्रकार
प्रभावित करते हैं?

विधिशास्त्र के प्रति समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण अपनाये जाने के फलस्वरूप
अमेरिका में यथार्थवादी विचारधारा (Realist School) का प्रादुर्भाव हुआ जिसके अन्तर्गत
विधि के क्रियात्मक पहलू को इतना अधिक महत्व दिया गया है कि इससे संहिताओं
और अधिनियमों के अमूर्त नियमों तथा उनमें सन्निहित सिद्धान्तों का महत्व न्यूनप्राय हो
गया।

विधि तथा विधिशास्त्र के प्रति प्रयोजनात्मक (Pragmatic) दृष्टिकोण अपनाते हुए
यथार्थवादियों ने विधि को काल्पनिक सिद्धान्तों से उबारकर तथ्यों पर आधारित
वास्तविक रूप प्रदान किया और इस प्रकार विधि को सामाजिक समस्याओं को सुलझाने
वाला एक क्रियात्मक साधन माना। इस विचारधारा के प्रबल समर्थक जेरोम फ्रैंक
(Jerome Frank) का मानना था कि विधि की निश्चितता एक काल्पनिक तथ्य है
क्योंकि विधि सदैव ही परिवर्तनषील होती है और इसीलिये विधि के संहिताकरण या
पूर्व-निर्णयों को विशेष महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। फ्रेंक के अनुसार विधि के विकास
का सामाजिक प्रगति से सीधा सम्बन्ध रहता है।

लेविलिन (Llewellyn) ने विधिशास्त्र को सामाजिक प्रगति का स्रोत मानते हुए
उसके क्रियात्मक पहलू पर बल दिया गया है। उनके अनुसार विधिशास्त्री का यह
कर्तव्य है कि वह विधि का अध्ययन और विश्लेशण सम-सामयिक सामाजिक समस्याओं
के परिप्रेक्ष्य में करें। विधि को सैद्धान्तिक दायरे से हटकर मानव जीवन के व्यावहारिक
पहलू से समस्याओं के निवारण में सहायक होना चाहिए।

आंग्ल विधिशास्त्र तथा महाद्वीपीय विधिशास्त्र 

सामंड ने आंग्ल विधिशास्त्र (English Jurisprudence) और महाद्वीपीय (अन्य
यूरोपीय देशो के) विधिशास्त्र में विभेद करते हुए कहा है कि इन दोनों में अनेक
समानतायें हैं। अंग्रेजी में ‘विधि’ शब्द का अर्थ अन्य कुछ न होते हुए केवल कानून
(Law) ही है परन्तु अन्य महाद्वीपीय देशों में इस शब्द का अर्थ केवल कानून ही नहीं
वरन् ‘औचित्य’ या ‘अधिकार’ या ‘न्याय’ भी है। परिणामत: आँग्ल विधिशास्त्र में ‘विधि’
तथा ‘अधिकार’ में अन्तर है। जबकि यूरोप के अन्य देशों में ‘विधि’ तथा ‘अधिकार’ में
कोई विभेद नहीं है। इसके अतिरिक्त आँग्ल विधिशास्त्र के दो मुख्य रूप है-
विश्लेशणात्मक एवं ऐतिहासिक विधिशास्त्र। परन्तु अन्य यूरोपीय देशों में विधिशास्त्र को
केवल नैतिक रूप ही प्राप्त है जो तर्क और विवेक पर आधारित है। इसी प्रकार
महाद्वीपीय विधिशास्त्र (Continental Jurisprudence) विधि एवं न्याय को पृथक नहीं
मानता है जब कि आँग्ल विधिशास्त्री इन दोनों शब्दों को पृथक मानते हैं।

तुलनात्मक विधिशास्त्र 

अनेक विधिशास्त्रियों ने विधि के विभिन्न वर्गों के अनुसार विधिशास्त्र का विभाजन
किया है। ऐलन (Allen) ने विधि को दो या अधिक पद्धतियों से तुलनात्मक अध्ययन
करने को तुलनात्मक विधिशास्त्र कहा है। हॉलैण्ड (Holland) ने इस प्रकार के
वर्गीकरण को अनावष्यक और व्यर्थ बताते हुए यह विचार व्यक्त किया है कि इसके
विधिशास्त्र का क्षेत्र अनेक भागों में बँटकर सीमित हो जायेगा।
तुलनात्मक विधिशास्त्र को विकसित करने का वास्तविक श्रेय दो सुविख्यात
विधिशास्त्री काण्ट तथा स्टोरी को दिया जाना चाहिए। जिन्होंने इस बात पर जोर दिया
कि विधायन और विधि में व्यावहारिक सुधार लाने में तुलनात्मक अध्ययन की अहम
भूमिका रहती है। सामंड ने भी विभिन्न देशों की विधियों के गुण-दोशों के आधार पर
स्वदेशीय विधि का तुलनात्मक मूल्यांकन किये जाने की आवश्यकता प्रतिपादित की है
लेकिन वे इसे (तुलनात्मक विधिशास्त्र को) विधिशास्त्र की एक स्वतंत्र शाखा के रूप में
मानने से इन्कार करते हैं। उनके अनुसार यह विधिशास्त्र के अध्ययन का एक तरीका
मात्र है।

विधिशास्त्र के अध्ययन का महत्व 

सामण्ड के अनुसार विधिशास्त्र के अध्ययन की अपनी अभ्यान्तरिक रूचि है
जिसके कारण इसकी तुलना किसी गंभीर ज्ञान की शाखा से की जा सकती है। वास्तव
में अनुमान और सिद्धान्त का प्राकृतिक आकर्शण होता है। विधिषास्त्रिक अनुसंधान
विधिक, राजनीतिक, सामाजिक आदि विचारों को प्रभावित करते हैं अतएव विधिशास्त्र का
अध्ययन महत्वपूर्ण है। विधिशास्त्र का अध्ययन मानव के चिन्तन मनन की प्रखरता में
वृद्धि करता है। डायस के अनुसार यह विधि-वेत्ता को सिद्धान्त और जीवन प्रकाष लाने
का सुअवसर देता है क्योंकि यह सामाजिक विज्ञान के संबंध में मानव विचारों पर विचार
करता है। विधिक अवधारणाओं के तार्किक विश्लेशण से विधिवेत्ताओं की तार्किक पद्धति
का विकास होता है। इससे विधिवेत्ता की व्यवसायिक प्रारूपवाद की बुराई को दूर किया
जा सकता है। डायस ने माना कि विधिशास्त्र विधि में जीवनदायी (Lifemanship) का
विकास कर अध्येता में प्रतिभा निखार की अनुप्रेरणा देता है। जे0जी0 फिलीमोर (J.G.
Phillimore) ने स्पष्ट किया है कि विधिशास्त्र का विज्ञान इतना उच्च स्तरीय है कि
इसका ज्ञान इसके अध्येता को ज्ञानपूर्ण अवधारणाओं और मनोवेगों, जो मानव
परिस्थितियों में उत्पन्न सभी अपेक्षाओं में लागू हो सके, के साथ जीवन में प्रवेश कराता
है। लास्की (Laski) ने विधिशास्त्र के महत्व का मूल्यांकन करते हुए इसे ‘विधि का नेत्र‘
कहा है। विधि की बढ़ती गुत्थियों एवं मानव संबंधों की जटिलताओं के निराकरण का
रास्ता विधिशास्त्र के अध्ययन में पाया जा सकता है। इसीलिए इसे विधि का व्याकरण
माना गया है। अनिरूद्ध प्रसाद के अनुसार विधिशास्त्र का जागरूक अध्ययन सामाजिक
समस्याओं के समाधान एवं न्याय की सार्थकता को अवश्यभावी करता है। वर्तमान जेल
सुधार, कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार की अपेक्षा, मानव गरिमा के साथ जीने के
अधिकार के साथ सोशल एक्शन लिटीगेशन तथा लोक हित वादों का अन्वेशण नवीन
विधिशास्त्रीय दृष्टिकोण से ही उपजा है। इसी प्रकार पर्यावरण सुधार विधि, गरीबों के
लिए मुफ्त कानूनी सहायता आदि विधिशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञानों की अन्तर्विद्या
ज्ञान के आदान-प्रदान तथा पारस्परिक प्रभावों की देन है। विधिशास्त्र विधि की विभिन्न
शाखाओं की मूलभूत संकल्पनाओं के सैद्धान्तिक आधारों का ही ज्ञान नहीं कराता है
बल्कि उनके अन्तर्सम्बन्धों का भी ज्ञान कराता है। विधिशास्त्र केवल विधिक प्रणाली के
माध्यम से न्याय प्रशास्ति ही नहीं करता वरन् नवीन सिद्धान्तों, विचारों एवं अन्य मार्गों
की खोज के माध्यम से न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में सहायक होता है।

2 Comments

SANJAY KHOLIYA

Dec 12, 2018, 1:06 am Reply

Nice baa

Unknown

Aug 8, 2019, 8:40 am Reply

good one

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