कर्मचारी लाभ से संबंधित कानून और नियम

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श्रमिक क्षतिपूर्ति संशोधित अधिनियम, 1984 

यह अधिनियम मार्च 1923 में पारित किया गया और 1 जुलाई 1924 से लागू हुआ। इसमें अब तक कई बार संशोधन किये जा चुके है। और अन्तिम संशोधन 1984 में किया गया है। इन संशोधनों का उद्देश्य अधिनियम के सीमा-क्षेत्र को बढ़ाना व व्यवस्था को अधिक उपयोगी तथा प्रभावशाली बनाना रहा है। इसके अधीन श्रमिक हर्जाना की व्यवस्था किसी रोजगार सम्बन्धी चोट या व्यावसायिक रोग के कारण श्रमिक की मृत्यु या असमर्थता के दुख को दूर करने के लिए की गयी है तथा इसका व्यय केवल सेवायोजक को उठाना पड़ता है। यह व्यवस्था औद्योगिक दुर्घटनाओं से श्रमिक के संरक्षण के लिए, सेवायोजक के दायित्व के सिद्धान्त का प्रतिपादन करती है।

इसके अन्तर्गत क्षतिपूर्ति का अधिकार किसी श्रमिक को उसी समय होता है जब (अ) कोई दुर्घटना या रोग हुआ हो; तथा (ब) वह दुर्घटना या रोग काम के अन्तर्गत और काम के दौरान हुआ हो। यह अधिनियम संस्था के सभी श्रमिकों पर लागू होता है चाहे उनका वेतन कितना हो क्यों न हो। जो श्रमिक कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 के अन्तर्गत शामिल है वे भी इसके अन्तर्गत क्षतिपूर्ति पाने के अधिकारी नहीं हैं। अधिनियम के अन्तर्गत धारा 3(1) के अनुसार सेवायोजक इन दशाओं में क्षतिपूर्ति के लिए जिम्मेदार नही होगा, (क) किसी भी ऐसी चोट के सम्बन्ध में जिसके कारण श्रमिक पूरी तरह या आंशिक रूप से 3 दिन से अधिक दिनों के लिए अयोग्य न हों; (ख) किसी भी ऐसी चोट के सम्बन्ध में जिसके फलस्वरूप श्रमिक की मृत्यु न हो और दुर्घटना प्रत्यक्ष रूप से इन कारणों से हुई हो : (1) दुर्घटना श्रमिक के शराब या दूसरी चीज से प्रभावित होने के फलस्वरूप हो जाय; (2) श्रमिक ने अपनी सुरक्षा के लिए दिये गये किसी स्पष्ट आदेश या सुरक्षा के लिए बनाये गये किसी स्पष्ट नियम का जानबूझकर उल्लंघन किया हो, (3) श्रमिकों की सुरक्षा के लिए रक्षक या दूसरे साधनों की व्यवस्था की गयी है, यह जानते हुए भी उसे जान-बूझकर कोई श्रमिक हटाता हो या उसका उपयोग नहीं करता हो। शारीरिक चोट के अतिरिक्त कुछ व्यावसायिक रोगों की दशा में भी जिन्हें अधिनियम की तीसरी अनुसूची में शामिल किया गया हो, क्षतिपूर्ति देनी होती है। राज्य सरकारों को अधिकार है कि वे इस सूची में नये रोगों को भी जोड़ सकती है।

प्रसूति लाभ अधिनियम, 1961 

प्रसूति लाभ महिला कर्मचारी को बच्चे के जन्म के पहले तथा बाद में काम पर अनुपस्थित रहने पर दिया जाता है। यह अनुपस्थिति अनिवार्य होती है जिससे स्वयं माता तथा उसके बच्चे के स्वास्थ्य पर बुरा असर न पड़े। अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के 19191 के कन्वेंशन ने 12 सप्ताह की छुट्टी के लिए व्यवस्था की थी। भारत सरकार उस कन्वेंशन को कुछ कठिनाइयों के कारण (जैसे महिला श्रमिकों का प्रवासी स्वभाव, बच्चा होने के पहले पांव चले जाने की प्रथा और डॉक्टरी सर्टीफिकेट दे सकने वाली महिला डॉक्टरों की कमी होने से) अपने देश में लागू नहीं कर सकी। फिर भी बहुत-सी राज्य सरकारों ने समय-समय पर इस विषय में कानून बनाये जैसे बम्बई राज्य द्वारा 1929, मध्य प्रदेश में 1930 में, मद्रास में 1934 में, दिल्ली में 1937 में, उत्तर प्रदेश में 1938 में, बंगाल में 1939 में, पंजाब में 1943 में, असम में 1943 में, बिहार में 1945 में, महाराष्ट्रं 1948 में तथा राजस्थान व उड़ीसा में 1953 में। विभिन्न अधिनियमों में सीमा क्षेत्र पात्रता शर्तो लाभ दरों एवं लाभ अवधियों को देखते हुए, बहुत अन्तर रहता था अत: भारत सरकार ने एकरूपता लाने के उद्देश्य से 1961 में एक नया प्रसूति लाभ अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम में यह व्यवस्था है कि महिला श्रमिक के एक वर्ष से 160 दिन के सेवाकाल के पूरा कर लेने पर 6 सप्ताह की छुट्टी औसत वेतन पर दी जायेगी। इसके अतिरिक्त नियोक्ता द्वारा 25 रुपये चिकित्सा भत्ते के रूप में और दिये जायेगें।

अधिनियम की व्यवस्थाओं के अनुसार कोई भी सेवायोजक किसी भी महिला श्रमिक को उसकी प्रसूति या अकाल-प्रसव की तारीख के बाद 6 सप्ताह की अवधि में जानबूझकर किसी भी इकाई में काम पर नहीं लगायेगा। हर महिला श्रमिक को उसकी प्रसूति की तारीख के पहले अनुपस्थिति की वास्तविक अवधि तथा प्रसूति की तारीख के बाद 6 हफ्तों के लिए प्रसूति लाभ पाने का अधिकार होगा। सेवायोजक उसे औसत दैनिक मजदूरी की दर से इस लाभ का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा। औसत दैनिक मजदूरी से आशय सम्बन्धित महिला श्रमिक की ऐसे तीन कलैण्डर माह की मजदूरी के दैनिक औसत से है जो उसके मातृत्व के कारण अनुपस्थित रहने की तारीख के पहले आते हों। अधिनियम में पात्रता अवधि उसकी प्रसूति की आशा की गयी तारीख के ठीक पहले के 12 महीनों में कम से कम 160 दि (जबरी छुट्टी के दिनों को शामिल करते हुए) की सेवा है। मातृत्व लाभ पाने की पात्रता रखने वाली हर महिला श्रमिक अपने सेवायोजक को निर्धारित प्रारूप में लिखित सूचना दे सकती जिसमें यह उल्लेख होगा कि इस अधिनियम के अन्तर्गत उसे मिलने वाले मातृत्व लाभ तथा दूसरी रकम का भुगतान उसे स्वयं या उसके द्वारा ऐसी सूचना में नामांकित व्यक्ति को किया जाय तथा वह लाभ पाने के दौरान किसी भी संस्था में काम नहीं करेंगी।

कर्मचारी राज्य बीमा संशोधित अधिनियम, 1984 

यह अधिनियम पूरे भारत के मौसमी कारखानों को छोड़कर सभी कारखाने में, जो शक्ति द्वारा चलाये जाते हैं और 10 या ज्यादा श्रमिकों को नियुक्त करते हैं, या बिना शक्ति के 20 या इससे अधिक श्रमिक कार्य करते है।, लागू होता है। इसमें यह व्यवस्था की गयी है कि इसे किसी भी संस्था या संस्थाओं पर, जो औद्योगिक हों या व्यापारी या कृषि सम्बन्धी या अन्य, पूरी तरह या आंशिक रूप से लागू किया जा सकता है। इसमें दी हुई ‘कर्मचारी’ शब्द की परिभाषा में शारीरिक श्रमिक वर्ग तथा लिपिक, सुपरवाइजरी एवं टेकनिकल कर्मचारी शामिल है किन्तु यह उन पर लागू नही होता जिनका वेतन या मजदूरी 1600 रुपये मासिक से ज्यादा है। यह जहाजी, फौजी या हवाई सेनाओं के कर्मचारियों पर भी लागू नहीं होता।

बीमा योजना का प्रशासन कर्मचारी राज्य बीमा निगम को सौंपा गया है। इसमें केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों, सेवायोजकों एवं कर्मचारियों के संगठनों, डॉक्टरों पेशे तथा संसद सदस्यों के प्रतिनिधि शामिल है। एक छोटी समिति, जो स्थायी समिति कहलाती है, निगम के सदस्यों में से चुनी जाती है तथा निगम की कार्यकारिणी का कार्य करती है। एक चिकित्सा लाभ काउंसिल निगम को चिकित्सा लाभों के प्रशासन आदि से सम्बन्धित मामलों पर सलाह देती है। निगम का मुख्य प्रशासन महानिदेशक होता है, जो क्षेत्रीय एवं स्थानीय कार्यालयों के द्वारा प्रशासन करता है। राज्यक्रम से क्षेत्रीय बोर्ड भी स्थापित किये गये है।

योजना की वित्त व्यवस्था कर्मचारी राज्य बीमा कोष द्वारा की जाती है जिसमें सेवायोजकों और कर्मचारियों के चन्दे एवं केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों, स्थानीय संस्थाओं या किसी भी व्यक्ति या संस्था के अनुदान, दान एवं उपहार शामिल होते है। केन्द्रीय सरकार ने नियम को पहले पांच वर्षो में एक वार्षिक अनुदान देना मंजूर किया था जो निगम के प्रशासन के खर्चो (लाभों की लागत शामिल न करते हुए) के दो-तिहाई के बराबर था। राज्य सरकारें भी योजना में चिकित्सा एवं सेवा की लागत के एक भाग के रूप में हिस्सा लेती है। खर्च का कितना अनुपात राज्य सरकारें पूरा करेंगी यह नियम के साथ उनके समझौतों पर छोड़ दिया गया है। अधिनियम में उन उद्देश्यों की सूची दी गयी है जिन पर कि कोष खर्च किया जा सकता है। मुख्य नियोक्ता पर ही अपना तथा अपने कर्मचारियों के चन्दों की रकम के भुगतान की जिम्मेदारी है। इस तरह कर्मचारियों का चन्दा नियोक्ता द्वारा उनकी मजदूरियों में से काट लिया जाता है। किसी कर्मचारी के सम्बन्ध में देय मासिक चन्दे की रकम उस माह में उसकी औसत कमायी पर निर्भर होती है तथा चन्दे हर माह के सम्बन्ध में, जिसके पूरे या आंशिक भाग में किसी कर्मचारी की नियुक्ति हुई हो और उसने मजदूरी प्राप्त की हो, देय होते हैं। अधिकृत छुट्टी, वैध हड़ताल या तालाबन्दी की दशा को छोड़कर ऐसे किसी माह के लिए चन्दा देय नहीं होता जिसमें सेवाएं न दी गयी हों और जिसके सम्बन्ध में कोई मजदूरी देय न हुई हो। संशोधित अधिनियम के अन्तर्गत अब 27 जनवरी, 1985 से मालिक का चन्दा कर्मचारियों के मासिक वेतन का 5 प्रतिशत व कर्मचारियों का चन्दा 2 प्रतिशत होगा। लेकिन उन कर्मचारियों को कोई चन्दा नहीं देना होगा जिनका वेतन 6 रुपये प्रतिदिन से अधिक नहीं है। परन्तु मालिक को वेतन का 5 प्रतिशत अवश्य देना होगा।

अधिनियम के अन्तर्गत बीमाषुदा व्यक्तियों, उनके आश्रितों तथा अन्य व्यक्तियों को निम्न लाभ पाने का अधिकार है :

बीमारी लाभ - 

व्यक्ति की बीमारी की दशाओं में उसे सामयिक भुगतान किया जायेगा जिसे बीमारी लाभ कहेगें। बीमारी की जांच निगम के डॉक्टर या दूसरे डॉक्टर द्वारा होना आवश्यक है। बीमारी लाभ की दैनिक दर कर्मचारी की औसत दैनिक मजदूरी के आधे के बराबर होती है, किन्तु चूँकि लाभ बीमारी के सभी दिनों के लिए जिनमें इतवार और अन्य छुट्टियां शामिल है, दिया जाता है, इसलिए लाभ की दर मजदूरी के लगभग 7/12 भाग के बराबर होती है। यह लाभ पहले दो दिनों की बीमारी के लिए नहीं दिया जायेगा यदि बीमारी का दौर 15 दिन के भीतर दुबारा नहीं आता है।

प्रसूति लाभ - 

एक सामयिक नकद भुगतान के रूप में प्रसूति लाभ महिला श्रमिक को 12 हफ्ते के लिए, जिनमें से बच्चा होने की आशा की गयी तारीख से पहले 6 हफ्ते से ज्यादा के लिए नहीं होगा, देने की व्यवस्था की गयी है। इसकी पात्रता का प्रमापीकरण निर्धारित अधिकारी द्वारा होना आवश्यक है।

असमर्थता लाभ - 

यदि कोई बीमाशुदा व्यक्ति इस अधिनियम के अन्तर्गत कर्मचारी के रूप में काम करते हुए किसी व्यावसायिक चोट जिसमें अधिनियम की तीसरी अनुसूची में दिये गये कुछ व्यावसायिक रोग शामिल है कि फलस्वरूप होने वाली असमर्थता से पीड़ित हो जाता है उसे एक आवधिक भुगतान का लाभ पाने का अधिकार है। असमर्थता लाभ की पात्रता का प्रमापीकरण निर्धारित अधिकारी द्वारा होना आवश्यक है।

आश्रित लाभ - 

यदि कोई बीमाशुद्धा व्यक्ति किसी व्यावसायिक चोट के फलस्वरूप मर जाता है तो अधिनियम के अन्तर्गत जिन आश्रितों को क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार है उन्हें आवधिक भुगतान दिया जायेगा जिसे आश्रित लाभ कहा जायेगा।

डॉक्टरी या चिकित्सालय लाभ -

 इस लाभ की व्यवस्था सबसे अधिक महत्व है क्योंकि यह लाभ वह धुरी है जिस पर सारी प्रणाली घूमती है। यदि किसी बीमाशुद्धा व्यक्ति या उसके परिवार के किसी सदस्य (यदि डॉक्टरी लाभ बीमाशुद्धा व्यक्ति के परिवार को भी दिया जाता हो) की दशा ऐसी है कि उसे डॉक्टरी इलाज या सेवा की आवश्यकता है तो उसे यह लाभ पाने का अधिकार होता है। यह लाभ बीमारी, व्यावसायिक चोट या प्रसूति की दिशा में बिना किसी शुल्क के डॉक्टरी इलाज के रूप में होता है।

अन्त्येष्टि क्रिया सम्बन्धी लाभ - 

1966 के संशोधित अधिनियम के अन्तर्गत 17 जून, 1969 से यदि किसी बीमाशुद्धा व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसके परिवार के सबसे बुजुर्ग जीवित सदस्य को बीमाशुद्धा व्यक्ति की अन्त्येष्टि क्रिया सम्बन्धी खर्च का भुगतान करने का लाभ दिया जाता है।

कोयला खान भविष्य निधि एवं विविध व्यवस्थाएं अधिनियम 1948 

 एक भविष्य निधि योजना पं. बंगाल और बिहार में सभी कोयला खानों में लागू की गयी जो बाद में धीरे-धीरे मध्य प्रदेश, असम, उड़ीसा, महाराष्ट्र सहित सारे भारत की कोयला खानों में भी लागू कर दी गयी। इस समय इस योजना के अन्तर्गत 1001 कोयला खाने तथा सहायक संगठनों के 6 लाख 78 हजार श्रमिक सदस्य है। इस समय देश के विभिन्न कोयला क्षेत्रों के कोष के प्रशासन के लिए 8 क्षेत्रीय कार्यालय है। प्रारम्भ में सदस्यों द्वारा कोष में अनिवार्य अंशदान की दर श्रमिकों की कुल आमदनी का 8 प्रतिशत कर दिया गया तथा सेवायोजकों का अंशदान इसके बराबर रहता है। जून 1963 से सदस्यों के लिए यह ऐच्छिक कर दिया गया है कि यदि वे चाहें तो अपने अनिवार्य अंशदान के अलावा 8 प्रतिशत की दर से अधिक अंशदान दे सकते हैं, किन्तु सेवायोजकों को इसके बराबर कोई अंशदान नही देना होता। कोष की उस रकम के विनियोग का स्वरूप जो बाहर जाने वाले सदस्यों की वापसी के लिए तुरन्त आवश्यक नही होती, ट्रस्टी बोर्ड द्वारा निर्धारित किया गया है। किसी सदस्य की सेवा से निवृत्ति की आयु छंटनी, कार्य के लिए पूर्ण असमर्थता अथवा उसकी मृत्यु की दशा में वह कोष में से ब्याज सहित अपने ‘जमा’ में पड़ी हुई सारी इकट्ठा हुई रकम वापस ले सकता है। दूसरी दशाओं में श्रमिक के प्रति देय सेवायोजक के अंशदान का एक भाग सदस्यता की अवधि के आधार पर इस प्रकार काटा जाता है : यदि सदस्यता की अवधि तीन वर्ष से कम है तो 75 प्रतिशत, 3 वर्ष या अधिक किन्तु 5 वर्ष से कम है तो 50 प्रतिशत, 5 वर्ष या अधिक किन्तु 10 वर्ष से कम है तो 25 प्रतिशत, 10 वर्ष या अधिक, किन्तु 15 वर्ष से कम है तो 15 प्रतिशत अंशदान (ब्याज सहित) काट लिया जायेगा। जहाँ सदस्यता की अवधि 15 वर्ष या इससे अधिक है वहाँ कुछ नहीं काटा जायेगा। काटी गयी रकम का उपयोग सदस्यों के कल्याण के लिए किया जाता है।

योजनाओं के अन्तर्गत सदस्यों को कोष में अपनी इकट्ठी हुई रकम में से सहकारी समितियों के अंश खरीदने, मकान बनवाने, जीवन बीमा पॉलिसी का प्रीमियम देने तथा पुत्रियों की “ाादी या बच्चों की ऊंची शिक्षा के लिए न लौटने वाले अग्रिमों के दिये जाने की व्यवस्था है। हाल के संशोधनों द्वारा फण्ड में सदस्य की इकट्ठा हुई रकम के 50 प्रतिशत तक न लौटने वाले अग्रिम की सुविधा कोयला खानों के आंशिक रूप से बन्द होने के कारण बेरोजगारी या आंशिक रोजगार की दशा में लागू कर दी गयी है।

योजना की व्यवस्थाओं के अन्तर्गत सदस्यों के हिसाब से काटी गयी ब्याज सहित सेवायोजक के अंशदानों की रकम में से मृत्यु सहायता कोष स्थापित किया गया है, जिसमें से सदस्य की खान में सेवा छोड़ने की तारीख के दो वर्ष के भीतर या पहले मृत्यु की दशा में, यदि उसकी इकट्ठा हुई रकम 1000 रुपये से कम है, तो कम पड़ने वाली रकम के दिये जाने का प्रावधान है। योजना का प्रशासन एक न्यास मण्डल द्वारा किया जाता है जिसमें बराबर संख्या में सरकार, सेवायोजकों एवं श्रमिकों के प्रतिनिधि होते हैं। निधि का केन्द्रीय कार्यालय धनवाद में है और कोयला खान भविष्य निधि आयुक्त इसका मुख्य अधिशास्ी अधिकारी है। प्रशासन की लागत कोष में श्रमिकों एवं सेवायोजकों के कुल अनिवार्य अंशदान के 3.3 प्रतिशत की दर से सेवायोजकों से एक खास कर द्वारा पूरी की जाती है। केन्द्रीय सरकार ने कोयला खान भविष्य निधि जमा जुड़ी बीमा योजना 1 अगस्त, 1976 से श्रमिकों के लिए लागू की है जिसके अन्तर्गत कोयला खान भविष्य निधि का सदस्य मृत्यु के समय कोष में जमा रकम के अतिरिक्त मृतक के हिसाब में पिछले तीन वर्षो के दौरान औसत बाकी के बराबर (अधिक से अधिक 10000 रुपये तक) पाने का अधिकारी होता है। श्रमिकों द्वारा कोई चन्दा इसके लिए नहीं दिया जाता। इस योजना पर हुए खर्च को सेवायोजकों और केन्द्रीय सरकार द्वारा 2 : 1 के अनुपात में उठाया जाता है।

कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध व्यवस्थाएं अधिनियम 1952 

आरम्भ में इस योजना के सदस्य केवल कर्मचारी हो सकते थे जिनका मासिक वेतन 300 रुपये से अधिक नहीं था। 31 मई, 1957 से इस सीमा को बढ़ाकर 500 रुपये प्रति मास तथा 31 दिसम्बर, 1962 से 1000 रुपये प्रति मास कर दिया गया है। वर्तमान में यह सीमा 1600 रुपये प्रति माह है। इस योजना में कर्मचारी के वेतन का 8 प्रतिशत चन्दे के रूप में काटा जाता है तथा इतना ही सेवायोजकों द्वारा दिया जाता है।

अनुग्रह भुगतान संशोधित अधिनियम 1984 

अधिनियम के अन्तर्गत किसी कर्मचारी को किसी कारखाने या संस्था में उसके रोजगार के खत्म होने पर सेवा-निवृत्ति आयु होने पर या निवृत्त होने या स्तीफा देने पर, मृत्यु या दुर्घटना या रोग के कारण असमर्थता होने पर कम से कम पांच वर्ष की लगातार सेवा के बाद अनुग्रह रकम देय होगी। यदि कर्मचारी की मृत्यु रोजगार या दुर्घटना या रोग के असमर्थता के कारण होती है तो पांच वर्ष की ‘लगातार सेवा’ की शर्ते पूरा होना जरूरी नहीं होगा। किसी कर्मचारी की मृत्यु की दशा में उसकी मिलने वाली अनुग्रह रकम का भुगतान उसके द्वारा मनोनीत व्यक्ति या, यदि कोई व्यक्ति मनोनीत नहीं किया गया है, उसके उत्तराधिकारियों को किया जायेगा।

जमा सम्बद्ध बीमा योजना, 1976

यह योजना 1 अगस्त, 1976 से उन कर्मचारियों व श्रमिकों पर लागू की गयी है जो ‘‘कर्मचारी भविष्य निधि योजना’’ व ‘‘कोयला खान भविष्य निधि योजना’’ के अन्तर्गत आते हैं। इस योजना के अन्तर्गत आने वाले किसी कर्मचारी की आय पर मृतक के परिवार को भविष्य निधि में पिछले तीन वर्ष बकाया औसत राशि के बराबर राशि दी जाती है, लेकिन यह राशि 10000 रुपये से अधिक नहीं हो सकती है। इस योजना की विशेषता यह है कि इसमें कर्मचारी व श्रमिकों को कुछ भी नहीं देना पड़ता है। इसमें सरकार व मालिक ही को देना पड़ता है। 8. सामाजिक सुरक्षा सर्टीफिकेट यह योजना 1 जून, 1982 से लागू की गयी है। इसमें कोई भी व्यक्ति जिसकी उम्र 18 वर्ष व 45 के बीच है, इन सर्टीफिकेटों को क्रय कर सकता है, लेकिन एक व्यक्ति अधिक से अधिक 5000 रुपये के ही सर्टीफिकेट क्रय कर सकता है। यह सर्टीफिकेट 500 व 1000 रुपये के है जिनका भुगतान 10 वर्ष बाद क्रमश: 1500 व 3000 रुपये होगा। लेकिन यदि सर्टीफिकेट क्रेता क्रय करने के 2 वर्ष पश्चात् मर जाता है तो उसके कानूनी उत्तराधिकारी को सर्टीफिकेट की पूरी रकम तुरन्त देय हो जाती है और उसको देय तिथि तक भुगतान के लिए इन्तजार नहीं करना पड़ता है।

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