संघर्ष प्रबंधन क्या है?

अनुक्रम
पूंजीवादी औद्योगिक अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता औद्योगिक संघर्ष है। इसका तात्पर्य मालिकों और श्रमिकों के मध्य होने वाले मतभेदों से है जिनका परिणाम हड़ताल, तालाबंदी, काम की धीमी गति, घेराव तथा इस प्रकार की अन्य समस्याओं के रूप में सामने आता है। अत: औद्योगिक संघर्ष वह मतभेद है जो रोजगार देने या न देने अथवा रोजगार की शर्तों या श्रम की दशाओं के सम्बन्ध में विभिन्न मालिकानों के मध्य या विभिन्न श्रमिकों के मध्य या श्रमिकों और मालिकानों के मध्य होता है।

दूसरे शब्दों में श्रमिकों व नियोक्ताओं के मध्य श्रमिकों को रोजगार या उनकी बेरोजगारी की दशाओं से संबंधित असहमति को निर्देशित करता है। अधिकांश रूप से उत्पन्न होने वाले संघर्ष, मंहगाई भत्ता, बोनस, श्रमिकों की पदच्युति अथवा सेवामुक्ति, अवकाश एवं छुट्टियों, सेवानिवृत्ति लाभों और मकान किराया एवं अन्य भत्तों से संबद्ध हो सकते हैं।

संघर्ष प्रबंधन की विशेषताएँ 

  1. औद्योगिक संघर्ष में विभिन्न पक्षकारों के बीच होते हैं : जैसे - मालिकों के मध्य मालिकों एवं श्रमिकों के मध्य, श्रमिकों एवं श्रमिकों के मध्य 
  2. इन विभिन्न पक्षकारों के मध्य उत्पन्न संघर्ष तब औद्योगिक संघर्ष कहलाता है। जबकि संघर्ष का संबंध निम्न में से किसी विषय में होता है। : (अ) किसी कर्मचारी की नियुक्ति या सेवामुक्ति से सम्बन्धित हो, (ब) किसी कर्मचारी की सेवा शर्तों से सम्बन्धित हों, (स) किसी कर्मचारी की कर्य दशाओं से सम्बिन्ध् ात हो। 
  3. औद्योगिक संघर्ष को लिखित रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होती। 
  4. जिन पक्षकारों के द्वारा संघर्ष की दशायें पैदा की जाती है, उनका संघर्ष में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित जुड़ा होता है। 
  5. संघर्ष की पक्षकारों के मध्य वास्तविक रूप से होना आवश्यक होता है। 
  6. औद्योगिक संघर्ष के अंतर्गत संघर्ष एवं उनके पक्षकार स्पष्ट होने आवश्यक हैं। 
  7. औद्योगिक संघर्ष को भूतपूर्व श्रमिक द्वारा भी प्रस्तुत किया जा सकता है। 
  8. औद्योगिक संघर्ष उद्योग में अव्यवस्था के कारण उत्पन्न होते हैं। 

संघर्ष के विभिन्न प्रकार 

जब संघर्ष व्यापक रूप धारण कर लेता है तब इसकी परिणिति हड़ताल प्रदर्शन, धरना आदि के रूप में सामने आती हैं। इसी प्रकार उपर्युक्त सभी अवधारणा, औद्योगिक संघर्ष के अंग हैं।आइये अध्ययन की सुविधा हेतु इनका क्रमवार अध्ययन करें :-

हड़ताल 

हड़ताल का तात्पर्य अस्थायी रूप से श्रमिकों द्वारा कार्य में विध्न डालना है। यह श्रमिक द्वारा स्वत: कार्यमुक्ति है। औद्योगिक संघर्ष अधिनियम की धारा 2 (क्यू) के अनुसार व्यक्तियों के समूह द्वारा, जो मिलकर कार्य करते हैं सामूहिकता से कार्य नहीं करना अथवा एकमत होकर कार्य करने से मना करना, हड़ताल कहलाता है।’इसी प्रकार हड़ताल का तात्पर्य श्रमिकों द्वारा कार्य को चालू रखने से इन्कार या दूसरे शब्दों में श्रमिकों के किसी समूह द्वारा अपने परिवाद का प्रकट करने या कार्य से संबंधित अपनी मांगों को मनवाने हेतु दबाव डालने के लिए अस्थाई रूप से कार्य बद करना, हड़ताल है। वस्तुत: हड़ताल में श्रमिकों द्वारा अस्थाई रूप से कार्य करना बंद कर दिया जाता है। इसका उद्देश्य अपने परिवादों का प्रकट करना अथवा अपनी किन्हीं मांगों को मनवाने के लिए दबाव डालना ही प्रमुख होता है। अग्रलिखित लक्षणों द्वारा इस अवधारणा को और अस्पष्ट किया जा सकता है।’
  1. हड़ताल सदैव असंतुष्ट श्रमिकों द्वारा की जाती है। 
  2. इसमें श्रमिक कार्य करना बंद कर देते हैं। 
  3. हड़ताल श्रमिकों द्वारा अपने विवादों को प्रकट करने का एक सशक्त माध्यम है। 
  4. हड़ताल अनिश्चित समय के लिए की जाती है तथा हड़ताल समाप्ति के पश्चात प्राय: श्रमिक अपना कार्य करना आरंभ कर देते हैं। 
  5. हड़ताल किन्हीं मांगों को लागू करवाने के लिए दबाव डालने का साधन है। 
  6. हड़ताल श्रमिकों के किसी भी एक समूह द्वारा की जा सकती है। 
  7. हड़ताल अन्याय तथा असंतोष का गम्भीर लक्षण है। 
  8. हड़तालें वैध या अवैध हो सकती हैं। 
  9. हड़तालें अनेक रूपों में यथा - भूख हड़ताल, सांकेतिक हड़तालें,धीरे कार्य करो हड़ताल आदि के रूप में हो सकती है। 
  10. समुचित ढंग से नोटिस दे कर हड़ताल करने का श्रमिकों का अधिकार है। 
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आज हड़ताल अपनी न्यायोचित मांगों को मनवाने का एक सशक्त माध्यम बनती जा रही है। प्राय: हड़तालों के निम्न स्वरूप दृष्टिगत होते हैं :-
  1. जब कर्मचारी जान बूझ कर अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं करते। अत: सेवायोजकों को उनकी मांगों के विषय में विवश होकर सोचना पड़ता है तब इस हड़ताल धीरे काम करो हड़ताल के नाम से सम्बोधित किया जाता है। 
  2. जब विभिन्न श्रम संगठनों द्वारा क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सामूहिक शक्ति प्रदर्शन दूसरे का समर्थन हेतु किया जाता है तब इसे सहानुभूति हड़ताल कहा जाता है। 
  3. नियमानुसार कार्य की नीति के अंतर्गत जिसे उड्डयन विभाग के विमान चालकों ने भारत में अपनाया था जिसमें अतिरिक्त समय काम करने या अधिक माल ले जाने से मना कर देते हैं। 
  4. भूख हड़ताल यह हड़ताल सबसे प्रचलित विधि है।सामान्यत: यह नेताओं, विद्यार्थियों अथवा श्रमिकों द्वारा अपनी मांगें मनवाने हेतु की जाती हैं। भूख हड़ताल का प्रारम्भ हड़ताल के समय, हड़ताल के उपरांत कभी भी किया जा सकता है। इसमें श्रमिकों का सहयोग प्राप्त किया जाता है। किसी विरोधी निर्णय को वापस लेने, श्रमिकों के विरूद्ध लगाये गये किसी अभियोग को वापस लेने के उद्देश्य से भूख हड़तालें आयोजित की जाती हैं। 
  5. ‘घेराव’ में कर्मचारी प्रबंधकों को तब तक घेरे रहते हैं जब तक कि उनकी मांग मान नहीं ली जाती या आश्वासन नहीं दे दिया जाता। 
  6. सांकेतिक हड़ताल नियोक्ता का ध्यान किसी समस्या के प्रति आकृष्ट करने के लिए सांकेलित हड़तालें भी की जाती है। इस क्रिया का असर नहीं होने पर विधिवत नोटिस दे कर लंबी हड़ताल प्रारम्भ कर दी जाती है। 

तालाबन्दी 

तालाबंदी सेवायोजकों के हाथ में एक महत्वपूर्ण हथियार है। जिससे यह श्रमिकों को तितर बितर करने का असफल प्रयत्न करता है। यह श्रमिकों की चेतना को नष्ट करने का अस्त्र है। औद्योगिक संघर्ष अधिनियम की धारा 1 के अनुसार तालाबंदी की परिभाषा इस प्रकार है, सेवायोजकों द्वारा कर्मचारियों से कार्य नहीं लेना, अथवा कार्य स्थल पर ताला लगा देना अथवा कार्य स्थगित यकर देना आदि क्रियायें तालाबंदी के अन्तर्गत आती हैं। इस प्रकार जब सेवायोजक श्रमिकों के मानवीय अधिकारों पर शासन करना चाहता है तथा उन पर संपत्ति अधिकार प्रयोग करती है, तो वह उन्हें अपने व्यवसाय क्षेंत्र से बाहर निकाल देता है एवं उन्हें कार्य करने से रोकता है जिसे तालाबन्दी की संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार तालाबन्दी में निम्न तत्व सम्मिलित होते हैं :-
  1. तालाबन्दी सेवायोजकों द्वारा की जाती है। 
  2. तालाबंदी के अन्तर्गत सेवायोजक संस्था में कार्यरत सभी या कुछ श्रमिकों को अनिश्चित समय के लिए रखने से इनकार करता है। 
  3. तालाबंदी में कारखाने या कार्यस्थल को अस्थायी रूप से बंद कर दिया जाता है। 
  4. तालाबंदी किसी औद्योगिक संघर्षों के उत्पन्न हो जाने तथा संघर्षों का निपटारा करने के सभी प्रयासों के असफल हो जाने का परिणाम होती है। 
  5. तालाबंदी श्रमिकों की मांगों को मानने में असमर्थता प्रकट करने के लिए की जाती है। 
  6. किसी व्यक्ति विशेष को कार्य देने से इनकार करना तालाबंदी नहीं होती। 
  7. कुछ श्रमिकों को एक साथ सेवामुक्त करना या पदच्युत करना भी तालाबंदी नहीं है। 
  8. छंटनी के कारण किन्हीं श्रमिकों को कार्य देने से इनकार करना भी तालाबंदी नहीं है। 

औद्योगिक संघर्षों के सामान्य कारण 

यहॉं महत्वपूर्ण विषय है कि औद्योगिक संघर्ष होते ही क्यों हैं? इन औद्योगिक संघर्षों के मूल कारण क्या होते हैं? औद्योगिक संघर्षों के प्रमुख कारणों को निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है -

पूॅंजीवाद

संघर्षो की पृष्ठभूिम सदैव पूजीवादी अर्थव्यवस्था की दने रही है। यदि हम विश्व के अन्य देशों का अवलोकन करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि जहॉं भी इस प्रकार की अर्थव्यवस्था है वहॉं औद्योगिक संघर्ष अपने चरम पर होती है। अत: हम कह सकते हैं के श्रम और पूंजी के बीच संघर्ष का मूल कारण पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है। जैसे जैसे उत्पत्ति की मात्रा में वृद्धि होती जाती है वैसे श्रम और पूंजी के बीच मतभेद और विवाद उग्र होते जाते हैं।

आर्थिक कारण 

संघर्ष का द्वितीय कारण आर्थिक है। अत: जब व्यक्ति अपनी सेवाओं का विक्रय करते हैं और अपना कार्य जीवन सेवाओं, सेवाओं के क्रय करने वाले के यहॉं व्यतीत करते हैं, तब उनमें विभिन्न प्रकार का असन्तोष और औद्योगिक अशान्ति का उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक ही है। कर्मचारी विशेषरूप से असन्तोषजनक कार्य, काम करने की स्वस्थ दशायें, आगे बढ़ने के अवसर, सन्तुष्टि प्रदान करने वाला काम, औद्योगिक मामलों में कुछ कहने सुनने का अधिकार मजदूरी की हानि, अत्यधिक काम और मनमाने व्यवहार के प्रति सुरक्षा में रूचि रखते हैं। श्रमिकों की ये आशायें समाप्त हो जाती हैं और वह आर्थिक शोषण के ऐसे जाल में फॅंस जाता है जिससे निकलना उसके लिए असम्भव होता है। उद्योगपति श्रमिकों से अधिक से अधिक काम लेते हैं और इसके बदले में कम से कम मजदूरी देते हैं। साथ ही रहने के लिए अस्वाथ्यकर दशायें होती हैं। इस कारण उनमें असंतोष व्याप्त होता है। इसका परिणाम यह होता है कि औद्योगिक संघर्ष का जन्म होता है। प्रमुख आर्थिक कारण जो औद्योगिक संघर्ष को जन्म देते हैं, उनमें अग्रलिखित को सम्मिलित किया जाता है-
  1. अताकिक वेतन प्रणाली - औद्योगिक संघर्ष के कारणों में कम वेतन और मॅंहगाई भत्ते प्राय: अपनी प्रमुख भूमिका निभाते है।। उत्पादों के मूल्यों में दिन दूनी, रात चौगुनी वृद्धि हो रही है, किन्तु मॅहगाई भत्त उतना ही दिया जाता है, जो वर्षों पहले दिया जाता था। जो वर्षों पहले दिया जाता था। इससे मजदूर जीवन स्तर को बनाये रखने के लिए अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ रहता है। इसका परिणाम यह होता है कि उसमें असन्तोष की भावना का विकास होता है और इसकी परिणति औद्योगिक संघर्षों के रूपों में होती है।
  2. दोषपूर्ण बोनस प्रणाली - अनके उद्योगों में बोनस की व्यवस्था सन्तोषजनक नहीं है तथा बोनस अत्यन्त ही कम मात्रा में दिया जाता है, इससे श्रमिकों में असन्तोष की भावना का विकास होता है।
  3. भर्ती - औद्योगिक सघंर्षो के मलू कारणों में श्रमिकों को भर्ती पद्धति का भी स्थान है। श्रमिकों की भर्ती या तो मध्यस्थों द्वारा होती है या ठेकेदारों की सहायता से। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि श्रमिक उद्योगपति के साथ वफादारी का निर्वाह करने में अपने को असमर्थ पाता है। मध्यस्थों के स्वार्थ की पूर्ति तभी हो सकती है जब वे श्रमिक और मालिक की दूरी को बनाये रखें। इसका परिणाम यह होता है कि औद्योगिक संघर्षों का जन्म होता है।
  4. कार्य की दशाएँ - औद्योगिक संघर्षो का कारण कार्य की दोषपूर्ण दशायें भी हैं जिनके कारण औद्योगिक संघर्षों का जन्म होता है, जैसे - अस्वस्थ वातावरण, असन्तोषजनक सुरक्षा, कैन्टीन की सुविधाएं और काम करने के अधिक घण्टे आदि।

प्रबंध सम्बन्धी कारक 

प्रबन्ध सम्बन्धी कारकों ने भी औद्याेि गक संघर्षो को जन्म दिया है। मालिक उद्योगों में ऐसा प्रबन्ध करते हैं, जो श्रमिकों के हित में न हो। प्रबन्ध सम्बन्धी कारकों में अग्रलिखित तत्वों को सम्मिलित किया जा सकता है -
  1. अकुशल नेतृत्व - अनके स्वाथ्र्ाी व्यक्ति जो अपने को श्रमिकों का तथाकथित नेता समझाते हैं श्रमिकों को अपने रास्ते से भटका देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि अशिक्षित श्रमिक उनके पीछे हो लेता है और उनके इशारों पर हड़ताल और तालाबन्दी की कार्यवाही करता है। उनका मौलिक उद्देश्य तो अपनी प्रसिद्धि होता है, श्रमिकों की भलाई नहीं। इसका परिणाम यह होता है कि श्रमिक इन्हीं अकुशल नेताओं के कहने मे आकर हड़ताल करने को तत्पर हो जाते हैं तथा अपने पैर में स्वयं कुल्हाड़ी मारकर संस्था को हानि पहुंचाता है।
  2. प्रबंध में श्रमिकों का प्रतिनिधित्व - प्रबन्ध में श्रमिकों को स्थान देना वैसे भी असन्तोष का कारण है, किन्तु जब प्रबन्धकों द्वारा श्रमिकों के साथ बुरा व्यवहार किया जाता है तो इससे औद्योगिक असंतोष और अधिक भड़कता है। प्रबन्धकों द्वारा श्रमिकों के साथ जो दुव्यर्वहार किये जाते हैं जैसे - श्रमिकों को अनेक प्रकार से परेशान करना, उन मजदूरों को जो श्रमिक संघों से सम्बन्धित हैं, काम से निकाल देना, श्रमिक संघों को मान्यता न देना, और उन मध्यस्थों की बेईमानी और भ्रष्टाचार जो श्रमिकों को कार्य दिलाते हैं, आदि। इसी प्रकार के और अनेक अमानवीय व्यवहार हैं जो प्रबन्धक श्रमिकों के साथ करते हैं। इन दुव्र्यवहारों के कारण श्रमिकों में असन्तोष की भावना व्याप्त होती है और औद्योगिक संघर्षों का जन्म होता है।
  3. सामूहिक सौदेबाजी का अभाव - श्रमिकों का श्रम अस्थायी प्रकृति का होता है। इसका कारण यह है कि काम न मिलने से श्रम समाप्त हो जाता है और इसकी पुन: प्राप्ति करना सम्भव नहीं होता है। साथ ही सामूहिक सौदेबाजी के कारण श्रमिकों और मालिकों के बीच निकट सम्बन्धों की स्थापना नहीं हो पाती। इसका परिणाम यह होता है कि थोड़ी सी कठिनाई होने पर श्रमिक बिना सोचे समझे हड़ताल कर देते हैं।
  4. अवकाश से सम्बन्धित कारक - अनके अवस्थाओं में श्रमिकों को मालिकों द्वारा अवकाश नहीं दिया जाता जब कि अवकाश उनके लिए आवश्यक होता है। कभी कभी अवकाश के दिनों की मजदूरी भी प्रबन्धकों द्वारा काट ली जाती है। इससे श्रमिकों में असन्तोष व बीजारोपण होता है और औद्योगिक संघर्षों का जन्म होता है।
  5. सेवा शर्तों का अभाव - उद्योगों में अनके सेवा शर्तों की कमी रहती है। इस कमी को निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है -
    1. श्रमिकों को बिना किसी सूचना के काम से निकाल देना अथवा छॅटनी,श्रमिकों की सहमति के बिना उनके काम की दशाओं में परिवर्तन कर देना,
    2. श्रमिकों पर जुर्माना कर देना,
    3. श्रमिकों की मजदूरी में अवैधानिक ढंग से कटौती करना। इस सभी कारणों से श्रमिकों में असन्तोष का बीजारोपण होता है और यह असन्तोष औद्योगिक विवाद को जन्म देता है।

सामाजिक कारक

पूजींवादी, आर्थिक और प्रबन्धक सम्बन्धी कारक ही औद्योगिक संघर्षों के लिए उत्तरदायी नहीं होते है, अपितु सामाजिक कारक भी औद्योगिक क्षेत्रों में विवाद के लिए उत्तरदायी होते हैं।प्रमुख सामाजिक कारक, जो औद्योगिक संघर्षों के साथ जुड़े होते हैं वे निम्न हैं :-
  1. व्यवसाय की व्यापकता - आधुनिक उद्योगों की सबसे बडी़ विशेषता यह है कि ये बड़े व्यापक स्तर पर किये जाते हैं। इसके कारण मालिकों और श्रमिकों के बीच की खाई अत्यन्त चौड़ी हो गई है। उनमें सामाजिक सम्पर्क की स्थापना नहीं हो पाती है। इससे मालिकों और श्रमिकों के सम्बन्ध मात्र औपचारिक रह जाते हैं, जिससे औद्योगिक संघर्षों का जन्म होता है।
  2. बुरी आवास व्यवस्था और निम्न जीवनस्तर - श्रमिको के निवास की दशाएं अत्यन्त ही घृणित होती हैं और उनके रहन सहन का स्तर अत्यन्त निम्न होता है। इससे उनमें असन्तोष और रोष तो व्याप्त रहता ही है। साथ ही असन्तोष और रोष की मात्रा में तब और वृद्धि हो जाती है जब इस कार्य के लिए नेता मालिकों को उत्तरदायी ठहरा देते हैं। परिणामस्वरूप श्रमिकों में औद्योगिक संघर्ष का जन्म होता है।
  3. सामाजिक सुरक्षा की कमी - प्रत्यके समाज में व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाती है। व्यक्ति के सामने अनेक सामाजिक कठिनाइयां होती है,जिनमें वह सामाजिक सुरक्षा का अनुभव करता है। ये कठिनाइयां इस प्रकार हैं, - बेरोजगारी की समस्या, वृद्धावस्था की समस्या, दुर्घटनाएं रोग तथा बीमारी से सम्बन्धित समस्याएं आदि। श्रमिकों को इन असुरक्षाओं से बचाने का ऐसा कोई आश्वासन नहीं मिलता जो स्पष्ट और सरल हो। इससे उनमें असन्तोष व्याप्त होता है और औद्योगिक संघर्षों का जन्म होता है।

राजनीतिक कारक

औद्योगिक विवादों के लिए राजनीतिक कारणों का महत्व सबसे ज्यादा है। इसमें राजनीतिक दलों का महत्व और भी अधिक है। इसका कारण यह है कि ये दल श्रमिकों को अपने विश्वास में लेना चाहते हैं। इसके लिए छोटी सी घटना को भी बढ़ा-चढ़ाकर आगे ले जाते हैं और वे इसके लिए हड़ताल अनशन आदि करने के लिए अग्रसर होते हैं और इनमें वे श्रमिकों को भी मिला लेते हैं। इसके साथ ही श्रम संघ राजनीतिक दलों के प्रभाव में रहते हैं और राजनैतिक उद्देश्यों के प्राप्ति के लिए हड़ताल आदि करवाते हैं।

मनोवैज्ञानिक कारक

औद्योगिक संघर्षो के मलू में मनोवैज्ञानिक कारण होते है। मनोवैज्ञानिक कारकों का औद्योगिक सम्बन्धों को सुधारने या खराब करने में महत्वपूर्ण हाथ होता है। मानव सिर्फ भूख और प्यास का पुतला ही नहीं होता, उसमें इन्सानियत होती है। साथ ही वह आत्मसम्मान और आदर का भी भूखा होता है। सन्तोष बाहरी तत्व नहीं है, अपितु इसकी उत्पत्ति मानव की अन्तरात्मा से होती है। अत: आन्तरिक कारण ही इसकी सन्तुष्टि के लिए उत्तरदायी होते हैं। यह श्रमिक उसकी आन्तरिक भावना होती है कि वह काम को अच्छा समझता है या बुरा। ऐसा देखा जाता है कि अग्रलिखित अधिकांश कारण औद्योगिक संघर्षों का जन्म देते हैं-
  1. ऐसी परिस्थितियों का अभाव जिनसे श्रमिक अपने कार्यों के सम्पादन में गर्व का अनुभव करें,
  2. ऐसे वातावरण की कमी जिससे श्रमिक अपने कार्यों के सम्पादन में गर्व का अनुभव करें,
  3. उन्हें अपने काम को करने में आत्मसन्तुष्टि नहीं मिल पाती, तथा
  4. उत्पादन में श्रमिकों की भावनाओं को ठेस लगती है और वे औद्योगिक संघर्ष करने को विवश होते हैं।

संघर्ष से लाभ तथा हानि - एक विमर्श 

औद्योगिक संघर्ष के परिणाम के सम्बन्ध में दो प्रकार के मत हैं।कुछ विद्वानों का ऐसा मत है कि इसके परिणाम अच्छे होते हैं, इससे श्रमिकों की कार्यदशाओं में सुधार होता है। इसके विपरीत कुछ विद्वानों का कहना है कि औद्योगिक विवादों के कारण उत्पादन मात्रा में कमी आ जाती है और इससे लाभों में हानि होती है। औद्योगिक संघर्ष के सम्बन्ध में दोनों प्रकार के विचारकों के मत एकांगी है। इससे लाभ भी होता है और हानियॉं भी होती हैं। यहॉं हम औद्योगिक संघर्ष से होने वाले लाभ और हानि दोनों मतों के सम्बन्ध में क्रमश: विमर्श करेंगे :-

प्रथम विमर्श से हम औद्योगिक संघर्ष से होने वाले लाभों के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे -

औद्योगिक श्रमिक जिन कारखानों में कार्य करते है उनकी दशाएं अत्यन्त खराब होती हैं और इनसे श्रमिकों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।वहॉं अत्यन्त गन्दगी, रोशनी और प्रकाश की समुचित व्यवस्था का अभाव, खाद्य पदार्थों का अभाव और अस्वाथ्यकार खाद्यपदार्थ, विश्रामगृह की बुरी हालत, मूत्रालय और शौचालय आदि की अव्यवस्था रहती है। हड़तालों की सहायता से इन बुरी अवस्थाओं में सुधार लाया जाता है। और श्रमिकों के लिए काम करने की स्वास्थ दशाओं का सृजन किया जाता है।औद्योगिक संघर्षों के कारण श्रमिकों को आर्थिक लाभ होता है। इससे उनकी मजदूरी तथा मॅंहगाई भत्ते में वृद्धि होती है और बोनस की उपयुक्त सुविधा प्रदान की जाती है। औद्योगिक संघर्षों के कारण श्रमिकों के जीवन शैली में परिवर्तन आता है, अद्धिाक मजदूरी मिलती है, आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है। इसका परिणाम यह होता है कि श्रमिकों के रहन सहन के स्तर में उन्नति होती है। औद्योगिक क्षेत्रों में होने वाले संघर्षों के पूर्व श्रमिकों को उद्योग में अधिक घण्टों तक काम करना पड़ता था। इसके द्वारा श्रमिक को अपने काम के घण्टों में कमी करने में मदद मिलती है। साथ ही काम के मध्य में अवकाश आदि की उचित व्यवस्था करने में भी मदद मिलती है।

औद्योगिक संघर्षों के कारण औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के कार्य की दशाओं में सुधार आता है। उनको आर्थिक लाभ होता है, उनका जीवन-स्तर उन्नत होता है तथा काम के घण्टों में कमी होती है। इस सब का परिणाम यह होता है कि श्रमिकों की कुशलता और कार्य क्षमता में वृद्धि होती है।

औद्योगिक संघर्षों का सबसे अच्छा परिणाम यह होता है कि इससे श्रमिकों में पारस्परिक सहयोग की भावना का विकास होता है। जिससे इनमें एकता की भावना का विकास होता है। इस एकता का परिचय वे श्रम संघ के माध्यम से देते हैं।इससे श्रम सघ आंदोलन को भी प्रोत्साहन मिलता है। साथ ही, श्रमिक संघों में अधिक दृढ़ता का विकास होता है। इसके कारण श्रमिकों के प्रतिनिधियों को उद्योगों के प्रबन्ध में भागीदार का अधिकार मिल जाता है। इससे श्रमिकों को सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वे प्रबन्ध् ा में होने के कारण अपनी समस्याओं को स्वयं ही सुलझा लेते है।। इसमें इनके शोषण का अन्त तो नहीं होता किन्तु श्रमिकों के शोषण में कमी आ जाती है। इन्हें अनेक प्रकार की सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं तथा इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि उद्योगों के प्रबन्धकों में जागरूकता का विकास हुआ है। आज वे श्रमिकों के साथ दुव्र्यवहार और उनका अनावश्यक शोषण नहीं कर सकते। वे श्रमिकों की समस्याओं को उपेक्षा और उदासीनता की दृष्टि से नहीं देख सकते हैं।

जिस प्रकार एक सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी प्रकार जहॉं एक ओर लाभ है तो दूसरी ओर हानि। औद्योगिक संघर्षों के कारण प्रमुख रूप से जो हानियॉ हैं वे अग्रलिखित हैं -

औद्योगिक संघर्षों के कारण हड़ताल और तालाबन्दी होती है इससे श्रमिकों को गम्भीर परेशानियों का सामना करना पड़ता है। संघर्ष के कारण मजदूरों तथा उनके परिवार को निम्न हानियॉं उठानी पड़ सकती हैं।
  1. इसके परिणाम स्वरूप श्रमिकों की आय में कमी आती है, जिसके कारण उसका पारिवारिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है वह अपने को आर्थिक संकट से घिरा हुआ पाता है। इससे उसके जीवन यापन के स्तर में गिरावट तो आती ही है साथ ही उसका और पूरे परिवार का स्वास्थ्य भी बुरी तरह प्रभावित होता है।
  2. हड़ताल के समय का पारिश्रमिक व्यर्थ में ही चला जाता है। जिस समय में श्रमिक हड़ताल करता है वहसमय दुबारा लौटकर नहीं आता। बेकार बैठे रहने से श्रमिकों की कार्यक्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। 
  3. हड़ताल और मांगों के प्रदर्शन में श्रमिकों को लाठी और गोली खानी पड़ती है तथा कभी कभी उन्हें अपनी बलि भी चढ़ानी पड़ती है। 
  4. हड़ताल के कारण श्रमिक को णग्रस्तता का भी शिकार होना पड़ता है क्योंकि हड़ताल के समय मजदूरी नहीं मिलती इसलिए अपने स्वयं के और परिवार के भरण पोषण के लिए उसे उधार लेना पड़ता है। 
  5. पारिवारिक जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है । भोजन के अभाव में परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है और वे बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। 
  6. अनेक हड़तालें असफल हो जाती हैं हड़तालों की इस असफलता से श्रमिकों का नैतिक पतन होता है। साथ ही उनमें आत्मविश्वास की कमी हो जाती है। 
  7. श्रमिक श्रम संघों के प्रति अपना विश्वास समाप्त कर देते हैं। 
  8. श्रमिकों में एकता की भावना में कमी आती है, श्रमिकों की छॅटनी हो जाती है तथा इससे बेकारी की समस्या और भी उग्र हो जाती है। 
  9. संघर्षों के कारण सबसे ज्यादा हानि उद्योगपतियों को चुकानी पड़ती है। उद्योगपतियों को जो कीमत चुकानी पड़ती है उसमें उत्पादन में कमी, बिक्री में कमी, बिक्री कम हो जाने से बाजार छिन्न भिन्न हो जाना, इस प्रकार श्रम संघों के प्रति जनता विश्वास व्यक्त करती है और उत्पादकों के प्रति विश्वास में कमी आती है। 
  10. अत: मालिकों के नैतिक प्रतिष्ठा में कमी हो जाती है। औद्योगिक अशान्ति का जन्म होता है, जिससे सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। 
  11. हड़ताल और तालाबन्दी के परिणामस्वरूप अनुशासनहीनता में वृद्धि होती है, और श्रम तथा पूंजी के बीच घृणा का वातावरण पैदा हो जाता है जिससे वर्ग संघषो को प्रोत्साहन मिलता है। 
संघर्षों के कारण श्रमिक और उद्योगपति को ही हानि नहीं होती अपितु इससे सर्व समाज को हानि उठानी पड़ती है। इस प्रकार संघर्ष के परिणामस्वरूप समाज को निम्न हानि उठानी पड़ती है।
  1. इससे समाज में विद्वेष और विषमता का वातावरण उत्पन्न होता है। 
  2. समाज में अनिश्चितता का वातावरण उत्पन्न हो जाता है। 
  3. प्राथमिक सुविधाएं जैसे - परिवहन, जल, बिजली, आदि में हड़ताल होने से जनता को अनेक प्रकार की कठिनाइयॉं होती हैं। 
  4. हड़ताल के कारण समाज में वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि हो जाती है जिससे समाज को हानि उठानी पड़ती है। 
  5. हड़ताल के कारण उत्पादन कम हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि राष्ट्रीय आय की हानि होती है।
इस प्रकार जब किसी उद्योग में पूंजी और साधन पूर्णरूप से हड़ताल या तालाबन्दी से निष्क्रिय कर दिये जाते हैं तब इसका प्रभाव राष्ट्रीय लाभांश पर पड़ता है। जिससे अर्थव्यवस्था को हानि पहुंचाती है और देश का विकास रूक जाता है।

संघर्षों के रोकथाम हेतु सुझाव 

अभी तक आप सभी संघर्ष की अवधारणा तथा इसको उत्पन्न करने वाले कारकों का विश्लेषण कर चुके है।, हमने यह भी जाना कि इसके परिणाम क्या होते हैं। इससे समाज, मालिक और श्रमिक तीनों को हानि उठानी पड़ती है इसलिए इस हानि का रोकना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति रूक जायेगी। सबसे पहला प्रयास तो यह होना चाहिए कि संघर्षों का जन्म ही न हो।

इससे औद्योगिक शान्ति की स्थापना तो होगी ही साथ ही उत्पादन में वृद्धि के साथ ही राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी। अत: हमें ऐसे प्रयास किये जाने चाहिए जिससे मालिकों और श्रमिकों के बीच की दूरी को समाप्त किया जा सके। यह कार्य इतना आसान नहीं है जितना इसे समझा जाता है। विशेषत: आज की परिस्थितियों में ऐसा करना और भी कठिन हो गया है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि औद्योगिक विवादों को सुलझाया ही नहीं जा सकता । इन समस्याओं को उत्साह, अनुभव और कर्मठता के आधार पर सुलझाया जा सकता है। अत: इस सम्बन्ध में निम्न सुझावों की सहायता से संघर्षों को कम करने में मदद सहायता मिल सकती है :-

श्रम संघों की स्थापना - 

कुशल एवं प्रभावी श्रम संघों की स्थापना के द्वारा औद्योगिक क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले संघर्षों को कह करके शान्ति की स्थापना का प्रयास किया जा सकता है। इससे सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि पारस्परिक सम्बन्ध् ाों की स्थापना होगी। परिणामस्वरूप इन दोनों के बीच पाए जाने वाले पारस्परिक मतभेदों को समाप्त किया जा सकता है। यद्यपि श्रम संघों में अनेक दोष हैं, फिर भी इन दोषों को समाप्त करके शक्तिशाली श्रमसंघों की स्थापना की जा सकती है। इससे औद्योगिक अशान्ति में कमी आएगी।

उ़द्योगपति तो शक्तिशाली है ही साथ ही श्रम संघों की स्थापना से श्रमिकों में शक्ति का संचार हो जायेगा। इस शक्ति सन्तुलन के परिणामस्वरूप मालिकों और श्रमिकों के बीच में समझौता होगा और भविष्य में यदि किसी भी प्रकार का मतभेद होगा तो श्रम संघ और उद्योगपति मिलकर समस्याओं का समाधान कर लेंगे। इससे भविष्य में किसी प्रकार के संघर्ष की गुंजाइश नहीं रहेगी। इस प्रकार शक्तिशाली श्रम संघों की सहायता से संघर्ष को निपटाने में मदद मिलेगी।

कार्य समितियॉं

इसे मालिक-मज़दूर समितियों के नाम से भी जाना जाता है। संघर्ष को सुलझाने में ये समितियों महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती हैं। शाही श्रम आयोग के अनुसार औद्योगिक विवादों को समाप्त करने में इन समितियों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इस प्रकार की संस्थाएं विश्व के अन्य देशों डेनमार्क, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, इटली, हंगरी, पोलैण्ड, नार्वे, चेकोस्लोवाकिया में भी हैं। इन संस्थाओं का निर्माण मुख्यरूप से निम्न उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया गया है-
  1. औद्योगिक विवादों और संघर्ष को समाप्त करना। 
  2. श्रमिकों और पूंजीपतियों के बीच असहयोगात्मक वातावरण समाप्त करना, और 
  3. उद्योगों में नियमों का पालन करना। 
इस प्रकार मालिक-मज़दूर समितियॉं, औद्योगिक विवादों के सुलझाने में जो प्रमुख कार्य करेंगे, वे इस प्रकार हैं -
  1. मान्यता प्राप्त मालिकों के संघ और श्रमिकों के संघ के बीच समझौते की शर्तों को लागू करना। 
  2. श्रमिकों और मालिकों के बीच जो गलतफहमियों हो जाती है, उन्हें दूर करना। 
  3. श्रमिकों में उनकी दशाओं और कार्य के प्रति रूचि तथा उत्तरदायित्व की भावना का प्रसार करना। 
  4. मालिकों और श्रमिकों के बीच पारस्परिक सहयोग को बनाए रखना साथ ही दिन प्रतिदिन जो समस्याएं आये उन पर विचार विनिमय करना। 
  5. श्रमिकों और मालिकों के बीच अनुशासन और उचित व्यवहार बनाए रखना। 
  6. श्रमिकों के जीवन स्तर को उन्नतिशील बनाना। 
  7. श्रमिकों को विचार विनिमय करना - काम करने की दशाएॅं, रहन सहन की दशाएॅं, कल्याण की दशाएॅं, मजदूरी भत्ता और बोनस, छुट्टियॉं और अवकाश आदि। 
  8. श्रमिकों की कार्यक्षमता को बनाए रखना और कार्य क्षमता को घटाने वाले कारकों का विश्लेषण करना। 
  9. औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के प्रयास करना। 
  10. हड़ताल और तालाबन्दी की घटनाओं को न होने देना और यदि हो जाती है तो शीघ्र ही इनको समाप्त करने सम्बन्धी प्रयास करना। 
  11. श्रमिकों की इन समस्याओं की जानकारी उद्योगपतियों को देना और समस्याओं के समाधान का प्रयास करना। 
  12. ऐसी व्यवस्था करना जिससे कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की गारन्टी दी जा सके। 
  13. मिल में सामाजिक जीवन का विकास करने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम को अपनाना। 
  14. श्रम न्यायालय के निर्णय, सरकारी आदेश, विज्ञप्ति आदि के विषय में प्रबन्धकों से विचार विमर्श करना। 
  15. यदि कोई कर्मचारी कारखाने के दैनिक जीवन और सुख सुविधाओं के सम्बन्ध में अपने सुझाव दे तो उन सुझावों पर विचार विनिमय करना। 
  16. प्रबन्धकों अथवा श्रमिकों द्वारा प्रस्तुत किसी भी मामले पर विचार विमर्श करना। वस्तुत: यदि उनको उचित स्थान प्रदान किया जाता है और भूतकाल की गलतियों को दूर करने दिया जाता है जो मालिक मजदूर समितियां औद्योगिक प्रणाली में बहुत प्रभावी व उपयोगी कार्य कर सकती है। 

संयुक्त औद्योगिक परिषदें 

सयुंक्त औद्योगिक परिषदो की स्थापना द्वारा भी औद्योगिक संघर्षों को कम किया जा सकता है। ये परिषदें निम्न प्रकार की हो सकती हैं -
  1. राष्ट्रीय स्तर पर
  2. राज्य स्तर पर
  3. भिन्न भिन्न उद्योगों की भिन्न भिन्न परिषदें, और
  4. एक ही उद्योग में विभिन्न विभागों के लिए अलग अलग परिषदें।
इन परिषदों में श्रमिक और मालिक दोनों के ही समान प्रतिनिधि होंगे। इनके माध्यम से श्रमिकों और मालिकों के बीच ऐसा वातावरण तैयार किया जाता है जिससे औद्योगिक विकास में दोनों बराबर सहयोग दें। इन परिषदों के माध्यम से मालिक और श्रमिक दोनों के हितों की रक्षा का प्रयास किया जाता है। इन समितियों के समक्ष जिन विषयों पर विचार विमर्श किया जा सकता है, वे अग्रलिखित हो सकते हैं -
  1. नित्य प्रति काम करने की दशाएं और श्रमिकों की मजदूरी
  2. उद्योगों से सम्बन्धित उत्पादन
  3. श्रम की कुशलता
  4. ऑकड़े इकट्ठे करना।
  5. औद्योगिक अनुसंधान को प्रोत्साहन, और
  6. प्रबन्ध सम्बन्धी समस्याओं पर विचार करना, आदि।

मजदूरी परिषदें 

मजदूरी परिषदो की स्थापना के माध्यम से भी आद्यैागिक संघर्ष को सुलझाया जा सकता है। यह परिषद मजदूरी से सम्बन्धित समस्याओं के विभिन्न पहलुओं पर विचार करेगी। साथ ही इसका काम न्यूनतम मजदूरी की दर का निर्धारण और काम करने की दशाओं में सुधार से सम्बन्धित होता है । इसमें मालिक और मजदूर समान प्रतिनिधि होते हैं, तथा कम से कम 3 व्यक्ति बाहर से लिये जाते हैं जो इस विषय के विशेषज्ञ होते हैं।

श्रमिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार

अतिमहत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि श्रमिक हड़ताल क्यों करते हैं? यदि गंभीरता से इस प्रश्न का उत्तर ढूॅंढने का प्रयास करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि श्रमिक की आर्थिक दशा इसके मूल में है। यदि श्रमिकों को उनके काम का उचित पुरस्कार दिया जाय, उनको कार्य के समय और कार्य सेवा- मुक्त होने पर आर्थिक सुरक्षा की गारन्टी दी जाय, आवास की व्यवस्था में उचित सुधार किये जायें, काम करने के घण्टों में कमी की जाय, अवकाश और सवैतनिक छुट्टियों की व्यवस्था की जाय, उनके तथा उनके परिवार के लिए शिक्षा तथा अन्य कल्याण कार्यों की व्यवस्था की जाये, उन्हें उचित आदर और सम्मान दिया जाय तो ऐसी कोई बात नहीं है कि श्रमिक संघर्ष करने पर उतारू हों, संघर्ष को सुलझाने के लिए यह आवश्यक है कि श्रमिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार किया जाय।

स्थायी आदेश 

स्थायी आदेश वे हैं जो श्रमिकों और महिलाओं के सम्बन्धों पर नियंत्रण रखने से सम्बन्धित होते हैं। दिन प्रतिदिन श्रमिकों की समस्याओं में वृद्धि होती जा रही है। यदि मालिकों पर इन समस्याओं को छोड़ दिया जायगा तो इन समस्याओं का सुलझाना तो दूर रहा ये और भी उलझ जायेगी। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि सरकार श्रमिकों से सम्बन्धित नियमों का निर्माण करें। साथ ही, इन नियमों को संरक्षण प्रदान करें। स्थायी आदेशों के कारण श्रमिकों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान हो जाता है।साथ ही, मालिक भी जान जाते हैं कि उन्हें कौन सी शर्तो का पालन करना है। इसका परिणाम यह होता है कि दोनों के बीच कभी भी दुविधा की स्थिति नहीं आती। इसलिए सरकार को स्थायी आदेशों का निर्माण करना चाहिए और इन्हें कड़ाई से समाज पर लागू करना चाहिए। इससे संघर्ष को सुलझाने में मदद मिलेगी।

अन्य सुझाव

औद्योगिक विवादों को समाप्त करने के लिए अन्य जो सुझाव दिये जा सकते हैं वे हैं -
  1. प्रबन्ध में श्रमिकों को सहभागिता प्रदान करके, 
  2. अनुशासन - संहिता का निर्माण करके 
  3. आचार संहिता का निर्माण करके
  4. शिकायत निवारण क्रियाविधि 
  5. मूल्यांकन तथा कार्यान्वयन समितियॉं तथा 
  6. त्रिदलीय श्रम व्यवस्था।

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