सर्पगंधा की खेती कैसे करें?

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भारतीय महाद्वीप की जलवायु में सफलतापूर्वक उगाए जा सकने वाले औषधीय पौधों में न केवल औषधीय उपयोग बल्कि आर्थिक लाभ एवं मांग की दृष्टि से भी सर्पगंधा कुछ गिने चुने शीर्ष पौधों में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दक्षिण पूर्वी एशिया का यह मूल निवासी पौधा भारतवर्ष के साथ-साथ बर्मा, बांग्लादेश, श्री लंका, मलेशिया, इंडोनेशिया तथा अंडमान द्वीप समूह में स्वयंजात पाया जाता है भारतवर्ष में यह मुख्यतया उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल के तराई क्षेत्र, पूर्वी बिहार, उत्तर बंगाल, आसाम, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश आदि राज्यों के साथ-साथ गोवा, कर्नाटक तथा केरल के कुछ भागों में वनों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है।

यूं तो भारतवर्ष के विभिन्न भागों में पाया जाने वाला सर्पगंधा औषधीय दृष्टि से विश्व भर में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है परन्तु देश के विभिन्न भागों में पाए जाने वाले सर्पगंधा देहरादून क्षेत्र में बोई जाने वाली सर्पगंधा में अजमेलीन समूह के एल्केलाइड अधिक पाए जाते हैं जबकि बिहारी मूल की सर्पगंधा में सर्पेन्टाइन समूह के एल्केलाइड अधिक पाए जाते हैं। सर्पगंधा का नाम ‘‘सर्पगंधा’’ क्यों पड़ा होगा, इसके पीछे कई मत हैं। ऐसा माना जाता है कि क्योंकि प्राचीन समय से ही सर्पगंधा का उपयोग सांप काटे के इलाज के लिए किया जाता रहा है। इसलिए इसका नाम सर्पगंधा पड़ा होगा। हालांकि सबसे ज्यादा उपयुक्त मत इसके संस्कृत नाम का लगता है जिसमें सर्पगंधा का अभिप्राय ‘‘सर्पान् गन्धयति अर्दयति इति’’ है, अर्थात् ‘‘वह वस्तु (बूटी) जो सर्पों को पीडित करे अथवा सर्पों को दूर भगाए’’। क्योंकि सर्पगंधा की गंध से सांप दूर भागते हैं अत: संभवतया इसी वजह से इसका नाम सर्पगंधा पड़ा होगा। इसका व्यवसायिक नाम ‘‘रावोल्फिया’’ सोलहवीं शताब्दी के एक जर्म पादपविज्ञानी तथा चिकित्सक लियोनार्ड रावोल्फिया के नाम पर पड़ा हुआ माना जाता है।

विभिन्न चिकित्सा कार्यों हेतु भारतवर्ष में सर्पगंधा का उपयोग लगभग 400 वर्षों से किया जा रहा है। यद्यपि परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों में इसका उपयोग सांप अथवा अन्य कीड़ों के काटने के इलाज हेतु, पागलपन एवं उन्माद की चिकित्सा हेतु तथा कई अन्य रोगों के निदान हेतु किया जाता रहा है परन्तु वर्ष 1952 में जब सीबा फार्मेस्यूटिकल्स स्विटजरलैण्ड के शिलर तथा मुलर नामक वैज्ञानिकों ने सर्पगंधा की जड़ों में ‘‘रिसरपिन’’ नामक एल्कोलाइड उपस्थित होने की खोज की तो यह पौधा सम्पूर्ण विश्व की नज़रों में आ गया। फलत: उच्च रक्तचाप की अचूक दवाई माने जाने वाले इस पौधे का जंगलों से अंधाधुंध विदोहन प्रारंभ हो गया जिससे शीघ्र ही यह पौधा लुप्तप्राय पौधों की श्रेणी में आ गया। वर्तमान में यह पौधा भारत सरकार द्वारा अधिसूचित किए गए लुप्तप्राय तथा प्रतिबन्धित पौधों की श्रेणी में शामिल है जिसके कृषिकरण को बढ़ावा देने हेतु प्रत्येक स्तर पर सर्र्पगंध्ंधा के विभिन्न प्रज्रजातियोंं के पुष्प प्रयास किए जा रहे हैं।

सर्पगंधा

सर्पगंधा लगभग 2 से 3 फीट तक उंचाई प्राप्त करने वाला एक अत्यधिक सुन्दर दिखने वाला बहुवर्षीय पौधा है जिसे कई लोगों द्वारा घरों में सजावट कार्य हेतु भी लगाया जाता है। भारतवर्ष के कई प्रदेशों में ‘‘पागलपन की बूटी’’ अथवा ‘‘पागलों की दवाई’’ के नाम से जाने जाने वाले इस पौधों का औषधीय दृष्टि से प्रमुख उपयोगी भाग इसकी जड़ होती है जो 2 वर्ष की आयु के पौधे में 30 से 50 से0मी0 तक विकसित हो जाती है लगभग छ: माह की आयु प्राप्त कर लेने पर पौधों में हल्के गुलाबी रंग के अति सुन्दर फूल आते हैं तथा तदुपरान्त उन पर मटर के दाने के आकार के फल आते हैं जो कच्ची अवस्था में हरे रहते हैं तथा पकने पर ऊपर से काले दिखते हैं। इन फलों को मसलने पर अंदर से सफेद भूरे रंग के चिरौंजी के दानों जैसे बीज निकलते हैं। यूं तो सर्पगंधा की कई प्रजातियां जैसे राबोल्फिया, वोमीटोरिया, रावोल्फिया, कैफरा, रावोल्फिया टैट्रफाइला रावोल्फिया, कैनोन्सिस आदि भी पाई जाती हैं परन्तु सर्वाधिक मांग एवं उपयोगिता वाली प्रजाति राबोल्फिया सर्पेन्टाइना ही हैं इसके अतिरिक्त भी सर्पगंधा की कई जातियां हैं जो भारत के विभिन्न भागों में पाई जाती है। उदाहरणार्थ इसकी राबोल्फिया कानेसेंस नामक जाति बंगाल में प्रचुरता से मिलती है जबकि राबोल्फिया डेन्सीफ्लोय नामक प्रजाति खासीपर्वत, पश्चिमी घाट तथा कोंकण प्रदेश में ज्यादा पाई जाती हैं इसी प्रकार इसकी एक अन्य जाति राबोल्फिया मीक्रान्था है जो कि मालावार के समुद्रतटीय मैदानों में अधिक पाई जाती है तथा दक्षिणी भारत के बाजारों में इसकी जड़ें बिकने के लिए आती हैं।

सर्पगंधा की रासायनिक संरचना 

सर्पगंधा में लगभग 30 एल्केलाइड्स पाए जाते हैं जिनमें प्रमुख हैं- रिसरपिन, सर्पेन्टाइन, सर्पेन्टाअनाइन, अजमेलाइन, अजमेलिसाइन, रावोल्फिनाइन, योहिम्बाइन, रेसिनेमाइन, डोज़रपिडाइन आदि। ये एल्केलाइड्स सर्पगंधा की फसल मुख्यतया सर्पगंधा की जड़ों में होते हैं। तथा पौधे की सूखी जड़ों में इनकी उपस्थिति 1. 7 से 3 प्रतिशत तक पाई जाती है। इसकी जड़ों से तैयार की जाने वाली भस्म में पोटेशियम, कार्बोनेट, फास्फेट, सिलिकेट, लोहा तथा मैंगेनीज़ पाए जाते हैं।

सर्पगंधा के औषधीय उपयोग 

सर्पगंधा भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में प्रयुक्त होने वाले प्राचीन एवं प्रमुख पौधों में से एक हैं परम्परागत ज्ञान के साथ-साथ- आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार भी यह विभिन्न विकारों के निदान में उपयोगी सिद्ध हुआ है। आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों में भारतवर्ष में जनसामान्य में इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय कोलकाता के सुप्रसिद्ध आयुर्वेदिक चिकित्सक डा. गणपत सेन तथा डा. चन्द्रा बोस को जाता है। वर्तमान में जिन प्रमुख चिकित्सीय उपयोगों हेतु सर्पगंधा प्रमुखता से प्रयुक्त की जा रही है, वे निम्नानुसार हैं-

उच्च रक्त चाप के निवारण हेतु 

उच्च रक्त चाप अथवा हाई ब्लडप्रेशर के उपचार हेतु सर्पगंधा सम्पूर्ण विश्व भर में सर्वोत्तम औषधि मानी जाती है। इसके उपयोग से उच्च रक्तचाप में उल्लेखनीय कमी आती है, नींद भी अच्छी आती है तथा भ्रम आदि मानसिक विकार भी शांत होते हैं। वर्तमान चिकित्सा पद्धतियों में, विशेषतया अमेरिका में इसके उन तत्वों को अलग (आईसोलेट) कर लिया जाता हैं जो उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करते हैं तथा इन्हीं तत्वों का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार किन्हीं तत्वों को आईसोलेट करके सर्पगंधा के उन्हीं तत्वों का सेवन करने के दुष्प्रभाव नहीं देखे जाते। प्राय: उच्च रक्तचाप में इसकी जड़ के चूर्ण का आधा छोटा चम्मच (एक ग्राम की मात्रा में) दिन में दो या तीन बार सेवन करने से उच्च रक्तचाप से सामान्यता आती है।

अनिद्रा के उपचार हेतु 

अनिद्रा की स्थिति में नींद लाने हेतु सर्पगंधा काफी उपयोगी औषधि है। खांसी वाले रोगियों की अनिद्रा के निदान में भी यह अत्यधिक प्रभावी हैं अनिद्रा की स्थिति में निद्रा लाने हेतु इसकी जड़ का 0.60 से 1. 25 ग्राम चूर्ण किसी सुगंधीय द्रव्य के साथ मिलाकर देना प्रभावी रहता है। वैसे रात को सोते समय इसके 0.25 ग्राम पावडर का सेवन घी के साथ करने से बहुत जल्दी नीद आ जाती हैं वैसे चिकित्सक के परामर्श पर ही इसका उपयोग करना हितकर है।

उन्माद के उपचार हेतु 

परम्परागत चिकित्सा में सर्पगंधा बहुधा ‘‘पागल बूटी’’ अथवा पागलपन की दवा के रूप में भी जानी जाती हैं उन्माद और अपस्मार में जब रोगी बहुत अधिक उत्तेजित रहता है तो मन को शांत करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है इससे मन शांत रहता है तथा धीरे-धीरे मस्तिष्क के विकार दूर हो जाते हैं। इस विकार के उपचार हेतु सर्पगंधा की जड़ का एक ग्राम चूर्ण, 250 मि.ली. बकरी के दूध के साथ (साथ में गुड़ मिलाकर) दिन में दो बार दिया जाना उपयोगी रहता हैं परन्तु यह केवल उन्हीं मरीजों को दिया जाना चाहिए जो शारीरिक रूप से हष्ट पुष्ट हों। शारीरिक रूप से कमजोर मरीजों तथा ऐसे मरीज़ जिनका रक्तचाप पहले से असामान्य रूप में नीचा हो (लो ब्लड प्रेशर वाले), को यह नहीं दिया जाना चाहिए।

अनिद्रा, उन्माद तथा उच्च रक्तचाप जैसे महत्वपूर्ण विकारों के निवारण के साथ-साथ शीतपित्त (यूर्टीकेरिया) बुखार, कृमिरोगों के निवारण, सर्पविष एवं अन्य कीड़ों के काटने के उपचार आदि जैसे अनेकों विकारों के निवारण हेतु भी इसे प्रयुक्त किया जाता है।

नि:सन्देह सर्पगंधा एक अत्यधिक औषधीय उपयोग का पौधा है जिसका उपयोग केवल परम्परागत ही नहीं बल्कि आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों में भी बखूबी से किया जाता हैं इस पौधे के संदर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसका उपयोग तो विश्व के सभी देशों द्वारा किया जाता है चाहे वे विकसित देश हों अथवा अविकसित, परन्तु इसकी आपूर्ति का मुख्य स्त्रोत भारतवर्ष ही हैं हालांकि कुछ मात्रा में पाकिस्तान, बर्मा, थाईलैण्ड, श्रीलंका आदि देशों से भी इसकी आपूर्ति होती है परन्तु भारतवर्ष में उपजी सर्पगंधा को ज्यादा अच्छा माना जाता है। एक अनुमान के अनुसार विश्व भर में सर्पगंधा की सूखी जड़ों की वार्षिक मांग लगभग 20.000 टन की हैं इसी प्रकार देशीय बाजार में इसके एक्सट्रेक्ट तथा एलकोलाइड्स निकालने हेतु लगभग 650 टन जड़ों की वार्षिक मांग है। जबकि समस्त स्त्रोतों को मिला करे इसकी कुल आपूर्ति मात्र 350 टन प्रतिवर्ष की है (फारूखी एवं श्री रामू, 2001) उल्लेखनीय है कि फाउण्डेशन फॉर रीवाइटलाईजेशन ऑफ लोक हेल्थ ट्रेडीशन्स बंग्लौर द्वारा किये गये एक सर्वेक्षण के आधार पर उनके द्वारा सर्पगंधा को सर्वाधिक मांग वाले 20 प्रमुख भारतीय औषधीय पौधों (Top twenty indian medicinal Plants in trade) में स्थान दिया गया है। ऐसी स्थिति में इसकी सुनिश्चित आपूर्ति तभी हो सकती है यदि इसके कृषिकरण को बहुत बड़े स्तर पर प्रोत्साहित किया जाए।

सर्पगंधा की खेती की विधि 

सर्पगंधा एक बहुवर्षीय औषधीय पौधा है जिसकी खेती इसकी जड़ों की प्राप्ति के लिए की जाती है कई जगहों पर इसे दो वर्ष की फसल के रूप में लिया जाता है तथा कई जगहों पर 3-4 वर्ष की फसल के रूप में। इसी प्रकार विभिन्न स्थानों पर इसकी फसल से होने वाली प्राप्तियों में भी भिन्नता होती है। एक अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए इसकी कृषि तकनीक से संबंधित विकसित किए गए प्रमुख पहलू अपनाना होगा।

सर्पगंधा की फसल

सर्पगंधा की फसल की अवधि

सर्पगंधा बहुवर्षीय फसल है तथा इसे 2 माह से 5 वर्ष तक के लिए खेत में रखा जाता है। परन्तु इन्दौर में हुए शोध कार्यों से यह पता चलता है कि 18 माह की अवधि के उपरान्त फसल को उखाड़ लिया जाना चाहिए। हांलांकि यह भी पाया गया है कि जितने ज्यादा समय तक पौधा खेत में लगा रहेगा उसी के अनुरूप जड़ों की मात्रा में बढ़ोत्तरी होती जाएगी तथा दो साल की फसल की अपेक्षा तीन साल की फसल से ज्यादा उत्पादन नर्सरी में तैयार हो रहे सर्पगंधा के पौधे मिलता है, परन्तु अंतत: यह निष्कर्ष निकाला गया है कि इसकी खेती 30 माह अर्थात् ढाई वर्ष की फसल के रूप में की जाए जिससे एल्केलाइड भी पूर्णतया विकसित हो जाएं तथा उत्पादन भी अधिक हो। 

खेती के लिए उपयुक्त जलवायु 

भारतीय महाद्वीप का मूल निवासी पौधा होने के कारण सर्पगंधा की खेती हेतु भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु काफी उपयुक्त पाई जाती है। यूं तो ऐसे क्षेत्र जहां की जलवायु में ज्यादा उतार चढ़ाव न हों वे इसके लिए ज्यादा उपयुक्त हैं, परन्तु फिर भी देखा गया है कि यह 100 से लेकर 450 तक के तापमान में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। वैसे तो यह खुले क्षेत्रों में ज्यादा अच्छी प्रकार पनपता है परन्तु आंशिक छाया वाले क्षेत्रों में भी इसका अच्छा विकास होता है। ज्यादा पाले तथा सर्दी के समय इसके पत्ते झड़ जाते हैं तथा बसन्त आते ही पुन: नई कोपलें आ जाती हैं। यद्यपि जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए यह उपयुक्त नहीं है। परन्तु यदि 2-3 दिन तक जल भराव वाली स्थिति बनती है तो ऐसी स्थितियां यह सहन करने की क्षमता रखता है। प्रकृति रूप में तो यह 250 से 500 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी प्रकार उगता एवं बढ़ता देखा गया है। इस प्रकार सामान्य परिस्थितियों में सम्पूर्ण भारतीय महाद्वीप की जलवायु, ऊपरी उत्तरांचल, ऊपरी हिमाचल, कश्मीर तथा किन्हीं उत्तर पूर्वी राज्यों तथा राजस्थान एवं गुजरात के रेगिस्तान वाले क्षेत्रों को छोड़कर शेष भारत की जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। अभी वर्तमान में इसकी आपूर्ति मुख्यतया उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, आसाम, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल तथा महाराष्ट्र आदि राज्यों में हो रही है जो स्वाभाविक रूप से इसकी खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्र माने जा सकते हैं। कटिंग (कलम) से तैयार किया गया सर्पगंधा का पौधा।

 उपयुक्त मिट्टी 

सर्पगंधा की जड़ें भूमि में 50 सेंमी. तक गहरी जाती हैं अत: इसकी खेती ऐसी मिट्टियों में ज्यादा सफल हागी जिनमें जड़ों का सही विकास हो सके। इस दृष्टि से 6.5 पी.एच. वाली रेतीली दोमट तथा काली कपासिया मिट्टियां इसकी खेती के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं।

सर्पगंधा की उन्नत प्रजातियाँ 

सर्पगंधा की खेती से संबंधित जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय द्वारा काफी अच्छा कार्य किया गया हैं तथा विश्वविद्यालय द्वारा सर्पगंधा की एक उन्नत प्रजाति विकसित की गई है जिसे ‘‘आर.एस.1’’ का नाम दिया गया है। इस प्रजाति में सात माह पुराने बीजों में भी 50 से 60 प्रतिशत तक उगाव होना पाया गया है तथा इस प्रजाति में 10 क्विंटल प्रति एकड़ सूखी जड़ों का उत्पादन रिपोर्ट किया गया है। सर्पगंधा की इस प्रजाति के 18 माह के पौधों से प्राप्त जड़ों में 1.64 प्रतिशत से 2.94 प्रतिशत तक एल्कोलाइड होना पाया गया है।

बिजाई की विधि 

सर्पगंधा की बिजाई हेतु मुख्यतया तीन विधियां प्रचलन में हैं- 1. तने की कलम से प्रवर्धन, 2. जड़ों से प्रवर्धन, 3. बीजों से बिजाई करने की प्रक्रियाएं निम्नानुसार है-

तने की कलमो से प्रवर्धन :-इस विधि में सर्पगंधा की 6 से 9 इंच लम्बी ऐसी काट ली जाती हैं जिनमें कम से कम 3 नोड्स हो। इस सदर्भ में नर्म लकड़ी वाली कलमों की बजाय सख्त लकड़ी (हार्डवुड) वाली कलमें ज्यादा उपयुक्त रहती हैं। इन कलमों को 30 पी.पी.एम. वाले एन्डोल एसिडटिक एसिड वाले घोल में 12 घंटे तक डुबोकर रखने के उपरान्त इनकी बिजाई करने के अच्छे परिणाम देखे गए हैं। इस प्रकार इस घोल में इन कलमों को शोधित करने के उपरान्त इन्हें माह मई-जून में नर्सरी में लगा दिया जाता है। तथा नर्सरी में नमी बनाई रखी जाती है। यूं तो इनमें 3-4 दिन में उगाव प्रारंभ हो जाता है परन्तु ट्रांसप्लांटिंग के लिए पौधे लगभग 70-75 दिन में ही तैयार हो पाते हैं। प्राय: इस विधि से 40 से 65 प्रतिशत कलमों में ही उगाव हो पाता है।

जड़ों की कटिंग्स (रूट कटिंग्स)प्रवर्धन :- जड़ों की कटिंग्स से पौधों का प्रवर्धन तने की कटिंग्स की तुलना में ज्यादा सफल रहता है। इस विधि से एक से दो इंच लंबी टेप रूट्स की कटिंग्स को खाद, मिट्टी तथा रेत मिश्रित पौलीथीन की थैलियों में इन्हें इस प्रकार रखा जाता है कि पूरी कटिंग मिट्टी से दब जाए तथा यह मिट्टी से मात्र 1 से.मी. ही ऊपर रहे। इस प्रकार लगाई गई 50. प्रतिशत कटिंग्स लगभग एक माह के अंदर अंकुरित हो जाती है। परीक्षणों में देखा गया है कि इस प्रकार मार्च-जून माह में लगाई गई लगभग 0.5 डायमीटर की कटिंग्स में 50 से 80 प्रतिशत तक उगाव हो जाता है। इस प्रकार से बिजाई करने हेतु एक एकड़ की बिजाई करने के लिए लगभग 40 कि.ग्रा. रूट कटिंग्स की आवश्यकता होती है। हालांकि इस विधि से बिजाई करने पर तने की कलमों से बिजाई करने की अपेक्षा अधिक उत्पादन मिलता है परन्तु सर्वाधिक उत्पादन तो बीज से बिजाई करने पर ही प्राप्त होता है।

बीज से बिजाई करना : व्यवसायिक खेती की दृष्टि से सर्पगंधा के प्रवर्धन का सर्वोत्तम तरीका इसका बीजों से प्रवर्धन करना होता है, हालांकि बीजों से प्रवर्धन करने के रास्ते में सबसे बड़ी समस्या बीजों की उगाव क्षमता की है क्योंकि एक तो वैसे भी बीजों का उगाव कम (10 से 60) प्रतिशत ही होता है।, दूसरे बीज जितने पुराने होंगे उनकी उगाव क्षमता उतनी घटती जाएगी। वैसे यदि एकदम ताजे बीजों की बिजाई की जाए तो उगाव क्षमता ज्यादा रहती है तथा 6 माह से ज्यादा पुराना बीज नहीं लेना चाहिए।

बीज प्राप्त करने तथा इनका ऊपरी छिलका (काले रंग वाला आवरण) उतार लेने के उपरान्त इनको नर्सरी में तैयार किया जाता है। इसके लिए लगभग 9 इंच से 1 फीट ऊंची उठी हूई (रेज़्ड) बैड्स बना ली जाती हैं। इन बीजों को रात भर पानी में भिगोकर रखा जाता है तथा कुछ बीज जो पानी के ऊपर तैरते दिखाई देते हैं उन्हें निकाल दिया जाता है। बिजाई से पूर्व इन बीजों को थीरम (3 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से) उपचारित किया जाना उपयोगी रहता है। एक एकड़ की खेती के लिए लगभग 500 वर्ग फीट की नर्सरी पर्याप्त होती है। नर्सरी के बजाय बीजों को पोलीथीन की थैलियों में डालकर भी पौध तैयार की जा सकती है। नर्सरी अथवा पौलीथीन की थैलियों में हल्की नमी बनाकर रखना चाहिए। नर्सरी बनाए जाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय अप्रैल-मई माह का होता है। बीज से पौध तैयार करने में एक एकड़ के लिए 2 से 3 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। प्राय: 20 दिन के उपरान्त बीजों से उगाव होना प्रारंभ हो जाता है तथा उगाव की प्रक्रिया 50 दिन तक चलती है। नर्सरी में लगाए गए पौधों पर जब 4 से 6 तक पत्ते आ जाएं तो उन्हें सुविधापूर्वक उखाड़ करके मुख्य खेत में लगा दिया जाता है। मुख्य खेत में लगाने से पूर्व इन छोटे पौधों को गौमूत्र से उपचारित करना लाभकारी रहता है।

खेत की तैयारी 

सर्पगंधा की फसल को कम से कम दो वर्ष तक खेत में रखना होता है। अत: मुख्य खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान दिया जाना आवश्यक है। इसके लिए सर्वप्रथम खेत तैयार करते समय गहरी जुताई करके खेत में दो टन केंचुआ खाद अथवा चार टन कम्पोस्ट खाद तथा 15 किग्रा. बायोनीमा जैविक खाद प्रति एकड़ की दर से मिला दी जानी चाहिए। तदुपरान्त 45-45 सेमी. की दूरी पर खेत में 15 सेमी. गहराई के कुंड बना दिए जाते हैं।

सर्पगंधा के पौधे

कई बार बिना कुंड बनाए सीधे बजाई भी की जा सकती हैं। ऐसी स्थिति में खेत में खुरपी की सहायता से लगभग 6 इंच गहराई के गड्ढे बनाकर नर्सरी में तैयार किए गए पौधों को 30-30 सेमी. की दूरी पर रोपित कर दिया जाता है। इस प्रकार लगाए जाने पर लाइन से लाइन की दूरी 45-45 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 30-30 सेमी. रहती है। रोपण के तत्काल बाद पौधों को सिंचाई दे देनी चाहिए।

सिंचाई की व्यवस्था 

सर्पगंधा लम्बे समय (2 साल से अधिक) की फसल है अत: इसकी अच्छी बढ़त के लिए सिंचाई की व्यवस्था होना आवश्यक है किन्तु सिंचाई देने में ज्यादा उदारता नहीं बरतनी चाहिए तथा पौधों को तरसा-तरसा करके पानी देना चाहिए। यदि पौधे को किन्हीं निश्चित अंतरालों पर अपने आप पानी दे दिया जाए तो जड़ें पानी की तलाश में नीचे नहीं जाएंगी अर्थात् जड़ों का सही विकास नहीं हो पाएगा। अत: सर्पगंधा के पौधों की सिंचाई के संदर्भ में विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है तथा सिंचाई तभी की जानी चाहिए जब पौधों को इसकी वास्तविक आवश्यकता हो तथा पौधे लगभग मुरझाने से लग जाऐं।

सर्पगंधा के साथ अंर्तवर्तीय फसल 

सर्पगंधा की खेती जहां कई अन्य फसलों के साथ ली जा सकती है वहीं इसके बीज में कई अन्य औषधीय तथा अन्य फसलें भी ली जा सकती हैं। अंतर्वतीय फसल के रूप में इसके साथ सोयाबीन की कम फैलने वाली प्रजातियों की खेती काफी उपयुक्त रही हैं इसी प्रकार इसकी खेती बाइबिडंग तथा आंवला आदि जैसे बहुवर्षीय पौधों के साथ-साथ सफेद मूसली, कालमेघ तथा भुई आंवला आदि जैसे कम अवधि के औषधीय पौधों के साथ भी सफलतापूर्वक ली जा सकती है।

सर्पगंधा की फसल के प्रमुख रोग तथा बीमारियाँ 

सर्पगंधा की जड़ों पर कई प्रकार के कश्मि तथा नीमैटोड्स विकसित हो सकते हैं। जिससे जड़ों के ऊपर छल्ले जैसे बन जाते हैं। इनसे सुरक्षा सर्पगंधा की सूखी जड़े़ं के लिए प्रति एकड़ 15 कि.ग्रा. बायोनीमा भूमि में डालना लाभकारी रहता है। पौधों के पत्तों पर पत्ती लपेटने वाले कीड़ों (केटरपिलर्स) का प्रकोप भी हो सकता है जिसके लिए 0.2 प्रतिशत रोगोर का स्पे्र किया जा सकता है। इसी प्रकार सिरकोस्पोरा रावोल्फाई नामक फफूँद द्वारा पौधे की पत्तियों पर धब्बे डाले जाने की स्थिति में मानसून से पूर्व 0.2 प्रतिशत डायथेन जेड-78 अथवा डायथेन एम-45 का छिड़काव करना लाभकारी रहता है। इस ्रपकार यूं तो यह फसल बहुधा कीड़ों तथा बीमारियों के प्रकोप से मुक्त रहती है परन्तु फिर भी उपरोक्तानुसार वर्णित कुछ रोग फसल पर आ सकते हैं। जिनसे समय रहते सुरक्षा की जाना आवश्यक होती हैं। विभिन्न जैविक विधियों जैसे नीम की खली का घोल, जैविक कीटनाशकों जैसे बायोपैकुनिल तथा बायोधन का स्प्रे तथा गोमूत्र का छिड़काव भी फसल को विभिन्न बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करता है।

सर्पगंधा की सूखी जड़े़ं

फसल की वृद्धि तथा इसकी परिपक्वता 

रोपण के लगभग छ: माह के उपरान्त सर्पगंधा के पौधों पर फूल आने प्रारंभ हो जाते हैं जिन पर फिर फल तथा बीज बनते हैं। इस संदर्भ में यदि फसल के प्रारंभिक दिनों में बीज बनने दिए जाए तो जड़ों का विकास प्रभावित हो सकता है क्योंकि ऐसे में सारी खाद्य सामग्री (फूड मेटेरियल) फलों तथा बीजों को चली जाती है तथा जड़ें कमजोर रह सकती हैं। अत: पहली बार आने वाली फूलों को नाखून की सहायता से तोड़ दिया जाता है तथा आगे आने वाले फूलों, फलों तथा बीजों को फलने तथा बढ़ने दिया जाता है। इनमें से पके हुए फलों को सप्ताह में दो बार चुन लिया जाता है। यह सिलसिला पौधों को अंतत: उखाड़ने तक निरन्तर चलता रहता है। इसी बीच माह जून-जुलाई में प्रति एकड़ एक टन केंचुआ खाद तथा 15 कि.ग्राबाय ोनीमा जैविक खाद ड्रिलिंग करकें खेत में पौधों के पास-पास डाल दी जानी चाहिए।

जैसा कि पूर्व में वर्णित है, यूं तो सर्पगंधा की 18 माह की फसल में इसकी जड़ों में पर्याप्त तथा वांछित एल्केलाइड विकसित हो जाते हैं परन्तु पर्याप्त मात्रा में जड़ें प्राप्त करने के लिए इसे 2-3 अथवा 4 साल तक खेत में रखा जाता है। वैसे इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त अवधि 30 माह तक की है। अत: जब फसल 30 माह अथवा ढ़ाई वर्ष की हो जाए तथा सदी के मौसम में (दिसम्बर-जनवरी) में जब पौधों के पत्ते झड़ जाएं तब जड़ों को खोद लिया जाना चाहिए। वैसे भी जड़ों की हारवेस्टिंग सर्दी के समय करना ही ज्यादा उपयुक्त होता है क्योंकि उस समय इनमें एल्केलाइड्स की मात्रा अधिकतम होती है।

जड़ेंं उखाड़ने में विशेष सावधानियाँ 

सर्पगंधा की फसल के संदर्भ में इसकी जड़ों को उखाड़ने में कुछ विशेष सावधानियां रखने की आवश्यकता होती है। क्योंकि इसकी जड़ों की छाल में सर्वाधिक एल्केलाइड्स की मात्रा होती है तथा जड़ों का 40 से 55 प्रतिशत भाग इस छाल का ही होता है अत: यह विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि जड़ों को उखाड़ते समय इनके साथ लगी छाल को हानि न पहुंचे। अत: जड़ों को सावधानी पूर्वक उखाड़ा जाना चाहिए। जड़ों को उखाड़ने के लिए कुदाली का उपयोग भी किया जा सकता है तथा सब-सायलर का भी।

उखाड़ने से पूर्व खेत में एक हल्की सिंचाई कर दी जाए तो जड़ों को उखाड़ना आसान हो जाता है। उखाड़ने के उपरान्त जड़ों के साथ लगी रेत अथवा मिट्टी को सावधानी पूर्वक साफ करना आवश्यक होता है। यह भी यह ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि जड़ों की छाल को क्षति न पहुंचे। साफ कर लेने के उपरान्त इन्हें अच्छी प्रकार सुखाया जाता है। सुखाने के उपरान्त जड़ों में 8 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं बचनी चाहिए। सूखने पर ये जड़ें इतनी सूख जानी चाहिए कि तोड़ने पर ये ‘‘खट’’ की आवाज से टूट जाऐं। इन सूखी हुई जड़ों को सूखी जगह पर जूट के बोरों में रख कर संग्रहित कर लिया जाता है।

सर्पगंधा की खेती से कुल प्राप्तियां 

विभिन्न विधियों से लगाई जाने वाली सर्पगंधा की फसल से मिलने वाली जड़ों की मात्रा में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। इस संदर्भ में तने की कलमों की अपेक्षा जड़ की कलमों (रूट कटिंग्स) तथा जड़ की कलमों की अपेक्षा बीज से लगाई गई फसल में जड़ों की मात्रा ज्यादा पाई जाती है। इसी प्रकार यूं तो 18 माह की फसल में पर्याप्त तथा उपयुक्त एल्केलाइड्स विकसित हो जाते हैं। परन्तु इन्हें जितने ज्यादा समय तक खेत में लगा रहने दिया जाए उतनी ही उत्तरोत्तर जड़ों की मात्रा बढ़ती जाती है। परीक्षणों में यह पाया गया है कि दो वर्ष की फसल से प्रति एकड़ 880 किग्रा. तथा तीन वर्षा की फसल से 1320 किग्रा. सूखी जड़ें प्राप्त हुई हैं। इस प्रकार यदि 30 माह की फसल के अनुसार अनुमान लगाया जाए तो एक एकड़ से लगभग 1000 किग्रा. अथवा 10 क्विंटल सूखी जड़ों की प्राप्ति होगी। वैसे यदि 8 क्विंटल जड़ें भी प्राप्त हों तथा जड़ों की प्राप्ति हो तथा जड़ों की बिक्री दर 80 रू. प्रति किग्रा. मानी जाए तो इस फसल से किसान को लगभग 65000 रू. की प्राप्तियां होगी। इसके साथ-साथ किसान को लगभग 25 किग्रा. बीज भी प्राप्त होंगे जिसकी 1500 रू. प्रति कि.ग्रा. की दर से बिक्री भी मानी जाए तो इससे किसान को लगभग 35000रू. की अतिरिक्त प्राप्तियां होंगी। इस प्रकार इस 30 माह की फसल से किसान को लगभग 1 लाख रू. प्रति एकड़ की प्राप्तियां होंगी। इनमें से यदि विभिन्न कृषि क्रियाओं पर होने वाला 24000 रू. का खर्च कम कर दिया जाए तो सर्पगंधा की फसल से किसान को प्रति एकड़ 77500रू. का शुद्ध लाभ होने की संभावना है। 

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