शून्य आधार बजट क्या है? भारत में शून्य आधारित बजट कब पेश किया गया?

शून्य आधार बजट ऐसी नियोजन एवं बजट प्रक्रिया है जिसमें यह अपेक्षा की जाती है कि प्रत्येक प्रबन्धक को शून्य आधार से अपनी सम्पूर्ण बजट माँग को विस्तारपूर्वक न्यायसंगत ठहराना पड़ता है एवं वह मांग किये गये धन को क्यों व्यय करेगा, इसके औचित्य को भी सिद्ध करने का भार प्रत्येक प्रबन्धक पर डाल दिया जाता है। इस दृष्टिकोण से कि सभी क्रियाएँ ‘निणर्य संकुलों’ में विश्लेषित की जाती हैं जिनका व्यवस्थित विश्लेषण द्वारा मूल्यांकन किया जाता है तथा उन्हें महत्व के अनुसार क्रमबद्ध किया जाता है।

भारत में सर्वप्रथम 1985-86 में शून्य आधार बजट की अवधारणा को स्वीकार किया गया था। केन्द्र सरकार द्वारा इस शून्य आधार बजट को अपनाने के लिए समस्त विभागों को निर्देश दिये गये थें वर्ष 1986-87 में केन्द्र सरकार के सभी विभागों ने शून्य आधार बजट को स्वीकार किया। सामान्यतः भारत में शून्य आधार बजट में अनुत्पादक व्यय तथा अधिकारियों की लापरवाही ने अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ पैदा की लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत में शून्य आधार बजट की अत्यन्त आवश्यकता थी। भारत में शून्य आधार बजट के लिये निम्नलिखित तथ्यों पर विशेष जोर दिया गया। 
  1. बजट की मदों पर लागत-लाभ विश्लेषण करना।
  2. निष्क्रियता के स्थान पर सक्रिय मदों को स्थान देना। 
  3. उद्देश्यों की प्राप्ति के प्रयासों की सही-सही जानकारी प्राप्त करना।
  4. विकल्पों की खोज के साथ मितव्ययता को महत्व देना। 
  5. निर्णय सम्बन्धी पैकेज का डिजाइन तैयार करना तथा उसे क्रमबद्ध करना।

शून्य आधार बजट की परिभाषा

शून्य आधार बजट को अर्थशास्त्रियों द्वारा निम्नलिखित रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया है।

1. पीटर ए. पेर के शब्दों में “यह (ZBB) एक परिचालन नियोजन एवं बजट प्रक्रिया है जिसमें प्रत्येक प्रब्न्धक को अपनी सम्पूर्ण बजट मांगों का प्रारम्भ (शून्य आधार) से विस्तार में औचित्य सिद्ध करना होता है। प्रत्येक प्रबन्धक यह बतलाता है कि वह आखिर कोई धनराशि क्यों खर्च करे। इन विचारधारा के अनुसार सभी क्रियाएं निर्णय पैकेज में अभिव्यक्त की जाती है जिन्हें महत्व के अनुसार क्रम स्थान देकर सुव्यवस्थित विश्लेषण द्वारा मूल्यांकित किया जायेगा।” 

2. डेविड लिनिंजर रोलान्ड सी वॉग के अनुसार, “शून्य आधार बजट एक प्रबन्धकीय उपकरण है जो सभी चालू अथवा नवीन क्रियाओं एवं कार्यक्रमों के मूल्यांकन के लिए सुव्यवस्थित विधि प्रदान करता हैं। विवेकपूर्ण तरीके से बजट में कमी या विस्तार स्वीकृत करता है तथा निमन से उच्च प्राथमिकता वाले कार्यक्रमों में साधनों के पुन: आबंटन की स्वीकृति देता है।” 

3. आई.सी.एम.ए. शब्दावली के अनुसार, “यह बजट की एक विधि है जिसमें प्रत्येक समय जब कभी भी बजट बनाया जाता है, सभी क्रियाओं का पुन: मूल्यांकन किया जाता है। प्रत्येक क्रियात्मक बजट इस मान्यता पर प्रारम्भ किया जाता है कि वह क्रिया विद्यमान नहीं है और लागत शून्य है। लागत संवृद्धियों की तूलना लाभ संवृद्धियों से की जाती है ताकि, दी हुई लागतों पर नियोजित अधिकतम लाभ पराकाष्ठा पर पहुँच जाये।” शून्य आधार बजट के अन्तर्गत प्रबन्धक को यह निर्णय लेना पड़ता है कि वह व्यय क्यों करना चाहता है। विभिन्न मदों पर किये जाने वाले व्ययों की प्राथमिकता उसके निर्णय पर आधारित होती है।

4. जिमी कार्टर के शब्दों में, ‘‘शून्य पर आधारित बजटिंग में बजट को इकाइयों में रखा जाता है जिसे ‘निर्णय पैकेज’ कहा जाता है और जो प्रत्येक स्तर पर मैनेजर द्वारा तैयार किये जाते हैं। यह पैकेज विभाग की विद्यमान या प्रस्तावित क्रियाओं को पूर्ण करते हैं।’’

शून्य आधार बजट की विशेषताएं 

शून्य आधार बजटिंग की विशेषताएँ शून्य आधारित बतजटिंग की मुख्य विशेषतायें निम्नलिखित रूप में दी गयी हैं जो आपको शून्य आधार बजटिंग के विभिन्न आयामों तक पहुँचने में सहायक हो सकती हैं।
  1. शून्य आधार बजटिंग का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक व्ययों पर नियंत्रण करने से लगाया गया है ताकि सरकारी धन का अपव्यय न हो सके एवं उसका प्रयोग सार्वजनिक हित में हो सके। 
  2. शून्य आधार बजटिंग के अन्तर्गत पूर्ववर्ती कार्यक्रमों अथवा योजनाओं के आलोचनात्मक मूल्यांकन की व्यवस्था की गयी है जिसके आधार पर उस मद को बजट में यथास्थान दिलाया जा सके।
  3. यह बजट लागत-लाभ विश्लेषण पर आधारित है। इसलिये यह प्रयास किया जाता है कि किसी कार्यक्रम या मद पर आने वाली-लागत तथा उस मद से प्राप्त होने वाले सामाजिक हित के मध्य कम से कम अन्तर हो। 
  4. शून्य आधारित बजटिंग में किसी कार्यक्रम या योजना को अनिवार्य रूप से भविष्य में बनाये रखना आवश्यक नहीं होता है।
  5. इस प्रकार की बजटिंग प्रणाली के संचालन के लिए कुशल एवं ईमानदार कर्मचारियों एवं अधिकारियों की आवश्यकता है जो सभी अर्थव्यवस्थाओं में प्रायः सम्भव नहीं है। 
  6. शून्य आधार बजटिंग के लिए बजट बनाते समय पूर्व में संचालित मदों की पूर्ण एवं सही जानकारी होनी चाहिए ताकि उस मद के औचित्य को सही रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

शून्य आधार बजट के कदम 

  1. सर्वप्रथम बजट के उद्देश्यों का निर्धारण किया जाना चाहिए। उद्देश्य सुनिश्चित होने की ही स्थिति मेंं उन्हें प्राप्त करने के लिए प्रयास किया जा सकता है। अलग-अलग संस्थाओं के उद्देश्य भी अलग-अलग होते हैं। हो सकता है एक संस्था कर्मचारियों पर किये जाने वाले व्ययों में कटौती करना चाह सकती है, जबकि दूसरी संस्था एक परियोजना की जगह पर दूसरे को लागू करना चाह सकती है, इत्यादि। 
  2. किस परिस्थिति में और किस सीमा तक शून्य बजट को अपनाया जायेगा, का भी निर्धारण हो जाना चाहिए। 
  3. लागत एवं लाभ विश्लेषण भी किया जाना चाहिए। सर्वप्रथम उसी परियोजना को अपनाया जाना चाहिए जिससे लाभ की सम्भावना सर्वाधिक हो। लागत विश्लेषण से विभिन्न परियोजनाओं को अपनाये जाने की प्राथमिकता के निर्धारण में काफी मदद मिलती है।

शून्य आधार बजट के लाभ 

  1. विभिन्न क्रियाओं की प्राथमिकता के निर्धारण तथा उन्हें लागू करने में सहायता। 
  2. शून्य आधार बजट से प्रबन्ध की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इसके माध्यम से केवल उन्हीं क्रियाओं को अपनाया जायेगा जो व्यवसाय के लिए आवश्यक होती हैं। 
  3. शून्य आधार बजट से आर्थिक व व्यर्थ क्षेत्रों को पहचानने में मदद मिलती है। इसके आधार पर आर्थिक क्षेत्रों को छाँटकर भावी कार्यकलाप का निर्धारण किया जा सकता है। 
  4. प्रबन्ध साधनों का सर्वो़त्तम/अनुकूलतम प्रयोग करने में सफल हो सकते हैं। किसी मद पर व्यय तभी किया जायेगा जब यह आवश्यक होगा अन्यथा नहीं। 
  5. शून्य आधार बजट उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होता है जिनका उत्पाद, उत्पादन से सम्बन्धित नहीं हो। इस विधि से व्यवसाय की प्रत्येक क्रिया की उपयुक्तता के भी निर्धारण में सहायता मिलती है। 
  6. शून्य आधार बजट व्यवसाय के लक्ष्यों से भी सम्बन्धित होगा। केवल वे ही चीजें (क्रियाएं) स्वीकार की जायेंगी जिनसे संस्था के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। 

शून्य आधार बजट की सीमाएँ 

  1. शून्य आधार बजट का सफल क्रियान्वयन तभी किया जा सकता है जबकि उच्च प्रबन्धक वर्ग का खुले दिल से सहयोग प्राप्त हो। 
  2. जिन संस्थाओं के साधन सीमित होते हैं, उनके लिए इस प्रणाली को लागू करना सम्भव नहीं होता है। 
  3. इस प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या निर्णय पैकेज के निर्धारण एवं क्रम स्थान प्रदान करने की है। यह क्रम कौन प्रदान करेगा? कैसे प्रदान करेगा ? तथा किस सीमा तक क्रियान्वयन होगा ? आदि जटिल समस्याएँ हैं।

शून्य आधार बजटिंग की कठिनाइयाँ

 शून्य आधार बजटिंग के निर्माण एवं क्रियान्वयन में अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं जिन्हें निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। 

(i) शून्य आधारित बजट के अन्तर्गत कार्यक्रमों एवं योजनाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन उसी विभाग एवं मंत्रालय के अधिकारियों एवं प्रभारियों द्वारा किया जाना होता है जिसके अन्तर्गत यह कार्यक्रम या योजनायें संचालित हैं। ऐसी स्थिति में स्वमूल्यांकन उनके विरूद्ध नहीं जा सकता है। इसीलिये पूर्ववर्ती मदों को ही आधार बनाना आवश्यक हो जाता है जो शून्य आधार बजट की संकल्पना के अनुकूल नहीं है। 

(ii) शून्य आधारित बजट के निर्माण एवं क्रियान्वयन के लिए ईमानदार एवं पूर्ण कुशल अधिकारियों एवं कर्मचारियों की आवश्यकता है जो प्रायः सभी देशों में सम्भव नहीं है। इसके साथ बजट का प्रत्येक चरण एक तकनीकी प्रशिक्षण पर आधारित होता है इसके लिये सम्बन्धित कर्मचारियों को पूर्ण प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी जो स्वयं में ही एक समस्या बन जाती है। 

(iii) शून्य आधारित बजटिंग मितव्ययता एवं पूर्ण नियंत्रणात्मक सार्वजनिक व्यय पर आधारित है जो प्रजातांत्रिक एवं सत्तालोलुप सरकारों द्वारा समभव नहीं हो सकता है। आपको यहाँ विदित हो कि प्रजातांत्रिक सरकारें जनता को खुश करने के लिये अपव्यय तथा गैर नियंत्रणात्मक व्ययों का सहारा लेती हैं। 

(iv) विकाशील तथा पिछडे़ देशों में शून्य आधारित बजटिंग की प्रणाली कारगर सिद्ध नहीं हो सकती क्योंकि यहाँ पर बजट प्रणाली में लचीलापन अत्यन्त ही आवश्यक समझा गया है जो शून्य आधारित बजट के विपरीत है।

संदर्भ -
  1. भाटिया एच0एल0 (2006), लोकवित्त (Public Finance), विकास पब्लिषिंग हाउस प्रा0 लि0, जंगपुरा, नई दिल्ली।
  2. पंत, जे0सी0 (2005), राजस्व (Public Finance), लक्ष्मीनारायन अग्रवाल, पुस्तक प्रकाशक एवं विक्रेता, अनुपम प्लाजा, संजय प्लेस, आगरा।
  3. जे0सी0 (1997), राजस्व (Public Finance), साहित्य भवन पब्लिकेषन्स, हास्पीटल रोड, आगरा।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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