आरक्षण क्या है?

अनुक्रम
किसी भी समाज राजनीतिक ढांचा उस समाज की प्रकृति से प्रभावित होता है। समाज की प्रकृति को समझने के लिये हमें समाजिक संरचना को समझना होगा। भारतीय सामाजिक संरचना को जाति प्रथा के रूप में अच्छी तरह से समझा जा सकता है जहां जाति के अंतर्गत प्रचीन वर्णाश्रम व्यवस्था सन्निहित है। कई वर्षो तक जाति व्यवस्था का विकास समाज में सामाजिक आर्थिक असमानता को बनाए रखने के लिये होता रहा। यदि कोई व्यक्ति किसी छोटी जाति में उत्पन्न होता था तो उसे बडी़ जातियों द्वारा परेशान किया जाता था और उसे अन्य अनेक सुविधाओ से वंचित होना पडता था। दलितो की हालत बदतर थी। छूआछूत के व्यवहार से उनकी दशा और भी खराब हो गई। परंपरागत वर्णव्यवस्था के अंतर्गत चार वर्ण आते है: ब्राम्हण (पुजारी और शिक्षित वर्ग), क्षत्रिय (योद्धा और शासक वर्ग), वैश्य (व्यापारी एवं वणिक वर्ग) और शुद्र (जो तुच्छ और प्रदूषण युक्त कार्य करते थे)। यहां हमें यह समझ लेना चाहिए कि वर्ण व्यवस्था, जातीय वास्तविकता के बजाए ज्यादा सैद्धांितक है। वास्तव में चार ही जातियो का वर्गीकरण वर्ण पर आधारित किया जा सकता है। हालांकि ऐसा करना सामाजिक संरचना के अंतिम छोर पर आसान होता है, न कि मध्य मे दूसरे शब्दो में, वर्ण व्यवस्था जाति संबधित है।

जाति एक स्थानीय समूह होता है जो किसी व्यवसाय विशेष से पाम्परिक रूप से जुडा होता है। जन्म का सिद्धांत जातिगत समुदायो में सदस्यता का एकमात्र आधार है अथार्त व्यवसाय का चुनाव स्वतंत्र न होकर किसी जाति में जन्म लेने के आधार पर निर्धारित होता है। इसके अलावा अन्य जाति समुदायो के अपने खान पान एवं विवाह संबंधी नियम होते है। समूह ही अपने सदस्यो के रहन सहन के नियम बनाता है। जो इनके नियम नहीं मानते उन्हे जाति बिरादरी से निकाले जाने का भी अधिकार समुदाय के पास होता है। आधुिनक विचार धाराओ एवं संस्थाओ की दृष्टि से जातिगत पहचान मजबतू हुई है। स्वतंत्रता आंदोलन से पूर्व,इसके दौरान और बाद में यह राजनीतिक लामबन्दी का एक हथियार बनने के कारण ऐसा संभव हुआ। 19 वीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक आंदोलन ने निम्न जातियो को उनकी खराब हालत के प्रति सचेष्ट किया और वे अपने अधिकारो के प्रति जागरूक भी हुए जिनसे उन्हे सदियो से वंचित रखा गया था। परिणामत: उनमें से अनेक अपनी दुर्दशा को भाग्य की देन मानने को तैयार नही थे। इस जागरूकता के फलस्वरूप शासन में लोकतांत्रिक सिद्धांतो का लागू होना दल केन्द्रित राजनीति का उदय तथा ब्रिटिश शासको द्वारा मुसलमानो सहित पिछड़ी जातियां एक ताकत बन चुकी थी। उनकी मांगे एवं हित अधिक दिनो तक टाले नही जा सकते थे। उसी समय राष्ट्रवादी नते ाओ ने भी उनकी दशा सुधारने का बीड़ा उठाया। उपर्युक्त के सदंर्भ में, संविधान निर्माताओ ने भी सकारात्मक रवैया अपनाते हएु इन्हे समाज में दूसरे के समान स्थान दिलाने का प्रयास किया। उन्होने समझा कि राज्य की सहायता के बिना उनके ऐतिहासिक पिछडेपन को दूर नहीं किया जा सकता। इसलिए संविधान में आरक्षण की नीति लाई गई। पिछडे वर्गो के अंतर्गत निम्न तीन वर्ग आते है- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछडी जातियां (ओबीसी)

स्वतंत्रता के बाद जाति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाना शुरू किया। राजनीति में इसकी भूमिका अधिक बढ गई। सच्चाई यह है कि आसानी से पहचान में आने वाले सामाजिक समूह के रूप में इसकी स्थिति ने राजनीतिक दलो को इनके वोट आरै समर्थन प्राप्त करने के लिए जातियों को राजनीतिक लामबन्दी का विषय बना दिया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति में जाति के मुददे को दो कारको से विशेष ध्यान ।

आरक्षण नीति 

मूल आधार

पिछडे वर्गो के पिछडेपन को देखते हुए संविधन में उनके उत्थान के लिए कुछ विशेष प्रावधान किए गए है। विशेष प्रावधान संरक्षणात्मक भेदभाव के रूप में है। आरक्षण की नीति एक संरक्षणात्मक विभेदी करण है। आरक्षण नीति एवं इसके संवैधानिक संरक्षात्मक प्रावधान जानने से पहले आइए, पिछडी जातियो के लिये संवैधानिक प्रावधानो को जाने। नीति निर्देशक सिद्धांत के अध्याय के अंतर्गत धारा 38 और 46 में कहा गया है कि राज्य का यह कर्तव्य है कि वह जन साधारण के सामान्य और पिछडी जातियों के लिये विशेष कल्याण का ध्यान रखे। -

धारा 38 के अनुसार- (1) राज्य को चाहिए कि वह जनता की भलाई एवं कल्याण के लिये उसके सामाजिक, आर्थिक स्तर की असमानता को कम करने का प्रयास करे। (2) राज्य विशेष रूप से आर्थिक स्तर की असमानता को कम करने का प्रयास करे साथ ही आर्थिक असमानता को दूर दराज के क्षेत्रो में रहने वाले विपरीत परिस्थितियों में रहने वाले विपरीत परिस्थितियों में रहने वाले लोगो के लिए कम किया जा सके। धारा 46 के अनुसार’’ राज्य का दायित्व है कि वह गरीब तबके के लोगो को शैक्षिक, आर्थिक स्तर पर जागरूकता लाकर उनका संवर्धन करेगा। राज्य विशेषत: अनुसुचित जाति एवं जनजातियो को शोषण से मुक्त करके न्यायिक संरक्षण प्रदान करेगा।’’ अनुसूचित जाति और जनजातियो के लिए आरक्षण संविधान ने पिछडी जातियो की तीन तरह से पहचान की है। इस अनुभाग में हम अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियो के लिये सरंक्षात्मक प्रावधानो की चर्चा करेंगे। संविधान ने अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजातियों के बारे में तीन तरह के प्रावधान सुनिश्चित किए है-
  1. सार्वजनिक एवं सरकारी सेवाओ में नौकरियो के लिये आरक्षण 
  2. शिक्षण संस्थाअेा में आरक्षण और 
  3. विधायी प्रतिनिधित्व में आरक्षण धारा 16 (अ) 320 (4) और 333 के अनुसार 15 प्रतिशत और 7 प्रतिशत नौकरियो में आरक्षण सभी प्रकार की सरकारी सेवाओ में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए होगा। धारा 35 में यह व्यवस्था है कि प्रशासनिक स्तर पर भी यह आरक्षण सुनिश्चित होगा। 
धारा 15(4) शिक्षण संस्थानो की सीटो से सबं दध है। इस धारा के अनुसार राज्य को धारा 15 या धारा 29 के उपबंध में किसी तरह का संशोधन करके सामाजिक रूप से पिछडे वर्गो के शैक्षिक रूप से पिछडे या अनुसूचित जाति एव जनजाति के लिये कुछ अधिक करने का प्रावधान है। जैसा कि संघ एवं राज्य सरकार ने पहले से ही उन शैक्षिक संस्थाओ- जो जनता के धन से संचालित है वहां 25 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर रखी है। इसलिए उनकी योग्यता में भी शिथिलता रखी गई है। इससे उन्हे शिक्षा के क्षत्रे में अनेक अवसर प्राप्त हो सकेंगे। धारा 330 और 332 के अंतर्गत लोकसभा एवं विधानसभा में सीटो जनजातियों के लिये आरक्षित है। राज्यों की विधानसभा सीटो में कुल 540 अनुसूचित जातियों के लिए तथा 282 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित है। इसके अलावा पंचायती राज संस्थाओ के लिए भी इसी प्रकार सींटे आरक्षित है।

अन्य पिछडी जातियोंं के लिये आरक्षण 

जैसा कि हमने पहले पढ़ा है कि अन्य पिछड़ी जातियों की पहचान करने तथा सुनिश्चित करने का काम केन्द्र तथा राज्य सरकारो पर छोड़ दिया था। ऐसो कई राज्यों में जहाँ पिछडे वर्गो का आंदोलन मजबूत था जैसे तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, गुजरात, बिहार इत्यादि में राज्य सरकारो ने लोक सेवाओ के सभी सतरो पर नौकरियो को तथा शिक्षण संस्थाओ में सीटो को आरक्षित कर दिया है। केन्द्र सरकार ने केन्द्रीय सेवाओ में आरक्षण प्रदान करने में अपेक्षाकृत अधिक लम्बा समय लिया। केन्द्रीय सरकार ने 1953 में अनुच्छेद 340 के अंतर्गत केलकर आयोग नियुक्त किया था। आयोग ने 1956 में अपनी रिर्पोट सौंपी परंतु सरकार ने इसकी सिफारिशो को लागू नहीं किया। दूसरा आयोग जनता पार्टी की सरकार द्वारा 1978 में नियुक्त किया गया। इस आयोग को मण्डल आयोग कहा गया जिसने अपनी रिपाटेर् 1982 में सरकार को सौंप दी। इसने 3943 जातियों की पिछडी जाति के रूप में पहचान की तथा सिफारिश की कि सभी सरकारी और अर्द्ध सरकारी नौकरियों में तथा शिक्षण संस्थाओ में इन जातियो को 27 प्रतिशत आरक्षण पद्रान किया जाए।

13 अगस्त 1990 को वी. पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिश के अनुरूप एक कार्यालयी ज्ञापन जारी कर अन्य पिछडी जातियो के लिये आरक्षण लागू कर दिया। इसके तुरंत बाद बडी मात्रा में विरोध प्रदर्शन हएु । सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दाखिल की गई तथा उच्च न्यायालये ने दइस कायर्वाही पर प्रश्न उठाए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय पर नवम्बर 14992 मे सुनवाई की तथा केन्द्र सरकार को इस शर्त पर अन्य पिछडी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की अनुमति दी कि अन्य पिछड़ी जातियो की क्रीमी लेयर को इस आरक्षण से बाहर रखा जाए। केन्द्रीय सरकार द्वारा क्रीमी लेयर की पहचान करने के लिये रामानंद पस्राद आयोग का गठन किया गया। इसका काम पूरा होने के बाद सरकार ने 13 अगस्त 1990के आदेश को सितंबर 1993 से लागू किया। इस प्रकार हम देख सकते है कि कने द्रीय सरकार ने अन्य पिछड़ी जातियो को आरक्षण का लाभ अेने के लिए 40 वर्ष का समय लिया। इतना ही समय सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गो की पहचान के लिए जाति को एक सही आधार स्वीकार करने में लिया गया। हमें यहां यह ध्यान भी रखना होगा कि अन्य पिछड़ी जातियो को आरक्षण का लाभ कवे ल सरकारी नौकरियो में ही दिया गया है और उनके लिए लाके सभा तथा राज्य विधान सभाओ में कोई स्थान आरक्षित नहीं किया गया है जैसा कि अनुसूचित जातियो और अनुसूचित जनजातियो के लिए किया गया है।

महिलाओ के लिए आरक्षण का महत्व 

महिलाएं भारत की जनसंख्या का लगभग आधा भाग है। लेकिन भारत में अशिक्षा, गरीबी और पिछड़े सामाजिक मूल्यों के कारण महिलाओं की स्थिति सोचनीय है। पच्रलित परिस्थितियों के दृष्टिगत महिलाओं को घर की चारदीवारी से बाहर निकाल कर उन्नति के रास्ते पर लाने के लिए महिलाओ के लिए आरक्षण शुरू किया गया। भारतीय लोकतत्रं में प्रत्येक प्रतिनिधिक संस्था तथा राज्य की प्रशासनिक सेवाओ में महिलाओ के लिए आरक्षण के लिए बहस जारी है। पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत महिलाओ के लिए पंचायत, बुलाक एव जिला स्तर पर सीटो को आरक्षित कर दिया गया है। कुछ राजनीतिक दल राज्य विधान सभाओ तथा संसदीय चुनावो में 30 प्रतिशत टिकटो पर महिला प्रत्याशियों को चुनाव लडवाने की बहस चला रहे है। परंतु महिला आरक्षण विधेयक अभी तक संसद में लटका पडा है।

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