मौलिक अधिकार का अर्थ, महत्व, प्रकार एवं विशेषताएँ

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अनुक्रम

मौलिक अधिकार का अर्थ एवं महत्व 

मौलिक अधिकार वे अधिकार होते है जो व्यक्ति के जीवन के लिए मौलिक
एवं आवश्यक होने के कारण संविधान के द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते है।
मौलिक अधिकार के महत्व के संबंध में डॉ. अम्बेडकर का यह कथन उल्लेखनीय है-
‘‘यदि मुझसे कोई प्रश्न पूछे कि संविधान का वह कौन सा अनुच्छेद
है जिसके बिना संविधान शुन्यप्राय हो जायेगा तो इस अनुच्छेद 32 को
छोड़कर मैं किसी और अनुच्छेद की ओर संकेत नहीं कर सकता यह
संविधान की हृदय एवं आत्मा है।’’ श्री ए.एन.पालकीपाल ने कहा है- ‘‘मौलिक अधिकार राज्य के निरंकुश स्वरूप से साधारण नागरिकों की रक्षा करने वाला कवच है।’’ न्यायाधीश के. सुब्बाराव के अनुसार – ‘‘परम्परागत प्राकृतिक अधिकारों का दूसरा नाम मौलिक अधिकार है।’’

मौलिक अधिकार की विशेषताएँ 

राष्ट्रीय आंदोलन के भावना के अनुकूल 

भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के समय भारतीय नेताओं ने
अंग्रेजों के समझ बार-बार अपने अधिकारों की मांग रखी थी
स्वतंत्रता के पश्चात् सौभाग्यवश भारतीय संविधान सभा के लिये
राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बहुमत में निर्वाचित हुए थे जिन्होंने
स्वतंत्रता आंदोलन के समय की अपनी पुरानी मांग को भारतीय
संविधान में सर्वोपरी प्राथमिकता देते हुए मौलिक अधिकारों की
व्यवस्था की।

सर्वाधिक विस्तृत एवं व्यापक अधिकार 

भारतीय संविधान के तृतीय भाग में अनुच्छेद 12 से 30 और
32 से 35 तक मौलिक अधिकारों का वर्णन है। जो अन्य देशों के
संविधानों में किये गये वर्णन की तुलना में सर्वाधिक है।

व्यावहारिकता पर आधारित 

भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के सिद्धांत
न होकर व्यावहारिक और वास्तविकता पर आधारित है। किसी
भेदभाव के बिना समानता के आधार पर सभी नागरिकों के लिए
इनकी व्यवस्था की गयी है। साथ ही अल्पसंख्याकों, अनुसूचित
जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं पिछड़ा वगोर्ं की उन्नति एवं
विकास के लिए विशेष व्यवस्था भी की गयी है।

अधिकारों के दो रूप 

मौलिक अधिकारों के सकारात्मक एवं नकारात्मक दो रूप
है। सकारात्मक स्वरूप में व्यक्ति को विशिष्ठ अधिकार प्राप्त होते
हैं। स्वतंत्रता धर्म शिक्षा और संस्कृति आदि से संबंधित अधिकारों
को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। इस प्रकार सकारात्मक
अधिकार सीमित एवं मर्यदित है। नकारात्मक स्वरूप में वे अधिकार
आते हैं जो निसेधाज्ञाओं के रूप में है और राज्य की शक्तियों को
सीमित एवं मर्यदित करते हैं। इस प्रकार नकारात्मक अधिकार
असीमित है।

 मौलिक अधिकार असीमित नहीं 

भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दिये गये मौलिक
अधिकार असीमित नहीं है। इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सामाजिक
हित में सीमित करने की व्यवस्था की गयी। लोक कल्याण, प्रशासनिक
कुशलता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए मौलिक अधिकारों पर
प्रतिबंध भी लगाये जा सकते है। संसद ने सन् 1979 में 44 वें
संविधान द्वारा संपत्ति के मौलिक अधिकार को लेकर केवल एक
कानूनी अधिकार बना दिया है।

सरकार की निरंकुशतापर अंकुश

मौलिक अधिकार प्रत्येक भारतीय नागरिक की स्वतंत्रता के
द्योतक और उसकी भारतीय नागरिकता के परिचायक हैं। संविधान
द्वारा इनके उपयोग का पूर्ण आश्वासन दिया गया है। अत: किसी
भी स्तर की भारत सरकार मनमानी करते हुए उन पर अनुचित रूप
से प्रतिबंध नहीं लगा सरकार, जिला-परिषद्, नगर निगम या ग्राम
पंचायतें आदि समस्त निकाय मौलिक अधिकारों का उल्लंधन नहीं
कर सकतीं।

राज्य के सामान्य कानूनों से ऊपर

मौलिक अधिकार को देश के सर्वोच्च कानून अर्थात्
संविधान में स्थान दिया गया है और साधारणतया संविधान
संशोधन प्रक्रिया के अतिरिक्त इनमें और किसी प्रकार से परिवर्तन
नहीं किया जा सकता। इस प्रकार मौलिक अधिकार संसद और
राज्य-विधानमण्डलों द्वारा बनाये गये कानूनों से ऊपर है। संघीय
सरकार या राज्य-सरकार इनका हनन नहीं कर सकती। ‘गोपालन
बनाम मद्रास राज्य’ विवाद में न्यायाधीश श्री पातंजलि शास्त्री
ने कहा था – ‘‘मौलिक अधिकारों की सर्वश्रेष्ठ विशेषता यह है कि
वे राज्य द्वारा पारित कानूनों से ऊपर हैं।’’

न्यायालय द्वारा संरक्षण 

मौलिक अधिकार पूर्णतया वैधानिक अधिकार हैं। संविधान
की व्यवस्था के अनुसार मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए
भारतीय न्यायपालिका को अधिकृत किया गया है। संविधान के
अनुच्छेद 32 के अनुसार, भारत का प्रत्येक नागरिक अपने मौलिक
अधिकारों की रक्षा के लिए उच्च न्यायालयों या सार्वोच्च न्यायालय
की शरण ले सकता है। मौलिक अधिकारों को अनुचित रूप में
प्रतिबंधित करने वाले कानूनों को न्यायपालिका द्वारा अवैध घोषित
कर दिया जाता है। चूंकि भारतीय न्यायपालिका, कार्यापालिका
और व्यवस्थापिका के नियंत्रण से मुक्त है, इसलिए मौलिक
अधिकारों की रक्षा के लिए वह संविधान द्वारा दिये गये संवैधानिक
उपचारों के अधिकार के अतंर्गत आवश्यक निर्देश भी निर्गत कर
सकती है।

भारतीय नागरिकों तथा विदेशियों में अंतर

भारतीय नागरिकों तथा भारत में निवास करने वाले विदेशी
नागरिकों के लिए संविधान द्वारा दिये गये मौलिक अधिकारों में
अंतर है। मौलिक अधिकारों में कुछ अधिकार ऐसे हैं, जो भारतीयों
के साथ-साथ विदेशियों को भी प्राप्त हैं, जैसे- जीवन तथा
व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, परन्तु शेष अधिकार केवल भारतीय
नागरिकों के लिए ही सुरक्षित हैं। इस प्रकार भारतीय नागरिकों को
प्राप्त समस्त मौलिक अधिकारों का उपभोग विदेशी नागरिक नहीं
कर सकते।

मौलिक अधिकार के प्रकार 

भारत संविधान में सात मौलिक अधिकार वर्णित थे। यद्यपि वर्ष 1976 में
44वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकारों की सूची में से संपत्ति का अधिकार
हटा दिया गया था। तब से यह एक कानूनी अधिकार बन गया है। अब कुल छ:
मौलिक अधिकार है।

  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18) 
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22) 
  3. शोषण के विरूद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24) 
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28) 
  5. सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30) 
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32) 

समानता का अधिकार

भारतीय समाज के व्याप्त असमानताओं एवं विषमताओं को
दूर करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में समानता के
अधिकार का उल्लेख किया गया है।

  1. विधि के समक्ष समानता –
    अनुच्छेद 14 के अनुसार ‘‘भारत राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति
    को विधि के समक्ष समानता से वंचित नहीं किया जावेगा। आशय
    कानून की दृष्टि से सब नागरिक समान है।
  2. सामाजिक समानता –
    अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य किसी नगरिक के विरूध धर्म
    वंश जाति लिंग जन्म स्थान आदि के आधार पर नागरिकों के प्रति
    जीवन के किसी क्षेत्र में पक्षपात नहीं किया जावेगा।
  3. अवसर की समानता –
    अनुच्छेद 16 की व्यवस्था के अनुसार राज्य की नौकरियों के
    लिए सभी को समान अवसर प्राप्त होंगे।
  4. अस्पृश्यता का अंत –
    अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया
    है। किसी भी दृष्टि में अस्पृश्यता का आचरण करना कानून दृष्टि में
    अपराध एवं दण्डनीय होगा।
  5. उपाधियों का अंत –
    अनुच्छेद 18 के अनुसार ‘‘सेना अथवा शिक्षा संबंधी
    उपाधियों के अलावा राज्य अन्य कोई उपाधियाँ प्रदान नहीं कर
    सकता। 

समानता के अधिकार के अपवाद – 

  1. सामाजिक समानता में सबको समान मानते हुए भी राज्य
    स्त्रियों तथा बच्चों को विशेष सुविधाएं प्रदान कर सकता है और
    इसी प्रकार राज्य सामाजिक तथा शिक्षा की दृष्टि से पिछडे़ वर्गों,
    अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए
    विशेष नियम बना सकता है। 
  2. सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों
    और अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए कुछ स्थान सुरक्षित
    कर दिये गये हैं तथा राज्य द्वारा जन्म-स्थान एवं निवास-स्थान
    तथा आयु संबंधी योग्यता का निर्धारण किया जा सकता है। 
  3. संविधान में उपाधियों की व्यवस्था न होते हुए भी देश में सन् 1950
    से भारत रत्न, पद्म विभूषण और पद्म श्री आदि उपधियां भारत
    सरकार द्वारा प्रदान की जाती हैं। सन् 1977 में जनता पार्टी के
    सत्तारूढ़ होने पर इन उपाधियों का अंत कर दिया गया है और
    साथ ही उपाधि प्राप्त व्यक्तियों द्वारा उपाधियों का प्रयोग को
    प्रतिबन्धित भी कर दिया गया था, परंतु 24 जनवरी 1980 से इंद्रिरा
    काँग्रेस द्वारा भारत रत्न तथा अन्य उपाधियों एवं अलंकरणों को पुन:
    प्रारंभ कर दिया गया था। 

स्वतंत्रता का अधिकार 

स्वतंत्रता एक सच्चे लोकतत्र की आधारभूत स्तंभ होती है।
संविधान के अनुच्छेद 19 से 22 तक इन अधिकारों का उल्लेख है।

  1. विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता –
    अनुच्छेद 19 के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक को
    भाषण लेखन एवं अन्य प्रकार से अपने विचार व्यक्त करने का
    अधिकार है।
  2. शांतिपूर्व एवं नि:शस्त्र सभा करने की स्वतंत्रता –
    अनुच्छेद 19 के अनुसार प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग
    से बिना हथियारों के सभा या सम्मेलन आयोजित करने का
    अधिकार है।
  3. समुदाय और संघ बनाने की स्वतंत्रता –
    भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को समुदाय और संघ
    बनाने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। 
  4. भ्रमण की स्वतंत्रता –
    प्रत्येक भारतीय को को संपूर्ण भारत में बिना किसी रोकटोक
    के भ्रमण करने तथा निवास की स्वतंत्रता है।
  5. अपराध के दोष सिद्ध के विषय में संरक्षण की स्वतंत्रता-
    संविधान के अनुच्छेद 20 अनुसार कोई भी व्यक्ति अपराध के
    लिए तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि वह किसी
    ऐसे कानून का उल्लंधन न करे जो अपराध के समय लागू था और
    वह उससे अधिक दण्ड का पात्र न होगा। 
  6. जीवन और शरीर रक्षण की स्वतंत्रता –
    संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को अपने
    प्राण या शारीरिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को
    छोड़कर अन्य किसी से वंचित नहीं किया जा सकता। 
  7. बंदीकरण से संरक्षण की स्वतंत्रता –
    संविधान के अनुच्छेद 22 के द्वारा बंदी बनाये जाने वाले
    व्यक्ति को कुछ संवैधानिक अधिकार प्रदान किये गये है। इसके
    अनुसार कोई भी व्यक्ति को बंदी बनाये जाने के कारण बतायें बिना
    गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया जा सकता है। उसे यह
    अधिकार है कि वह अपनी पसंद के वकील की राय ले सकता है,
    मुकदमा लड़ सकता है। अभियुक्त को 24 घण्टें के अंदर निकटत्म
    दण्डाधिकारी के सामने प्रस्तुत किया जाना होता है। 

स्वतंत्रता के अधिकार के अपवाद 

  1. स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है। राष्ट्रीय हित
    और सार्वजनिक हित की दृष्टि से संसद कोई भी नियम बनाकर
    स्वतंत्रता के अधिकार को सीमित कर सकती है। 
  2. सिक्खों को
    उनके धर्म के अनुसर कटार धारण करने सभा या सम्मेलन आयोजित
    करने का अधिकार दिया गया है। 
  3. कोई भी नागरिक ऐसे समुदाय
    या संघ का संगठन नहीं कर सकता, जिसका उद्देश्य राज्य के कार्य
    में बाधा उत्पन्न करना हो 
  4. अनुच्छेद 22 के द्वारा प्रदान किये गये
    अधिकार शत्रु-देश के निवासियों पर लागू नहीं होते। 

शोषण के विरूद्ध अधिकार 

संविधान के अनुच्छेद 23 व 24 के अनुसार कोई व्यक्ति
किसी अन्य व्यक्ति का शोषण नहीं कर सकेगा। इस संबंध में निम्न
व्यवस्थाएं की गयी है- 
  1. मनुष्यों का क्रय-विक्रय निषेध –
    संविधान के अनुच्छेद 32 (1) के अनुसार मनुष्यों, स्त्रियों और
    बच्चों के क्रय-विक्रय को घोर अपराध और दण्डनीय माना गया है।
  2. बेगार का निषेध –
    संविधान के अनुच्छेद 24 के अनुसार, 14 वर्ष से कम आयु
    वाले बालकों को कारखानों अथवा खानों में कठोर श्रम के कार्यों के
    लिए नौकरी में नहीं रखा जा सकेगा। 

शोषण के विरूद्ध अधिकार का अपवाद 

इस अधिकार की व्यवस्था में सार्वजनिक उद्देश्य से अनिवार्य
श्रम की कोई योजना लागू करने का राज्य को अधिकार है। वस्तुत:
शोषण के विरूद्ध अधिकार का उद्देश्य एक वास्तविक सामाजिक
लोकतंत्र की स्थापना करना है। 

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार 

धार्मिक स्वतंत्रता का अभिप्राय यह है कि किसी धर्म में
आस्था रखने या न रखने के बारे में राज्य कोई हस्ताक्षेप नहीं
करेगा। संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक भारत के सभी नागरिकों
के लिए धार्मिक स्वतंत्रता की व्यवस्था की गयी है। इस अधिकार के
अंतर्गत निम्नलिखित स्वतंत्रताएं प्रदान की गयी हैं- 
  1. धार्मिक आचरण एवं प्रचार की स्वतंत्रता –
    संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसारप्रत्येक व्यक्ति
    को अपने अत:करण की मान्यता के अनुसार किसी भी धमर् को अबाध
    रूप में मानने, उपासना करने आरै उसका प्रचार करने की पूर्ण
    स्वतंतत्रता है। 
  2. धार्मिक कार्यों के प्रबन्ध की स्वतंत्रता –
    संविधान के अनुच्छदे 26 के द्वारा सभी धमोर्ं के अनुयायियों
    को धार्मिक और दानदात्री संस्थाओं की स्थापना औ उनके संचालन
    धार्मिक मामलों का प्रबंध, धार्मिक संस्थाओं द्वारा चल एवं अचल
    संपत्ति अर्जित करने राज्य के कानूनों के अनुसार प्रबंध करने की
    स्वतंत्रता प्रदान की गई है। 
  3. धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता –
    संविधान के अनुच्छदे 26 के द्वारा सभी धमोर्ं के अनुयायियों
    को धामिर्क और दानदात्री सस्ं थाओं की स्थापना और उनके संचालन,
    धार्मिक मामलों का प्रबंध, धार्मिक संस्थाओं द्वारा चल एवं अचल
    संपत्ति अर्जित करके राज्य के कानूनों के अनुसार प्रबध करने की
    स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। 
  4. व्यक्तिगत शिक्षण-संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा देने की
    स्वतंत्रता –
    संविधान के अनुच्छेद 28 की व्यवस्था के अनुसार किसी
    राजकीय (राज्य निधि से पूर्णत: पोषित) शिक्षण संस्था में किसी
    धर्म की शिक्षा नहीं दी जा सकती है। 

धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अपवाद – 

धार्मिक कट्टरता एवं धार्मिक उन्माद को रोकने के लिये
राष्ट्रीय एकता के उद्देश्य से सार्वजनिक हित में सरकार द्वारा इस
अधिकार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। 

संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार 

संविधान के अनुच्छेद 29 व 30 के द्वारा नागरिकों को
संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी दो अधिकार दिये गये है। 
  1. अल्पसंख्याकों के हितों का संरक्षण –
    अनुच्छेद 29 के अनुसार अल्पसंख्याकों को अपनी
    भाषा लिपि या संस्कृति को सुरक्षित रखने का पूर्ण अधिकार है। 
  2. अल्पसंख्याकों को अपनी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना
    एवं प्रशासन का अधिकार –

    अनुच्छेद 30 के अनुसार धर्म या भाषा पर आधारित
    सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि के अनुसार शिक्षण संस्थाओं
    की स्थापना और उनके प्रशासन का अधिकार है। यह अधिकार
    अल्पसंख्याकों को उनकी संस्कृति तथा भाष के संरक्षण हेतु राज्य
    से मिल रहे सहयोग को सुनिश्चित करता है। 

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

भारतीय संविधान में संवैधानिक उपचारों का प्रावधान इंग्लैण्ड की कानूनी व्यवस्था का अनुकरण है। इंग्लैण्ड में यह कॉमन लॉ की
अभिव्यक्ति है। इंग्लैण्ड में संविधान उपचार की रीट इस कारण
जारी की जाती थी कि सामान्य विधिक उपचारों उपयप्ति हैं। आगे
चलकर ये रीट उच्च न्यायालय प्रदान करने लगा, क्योंकि उसके
माध्यम से ही सम्राट न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करता था। 
भारतीय संविधान ने नागरिकों को केवल मौलिक अधिकार
ही प्रदान नहीं किये हैं, वरन् उनके संरक्षण की भी पूर्ण व्यवस्था की
गयी है। अनुच्छेद 32 से 35 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को यह
अधिकार दिया गया है कि वह अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के
लिए उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय की शरण ले सकता
है। संवैधानिक उपचारों के अधिकार के महत्व के विषय में डॉभीमराव
अम्बेडकर ने कहा था; ‘‘यदि मुझसे कोई यह पूछे कि
संविधान का वह कौन-सा अनुच्छेद है, जिसके बिना संविधान
शून्यप्राय हो जायेगा तो मैं अनुच्छेद 32 की ओर संकेत करूंगा। यह
अनुच्छेद तो संविधान की हृदय और आत्मा है।’’ यह अनुच्छेद
उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों को नागरिकों के मूल अधिकारों का
सजग प्रहरी बना देता है। 
न्यायालयों द्वारा इन अधिकारों की रक्षा के लिए निम्नलिखित
पांच उपचार प्रयोग किये जा सकते हैं- 
  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख –
    व्यक्तिगत स्वतंत्रता हेतु यह लेख सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
    लैटिन भाषा के हैबियस कार्पस का अर्थ है- ‘सशरीर उपस्थिति’।
    इस लेख के द्वारा न्यायालय बन्दी बनाये गये व्यक्ति की प्रार्थना पर
    अपने समक्ष उपस्थिति करने तथा उसे बन्दी बनाने का कारण बताये
    जाने का आदेश दे सकता है। यदि न्यायालय के विचार में संबंधित
    व्यक्ति को बन्दी बनाये जाने के पर्याप्त कारण नहीं है या उसे
    कानून के विरूद्ध बन्दी बनाया गया है तो न्यायालय उस व्यक्ति को
    तुरंत रिहा (मुक्त) करने का आदेश दे सकता। व्यक्तिगत स्वतंत्रता
    के लिए यह लेख सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। 
  2. परमादेश लेख –
    इस लेख अर्थ है- ‘हम आज्ञा देते हैं’। जब कोई सरकारी
    विभाग या अधिकारी अपने सार्वजनिक कर्तव्यों का पालन नहीं कर
    रहा है, जिसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार
    का हनन होता है। तो न्यायालय इस लेख के द्वारा उस विभाग या
    अधिकारी को कर्तव्य पालन हेतु आदेश दे सकता है। 
  3. प्रतिषेध लेख –
    इस लेख का अर्थ – ‘रोकना या मना करना।’ यहा आज्ञा
    पत्र उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों द्वारा अपने अधीनस्थ न्यायालय
    को किसी मुकदमे की कार्यवाही को स्थगित करने के लिए निर्गत
    किया जाता है। इसके द्वारा उन्हें यह आदेश दिया जाता है कि वे
    उन मुकदमों की सुनवाई न कीजिए जो उनके अधिकार क्षेत्र के
    बाहर हों। प्रतिषेध ओदश केवल न्यायिक पा्र धिकारियों के विरूद्ध
    ही जारी किये जा सकते हैं, प्रशासनिक कर्मचारियों के विरूद्ध नहीं। 
  4. उत्प्रेषण लेख –
    इस लेख का अर्थ है पूर्णतया सूचित करना। इस आज्ञा पत्र
    द्वारा उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय को और उच्च न्यायालय
    अपने अधीनस्थ न्यायालय को किसी मुकदमे को सभी सूचनाओं के
    साथ उच्च न्यायालय में भेजने की सूचना देते हैं। प्राय: इसका
    प्रयोग उस समय किया जाता है, जब कोई मुकदामा उस न्यायालय
    के क्षेत्राधिकार से बाहर होता है और न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों
    का दुरूपयोग होने की संभावना होती है। इसके अतिरिक्त उच्च
    न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों से किसी मुकदमे के विषय में
    सूचनाएं भी लेख के आधार पर मांग सकता है। 
  5. अधिकार-पृच्छा लेख –
    इस लेख का अर्थ है- ‘किस अधिकार से?’ जब कोइ
    व्यक्ति सार्वजनिक पद को अवैधानिक तरीके से जब जबरदस्ती
    प्राप्त कर लेता है तो न्यायलय इस लेख द्वारा उसके विरूद्ध पद को
    खाली कर देने का आदेश निर्गत कर सकता है। इस आदेश द्वारा
    न्यायालय, संबंधित व्यक्ति से यह पूछता है कि वह किस अधिकार
    से इस पद पर कार्य कर रहा है? जब तक इस प्रश्न का सम्यक् एवं
    संतोषजनक उत्तर संबंधित व्यक्ति द्वारा नहीं दिया जाता, तब तक
    वह उस पद का कार्य नहीं कर सकता। 

मौलिक अधिकारों का स्थगन 

मौलिक अधिकार को इन परिस्थतियों में स्थागित किये जाने का प्रावधान है- 
  1. स्वतंत्रताओं का स्थगन –
    भारतीय राष्ट्रपति संविधान की धारा 352 के अनुसार, जब में
    सकंटकाल की घोषणा करता है तो अनुच्छेद 19 में वर्णित सभी स्वतंत्रतायें
    जैसे विचार- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा व सम्मेलन की स्वतंत्रता, संघ
    बनाने व भ्रमण की स्वतंत्रता तथा निवास की स्वतंत्रता आदि हो जाती है।
  2. संवैधानिक उपचारों के अधिकार का स्थगत –
    आपातकालीन स्थिति में अनुच्छेद 359 के अनुसार, ‘‘संवैधानिक
    उपचारों के अधिकार को भी स्थगित या निलंबित किया जा सकता है। 
  3. मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने के लिए हस्तक्षेप –
    अनुच्छेद 15(1), 4 अनुच्छेद 19(6) में मौलिक अधिकारों पर
    प्रतिबंध लगाने के लिए राज्य हस्तक्षेप कर सकती है। 
  4. संविधान में संशोधन –
    संसद संविधान में संशोधन करके मौलिक अधिकारों को निलम्बित
    कर सकती है, किन्तु संविधान के मूल ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती। 

अत: स्पष्ट है कि संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये गये मौलिक
अधिकार असीमित नहीं है इन अधिकारों की कुछ सीमाएं है तथा उन्हें विशेष
परिस्थितियों में स्थगित भी किया जा सकता है। 

मौलिक अधिकारों का मूल्यांकन 

पक्ष में तर्क – मौलिक अधिकारों के अभाव में स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं
है, इन तर्कों के आधार पर मौलिक अधिकारों के महत्व को स्पष्ट
किया जा सकता है। 
  1. व्यावहारिकता पर आधारित –
    मौलिक अधिकारों की व्यवस्था, व्यावहारिकता एवं वास्तविकता पर
    आधारित है। 
  2. अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों का कल्याण –
    मौलिक अधिकारों द्वारा अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के
    हितों के संरक्षण को विशेष महत्व प्रदान किया गया है। 
  3. लोकतंत्र की सफलता का आधार –
    मौलिक अधिकारों के अभाव में लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की
    जा सकती। स्वतंत्रता और समानता लोकतंत्रीय व्यवस्था के दो आधारभूत
    स़िद्धांत होते हैं, इसीलिए हमारे मौलिक अधिकारों में इन दोनों सिद्धांतों को
    स्थान दिया गया है।

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