समकालीन विश्व व्यवस्था क्या है ?

अनुक्रम
आज विश्व में लगभग 200 राष्ट्र हैं, जिन्है। अलग-अलग देश के नाम से जाना जाता हैं। वे आपस में कई मायनों में समान हैं। प्रत्येक देश स्वतत्रं होता है उसकी अपनी सरकार होती हैं जो अपनी सेना के द्वारा विदेशी हमलावरो से देश की रक्षा करते हैं। परंतु साथ ही ये देश भौगोलिक आकार, जनसंख्या, प्राकृतिक, संसाधनो, आर्थिक स्थितियों और सरकार के स्परूप आदि में भिन्नता लिए होते है। तथापि कोई भी देश-कमजोर या शक्तिशाली, छोटा या बडा, अपने दायित्व का वहन अकेले नही कर सकता। उन्हें एक-दूसरे के साथ मिलकर रहने और आपसी लाभों के लिए कार्य करने की आवश्यकता होती है।

यद्यापि विश्व मामले का अर्थ सभी राज्यो के आपस में संबध से है परंतु यह केवल राज्यों तक ही सीमित नही हैं। आम व्यक्तियों के बीच पर्यटक, पत्रकार, उधमी, खिलाड़ी आदि के रूप में सपंर्क और सहयोग को तेजी से विकास हो रहा हैं। सैटेलाइट तकनीक और मोबाइल के प्रयोग से सूदुर देशों में बैठे लोगों के बीच बात करना सरल हो गया हैं। यही नही, केवल टेलीविजन के माध्यम से खेलों, राजनैतिक और सांस्कृतिक घटनाओं, यहां तक कि युद्ध तक का भी सीधा प्रसारण हम अपने घर में बठै कर देख सकते हैं। इन सभी विकासों ने ससांर को एक गाँव के रूप में परिवर्तित कर दिया है। अत: विश्व में घटित हो रही घटनाओं के बारे में जानना हमारे लिए आवश्यक हो गया है। इसमे निश्चित रूप से हमें अपने संसार और उसकी समस्याओं के बारे में जानकारी करना आवश्यक हैं।

विश्व व्यवस्था का अर्थ 

‘क्रम’ या व्यवस्था से सभी वस्तुओं के उचित स्थान पर होने का संकेत मिलता है। यह नियमों को लागू करने और उनका सम्मान करने को भी दर्शाता है। यदि व्यवस्था सुदृढ हो तो दैनिक क्रियाकलाप शांतिपूर्ण और सामान्य होंगे। पर विश्व व्यवस्था में एक देश का अपने मामलों को दूसरे देशों के साथ संचालिन करने का तरीका प्राप्त होता है। यह तरीका नियमों और सिद्धान्तों के रूप में हो सकता है जो सरकारों द्वारा स्वीकृत और सम्मानित होता है, इन नियमों में शामिल हैं-सभी राष्ट्रों की समानता, किसी राष्ट्र को अन्य राष्ट्र के आतं रिक मामलो में हस्तक्षेप नही करना, द्विपक्षीय संबंधो में शक्ति का प्रयोग न किया जाना और न ही उसके प्रयोग की चेतावनी देना, यद्धु बंदियो के साथ मानवोचित व्यवहार किया जाना आदि। राष्ट्रों में इन नियमों को लागू करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था की स्थापना की गई है। इसका उद्देश्य राष्ट्रों के बीच वार्ता और राजनीति द्वारा उनक बीच अंतरों और समस्याओं को हल करने में सहायता देना हैं।

इस वास्तविकताओं के विपरीत ‘विश्व व्यवस्था’ शब्द विचित्र जान पड़ सकता है। यघपि औपचारिक रूप से राष्ट्र समान माने जाते हैं, परंतु उनके बीच स्पष्ट असमानता होती हैं। इनमें से कुछ असमानताएं इस रूप में देखी जाती हैं कि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में निषेधाधिकार (वीटो) केवल पाँच ही देशों को ही दिया गया। संसाधनो और अपना प्रभुत्व बढाने के लिए संभी देश की परस्पर स्पर्धा करते है। वे एक-दूसरे की नियती और महवाकांक्षा पर संदेह करत े है। वे सीमा, व्यापार और अन्य मामलों के कारण झगड़ते है। वास्तव में इस समय भी विश्व में एशिया, अफ्रीका और युरोप में दर्जनों युद्ध चल रहे हैं जो लाखों लोगों की मौत और बहुमूल्य सम्पत्ति का विनाश करते हैं। अनेक देशों में गृह युद्ध चल रहैं हैं। ये गृह युद्ध देश की सेना और एक समुदाय के बीच का लंबा संघर्ष है ताकि वहां की सरकार को अपदस्थ किया जा सके या अलग स्वतंत्र राष्ट्र स्थापित कर लिया जाए। श्रीलंका इसका एक उदाहरण है। इसी से आतंकवाद भी जुड़ा हुआ है जो आम जनता में हिंसा और नृशंसतापूर्वक हत्याओं का डर पैदा करता है। इसके अलावा वाणिज्यिक और सामाजिक दबाव वाले समुदाय भी राज्य नीतियों से बड़ी-बड़ी मांगे करते हैं।

अमेरिका और यूरोप की बहुराष्ट्रीय कपंनियाँ इतनी शक्तिशाली हो गई है। जो कछु निर्धन देशों में वहॉ की आर्थिक नीतियों के निधार्र ण में हस्तक्षेप करती है।। व्यापारिक गैर-सरकारी संगठनो का भी उन नीतियों पर प्रभाव बढता जा रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपं नियां वे व्यापारिक कंपनियां है। जो मुख्यत: अमेरीका और यूरोप की हैं। उन्होने अपने उपभोक्ता सामानों, दवाओं आदि के व्यापार को विश्व के अन्य भागों में फैलाया हैं। आप कोक, माइक्रोसाफट, जनरल मोटर्स आदि से परिचित होंगे। उन्हें बहुत अर्थिाक मुनाफा होता हैं। कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों की वार्षिक आय, अनेक अल्प विकसित राष्ट्रों से अधिक होता है। गैर-सरकारी संस्थांए वे है। जो व्यक्ति विशेष द्वारा उनकी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार सरकार के सीधे हस्तक्षेपं के बिना स्थापित की जाती है। वाय. एम. सी. ए. रोटरी इंटरनेशनल, रेडक्रास आदि कुछ एंसे गैर-सरकारी संगठनों के उदाहरण हैं जो स्थानीय, राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय है। ये वातावरण सुरक्षा, विकास और मानव अधिकार आदि क्षेत्रो में सक्रिय हैं। वास्तव में आप आश्चर्यचकित हो सकते हैं कि विश्व व्यवस्था को वर्तमान परिस्थिति में कैसे वर्णित किया जा सकता हैं। निसंदेह बहतु कछु असंतोषजनक है परतुं यह भी सत्य है कि विश्व के मामलों में बहुत कुछ व्यवस्थित है जो कि आसानी से ध्यान में नहीं आता। उदाहरण के लिए, राजनायिकों का आदान-प्रदान, युद्ध संबंधी नियम पत्र व्यवहार, वायु और समुद्री यातायात, विदेशियों से व्यवहार तथा मदु्रा विनिमय सभी अतंराष्ट्रीय व्यवस्था के उदाहरण हैं। अंतराष्ट्रीय मामलों के इन पहलुओं को प्रथा और परमपरा के द्वारा तथा विभिन्न अंतराष्ट्रीय समझोतों और संधियों के नियमों द्वारा निर्धारित किया जाता हैं। सामान्यत: यह भी देखा जाता है कि जिन राष्ट्रों के बीच विवाद होता है, वे किसी समझौते पर पहुचने के लिए किसी दूसरे देश या किसी अन्तर्राष्ट्रीय एजेन्सी की सहायता लेते है। भारत और पाकिस्तान के बीच चल रही वर्ता प्रक्रिया इसी विश्व व्यवस्था का द्योतक है। 1945 के बाद विश्व युद्ध का न होना विश्व व्यवस्था के सकारात्मक पहलू को दर्शाता हैं।

हमें यहां यह जानना चाहिए कि वास्तविकताओं को पूर्ण रूप से उपेक्षित करके आदर्श विश्व व्यवस्था प्राप्त नहीं की जा सकती। राजनीतिक और अन्य परिस्थितियाँ या विश्व व्यवस्था को सदैव प्रभावित करती रही हैं। इन घटनाओं के संदर्भ में आवश्यक समायोजन करती हुई विश्व व्यवस्था बनती जाती है। यह व्यवस्था किसी नई व्यवस्था को स्थान देने के लिए पूर्ण रूप से समाप्त नहीं की जाती, इसमें संसार की वास्तविकता के आधार पर कवे ल कुछ परिवतर्न किए जाते हैं। ये परिवर्तन अच्छे या बुरे, छोटे या बड़े हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में, शीत युद्ध जैसी घटनाओं के अंत के लिए व्यवस्था में परिवर्तन किया गया न की उस समय अस्तित्व में व्यवस्था को पूर्ण रूप से बदला गया।

शीत युद्ध के समय द्विध्रुवीय व्यवस्था 

जैसा कि आप जानते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध तक यूरोप विश्व व्यवस्था का रंगमंच बना रहा। यूरोपीय देशों ने आपस में गुट बनाकर यह सुनिश्चित किया कि कोई भी अकेला देश (जैसे कि फ्रांस, ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी आदि) संसार पर अपना प्रभुत्व स्थापित न कर सके। इस प्रकार उत्पन्न इस व्यवस्था को शक्ति का संतुलन कहते हैं। ब्रिटेन में इस नीति का बहूत लंबे समय तक पालन किया। परंतु यह तरीका प्रथम विश्व युद्ध के साथ ही बीसवी सदीं के प्रारम्भ में विफल हो गया। इसी बीच यूरोप से बाहर के उभरते हुए देशों जैसे- अमेरीका और जापान ने विश्व राजनीति की प्रकृति और कार्य क्षेत्र का प्रसार किया। ग्रेट ब्रिटेन, सोवियत रूस और अमेरीका गुट के हाथों जर्मनी, जापान और इटली की हार के बाद द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया। युद्ध के अंतिम चरण में अमेरीका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर नाभिकीय बम गिराए। इस युद्ध ने दीर्घकालिक प्रभाव छोडे, संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी आर्थिक संपन्नता और सैन्य शक्ति के कारण नि:संदेह इस युद्ध में विजय का श्रेय लेने वाला बना। यह भी महसूस किया जाने लगा कि युद्ध के बाद भी अमेरिका की सैन्य शक्ति और नेतृत्व की विश्व में शांति कायम रखने की आवश्यकता होगी। इसमें आश्चर्य नहीं है कि ब्रिटेन, फ्रांस और दूसरे यूरोपियन देश आर्थिक भरपाई और सैन्य सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निभर्र हो गए। युद्ध में विजय के लिए महत्वपूर्ण योगदान देने के कारण सोवियत रूस को भी कम नही आकां जा सकता। यह देश भी यूरोपीय मामलो में समान दावेदारी किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरीका और सोवियत संघ के बीच यूरोप की शांति और स्थायित्व के मसले पर जोरदार मतभेद पैदा हो गया। इसके कारण राजनैतिक और सैद्धांतिक थे। अमेरीका ने सरकार के पा्र रूप के लिए प्रजातंत्र और मुक्त व्यापार को बढावा देने पर जोर दिया। दूसरी ओर सोवियत संघ ने साम्यवादी एक दलीय शासन और राज्य नियत्रित अथर्व्यवस्था में विश्वास किया और उस पर बल दिया। इन अंतरो के कारण एक दूसरे के बीच भय की भावना उत्पन्न कर दी । इस प्रकार युद्ध के बाद विश्व का द्वि धुव्रीय चरण आरम्भ हो गया। अमेरिका और सोवियत संघ दो विरोधी ध्रुव बने जिनके इर्द गिर्द यूरोपीय राजनीति घूमने लगी। जहां पश्चिमी यूरोप के देशो ने अमेरीका का साथ दिया और स्वयं को मुक्त विश्व की संज्ञा दी वही दूसरी ओर पूर्वी यूरोप के देश सोवियत संघ के नेतृत्व वाले समाजवादी शिविर का हिस्सा बन गए। अमेरीका और सोवियत संघ दो महाशक्तियों के नाम से विख्यात हो गए।

शीत युद्ध के बाद एक ध्रुवीय विश्व

बर्लिन दीवार के ढह और जर्मनी के एकीकरण के बाद यूरोप में विस्मयकारी विकासो की एक प्रकिया आरम्भ हुई। पोलैंड, हंगरी, बुल्गारिया और अन्य देशों के नागरिको की बड़ी भीड़ इन इन समाजवादी तानाशाहों के विरोध में उठी और शासन ताश के पत्तों की भांति ढ़ह गए क्योंकि तत्कालीन मिखाईल गोर्बाचोव के नेतृत्व में सोवियत संघ सैन्य हस्तक्षेप करने को अनिच्छुक था। शीघ्र ही स्वतंत्रता की बलवती इच्छा ने समाजवादी शिविर के स्वामित्व को हिलाकर रख दिया। 1991 में सोवियत संघ, रूस संघ और 14 अन्य देशों में विभाजित हो गया। नैटो अमीर भी है और युगोस्लाविया तथा अफगानिस्तान में कार्यरत है, जो इन देशों ने समाजवाद छोड़ प्रजातंत्र और मुक्त व्यापार अर्थव्यवस्था की विचारधारा को अपनाया। इसे अमेरीका की शानदार विजय माना गया। अब जबकि वारसा टिट्री ऑगनाइजेशन विघटित हो चुका है इसकी मूल रूप से योजना में नहीं था। शीत युद्ध में विजय के साथ ही अमेरिका प्रशंसा और भय का पात्र बन गया। समाजवाद के अंत और सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका एक अकेली महाशक्ति रह गया। शीत युद्ध की समाप्ति कें 15 वर्षो के बाद के एक देश के प्रभुत्व को एक धु्रवीय व्यवस्था के नाम से बहुत विद्वान वर्णित करते हैं। इस ऊचँाई में अमेरिका को शीर्ष से हटाने की चनौती कोई नहीं दे सकता। प्रथम खाडी युद्ध के दौरान राष्ट्र संयुक्त की भूमिका को इस नई परम्परा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जा सकता है। लगभग एक दशकं के बाद संयुक्त राष्ट्र की परवाह किए बिना अधीर अमेरीका ने 2003 में एक तरफा ईराक पर आक्रमण कर दिया। महासभा और महासचिव की कार्य प्रणाली अमेरिका के इस अड़ियल रवैये से आहत हुई।

एक, ध्रुवीय स्थायित्व 

यह खेदजनक है कि शांति और स्थायित्व इस विश्व में एक ध्रुवीय नहीं रह सकते। शीतयद्धु के बाद के समय का एक मुख्य लक्षण राष्ट्र, राज्य के लिए चुनौतियों का बढ़ जाना था जैसा कि द्विध्रुवीय समया में नही था जब राष्ट्रों को आंतरिक और बाह्य शक्तियों से अपने अस्तित्व का खतरा था। 1990 से पहले देश की क्षेत्रीय एकता को स्थायित्व के लिए आवश्यक माना जाता था। सोवियत संघ के विघटन ने जातीय, भाषाई और धार्मिक पहचान के आधार पर अलग राज्य की मांग करने को प्रोत्साहन दिया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के जनक राष्ट्रों में से यूगोस्लाविया एक कटु प्रक्रिया के बाद पाचँ हिस्सों में टुट गया। अंतराष्ट्रीय आतंकवाद न केवल एक राष्ट  बल्कि संपूर्ण विश्व क्रम की सुरक्षा के लिए एक खतरा बन गया है। आसेमा बिन लादेन के नेतृत्व वाला अलकायदा सबसे अधिक भयभीत करने वाला आंतकवादी संगठन है। हम सभी जानते हैं कि 11 सितम्बर 2001 में किस प्रकार ओसामा बिन लादेन के अनुयायियों ने एक योजना बनाकर न्यूर्याक के वल्र्ड ट्रेड सेन्टर पर संगठित आक्रमण किया और अमेरिका के अन्य स्थानों पर हालांकि आतंकवाद का संकट 11 सितम्बर 2001 से पहले ही असितत्व में आ चुका था परंतु इस घटना को टेलीविजन स्क्रीन पर देखकर यह लगने लगा कि किस प्रकार विश्व की सबसे बड़ी शक्ति को ओसामा ने कंपित किया। दक्षिण एशिया में भारत और श्रीलंका एक दशक से भी पहले से इस आतंकवाद से लड रहे हैं और यह आतंकवाद अब दक्षिण एशिया के अन्य देशों जैसे बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान में, दक्षिण-पूर्वी एशिया के मलेशिया और इंडोनेशिया, पश्चिमी एशिया के लेबनान और मिस्र तथा अफ्रीका के कीनिया, सोमालिया और सुडान में फैल चुका है। सितम्बर 2004 की एक दहशत पूर्ण घटना में चेचन्या संबधित एक आतंकवादी संगठन ने दक्षिणी रूस के एक स्कूल पर कब्जा कर लिया और रूसी कमांडो के साथ एक दुर्भाग्यपूर्ण मुकाबले में 350 छोटे-छोटे स्कूली बच्चों की मृत्यु हो गई।

संक्षेप में अस्थायित्व के इन पहलुओं को कई तरह से देखने की आवश्यकता की ओर संकेत करते है। सुरक्षा का दायरा बढ चुका है, इसमें अब केवल विदेशी आक्रमणों की ही अनुपस्थिति शामिल होनो नहीं है बल्कि आतंरिक सरु क्षा भी शामिल है। सुरक्षा का अर्थ केवल राज्य की सुरक्षा हेतु एक मजबूत सेना तैयार करना ही नही है, इनमें लोगों की आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण संबंधी हित भी विहित हैं। इसके अतिरिक्त, आतंकवाद सहित इन समस्याओं पर किसी एक राज्य द्वारा काबू नही पाया जा सकता परंतु सभी राष्ट्रों को एकजुट होकर इसका सामना करना होगा।

वैश्वीकरण के अच्छे और बुरे प्रभाव 

नि::संदेह, 21 वीं सदी का विश्व वैश्वीकरण की राह पर है जिसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक है, यधपि इसके कुछ अन्य सांस्कृतिक और राजनैतिक आयाम भी है। 1990 के दारै ान शीतयद्धु के बाद निजीकरण और उदारीकरण को माना गया कि यें ही आथिर्क और वाणिज्यिक लेन-देन में महत्वपूर्ण बदलाव करके विकास का पथ प्रशस्त करते है। कुछ अन्य विकास एसे भी थे जिन्होने वैश्वीकरण को बढ़ाने में योगदान दिया। सूचना और संचार तकनीक के विकास जो कि कम्प्यूटर से जुडे हैं, ने इलेक्ट्रानिक यगु की शुरूआत की। विश्व के आर्थिक सस्ंथानों जैसे इटंरनेशनल मानिटरो फंड और विश्व बैंक जिनकी शक्ति अब वैश्विक बन चुकी है।, इनके साथ उतनी ही शक्तिशाली एक और संस्था भी मुक्त व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए कार्य करती है। यह विश्व व्यापार संगठन हैं। संपूर्ण विश्व आज एक ऐसा बाजार बन चुका है जिसमें विदेशीं निवेशकों और राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार सामानो  की मुक्त आवाजाही की अनेमति दी जाती हैं। इस बदली हुई परिस्थिति में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वैश्विक सम्मान और श्रेष्ठता प्राप्त किया हैं। वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य संसार को एक बाजार बनाने का हैं और बिना किसी रोक ठोक के पूंजी, सामान, सूचना और यहां तक कि श्रमिक भी सीमाओं के आर पार आसानी से आ जा सके।

विश्व समुदायों की बहुतायत, विकासशील प्रत्याशा वैश्वीकरण का हिस्सा बन गए। हमें भारत के अंनुभव पर नजर डालनी चाहिए। सुविकसित और उच्च प्रतिस्पर्धा की सॉफ्टवेयर औद्योगिक तकनीक, कुशल कार्यक्षमता की उापलब्धि और एक बड़ी मध्यमवर्गीय बाजार होने के कारण भारत को वैश्वीकरण से बहुत आशाएॅ हैं। 1991 से भारत ने अपनी आर्थिक नीति को निजीकरण के गुणों को अपनाकर विदेशी निवेशो के प्रति उदार नियम बनाकर और पब्लिक सेक्टर कंपनियों के निवेश को बंद करके परिवर्तित किया हैं, उपभोक्ताओं के पास बाजार में वस्तुओं के चुनाव की बहुत-सी संभावनाएं है जो कि मोटर कार से लेकर खाद्य पदार्थो तक है। भारतीय निर्यात विशेषकर सेवा क्षेत्र में बढ़ा हैं देश में निवेश भी बढ़ा हैं, और हमारे विदेशी मुद्रा भंडार भी प्रचुरमात्रा में है। सम्पूर्ण रूप से वैश्वीकरण के दौरान भारत एक सबसे तेज वृिद्ध दर वाली अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है।। यधपि भारत वैश्वीकरण के लाभकारी पक्षों के लिए खुला हैं। अमेरिका कपं नियां, मुद्रा, टीवी चैनलों और हथियार संसार पर छा गए है। सरकार द्वारा उवर्र को, बिजली और अन्य आवश्यक जरूरतों में सहायता न देने से ग्रामीण और कृषि क्षेत्र की समस्याएं और अधिक हो गई हें। देशों के अंदर अमीर और गरीब की आय में अतंर तेजी से बढता गया हैं।

संसार की लगभग आधी जनसंख्या (जो अबसहारा, अफ्रीका और दक्षिण एशिया में केन्द्रीत हैं) बहतु गरीबी में है। जहां सम्पन्न देशों द्वारा दिया गया दान बढ़ा नहीं है वहीं विकासशील देशों पर कर्ज, का बोझ अधिक बढ़ गया है। दूसरी और ससांर के सबसे बडे खरबपतियों को पूंजी सबसे कम विकसित देशों की राष्ट्रीय संपत्तियों को एक साथ मिलकर भी उनसे अधिक है।। विकसित देशों में इन निम्नतम विकसित देशों का सामान प्राथमिकता नहीं पाता। इसके अतिरिक्त हमारी जीवनशैली निरर्थक उपभोक्तावाद की तरफ तेजी से बढ़ रही हैं। वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप एड्स जैसी बीमारियों के फैलने से एक साथ डरकर रह रहे हैं। इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए किए गए सभी प्रयास अपर्या्रप्त रहे हैं। वैश्वीकरण को अब उचित साबित करने के लिए इसे मानवीय रूप देने की आवश्यकता हैं। अन्यथा समकालीन विश्वव्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लग सकता हैं।

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