योग में साधक एवं बाधक तत्व

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योग शब्द का अर्थ संस्कृत भाषा के युज् धातु से निश्पन्न होने के साथ विभिन्न ग्रन्थों के अनुसार योग की परिभाषाओं का अध्ययन किया गया। योग साधना के मार्ग में साधक के लिए साधना में सफलता हेतु सहायक तत्वों तथा साधना में बाधक तत्वों की चर्चा विभन्न ग्रन्थों के अनुसार की गई है। वास्तविकता में योग साधना चाहे आघ्यात्मिक लक्ष्य के लिए की जाए अथवा भौतिक सम्पन्नता हेतु दोनों ही स्थितियों में बाधाओं का आना स्वाभाविक ही है अत: यदि साधक इन बाधाओं को जानकर साधक तत्वों पर नियन्त्रण प्राप्त कर सके तो वह साधना में अवश्य सफल रहता है इसी तथ्य को अध्ययन करेगें।

योग साधना मे बाधक तत्व 

जो योग साधक सच्चाई पूर्वक आध्यात्मिक मार्ग का अवलम्बन करता है, वह कुछ ऐसी कठिनाईयों एंव अनोखे अनुभव को प्राप्त करता है, जो उसमें प्रथमत: साहसहीनता तथा निरूत्साह उत्पन्न करके बाधा उत्पन्न करते है। इसके विपरीत ऋशियो-मुनियो के प्रायोगात्मक अनुभव के आधार पर योग साधना को सुगमता से प्रशस्त करने हेतू ऐसे उपाय है, जो साधना की बाधाओं को प्रभावशाली ढंग से दूर कर देते है। अत: योग साधना हेतू बाधक एंव साधक तत्वों का ज्ञान आवश्यक होता है, जिसका विवरण शास्त्रों के अनुसार निम्न प्रकार है-

हठप्रदीपिका के अनुसार 

अत्याहार: प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रह:।
जनसंएरच लौल्य च शड्भिर्योगो विनश्चति।। (ह0प्र0 )

अर्थात् अधिक भोजन, अधिक श्रम, अधिक बोलना, नियम-पालन में आग्रह, अधिक लोक सम्पर्क तथा मन की चंचलता, यह छ: योग को नष्ट करने वाले तत्व है अर्थात् योग मार्ग में प्रगति के लिए बाधक है- उपर्युक्त “लोकानुसार जो विघ्न बताये गये हैं, उनकी व्याख्या अधोवर्णित है-

अत्याहार:- आहार के अत्यधिक मात्रा में ग्रहण से शरीर की जठराग्नि अधिक मात्रा में खर्च होती है तथा विभिन्न प्रकार के पाचन-संबधी रोग जैसे अपच, कब्ज, अम्लता, अग्निमांघ आदि उत्पन्न होते है। यदि साधक अपनी ऊर्जा साधना में लगााने के स्थान पर पाचन क्रिया हेतू खर्च करता है या पाचन रोगों से निराकरण हेतू शट्कर्म, आसन आदि क्रियाओं के अभ्यास में समय नष्ट करता है तो योगसाधना प्राकृतिक रुप से बाधित होती है।

अत: शास्त्रों में कहा गया है कि-
 सुस्निग्धमधुराहारष्चर्तुयांश विवर्जित: 
 भुज्यते शिवसंप्रीत्यै मिताहार: स उच्यते 

अर्थात ( जो आहार स्निग्ध व मधुर हो और जो परमेश्वर को सादर समर्पित कर आमाशय के 3/4 भाग को पूर्ण करने के लिए ग्रहएा किया जाए, जिससे कि आमाशय का 1/4 भाग वायु संचरण व सुचारु रुप से पाचन क्रियार्थ छोडा जाए, ऐसे मात्रा आधारित रुचिकर भोजन को स्वात्माराम जी मिताहार की संज्ञा देते है।  इसी प्रकार केशव गीता में कहा गया है-कि-

अति खावे अति थोडा खावे अति सोवे अति जागर पाये 
यह स्वभाव राखे यदि कोय उसका योग सिद्ध नहीं होय 

अर्थात अत्यधिक भोजन एवं अत्यधिक थोडा भोजन एवं अत्यधिक सोना एवं अत्यधिक जागना! इस प्रकार का स्वभाव यदि कोई साधक रखता है, तो उसका योग कभी सिद्ध नहीं हो सकता। इसी प्रकार घेरण्ड ऋशि ने कहा है, कि- मिताहारी न होने के स्थान पर यदि साधक अत्याहारी आचार-संहिता का पालन करता हैे, तो नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित होकर योग मे सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। अत: साधक को अत्याहार की प्रवृत्ति को त्यागना चाहिए। शरीर को धारण करने में समर्थ होने के कारण धातु नाम को प्राप्त हुए वात, पित्त और कफ की न्यूनाधिकता खाये तथा पिये हुए आहार पदार्थों के परिणामस्वरुप रस की न्यूनाधिकता को व्याधि अथवा रोग कहते है। व्याधि होने पर चित्त वृत्ति उसमें अथवा उससे दूर करने के उपायों में लगी रहती है। इससे वह योग में प्रवृत्त नहीं हो सकती। इसी कारण व्याधि की गणना योग के विघ्नों में होती है। अजीर्ण, नींद की खुमारी, अति परिश्रम प्र्रवृत्ति से वाह्यकारवृत्ति का अभाव हो जाता है। अजीर्ण आदि लय के कारणरुप विघ्नों के निवारण करने के लिए पथ्य और लघु भोजन करनें से और प्रत्येक व्यवहार में युक्ति तथा नियम के अनुसार चलने से एवं उत्थान के प्रयत्न द्वारा चित्त को जागृत करने से विघ्न दूर होते है।  इस विषय में श्री कृश्ण भगवान् ने भी अर्जुन के प्रति कहा है-

 नात्यश्रतस्तु योगासित न चैकान्तमनश्रत:। 
 न चाति स्वप्नशील जाग्रतो नैव चार्जुन ।। गीता 

अर्थात (जो अधिक भोजन करता है, जो बिल्कुल बिना खाये रहता है, जो बहुत सोता है तथा जो बहुत जागता है, उसके लिए हे अर्जुन योग नहीं है बल्कि-

युक्ताहारविहारस्य युत्कचेश्टस्य कर्मसु। 
युत्कासवपनाववोधस्य योगो भवति दु:खहा।। गीता 

ज़ो नियमपूर्वक भोजन करता है नियमित आहार-विहार करता है। उसके लिए योग दु:ख का नाश करने वाला होता है।
  1. प्रयास- योग साधक को अत्यधिक शारीरिक व मानसिक श्रम से बचना चाहिए। अत्यधिक शारीरिक व मानसिक श्रम राजसिक व तामसिक गुणों की वृद्धि के साथ-साथ शरीरस्थ शारीरिक व मानसिक ऊर्जाओं में असंतुलन पैदा करते हैं अत: योग साधक को अतिप्रयास त्यागना चाहिए।
  2. प्रजल्प:- अधिक बोलने की व्यावहारिकता से शारीरिक समय भी नष्ट होता है। गप-शप लडाने में समय व्यतीत करने से लोकसम्पर्क में वृद्धि होती है, और यही वृद्धि नकारात्मक वृत्तियों जैसे ईष्र्या, द्वेश, लोभ, मोह आदि उत्पन्न कर योग मार्ग में बाधक बनती है।
  3. नियमाग्रह - योग साधक के लिए शास्त्रोक्त या सामाजिक धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमों का सख्त पालन आवश्यक नही है- जैसे यदि प्रात: काल ठंडे पनी से स्नान योग साधना के लिए आवश्यक माना गया है, तो रोगावस्था या अत्यन्त सर्दी के मौसम में इस नियम का पालन आवश्यक नहीं है। इन हालातों में थोडे ठण्डा जल का प्रयोग भी हो सकता है। अत्यधिक नियमाग्रह योगसाधना मार्ग में बाधक है।
  4. जनसंग- अत्यधिक लोकसम्पर्क भी शारीरिक व मानसिक ऊर्ज्ाा àास कर नष्ट करता है। जितने लोगों के साथ सम्पर्क होगा, उतनी ही आपकी योगसाधना मार्ग के बारे में नोंक- झोंक मन व शरीर को अस्थिर कर योगमार्ग की बाधा बनेगी। यह त्याज्य है।
  5. चंचलता- यह वृत्ति भी योगसाधना मार्ग में बाधक है। शरीर की अस्थिरता दीर्घ समयावधि की साधना हेतु बाधक बनती है। नकारात्मक वृत्तियां जैसे ईष्र्या, द्वेश आदि मन की चंचलता बढ़ाकर योग मार्ग में विघ्न उत्पन्न करती है। साधना की अनियमितता जैसे- एक दिन तो सुबह चार बजे से साधना की दूसरे दिन आलस्यवश सुबह 7 बजे उठकर की। इस तरह की अस्थिनता भी योगसाधना में बाधक बनती है। चित्तविक्षेपकों की ही योगान्तराय कहते हैं जो चित्त को विक्षिप्त करके उसे एकाग्रता को नष्ट कर च्युत कर देते है उन्हें योगान्तराय अथवा योगविघ्न कहा है। ‘योगस्य अन्त: मध्ये आयान्ति ते अन्तराया:’। ये योग के मध्य में आते है।, इसलिये इन्हें योगान्तराय कहा जाता है। विघ्नों से व्यथित होकर योगसाधक साधना को बीच में ही छोडकर चल देते है। या तो विघ्न आयें ही नहीं अथवा यदि या जायें तो उनको सहने की शक्ति चित्त में आ जाये, ऐसी कृपा ईश्वर ही कर सकता है। यह तो सम्भव नहीं कि विघ्न न आयें। ‘श्रेयांसि बहुविघ्नानि’ शुभकार्यो में विघ्न आया ही करते है। उनसे टकराने का साहस योगसाधक में होना चाहिए।

योगसूत्र के अनुसार- 

चित्त के विक्षेपक नौ अन्तराय हैं- व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व। उक्त नौ अन्तराय ही चित्त को विक्षिप्त करते है। अत: ये योगविरोधी है। चित्तवृत्तियों के साथ इनका अन्वयव्यतिरेक है। अर्थात् इन विक्षेपों के होने पर प्रमाणादि वृत्तियॉं होत है। जब ये नहीं होते तो वृत्तियॉं भी नही होती। वृत्तियों के अभाव में चित्त स्थिर हो जाता है। इस प्रकार चित्तविक्षेप के प्रति ये उक्त नौ अन्तराय ही कारण है।

व्याधि

‘धातुरसकरणवैशम्यं व्याधि:’ धातुवैशम्य, रसवैशम्य तथा करणवैशम्य को व्याधि कहते है। वात, पित्त और कफ ये तीन धातुएं है। इनमें से यदि एक भी कुपित होकर न्यून या अधिक हो जाये तो यह धातुवैशम्य कहलाता है। जब तक देह में वात, पित्त और कफ समान मात्रा में हैं तो तब इन्हें धातु कहा जाता है। जब इनमें विषमता आ जाती है तब इन्हें दोश कहा जाता है। धातुओं की समता में शरीर स्वस्थ रहता है। विषमता में रूग्ण हो जाता है। आहार का अच्छी तरह से परिपाक न होना रसवैशम्य कहलाता है। यही शरीर में व्याधि बनाता है। ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों की शक्ति का मन्द हो जाना करणवैशम्य है। योगसाधना के लिए सशक्त और दृढ इन्द्रियों की आवश्यकता होती है। धातु, रस तथा करण इन तीनों के वैशम्य को व्याधि कहते हैं। रोगी शरीर से समाधि का अभ्यास सम्भव नहीं। अत: व्याधि समाधि के लिए अन्तराय है। कास, श्वास आदि दैहिक रोगों को व्याधि कहते हैं तथा मानविक रोग को व्यााधि जैसे- स्मरण शक्ति का अभाव, उन्माद, अरुचि, घृणा, काम, क्रोध आदि। आधि शब्द के ‘वि’ उपसर्ग के योग से व्याधि शब्द बनता है- ‘विशेषेण अधीयते अनुभूयते मनसा इति व्याधि:। चूँकि शारीरिक रोग मन को आधि की तुलना में अधिक कष्टकारक अनुभूत होता है, इसलिए शारीरिक रोग का व्याधि नाम सार्थक सिद्ध होता है।

स्त्यान

‘स्त्यानं अकर्मण्यता चित्तस्य’ अर्थात् चित्त की अकर्मण्यता को स्त्यान कहते हैं। समाधि का अभ्यास करने की इच्छा तो चित्त में होती है किन्तु वैसा सामथ्र्य उसमें नहीं होता। केवल इच्छा से योग सिद्ध नहीं होता, अपितु उसमें योगाभ्यास की शक्ति होनी चाहिए। पुत्रों की आसक्ति, विषयभोग की लालसाएं तथा जीविकोपार्जन के व्यापार चित्त को उलझाये रखते हैं कि चित्त अकर्मण्यता अनुभव करता है। अकर्मण्यता समाधि में अन्तराय है।

संशय

‘उभयकोटिस्पृग् विज्ञानं संशय:’ अर्थात् यह भी हो सकता है और वह भी हो सकता है। इस प्रकार के ज्ञान को संशय कहते हैं। योग साधना के विषय में जब साधक को कभी-कभी संशय होता है कि मैं योग का अभ्यास कर सकूंगा या नहीं? क्या मुझे सफलता मिलेगी? क्या समाधि से कैवल्य प्राप्त हो सकेगा? हो सकता है मेरा परिश्रम व्यर्थ चला जाये? तब यह संशयात्मक ज्ञान योग का विघ्न बन जाता है।

प्रमाद

‘समाधिसाधनानामभावनम्’ - समाधि के साधनों में उत्साह पूर्वक प्रवृत्ति न होना प्रमाद कहलाता है। समाधि का अभ्यास प्रारम्भ कर देने पर उसमें वैसा ही उत्साह और दृढता निरन्तर बनी रहनी चाहिए जैसाा उत्साह प्रारम्भ में था। प्राय: युवावस्था का मद, धन और प्रभुत्व का दर्प तथा शारीरिक सामथ्र्य का पद साधक के उत्साह को शिथिल कर देता है। अत: प्रमाद समाधि में अन्तराय है।

आलस्य 

‘आलस्यं कायस्य चित्तस्य च गुरुत्वादप्रवृत्ति:’ काम के आधिक्य से शरीर तथा तमोगुण के आधिक्य से चित्त भारीपन का अनुभव करता है। शरीर और चित्त के भारी होने से समाधि के साधनों में प्रवृत्ति नहीं होती, इसी मा नाम आलस्य है। प्रमाद और आलस्य में बहुत अन्तर है। प्रमाद प्राय: अविवेक से उत्पन्न होता है। आलस्य में अविवेक तो नहीं होता किन्तु गरिष्ठ भोजन के सेवन से शरीर और चित्त भारी हो जाता है। यह भी योग साधना मार्ग में अन्तराय कहलाता है।

अविरति- 

‘चित्तस्य विषयसम्प्रयोगात्मा गर्ध: अविरति:’- शब्दादि विषयों के भोग से तृष्णा उत्पन्न होती है। तृष्णा वैराग्य का शत्रु है। समाधि के लिये वैराग्य प्रमुखतम साधन है। अत: वैराग्याभाव योग का अन्तराय है। कोमलकान्त वचन, उनके अंगो को मोहक स्पर्श, पुष्पादि का आ दक गन्ध तथा स्वादिश्ट भोज्य पेय आदि व्यंजनों का रस कभी-कभी तत्वज्ञान को भी आवृत्त करके साधक को संसार में आसक्त बना देता है। विषयों के प्रति यह आसक्ति ही अविरति हैं। यह अविरति योग का महान् विध्न कहा गया है।

भ्रान्तिदर्शन

‘भ्रान्तिदर्शन विपर्ययज्ञानम्’- अर्थात् मिथ्याज्ञान को भ्रान्तिदर्शन कहते है। अन्य वस्तु में अन्य वस्तु का ज्ञान ही मिथ्या ज्ञान है। जब साधक योग के साधनों को असाधन और असाधनों को साधन समझने लगता है तो यह भ्रान्तिदर्शन योग का विघ्न बन जाता है।

अलब्धभूमिकत्व- 

‘अलब्धभूमिकत्वं समाधिभूमेरलाभ’:- अर्थात् समाधि की किसी भी भूमि की प्राप्ति न होना भी योग में विध्न है। समाधि की चार भूमियॉ है- सवितर्क, निर्वितक, सविचार तथा निर्विचार। जब प्रथम भूमि की प्राप्ति हो जाती है तो योगी का उत्साह बढ़ जाता है। वह सोचता है कि जब प्रथम भूमि प्राप्त हो गयी है तो अन्य भूमियॉं भी अवश्य ही प्राप्त होगी। परन्तु किसी कारण से उनकी प्राप्ति न होना अलब्धभूमिकत्व कहा गया है। यह भी योग में अन्तराय है।

अनवस्थित्व- 

‘लब्धायां भूमौ चित्तस्याप्रतिष्ठा अनवस्थितत्वम्’ यदि किसी प्रकार मधुमती आदि भूमियॉं में से किसी एक की प्राप्ति हो जाये किन्तु उसमें निरन्तर चित्त की स्थिति न हो तो यह अनवस्थितत्व कहलाता है। इस प्रकार नौ चित्तविक्षेप योग के अन्तराय कहलाते है। इन्ही को चित्त का मल तथा येाग प्रतिपक्ष भी कहा गया है। इन चित्तविक्षेपों के पॉंच साथी भी है। जो इन अन्तरायों के होने पर स्वत: हो जाते है।

1. दुख- दुख के बारे में व्यास जी कहते है। ‘येनाभिहता: प्राणिनस्तदुपघाताय प्रयतन्ते तद्दु:खम्’ योगसूत्र व्यासभाश्य 1/31

 जिसके साथ सम्बन्ध होने से पीड़ित हुए प्राणी उस प्रतिकूल वेदनीय हेय दु:ख तीन प्रकार के है- आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक। आध्यात्मिक दुख भी दो प्रकार के होते है शारीरिक और मानसिक। आधिभौमिक शब्द की रचना का विचार किया जाए तो ज्ञात होता है कि यह शब्द भूत शब्द से बना है। भूत शब्द का अर्थ है प्राणी अर्थात् प्राणियों के द्वारा दिये गए दु:खों को आधिभौतिक कहा जाता है। प्राणी योनिज, स्वेदज, अण्डज तथा उद्भिज से चार प्रकार के होते है। दु:खों के तृतीय प्रकार का नाम आधिदैविक है जिसका अर्थ है दैविक शक्तियों के द्वारा दिये गए दु:ख। दैविक शक्तियों के रूप में अग्नि, जल और वायु की गणना की जाती है। ये तीनों प्रत्येक के लिए अति आवश्यक है परन्तु आवश्यकता से अधिक या कम होने पर ये दु:खों के उत्पादक होते है। जैसे-अग्नि यदि हमारे उदर अथवा रसोई घर में पर्याप्त मात्रा में रहे तो सुखद परन्तु यदि कम या अधिक हो तो असहनीय होकर दु:खो का कारण बन कर नाशवान् हो जाती है। इसी प्रकार से वायु और जल को समझना चाहिए। 

2. ठण्दौर्मनस्य- अभिलाशित पदार्थ विषयक इच्छा की पूर्ति न होने से चित्त में जो क्षोभ होता है। उसे दौर्मनस्य कहा जाता है जब प्रयास करने पर भी इच्छा की पूर्ति नहीं होती तो चित्त व्याकुल होता है। यह दौर्मनस्य भी दु:ख का साथी है। कहा गया है-

 इच्छाव्याघातात् चेतस: क्षोभ: दौर्मनस्यम्। योगसूत्र व्यासभाश्य 1/31 

3. गमेजयत्व- जो शरीर के हाथ, पैर शिर आदि अंगो की कम्पित अवस्था है, वह अंगमेजयत्व कहलाती है- यत् अंगानि एजयति कम्पयति तद् अंगमेजयत्वम्’ व्याधि आदि अन्तराय शरीर को दुर्बल बना देती हैं जिससे अंगो में कम्पन होने लगता है। यह अंगमेजयत्व आसन, प्राणायाम आदि में व्यवधान उपस्थित करता है। अत: विक्षेप का साथी होने से समाधि का प्रतिपक्षी है।

4.  श्वास- जो बाहा्र वायु का नासिकाग्र के द्वारा आचमन करता है, वह श्वास कहलाता है अर्थात् भीतर की ओर जाने वाला प्राणवायु श्वास है। यह प्राणक्रिया यदि निरन्तर चलती रहे, कुछ समय के लिए भी न रूके तो चित्त समाहित नहीं रह सकता। अत: यह श्वास रेचक प्राणायाम का विरोधी है। अत: यह समाधि का अन्तराय है-

प्राणो यद् बाहा्रं वायुमाचमति स श्वास:। 

5. प्रश्वास- जो प्राण भीतर की वायु को बाहर निकालता है, वह प्रश्वास कहलाता है। यह श्वास क्रिया भी निरन्तर चलती रहती है। यह भी समाधि के अंगभूत पूरक प्राणायाम का विरोधी होने से समाधि का विरोधी है। अत: विक्षेप का साथी होने से योगान्तराय कहा जाता है।

योग साधना में साधक तत्व- 

हठप्रदीपिका के अनुसार 

उत्साहात् साहसाद् धैर्यात् तत्वज्ञानाच्च निश्चयात्।
जनसंगपरित्यागात् शडभिर्योग: प्रसिद्वयति:।। ह0 प्र0 1/16

अर्थात उत्साह, साहस, घौर्य, यथार्थज्ञान संकल्प तथा लोकसंग का परित्याग इन छ: तत्वों से योग की सिद्वि होती है, अत: ये योग के साधक तत्व है।

उत्साह- योग साधना में प्रवृत्त होने के लिए उत्साह रूपी मनोस्थिति का होना आवश्यक है। उत्साह भरे मन से कार्य प्रारभं करने से शरीर, मन व इन्द्रियो में प्राण संचार होकर सभी अंग साधना में कार्यरत होने को प्रेरित हो जाते है। अत: उत्साहरूपी मनोस्थिति की कुुजी है।

साहस- योगसाधना मार्ग मे साहस का भी गुण होना चाहिए। साहसी साधक योग की कठिन क्रियांए जैसे- वस्त्रधौति, खेचरी आदि की साधना कर सकता है। पहले से ही भयभीत साधक क्रियोओ के मार्ग की और नही बढ़ सकता।

धैर्य- योगसाधक में घीरता का गुण होना अत्यावष्यक हैं। यदि साधक रातो-रात साधना में सफलता चाहता है तो ऐसा अधीर साधक बाधाओं से घिरकर पथभ्रस्ट हो जाता है। साधक को गुरूपदेश से संसार की बाधाओं या आन्तरिक स्तर की विपदाओ का धैर्य पूर्वक निराकरण करना चाहिए।

तत्वज्ञान- योगमार्ग पर चलने से पहले आवश्यक है कि साधक साधना मार्ग का उचित ज्ञान शास्त्रों व गुरूपदेशों द्वारा ग्रहण करे। भली-भाति ज्ञान न होने पर साधना मे समय नष्ट होगा व नाना प्रकार की बाधाएं उत्पन्न होकर मन भी विचलित होगा।

दृढ़-निश्चय- किसी सांसरिक कार्य को प्रारम्भ करने से पहले दृढ़-निश्चय की भावना आवश्यक है। जहा निश्चय में ढील हुई वहीं मार्ग्ा बाधित हो जायेगा। अत: योगसाधना मार्ग में प्रवृत्त होने से पहले दृढ़-निश्चय की भावना अत्यन्त आवश्यक है।

जनसंग परित्याग- सामाजिक व धार्मिक स्तर पर उत्पन्न बाधाओ से बचाव हेतू अधिक जनसम्पर्क त्यागना चाहिए। अधिक जनसम्पर्क से शारीरिक व मानसिक ऊर्जा का ह्रास होता है। योग-साधना हेतु अधिक जनसम्पर्क त्याज्य है। हठप्रदीपिका में ही अन्यत्र कहा गया है कि-

हठविद्या पर गोप्या योगिनां सि़द्धमिच्छताम् 

 योग में सिद्धि की इच्छा रखने वाले साधको को यह हठविद्या नितान्त गुप्त रखनी चाहिए। गुप्त रखने से यह शक्तिशालिनी होती है, तथा प्रकट करने पर यह शक्तिविहीन हो जाती है। इसी प्रकार अन्यत्र कहा गया हैं कि- 

ब्रहमचारी मिताहारी त्यागी योगपरायण:। 
अब्दादूध्र्व भवेत् सिद्धो नात्र कार्यविचारणा।। 

जिसने ब्रहमचर्य का पालन किया हो, ऐसा साधक एक वर्ष या उससे कुछ अधिक समय में सिद्वि प्राप्त कर लेता है, इसमे कोई संदेह नहीं। निश्कर्ष यह है कि ब्रहमचर्य, मिताहार, त्याग व योग के प्रति सत्कार भाव योग साधना में साधक तत्च है।

योगसूत्र के अनुसार- 

 मैत्री, करूणा, मुदिता और उपेक्षा- इन चार प्रकार की भावनाओं से भी चित्त शुद्व होता है। और वृत्तिनिरोध मे समर्थ होता है- ‘मैत्रीकरूणामुदितोपेक्षाणांसुखदु:खपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातष्चित्तप्रसादनम्’ यो.सू.1/33

 सुसम्पन्न पुरुषों में मित्रता की भावना करनी चाहिए, दुखी जनों पर दया की भावना करें। पुण्यात्मा पुरुषों में प्रसन्नता की भावना करे तथा पाप कर्म करने के स्वभाव वाले पुरूषों में उदासीनता का भाव रखे। इन भावनाओं से चित्त शुद्व होता है। शुद्व चित्त शीघ्र ही एकाग्रता को प्राप्त होता है।

संसार में सुखी, दु:खी, पुण्यात्मा और पापी आदि सभी प्रकार के व्यक्ति होत है। ऐसे व्यक्तियों के प्रति साधरणजन का अपने विचारों के अनुसार राग, द्वेश आदि उत्पन्न होना स्वाभाविक है। किसी व्यक्ति को सुखी देखकर दूसरे अनुकूल व्यक्ति का उसमें राग उत्पन्न हो जाता है, प्रतिकूल व्यक्ति को द्वेश व ईष्र्या आदि। किसी पुण्यात्मा के प्रतिश्ठित जीवन को देखकर अन्य जन के चित्त में ईष्र्या आदि का भाव उत्पन्न हो जाता है। उसकी प्रतिष्ठा व आदर को देखकर दूसरे अनेक जन मन में जलते है, हमारा इतना आदर क्यों नही होता ? यह ईष्र्या का भाव है। इसमें प्रेरित होकर ऐसे व्यक्ति पुण्यात्मा में अनेक मिथ्यादोशों का उद्भावन कर उसे कलंकित करने का प्रयास करते देखे जाते है। इस प्रकार परनिन्दा की भावना असूया है। दु:खी को देखकर प्राय: साधारण जन उससे घृणा करते है, ऐसी भावना व्यक्ति के चित्त को व्यथित एवं मलिन बनाये रखती है। यह समाज की साधारण व्यावहारिक स्थिति है।

योगमार्ग पर चलने वाले साधक ऐसी परिस्थिति से अपने आपको सदा बचाये रखने का प्रयास करें। साधक के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि उसका चित्त ईष्र्या तथा असूया आदि मलों से सर्वथा रहित हो, यह स्थिति योग में प्रवृत्ति के लिये अनुकुल होती है। निर्मल-चित्त साधक योग में सफलता प्राप्त करने का अधिकारी होता है। सुखी जनों को देखकर साधक उनके प्रति मित्रता की भावना बनाये। मित्र के प्रति कभी ईष्र्या का भाव उत्पन्न नहीें होता। दु:खी जनों के प्रति सदा करूणा-दया का भाव, उनका दु:ख किस प्रकार दूर किया जा सकता है इसके लिए उन्हें सन्मार्ग दिखाने का प्रयास करे। इससे साधक के चित्त में उनके प्रति कभी धृणा का भाव उत्पन्न नही होने पायेगा। इससे दोनों के चित्त में शान्ति और सांत्वना बनी रहेगी। इसी प्रकार पुण्यात्मा के प्रति साधक हर्ष का अनुभव करे। योग स्वयं ऊॅंचे पुण्य का मार्ग है। जब दोनों एक ही पथ के पथिक है तो हर्ष का होना स्वाभाविक है। संसार में सन्मार्ग और सद्विचार के साथी सदा मिलते रहें, तो इससे अधिक हर्ष का और क्या विषय होगा। पापात्मा के प्रति साधक का उपेक्षाभाव सर्वथा उपयुक्त है। ऐस व्यक्तियों को सन्मार्ग पर लाने के प्रयास प्राय: विपरीत फल ला देते है। पापी पुरुष अपने हितेशियों को भी उनकी वास्तविकता को न समझते हुए हानि पहुॅंचाने और उनके कार्यो में बाधा डालने के लिये प्रयत्नशील बने रहते है। इसलिए ऐसे व्यक्तियों के प्रति उपेक्षा अर्थात् उदासीनता का भाव श्रेयस्कर होता है। साधक इस प्रकार विभिन्न व्यक्तियों के प्रति अपनी उक्त भावना को जाग्रत रखकर चित्त को निर्मल स्वच्छ और प्रसन्न बनाये रखने में सफल रहता है, जो सम्प्रज्ञात योग की स्थिति को प्राप्त करने के लिये अत्यन्त उपयोगी है।

वृत्ति निरोध के उपायों के अन्तर्गत महर्षि पतंजलि ने नौ उपायों को उल्लेख किया हैं। जिनमें प्रथम एवं मुख्य उपाय का वर्णन करते हुए पंतजलि कहते है- ‘अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:’ योगसूत्र 1/12 

अर्थात् अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इन वृत्तियों का निरोध होता है। अभ्यास और वैराग्य पक्षी के दो पंखों की भांति है। जैसे पक्षी दोनों पंखों के द्वारा ही उड़ सकता है, एक पंख से उड़ पाना सम्भव नहीं है। वैसे ही अभ्यास और वैराग्य इन दोनों के एक साथ पालन करने से वृत्तियों का निरोध हो जाता है। कहा गया है- तत्र स्थितौ यत्नोSभ्यास:। योगसूत्र 1/13 

अर्थात् स्थिति में प्रयत्न का नाम अभ्यास कहलाता है। स्थिति का अर्थ है- वृत्तिहीन चित्त की एकाग्रता और यत्न का अर्थ है- उस एकाग्रता के लिये मानसिक उत्साह तथा दृढ़तापूर्वक यमादि योगांगो का अनुष्ठान। वैराग्य दो प्रकार का है- पर और अपर। लौकिक और वैदिन दोनों प्रकार के विषयों में चित्त का तृष्णा रहित हो जाना वैराग्य कहलाता है- दृष्टवदानुश्रविकविषयवितृश्णस्य वशीकारसंज्ञावैराग्यम्। योगसूत्र 1/15 

 स्रक्, चन्दन, वनिता, अन्न आदि लौकिक विषय है तथा वेदबोधित पारलौकिक स्वर्गादि के अमृतपान, अप्सरागमन आदि आनुश्रविक विषय है। इन दोनों से चित्त का तृष्णारहित हो जाना वैराग्य है। परवैराग्य के विषय में कहा गया है- तत्परं पुरूषख्यातेर्गुणवैतृश्ण्यम्। योगसूत्र 1/16 

प्रकृत्ति और पुरुष विषयक भेद का ज्ञान उदित हो जाने सत्वगुण के कार्यरूप विवके ज्ञान की तृष्णा का अभाव है वह परवैराग्य है। अपरवैराग्य सम्प्रज्ञातसमाधि का हेतु है और परवैराग्य असम्प्रज्ञातसमाधि का हेतु है। इस प्रकार अभ्यास और वैराग्य उत्तम कोटि के योगसाधकों के लिये चित्तवृत्तिरनिरोध का सर्वोत्कृश्ट उपाय है। उनमें भी जिस साधक के मन में जितना तीव्रसंवेग होगा, उतना ही वृत्तिनिरोध शीघ्र होगा- तीव्रसंवेगानामासन्न:। योगसूत्र 1/21 

द्वितीय उपाय के रूप में ईश्वरप्रणिधान को माना है। यह एक प्रकार की भक्ति है। पतंजलि ने यह साधन उत्तमकोटि के साधकों के लिए बताया है। इस स्थिति के साधकों के लिए एक अन्य सुगम उपाय बताते हुए पंतजलि कहते है- ‘ईश्वरप्रणिधानाद्वा’ अर्थात् ईश्वर प्रणिधान के पालन से भी वृत्तियों का निरोध हो जाता है। एक स्थान पर पतंजलि कहते है- ‘समाधिसिद्विरीष्वरप्रणिधानात्’ योगसूत्र 1/23 

अर्थात् ईश्वर प्रणिधान के पालन से समाधि की स्थिति शीघ्र प्राप्त होती है और समाधि की स्थिति में ही वृत्तियों का निरोध सम्भव है।

तृतीय उपाय के रूप में ऐसे ही योगियों के लिए भावनाचतुश्टय (मैत्री, करूणा, मुद्रिता और उपेक्षा) का पालन भी वृत्ति निरोध में सहायक माना है। भावनाचतुश्टय का उल्लेख कर दिया गया है। चतुर्थ उपाय के रूप में प्राणायाम को महत्तव देते हुए कहा है- प्रच्छर्दन विधारणाभ्यां वा प्राणस्य। योगसूत्र 1/35 

अर्थात् उदरस्थ वायु को नासिकापुट से बाहर निकालना प्रच्छर्दन और भीतर ही रोके रखने को विधारण कहा है। इसी का नाम रेचक एवं कुम्भक प्राणायाम है। इस प्रकार के प्राणायाम से भी चित्त स्थिर होता है। और समाधि की प्राप्ति होती है।

पॉंचवे उपाय के रूप में विषयवती प्रवृत्ति को माना जाता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश - ये पॉंच महाभूत है। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द ये पॉंच इनके विषय है। दिव्य और अदिव्य भेद से ये विषय दस प्रकार के हो जाते है। इनसे पॉंच दिव्य विषयों का योगशास्त्र प्रतिपादित उपाय द्वारा जो योगियों को साक्षात्कार होता है। 

छठे उपाय के अन्तर्गत ज्योतिश्मती प्रवृत्ति को ग्रहण किया जाता है। कहा गया है- विषोका वा ज्योतिश्मती। योगसूत्र 1/36 

चित्तविषयक साक्षात्कार तथा अहंकारविषयक साक्षात्कार विषोका ज्योतिश्मती कहे जाते है। हृदय कमल में संयम करने पर जो चित्त का साक्षात्कार होता है वह चित्तविषयक ज्योतिश्मती प्रवृत्ति कहलाती है। उस प्रवृत्ति के द्वारा भी चित्त प्रसन्न होता है।

वृत्तिविषयक के एक अन्य उपाय के रूप में मध्यम कोटि के साधकों के लिए पंतजलि क्रियायोग का वर्णन करते है। अर्थात् तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान के पालन से वृत्तियों का निरोध होता है। सबसे सुगम व सरल उपाय के रूप में पतंजलि यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इस अष्टांगिक मार्ग का उपदेश करते है। अर्थात् अष्टांग योग की पूर्णता होने पर वृत्तियों का निरोध हो जाता है।

सांतवा उपाय बीतरागविषयक चित्त है। पूर्वोक्त गन्ध आदि विषयों में संयम करने से चित्त स्थिरता को प्राप्त करता है। वैसे ही सनकादि, दत्ताश्रेय, व्यास, शुक्रदेव आदि वीतराग योंगियो के चित्त को आलम्बन करने से भी चित्त शीघ्र ही स्थिरता को प्राप्त करता है।

आठवें उपाय के रूप में स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बन है। निद्रा सुख में ध्यान लगाने से भी चित्त का शीध्र ही स्थैर्य हो जाता है।

नवम उपाय यथाभिमत ध्यान कहा गया है। जिस साधक को जो स्वरूप् अभीष्ट हो उसमें ध्यान करने से चित्त शीध्र स्थिरता को प्राप्त करता है। अनभिमत विषय में चित्त कठिनता से स्थिर होता है। इसलिए शिव, शक्ति, गणपति, विश्णु तथा सूर्य आदि देवताओं में से किसी एक में यदि विशेष रूचि हो तो उसी का ध्यान करने से उसमें स्थिर हुआ चित्त निर्गुण निराकार परमेश्वर में भी स्थिरता को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार चित्त प्रसादन के नौ उपायो का स्पष्ट उल्लेख महर्षि पतंजलि ने किया है।

Comments

  1. आपके अमिट प्रयास को कोटि कोटि प्रणाम आपके प्रयास ने योग को सहज सरल शब्दों में प्रस्तुत कर योग सोपान को को और भी मधुर कर दिया ,,, धन्यवाद

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  2. बहोत ही सरल और सचोट जानकारी दी है आपने . 🙏🙏🙏
    भवतां घन्यवादः🙏

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