पेरिस शांति सम्मेलन का इतिहास

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11 नवम्बर, 1918 ई. को प्रथम महायुद्ध की विराम संधि पर मित्र राष्ट्रों के सेनापति मार्शल फॉच एवं जर्मन प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किये। प्रथम विश्वयुद्ध में एक ओर अत्यधिक आर्थिक हानि हुई तो दूसरी ओर भारी संख्या में नरसंहार हुआ। इस कारण विश्व के सभी देश शांति स्थापना की ओर अग्रसर हुए। जर्मनी ने अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन की 14 सूत्रीय योजना को पढ़कर आत्मसमपर्ण किया था। अब शांति स्थापना एवं परास्त राष्ट्रों के साथ संधियाँ करने हेतु 1919 ई. में पेरिस में शांति सम्मेलन का आयोजन किया गया।

शांति-सम्मेलन का आयोजन फ्रांस की राजधानी पेरिस में किया गया। 1919 के प्रारंभ से विभिन्न देशों के प्रतिनिधि देशों के प्रतिनिधि-मण्डल वहाँ पहुँचने लगे। कई प्रतिनिधि-मण्डलों की संख्या तो सैकड़ों में थी, जिनमें मंत्री, कूटनीतिज्ञ, कानून और आर्थिक विशेषज्ञ, सैनिक, पूँतिपति, मजदरूों के नेता, संसदीय सदस्य और प्रमुख नागरिक थे। इसके अतिरिक्त संसार के कोने-कोने से पत्र-प्रतिनिधि एवं संवाददाता भी पेरिस पहुँचे थे। सम्मेलन के अवसर पर पेरिस में स्वयं अमेरिका के राष्ट्रपति तथा विभिन्न देशों के ग्यारह प्रधान मंत्री और बारह विदेश-मंत्री मौजूद थे। इस विशिष्ट जन-समूह में निम्नलिखित लोगों के नाम उल्लेखनीय हैं-फ्रांस सके क्लिमेंशी पिसों, टाडियू और कैम्बाे, अमेरिका के लासिंग और कर्नल हाउस, ब्रिटेन के लायड जॉर्ज, बालफर और बाने रली इटली के ओरर्क्रडैों और सोनिनो, बेल्जियम के हईमन्स, पोलैंड के डिमोस्स, यूगोिस्लाविया के पाशिष, चैकोस्लोवाकिया के बेनेस, यूनान के वेनिजेलोस तथा दक्षिण अफ्रीका के स्मट्स तथा वोथा इत्यादि। सोवियत रूस को सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए निमंत्रित नहीं किया गया था। पराजित राष्ट्रों को भी सम्मेलन में भाग लेने के लिए नहीं बुलाया गया था, क्योंकि उनका काम केवल इतना ही था कि संधि का मसविदा पूर्ण हो जाने पर अपने हस्ताक्षर कर दे।

18 जनवरी, 1919 को फ्रांस के विदेश-मंत्रालय में पोअन्कारे शांति-सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गये। इतने बड़े सम्मेलन में इतने महत्वपूर्ण काम होना व्यावहारिक रूप से असंभव था। अत: सम्मेलन की कार्यवाही को चलाने के लिए दस व्यक्तियों की एक ‘सर्वोच्च शांति परिषद’ बनाई गयी। इस परिषद में तत्कालीन महान राष्ट्रों-अमेरिका, फ्रांस , ब्रिटेन, जापान और इटली के प्रधान प्रतिनिधि थे। साधारण अधिवेशन में रखे जाने वाले विषयों का चुनाव वे ही करते थे। सम्मेलन ने उनके फैसलों को निर्विरोध स्वीकार कर लिया था। बाद में दस व्यक्तियों की परिषद भी शीघ्रता से काम करने और कार्यवाही की गोपनीयता रखने के दृष्टिकोण से बहुत बड़ी साबित हुई। अत: मार्च, 1919 में यह काम केवल चार व्यक्तियों के जिम्मे ही सुपुर्द कर दिया गया। ये चार व्यक्ति विल्सन, लायड जॉर्ज, क्लिमेंशाे तथा और लैंडा े थे। संसार के भाग्य का निपटारा पूरी तरह से इन महापरूु “ज्ञों के हाथ में था। सर्वसाधारण की तो बात ही क्या, स्वयं अन्य मित्रराष्ट्रों के राजनीतिज्ञों की भी कोई पूछ नहीं थी। उपर्युक्त चार व्यक्ति ही गुप्त रूप से सभी बातों का फैसला कर लिया करते थे। ‘सर्वोच्च शांति परिषद’ के अतिरिक्त सम्मेलन में 58 के लगभग छोटे-बड़े आयागे और उप-समितियाँ थी। इनका काम था कि वे विविध समस्याओं-राष्ट्रसंघ का संगठन, हरजाने की रकम, अल्पसंख्यक जातियों की समस्या इत्यादि प्रश्नों पर विशद रूप से विचार करके अपनी रिपाटेर् पेश करे। किन्तु इस रिपोर्ट पर अंतिम निर्णय देने का अधिकार ‘सर्वोच्च शांति-परिषद’ को था और सम्मेलन का कार्य इसी निर्णय का अनुमोदन करना था।

पेरिस शांति सम्मेलन के प्रमुख प्रतिनिधि 

पेरिस शांति सम्मेलन में 32 राज्यों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में पराजित राष्ट्रों जर्मनी, आस्ट्रीया, तुर्की, बल्गारिया को स्थान नहीं दिया गया था। पेरिस शांति सम्मेलन में अमेरिका के राष्ट्रपति के अतिरिक्त 11 देशों के प्रधानमंत्री, 12 देशों के विदेश मंत्री एवं अन्य राज्यों के प्रतिनिधि एकत्रित हुये। 1917 में रूस में क्रांति होने के कारण उसे भी इस सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया था। पश्चिमी राष्ट्र साम्यवादी क्रांति के विरोधी जो थे। इस तरह इस सम्मेलन में 32 राज्यों के 70 प्रतिनिधि सम्मिलित हुये। पेरिस शांति सम्मेलन में प्रमुख प्रतिनिधि निम्न थे -

फ्रांस का प्रधानमंत्री क्लीमेंशू 

फ्रांस का प्रधानमंत्री पेरिस शांति सम्मेलन का सर्वप्रमुख प्रतिनिधि था। यह इस सम्मेलन का सभापति भी था। क्लीमेंशू को ‘टाइगर ऑफ फ्रांस’ कहा जाता था। अमेरिका के विदेश मंत्री लैंसिंग के अनुसार - ‘क्लीमेंशु शांति सम्मेलन पर छाया हुआ था, उसमें महान नेताओं के सभी आवश्यक गुण विद्यमान थे।’ प्रतिशोध की भावना से ग्रसित क्लीमेंशु फ्रांस को पूर्णत: कुचलना चाहता था ताकि भविष्य में वह फ्रांस के लिये खतरा न बन सके।

इंग्लैण्ड का प्रधानमंत्री लायड जार्ज 

इंग्लैण्ड का प्रधानमंत्री एक व्यावहारिक एवं खुशमिजाज व्यक्ति था। वह तीक्ष्ण बुद्धि का स्वामी था। दूसरे व्यक्तियों के चरित्र एवं दुर्बलताओं को वह शीघ्र भांप लेने में सक्षम था। उसके इस सम्मेलन भाग लेने के 3 प्रमुख उद्देश्य थे -
  1. वह जर्मनी के नौसैनिक एवं थल सैनिक शक्ति को इतना कम कर देना चाहता था कि भविष्य में इंग्लैण्ड के लिये चुनौती न बन सके। 
  2. वह जर्मनी को तो कमजोर करना चाहता था, मगर फ्रांस को भी अधिक शक्तिशाली नहीं बनने देना चाहता था। 
  3. युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में लायड जार्ज अधिक से अधिक धन इंग्लैण्ड के लिये प्राप्त करना चाहता था।

अमेरिका का राष्ट्रपति वुड्राो विल्सन 

अमेरिका के राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन का प्रमुख उद्देश्य यूरोप में आदर्शमय शांति स्थापित करना चाहता था। युद्ध के दौरान विल्सन ने 8 जनवरी, 1918 को 14 सूत्रीय योजना की घोषणा की थी। जर्मनी ने इन 14 सूत्रों के पालन के आश्वासन पर ही युद्ध विराम लिया था। वुड्रो विल्सन इसीलिये चाहता था कि शांति संधियों में इन 14 सूत्रों का पालन हो। विल्सन युद्ध पश्चात भविष्य में शांति की स्थापना के लिये राष्ट्रसंघ की स्थापना भी कराना चाहता था।

इटली के प्रधानमंत्री ओरलैण्डो 

इटली प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारंभ में जर्मनी एवं आस्ट्रीया की ओर से लड़ा था। मगर बीच में उसने श्रगाल नीति का परिचय देते हुये पाला बदल लिया। उसने इंग्लैण्ड व फ्रांस से गुप्त संधि कर ली। इन्होंने उसे फ्यूम नगर दिलाने का आश्वासन दिया। इस तरह वह युद्ध में मित्र राष्ट्रों की ओर हो गया। पेरिस शांति सम्मेलन में वुडरो विल्सन ने गुप्त संधियों पर अमल नहीं होने की बात कही। इससे इटली की फ्यूम पाने की इच्छा पूर्ण न हो सकी। परिणामस्वरूप ओरलैण्डो पेरिस शांति सम्मेलन को बीच में ही छोड़कर वापस आ गया।

जापान के सायोन्जी एवं मकिनो 

जापान के इन प्रतिनिधियों की यूरोपीय समस्याओं में कोई रूचि नहीं थी। वे केवल पूर्वी एशिया में जापानी हितों की रक्षा की खातिर आये थे। चीन में जर्मन प्रभाव वाले शान्तुग क्षेत्र पर वर्चस्व स्थापित करने में इन्होंने विशेष रूचि दिखायी। यूरोपीय मामलों पर वे मूकदर्शक बने रहे।

पेरिस शांति सम्मेलन के उद्देश्य 

पेरिस शांति सम्मेलन के इन प्रतिनिधियों के समक्ष उद्देश्य थे -
  1. आत्म निर्णय के सिद्धांत को कार्य रूप प्रदान करना। 
  2. एक न्याय संगत एवं चिरस्थायी शांति संधि का मसौदा तैयार करना एवं उस पर हस्ताक्षर कराना।
  3.  प्रजातंत्र की सुरक्षा को कायम रखना। 
  4. राष्ट्र संघ के संविधान का निर्माण करना। 
  5. विश्वयुद्ध की महाविभीषिका से आहत भूखी जनता को अनाज मुहैया कराना। 
  6. प्रतिशोध की भावना से उत्तेजित मित्र राष्ट्रों की सेनाओं पर नियंत्रण कायम करना। 
  7. अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के 14 सूत्रों के अनुसार कार्य सम्पन्न करना। 
  8. विजेता एवं पराजित राष्ट्रों को संतुष्ट करना।

पेरिस शांति सम्मेलन की समस्या 

पेरिस शांति सम्मेलन को अपने उक्त उद्देश्यों को प्राप्त करना कोई सरल कार्य नहीं था। उसके समक्ष कई समस्यायें विद्यमान थीं। सबसे बड़ी समस्या प्रमुख प्रतिनिधियों के मध्य उचित तालमेल के अभाव एवं विरोधाभासी चरित्र की थी। एक ओर क्लीमेंशू एवं लायड जार्ज जर्मनी पर प्रतिशोधात्मक संधि आरोपित करना चाहते थे तो दूसरी ओर वुडरो विल्सन जर्मनी के आत्म निर्णय के सिद्धांत की रक्षा करना चाहते थे। क्लीमेंशू एवं लायड जार्ज की महत्वाकांक्षा के मार्ग में वुडरो विल्सन के 14 सूत्र बाधाएँ उत्पन्न कर रहे थे। अत: क्लीमेंशू एवं लायड जार्ज ने संधियों का मसौदा बनाते समय वुडरो विल्सन के 14 सूत्रों की अनदेखी की। चूँकि जर्मनी ने इन 14 सूत्रों की शर्तों पर ही आत्म समर्पण किया था अत: जर्मनी इससे अत्यधिक नाराज हुआ।

पेरिस शांति सम्मेलन में सम्पन्न संधियाँ 

पेरिस शांति सम्मेलन में काफी मशक्कत के पश्चात पाँच पराजित राष्ट्रों के साथ पाँच पृथक-पृथक सन्धियाँ सम्पन्न की गई -
  1. 28 जून, 1919 ई. जर्मनी के साथ वर्साय की सन्धि 
  2. 10 सितम्बर, 1919 ई. आस्ट्रीया के साथ सेंट जर्मन की संधि 
  3. 27 नवम्बर, 1919 ई. वल्गारिया के साथ न्यूली की संधि
  4. 4 जून, 1920 ई. हंगरी के साथ ट्रियानो की संधि
  5. 10 अगस्त, 1920 ई. टर्की के साथ सेवे्र की संधि 23 जुलाई, 1923 ई. टर्की के साथ लूसान की संधि (एक बार पुन:) 
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध 28 जुलाई, 1914 से 11 नवम्बर, 1918 तक लगभग 4) वर्ष चला। परन्तु शांति संधियों को सम्पन्न करने में पूरे 5 वर्ष लग गये। उक्त सभी संधियाँ पेरिस संधियाँ कही जाती हैं। इन सभी संधियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण जर्मनी के साथ की गई वर्साय की संधि थी। अब हम उक्त सभी संधियों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत करेंगे।

बर्साय की संधि, 28 जून, 1919 ई.

मित्र राष्ट्रों द्वारा पेरिस शांति सम्मेलन में 28 जून, 1919 ई. को वर्साय की संधि सम्पन्न की। सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में बर्साय की संधि सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इस संधि की पृष्ठभूमि में एक लम्बा इतिहास था, और इस संधि ने आगामी एक लम्बे इतिहास का आधार तैयार किया। इस संधि का प्रारूप इस प्रकार बना।
  1.  4 माह तक गहन विचार विमर्श के उपरान्त 6 मई, 1919 ई. को इसका अंतिम प्रारूप तैयार किया गया। 
  2. इस संधि मसौदा में कुल 230 पृष्ठ थे। यह 15 भागों में विभक्त थी। इसमें 439 अनुच्छेद (धाराएँ) थे एवं कुल 80,000 शब्द थे। 
  3. 20 अप्रैल, 1919 ई. को विदेश मंत्री ब्रोकडर्फि रान्टाजू के नेतृत्व में एक जर्मन प्रतिनिधिमण्डल वर्साय पहुँच गया था। इन्हें ट्रायनन पैलेस होटल में ठहराया गया था। 
  4. 7 मई, 1919 ई. को संधि का मसौदा जर्मन प्रतिनिधियों को सौंप दिया एवं इस पर विचार विमर्श हेतु 2 सप्ताह का समय उन्हें दिया।
  5. सम्पूर्ण जर्मनी में संधि की शर्तों का घोर विरोध हुआ।
  6. ब्रोकडर्फि ने कहा युद्ध की सारी जिम्मेवारी जर्मनी पर लादना न्यायसंगत नहीं है।
  7. जब इन्होंने संधि पर हस्ताक्षर करने में ना-नुकर की तो सिंह गर्जना करते हुये लायड जार्ज ने कहा - ‘जर्मन लोग कहते हैं कि वे संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। जर्मनी के समाचार पत्र एवं राजनीतिज्ञ भी यही बात कहते हैं। लेकिन हम लोग कहते हैं - “महानुभावो! आपको इस पर हस्ताक्षर करना है। अगर आप वर्साय में ऐसा नहीं करते हैं तो आपको बर्लिन में करना ही पड़ेंगे”।’
  8. जर्मन राजनीतिज्ञों ने 26 दिन बाद 60 हजार शब्दों का एक विरोध पत्र सौंपा।
  9. मित्र राज्यों ने जर्मन प्रस्तावों पर विचार-विमर्श कर संधि प्रस्ताव पर छोटे-मोटे संशोधन किये।
  10. संशोधित संधि प्रस्ताव युद्ध की चुनौती के साथ 5 दिन में हस्ताक्षर करने हेतु जर्मनी को सौंपा।
  11. शिंडेमान सरकार ने संधि को अस्वीकार कर त्यागपत्र दे दिया। 
  12. जर्मनी में नयी सरकार बनी गुस्टावजौर प्रधानमंत्री एवं मूलर विदेश मंत्री बना। 
  13. सराजवो हत्याकांड के दिन 28 जून, 1919 (5 वर्ष बाद) जर्मन प्रतिनिधियों ने संधि मसौदा पर हस्ताक्षर कर दिये। 

वर्साय की संधि की प्रमुख धाराएँ 

बर्साय की संधि की प्रमुख धाराएँ निम्न थीं -
  1. प्रादेशिक व्यवस्थायें :- 
    1. अल्सास लारेन फ्रांस को दे दिये गये। 
    2. जर्मन सीमा पर स्थित मेलमिडे और यूपेन बेल्जियम को दिये। 
    3. खनिज सम्पदा से भरपूर सार घाटी दोहन हेतु 15 वर्ष के लिये फ्रांस को दी गयी नियंत्रण राष्ट्रसंघ का रहेगा एवं एक आयोग शासन चलायेगा। 15 वर्ष बाद जनमत संग्रह द्वारा सार बासी निर्णय करेंगे कि जर्मनी, फ्रांस, राष्ट्र संघ किसके साथ रहें। 
    4. जर्मनी अधिकृत श्लेसविग में जनमत संग्रह किया गया उसके आधार पर उत्तरी श्लेसविग डेनमार्क को, दक्षिणी श्लेषविग जर्मनी को दिया गया। 
    5. जर्मनी को पूर्वी सीमा पर सर्वाधिक नुकसान हुआ। जर्मनी, आस्ट्रीया, रूस के पोल क्षेत्रों को लेकर स्वतन्त्र पोलैण्ड का निर्माण, समुद्र तट स्थापित करने के लिये जर्मनी का डेनजिंग बंदरगाह पोलैण्ड को दिया। 
    6. जर्मनी का वाल्टिक सागर तट पर स्थित मेमल बन्दरगाह राष्ट्रसंघ को दिया ताकि वह लिथुआनिया को स्थानान्तरित किया जाय।
    7. नवनिर्मित राष्ट्र वेल्जियम, पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया की स्वतंत्रता और प्रभुसत्ता को जर्मनी ने मान्यता दी। 
    8. चेकोस्लोवाकिया को उपरी साइलेशिया का छोटा क्षेत्र दिया। 
    9. जर्मन उपनिवेश ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, आस्ट्रीया, न्यूजीलैण्ड, बेल्जियम ने बाटे। 
    10. ब्रेस्ट लिटोवस्क सन्धि द्वारा जर्मनी ने एक बड़ा भाग रूस से छीन कर अपने राज्य में मिला लिया था। उसे बर्साय सन्धि द्वारा इस भाग पर लैटविया, एस्टोनिया, लिथुआनिया की स्थापना की गई। 
  2. सैनिक व्यवस्थायें :- 
    1. अनिवार्य सैनिक सेवा समाप्त की गयी। 
    2. स्थल सेना 1 लाख निर्धारित, अधिकारियों को कम से कम 25 वर्ष तथा सैनिकों को 12 वर्ष सेना में रहना पड़ेगा। 
    3. गोला बारूद, अस्त्र-शस्त्र सीमित किये एवं निर्यात प्रतिबन्धित किया। 
    4. जर्मनी अब वायुसेना नहीं रखेगा।
    5. नौसेना सीमित - 6 युद्धपोत, 6 लड़ाकू विमान, 12 तोपची जहाज, पनडुब्बी नहीं एवं 15,000 सैनिक अधिकारियों सहित। 
  3. अन्य व्यवस्थायें :- 
    1. नदियाँ - एल्व, ओडर, नीमन, डेन्यूब अन्तर्राष्ट्रीय घोषित। 
    2. कील नहर और इसके मार्गों को सब राष्ट्रों के लिये खोला गया। 
    3. विलियम प् पर घोर अपराध का अभियोग। नीदरलैण्ड ने उसे सौंपने से इन्कार किया अत: मुकदमा न चल सका। 
    4. जर्मनी को प्रथम विश्वयुद्ध का उत्तरदायित्व स्वीकार करना पड़ा। 
    5. क्षतिपूर्ति आयोग का गठन। 
    6. युद्ध में नष्ट हुये प्रदेशों के पुनर्निर्माण के लिये जर्मनी फ्रांस, इटली, बेल्जियम, लक्झमवर्ग को कोयला देगा, फ्रांस को - अमोनियम सल्फेट, कोलतार आदि देगा। 
    7. क्षतिपूर्ति राशि का अन्तिम निर्णय होने तक जर्मनी 1921 तक 5 अरब डालर देगा।
    8. सन्धि शर्तों को पूरा करने के लिये कुछ गारन्टियों की भी व्यवस्था की गई। राइन के पश्चिम क्षेत्र पर सन्धि लागू होने के बाद आगामी 15 वर्षों तक मित्र राष्ट्रों की सेनाओं का अधिकार रहेगा। यदि जर्मनी शर्तों का निष्ठापूर्वक पालन करता है तो 5 वर्ष बाद कोलोन क्षेत्र, 10 वर्षों बाद कोबलेंज क्षेत्र, 15 वर्ष बाद मेंज तथा अन्य अधिकृत जर्मन क्षेत्रों से सेनायें हटा ली जायेंगी। 

वर्साय की संधि का आलोचनात्मक मूल्यांकंन 

वर्साय की संधि की प्राय: अधिकांश विद्वानों ने आलोचना की है। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जिन्हें कि इतिहास में विशेष रूचि थी ने वर्साय की संधि पर इन शब्दों में आलोचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है। “मित्र राष्ट्र घृणा और प्रतिशोध की भावना से भरे हुए थे वे माँस का पिण्ड ही नहीं चाहते थे बल्कि जर्मनी के अर्द्धमृत शरीर से रक्त की आखिरी बूँद तक खींच लेना चाहते थे।” वर्साय की संधि का आलोचनात्मक अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर किया जा सकता है।
  1. प्रतिशोधात्मक संधि - वर्साय की संधि एक प्रतिशोधात्मक संधि थी मित्र राष्ट्र विशेषकर फ्रांस में जर्मनी के प्रति प्रतिशोध की भावना व्याप्त थी। फ्रांस के राजनीतिज्ञ एवं जनता जर्मनी से 10 मई, 1871 की फैकफर्ट की अपमानजनक संधि का प्रतिशोध लेना चाहते थे। अत: यह प्रतिशोधात्मक संधि थी।
  2. अपमानजनक संधि - अमेरिकी विदेशमंत्री लैन्सिग ने कहा था कि “सन्धि की शर्तें काफी कठोर एवं अपमानजनक थी उनमें अधिकांश ऐसी थी जिन्हें क्रियान्वित किया जाना मेरी दृष्टि से असम्भव था।” इतिहासकार हैजैजैजन ने लिखा है - “जर्मन जैसा स्वाभिमानी राष्ट्र इन अपमानजनक शर्तों को स्वीकार नहीं कर सकता अत: यह स्वाभाविक ही था कि भविष्य में पुन: युद्ध द्वारा वह अपने अपमान को धोने और क्षतिपूर्ति की पूर्ति का प्रयत्न करे। अत: स्पष्ट है कि यह संधि अपमानजनक थी।” 
  3. आरोपित संधि - ई.एच. कार महोदय ने इसे आरोपित संधि करार देते हुए कहा कि “वर्साय की संधि में आरोप का भाव सभी शांति संधियों की अपेक्षा अधिक था” इस संधि पर जर्मन के प्रतिनिधियों से धमकी देकर हस्ताक्षर करवाकर उन पर यह संधि जबरदस्ती थोपी गई। इससे पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि यह एक आरोपित संधि थी। 
  4. शिष्टाचार का उल्लंघन - संधि मसौदे पर हस्ताक्षर हेतु जर्मन प्रतिनिधियों को बुलाया गया उनके साथ उस समय शिष्टाचार का व्यवहार नहीं किया गया। उन्हें कटीले तारों से घिरे एक बंगले में रूकाया गया तथा उनके साथ अपराधी की तरह बाहर तथा भीतर दोनों जगह व्यवहार किया गया। इस प्रकार इस संधि में शिष्टाचार का उल्लंघन किया गया। 
  5. संधि का आधार विश्वासघात - जर्मनी ने विल्सन के 14 सूत्रों का पालन करते हुए युद्ध में आत्मसमर्पण किया था। परन्तु जब संधि की गई तो विल्सन के 14 सूत्रों को कोई अहमियत नहीं दी गई। इंग्लैण्ड का प्रमुख उद्देश्य था कि युद्ध की लूट को आपस में बाँटा जाए। जर्मनी के साथ विश्वासघात किया गया। जर्मनी के साथ राष्ट्रीयता के सिद्धांत का पालन नहीं किया गया था। 
  6. एकपक्षीय संधि - संधि की शर्तें पूर्णत: एकपक्षीय थी। संधि मसौदा तैयार करते समय जर्मनी के साथ विचार-विमर्श की तो दूर की बात इसे सम्मेलन में आमंत्रित भी नहीं किया। एडम्स गिवन्स ने सही लिखा है - “पराजित राष्ट्रों की अनुपस्थिति में यह संधि एकतरफा थी इसकी शर्तों को कार्यान्वित करना केवल उसी समय तक संभव था जब तक कि वह शक्ति उसे कार्यान्वित कर सके।” 
  7. द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज - वर्साय की संधि कोई शांति संधि नहीं थी, द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज इसमें स्पष्टत: मौजूद दिखाई दे रहे थे। चैम्बर्स एण्ड हैरिस ने लिखा है - “शांति सम्मेलन में एक विष वृक्ष के बीज का आरोपण किया जो 1939 ई. में एक विशाल संहारक वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो गया और उसके कटु फलों को संपूर्ण संसार को बुरी तरह चखना पड़ा।” 
अत: यह सच है कि वर्साय की संधि प्रत्येक दृष्टि से अनुचित थी। यह संधि जर्मनी पर जबरदस्ती थोपी गई थी, जर्मनी को पंगू बनाने का प्रयास किया गया था।

आस्टिय्रा के साथ सेंट जर्मन की संधि, 10 सितम्बर, 1919 

पेरिस के समीप सेंट-जर्मन नामक स्थान पर 10 सितम्बर, 1919 को आस्ट्रिया और मित्र राष्ट्रों के बीच संधि हुई। इसके द्वारा आस्ट्रिया-हंगरी का साम्राज्य भंग कर दिया गया और छोटे-छोटे टुकड़ों में विभक्त हो गया था। जिसमें इटली, चेकोस्लोवाकिया, यूगोस्लोविया, पोलैण्ड और रूमानिया आदि देश थे। इस संधि के अनुसार निम्नलिखित देशों को विभिन्न क्षेत्र प्राप्त हुए -
  1. इटली को आस्ट्रिया से दक्षिण टायरल, ट्रैंटिनो, ट्रीस्ट, इरिट्रिया, एवं डालमेशिया के तटवर्ती कुछ द्वीप प्राप्त हुए। 
  2. चेकोस्लोवाकिया को वोहीमिया, मोराविया, आस्ट्रियन, साइलेशिया का अधिकांश भाग और आस्ट्रिया के दक्षिणी क्षेत्र का कुछ भाग प्राप्त हुआ।
  3. पोलैण्ड को मलेशिया का क्षेत्र प्राप्त हुआ। 
  4. रूमानिया को वोकोविनया का प्रदेश प्राप्त हुआ। 
  5. यूगोस्लाविया को डालमेशिया, वोस्मिया-हर्जगोबीना आदि क्षेत्र प्राप्त हुए। 
इस प्रकार अब आस्ट्रिया का क्षेत्रफल सिमटकर छोटा सा बचा और आबादी मात्र सत्तर लाख रह गई। इस संधि के अनुसार आस्ट्रिया को बाध्य किया गया कि वह युद्ध की जिम्मेवारी स्वीकार करे और इसके लिए जर्मनी की तरह एक बहुत बड़ी रकम मित्र राष्ट्रों को हर्जाने के रूप में दे। आस्ट्रिया को युद्ध के अपराधियों को सौंपने के लिए कहा गया। अंतत: सेंट-जर्मन की सन्धि की धारा 88 द्वारा आस्ट्रिया पर यह प्रतिबंध लगा दिया गया कि वह भविष्य में ऐसा कोई प्रयत्न न करे जिसमें स्वतन्त्र राज्य के रूप में उसका नामोनिशान मिट जाय।

बल्गेरिया के साथ न्यूली की संधि 

27 नवम्बर, 1919 के पेरिस के पास न्यूली नामक स्थान पर मित्र राष्ट्रों तथा वल्गेरिया के साथ संधि हुई। संधि के अनुसार -
  1. पश्चिमी थ्रेस (Thrace) का भाग यूनान को देना पड़ा। इससे उसकी बड़ी हानि हुई। क्योंकि थ्रेस के निकल जाने से एजियन सागर से उसका संबंध टूट गया। 
  2. वल्गेरिया की सेना की संख्या घटाकर 20,000 कर दी गयी और उसकी नौ-सेना को भंग कर दिया गया। 
  3. हर्जाने के रूप में एक भारी बड़ी रकम भी लाद दी गयी। 

हंगरी के साथ त्रियानों की संधि, 4 जून, 1920 

युद्ध समाप्ति के पश्चात हंगरी की आंतरिक स्थिति इतनी अव्यवस्थित हो गई कि वहाँ कोई सरकार ही नहीं बन सकी। नवम्बर, 1920 में वहाँ एक नयी सरकार गठित की गई जिसे मित्र राज्यों ने मान्यता दे दी। 4 जून, 1920 को हंगरी के प्रतिनिधि मण्डल ने त्रियानो के राजमहल में संधि पर हस्ताक्षर कर दिये। इस संधि के अनुसार -
  1. हंगरी राज्य का बहुत सा भाग यूगोस्लाविया, चेकोस्लोवाकिया और रूमानिया को दिया गया।
  2. यूगोस्लोवाकिया को हंगरी, कोटिया, स्लावोनिया, और वनाट का कुछ भाग दे दिया गया। 
  3. चेकोस्लोवाकिया को कार्पोशियन पर्वत के दक्षिण और पूर्व की ओर स्थित कुछ भाग प्राप्त हुआ।
  4. रूमानिया को ट्रांसिलवानिया का प्रदेश और उसके पश्चिम में स्थित कुछ मैदानी भाग एवं वनाट का दो तिहाई भाग प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त आस्ट्रिया को और भी राज्य प्राप्त हुआ। विजित राज्यों में आस्ट्रिया को अत्यधिक राज्य प्राप्त हुआ। 
इस प्रकार ट्रियानों की संधि के अनुसार हंगरी का क्षेत्रफल एवं जनसंख्या बहुत कम रह गई। क्षेत्रफल 1,25,000 वर्ग मील की जगह 35,000 वर्ग मील तथा जनसंख्या 2 करोड़ की जगह 80 लाख रह गई। नौसेना भंग कर दी गई तथा सेना घटाकर 35,000 कर दी गई।

तुर्की के साथ सेव्रे की सन्धि, 10 अगस्त, 1920 

पेरिस की सन्धियों में से यह अन्तिम सन्धि थी। युद्ध में मित्र राज्यों ने गुप्त सन्धियों के द्वारा तुर्की के साम्राज्य को विभाजित करने का निश्चय कर लिया था। पेरिस के निर्णायकों का मुख्य उद्देश्य तुर्की साम्राज्य की समस्त अ-तुर्की जातियों को मुक्त करना था। इस संधि के अनुसार -
  1. तुर्की को मिश्र, सूडान, साइप्रस त्रिपोलीटानिया, मोरक्को, और ट्यूनिस, अरब पेलेस्टाइन, मेसोपोटामिया तथा सीरिया पर अपने समस्त अधिकार छोड़ने पड़े। 
  2. यूनान (ग्रीस) को पूर्वी थ्रेस का कुछ भाग और एजियन सागर में स्थित कुछ द्वीप प्राप्त हुए। 
  3. डार्डेनलीज के जलमडरूमध्य को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र घोषित किया गया, परन्तु कान्सटेन्टीनोपल और उसके आसपास का भाग तुर्की के सुल्तान के अधीन बना रहा। 
  4. तुर्की के आर्मीनिया को स्वतन्त्र राज्य मान लिया और बुदिस्तान को आन्तरिक स्वराज्य देने का वचन दिया।
  5. अरब में हिजाव के राज्यों को भी मान लिया गया। लेबनान, सीरिया, मेसोपोटामिया और पेलेस्टाईन का अधिदेशाधीन क्षेत्र बनाया गया। एशिया माइनर में केवल एनालेलिया का क्षेत्र तुर्की के अधीन बना रहा। 
इस संधि के तहत एक बड़ा भू-भाग तुर्की के हाथ से निकल गया। यह संधि कार्यान्वित न हो सकी। मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में तुर्की में इस संधि के विरूद्ध एक जबरदस्त आन्दोलन खड़ा हुआ। मुस्तफा कमाल पाशा ने खलीफा की शक्ति का अन्त कर दिया।

लोसान की संधि 

मित्र राष्ट्रों को मजबूर होकर 23 जुलाई, 1923 को तुर्की के साथ लोसान की संधि सम्पन्न करना पड़ी। इस संधि के द्वारा रमर्ना, थे्रेस, कान्स्टेन्टीनोपल तुर्की को वापस कर दिये गये। तुर्की की सार्वभौम सत्ता स्वीकार कर ली गयी।

पेरिस शांति सम्मेलन की कठिनाइयाँ

सम्मेलन के सम्मुख विविध प्रकार की जटिल समस्याएँ थीं। उदार सिद्धांतों को सामने रखकर मित्रराष्ट्र लड़ाई लड़े थे। युद्ध के समय समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्रवाद इत्यादि के नारे बुलन्द किये गये थे। पर युद्ध के बाद विजय के मद में चरू होकर मित्रराष्ट्र इन सारे सिद्धांतों को भूल गये वे अब इस चिन्ता में थे कि पराजित शत्रुओं से किस प्रकार अधिक-से-अधिक हरजाना वसूल किया जाय और किस प्रकार उनके भग्न साम्राज्य को आपस में बाँट लिया जाय। कहने को तो अब भी सारे फैसलों का आधार राष्ट्रपति विल्सन द्वारा प्रतिपादित ‘चौदह सूत्र‘ था, पर वास्तव में सूत्र केवल आदर्शमात्र ही थे। क्रिया में उन्हें कोई महत्व नहीं दिया गया। विश्व-युद्ध के समय अनेक गुप्त-संधियां हुई थीं। इन गुप्त संधियों के आधार पर मित्र-राष्ट्रों ने इटली, जापान, रूमानिया इत्यादि देशों को तरह-तरह के आश्वासन दिये थे और इन्हीं आश्वासनों को पाकर ये देश युद्ध में शामिल हुए थे। स्वयं मित्रराष्ट्रों के बीच ही अनेक गुप्त संधिया हुई थी। विल्सन के चौदह सूत्र अर्थात मित्रराष्ट्रों की गुप्त संधियों का विरोध। ब्रिटेन और फ्रांस गुप्त आश्वासनों को पूरा करन के लिए विवश थे। उन्हे विल्सन के आदर्शवादी सूत्रों की कोई परवाह नहीं थी। विजय के बाद उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएँ इतनी बढ़ गयी थी कि परास्त देशों के न्याययुक्त अधिकारों की उपेक्षा करने में उन्हें जरा भी हिचकिचाहट नहीं होती थी। पर विल्सन का कहना था कि इस समझौते में केवल विजयी राष्ट्रों के स्वार्थ तथा हित का ही ध्यान न रखा जाय, बल्कि उन राष्ट्रों की इच्छाएँ भी ध्यान में रखी जायँ जिन पर इस समझौते का असर पड़गे ा। सैद्धान्तिक मतभेद के कारण सम्मेलन कटुता के वातावरण से अछूता नहीं रह सका। एक बार तो स्थिति इतनी गंभीर हो गयी कि राष्ट्रपति विल्सन ने सम्मेलन का बहिष्कार करके अमेरिका लौटने का निर्णय कर लिया था। इटली का प्रधान मंत्री ओरलैंडो अपने साथियों सहित सम्मेलन को छोड़कर रोम तक वापस चला गया था। जापानी प्रतिनिधि-मण्डल ने भी कुछ इसी प्रकार की धमकी दी। पर मनमुटाव के इस वातावरण के बावजूद सम्मेलन ने किसी तरह अपना काम पूरा किया। सम्मेलन ने 1600 बैठकें करके अपने 58 आयोगो  द्वारा जर्मनी के साथ संधि का एक मसविदा तैयार किया।

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