चुनाव आयोग का गठन, कार्य एवं प्रक्रिया

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चुनाव आयोग का गठन 

इसकी शुरुआत उद्देशिका से ही हो जाती है भारतीय संविधान की उद्देशिका यह उद्घोशित करती है कि भारत एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य है। लोकतन्त्र भारतीय संविधान का एक मूलभूत ढ़ँाचा है। किसी भी प्रजातान्त्रिक व्यवस्था वाले देश के लिए चुनाव एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। चुनाव द्वारा न केवल जन प्रतिनिधि का निर्धारण होता है अपितु जनता द्वारा जनता की सरकार का भी चयन होता है। चर्चिल ने लोकतन्त्रात्मक गणराज्य के लिए कहा कि इसमें एक साधारण व्यक्ति साधारण से कागज पर क्रास लगाता है। लोकतन्त्र के स्थायित्व के लिए चुनाव की महत्ता को देखते हुए संविधान में एक पृथक एवं स्वतन्त्र निर्वाचन आयोग का प्रावधान किया गया है जो राज्य तथा केन्द्र सरकारों के नियन्त्रण से बाहर होगा।

भारत का निर्वाचन आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है। संविधान के उपबंधों के अनुरूप 25 जनवरी 1950 को इसकी स्थापना की गयी, अनुच्छेद 324 में प्रावधान किया गया है कि-
  1. संविधान के अधीन संसद और प्रत्येक राज्य के विधानमंडल के लिए कराए जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए तथा राश्ट्रपति और उपराश्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने का और उन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण, एक आयोग में निहित होगा (जिसे इस संविधान में निर्वाचन आयोग कहा गया है)।
  2. निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्तों से, यदि कोई हों, जितने राश्ट्रपति समय-समय पर नियत करें, मिलकर बनेगा तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्तों और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, संसद द्वारा इस निमित्त बनाई गई विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राश्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
  3. जब कोई अन्य निर्वाचन आयुक्त इस प्रकार नियुक्त किया जाता है तब मुख्य निर्वाचन आयुक्त निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा।
  4. लोक सभा और प्रत्येक्ष राज्य की विधान सभा के प्रमुख साधारण निर्वाचन से पहले तथा विधान परिशद् वाले प्रत्येक राज्य की विधान परिशद् के लिए प्रथम साधारण निर्वाचन से पहले और उसके पश्चात् प्रत्येक द्विवार्शिक निर्वाचन से पहले, राश्ट्रपति निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात, खंड(1) द्वारा निर्वाचित आयोग को सौंपे गए कृत्यों के पालन मे आयोग की सहायता के लिए उतने प्रादेशिक आयुक्तों की भी नियुक्ति कर सकेगा जितने वह आवश्यक समझे। 
  5. संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, निर्वाचन आयुक्तों और प्रादेशिक आयुक्तों की सेवा की शर्तें और पदाविधि ऐसी होंगी जो राश्ट्रपति नियम द्वारा अवधारित करें। परन्तु मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर ही हटाया जाएगा, जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है अन्यथा नहीं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सेवा की शतोर्ं में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए लाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा। किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त या प्रादेशिक आयुक्त को मुख्य आयुक्त की सिफारिश पर ही पद से हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं। 
  6. जब निर्वाचन आयोग ऐसा अनुरोध करें, तब राश्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल निर्वाचन आयोग का प्रादेशिक आयुक्त को उतने कर्मचारीवृंद उपलब्ध कराएगा जितने खंड (1) द्वारा निर्वाचन आयोग को सौंपे गए कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हों। अत: चुनाव आयोग का गठन निम्न लोगों को मिलकर होगा। 
    1. मुख्य निर्वाचन आयुक्त :- अनु0 324 के खण्ड (2) के अनुसार एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त होगा जिसे उपखण्ड (3) के अनुसार अध्यक्ष के रूप में जाना जायेगा। 
    2. अन्य निर्वाचन आयुक्त :- अनु0 324 के खण्ड (2) के अनुसार उतने अन्य निर्वाचन आयुक्त होंगे जितने राश्ट्रपति समय-समय पर नियत करे। खण्ड (2) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राश्ट्रपति संसद द्वारा बनायी गयी विधि के अधीन करेगा। 
    3. प्रादेशिक निर्वाचन आयुक्त :-:- अनु0 324 के खण्ड (4) के अनुसार लोकसभा, राज्य की विधानसभा और विधान परिशद के निर्वाचन से पहले राश्ट्रपति निर्वाचन आयोग से सलाह लेकर उतने प्रादेशिक निर्वाचन आयुक्तों को नियुक्त कर सकेगा जितने वह उचित समझता है। 
    4. कर्मचारी:-अनु0 324 के खण्ड (5) के अनुसार निर्वाचन आयोग के अनुरोध पर राश्ट्रपति या राज्य का राज्यपाल निर्वाचन आयोग या प्रादेशिक आयुक्तों को उतने कर्मचारी उपलब्ध करायेगा जितने आवश्यक हो। 
 इस वाद ने अभिनिण्र्ाीत किया गया की अनु0 324(2) के अधीन निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति एवं पदच्युति की शक्ति राश्ट्रपति में है और पद समाप्ति के आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती है।

चुनाव आयोग के कार्य

अनुच्छेद 324 के अनुसार स्वतन्त्र एवं निश्पक्ष चुनाव के पश्चात एक लोक कल्याणकारी सरकार सत्ता में आये इस हेतु निर्वाचन आयोग को चुनाव से सम्बन्धित कुछ कृत्य हमारे संविधान द्वारा सौंपे गये हैं जो निम्नलिखित हैं।
  1. संसद और राज्य विधानमण्डलों के निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराना एवं निर्वाचन कराना। 
  2. राश्ट्रपति उपराश्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों का अधीक्षण निदेशन और नियन्त्रण करना और निर्वाचन कराना। 
  3. संसद तथा राज्य विधानमण्डलों के निर्वाचन सम्बन्धी सन्देहो और विवादों के निर्णय के लिए निर्वाचन अधिकरण नियुक्त करना।
  4. मूल संविधान के अनुसार निर्वाचन आयोग चुनाव सम्बन्धी विवादों को भी सुनता था परन्तु 1966 में संविधान में 19 वें संशोधन द्वारा संशोधन करके चुनाव याचिकाओं को निण्र्ाीत करने का अधिकार उच्च न्यायालय को दिया गया है। 
  5. निर्वाचन आयोग विभिन्न राजनीतिक दलों को राश्ट्रीय दल या क्षेत्रीय दल या अमान्यता प्राप्त पंजीकृत दल के रूप मान्यता प्रदान करता है और इस प्रकार मान्यता प्राप्त करने के आधार भी विनिश्चत करता है। 
  6. मान्यता प्राप्त राजनीति दलों को आरक्षित चुनाव चिन्ह प्रदान करना और इस पर विभिन्न राजनीतिक दलों के मध्य विवादों का निपटारा आयोग ही करता है। 
  7. चुनाव क्षेत्रों का परिसीमाकंन परिसीमन आयोग अधिनियम 1952 के आधार पर चुनाव आयोग करता है। 
  8. चुनाव आयोग चुनाव से सम्बन्धित आचार संहिता लागू करवाता है और आयोग द्वारा लागू आचार संहिता का पालन न करने वाले प्रत्याशियों तथा राजनीतिक दलों के विरूद्ध आयोग कार्य भी कर सकता है। 
  9. चुनाव आयोग चुनाव याचिकाओं के सम्बन्ध में सरकार को आवश्यक परामर्श देता है।
  10. राश्ट्रपति और राज्यपाल क्रमश: संसद और विधानमण्डलों के सदस्यों की अयोग्यताओं के सम्बन्ध में चुनाव आयोग से परामर्श कर सकते हैं।  
  11. चुनाव आयोग अपने कार्यों के सम्बन्ध में प्रतिवेदन समय-समय पर सरकार को देता है।
  12. चुनाव आयोग को किसी निर्वाचन स्थान को रद्द करने की भी शक्ति प्राप्त है। 
 इन समस्त कार्यों हेतु चुनाव आयोग को निम्नलिखित विधिक अधिनियमों से शक्ति प्राप्त होती है।
  1. लोक प्रतिनिधत्व अधि0-1950 :- इस अधिनियम के अन्तर्गत प्रावधानों का अनुसरण किया जायेगा उनका उल्लेख है। 
  2. लोक प्रतिनिधित्व अधि0 1951 :- इस अधिनियम के अन्तर्गत चुनाव हेतु मतदान हो जाने के बाद किन प्रावधानों का अनुसरण किया जायेगा इसके सम्बन्ध में प्रावधान किया गया है।
  3. परिसीमन आयोग अधिनियम 1952 :- इस अधिनियम के अन्तर्गत चुनाव क्षेत्रों के सीमांकन से सम्बन्धित प्रावधान हैं। 
 कैप्टन चावला सिंह बनाम भारत का निर्वाचन आयोग, 1992 के बाद में न्यायालय ने धारित किया कि निर्वाचन व्ययों का ऐसा लेखा आयोग द्वारा निर्धारित या विहित रीति में ही प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। अभ्यथ्र्ाी उसे किसी भी रूप में नहीं पेश कर सकता है। धारा 146 में निर्वाचन आयोग को जांच के विशय में सिविल न्यायालय की निम्नांकित शक्तियां प्रदत्त की गयी हैं-
  1. किसी व्यक्ति को साक्ष्य हेतु समन करना,
  2. कोई दस्तावेज या अभिलेख मँगवाना,
  3. उसका शपथ पर परीक्षण करना,
  4. शपथ पत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना, 
  5. साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिये कमीशन निकालना, आदि।
नन्दलाल शर्मा बनाम निर्वाचन आयोग (1984) के वाद में न्यायालय ने कहा कि जाँच में निर्वाचन आयोग का कर्त्तव्य होता है कि वह पक्षकारों को सुनवायी व दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करे। यदि आयोग द्वारा ऐसा अवसर प्रदान कर दिया जाता है, तो फिर जाँच में उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं रह जाती है।

चुनाव की प्रक्रिया

चुनाव की प्रक्रिया हेतु निम्नलिखित आवश्यकताऐं जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के द्वारा परिणीत की गयी हैं जो निम्नलिखित हैं।

निर्वाचन मशीनरी

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के भाग 4 में निर्वाचन के संचालन के लिये मशीनरी का प्रावधान किया गया है। निर्वाचन को सफल बनाने के लिए एक मशीनरी की आवश्यक होती है। जिसका अधीक्षण, निर्देशन व नियन्त्रण निर्वाचन आयोग में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(1) के अनुसार निहित होगा। निर्वाचन आयोग एक स्वतन्त्र निकाय है। उच्चतम न्यायालय की तरह सरकारी कार्यकारिणी तंत्र के बिना हस्तक्षेप में यह अपनी गतिविधियों को निर्बाध रूप से संचालित करता है। इस मशीनरी में मुख्य रूप से निम्न व्यक्ति जुड़े होते हैं-
  1. मुख्य निर्वाचन अधिकारी/आयुक्त 
  2. जिला निर्वाचन अधिकारी/आयुक्त 
  3. रिटनिर्ंग आफीसर 
  4. पीठासीन आफीसर
  5. पोलिंग आफीसर आदि। 
अनुच्छेद 324(2) के अनुसार निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्तों से, जितने राश्ट्रपति समय-समय पर संसद द्वारा बनाई गयी विधि के अधीन नियुक्त किये जायेंगे, बनेगा।
जो बहुत प्रमुख व हमेशा व्यवहार में आने वाले अधिकारी हैं उनको 3 श्रेणियों मेंं बाँटा जा सकता है।
प्रथम श्रेणी :-
  1. इलेक्शन कमीशनर 
  2. चीफ इलेक्टोरल आफीशर
  3. डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफीसर। 
 द्वितीय श्रेणी -
  1. एजेंट/ पुलिस फोर्स

इलेक्शन कमीशन

इलेक्शन कमीशन देश का सबसे बड़ा अधिकारी है। देश के चुनाव से सम्बन्धित सभी कार्यवाही इसके द्वारा संपादित किये जाते हैं। सरकारी हस्तक्षेप इसमें अपेक्षित नहीं है, परन्तु इसके द्वारा केवल कानूनी व्याख्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का आदर किया जाता है।

चीफ इलेक्टोरल ऑफीसर

चीफ इलेक्टोरल ऑफीसर हर स्टेट के चुनाव का प्रमुख है तथा दिशा-निर्देश व्यवस्था और नियन्त्रण पर इसी का आदेश प्रभावी होता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अतिरिक्त अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के संदर्भ में सुप्रीमकोर्ट ने एस0एस0 धमोआ बनाम भारत संघ, (1991) सु0को0 में अवधारित किया कि अनुच्छेद 324(2) में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति एवं पदच्युति की शक्ति राश्ट्रपति में निहित है। राश्ट्रपति जितना, उचित समझे उतने आयुक्त नियुक्त कर सकता है और यदि कार्य समाप्त हो जाता है तो पद को समाप्त भी कर सकता है। पद समाप्ति के आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती है।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 20 में मुख्य निर्वाचन अधिकारी के साधारण कर्त्तव्यों का उल्लेख किया गया है इसके अनुसार मुख्य निर्वाचन अधिकारी का कर्त्तव्य है कि निर्वाचन आयोग के अधीक्षण निर्देशन व नियन्त्रण के अधीन रहते हुए निर्वाचनों के संचालन का पर्यवेक्षण (superview) करें।

डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफीसर 

आर0 पी0 एक्ट 1951 की धारा 20क के अनुसार जिला निर्वाचन अधिकारी का कर्त्तव्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अधीक्षण निर्देशन व नियन्त्रण के अधीन रहते निर्वाचन में जुड़े सब कार्यों का समन्वय व पर्यवेक्षण करना है। इसका कार्य चुनाव की व्यवस्था करना है। उसके प्रति निर्देश देना, और चुनाव को नियन्त्रित करना है। यह जिला भर का चुनाव संचालक है।

चुनाव अधिकारी

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 21 प्रावधान करती है कि एक रिटर्निंग आफीसर भी होगा। यह सरकार का या स्थानीय अधिकारी (प्राधिकारी) का आफीसर, राज्य सरकार के परामर्श से होगा। पशुपति नाथ सुकुल बनाम नेमचन्द्र जैन (1984) सु0को0 में उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि ‘सरकारी आफीसर’ का मतलब केवल कार्यकारी अधिकारी भर से नहीं है, चुनाव प्रक्रिया में यह सरकारी आफीसर, कार्यवाही विधायिका व न्यायिक तीनों प्रकार की अधिकारिता को ग्रहण करता है।

धारा 22 के अनुसार निर्वाचन आयोग किसी रिटनिर्ंग आफीसर की उसको कृत्यों के पालन में सहायता करने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों को सहायक रिटनिर्ंग आफीसर के रूप में नियुक्त किया जा सकेगा, परन्तु सहायक रिटनिर्ंग आफीसर के पद के लिए वही व्यक्ति योग्य होगा जो सरकार का स्थानीय प्राधिकारी का आफीसर होगा।

हर सहायक रिटनिर्ंग आफीसर, रिटनिर्ंग आफीसर के अधीन रहते हुए उनके सभी कार्यों को या उनमें से किसी कार्य को करने के लिये सक्षम होगा, परन्तु रिटनिर्ंग आफीसर के जो कार्य नाम निर्देशन की संवीक्षा से सम्बन्धित है उनमें से किसी को कोई सहायक रिटनिर्ंग आफीसर तब तक न कर सकेगा जब तक कि रिटनिर्ंग आफीसर उक्त कार्य को करने में सक्षम न हो जाये। धारा 24 के अनुसार चुनाव अधिकारी का काम यह होगा कि चुनाव प्रभावपूर्ण ढंग से ऐसा हो कि सभी कानूनी प्रावधानों का विधिवत पालन किया गया हो।

पीठासीन अधिकारी

आर0पी0 एक्ट 1951 की धारा 26 मे पीठासीन व मतदान अधिकारी की नियुक्ति के बारे में प्रावधान है। मतदान केन्द्रों पर मतदान के कार्य को सम्पादन कराने के लिये जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा पर्याप्त संख्या में पीठासीन अधिकारियों, मतदान अधिकारियों व अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति की जायेगी।

पीठासीन अधिकारी के किसी कारणवश अनुपस्थित रहने पर उसके कृत्यों का निर्वहन मतदान अधिकारी द्वारा किया जा सकेगा। एस0वी0आई0 स्टाफ एसो0 बनाम इलेक्शन कमीशन 1994 में यह निर्धारित किया गया कि जिला निर्वाचन अधिकारी की यह शक्तियाँ मनमानी नहीं हो सकती हैं। ऐसी नियुक्तियों के विरूद्ध जिला निर्वाचन अधिकारी को निर्देशित किया जाना आवश्यक है। जिला निर्वाचन अधिकारी एक ही पीठासीन अधिकारी को एक या इससे अधिक पोलिंग का कार्य सौंप सकता है। अत: मुख्य पीठासीन अधिकारी के निम्नलिखित कार्य हैं :-
  1. शांन्ति व्यवस्था को बनाये रखना, 
  2. चुनाव कानून का उचित रूप में पालन हो।

मतदान अधिकारी

इसका काम पीठासीन अधिकारी की मदद करना है। (धारा 28)

एजेंट

यद्यपि यह अधिकारी नहीं है, परन्तु मतदाताओं से कुछ अधिक है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 40 के तहत कोई भी अभ्यथ्र्ाी निर्वाचन में अपने से भिन्न किसी व्यक्ति को अपना अभिकर्ता/एजेन्ट विहित रीति में नियुक्त कर सकेगा और ऐसी नियुक्ति की सूचना रिटनिर्ंग आफीसर को विहित रीति में अभ्यथ्र्ाी प्रदान करेगा।

धारा 41 के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो संसद के दोनों सदनों में से किसी का या किसी राज्य के विधान मण्डल के सदन का या दोनों सदनों में से किसी का सदस्य होने या निर्वाचन में मत देने के लिये निहित है तो वह किसी भी निर्वाचन में अभिकर्ता होने के लिये अर्ह होगा। अधिकारों के तहत एक निर्वाचन अभिकर्ता को निर्वाचन से सम्बन्धित कुछ कार्य प्रदान किये जाते हैं, जो निम्नलिखित हैं-
  1. धारा 36(1) के तहत नाम निदेशनों की जाँच व संविक्षा तथा परीक्षण के लिये रिटर्निंग आफीसर के आदेशानुसार हाजिर होंगे। 
  2. अभ्यथ्र्ाी की अभ्यथ्र्ाीता को वापस लेने के लिये अभ्यथ्र्ाी द्वारा लिखित सूचना को रिटनिर्ंग आफीसर को प्रदत्त करना (धारा 37(1))। 
  3. विहित रीति में अभिकर्ताओं व अवमुक्ति अभिकर्ताओं की नियुक्ति करना (धारा-46) 
  4.  मतदान केन्द्रों में उपस्थित व मतदान अभिकर्ता या गठन अभिकर्ता के कृत्यों का पालन करना (धारा-58) 
  5. मतगणना के समय उपस्थित रहने वाले गठन अभिकर्ता की नियुक्ति करना (धारा-47)
  6. गठन के समय उपस्थित रहना और यदि आवश्यक हो तो गठन अभिकर्ता के कृत्यों को पूर्ण करना। 
  7. चुनाव के व्ययों का शुद्ध व अलग लेखा करना जो कि उसके द्वारा किये गये हैं।
सामान्यत: अभिकर्ता 3 प्रकार के होते हैं -
  1. निर्वाचन
  2. मतदान
  3. गठन 
अभ्यर्थी कभी भी अभिकर्ता की नियुक्ति का प्रतिसंहरण कर सकेगा। अभिकर्ता की मृत्यु हो जाने पर अभ्यर्थी उसके स्थान पर नया अभिकर्ता नियुक्त कर सकेगा।

धारा 46 के अनुसार मतदान केन्द्रों पर अभिकर्ता के रूप में कार्य करने के लिये अभ्यर्थी द्वारा मतदान अभिकर्ता की नियुक्ति की जा सकेगी। अभिकर्ता की नियुक्ति का पत्र अभ्यर्थी द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिये, परन्तु ऐसा नियुक्ति पत्र या प्रारूप अविधिमान्य होगा जो अभ्यर्थी द्वारा हस्ताक्षरित भी हो और दाखिल भी उसके द्वारा किया गया हो, परन्तु उसमें अभिकर्ता के नाम किसी अन्य द्वारा लिखे गये हों।

मतदान अभिकर्ता का मुख्य कार्य मतदान से पूर्व बैलेट बाक्स का परीक्षण करना और यह देखना कि वे मतदान के लिये उचित कार्यवाहक आदेश में तैयार किये गये हैं तथा यह देखना कि बैलेट बॉक्स उस स्थान पर रखे जायें जहाँ मतदान की गुप्तता बनी रहे, तथा हृदयवेशी को चुनौती देना तथा रजिस्टर या निर्वाचक नामावली की अपने पते में उन व्यक्तियों के नाम चढ़ाना जो कि आये व मतदान दिया तथा मतदान के बाद यह देखना कि सादे बैलेट पेपर, टेंडर बैलेट पेपर, वापसी गतपत्र (Return ballat papers) तथा टेंडर गत की सूची और आपत्ति गत (Challenged Votes) उचित रूप से सीलबन्द पैकेटों में रख दिये गये हैं। (नियम 32, 33, 36, 44, 45 व 46 के 1961)

धारा 47 के अनुसार मतगणना के समय उपस्थित रहने के लिये अभ्यथ्र्ाी द्वारा गणन अभिकर्ता की नियुक्ति की जा सकती है ऐसी नियुक्ति की सूचना भी रिटनिर्ंग आफीसर को देना आवश्यक होगा। गणन अभिकर्ता का मुख्य कार्य मतों की गणना के समय उपस्थित रहना है और यह देखना है कि गणना सही ढंग से पूर्ण हो रही है।

पुलिस फोर्स

यह सहज व्यवस्था के लिये अलग से लगाये जाते हैं। इनका सीधा सम्बन्ध चुनाव प्रक्रिया से न होकर शान्ति व व्यवस्था बनाये रखना है।

राजनैतिक दलों का रजिस्ट्रीकरण

संसदीय शासन पद्धति में राजनैतिक दलों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। जहाँ तक दलीय व्यवस्था का प्रश्न है यह मुख्यतया दो प्रकार की हो सकती है। द्विदलीय व्यवस्था तथा बहुदलीय व्यवस्था। भारत में बहुदलीय व्यवस्था को अंगीकृत किया गया है। भारत में नागरिकों का कोई भी संगम या निकाय (Body) राजनैतिक दल के रूप में गठित हो सकता है, परन्तु उसे अस्तित्व में तभी माना जाता है जब वह निर्वाचन आयोग द्वारा पंजीकृत कर लिया जाये।

आर0 पी0 एक्ट 1951 की धारा-29क (भाग-4क) के तहत दलों के रजिस्ट्रीकरण के बारे में उपबन्ध किया गया है। उपरोक्त धारा के अनुसार कोई भी नागरिक कोई भी संगम या निकाय, जो स्वयं को राजनैतिक दल कहता है और जो इस भाग के उपबन्धों का लाभ उठाना चाहता है, उसे राजनैतिक दल के रूप में रजिस्ट्रीकरण कराने के लिये निर्वाचन आयोग को आवेदन करेगा। ऐसा प्रत्येक आवेदन संगम या निकाय बनाये जाने की तारीख के ठीक आगामी 30 दिन के भीतर किया जायेगा। इसमें निम्नलिखित तत्व शामिल होंगे।
  1. संगम या निकाय का नाम,
  2. वह राज्य जिसमें उसका प्रधान कार्यालय स्थित है, 
  3. वह पता जिस पर उसके लिये आशायित पत्र और अन्य संसूचनायं भेजी जायें, 
  4. उसके अध्ययक्ष सचिव, कोशाध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों के नाम,
  5. उसके सदस्यों की संख्या और यदि उसके सदस्यों के प्रवर्ग हैं, तो प्रत्येक प्रवर्ग की संख्या, 
  6. क्या उसके कोई स्थानीय एकक हैं? यदि हैं तो किन स्तरों पर हैं, सदस्य या किन्हीं सदस्यों द्वारा उसका प्रतिनिधित्व किया जाता है, यदि किया जाता है तो ऐसे सदस्यों की संख्या। 
आयोग ऐसे संगम या निकाय के प्रतिनिधियों को सुनवाई का अवसर प्रदान कर रजिस्ट्रीकरण के आवेदन को-
  1.  स्वीकार कर सकता है या
  2. अस्वीकार कर सकता है।
यद्यपि इस सम्बन्ध में आयोग का विनिश्चय अंन्तिम होता है, लेकिन इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। जब तक कि आयोग द्वारा विनिश्चय न कर दिया जाये। सोशलिस्ट पार्टी बनाम इलेक्शन कमीशन ऑफ इण्डिया (1993) के वाद में न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा परमादेश रिट (Write of Mandomus) तभी जारी की जा सकती है। जब निर्वाचन आयोग द्वारा आवेदन पत्र निरस्त कर दिया जाये।

चुनाव खर्च

आर0पी एक्ट 1951 की धारा 77 व Conduct of Election Rules 1961 नियम (86-90) में निर्वाचन व्यय का वर्णन किया गया है। धारा 76 के अनुसार निर्वाचन व्यय से तात्पर्य केवल लोकसभा व राज्यसभा के निर्वाचनों के व्यय है।

धारा 77 के अनुसार निर्वाचन में प्रत्येक अभ्यथ्र्ाी (प्रत्याशी) या उसका निर्वाचन अभिकर्ता, नामांकन की तारीख से परिणामों की घोशणा की तारीख तक (दोनों दिन लेते हुए) के प्रत्येक व्यय का चाहे वह प्रत्याशी द्वारा किये गये हो या अभिकर्ता द्वारा, प्रथक और सही लेखा या तो प्रत्याशी स्वयं करेगा या अपने निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा रखवायेगा। नियम 86 के अनुसार अभ्यथ्र्ाी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा जो निर्वाचन व्ययों का लेखा दिन-प्रतिदिन के व्यय की हर एक मद के लिये निम्न प्रकार से करेगा-
  1. वह तिथि जिसको व्यय उपगत या प्राधिकृत किया गया था 
  2. व्यय की प्रकृति (उदाहरणार्थ यात्रा, डाक या छपाई आदि) 
  3. व्यय की रकम (A) भुगतान की हुई रकम (B) अदत की हुई रकम
  4. भुगतान की तिथि 
  5. भुगतान पाने वाले का नाम व पता, 
  6. भुगतान की गई रकम की स्थिति में वाउचरों (Entry) की क्रम संख्या, 
  7. अदत (परादेय, Out standing) रकम की स्थिति में विपत्रों की यदि कोई हो क्रम संख्या,
  8. उस व्यक्ति का नाम व पता जिसे अदत रकम देना है।
व्यय की प्रत्येक मद के लिये वाउचर अभिप्राप्त किया जायेगा सिवाय उन मामलों के जिनमें व्यय डाक व्यय या रेल द्वारा यात्रा या ऐसे मामलों में किया गया है। जिनमें वाउचर अभिप्राप्त करना सम्भव नहीं है। समस्त वाउचर प्रत्याशी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा भुगतान की तारीख के क्रम से और क्रम संख्याकित करके निर्वाचन व्ययों के लेखों के साथ दाखिल किये जायेगें और ऐसे वाउचर भुगतान की गयी रकम की स्थिति में वाउचरों के क्रम संख्याक के अन्तर्गत दर्ज किये जायेगें।

नियम 87 के अन्तर्गत लेखा पेश होने पर निर्वाचन अधिकारी 2 दिन में उसकी सूचना एक सूचना फलक पर लगवायेगा। जिनमें- (i) लेखा दाखिल करने की तिथि, (ii) अभ्यथ्र्ाी का नाम (iii) लेखों के परीक्षण का समय व स्थान का उल्लेख होगा। नियम 88 के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति निर्धारित शुल्क का संदाय करके ऐसे लेखों का निरीक्षण कर सकेगा तथा उनकी अनुप्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर सकेगा।

नियम 90 में अधिकतम निर्वाचन व्यय राशि का उल्लेख होगा। नियम 88 के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति निर्धारित शुल्क का संदाय करके ऐसे लेखों का निरीक्षण कर सकेगा तथा उनकी अनुप्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर सकेगा।
नियम 90 में अधिकतम निर्वाचन व्यय राशि का उल्लेख किया गया है जो हर राज्यों मे अलग-अलग है। उत्तर प्रदेश में संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लिये 15 लाख है व विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के लिये 6 लाख हैं। धारा 77 के स्पश्टीकरण के अनुसार यदि अभ्यथ्र्ाी का यह कथन है कि कोई व्यय किसी राजनैतिक दल या अर्थ संगठन निकाय स्वयं के द्वारा किया गया व्यय नहीं हैं। महाराज पाटोलिया बनाम आर0 के. बिड़ला, 1971, के बाद में सर्वोच्च न्यायलय ने कहा कि निर्धारित सीमा से अधिक व्यय करना भ्रश्ट आचरण माना जाता है लेकिन यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी प्रत्याशी के लिये धन व्यय करता है और इस कार्य में अभ्यथ्र्ाी या उसके अभिकर्ता की पूर्व सहमति नहीं होती है तो इसे धारा 77 (1) के अंतर्गत प्रत्याशी द्वारा किया गया व्यय नहीं माना जा सकता है। धारा 78 के अन्तर्गत हर प्रत्याशी निर्वाचित प्रत्याशी के निर्वाचन की तारीख से या यदि निर्वाचन में एक से अधिक अभ्यथ्र्ाी है और उनके निर्वाचन की तारीख से 30 दिन के अन्दर अपने निर्वाचन व्ययों का लेखा जो उस लेखे की सही प्रति (मूल प्रति) होग, जिला निर्वाचन ऑफीसर के पास दाखिल करेगा।

प्रत्याशी

लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम 1951 की धारा 79 के खण्ड (ख) के अनुसार प्रत्याशी का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो किसी निर्वाचन में अपने को प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत करता है। संसद के सदस्यों के लिए अर्हताए- अनुच्छेद 84 के अनुसार कोई व्यक्ति संसद के किसी स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए तभी अर्हित होगा जब-

(i) वह भारत का नागरिक हो और निर्वाचन आयोग द्वारा इस विभिन्न प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूप के अनुसार शपथ लेता है या प्रतिज्ञान करता है और उस पर अपने हस्ताक्षर करता है।

व्यक्ति भारत का नागरिक जन्म से हो सकता है और रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति भी नागरिक हो सकता है। एवं इस व्यक्ति को जब शपथ दिलायी जाती है तो वह नामांकन से पूर्व होती है। एवं भारतीय संविधान की तीसरी अनुसूची में निर्वाचन अधिकरी या ऐसे व्यक्ति जिसे निर्वाचन आयोग ने प्रधिकृत किया है के समक्ष शपथ लेता है। अगर व्यक्ति शपथ लेने से इंकार कर देता है तो उसका नाम निरस्त कर दिया जाता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति आज्ञात्मक प्रकृति के प्रावधानों को मानने के लिए बाध्य है।

(ii) वह राज्यसभा में स्थान के लिए कम से कम 30 वर्श की आयु का और लोक सभा में कम से कम 25 वर्श की आयु का होना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अपनी आयु के बारे में कोई व्यौरा नाम निर्देशन पत्र में नहीं देता है तो उसका नाम निर्देशन पत्र खारित कर दिया जायेगा। परन्तु लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम 1951 की धारा 36 (4) के अनुसार रिटर्निंग आफीसर किसी नाम निर्देशन पत्र को ऐसी किसी त्रुटि के आधार पर जो सारवान रूप की नहीं है, निरस्त नहीं करेगा।

ब्रजेन्द्र गुप्ता बनाम ज्वाला प्रसाद (1987) इस वाद में प्रत्याशी ने अपनी आयु का जिक्र नाम निर्देशन पत्र में नहीं किया था तो उसका नाम निर्देशन पत्र रिटर्निंग आफीसर ने खारिज कर दिया जब मामला निर्वाचन आयोग के समक्ष गया तो भी निर्वाचन आयोग ने रिटर्निंग आफीसर के निर्णय को मान्य रखा। परन्तु जब हाई कोर्ट में वाद दायर किया गया तो हाईकोर्ट ने व्यक्ति के पक्ष में फैसला करते हुए कहा कि आयु का विवरण देना जरूरी नहीं है और उसका नाम निर्देशन पत्र खारिज नहीं किया जाना चाहिए। परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय को पुन: पलटते हुए कहा कि नाम निर्देशन पत्र में आयु का विवरण देना आवश्यक है अन्यथा पत्र खारिज कर दिया जायेगा।

(iii) उसके पास अन्य योग्यताएं होनी चाहिए, जो संसद द्वारा बनाई गयी विधि द्वारा विहित की गयी हो।

राज्य सभा की सदस्यता के लिए अर्हताये

लोक प्रति0 अधि0 1951 की धारा 3 के अनुसार सन् 2003 के संशोधन के पश्चात् राज्य सभा का सदस्य होने के लिए आवश्यक है कि प्रत्याशी देश (भारतवर्श) या उसके किसी भाग में के किसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लिये निर्वाचक हो।

परन्तु सन् 2003 के संशोधन के पहले राज्यसभा का सदस्य होने के लिए प्रत्याशी को सम्बन्धित राज्य के किसी क्षेत्र के किसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक होना होता था। परन्तु यदि किसी व्यक्ति का नाम निर्वाचक नामवली में नहीं है तो वह राज्य सभा किसी सदस्यता के लिए प्रत्याशी नहीं हो सकता है।

लोकसभा सदस्यता के लिए अर्हताये

लोक प्रतिनिधित्व अधि0 1951 की धारा 4 के अनुसार लोकसभा की सदस्यता के लिए निम्नांकित बाते आवश्यक हैं।
  1. यदि कोई व्यक्ति किसी राज्य में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित स्थान हेतु चुनाव लड़ना चाहता है तो यह आवश्यक है कि 
    1. वह उस राज्य की अनुसूचित जातियों में से किसी एक का सदस्य हो, तथा 
    2. उस राज्य के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक हो।
  2. यदि कोई व्यक्ति किसी राज्य में (आसाम के स्वशासी जिलों को छोड़कर) अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित स्थान हेतु चुनाव लड़ना चाहता है तो यह आवश्यक है कि-
    1. वह उस राज्य की अनुसूचित जनजातियों में से किसी एक का सदस्य हो, 
    2. उस राज्य के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक हो।
  3. यदि कोई व्यक्ति आसाम के स्वाशासी जिलों में की अनुसूचित जन जातियों के लिए आरक्षित स्थान हेतु चुनाव लड़ना चाहता है तो यह आवश्यक है कि- 
    1. वह उन अनुसूचित जन जातियों में से किसी एक का सदस्य हो तथा 
    2. ऐसे स्वाशासी जिले को सम्मलित करने वाले संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक हो। 
  4. यदि कोई व्यक्ति लक्षद्वीप के संघ राज्य क्षेत्र में अनुसूचित जन जातियों के लिए आरक्षित स्थान हेतु चुनाव लड़ना चाहता है तो यह आवश्यक हैं कि 
    1. वह उन अनुसूचित जन जातियों में से किसी व्यक्ति का सदस्य हो तथा 
    2. वह उस राज्य क्षेत्र के संसदीय निर्वाचन के लिए निर्वाचक हो।

विधान सभा की सदस्यता के लिए अर्हताये

लोक प्रतिनि0 अधि0 1951 की धारा 5 अनुसार विधान सभा की सदस्यता के लिए निम्नांकित बाते आवश्यक है। (i) कोई व्यक्ति जिस राज्य में जाति या अनुसूचित जन जाति के लिए आरक्षित स्थान हेतु चुनाव लड़ना चाहता है तो यह आवश्यक है कि -
  1. वह उस राज्य की अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य हो। तथा 
    1. उस राज्य के किसी विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक हो। 
  2. आसाम के स्वाशासी जिले के अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित स्थान हेतु चुनाव लड़ना चाहता हो तो यह आवश्यक है कि 
    1. वह स्वाशासी जिले की अनुसूचित जनजातियों में से किसी एक का सदस्य हो तथा 
    2. ऐसे स्वाशासी जिले को सम्मिलित करने वाले सभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक क्षेत्र के लिए निर्वाचक हो। 
  3. किसी अन्य राज्य में स्थान की दशा में वह उस राज्य में के किसी सभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक हो।

विधान परिशद की सदस्यता के लिए अर्हतायें

लोक प्रतिनिधित्व अधि0 1951 की धारा 6 के अनुसार विधान परिशद की सदस्यता के लिए निम्नांकित बाते आवश्यक हैं।
  1. राज्यों की विधान परिशदों की सदस्यता के लिये उस राज्य के किसी विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र का निर्वाचक होना आवश्यक है। 
  2. यदि कोई स्थान विधान परिशद में राज्यपाल द्वारा नाम निर्देशन से भरा जाना है तो ऐसे व्यक्ति को उस राज्य का मामूली तौर से निवासी होना आवश्यक है।

निर्वाचक नामावली

संसदीय निर्वाचन तथा विधान सभा निर्वाचन के लिए निर्वाचक नामावलियाँ तैयार की जाती है। इन नामवलियों में निर्वाचन में मतदान के लिये अहर्य व्यक्तियों का उल्लेख रहता है। सामान्य तौर पर निर्वाचक नामवली से तात्पर्य उस नामावली से है जिसमें किसी व्यक्ति का नाम रजिस्टर्ड होने पर वह निर्वाचन में मत डालने का अधिकारी होगा। संिधान के अनुच्छेद 325 के अनुसार किसी भी निर्वाचक नामावली को धर्म, मूलवंश जाति, लिंग या इनमें से किसी आधार पर तैयार नहीं किया जायेगा एवं इन आधारों पर किसी व्यक्ति को मत देने से वंचित भी नहीं किया जायेगा।

लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम 1950 की धारा 23 की उपधारा 3 के अनुसार किसी भी व्यक्ति का नाम निर्वाचन नामावली में नाम निर्देशन की तारीख तक शामिल कर लिया जाना चाहिए उसके बाद किसी भी व्यक्ति का नाम शामिल नही किया जाएगा।

इस प्रकार निर्वाचन नामावली से तात्पर्य उस नामावली से है जिसमें प्रति योग्य व्यक्ति का नाम होगा जो मत देने का अधिकारी है। संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के लिये निर्वाचक नामावलियाँ लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम की धारा 13 (घ) के अनुसार जम्मू कश्मीर राज्य और ऐसे संघ राज्य क्षेत्रों जिनमें विधानसभा नहीं है को छोड़कर सभी संसदीय क्षेत्रों के लिए निर्वाचक नामावलियाँ अलग से तैयार नहीं की जाएगी बल्कि संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लिए उतने विधानसभा निवार्चन क्षेत्रों की निर्वाचक नामावलियां प्रयुक्त हो जायेगी जितने विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र एवं संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में आते हैं।

परन्तु अनुच्छेद 371 (क) के खंड (2) में बतायी गयी समयाविधि के लिए नागालैण्ड के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के उस भाग के लिए जो टयूनसांग जिले में समाविश्ट है, निर्वाचक नामावली पृथक रूप से तैयार की जायेगी और पुनरीक्षित होगी।

लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम की धारा 14 (क) के अनुसार निर्वाचन क्षेत्र से तात्पर्य सभा निर्वाचन क्षेत्र से तात्पर्य सभा निर्वाचन क्षेत्र (विधान सभा निर्वाचक क्षेत्र) से है। धारा 14(ख) के अनुसार अर्हता की तारीख से तात्पर्य हर निर्वाचक नामावली में उस तारीख से है जो विधि द्वारा विहित की गयी है।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 15 के अनुसार प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक निर्वाचक नामावली होगी जो कि निर्वाचन आयोग के अधीक्षण एवं निर्देशन में तैयार की जायेगी।

यहाँ पर निर्वाचन क्षेत्र से तात्पर्य विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से है। संविधान के अनुच्छेद 327 के अनुसार संसद समय-समय पर विधि द्वारा संसद या किसी राज्य विधानमण्डल के निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने से सम्बन्धित विधि बनाएगी।

लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम 1950 की धारा 16 के अनुसार निम्नव्यक्तियों का नाम निर्वाचक नामावली में शामिल नहीं किया जायेगा।
  1. वे व्यक्ति जो भारत के नागरिक नहीं है। 
  2. वे व्यक्ति जिन्हें सक्षम न्यायालय द्वारा विकृतचित्त्ा घोशित कर दिया गया है। 
  3. वे व्यक्ति जो भ्रश्ट आचरण अथवा अन्य अपराधों से जुड़ होने के कारण विधिनुसार निर्वाचक नामावली में अपना नाम सम्मिलित कराने के पात्र नहीं है।
परन्तु यदि कोई व्यक्ति जिसका नाम निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत हो गया है और उसके उपरान्त भ्रश्ट आचरण अथवा अन्य किसी अपराध के कारण मतदान के लिए अयोग्य हो जाता है तो भी उसका नाम निर्वाचक नामावली से हटा दिया जायेगा। परन्तु इसके उपरान्त आरोप खत्म हो जाने पर उसका नाम पुन: निर्वाचक नामावली में सम्मिलित कर लिया जायेगा।

तेन्या देवी बनाम ताको देवी (1989) के वाद में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जब एक बार निर्वाचक नामावली अंतिम रूप से तैयार और प्रकाशित हो जाती है तथा उस निर्वाचक नामावली के आधार पर निर्वाचन भी सम्पन्न हो जाता है तो कालान्तर में ऐसे निर्वाचन की वैधता को त्रुटिपूर्ण निर्वाचक नामावली के आधार पर चुनौती नहीं दी जाती जा सकती। लोकप्रतिनिधत्व अधिनियम 1950 की धारा 17 के अनुसार किसी भी व्यक्ति का नाम एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों की निर्वाचक नामावलियों में रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जा सकता है। बाबूराम बनाम मणिक राव (1999) इस वाद में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों की निर्वाचक नामावलियों में दर्ज हो गया है तो उसे इस आधार पर विधानसभा के चुनाव में खड़ा होने के लिए अयोग्य घोशित नहीं किया जा सकता है।

आई. वी. सेना बनाम होकिशे सेना (1999) इस वाद में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम एक से अधिक निर्वाचक नामावलियों नामावलियों मे विद्यमान है तो उसे उनमें से किसी एक का चुनाव करता होगा और उसे उसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदान करना होता है। यदि वह सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान करता है तो वह शून्य माना जायेगा। लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम 1950 की धारा 19 के अनुसार निर्वाचक नामावली में नाम रजिस्ट्रीकृत कराने की शर्तें निम्नलिखित है-
  1. व्यक्ति की आयु 18 वर्श होनी चाहिए। 
  2. निर्वाचक निर्वाचन क्षेत्र की जिस निर्वाचन नामावली में है उस निर्वाचन क्षेत्र का मामूली तौर से निवासी हो। सन् 1989 के संशोधन के पूर्व निर्वाचक नामवली में नाम रजिस्ट्रीकृत कराने की आयु 21 वर्श थी परन्तु इसके उपरान्त इसे घटाकर 18 वर्श कर दिया गया। 
  3. मामूली तौर से निवासी लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 20 मामूली तौर से निवासी के अर्थ को बताती है। मामूली तौर पर निवास तात्पर्य ऐसा अधिवास है जिसके अन्तर्गत व्यक्ति किसी निश्चित स्थान पर सामान्य रूप से रह रहा हो।

निर्वाचक नामावली की तैयारी और पुनिरीक्षण

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21 की उपधारा (1) के अनुसार प्रत्येक निर्वाचन के क्षेत्र के लिए नामावली
अर्हता की तारीख के प्रति निर्देश से (ii) विहित रीति से तैयार की जाएगी।

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21 की उपधारा (2) अनुसार निर्वाचन नामावली का परीक्षण लोक सभा या किसी राज्य की विधान सभा के हर एक साधारण निर्वाचन से पहले तथा निर्वाचन क्षेत्र आंतरित स्थान में आकस्मिकरिक्ति भरने के लिए हर एक उपनिर्वाचन से पहले अहर्ता की तारीख के प्रति निर्देश से किया जाएगा।

उपधारा (3) के अनुसार उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी निर्वाचन आयोग किसी भी निर्वाचन क्षेत्र या निर्वाचन-क्षेत्र के भाग के लिए निर्वाचक नामावली के ऐसी रीति से जिसे वह ठीक समझे पुरीक्षण के लिए किसी भी समय आदेश दे सकता है। मात्र उपधारा 3 में से ऐसा किये जाने के कारणों को अभिलिखित करना आवश्यक होगा।

निर्वाचक नामावली की प्रवश्टियों का शुद्धीकरण

लोक प्रधिनिधत्व अधिनियम 1950 की धारा (22) निर्वाचक नामावलियों की प्रविश्टियों के शुद्धिकरण के बारे में प्रावधान करती है। धारा 22 के अनुसार किसी निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर को यदि जाँच के पश्चात् यह समाधान हो जाता है कि उस निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में -
  1. कोई प्रविश्टि गलत या त्रुटिपूर्ण है, अथवा 
  2. किसी निर्र्वाचक ने अपना मामूली निवास स्थान बदल दिया है। अथवा
  3. निर्वाचक की मृत्यु हो गयी है।
तो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफीसर, ऐसे किन्हीं साधारण या विशेश देशों के (जैसे-निर्वाचन आयोग इनसे सम्बन्धित कोई निर्देश दे) अधीन रहते हुए इन प्रविश्टियों को संशोधित कर सकेगा, अन्यत रख सकेगा या निकाल भी सकेगा। परन्तु कोई कार्यवाही करने से पूर्व निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर सम्बद्ध व्यक्ति को सुनवाई का अवसर प्रदान करेगा।

निर्वाचक नामावलीयों में नामों का सम्मिलित किया जाना

लोक प्रतिनिधित्व अधि0 1950 की धारा 23 की उपधारा (1) के अनुसार कोई व्यक्ति जिसका नाम उसके निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचक नामावली में सम्मिलित नहीं है। उस नामावली में अपना नाम सम्मिलित कराने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर को आवेदन करेगा। उपधारा (2) के अनुसार यदि रजिस्ट्रीकरण आफिसर को यह समाधान हो जाता है कि आवेदक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किये जाने का हकदार है तो उसका नाम सम्मिलित किया जायेगा। परन्तु यहाँ पर यदि आवेदक का नाम पहले किसी अन्य निर्वाचित क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में सम्मिलित है तो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफीसर उस अन्य निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफीसर को इस बात की जानकारी उपलब्ध करायेगा और ऐसी जानकारी प्राप्त होने के पश्चात् वह उस नामावली से आवेदक के नाम को हटा देगा।

परन्तु उपधारी (3) के अनुसार यदि किसी निर्वाचक नामावली में किसी व्यक्ति का नाम सम्मलित किया जाना हो तो वह नामांकन पत्र दाखिल करने की अन्तिम तारीख से पूर्व ही सम्मलित कर लिया जाना चाहिए। नामांकन पत्र दखिल करने की अंितमतिथि के पश्चात् ऐसा कोई नाम सम्मलित नहीं किया जाएगा।

निर्वाचक नामावली के सम्बन्ध में मिथ्या घोशणाएँ करना

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 31 दण्डात्मक व्यवस्था के बारे में प्रावधान करती है इसके अन्तर्गत निम्नलिखित कृत्यों को दण्डनीय अपराध माना गया है।
  1. किसी निर्वाचन नामावली की तैयारी ; पुरीक्षण या शुद्धि के संबंध में मिथ्या कथन या घोशणा करना।
  2. निर्वाचक नामावली में किसी प्रविश्टि को सम्मिलित या आपवर्जित करने के सम्बन्ध में मिथ्या कथन या घोशणा करना। परन्तु धारा 31 वही लागू हो जहाँ किसी कथन अथवा घोशणा का (i) मिथ्या होना, या (ii) मिथ्या होने का ज्ञान होना या (iii) मिथ्या होने का विश्वास होना या (iv) उसके सत्य नहीं होने का विश्वास होना पर्याप्त है।

निर्वाचक नामावलीयों की तैयारी आदि से संशक्त पदीय कर्तव्यों का भंग 

अधिनियम की धारा 32 के अनुसार निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी तथा अन्य व्यक्तियों का यह कर्तव्य है कि वे
  1.  निर्वाचक नामावलियाँ तैयार करने, 
  2.  उनका पुनरीक्षण करने 
  3.  उनमें शुद्धि करने 
  4.  किसी प्रविश्टि को निर्वाचक नामावली में सम्मिलित करने, अथवा 
  5. अपवर्जित करने, के अपने पदीय कृत्यों का समुचित पालन एवं निर्वहन करे। 
यदि कोई अधिकारी या व्यक्ति बिना किसी युक्तियुक्त हेतु के अपने उक्त पदीय कृत्यों का निर्वहन नहीं करता है तो उसे न्यूनतम तीन माह एंव अधिकतम दो वर्श तक के अवधि के कारावास एवं जुर्माने से दण्डित किया जायेगा। 1 अगस्त 1996 के संशोधन से पहले इसके लिए केवल पाँच सौ रू0 तक जुर्माने का प्रावधान था। लेकिन लोक प्र0 (संशोधन) अधि0 द्वारा इसे न्यूनतम तीन माह एवं अधिकतम दो वर्श तक की अवधि के कारावास एवं जुर्माने से दंडनीय बना दिया गया है।

मतदाता का मताधिकार

संविधान के अनु0 326 के अनुसार संसद और राज्य विधान मण्डलों के लिए निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा। प्रत्येक वह व्यक्ति जो भारत का नागरिक है तथा 18 वर्श की आयु पूरी कर चुका है तथा अनिवास, चित्त, विकृति, अपराध या भ्रश्ट आचरण के कारण विधि द्वारा अयोग्य घोशित न किया गया, मत देने का अधिकार रखता है।

पहले मत देने का अधिकार 21 वर्श की आयु के व्यक्तियों को था परन्तु संविधान के 61वें संशोंधन अधिनियम 1988 द्वारा यह आयु 21 वर्श से घटाकर 18 वर्श कर दी गयी। धारा 62 मत देने के अधिकार से सम्बन्धित प्रावधान करती है धारा 62 की उपधारा (1) के अनुसार निर्वाचन में मत देने का अधिकार उसी व्यक्ति को प्राप्त होगा जिसका नाम उस क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में उपस्थित है जिसका नाम निर्वाचक नामावली में उपस्थित नहीं है वह मत देने का अधिकारी नहीं है।

लक्ष्मी चरन सेन बनाम ए0 के0 एम0 हुसैन (1999) के वाद में निण्र्ाीत हुआ कि मत देने के अधिकार को भी एक अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में माना जाना चाहिए। संग्राम सिंह बनाम भारत संघ के वाद में न्यायालय ने स्पश्ट रूप में कहा कि मत देने का अधिकार मूल अधिकार न होकर एक संविधिक अधिकार है।

धारा 62 की उपधारा (2) के अनुसार ऐसा कोई भी व्यक्ति मत देने का अधिकार नहीं रखता है जिसे अधिनियम 1950 की धारा 16 के अधीन अयोग्य घोशित कर दिया गया।

धारा 62 की उपधारा (3) के अनुसार कोई भी व्यक्ति साधारण निर्वाचन में एक से अधिक बार मत नहीं देगा भले ही उसका नाम एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में उपस्थित हो। और यदि वो ऐसा करता है तो उसके मत शून्य होंगें। धारा 62 की उपधारा (4) के अनुसार कोई भी व्यक्ति एक ही निर्वाचन क्षेत्र में एक से अधिक बार मत नहीं देगा भले ही उसका नाम एक ही निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में एक से अधिक बार उपस्थित हो। यदि वो ऐसा करता है तो उसके सभी मत शून्य होंगें।

धारा 62 की उपधारा (5) के अनुसार निम्नलिखित व्यक्ति किसी निर्वाचन में मतदान नहीं करेगा।
  1. वह व्यक्ति जो कारावास में परिरूद्ध है। या 
  2. अन्यथा कारावास में परिरूद्ध है। या 
  3. पुलिस की विधिपूर्ण अभिरक्षा में है।
परन्तु यदि कोई व्यक्ति निवारक निरूद्धि के अन्र्तगत है तो वह मतदान कर सकेगा।

अकुल चन्द्र प्रधान बनाम भारत संघ (2001) इस वाद में कहा गया कि कोई व्यक्ति जिसे जेल में या पुलिस की विधिपूर्ण अभिरक्षा में होने के कारण मत देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है वह यह नहीं कह सकता कि अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन हुआ है। धारा 62(5) का उद्देश्य स्वतन्त्र एवं निश्पक्ष चुनाव को बढ़ावा देना है जो कि संविधान का आधारभूत ढांचा है। मत देने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है जो कानून की सीमाओं के अन्तर्गत है। कोई भी कैदी सामान्य व्यक्ति की तरह इन अधिकार का दावा नहीं कर सकता है।

धारा 62 की उपधारा (6) के अनुसार- एक व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन रहते हुए प्रतिनिधि के तौर पर दो मत डाल सकता है और यह उपधारा (3) तथा उपधारा (4) का उल्लंघन नहीं होगा।

उदाहरणार्थ एक व्यक्ति जिसकी निर्वाचन में ड्यूटी लगती है तो वह एक प्रपत्र भरकर (जो कि निर्वाचन आयोग द्वारा विहित हो) अपना मत डालने का अधिकार किसी अन्य व्यक्ति को दे सकता है, परन्तु यहाँ पर यह आवश्यक है कि दोनों व्यक्ति एक ही निर्वाचन क्षेत्र के होने चाहिए।

इसी अधिनियम की धारा 11(क) के अनुसार किसी व्यक्ति को मत देने के अधिकार से वंचित किया जा सकता है यदि उसने निम्न में से कोई अपराध किया है।
  1. भा0द0सं0 1860 की धारा 171(ड़) के अधीन रिश्वत लेने के लिए दण्डित किया गया हो। 
  2. भा0द0सं0 1860 की धारा 171(च) के अधीन निर्वाचन मं असम्यक असर डालने या प्रतिरूपण के लिए दण्डित किया गया हो। 
  3. लो0प्र0 अधिनियम 1951 की धारा 125 के अधीन निर्वाचन के सम्बन्ध में विभिन्न वर्गों के बीच में या भारत के नागरिकों के बीच में घृणा की भावनाएं या शत्रुता की भावनाएं फैलायी हों। 
  4. लोक प्रति0 अधिनियम 1951 की धारा 135 के अधीन मतदान केन्द्रों से मत पत्र हटाने का अपराध किया हो। 
  5. लो0प्र0 अधिनियम 1951 की धारा 136(2)(क) अधीन निर्वाचन अपराध के लिए दण्डित किया गया हो।
इस धारा के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को 6 वर्श के लिए मतदान देने से वंचित किया जा सकता है।
इस प्रकार मत देने का अधिकार एक विधिक अधिकार है। जिसकी मांग मूल अधिकार के रूप में नही की जा सकती है, परन्तु साधारण परिस्थितियों में इसे किसी व्यक्ति से नहीं छीना जा सकता है।

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