1789 की फ्रांसीसी क्रांति के कारण, विकास एवं प्रभाव

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18वीं शताब्दी के आरंभ में 1715 ई. में लुई चतुर्दश की मृत्यु उपरांत उसका पुत्र लुई पंद्रहवें के नाम से फ्रांस के राज्य सिंहासन पर बैठा। उसके शासनकाल में दिन प्रतिदिन देश का पतन होता चला गया। जिसके कारण लुई पंद्रहवें का शासनकाल अराजकता, अव्यवस्था, अशांति ओर अभावों का युग कहलाता है। उस समय फ्रांस में सर्वत्र बेकारी, व्यापारिक शिथिलता, धन-धान्य का अभाव और दरिद्रता का प्रभाव दृष्टिगोचर होता था। राजा, राजमहल और शासन-संबंधी कार्यों को ऋण लेकर चलाया जा रहा था। राजकोश रिक्त पड़ा था और राजकीय आय-व्यय से कम हो गई थी। उस काल की फ्रांस की सामान्य दशा का वर्णन निम्न प्रकार है-

फ्रांस की राजनीतिक दशा

18वीं शताब्दी में केवल फ्रांस ही नहीं संपूर्ण यूरोप की राजनीतिक व्यवस्था कुलीनतंत्रात्मक थी। राज्य की संपूर्ण शक्ति कुछ थोड़े से उच्चवंशीय कुलीनों के हाथ में थी। मंत्री, उच्च पदाधिकारी, सेनापति, प्रभावशाली सैनिक अफसर, न्यायाधीश, प्रान्तीय शासक सब उच्चवंशीय कुलीनों में से ही नियुक्त किये जाते थे। राजकीय नियम और कानून बनाते समय कुलीनों के हित का सबसे अधिक ध्यान रखा जाता था। वे सदैव अपनी ओर अपने अन्य कुलीनवंशीय साथियों की स्वार्थ पूर्ति में व्यस्त रहते थे। जनसाधारण को देश के शासन में कोई भाग नहीं लेने दिया जाता था।

1774 ई. में लुई पंद्रहवे की मृत्यु हो गई ओर उनका पुत्र लुइर् सोलहवे के नाम से फ्रासं का शासक बना। वह साधारण जनता का हित चाहता था, परंतु आत्म-विशवास, दृढ़ता और स्थिरता की कमी के कारण वह इस दिशा में कुछ नहीं कर सका। वह निरंकुश होते हुए भी सामन्तों और पादरियों के हाथ में कठपुतली बना हुआ था। उस समय फ्रांस में कोई विधान नहीं था तथा देश के विभिन्न प्रांतों के शासन में अत्याधिक अंतर था। कुछ प्रांतों को अधिक सुविधाएं उपलब्ध थीं, जब कि अन्य प्रांतों को अधिक कर देना पड़ता था और प्रशासनिक कठोरता को भी सहन करना पड़ता था। शासन-प्रबंध भिन्न-भिन्न प्रकार की परम्पराओं, नियमों और नीतियों पर आधारित था। चर्च का राज्य पर विशेश रूप से प्रभाव स्थापित था। राजा यद्यपि कैथोलिक मतानुयायी था, परंतु अन्य धर्मावलंबियों के साथ भी उसका व्यवहार सहनशीलता से परिपूर्ण था। देश की एकमात्र विधानसभा स्टेटस जनरल थी, जिसका 1614 ई. से कोई अधिवेशन नहीं हुआ था। फ्राँसीसी जनता नवीन संविधान की इच्छुक थी और उसके द्वारा सुख, शान्ति और समृद्धि की प्राप्ति की अभिलाशिणी थी। फ्रासीसी व्यक्तियों के विचार में फ्रासं का संविधान इस प्रकार का हलवा था, जिसे जब भी इच्छा हो तैयार किया जा सके। राजा ने नेकर नाम दरबारी को अपना अर्थमंत्री नियुक्त किया। उसने आर्थिक सुधार के लिए एक योजना तैयार की जिसे राजा के दरबारियों और स्वार्थी कुलीनों ने अस्वीकार कर दिया। लुई सोहलवें ने नेकर को उसके पद से पृथक कर दिया। उस समय स्टेटस जनरल के तीन सदन थे। प्रथम सदन में कुलीनों के तीन सौ सदस्यों के लिए स्थान था। दूसरे सदन में पादरी वर्ग के 300 प्रतिनिधि बैठते थे। तृतीय सदन साधारण जनता का प्रतिनिधित्व करता था। इसकी सदस्य संख्या यद्यपि प्रथम और द्वितीय सदनों की सम्मिलित सदस्य संख्या से अधिक होनी चाहिए थी, परंतु 300 ही थी। इस सभा के पास कोई वास्तविक अधिकार नहीं था। वह केवल राजा को प्रशासनिक कार्यों में परामर्श दे सकती थी। राजा उन परामर्शों की स्वीकृत अथवा अस्वीकृत कर सकता था। यद्यपि शासन की शक्ति केन्द्र में स्थित थी, परंतु राजा की अस्थिरता के कारण उसे दृढ़ता से प्राप्त नहीं थी। इस प्रकार लुई सोहलवाँ उस काल की स्थिति में शासन संचालन की योग्यता से वंचित था। देश में असंतोष, अव्यवस्था और अराजकता का प्रसार था।

फ्रांस की सामाजिक दशा

16वीं शताब्दी में फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभिक्त था। प्रथम वर्ग कुलीनों का, दूसरा वर्ग पादरियों का और तीसरा वर्ग साधारण जनता का था। तीनों वर्गों में प्रथम दो वर्ग शक्तिसम्पन्न और विशेशाधिकार प्राप्त प्रभावशाली वर्ग थे। इन्हें राजकीय करों की अदायगी नहीं करनी पड़ती थी। तीसरा वर्ग साधारण जनता का था। राजकीय करों का संपूर्ण भार इसी वर्ग को वहन करना पड़ता था। इतिहासकारों ने उस काल की स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया है-कुलीन युद्ध करते हैं, पादरी ईशवर की पूजा करते हैं और जनता करों की अदायगी करती है। जो व्यक्ति जितना अधिक धनवान होता था उसे उतने ही कम कर सरकार को देने पड़ते थे। इस प्रकार उस समय के समाज के वर्गों में अमीर-गरीब, अधिकारों और स्थिति के आधार पर बहुत अधिक अंतर था।

कुलीन वर्ग - 

उस काल के यूरोपीय समाज में कुलानों और सामंतों के अधिकार असीम और प्रभाव बहुत अधिक थे। उन्हें राजपरिवार के बाद समाज के सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त था। राज्य, सेना और चर्च के सभी ऊँचे-ऊँचे पद इन्हीं को प्राप्त थे। इन पदों को ऊँची बोली पर नीलाम किया जाता था। राज्य की अधिकांश भूमि इन्हीं कुलीनों में विभक्त थी। ये लोग अपनी जमींदारी में कृशकों से तरह-तरह के कर वसूल करते, नजराने खेते, भेंट करते तथा बेगार लेते थे। कृशकों को सप्ताह में कई दिन इनकी भूमि बेगार में जोतनी पड़ती थी। कुलीन सामंतों के लिए विशाल शिकारगाह बने थे। शिकारगाहों में तरह-तरह के जंगली पशु भारी संख्या में रहते थे। जंगली पशु कृशकों के खेतों को हानि पहंचु ाते रहते थे, परंतु कृशक उन्हें खेतों से भगा नहीं सकते थे।

पादरी वर्ग -

कुलीनों की भाँति पादरियों को भी विशेषाधिकार मिले हुए थे। इन लोगो में भी दो श्रेणियां थी। प्रथम श्रेणी के पादरी कुलीनों और सामंतों की संतान थे। चर्च से इन्हें लाखांे रुपये वार्शिक की आय थी। ये भी कुलीनों की तरह राजसी ठाठ-बाट से जीवन व्यतीत करते थे। इनका संपूर्ण समय राग-रंग में व्यतीत होता था। धार्मिक कार्यों को संपन्न करने में इनकी रुचि नहीं थी। बड़े पादरियों में से कुछ ऐसे भी थे जिनका ईशवर के अस्तित्व में विशवास नहीं था। इसी कारण से लुई सोलहवंे ने पेिरस के आर्कबिशप की नियुक्ति करते समय कहा था कि हमें कम से कम फ्राँस की राजधानी में तो ईशवर में आस्था रखने वाले पादरी को नियुक्त करना चाहिए। सभी प्रकार की धार्मिक क्रियाएं दूसरी श्रेणी के पादरियों को करनी पड़ती थी। ये छोटे पादरी कहलाते थे। इन्है। साधारण वर्ग में से नियुक्त किया जाता था तथा 25 पौंड वार्शिक वेतन दिया जाता था। कम वेतन के कारण ये लोग भिक्षुओं जैसा जीवन बितात थे।

साधारण वर्ग- 

इस वर्ग में कृशक मजदूर, कारीगर, शिल्पकार और दुकानदार आदि सम्मिलित थे। यूरोपीय जनसंख्या का 85 प्रतिशत से भी अधिक भाग साधारण वर्ग का था। इसमें लगभग 25 लाख शिल्पी, दस लाख अर्द्धदास कृशक और दो करोड़ कृशक थे। उन्हें रहने के लिए मकान, खाने के लिए भोजन और तन ढकने के लिए कपड़े तक का अभाव था। इन पर करों का भारी भार लदा था। अत: अपनी जमींदारों और चर्च तीनों को अलग-अलग कर देने पड़ते थे। कृशकों की अपनी संपूर्ण आय का 80 प्रतिशत से अधिक करों के रूप में देना पड़ता था। अत: अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उनके पास बहतु कम धन बच पाता था। अर्द्धदास कृषकों को अपनी अनाज और मुर्गियाँ तक जमींदार को देनी पड़ती थीं और सप्ताह में लगभग छह दिन तक जमीदार के खते ों में काम करना पड़ता था। स्वतंत्र कृशकों को इन सबके बदले नाम कीट रेटं नामक कर देना पड़ता था। कृशक की मृत्यु हो जाने पर उसकी संतान को दुगना कर देना पड़ता था। उन्हें चर्च को भी अपनी उपज का दसवां भाग देना पड़ता था। अपने खेतों की उपज पर उन्हें सड़कों और पुलों के लिए टाले टैक्स तथा तरह -तरह की चंुि गयाँ देनी पड़ती थी। सड़कों की मरम्मत तो उन्हें ही करनी पड़ती थी। सरकारी करों का भारी बोझ भी उन्है। ही सहन करना पड़ता था। नगरों में कारीगरों और श्रमिकों की दशा अच्छी नहीं थी। व्यापारिक संस्थाओं का उन पर नियंत्रण था। वे ही उनके काम के घंटों, छुट्टियों और वते न आदि का निधार्र ण करती थी। श्रमिकों का जीवन स्तर सबसे नीचा था। साधारण वर्ग में सबसे श्रेश्ठ जीवन व्यापारियों का था। उनके पास धन सम्पित्त के भण्डार भरपूर थे। वे राजा तथा कुलीनों को ऋण देते थे।

मध्यम वर्ग - 

पढ़े लिखे व्यक्तियो, डॉक्टरों, दाशर्निकों, वकीलों, लेखकों, कवियों और क्लकों आदि का एक अन्य वर्ग था जो मध्यम वर्ग के नाम से प्रसिद्ध था। इनका रहन-सहन ग्रामीण कृशकों और बाहर के शिल्पियों तथा कारीगरों से बहे तर था किन्तु इन्है। समाज और शासन दोनो में उपयुक्त स्थान प्राप्त नहीं था।

फ्रांस की आर्थिक दशा

1789 ई. फ्राँसीसी राज्यक्रांति से पूर्व फ्रांस की आर्थिक दशा अव्यवस्थित और अस्त-व्यस्त थी। करों में समानता नहीं थी। सामंतों और जागीरदारों की संख्या कम होते हुए भी देश की चौथाई भूमि पर उन्हीं का अधिकार था। उन्हें राजकीय कर नहीं देने पड़ते थे। उन्हीं की तरह पादरियों ने भी देश की कुल भूिम के पाँचवे भाग पर अधिकार जमा रखा था। उन्हें भी राजकीय करों से मुक्त रखा गया था। इस पक्रार राज्य की आय बहुत कम रह गयी थी, परंतु राज्य का व्यय बहतु बढ़ा हुआ था। आय से बढे़ व्यय की पूर्ति ऋण लेकर की जाती थी। देश का वाणिज्य व्यवसाय भी उन्नत नहीं था। देश के भिन्न-भिन्न स्थानों पर चुंगी और टाले टैक्स की दरों में बहुत अधिक अंतर था। कारीगरों को जितना कठोर परिश्रम करना पड़ता था उतना परिश्रमिक उन्हें नहीं मिलता था। कठारे नियमों के बने होने के कारण ये लोग किसी प्रकार का आंदोलन भी नहीं कर सकते थे। इन्हीं कठिनाईयों के कारण व्यापारिक माल का उत्पादन अधिक नहीं हो पाता था, जिससे राष्ट्रीय आय के उद्यागे -धंधां े और व्यापार तथा व्यवसाय में वृद्धि नहीं हो रही थी।

राजा की आय और राज्य की आय में कोई अंतर नहीं माना जाता था। राजा, राजपरिवार के सदस्य, दरबारी और राजा के मुंह लगे मित्र राज्यकोश में रुपया आते ही व्यय कर डालते थे। बजट बनाना और आय-व्यय का हिसाब रखना कोई नहीं जानता था और न इसके लिए किसी प्रकार का प्रयास ही किया जाता था। अत: राज्य की आय-व्यय और आर्थिक स्थिति का किसी को भी ठीक-ठीक ज्ञान नहीं था। अत: उस काल की सबसे प्रधान समस्या यह थी कि राज्य की अर्थव्यवस्था किन साधनों से ठीक की जाए ?

उस समय आर्थिक दशा सुधारने के लिए केवल दो उपाय ही शेश रह गये थे। प्रथम राज्य दरबार के भारी अपव्यय को यथासंभव कम करना। दूसरे कुलीनों और पादरियों पर कर लगाना। लुई सोलहवें ने इसके लिए तुर्गों को वित्त मंत्री बनाया। किन्तु तुर्गों की मितव्ययी योजना का रानी और दरबारियों ने भारी विरोध किया, जिसके कारण लुई सोहलवें ने तुर्कों को मंत्रीपद से पृथक करना पड़ा।

1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के कारण

फ्रांस की राज्यक्रांति के प्रधान कारणों की व्याख्या निम्न प्रकार की जा सकती है- (अ) राजनीतिक (ब) सामाजिक (स) बौद्धिक (द) आर्थिक (इ) नवीन करों की अस्वीकृति एवं अकाल (फ) अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव।

राजनीतिक कारण - 

फ्रांस की राज्य क्रांति के राजनीतिक कारणों को नीचे दिए शीर्शकों में व्यक्त किया जा सकता है-

प्रशासनिक अव्यवस्था-

फ्रासं के शासन में व्यवस्था का नाम तक नहीं रहा था। याग्े य, अयाग्े य का विचार नहीं करते हुए राज्य के सभी महत्वपूर्ण पदों को नीलाम किया जाता था। पदाधिकारियों के अधिकारों और शक्ति की काइेर् सीमा नहीं थी। उन्हें अपने अधिकारों का प्राय: ज्ञान तक नहीं था। प्रत्येक प्रांत में राज्यपाल तो होता था, परंतु बहुत से ऐसे भी प्रांत थे, जिनमें कौसिलें नहीं थी।ं सभी नगरों में नगर सभा बनी थी, परंतु उनमें से कोई भी दो नगर सभाओं के नियम और निर्वाचन प्रणाली समान नहीं थीं। भिन्न-भिन्न प्रांतों में विविध प्रकार के कानून प्रचलित थे। एक नगर में जो बात नियमाकूल मानी जाती थी वहीं बात समीप के किसी दूसरे नगर में गैरकानूनी समझी जाती थी। देश के लिए एक संविधान नहीं था।

प्रशासन में कुशलता का अभाव-

फ्रांस के शासकों में कोई भी शासक ऐसा नहीं हुआ जो शक्तिशाली, सुयोग्य और कुशल हो। अत: फ्रांस की जो प्रतिश्ठा लुई चतुर्दश के शासनकाल में भी वह इस काल में केवल स्वप्न बन कर रह गयी।

शासकों की निरंकुशता-

इस काल में राजा की निरंकुशता की कोई सीमा नहीं रही थी। उसकी इच्छा ही कानून थी। स्टेट्स जनरल का अधिवेशन पिछले डेढ़ सौ वर्शों से अधिक समय से नहीं बुलाया गया था। जन साधारण को किसी प्रकार के- अधिकार प्राप्त नहीं थे। साधारण वर्ग के व्यक्तियों को बिना मुकदमा चलाये ही बंदीखाने में डाल दिया जाता था। राजा के कृपा पात्रों के पास छपे हुए आदेश-पत्र रहते थे, जिनमें वे अपने विरोधी का नाम लिख कर पुलिस चौकी पर दे देते थे। पुलिस उस व्यक्ति को पकड़ कर जेल भेज देती थी। देश भर में न कोई अपने विचार स्वतंत्रता के साथ प्रगट कर सकता था और न कोई व्यक्ति भाशण दे सकता था। अत: जनता क्रांति के लिए उत्सुक हो उठी थी।

अपव्यय- 

राजदरबार का व्यय, अपव्यय का रूप धारण कर चुका था। राज्य की संपूर्ण आय राजा, रानी और दरबारियों की विलासिता पर व्यय कर दी जाती थी। राजमहल में राजा की सेवा के लिए 1600 सेवक और महारानी की नौकरी में पाँच सौ दासियाँ नियुक्त थीं। राजा की घुड़साल में 18 सौ घोड़े और दो सौ गाड़ियाँ थीं। राजमहल का वार्शिक व्यय बारह करोड़ रुपये से कम नहीं था। राजा और रानी अपने कृपापात्रों को अपार धन राशि पुरस्कार के रूप में देते रहते थे। इस प्रकार के भारी अपव्यय ने राजकोश खाली कर दिया।

करों की अधिकता- 

राज्य के संपूर्ण करों का भारी भार साधारण जनता को ही वहन करना पड़ रहा था। कुलीनों और पादरियों को विशेषाधिकार प्राप्त थे, जिनके कारण उन्हें किसी प्रकार का कर देना नहीं पड़ता था। कृशकों को राज्य, जमींदारों और चर्च को इतने प्रकार के कर देने पड़ते थे कि उनकी आय का 85 प्रतिशत से भी अधिक भाग उन करों के भुगतान में व्यय हो जाता था। किसानों को आय-कर भी देना पड़ता था, जो कृशक के घर-बार आदि को देखकर लगाया जाता था। इन भारी करों के कारण जनता में राजा और राज्य के प्रति असंतोश बढ़ता जा रहा था। इस असंतोश ने ही आगे चलकर क्रांति का विस्फोट कर डाला।

न्यायालयों के अधिकार- 

उस काल के फ्रांस में न्यायालयों की संख्या 17 थी। इनमें से प्रत्येक न्यायालय में एक रजिस्टर कानून लिखने के लिए होता था। राजा के बनाये कानून इस रजिस्टर में लिखे जाते थे। इसके बाद उन कानूनों पर अमल किया जाता था। फ्रासं के उन नयायालयों के क्षत्रेों में लगभग 400 तरह के कानून प्रचलित थे। इन कानूनों के अनुसार जो बात एक स्थान पर नियमानुकूल थी। वही दूसरे क्षेत्र में गैर-कानूनी थी। न्यायाधीश यदि किसी कानून को अनुचित समझता था तो उसे रजिस्टर में लिखकर उसे राजा की सेवा में एक प्रार्थना-पत्र भेज देता था तथा प्रार्थना-पत्र की प्रतियाँ प्रकाशित करा कर उन्हें जनता में वितरित कर देता था। राजा प्रार्थना-पत्र मिलने पर कानून में कुछ संशोधन कर देता था या फिर कानून को वापस मगा लेता था या न्यायालयों के अधिकारियों को बुलाकर उन्हें कानून रजिस्टर में दर्ज कराने आदेश देता था, जिससे यह कानून रजिस्टर में दर्ज करा लिया जाता था। परंतु न्यायाधीश उस कानून पर अमल नहीं करते थे। इस तरह वह कानून केवल रजिस्टर में ही लिखा रह जाता था। एसेी स्थिति उत्पन्न होने पर विद्वानों में कानून की बुराईयों और दोषों के संबंध में बहस होने लगती थी। जनता की इस मनोवृत्त ने भी क्रांति का विस्फोट कराने में पर्याप्त सहयोग प्रदान किया था।

राजा की अस्थिरता- 

राजा के स्वभावकी अस्थिरता और डरपोक स्वभाव के कारण शासन में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी। इतिहासकारों ने लिखा है कि लुई सोलहवां राजमुकुट धारण करने वाले व्यक्तियों में सबसे निम्न काेिट का था। उसमें प्रशासनिक कार्यों के प्रति रुचि का पूर्ण रूप से अभाव था। शिकार खेलने, ताले बनाने और नाटक खेलने में उसका मन अधिक लगता था। वह बड़ी सफलता के साथ दरबारियों और रानी के बहकावे में आ जाता था और अंत:करण से जनता की भलायी चाहते हुए भी उपयुक्त सुधारों को लागू करने में असमर्थ रहता था। अत: उसकी अस्थिरता ने फ्रांस को धीरे-धीरे क्रांति की रक्तपता पूर्ण भÍी में झांके दिया।

रानी का चरित्र-

लुई सोलहवे की रानी आस्ट्रिया की राजकुमारी होने के कारण फ्राँस के लिए एक विदेशी महिला थी। फ्राँसीसी जनता उसे घृणापूर्वक ‘‘आस्ट्रियन औरत’’ कहा करती थी। वह अति सुंदर, सुसंस्कृत, सभ्य और सुदृढ़ विचारों की युवती थी। उसके स्वभाव में एशवर्य और विलास की मात्रा अधिक थी। राजा लुई सोलहवे पर उसका बहुत अधिक प्रभाव था। वह अपने हर प्रकार के कार्य करा लेती थी। राज-काज में अवरोध उत्पन्न करना उसका प्रमुख कार्य बन गया था। देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ने पर भी वह अपने कृपापात्रों को पुरस्कृत करती रहती थी। इसलिए फ्रांसीसी जनता उससे घृणा करती थी।

सामाजिक कारण

फ्राँस की राज्यक्रांति का दूसरा प्रधान कारण समाज में फैली हुई असमानता थी। फ्रांसीसी समाज उस समय दो प्रमुख वर्गों में विभाजित था। प्रथम वर्ग विशेषाधिकार वाले कुलीनो, सामंतों और उच्च पादरियों से बना था। इन्हें राजा को किसी प्रकार का कर नहीं देना पड़ता था। दूसरा वर्ग श्रमिकों, कृशको, छोटे-छोटे कर्मचारियो, शिल्पियों, व्यापारियों, दुकानदारों और वकील, डॉक्टर, दाशर्निक, लेखक आदि मध्यम स्थिति के व्यक्तियों से निर्मित था। इन सभी व्यक्तियां े को राज्य, चर्च और जमींदारों को भारी कर देने पड़ते थे। इन करों के कारण उनमें हर समय राज्य के प्रति असंतोष रहता था। यही असंतोश आगे चलकर क्रांति के विस्फोट का बन गया था।

विशेशाधिकार प्राप्त वर्ग में कुलीन और उच्च पादरी सम्मिलित थे। दोनों की सम्मिलित संख्या लगभग 2 लाख सत्तर हजार थी जो फ्राँस की संपूर्ण जनसंख्या का एक प्रतिशत से भी कम था। इतना होते हुए राज्य के सभी उच्च पदों और भूमि के अधिकाश भाग पर उन्हीं का अधिकार था। सांमतों ने अपनी-अपनी जागीरों में आटा पीसने की चक्की और शराब की भÍियाँ लगा रखी ं थी तथा तंदूर खाले रखे थे। जागीर में रहने वाले सभी व्यक्तियों को टैक्स देकर भÍियों पर अंगूर की शराब बनवानी, चक्की पर आटा पिसवाना और तंदूर पर रोटी पकवानी पड़ती थी। जागीरदार कृशकों से उनके माल पर चुंगी तथा पुलों पर रोटी टैक्स वसूल करते थे। उनकी शिकारगाहों में जंगली जानवर और सामंतों के पालतु पशु रहते थे जो कृशकों के खेतों को उजाड़ते रहते थे। बचे ारे कृशकों को यह हानि चुपचाप सहन करनी पड़ती थी। साधरण वर्ग के व्यक्तियांे को कुलीनों और पादरियों के विशेषाधिकार असहनीय हो गए थे। अत: उनका असंतोश ही धीरे-धीरे क्रांति का विस्फोट करने के लिए चिंगारी का काम करने लगा। चर्च में भी असमानता और पक्षपात का बाले वाला था। चर्च के तीन उच्च पदों पर कुलीनों के छोटे पुत्रों की नियुक्ति की जाती थी। वे चर्च के तीस करोड़ रुपये वार्शिक की आय और लंबी अवधि में एकत्रित की गइर् सम्पित्त का उपभोग करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र थे। उन्हें भी राज्य को किसी प्रकार के कर नहीं देने पड़ते थे। वे अपना अधिकांश समय भोग-विलास और राजदरबार के शड़यत्रों में व्यतीत करते थे। धार्मिक क्रियाकलाप और पूजा-पाठ में उनकी रुचि नहीं थी। छोटे-छोटे पादरी साधारण वर्ग के कृशकों में से नियुक्त किये जाते थे। उन्है। चर्च से प्रति व्यक्ति केवल 25 पौंड वार्शिक ही मिलता था। अत: उन्हें भी अपना और अपने परिवार का जीवन चलाने में असहनीय कश्ट सहन करने पड़ते थे। साधारण वर्ग के समान ही छोटे-छोटे पादरियों में भी शासनतंत्र के प्रति भारी असंतोश था, इसीलिए क्रांति का आरंभ होने पर इन्होंने साधारण वर्ग को अपना पूर्ण सहयोग प्रदान किया था। समाज में कृशकों की संख्या सबसे अधिक थी। संपूर्ण जनसंख्या का 80 प्रतिशत इन्हीं से निर्मित था। इनकी कुल संख्या 2 करोड़ से भी अधिक थी। करों और टैक्सों का संपण्ूर् ा भार इन्हीं के कंधों पर था। राज्य के अतिरिक्त इन्है। चर्च को धर्म कर अपनी उपज के दसवें भाग से बीसवें भाग तक तथा जागीरदारों को तरह-तरह के कर देने पड़ते थे। उसे भंटे , टाले टेक्स, नजराने आदि के रूप में सदैव कुछ न कुछ देते रहना पड़ता था। इस पक्र ार उसकी आय का 85 प्रतिशत से भी अधिक करों के रूप में निकल जाता था। शश्े ा 15 प्रतिशत से भी कम से उन्हें अपना और अपने परिवार का पालन-पाश्े ाण करना पड़ता था। इसी कारण उस समय की प्रचलित राज्य-व्यवस्था के प्रति असंतोश की गहरी मात्रा साधारण वर्ग में विद्यमान थी और क्रांति आरंभ होने पर इन्हांने उसमें सबसे अधिक भाग लिया था।

बौद्धिक कारण

फ्राँस की उस अव्यवस्था में फ्राँसीसी दाशर्निक और विचारकों ने राजनीतिक ओर सामाजिक त्रुटियों का जनता को ज्ञान कराकर उसके हृदय में कुलीनो, सामंतों और उच्च पादरी वर्ग के विरूद्ध घृणा, असंतोश और विद्रोह की भावनाओं को जागृत करके तीव्रता प्रदान की थी। अत: यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सभी प्रकार के दाशर्निकों और लेखकों ने फ्राँसीसी क्रांति के विस्फाटे में अपना पूरी तरह सहयोग प्रदान किया।

मॉन्टेस्क्यू ने राजा के दैवीय अधिकारों की सत्यता को चुनौती देकर सिद्ध कर दिया कि राजा जनता द्वारा निर्वाचित व्यक्ति होने के कारण अपनी इच्छा को कानून का रूप प्रदान नहीं कर सकता। अस्तु देश में इंग्लैण्ड के समान वैद्य राज सत्ता की स्थापना की जानी चाहिए। वाल्तेयर ने अपने निदात्मक लेखों और भाषाओं द्वारा राजा और चर्च के हठधर्मी तथा उच्च पादरियों की धर्म के प्रति अश्रद्धा का जनता को परिचय कराया।

रूसो ने अपनी पुस्तक ‘‘सामाजिक समझौता’’ द्वारा सिद्ध किया कि फ्रासं के शासकों ने अपनी मूर्खता और अत्याचारों द्वारा जनता को क्रांति के लिए उत्तेजना प्रदान की है। उसने मानव अधिकारों की व्याख्या करते हुए लोकतंत्र प्रणाली को शासन की सर्वोत्त्ाम प्रणाली प्रगट किया तथा राजा को जनता द्वारा निर्वाचित व्यक्ति सिद्ध करते हुए उसकी स्थिरता का आधार प्रजा की सद्भावना प्रगट किया। क्वसे ने ने व्यापारिक माल पर चंगुी लेना अनियमित बताते हुए उसे हटाने का परामर्श दिया। इस तरह दाशर्निको, लेखकों और विचारकों ने देश की प्राचीन शासन व्यवस्था के दोषों का जनता को ज्ञान करा कर उन्हें उन बुराइयांे को दूर करने के लिए क्राँति का आह्वान करने की प्रेरणा प्रदान की।

आर्थिक कारण

राज्यक्रांति का एक प्रधान कारण फ्राँस की आर्थिक दशा में दोष उत्पन्न होना था। लुई 14वें के काल में अनेक युद्ध लड़े गये जिनके कारण देश ऋण के भारी भार में दब गया। तत्पश्चात उसने तीस करोड़ रुपया व्यय करके पेरिस से 12 मील दूर वर्साय नाम का एक राजप्रसाद तैयार कराया जो शान-शौकत और सुंदरता में अनुपम था। इसकी शान शौकत स्थिर रखने में लगभग 12 करोड़ रुपया वार्शिक व्यय होता रहता था। लुई पंद्रहवंे के काल में अपव्यय में वृद्धि होने, सप्तवश्र्ाीय युद्ध में फ्रासं के सम्मिलित होने और शासन व्यवस्था बिगड़ जाने से व्यय की मात्रा आय से अधिक हो गयी और प्रतिवर्ष घाटा होने लगा। इस घाट को नये-नये ऋण लेकर पूरा करना पड़ा।

लुई 16वें के शासन के अंतर्गत आर्थिक स्थिति इतनी विकृत हो चुकी थी कि उसमें सुधार करना उस समय का सबसे प्रधान कार्य बन गया। आर्थिक दशा तब सुधर सकती थी, जब विशेशाधिकार प्राप्त वर्ग पर कर लगाये जायें तथा अपव्यय को कम किया जाय।े ये दोनो कार्य कुलीनों और उच्च पादरियों के स्वार्थ के विरूद्ध थे। अत: उन्होंने महारानी की आड़ लेकर सुधारों का उग्रता के साथ विरोध किया। लुई 16 वें ने अपने मंत्रिमंडल में तुर्गों और नेकर को सम्मिलित करके बारी-बारी से वित्त मंत्री नियुक्त किया। परंतु स्वार्थी दरबारियों के विरोध के कारण तुर्गों और नेकर के सुधारों का काइेर् सुखद परिणाम नहीं निकल सका। अत: लुई सोलहवे को उन्हें एक-एक करके अर्थ मत्री पद से पृथक करना पड़ा। उस काल में फ्रासं पर साठ करोड़ डॉलर का ऋण था। अत: फ्रांस के दिवालिया होने में कोई कमी नहीं रह गई थी। लुइर् ने विवश होकर 1787 ई. में राज्य के प्रमुख व्यक्तियों की सभा बुलायी। सभा ने कुलीनों और उच्च पादरियों पर लगाये जाने का प्रस्ताव सभा में प्रस्तुत किया। कुलीनों ने प्रस्ताव को टालने का प्रयत्न किया और कहा कि इस प्रस्ताव पर केवल राज्य-परिशद ही निर्णय कर सकती है। अब लुई सोहलवें को राज्य-परिशद का अधिवेशन बुलाना पड़ा। राज्य परिशद को बुलाना ही क्रांति को आमंत्रित करना था। परिशद के तृतीय वर्ग के सदस्यों ने परिशद में आते ही क्रांति की बारूद में चिंगारी लगा दी।

1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति का विकास

क्रांति का प्रारंभ

क्रांति के कारणों से स्पष्ट हो जाता है कि लुई 14वें के शासनकाल से ही देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी थी और लुई 16वें के शासन के आते-आते आर्थिक संकट ने विकराल रूप धारण कर लिया था। राजा तथा दरबारियों के खर्च की कोई सीमा नहीं थी। देश का खजाना बिल्कुल खाली हो गया था। तब लुई 16वें ने परिस्थितियों से विवश होकर देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए तुर्गो नामक व्यक्ति को वित्त मत्री के पद पर नियुक्त किया।

तुर्गो 1774 से 1776 ई. तक फ्रांस का वित्त मंत्री रहा वह साहसी एवं प्रतिभाषाली व्यक्ति था। उसे अर्थशास्त्र का श्रेष्ठ ज्ञान था। वह व्यापार के क्षेत्र में मुक्त व्यापार की नीति का समर्थक था। वित्त मंत्री के पद पर आते ही उसने मितव्ययता की नीति पर जोर दिया तथा घाटे की पूर्ति के लिए कर पद्धति में समानता के सिद्धातं को लागू करने का प्रस्ताव दिया। समय के अनुकूल तुर्गो की नीतियाँ राष्ट्र के लिए हितकारी थीं किंतु राजदरबारियों को उसकी नीतियाँ सहन नहीं हुई और उन्होंने राजा को तुर्गो के खिलाफ भड़काकर वित्त मत्री के पद से हटवा दिया। यह राजा के चरित्र की सबसे बड़ी दुर्बलता थी। यदि तुर्गो अपने पद पर रहता ओर उसकी नीतियों को क्रियान्वित किया गया होता तो निश्चित रूप से वह फ्रांस को आर्थिक संकट से उबार लेता किंतु दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं सका। तुर्गो के पश्चात् 1776 ई. में नेकर को फ्रांस का वित्त मंत्री बनाया गया जो 1781 तक अपने पद पर बना रहा। नेकर एक सुधारवादी व्यक्ति तथा जिनेवा के प्रतिष्ठित बैंक का संचालक था। वह भी मितव्ययता की नीति का समर्थक था। देश के आय-व्यय को संतुलित करने के लिए उसने सरकारी खर्चों में कमी करने के प्रयत्न किये किंतु उसकी नीतियाँ भी कुलीन एवं मंत्रीगणों को नाराज करने वाली थीं इसीलिए उन्होनें रानी की सहायता से नेकर को अपदस्थ करने के लिए राजा को तैयार कर लिया। फलस्वरूप नेकर ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।

नेकर के पतन के साथ ही राजा के एेिच्छक सुधारों का युग समाप्त हो गया। सुधारों की चष्े टा और चेष्टा की असफलता ने क्रांति को तेजी से ला दिया। नेकर के पश्चात् फ्लूरी, दआरमासां तथा केलोन फ्रांस के वित्त मंत्री बने। किंतु दरबारियों, मंत्रियों तथा रानी के कारण फ्रांस की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार संभव नहीं हो सका और राजकोष खाली हो गया। ऐसी गंभीर स्थिति में राजा ने उच्चवर्गीय लोगों पर कर लगाने का सुझाव रखा तथा इसके लिए उसने उच्चवर्गीय लोगों की सभा बुलाने का प्रस्ताव रखा जिसमें उनकी सहमति ली जा सके।

काउंसिल ऑफ नोबल्स

1786 ई. में राजा की आज्ञा से विशिष्ट व्यक्तियों की सभा (काउंसिल ऑफ नाबे ल्स) जिसमें उच्चवर्गीय व्यक्तियों के साथ-साथ कुछ तृतीय वर्ग के लोग भी थे, का अधिवेशन हुआ। इसमें केलोन ने देश की आर्थिक स्थिति का विवरण प्रस्तुत किया तथा उसके सुधार के लिए उच्च वर्ग के लोगो पर भी कर लगाने पर बल दिया किंतु उच्चवर्गीय लोगों ने केलाने का परु जोर विरोध किया और उसे उसके पद से पदच्युत करवा दिया। केलोन के पश्चात् ब्रिएन फ्रांस का वित्त मंत्री बनाया गया परंतु देश की संकटपूर्ण आर्थिक समस्या यथावत बनी रही। तत्पश्चात् काउंसिल ऑफ नोबल्स की सभा विसर्जित कर दी गयी। इस सभा के विसर्जन के पश्चात् जनता में राजा और उसके मंत्रियों एवं कुलीन वर्ग के विरूद्ध विरोध की भावना अत्यंत उग्र हो गयी।

राजा और पार्लियामेंट का संघर्ष

अंतत: परिस्थितियों से विवश होकर राजा ने नवीन करों को लगाने का निश्चय किया। नियमानुसार उन्हें पेिरस की पार्लियामंटे में भजे ा गया। पार्लियामंटे ने नये करों को दर्ज करने से मना कर दिया और यह घोषणा की कि नवीन करों को लगाने का अधिकार केवल स्टेट्स जर्नल को है। इस प्रकार राजा और पार्लियामंटे के बीच तनातनी आरंभ हो गयी अंतत: लुई 16वें ने 8 अगस्त 1788 ई. को यह घोषणा की, कि 5 मई 1789 ई. को स्टेट्स जर्नल को अधिवेशन होगा।

स्टेट्स जर्नल

स्टेट्स जर्नल फ्रासं की एक पुरानी प्रतिनिधि सभा थी, जिसमें कुलीन, पुराेि हत और जनसाधारण वर्ग के प्रतिनिधि शामिल हुआ करते थे। इस सभा का जनतंत्रीय सिद्धांत के अनुरूप विकास नहीं हो पाया था और 1614 ई. के बाद इसका अधिवेशन होना बंद हो गया था। फलत: लोग इसकी महत्ता और उपयाेिगता को भलू बैठे थे। अब 175 वर्षो के बाद अर्थात् 1789 ई. में पुन: इसकी आवश्यकता महसूस की गई।

5 मई 1789 ई. को वर्साय में स्टेट्स जर्नल का प्रथम अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में वित्त मत्री ने देश की संकटपूर्ण आर्थिक स्थिति के संबंध में एक विवरण पढ़ा जिसमें घाटे को पूरा करने के लिए सुझाव दिये गये किंतु सुधारों की काइेर् व्यवहारिक याजे ना प्रस्तुत नहीं की गयी। सुधारों पर काइेर् मतदान भी नहीं हुआ। अत: जनसाधारण के प्रतिनिधियों को बड़ी निराशा हुई और उनके मनों में अनेक शंकायें जन्म लेने लगीं।

नेशनल असेम्बली

17 जून 1789 ई. को तीसरे सदन के प्रतिनिधियों ने अपने आप को राष्ट्रीय सभा घोषित करने का एक साहसपूर्ण क्रांतिकारी कदम उठाया। इसके अनुसार उसने अपने आप को फ्रांस की जनता की एकमात्र प्रतिनिधि सभा घोषित कर दिया। स्टेट्स जर्नल का नाम बदल दिया गया तथा उसे नेशनल असेम्बली कहा जाने लगा। सर्वसाधारण वर्ग के इस निर्णय से दरबारियों में गहरा असंतोष उत्पé हुआ। तथापि 19 जून को पादरियों ने भी तृतीय सदन से मिल जाने का निर्णय लिया, जिससे सवर्स ाधारण वर्ग की शक्ति बढ़ गयी।

उपराक्ते स्थिति के पश्चात् लुई 16वें ने कुलीनों के प्रभावों में आकर तृतीय सदन के कायोर् ं में हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से सदन के सभा भवन को बंद कर दिया और वहाँ सेना तैनात कर दी। जून 1789 ई. को जब सर्वसाधारण वर्ग के सदस्य सभागृह पहुँचे तो वहाँ तैनात सैनिकों को देखकर वे अत्यतं क्रोधित हो गए ओर उन्होंने सभा भवन के निकट एक टेनिस कोर्ट में एकत्र होने का निर्णय लिया। टेनिस कोर्ट में बेली की अध्यक्षता में एक ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ और यह शपथ ली गई कि ‘‘जब तक राष्ट्र का संविधान स्थापित नहीं हो जायेगा तब तक हम कभी अलग नहीं होगे और जहाँ भी आवश्यकता पड़गेी हम एकत्र होगे ‘‘ इसे टेनिस कोर्ट की शपथ कहते है और यह शपथ फ्रासं की क्रांति की एक महान घटना थी।

23 जून 1789 ई. को स्टेट्स जर्नल का शाही अधिवेशन प्रारंभ हुआ किंतु इसमें भी राजा दरबारियों के प्रभाव में आ गया और उसने तृतीय सदन के प्रस्तावों को अमान्य कर दिया। राजा के इस कार्य से सर्वसाधारण वर्ग को घारे निराशा हुई। अधिवेशन की समाप्ति पर राजा तथा उच्चवर्गीय सदस्यों ने सभागृह छोड़ दिया परंतु तीसरे सदन के सदस्य अपने स्थान पर बने रहे। क्योंकि वे अपने अधिकारों तथा महत्ता का अंतिम निर्णय कर लेना चाहते थे। इस बीच उनके नेता मिराबो ने साहसिक घोषणा कर उनका मागर्द र्शन किया। मिराबो ने जारे दार शब्दों में कहा ‘‘हम यहाँ जनता की इच्छा से उपस्थिति हुए हैं और जब तक बंदूक की गोली से हमको नहीं हटाया जायेगा तब तक हम यहाँ से नहीं जायेंगे।’’ मिराबो की घोषणा और क्रियान्वयन के पश्चात् राजा की स्थिति कठिन हो गयी क्योंकि अधिकांश पादरी और मध्यम वर्गीय लोग सर्वसाधारण की सभा में सम्मिलित हो गए थे। अत: राजा ने 27 जून को तीनों सदनों को एक साथ बठै ने की अनुमति दे दी। इस पक्र ार नेशनल असेम्बली को वैधानिक मान्यता मिल गयी। यह सर्वसाधारण वर्ग की पहली महत्वपूर्ण विजय थी। इसी समय सत्ता राजा के हाथों से निकलकर राष्ट्रीय सभा के हाथों में चली गयी। इस घटना से राजा, रानी और अन्य दरबारी खिé हो गये। दरबारियों की प्रेरणा से राजा ने सैनिक शक्ति के द्वारा नेशनल असेम्बली को डराने धमकाने का प्रयास किया तथा 11 जुलाई 1789 ई. को वित्तमंत्री नेकर को पदच्युत कर देश छोड़ देने के आदेश दिये गये। राजा का यह कार्य अत्यंत अनैतिक था। इससे जनता में उत्तेजना का वातावरण बन गया और उग्र क्रांतिकारियों ने हथियार एकत्र कर आगे बढ़ने का निर्णय लिया।

बास्तील का पतन (14 जुलाई 1789 ई.)

पेरिस के पूर्व में कुछ दूरी पर 1383 ई. में निर्मित 30 मीटर ऊॅची दीवार थी। यहॉं के कारावास में अनेक बंदियों को रखकर उनको बर्बर अमानुषिक यातनाएं दी जाती थी। इससे यह दुर्ग और उसका बंदीगृह अनियंत्रित राजसत्ता और उसके अत्याचारों का घृणित पत्र ीक बन गया था। जनता में इस दुर्ग के प्रति आक्रोश और घृणा थी। इस समय दुर्ग का रक्षक और दुर्गपाल गर्वनर द लौने था। उसके पास दुर्ग में बंदूकों और बारूद का भडं ार ओर 127 सुरक्षा सैनिक थे। 14 जुलाई को शस्त्रों की खाजे में आयी उत्तेजित भीड़ ने बास्तील दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। लगभग दो घंटे के संघर्ष और गोलाबारी के बाद द लोने ने आत्म-समर्पण कर दिया। क्रोधित भीड़ ने उसके टुकडे़-टुकड़े कर दिये और वहां बंदी अनेक देशभक्तों को मुक्त कर दिया और अस्त्र शस्त्रों का भडं ार लूट लिया।

बास्तील के पतन का प्रभाव

बास्तील का पतन जनता की विजय मानी गयी। यह घटना राजतंत्र की पराजय और स्वतंत्रता के नये युग का प्रारंभ बन गई । फ्रांस के देशभक्तों ने इस दिन को स्वतंत्रता के प्रथम वर्ष का प्रथम दिन माना है। इसने सर्व सत्ता संपन्न निरंकुश स्वेच्छाचारी शासन और जर्जरित सामंती व्यवस्था के खोखलेपन को स्पष्ट कर दिया। सामंतशाही पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की नीवं हिल उठी, अब उसके गिरने की औरपचारिकता शेष थी और यह औपचारिकता 4 अगस्त को पूरी हो गयी जब कुलीन वर्ग के विशेष अधिकारों को समाप्त कर दिया गया।

इस घटना से फ्रांस की क्रांति हिंसा और रक्तपात की ओर मुड़ गयी। जब जनता की भीड़ जनता की महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। बास्तील के पतन के बाद सारे फ्रांस में क्रांति की लहर फैल गई और पेरिस, क्रांतिकारियों की सभी गतिविधियों का केदं ्र बन गया। इसके बाद कृषकों ने देहातों में सामंतों के गढ़ों को लूटकर विध्वसं कर दिया, उनके दस्तावजे जला दिये, उनकी सम्पत्ति लूट ली और उनकी कृषि भूमि पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया। परिणामस्वरूप कुलीन वर्ग के लोग अपने जीवन की सुरक्षा के लिये फ्रांस से बाहर पलायन कर गये।

लोकतांत्रिक घटनाओं की ओर अग्रसर होने से पेरिस के लोगों ने नागरिक प्रशासन को प्रजातंत्रीय रूप दे दिया। उन्होंने कुछ नेताओं को निर्वाचित पेरिस की नवीन स्थानीय सरकार का प्रमुख बनाया और ओतल द वील में एकत्रित होकर बैली को पेरिस का मेयर चुन लिया। शीघ्र ही फ्रांस के अन्य प्रांतों में भी एसे ी ही स्थानीय सरकार कायम हो गयी। पेिरस को एक विशिष्ट महत्वशाली स्वरूप प्राप्त हो गया। अब वह क्रांतिकारियों की राजनीतिक गतिविधियों का कंदे ्र बन गया था।

राष्ट्रीय रक्षा दल और राष्ट्रीय ध्वज (15-16 जुलाई 1789 ई.)

फ्रासं के क्रांतिकरियों ने क्रांति व्यवस्था कायम रखने के लिये जो नागरिक सेना पहिले थी, उसका नाम ‘राष्ट्रीय रक्षादल’ रख दिया। इसकी सदस्य संख्या 200 से बढ़ा कर शीघ्र ही 48,000 तक पहुंचा दी गई और लाफायते को इसका अध्यक्ष बनाया गया। पेिरस के समान अन्य नगरां े में भी राष्ट्रीय रक्षा दल और स्थानीय शासन स्थापित किये गये। अब बोर्बो राजवंश के श्वेत झंडे के स्थान पर लाल, सफेद और नीले रंग का तिरंगा झंडा राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार कर लिया गया।

राजा द्वारा मान्यता (17 जुलाई 1789)

राजा लुई सोलहवे ने स्वयं पेिरस में क्रांतिकारियों के कंदे ्र स्थल ‘आते ल द बिल’ में जाकर क्रांतिकारियों के प्रेरणादायक भाषण सुने। राजा ने बले ी और लाफायत की नियुक्तियों को तथा क्रांतिकारियों के तिरंगे झंडे को मान्यता प्रदान कर दी। इससे फ्रासं के अन्य नगरों में क्रांति के फैलने हेतु प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।

1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति का प्रभाव

एक ओर कुछ विद्वानों ने फ्रासीसी क्रान्ति को विनाशकारी, अप्रगतिशील तथा अराजकतावादी आन्दोलन कहा है, तो दूसरी ओर विद्वानों ने इसे विश्व की महानतम घटना कहा है। यह विश्व क्रांति थी, जिसने समूची मानव जाति के इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी।

फ्रांस पर प्रभाव

यद्यपि क्रांति के प्रारंभ के प्रथम दशक में फ्रांस में भीषण अस्त-व्यस्तता, अस्थिरता, भारी उथल-पुथल और अमानुषिक रक्तपात हुआ, पर फिर भी उसका तात्कालिक और स्थायी प्रभाव फ्रांस पर पड़ा। इस प्रभाव का विश्लेषण अधोलिखित है।

राजनीतिक प्रभाव

  1. निरंकुश शासन का अंत और गणतंत्र की स्थापना- इस क्रांति से फ्रांस में पुराना निरंकुशता और तानाशाही का युग समाप्त हो गया। दैवी अधिकारों के सिद्धांत पर आधारित राजतंत्र समाप्त हो गया और उसके स्थान पर संवैधानिक राजतंत्र और बाद में गणतंत्र स्थापित हो गया। 
  2. लिखित संविधान- क्रांति के बाद फ्रांस के लिए लिखित संविधान बनाया गया जिसमें व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका के अधिकार और कर्तव्य स्पष्ट किये गये और नागरिकों को मत देने का अधिकार प्राप्त हुआ। यह संविधान फ्रांस का ही नहीं, अपितु यूरोप का भी प्रथम लिखित संविधान था। 
  3. लोकप्रिय सम्प्रभुता का सिद्धांत- क्रांति ने राज्य के संबंध में एक नवीन धारणा को जन्म दिया और राजनीति में नवीन सिद्धांत प्रतिपादित किये। लोकप्रियता जनता में निहित होती है। इस क्रांति ने यह प्रमाणित कर दिया कि प्रजा ही वास्तव में राजनीतिक अधिकारों की स्वामी है और सार्वभैाम या सार्वजनिक सत्ता उसके पास ही है। 
  4. मानव अधिकारों की घोषणा- क्रांति के दौरान मानव के मौलिक अधिकारों की घोषणा की गई। उसमें मनुष्य के बहुमुखी विकास के लिए आवश्यक मूलभूत अधिकारों को स्पष्ट शब्दो में अभिव्यक्त किया गया। कानून की दृष्टि में सभी नागरिकों को समानता प्रदान की गई। इससे जन सामान्य की आशा-आकांक्षा का विस्तार हुआ और फ्रासं में एक लाके तंत्रीय समाज का निर्माण हुआ। 
  5. प्रशासन में सुधार- क्रांति के बाद प्रशासन का पुर्नगठन किया गया। फ्रासं को समान 83 भागां े में विभक्त कर उनको कैन्टनों और कम्यनूों में विभाजित किया। उनमें प्रशासन के लिये नागरिकों द्वारा निर्वाचित सभाएं स्थापित की गई। पदों पर सुयोगय और सक्षम अधिकारी नियुक्त किय गए। पक्षपातपूर्ण कर व्यवस्था तथा अव्यवस्थित फिजूल खर्चियों के स्थान पर समान कर-व्यवस्था और नियमित बजट प्रणाली स्थापित की गई। न्याय-व्यवस्था में भी परिवर्तन किया गया। न्यायालयों को कार्यकारिणी और व्यवस्थापिका के प्रभाव और नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया। फाजैदारी मकुदमों के लिये ‘ज्यूरी प्रथा’ प्रारंभ की गई। वंशानुगत और भ्रष्ट न्यायाधीशो के स्थान पर नव निर्वाचित न्यायाधीशो की व्यवस्था की गई।
  6. समान कानून और कानूनों का संग्रह- कानूनों की विविधता समाप्त कर दी गई। नेपोलियन ने विभिन्न कानूनों को एक करके दीवानी, फौजदारी तथा अन्य कानूनों का व्यवस्थित संग्रह करवाया जिससे फ्रांस में एक सी कानून व्यवस्था स्थापित की गई। इस कानून-संग्रह को ‘‘कोड ऑफ नेपोलियन’’ कहते हैं। बाद में आस्ट्रिया, इटली, जर्मनी, बेल्जियम, हॉलेण्ड और अमेरिका आदि देशों में भी काडे ऑफ नेपोलियन में आवश्यकतानुसार आंशिक परिवर्तन करके उसे लागू कर दिया गया।

धार्मिक एवं सामाजिक प्रभाव

  1. चर्च का पुर्नगठन- क्रांति के उपरान्त फ्रांस के केथोलिक चर्च का पुनर्गठन किया गया। चर्च की भूमि सत्ता और सम्पत्ति सरकार के अधिकार में कर दी गई और पादरियों के लिये नवीन संविधान लागू किया गया और उनको सरकारी कर्मचारियों के समान वेतन दिया जाने लाग। इसी नवीन संविधान के अंन्तर्गत पोप से संबंध विच्छेद कर दिया गया और अब पोप की सर्वोपरिता समाप्त हो गई। इससे कैथोलिकों और उनके विरोधियों में अधिक मत-भेद उभरने लगे। 
  2. सामाजिक समानता का युग- पुरातन सामन्तवादी व्यवस्था का अंत इस क्रांति का महत्वपूर्ण प्रभाव था। कुलीन सामन्तों की व्यवस्था, उनकी कर प्रणाली और उनके विशेष अधिकार समाप्त कर दिये गये। उनके द्वारा लगाये गये कर भी समाप्त कर दिये गये। सामन्त प्रणाली और दास व्यवस्था का अंत कर दिया गया। अंध विश्वासों व रूढियों पर आधारित पुरातन संस्थाए नष्ट कर दी गर्इं। सामाजिक समानता ओर सुव्यवस्था स्थापित की गई। सभी देशवासियों को समान नागरिक अधिकार प्रदान किये गये उन्हें बिना किसी भेदभाव के समानता व स्वतंत्रता दी गई। 
  3. कृषकों की दशा में सुधार- क्रांति से पूर्व कृषकों की दशा दयनीय थी। सामन्त ओर पादरी विभिन्न करों द्वारा उनका शोषण करते थे। इससे कृषक निर्धन हो गये थे क्रांति, उनके लिये वरदान सिद्ध हुई। कृषकों को निर्दयी सामन्तों और जागीरदारों के अत्याचारों करों, शोषण और दासता से छुटकारा मिला। उन्हान सामन्तो से प्राप्त भूिम पर बड़े परिश्रम और लगन से कृषि की और उपज में वृद्धि की। 
  4. शिक्षा और साहित्य में प्रगति- क्रांति के दौरान शिक्षा को केथोलिक चर्च के आधिपत्य और प्रबन्ध से हटाकर उसे गणतंत्रीय सरकार के अधीन कर दिया। इस प्रकार शिक्षा का राष्ट्रीयकरण किया। आधुनिक फ्रांस की राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति की नींव क्रांति ने ही रखी। ज्ञान वृद्धि के लिए अनेक विद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी संस्थान, प्रशिक्षण संस्थाएं और पेरिस का विश्वविद्यालय स्थापित किये गये। लिखने, भाषण देने और उदारवादी प्रगतिशील विचारों का प्रारंभ हुआ। 
  5. राष्ट्रीय भावना का विकास- जब विदेशी सेनाओं ने राजतंत्र की सुरक्षा के लिए फ्रासं पर आक्रमण किए तब विभिन्न वर्गो के लोगों ने सेना में भरती होकर अत्यतं वीरता ओर साहस से विदेशी सेनाओं का सामना किया ओर विजय प्राप्त की। इस प्रकार देश की सुरक्षा के लिए फ्रांसीसीयों में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न हुई। इस राष्ट्रीय भावना और विजयों से फ्रांस के सैनिक गौरव में अधिक वृद्धि हुई। समस्त यूरोप में सम्मिलित सैन्य शक्ति का सामना जिस सफलता व दृढता से फ्रांस कर सका, उसका मूल आधार उसकी राष्ट्रीयता और एकता की भावना थी।

आर्थिक प्रभाव

आर्थिक संकटों का निराकरण करने के लिये ही फ्रांस में क्रांति का प्रारंभ हुआ था। आर्थिक दुव्र्यवस्था सुधारने के लिये चर्च की भूमि का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया, सामन्तों की भूिम को कृषकों में विभक्त किया गया। मध्यम वर्ग के लोगो ने भी सम्पत्ति और भूमि क्रय कर ली। सामन्त प्रथा के अवसान के बाद करों का भार सभी वर्गो के लिये समान कर दिया गया। सभी को कर देना आवश्यक हो गया। अनुचित अन्यायपूर्ण करों का अंत कर दिया गया। शाही व्ययशीलता को समाप्त कर दिया गया। इस प्रकार प्रशासन व्यवस्था में बजट प्रणाली और बचत के कारण आर्थिक स्थिरता आ गई।

नवीन वाणिज्य नीति

व्यापार पर लगे प्रतिबंध समाप्त कर दिये गये, नाप तोल में दशमलव पद्धति प्रारंभ की गई। श्रमिकों व कारीगरों के लिये दोषपूर्ण गिल्ड व्यवस्था समाप्त कर दी गई । पजूंी और साख के लिये बैंक ऑफ फ्रांस की स्थापना की गई। नेपोलियन के शासनकाल में सड़कों, पुलों और बंदरगाहों का निर्माण किया गया जिससे व्यापार और उद्योगों की बहुत प्रगति हुई।

यूरोप पर प्रभाव

  1. स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना- फ्रांस की क्रांति ने यूरोप को ही नहीं अपितु मानव समाज को भी स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के शाश्वत तत्व प्रदान किये। ये सदैव जनता को स्फूि र्त देने वाले रहै। क्रांति से समाज में आर्थिक और सामाजिक समानता की भावना फैली, धार्मिक स्वतंत्रता और सहनशीलता का प्रचार बढ़ा और नागरिक स्वतंत्रता प्रदान की गई। व्यक्तिगत अधिकारों को मान्यता मिली। फ्रासं के क्रांतिकारी अन्य देशों की पीड़ित जनता को अपना बंधु समझते थे। स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व के सिद्धांत और लोकतंत्र के विचार यूरोप के अन्य देशों में शीघ्र ही फैल गये और इन विचारों के लिये संसार में तब से सघ्ं ार्ष प्रारभ हुआ।
  2. विप्लवों और क्रांतियों का नवीन युग- मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सिद्धातं सदा के लिए फ्रासं और बाद में यूरोप के सभी देशों में स्वीकार कर लिया गया। इससे जनता को अत्याचारी शासन का अंत करने की स्वतंत्रता और संघर्ष करने की प्रेरणा प्राप्त हुई। फ्रांस की क्रांति ने लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता की प्रेरणा दी। इन्हीं सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप देने के लिये यूरोप में 1830 ई. एवं 1848 ई. में क्रांतियां हुर्इं। संभवत: रूस में 1917 ई. की क्रांति और कार्लमाक्र्स के साम्यवादी समाज संगठन के सिद्धांत का प्रचार फ्रांस की क्रांति के आदर्शो पर ही हुआ। इन क्रांतियों से यूरोप में निरंकुश स्वेच्छाचारी राजाओ, तानाशाहों और उनके अत्याचारी शासन का अंत हुआ और जनता की विजय हुई। 
  3. यूरोप में क्रांति के दूरगामी परिणाम- फ्रांस की क्रांति, एक अंतर्राष्ट्रीय महत्व का तीव्र आंदोलन था; जिसके विस्तृत प्रसार से फ्रांस का इतिहास परिवर्तित हो गया। फ्रांस का राष्ट्रनायक नेपोलियन यूरोप की निर्णायक सत्ता बन गया। नेपोलियन का इतिहास यूरोप का इतिहास बन गया। 
  4. अंतर्राष्ट्रीयता का प्रसार- क्रांति के बाद फ्रांस के विरूद्ध हुए युद्धों ने और फ्रांस को परास्त कर देने की भावना ने यूरोप के देशों को परस्पर एक दूसरे के समीप ला दिया। नेपोलियन को वाटरलू में परास्त करने के पश्चात यूरोप की राजशक्तियों ने यूरोप में शांति व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखने के लिए पवित्र संघ, और यूरोपीय संयुक्त व्यवस्था की स्थापना की। इन अंतर्राष्ट्रीय संघों ने यूरोप में विभिन्न स्थानों में सम्मेलन किये। यद्यपि यूरोप की राजनीतिक समस्याओं का निराकरण ये अंतर्राष्ट्रीय संघ नहीं कर सका किन्तु इनसे यूरोप में अंतर्राष्ट्रीय भावना और कार्यप्रणाली को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। 20 वीं सदी की राष्ट्रसंघ और संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं भी इसी अंतर्राष्ट्रीयवाद का परिणाम हैं। 
  5. यूरोप में उच्चकोटि का साहित्य सृजन- फ्रासं की क्रांति के सिद्धातों और आदर्शों से प्रेरित होकर 19 वी सदी में यूरोप के देशों के अनेक विद्वानों, कवियों लेखका ेंं और साहित्यकारों ने स्वतंत्रता, समानता, मानव अधिकार, लाके तंत्र, समाजवाद और जनकल्याण आदि को अपनी कृतियों के प्रमुख विषय बनाये उदाहरण के लिये कवि वर्ड्सवर्थ की ‘प्रील्युड’, साउथगेट की जॉन ऑफ आर्क, विक्टर ह्यूगो की ‘ला मिजरेबल’ कवि शैले की ‘मिस्टेक ऑफ अनार्की’ गोटे का ‘फास्ट’ आदि रचनाओं पर क्रांति के सिद्धांतों और विचारों की स्पष्ट छाप झलकती है।

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