ओस्टियोपोरोसिस के कारण, लक्षण एवं आयुर्वेदिक उपचार

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ओस्टियोपोरोसिस रोग के कारण 

आधुनिक समय के विकृत आहार विहार एवं अनियमित दिनचर्या के परिणाम स्वरुप जैसे ही आयु पचास वर्ष से ऊपर पहुचती है प्राय: वैसे ही शरीर की अस्थियो मे विकार उत्पन्न होने प्रारम्भ हो जाते हैं। इन विकारों में अस्थियों के अन्दर के द्रव्यों का घनत्व कम होने लगता है। शरीर की अस्थियों की इस अवस्था को ‘आस्टियोपोरोसिस’ के नाम से जाना जाता है अर्थात । loss of bone mass or bone density is known as Oesteoporosis.

ओस्टियोपोरोसिस
ओस्टियोपोरोसिस

शरीर में अस्थियों की इस अवस्था अर्थात ओस्टियोपोरोसिस रोग का कोई एक निश्चित कारण विशेष नही होता है अपितु कुछ जैविक एवं कुछ प्रर्यावरणीय कारक ( Genetic and Environmental Factors) मिलकर इस रोग को उत्पन्न करते है। इन कारकों के कारण शरीर की अस्थियों में द्रव्यों का घनत्व कम होने लगता है जिससे अस्थियों की मजबूती एवं लचीलापन कम होता एवं इसके स्थान पर अस्थियों मे भंगुरता उत्पन्न हो जाती है। अस्थियों के भंगुर होने की अवस्था में चोट लगने पर अथवा गिरने व फिसलने पर हड्डियों मे फ्रैक्चर हो जाता है। इस रोग से ग्रस्त होने पर शरीर की बडी अस्थियों में जल्दी जल्दी एवं बार बार फैक्चर होने लगता है।

ओस्टियोपोरोसिस

यद्यपि जैसा कि इकाई के प्रारम्भ में ही स्पष्ट किया जा चुका है कि इस रोग का कोई एक निश्चित कारण निर्धारित नही किया जा सकता है अपितु  दो अथवा अधिक कारण साथ मिलकर ओस्टियोपोरोसिस रोग को उत्पन्न करते हैं -

बढती आयु अथवा वृद्धावस्था

मानव शरीर में निर्माण एवं विनाश सम्बन्धी दो क्रियाएं प्रतिक्षण चलती रहती हैं। यद्यपि बाल्यावस्था एवं युवावस्था में ये दोनों क्रियाएं सम अनुपात में चलती रहती हैं किन्तु जैसे जैसे शरीर वृद्धावस्था की ओर बढता है वैसे वैसे ही निर्माणकारी क्रिया धीमी एवं विनाशकारी प्रक्रिया त्रीव हो जाती है। इसी के परिणामस्वरुप अस्थियों में द्रव्यों का घनत्व धीरे धीरे कम होने लगता है जिसके कारण ओस्टियोपोरोसिस रोग उत्पन्न होता है। वर्तमान समय अप्राकृतिक रासायनिक पदार्थों से युक्त आहार एवं अव्यवस्थित दिनचर्या के कारण शरीर में विनाशकारी प्रक्रिया ओर अधिक त्रीव हो जाती है जिसके परिणाम स्वरुप वर्तमान समय में 50 से 60 वर्ष की आयु के अधिकांश वृद्ध प्राय: इस रोग की चपेट में आ रहे हैं।

असन्तुलित आहार

आहार में पोषक तत्वों की कमी इस रोग की उत्पत्ति का प्रमुख कारण है। प्रमुख रुप से आहार में कैल्शियम एवं विटामिन डी की कमी होने पर ओस्टियोपोरोसिस रोग की संभावना बढ जाती है। भोजन में समुद्री नमक की अधिक मात्रा का सेवन करने के कारण भी यह रोग तेजी से बढता है। चाय एवं कॉफी के रुप में अधिक कैफीन का सेवन भी अस्थियों पर नकारात्मक प्रभाव रखता है जिसके कारण ओस्टियोपोरोसिस रोग की संम्भावना बढ जाती है। भोजन में मिर्च मसाले के अधिक प्रयोग एवं मांसाहारी भोजन का सेवन भी इस रोग के कारण है।

श्रमहीन जीवनशैली

जीवन में श्रम का अभाव अथवा एक स्थान पर बैठकर कार्य करना अथवा शारीरिक श्रम का अभाव होने के कारण भी इस रोग की संम्भावना बढ जाती है। चूंकि शारीरिक श्रम करने से अस्थियां मजबूत एवं जोडों की गतिशीलता बनी रहती है किन्तु इसके विपरित शारीरिक श्रम का पूर्ण अभाव होने पर अस्थियां एवं जोड कमजोर बनते हैं एवं ओस्टियोपोरोसिस रोग की संम्भावना बढ जाती है। श्रमहीन जीवन शैली होने के साथ साथ यौगिक आसनों, क्रियाओं एवं सूर्यनमस्कार आदि अभ्यासों के नही करने पर ओस्टियोपोरोसिस रोग की संम्भावना और अधिक बढ जाती है।

हार्मोन्स का असन्तुलन

शरीर में हार्मोन्स का असन्तुलन होना इस रोग का प्रमुख कारण है। महिलाओं में रजोनिवृति ( Menopose) के उपरान्त एस्ट्रोजन हार्मोन का अल्पस्रावण इस रोग की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारण है। इसी प्रकार पुरुषों में टेस्टोस्टीरॉन हार्मोन का अल्पस्रावण इस रोग की उत्पत्ति का एक प्रमुख कारण है। इन्सुलिन हार्मोन के अल्प स्रावण भी इस रोग का कारण है। हायपर थायरडिज्म एवं हायपर पैराथायरडिज्म भी इस रोग की उत्पत्ति के कारण हैं। इस प्रकार शरीर में हार्मोन का असन्तुलन ओस्टियोपोरोसिस रोग का प्रमुख कारण है।

र्दुव्यसन

धूम्रपान करने की आदत अथवा एल्कोहल सेवन करने से अस्थियों पर नकारात्मक प्रभाव पडता है। इससे इस रोग की संम्भावना बढ जाती है। इसी प्रकार तम्बाकू, गुटका, पान मसाले आदि र्दुव्यसनों से शरीर की अस्थियों में विकृति उत्पन्न होती है जिसके कारण भी यह रोग उत्पन्न होता है। कुछ चिकित्सक धूम्रपान को ओस्टियोपोरोसिस रोग का प्रमुख कारण मानते हैं।

दवाईयों का अधिक सेवन 

अधिक दवाईयों का सेवन करने के कारण अस्थियों में द्रव्यों का घनत्व कम होने लगता है और रोग की संम्भावना बढ जाती है। दवाईयों में विशेष रुप से स्टीरॉइड, एंटीकॉएगुलेंट एवं कीमोथैरेपेटिक ड्रग्स ( Steroids, Anticoagulents & Chemotherapetic drugs) का सेवन इस रोग की उत्पत्ति का प्रमुख कारण हैं। इन दवाईयों का सेवन करने से इस रोग की संम्भावना अधिक बढ जाती है।

बार बार चोट लगना 

बार बार चोट लगने के कारण भी अस्थियों में द्रव्यों का घनत्व कम होता है जिसके कारण ओस्टियोपोरोसिस रोग की संम्भावना बढ जाती है। बढी उम्र में घुटने अथवा अन्य स्थान पर बार बार चोट लगने से शरीर ओस्टियोपोरोसिस रोग की चपेट में आ जाता है।

अस्थियों से सम्बन्धित रोग 

अस्थियों एवं जोडों से सम्बन्धित रोगों जैसे जोडों में दर्द व सूजन, गठिया , आथराइटिस तथा स्पोण्डोलाइटिस आदि से ग्रस्त होने का प्रभाव अस्थियों पर पडता है इन रोगों के कारण अथियां धीरे धीरे कमजोर पडने लगती हैं तथा भविष्य में चलकर यही विकृतियां ओस्टियोपोरोसिस रोग उत्पन्न कर देती हैं।

मानसिक तनाव एवं अनिन्द्रा

मानसिक तनाव, अवसाद एवं अनिन्द्रा ओस्टियोपोरोसिस रोग की उत्पत्ति के प्रमुख कारण हैं। मानसिक तनाव एवं अनिन्द्रा के कारण जहां शरीर की चयापचय दर असन्तुलित हो जाती है तो वहीं अनिन्द्रा की अवस्था में शरीर को भलि भांति विश्राम प्राप्त नही हो पाता है जिसके कारण आगे चलकर ओस्टियोपोरोसिस रोग उत्पन्न होता है।

अनुवांशिकता 

पारिवारिक पृष्टभूमि अर्थात अनुवांशिकता इस रोग का एक प्रमुख कारण हो सकता है। परिवार के बडे सदस्यों (पूर्वजों) को यदि पूर्व में यह रोग है तब अगली पीढी में इस रोग के पहुँचने की सम्भावना बढ जाती है। इस रोग का दोष पीढी दर पीढी अनुवांशिक रुप में चलता रहता है। इस प्रकार उपरोक्त कारणों के प्रभाव से शरीर ओस्टियोपोरोसिस रोग ग्रस्त हो जाता है किन्तु अब यह प्रश्न भी आपके मन में उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है कि हम इस रोग की पहचान कैसे करें ? अथवा इस रोग से ग्रस्त होने पर शरीर में क्या क्या लक्षण प्रकट होते हैं अत: अब हम ओस्टियोपोरोसिस रोग के लक्षणों पर विचार करते हैं -

ओस्टियोपोरोसिस के लक्षण

ओस्टियोपोरोसिस रोग के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह रोग अचानक से उत्पन्न नही होता है अपितु यह धीरे धीरे अथवा चुपके चुपके रोगी को अपनी चपेट में इस प्रकार ले लेता है। अर्थ यह है कि इस रोग का कोई बाºय अथवा प्रारम्भिक लक्षण प्रकट नही होता है। इसी कारण जब रोगी को रोग का ज्ञान होता है तब तक रोग शरीर की अस्थियों में गंभीरतापूर्वक फैल चुका होता है। इसी कारण आधुनिक चिकित्सक कहते हैं कि "Oesteoporosis is a silent Disease" अर्थात ओस्टियोपोरोसिस एक शान्त किन्तु गंभीर रोग है। 

ओस्टियोपोरोसिस रोग का एक मात्र एवं महत्वपूर्ण लक्षण चोट लगने पर अस्थियों का चटक जाना है। इस रोग से ग्रस्त रोगी की अस्थियां भंगुर एवं कमजोर हो जाती हैं जिसके कारण उनका लचीलापन एवं मजबूती कम हो जाती है और गिरने, फिसलने अथवा अन्य किसी प्रकार की चोट लगने पर अस्थियों में फ्रैक्चर हो जाता है।

ओस्टियोपोरोसिस के लक्षण

यद्यपि इस रोग का कोई प्रारम्भिक अथवा बाºय लक्षण प्रकट नही होता है किन्तु रोग का पता करने के लिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान द्वारा बी0 एम0 डी0 ( Bone Mineral Density) टेस्ट विकसित किया है जिसके द्वारा अस्थियों के अन्दर उपस्थित द्रव्यों के घनत्व का ज्ञान किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शरीर की अस्थियों में अस्थिद्रव्यों के घनत्व का मानक (Standard Deviation) 2.5 निर्धारित किया है। इस टेस्ट में अस्थिद्रव्यों का घनत्व इस मानक से कम पाया जाना ओस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) रोग को प्रर्दशित करता है। इस रोग का अधिक प्रभाव कूल्हे एवं रीढ की अस्थियों (Hip Bone and Spine) पर पडता है, जिससे चोट लगने अथवा गिरने पर इन स्थानों पर अस्थि भंग की संभावना बढ जाती है।

इसके साथ साथ ओस्टियोपोरोसिस रोग से ग्रस्त होने पर शरीर के जोडों में दर्द एवं सूजन उत्पन्न होती है तथा यह दर्द एवं सूजन लम्बे समय तक बनी रहती है। दर्द निवारक दवाईयों का सेवन करने के बाद भी ओस्टियोपोरोसिस रोग से ग्रस्त रोगी को आराम नही मिलता है अपितु शरीर की अस्थियों एवं जोडों में दर्द, सूजन के साथ जकडन उत्पन्न हो जाती है इनके परिणाम स्वरुप ग्रस्त रोगी के शरीर की आकृति बदलने लगती है।

ओस्टियोपोरोसिस रोग

उपरोक्त तथ्यों को जानने एवं समझाने के बाद अब आपके मन में निष्चित ही ओस्टियोपोरोसिस रोग की चिकित्सा को जानने की जिज्ञासा अवष्य ही बढ गयी होगी। चूंकि इस रोग में ऎलोपैथिक दवाईयों का सेवन रोगी का स्थाई लाभ प्रदान नही करता है अत: अब ओस्टियोपोरोसिस रोग की  चिकित्सा पर विचार करते हैं -

ओस्टियोपोरोसिस रोग की आयुर्वेदिक उपचार 

आयुर्वेद शास्त्र में ओस्टियोपोरोसिस रोग के समान संधिवात नामक रोग के उपचार हेतु निम्न औषध सेवन का वर्णन किया गया है -

व्याधिहरण 1 रत्ती, अश्वगन्धा नागोरी 1.5 ग्राम, चोप चिन्यादि चूर्ण 1.5 ग्राम एवं शुद्ध कुचला 0.5 रत्ती। ऐसी एक मात्रा प्रात: और सांय दो समय शहद के याथ रोगी को चटाए एवं ऊपर से 250 ग्राम गर्म दूध में 15 ग्राम ब्राºमी-घृत मिलाकर रोगी को पीलाये। भोजन करने के उपरान्त दोनों समय महारास्नादि काढ़ा-15 मि0ली0, दशमूल-15 मिली0, बलारिष्ट-15 मि0ली0 और कटेली पंचाग -15 मि0ली0 60 मि0ली0 पानी के साथ और 01 ग्राम त्रियोदशांश गुग्गुल मिलाकर रोगी को पीलाने से रोग ठीक होता है।

इसके साथ साथ अस्थि भंग (Bone Fracture) होने पर निम्न घरेलू प्रयोगों से भी लाभ मिलता है -
  1. इमली के फलों में नमक पीसकर भग्न स्थान पर लेप करने से चोट से उत्पन्न पीडा, लाली और सूजन तत्काल दूर हो जाती है और हड्डी जुड जाती है। 
  2. चावलों के आटे में नमक मिलाकर लेप करने से टूटी हुई हड्डी जुड जाती है।
  3. चमेली की जड़ पीसकर उसमे शहद मिलाकर चोट की जगह लेप करने से टूटी हुई हड्डी जुड जाती है।
  4.  भुना हुआ सुहागा पीसकर लगाने से टूटी हड्डी में लाभ होता है।
  5. लहसुन, शहद, पीपर की लाख, घी और मिश्री डेढ डेढ माशे सम मात्रा में लेकर पीस लें, इसको छह या आठ माशे की मात्रा में लेने से टूटी हुई हड्डी जुड जाती है। 

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