जीभ की संरचना एवं कार्य

अनुक्रम [छुपाएँ]


जीभ या जिहृा का मुख्य कार्य किसी वस्तु को चखकर उसके स्वाद को ज्ञात करना है क्योंकि स्वाद के रिसेप्टर्स (Receptors) इसी में स्थित होते हैं। स्वाद के कुछ रिसेप्टर्स कोमल तालू (Soft palate), टॉन्सिल्स एवं कंठच्छद (Epiglottis) आदि की म्यूकस मेम्ब्रेन में भी होते हैं।

जीभ एक अत्यधिक गतिशील अंग है, जो स्वाद-संवेदन के अतिरिक्त चबाने (Mastication), निगलने (Swallowing) तथा बोलने (Speech) जैसे महत्वपूर्ण कायोर्ं को भी संपदित करती है। जीभ मुख में स्थित म्यूकस मेम्ब्रेन से पूर्णत: ढँकी हुई ऐच्छिक पेशियों से निर्मित एक संवेदांग है। जीभ की पेशियाँ आन्तरिक (Intrinsic) एवं बाह्य (Extrinsic) दोनों प्रकार की होती हैं। आन्तरिक पेशियाँ जीभ के मुख्य अंग बनाती हैं तथा सभीप्रकार की नाजुक गतियाँ (Extrinsic) कराती हैं एवं बाह्य पेशियाँ जीभ तथा हॉयाड अस्थि (Hyoid bone), निचले जबड़े (Mandible) और टेम्पोरल अस्थि के स्टाइलॉइड प्रवर्ध के बीच में स्थित रहती हैं तथा चबाने एवं निगलने में होने वाली गतियाँ (ऊपर-नीचे, आगे-पीछे) कराती है।

जीभ के छोर या अग्रभाग (Tip), काय (Body) एवं आधार (Base or root) तीन भाग होते हैं। इसका आधार हॉयाड़ अस्थि से जुड़ा होता है जबकि इसका छोर तथा काय स्वतन्त्र होते हैं। जीभ की ऊपर की सतह डॉर्सम (Dorsum) कहलाती है, जो स्टै्रटिफाइड स्क्वेमस एपीथीलियम (Stratified squamous epithelium) से स्तरित होती है। जब जीभ को ऊपर की ओर पलटा (Turned up) जाता है तो इसकी निचली सतह पर ऊपर की ओर मध्य रेखा की ओर आती हुई म्यूकस मेम्ब्रेन की कई तहें दिखाई देती हैं, जिसे जिहृा बंध या फ्रेनुलम (Frenulum-linguae) कहते हैं। यह जीभ के पोस्टीरियर भाग को मुख के तल से जोड़ती है। जीभ का एन्टीरियर भाग स्वतन्त्र (Free) रहता है। जीभ को बाहर की ओर निकालने पर इसका छोर (Tip) नुकीला हो जाता है, किन्तु जब यह मुख तल में तथा शिथिल रहती है, तो इसका छोर (अग्रभाग) गोल रहता है।

स्वस्थ अवस्था (Health) में जीभ की म्यूकस मेम्ब्रन तर (Moist) एवं गुलाबी रहती है। इसकी ऊपरी सतह मखमली (Velvety) दिखाई पड़ती है तथा बहुत से उभारों (protuberances) से आच्छादित रहती है, जिन्हें अंकुरक या पैपिली (Papillae) कहते हैं। अंकुरक, जीभ की केवल ऊपरी सतह पर रहते हैं, निचली सतह पर इनका पूर्णत: अभाव रहता है किन्तु ये तालू (Palate), गले (Throat) एवं कंठच्छद (Epiglottis) की पोस्टीरियर सतह पर भी पाए जाते हैं। अंकुरकों में रक्तकोशिकाएँ (Capillaries) जाल के रूप में फैली रहती है। स्वाद-तन्त्रिकाओं-सातवीं (VII), नौवीं (IX), तथा दसवीं (X), कपालीय तन्त्रिकाओं के तन्तुओं का अन्त इन्हीं अंकुरकों (पैपिली) में होता है। इन अंकुरकों को ‘स्वाद कलिकाएँ’ (Taste buds) भी कहा जाता है। मानव में लगभग 10,000 स्वाद कलिकाएँ रहती हैं। वृद्धवस्था में इनकी संख्या में कमी आ जाती है। अंकुरक (पैपिली) मुख्यत: निम्न तीन प्रकार के होते हैं-
  1. परिवृत्त या सरकमवैलेट पैपिली (Circumvallated Papillae) 
  2. छत्रिकांकुर या फन्गिफॉर्म पैपिली (Fungi form Papillae) 
  3. सुत्रिकांकुर या फिलिफॉर्म पैपिली (Filiform Papillae) 
 परिवृत्त अंकुरक (Circumvallated Papillae)- ये जीभ की सतह पर पीछे की ओर अर्थात् पोस्टीरियर दो तिहाई भाग के समीप अंग्रेजी के उल्टे ‘V’ के आकार में दो समान्तर पंक्तियों (Rows) में 10 से 12 की संख्या में व्यवस्थित रहते हैं। प्रत्येक परिवृत्त या सरकमवैलेट पैपिली में 90 से 250 स्वाद कलिकाएँ विद्यमान रहती हैं। ये काफी बड़ी आकार के और आसानी से दिखाई देने वाले अंकुरक (पैपिली) होते हैं।

छत्रिकाकुंर (Fungi form Papillae)- 

ये जीभ पर विशेषकर उसके छोर (अग्रभाग) तथा किनारों प8र स्थित मशरूम (Mushroom) के समान दिखाई देने वाले, एकल फैले हुए (Singly scattered) अंकुरक होते हैं। इन प्रत्येक अंकुरक में 1 से 8 स्वाद कलिकाएँ विद्यमान रहती हैं।

सूत्रिकांकुर (Filiform Papillae)- 

ये जीभ के अगले दो तिहाई भाग की सतह पर पाए जाने वाले धागे के समान (Thread like) नुकीले अंकुरक होते हैं। इनमें स्वाद कलिकाओं का अभाव रहता है। इनका कार्य स्वाद ज्ञान कराने की अपेक्षा वस्तु को प्रतीत कराना है। स्वाद की अनुभूति सरकमबैलेट एवं फन्गिफॉर्म पैपिली से ही होती है।

स्वाद कलिकाएँ एवं स्वद ग्रहण करने की क्रिया विधि- 

स्वाद कलिकाएँ (Taste buds) ही स्वाद की विशिष्ट अन्तांग हैं। इनकी प्रत्येक कोशिका में स्वाद-तन्त्रिका (Lingual and gloss pharyngeal nerve) की शाखा आती है। प्रत्येक स्वाद कलिका अंकुरक (पैपिली) की सतह पर सूक्ष्म रन्ध्र (Tiny pore) से खुलती है और उसकी सभी कोशिकाएँ जो इस स्थान पर सामूहिक रूप से पहुँचती है, उनका अन्त सूक्ष्म बाल के समान अनेकों उभारों में होता है। खाद्य पदार्थ इन रन्ध्रों में प्रवेश कर इन उभारों को अपने संस्पर्श से उद्दीप्त करते हैं। इनमें उत्पन्न उद्दीपन के आवगे स्वाद-संवेद की तन्त्रिकाओं (VII, IX o X कपालीय तन्त्रिकाएँ) के द्वारा मस्तिष्क के स्वाद केन्द्र (Taste centre) में संचारित होते हैं और वहाँ स्वाद का विश्लेशण होता है, तत्पश्चात ही हमें विभिन्न प्रकार के स्वादों का ज्ञान होता है।

प्रत्येक स्वाद कलिका अण्डाकार होती है। इनके अक्ष सतह पर सीधे एवं सम्बद्ध (Perpendicular) दिशा में स्थित रहते हैं। इनमें नीचे की ओर से रक्तवाहिकाएँ और तन्त्रिकाएँ भी प्रवेश करती हैं स्वाद कलिकाओं में कीमोरिसप्टर या गस्टेटरी कोशिकाएँ तथा सहारा देने वाली समोर्टिंग कोशिकाएँ रहती हैं।

मूलभूत स्वाद संवेदन (Basic taste sensation)- 

मुख्य रूप से स्वाद की अनुभूतियाँ मीठी, खट्टी, कड़वी एवं नमकीन चार प्रकार की होती है। आधिकांश खाद्य पदार्थों में स्वाद के साथ-साथ महक (Flavor) भी होते हैं, किन्तु यह गंध की संवेदना से सम्बन्धित रहती है और गंध के रिसेप्टर्स को उद्दीप्त करती है न कि स्वाद के रिसेप्टर्स को।

मूलभूत स्वाद संवेदनाएँ जीभ की सतह पर समस्त भागों में समानरूप से उत्पन्न नहीं होती हैं। जीभ के निश्चित भाग ही विशेष स्वाद द्वारा प्रभावित होते हैं। मीठे एवं नमकीन स्वाद जीभ के छोर या अग्रभाग (Tip) पर, खट्टा स्वाद जीभ के दोनों पाश्वो (Sides) में तथा कड़ुवा स्वाद जीभ के पिछले भाग (गले के पास) में पता लगता है। जीभ के मध्य भाग में विशेष ‘स्वाद संवेदना’ नहीं रहती है। इस प्रकार, प्रत्येक निश्चित विशेष स्वद के लिए जीभ में निश्चित विशेष स्वाद कलिकाएँ (Taste buds) रहती हैं, जो किसी विशेष प्रकार के उद्दीपन से ही प्रभावित होती हैं।

स्वाद आवेगों का पथ (Pathways for taste impulses)- 

स्वाद संवेदनाओं के आगेग जीभ के अगले दो तिहाई भाग से फेशियल तन्त्रिका (Facial nerve) की शाखा द्वारा, पिछले एक तिहाई भाग से ग्लॉसोफेरन्जियल तन्त्रिका (Glosso pharyngeal nerve) द्वारा तथा तालू (Palate) एवं ग्रसनी (Pharynx) से वेगस तन्त्रिका (Vagus nerve) द्वारा मस्तिष्क तक को संचारित होते हैं। उपर्युक्त तीनों कपालीय तन्त्रिकाओं के स्वाद तन्तु (Taste fibres) मेड्यूला ऑब्लांगेटा समाप्त (Terminate) होते हैं। यहाँ से अक्षतन्तु या एक्सॉन्स (Axons) थैलेमस (Thalamus) की ओर निकलते हैं तथा फिर प्रमस्तिष्कीय कॉर्टेक्स के पैराइटल लोब् में स्थित ‘स्वाद केन्द्र’ (Taste centre) में पहुँच जाते हैं।

ध्राणेन्द्रिय या नाक (Nose)- 

नाक का कार्य किसी वस्तु या पदार्थ की गन्ध का ज्ञान करना या सूँघना (Olfaction) है। जिस प्रकार स्वाद के ज्ञान के लिए पदार्थ का घोल रूप में होना अनिवार्य है, उसी प्रकार गन्ध के ज्ञान या सूँघने के लिए पदार्थ या वस्तु का गेस या वाष्प के रूप में होना आवश्यक है। नाक में पहुँचकर वाष्प या गैस स्थानीय स्राव में घुल जाता है और घ्राण क्षेत्र की कोशिकाओं (Olfactory cells) को उद्दीप्त करता है। यहाँ से उद्दीपन के आवेग घ्राण बल्ब में और फिर घ्राण-पथ से होकर मस्तिष्क के घ्राण क्षेत्र में पहुँचते हैं जहाँ पर आवेगों का विश्लेषण होकर गन्ध का ज्ञान होता है।

Comments