मानसिक स्वास्थ्य का महत्व

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मानसिक स्वास्थ्य का महत्व 

मानसिक स्वास्थ्य मन से जुड़ी हुई गतिविधियों संबंधित है। मनुष्य एवं अन्य प्राणियों में विचार करने की योग्यता का फर्क है। मनुष्य विचार कर सकता है, चिंतन कर सकता है, घटनाओं का विश्लेषण कर सकता है। वहीं अन्य प्राणी ऐसा उसके समान नहीं कर सकते। उपयुक्त चिंतन, विचार एवं विश्लेषण के बल पर मनुष्य शोध अनुसंधान की योजनायें बना सकता है अपने जीवने को बेहतर बनाने सुविधापूर्ण बनाने की व्यवस्थायें जुटा सकता है। आधुनिक जीवन में जो सुख एवं आराम के संरजाम मनुष्य ने जुटायें हैं वे सभी उसकी विचार, चिंतन एवं विश्लेषण की क्षमता का ही परिणाम हैं। परन्तु यह तीनों प्रकार की क्षमतायें व्यक्ति की मानसिक प्रक्रियाओं से जुड़ी हुई हैं। अवधान, प्रत्यक्षण, अधिगम, स्मृति, अभिप्रेरण, बुद्धि आदि मानसिक क्रियायें हैं एवं इन क्रियायों का सुचारू रूप से जारी रहना एवं उन्नत होना न केवल व्यक्ति के शारीरिक विकास एवं स्वास्थ्य से संबंधित है अपितु उसका शारीरिक विकास एवं उन्नत स्वास्थ्य होने के बावजूद मानसिक स्वास्थ्य की उन्नति से कहीं अधिक सीधा एवं घनिष्ठ संबंध है। मानसिक स्वास्थ्य चिंतन, भाव एवं व्यवहार के तीन आयामों को अपने में समेटे हुए है। इन तीनों आयाम व्यक्तित्व के भी तीन आयाम हैं। व्यक्ति का व्यक्तित्व जिस रूप में परिलक्षित होता है वह इन तीनों आयामों के समुचित विकास, उन्नति एवं सामंजस्य पर निर्भर करता है। व्यक्ति की सोच उसमें भावनाओं को तरंगित करती है एवं ये भावनात्मक तरंगे उसे तदनुरूप क्रिया-व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती हैं। इन तीनों के बीच कोई सीधा स्पष्ट संबंध नहीं है वरन ये तीनों परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते एवं एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। इन तीनों का प्रभाव व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। इस मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने अथवा उत्तरोत्तर इसका उन्नत होना क्यों आवश्यक है इसका क्या महत्व है ।
  1. कार्यकुशलता के लिए आवश्यक (needed for dextrousness)- सभी प्रकार के कार्यों में कुशलता के लिए मानसिक प्रक्रियाओं, भावनात्मक दशा का ठीक होना आवश्यक है। ऐसे से बहुत से कार्य होते हैं जिन्में मन एवं शारीरिक अंगों के संचालन के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता होती है। मानसिक दशा ठीक नहीं होने पर यह तालमेल प्रभावित होता है। किसी भी कार्य में कुशलता मन एवं इन्द्रियों के बीच परस्पर सामंजस्य पर निर्भर करती है। इन्द्रियॉं मन के उपकरण के रूप मे कार्य करती है। जब इन्द्रियों द्वारा सम्पादित किये जा रहे कार्य में मन पूर्ण रूप से लगा हुआ होता है तो उस कार्य में कुशलता बन पड़ती है। परन्तु ऐसा न होने पर कार्य ठीक से सम्पन्न नहीं हो पाता है। 
  2. मानसिक स्वास्थ्य का सफलता के साथ संबंध (relationship with success)- मानसिक स्वास्थ्य का जीवन में किसी भी कार्य अथवा उद्देश्य में सफलता की प्राप्ति में एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह भूमिका एक मजबूत तैयारी के रूप में होती हैं। व्यक्ति की सफलता उसकी मानसिक तैयारियों पर भी निर्भर करती हैं। जब व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ होता है तब उसकी इंद्रियॉं सम्यक् रूप से कार्य करती हैं परिणामस्वरूप व्यक्ति किसी भी कार्य में अपना पूर्ण योगदान देने के लिए तैयार होता है। मजबूत मन मजबूत इरादे ही व्यक्ति को सफलता दिलाते हैं। वहीं मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति स्वयं अपनी ही उलझनों में फंसे रहते हैं परिणामस्वरूप किसी भी कार्य का समय पर पूरा कर पाना उनके लिए असंभव समान होता है। 
  3. पारिवारिक सामंजस्य में भूमिका (role in family adjustment)- मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अपने परिवार के सभी सदस्यों के विचारों का सटीक विश्लेषण करने में समर्थ हो पाता है तथा साथ ही उसकी अवधान, प्रत्यक्षण एवं बुद्धि आदि की मानसिक क्रियायें सुचारू रूप से चलने की वजह से वह उनके भावनाओं एवं आवश्यकताओं एवं शाब्दिक, अशाब्दिक संकेतों को भी सही से समझ पाता है। इससे वह परिवार के प्रत्येक सदस्य के साथ समुचित आदर एवं सम्मान के साथ व्यवहार एवं संचार कर पाने में समर्थ होता है परिणामस्वरूप उसका पारिवारिक समायोजन बहुत बेहतर होता है। साथ ही परिवार में मानसिक समस्याओं के पनपने की संभावनाये भी बहुत हद तक क्षीण रहती है। यदि परिवार के प्रत्येक सदस्य का मानसिक स्वास्थ्य उत्तम कोटि का होता है तो परिवार एक इकाई के रूप में सर्वतोमुखी प्रगति करता है। परिवार के किसी एक सदस्य के मानसिक स्वास्थ्य के ठीक न होने की स्थिति में परिवार के अन्य सदस्य उसके व्यवहार से दुखी एवं भविष्य को लेकर चिंतित रहते है, एवं लम्बे समय तक इस प्रकार की स्थिति बने रहने पर परिवार के अन्य सदस्यों में भी मानसिक रोग का शिकार होने की संभावनायें प्रबल हो जायेंगी। 
  4. सामाजिक स्वास्थ्य में भूमिका (role in social health)- मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समाज के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। किसी भी समाज की प्रगति एवं विकास उस समाज में रहने वाले व्यक्तियों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य तथा नैतिक विकास पर निर्भर करता है। इनमें से किसी भी आयाम में कमजोरी होने पर समाज की प्रगति एवं उन्नति बाधित होती है। एक स्वस्थ व्यक्ति न केवल अपनी उन्नति में सफल होता है बल्कि वह अपने परिवार एवं समाज को सफलता की नई ऊॅंचाइयों तक ले जाने में सार्थक योगदान दे सकता है। वहीं परिवार एवं समाज का कोई मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति उनकी प्रगति यात्रा को बाधित कर सकता है। 
  5. व्यक्तित्व विघटन से बचाव (refrain from personality disorganization)- जिन व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक होता है उनमें व्यक्तित्व विकार अथवा विघटन की घटना नहीं घटती है ऐसे व्यक्ति किसी भी प्रकार के मनोरोग का शिकार नहीं होते हैं। बल्कि ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में प्रसन्नता, उल्लास एवं उमंग से भरे रहते हैं। इनके भावों में सामंजस्य एवं परिपक्वता होने के कारण ये मनोदशा विकृति आदि मानसिक विकृतियों से बचे रहते हैं। 
  6. मानसिक स्वास्थ्य एवं समस्या समाधान क्षमता (mental health and problem solving ability)- मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गये अनुसंधानों के अनुसार मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों की समस्या समाधान क्षमता बढ़ी-चढ़ी होती है। इसका कारण मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति द्वारा समस्या को ठीक से समझ पाने हेतु ध्यान दे पाने की समर्थता से होता है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समस्या के सभी पहलुओं पर सभी संभावित कोणों से विचार कर पाता है। परिणामस्वरूप वह उनका हल भी जल्द ही ढॅूंढ़ लेता है। 
  7. मानसिक स्वास्थ्य एवं सृजनात्मकता (mental health and creativity)- हालॉंकि मानसिक स्वास्थ्य का सृजनात्मकता के साथ किसी सीधे संबंध के प्रमाण मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गये शोध एवं अनुसंधानों में प्राप्त नहीं हुए हैं। फिर भी तुलनात्मक शोध मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों एवं अस्वस्थ व्यक्तियों के सृजनात्मक कार्यों की बारंबारता में स्पष्ट अंतर प्राप्त हुए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं उनका मन एवं मस्तिष्क सृजनात्मक कार्यों अथवा गतिविधि के लिए अन्यों की अपेक्षा अधिक तत्पर होता है। परिणामस्वरूप ऐसे व्यकितयों के सृजनात्मक कार्यों की बारम्बारता बढ़ी-चढ़ी होती है।
  8. मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहारकुशलता (mental health and behaviourskill)- व्यवहार कुशलता पर किये गये अनुसंधानों के अनुसार जो व्यक्ति अपने दैनिक व्यवहार एवं सामाजिक व्यवहार या जॉब आधारित व्यवहार में कुशल होते हैं वे मानसिक रूप से अवश्य ही अन्यों की अपेक्षा कहीं अधिक स्वस्थ होते हैं। या इसे दूसरे रूप में कहा जा सकता है कि जिन लोगों का मानसिक स्वास्थ्य उत्तम होता है वे जीवन में अधिक व्यवहारकुशल होते हैं। 
  9. मानसिक स्वास्थ्य एवं नैतिकता (mental health and morality)- समाजशास्त्रियों ने मानसिक स्वास्थ्य को नैतिकता से भी संबंधित पाया है। उनके अनुसार नैतिकता का संबंध परिवार एवं समाज द्वारा परिवार एवं समाज की बेहतर व्यवस्था वह प्रगति हेतु बनाये गये नियमों, मानदण्डों के अनुपालन से होता है जो व्यक्ति स्वयं को जितना अधिक परिवार एवं समाज का अभिन्न अंग समझते हैं वे उतना ही इन नियमों के अनुपालन में रूचि प्रदर्शित करते हैं। जो व्यक्ति इन मानदण्डों का पालन करते हैं उन पर किये गये अध्ययनों के परिणाम प्रदर्शित करते हैं कि वे व्यक्ति अन्यों की तुलना में मानसिक रूप से कहीं अधिक स्वस्थ थे। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक बैरोन के अनुसार ऐसे व्यक्तियों में दोषभाव उत्पन्न नहीं होता है अतएव ये लोग अवसाद जैसी मानसिक विकृतियों से बचे रहते हैं। 
  10. आत्म बोध के लिए आवश्यक (necessary for self-actualization)- आत्म बोध से तात्पर्य अपने व्यक्तित्व के समस्त पहलुओं से परिचित होने से होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर छिपी असीम संभावनाओं का परिचय पाना चाहता है तथा अपनी प्रतिभा को बाह्य अभिव्यक्ति देना चाहता है। परन्तु इसके संभव होने के लिए स्वयं के आत्मन के विभिन्न हिस्सों की जानकारी आवश्यक है, और अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ है कि जिन व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य उत्तम होता है वे मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों की अपेक्षा अपने आत्म् की विशेषताओं से ज्यादा परिचित होते हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ने भी इसी तथ्य को अपने मानवतावादी व्यक्तित्व सिद्धान्त में उल्लेखित किया है। 
  11. व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक (necessary for personality development)- व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का उन्नत होना बहुत ही जरूरी है क्योंकि व्यक्तित्व शरीर, मन एवं इंद्रियों के सम्मिलन से विनिर्मित होता है जिसकी प्रकट अभिव्यक्ति व्यवहार के रूप में परिलक्षित होती है। व्यक्तित्व का विकास चिंतन, भाव एवं व्यवहार के तीनों आयामों के बीच अंत:क्रिया पर निर्भर करता है। एवं इन तीनों ही आयामों का मानसिक स्वास्थ्य के साथ सीधा संबंध है। बिना मानसिक क्षमताओं के बढ़ाए व्यक्तित्व विकास नहीं किया जा सकता है और मानसिक क्षमताओं की उन्नति के लिए मानसिक स्वास्थ्य का उन्नत होना अत्यंत ही आवश्यक है। 
  12. देश की उन्नति में भूमिका (role in nation development)- समग्र रूप से यदि मानसिक स्वास्थ्य को देश की उन्नति से जोड़कर देखा जाये तो हम पाते हैं कि किसी देश के समुचित विकास के लिए उस देश के नागरिकों का स्वस्थ होना आवश्यक है। नागरिकों की स्वस्थता में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी होती है। जिस देश के नागरिक जितना ही अधिक मानसिक रूप से मजबूत एवं क्षमतावान होते हैं उस देश का विकास उतना ही अधिक तीव्रता से होता है। क्योंकि मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति मिलकर एक स्वस्थ समाज का निर्माण करते हैं एवं स्वस्थ समाज देश के विकास में धनात्मक योगदान करता है। 
  13. अपराध दर में घटोत्तरी से संबंध (relation with the decrease in crime-rate)- मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों में आपराधिक प्रवृत्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों की तुलना में काफी कम होती है। मनोवैज्ञानिक इसका कारण सांवेगिक एवं वैचारिक परिपक्वता एवं स्थितरता को ठहराते हैं। सांवेगिक परिपक्वता एवं स्थिरता मानसिक स्वास्थ्य की सुदृढ़ स्थिति का परिचय प्रदान करती है। अतएव जो व्यक्ति सांवेगिक या भावनात्मक रूप से परिपक्व हेाते हैं वे अपने संवेगों एवं दूसरों के हृदय के भावों को भलीभॉंति समझते हैं एवं इसके कारण उनमें आपराधिक प्रवृत्ति नहीं के बराबर होती है। 
  14. मनोरोग से संबंध (relation with mental disorders)- सार रूप में कहें तो मानसिक स्वस्थता का मनोरोग से नकारात्मक संबंध है अर्थात् जैसे जैसे मानसिक स्वास्थ्य उन्नत होता है वैसे वैस मनोरोगों के स्तर में कमी आती है। जिन व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य उन्नत होता है वे मनोरोगों का शिकार नहीं होते हैं। वहीं जिन व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य स्थिर नहीं रहता है उनमें मनोरोगों की रोकथाम की क्षमता कम होती है।

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