मानसिक स्वास्थ्य के उपाय

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रोकथामपरक उपाय 

रोकथाम परक उपाय उन उपायों का कहा जाता है जिनमें मानसिक स्वास्थ्य को विकृत होने से बचाने के तरीकों का उपयोग किया जाता है। इन उपायों के पीछे कुछ मूल कल्पनायें काम करती हैं इन उपायों की सर्वाधिक प्रचलित मूल पूर्वकल्पना यह होती है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है (sound body resides in sound body)। नैदानिक मनोवैज्ञानिकों की मान्यता है कि शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति स्वत: ही मानसिक रूप से भी स्वस्थ होते हैं। इसका कारण यह होता है कि शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति भौतिक वातावरण संबंधी चुनौतियॉं का सामना करने में सहज ही सक्षम होते हैं, एवं यह सक्षमता उनमें परिस्थितियों से निपटने हेतु आत्मविश्वास एवं साहस से ओतप्रोत करती है। इसके कारण शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति जिन्दगी की तनावपूर्ण परिस्थितियों का डट कर मुकाबला करने में सक्षम होते हैं। भावसंवेगात्मक तनाव से सामना होने पर वे उसका उचित समाधान आसानी से निकाल सकने में समर्थ हो पाते हैं। परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य उत्तम होता है। अत: इन उपायों के तहत उन सभी तरह के साधनों पर विचार किया जाता है जिससे व्यक्ति का शारीरिक स्वास्थ्य उन्नत बना रह सके। बारलो एवं डूरण्ड के अनुसार जो व्यक्ति गंभीर शारीरिक बीमारियों जैसे कि बे्रन ट्यूमर, सिफिलिस, कैंसर, डायबिटीज आदि का शिकार होते हैं जिनकी गंभीर आंगिक अवस्थाओं के कारण मानसिक अक्षमताए उत्पन्न हो सकती हैं का उपचार शीघ्र अति शीघ्र करवाना चाहिए ताकि मानसिक स्वास्थ्य उनसे प्रभावित न हो।

मनोवैज्ञानिक उपाय 

मनोवैज्ञानिकों ने मानसिक स्वास्थ्य को उन्नत बनाये रखने के लिए मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों एवं नियमों के आधार पर कई उपाय सुझाये हैं। इन उपायों को विकासात्मक मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्ति के जीवन की विभिन्न विकासात्मक अवस्थाओं के हिसाब से कई स्तरों में बॉंटा है।

शैशवावस्था एवं प्रारंभिक बाल्यावस्था में किये जाने वाले उपाय- 

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक रिब्बिल (1964) के मतानुसार शैशवावस्था एवं प्रारंभिक बाल्यावस्था में अपनाये गये पालन-पोषण के तरीके का मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ता है। अत: उन्होंने कुछ मनोवैज्ञानिक नियमों का प्रतिपादन किया है। ये मनोवैज्ञानिक नियम शैशवावस्था तथा प्रारंभिक बाल्यावस्था में संबंधित हैं, इन नियमों के अनुरूप शिशु एवं बच्चों का पालन पोषण करने से उनका मानसिक स्वास्थ्य काफी ठीक रहता है।
  1. नवजात शिशु को उसकी मॉं द्वारा देखरेख किये जाने की लगातार आवश्यकता होती है। यदि किसी कारण से मॉं उस कार्य को लगातार न कर सके तो किसी अन्य महिला की सहायता ली जा सकती है परन्तु यह कार्य केवल एक ही महिला से करवाना चाहिए। क्योंकि नवजात पर स्पर्श का गहरा असर पड़ता है एवं बार बार स्पर्श का अहसास बदलने से उसमें असुरक्षा की भावना घर कर सकती है। 
  2. शैशवावस्था एवं प्रारंभिक बाल्यावस्था के शुरूआती कुछ महीनों में बच्चे चूषण क्रिया द्वारा संतुष्टि का अनुभव करते हैं ऐसे में इन दिनों में उन्हें चूषण क्रिया की पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। इसके लिए उन्हें उक्त दिनों तक भोजन आदि चूषण प्रक्रिया के माध्यम से ही कराया जाना चाहिए। इस चूषण क्रिया के सम्पन्न होने से बच्चों का शारीरिक स्वास्थ्य तो उन्नत बना ही रहता है साथ ही उनका मानसिक स्वास्थ्य भी उन्नत होता है।
  3. बाल मनोवैज्ञानिकों का मत है कि चूषण क्रिया (sucking) के उपरान्त शिशुओं को दंशन (bitting) एवं कंठगायन (vocalization) की क्रियाओं से संतुष्टि प्राप्त होती है। एक क्रिया से दूसरी क्रिया में पारगमन बहुत ही महत्वपूर्ण घटना होती है इस घटना को धीरे-धीेरे घटने देना चाहिए। इन दोनों अवस्थाओं में संतुष्ट होने का मौका शिशु को पर्याप्त रूप से देना चाहिए। चूषण की आदत छुड़वाने तथा दूसरी आदतें सिखाने तक की प्रक्रिया को धीरे धीरे सम्पन्न करना चाहिए। इससे शिशुओं में संतोष मिलता है जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य उत्तम एवं संतोषजनक होता है। 
  4. उपरोक्त क्रियाओं के बाद बालक के शौच प्रशिक्षण की बारी आती है जब तक बालक स्वयं के प्रयास से उठना बैठना न सीख जाये तब तक बालक को शौच प्रशिक्षण नहीं देना चाहिए। यह शौच प्रशिक्षण सदैव प्यार से दिया जाना चाहिए, जबरदस्ती बिल्कुल नहीं करना चाहिए। शौच प्रशिक्षण शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रत करने के लिए दिया जाता है। प्यार से सिखलाने से बच्चों में सुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है एवं वे आसानी से अपनी शौच से संबंधित शारीरिक क्रियाओं का निंयत्रण करना सीख जाते हैं। इस प्रक्रिया से बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य उन्नत होता है। यदि यह शौच प्रशिक्षण जबरदस्ती दिया जाता है तो इससे बच्चों में असुरक्षा एवं भय की भावना पैदा होती है जिससे कि मानसिक स्वास्थ्य नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है। 

उत्तर बाल्यावस्था, किशोरावस्था, वयस्कावस्था में किये जाने वाले उपाय- 

उत्तर बाल्यावस्था में शिक्षकों एवं माता-पिता की भूमिकायें काफी महत्वपूर्ण हो जाती हैं जिनसे बच्चों में असामान्य व्यवहारों में कमी तथा मानसिक स्वास्थ्य में उन्नति होती है। किशोरावस्था तथा वयस्कावस्था में उत्तम समायोजन के बहुत सारे नियमों का उल्लेख होता है।
  1. बाह्य वातावरण के कौन से उद्दीपक को परिवर्तित कर देने से उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है इस बात की पहले से जानकारी रखना चाहिए। साथ ही जिन उद्दीपकों को बदला नहीं जा सकता है उनकी वजह से उत्पन्न स्थिति को सहज ही स्वीकार करना चाहिए। 
  2. असफलता को कम हाथ लगे इसके लिए विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों से निपटने की क्षमता विकसित कर लेनी चाहिए। इससे मानसिक स्वास्थ्य सदैव उन्नत बना रहता है। 
  3. अपने भावसंवेगों एवं कामनाओं को सम्मान देते हुए उन्हें स्वीकार करना चाहिए। ऐसा करने से मानसिक अक्षमता व्यक्ति में विकसित नहीं होती है और उसका मानसिक स्वास्थ्य धीरे-धीरे उन्नत होता जाता है। 
  4. व्यक्ति को स्वयं को रचनात्मक कार्यों में संलग्न रखना चाहिए। इससे मन प्रसन्न रहता है तथा आत्म-संतोष बढ़ता है जो कि मानसिक स्वास्थ्य को उत्तरोत्तर बढ़ाने में सहायक होता है। 
  5. व्यक्ति को हास-परिहास करने की कला सीख लेनी चाहिए। इससे व्यक्ति में अपने डर, चिंता, क्रोध आदि संवेगों पर नियंत्रण हासिल करने में मदद मिलती है साथ ही प्रसन्नता बढ़ती है। इससे मानसिक स्वास्थ्य के उन्नत होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। 
  6. सामाजिक कार्यों में व्यक्ति को हाथ बॅंटाना चाहिए तथा जिम्मेदारी लेने के लिए आगे आना चाहिएं इससे व्यक्ति में सामाजिक सहभागिता का भाव उत्पन्न होता है उसमें पर्याप्त मानसिक संतोष जन्म लेता है। एवं मानसिक स्वास्थ्य उन्नत होता है। 
  7. व्यक्ति में किसी भी प्रकार की परिस्थिति में घटित घटनाओं की पुनर्विवेचन करने की क्षमता होनी चाहिए। मनोवैज्ञानिकों का मत है कि अधिकतर परिस्थितियों में जो कुंठा व्यक्ति में उत्पन्न होती है, उसका कारण बाह्य परिस्थिति की घटना नहीं होती है, बल्कि व्यक्ति द्वारा उसका दोषपूर्ण ढंग से व्याख्या किया जाना होता है। अत: व्यक्ति में ऐसी परिस्थितियों की पुनर्विवेचन करने की क्षमता होनी चाहिए ताकि उसमें कुंठा का स्तर अधिक न बढ़े और व्यक्ति में अनावश्यक तनाव आदि उत्पन्न न हो सके। इससे व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य का स्तर उत्तम बना रहता है।

सामाजिक-सांस्कृतिक उपाय 

बहुत से ऐसे सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारक है जिनके प्रभाव से सामान्य परिस्थितियों में मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट आती है यदि इन कारकों के प्रभावों को नियंत्रित करने की विधि व्यवस्था या उपाय कर लिये जायें तो मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है। इन विशेष सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों में जो प्रमुख हैं वे हैं-
  1. निम्न सामाजिक स्तर (lower social level) - निम्न सामाजिक स्तर को उन्नत करने के उपायों से व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध है। जब सामाजिक स्तर निम्न होता है तब व्यक्ति को विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों में अपमान का अनुभव होता हैं तथा स्वयं को नीचा देखना पड़ता है इससे व्यक्ति में कभी कभी स्वयं के प्रति घृणा का भाव पैदा हो जाता है तथा आत्म सम्मान में गिरावट आती है। जब इस सामाजिक स्तर को प्रशासकीय निर्णयों एवं सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से ऊॅंचा उठा दिया जाता है अथवा सामाजिक भेदभाव को दूर किया जाता है तो इस स्थिति के व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य उन्नत होता है।
  2. निम्न आर्थिक स्तर (lower economic level)- निम्न सामाजिक स्तर के समान ही निम्न आर्थिक स्तर भी व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य को परोक्ष रूप से प्रभावित करत पाया गया है। निम्न आर्थिक स्तर होने से व्यक्ति को बहुत सी साधारण स्तर की सुविधाओं से भी वंचित होना पड़ता है तथा उच्च आर्थिक स्तर के व्यक्तियों से तुलना करने पर वे अपने आप को हीन स्थिति में पाते हैं तथा उनमें हीनता का भाव उत्पन्न हो जाता है। यह हीन भावना व्यक्ति मानसिक अस्वस्थता को बढ़ावा देती है। जब प्रशासकीय अथवा सामाजिक सांस्कृतिक उपायों के माध्यम से इस आर्थिक असमानता को दूर कर दिया जाता है तो इससे मानसिक स्वास्थ्य उन्नत होने लगता है। 
  3. विवाह-विच्छेद (Divorce)- जीवन में विवाह-विच्छेद की घटना घटने पर व्यक्ति की मनोदशा पर प्राय: नकारात्मक प्रभाव पड़ता है व्यक्ति में संबंधों को न निभा पाने की भावना घर कर जाती है। उसे लगता है कि इन संबंधों के निभा पाना अत्यंत ही कठिन है। फलत: अन्य प्रकार के संबंधों के संदर्भ में भी उसकी यही राय बन जाती है। इससे संबंधों के प्रति व्यक्ति का विश्वास डॉवाडोल हो जाता है। समाज के लोग भी यदि व्यक्ति की क्षमताओं के प्रति अविश्वास प्रदर्शित करते हैं तो इससे व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। नकारात्मक भावसंवेग व्यक्ति को घेर लेते हैं। यदि किन्हीं उपायों के माध्यम से काउन्सलिंग अथवा साइकोथेरेपी के माध्यम से यदि व्यक्ति को इन नकारात्मक भावसंवेगों से बचाया जा सके तो इससे मानसिक स्वास्थ्य की गिरावट को थामा जा सकता है। 
  4. माता-पिता की मृत्यु (Death of parents)- माता-पिता की मृत्यु होने को भी सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों के रूप में देखा जाता है। यह घटनायें व्यक्ति को प्रेम से वंचन प्रदान करती है तथा बड़ों के मार्गदर्शन से भी वंचित करती हैं। यदि किसी सामाजिक प्रक्रिया से माता-पिता की मृत्यु के कारण होने वाले भावनात्मक एवं सामाजिक समर्थन के अभाव को दूर किया जा सके तो मानसिक स्वास्थ्य को उन्नत बनाया जा सकता है। 
  5. पति अथवा पत्नी की मृत्यु (Death of spouse)- पति अथवा पत्नी में से किसी एक की असमय मृत्यु हो जाने के कारण भी व्यक्ति को भावनात्मक समर्थन के अभाव का सामना करना पड़ता है तथा साथ ही इससे व्यक्ति की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थिति में बदलाव आ जाता है। यदि समाज के लोग व्यक्ति की इस आघात से उत्पन्न प्रभावों से निपटने में व्यक्ति की अपेक्षित सहायता करें अथवा जुटायें जो इससे व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को गिरने से बचाया जा सकता है। उपरोक्त उपायों के अलावा योग आधारित उपाय भी मानसिक स्वास्थ्य को उन्नत बनाने में सहायक होते हैं।

योग आधारित उपाय

मानसिक स्वास्थ्य को उन्नत करने के उपायों में योग आधारित उपाय वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित हैं। यौगिक जीवनशैली को अपनाने अथवा योगाभ्यास करने से मानसिक स्वास्थ्य को उन्नत बनाया जा सकता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है। एवं इन चित्तवृत्तियों का व्यक्ति की मानसिक स्थिति से सीधा संबंध होता है। इन चित्तवृत्तियों के कारक व्यक्ति के संस्कार एवं पंचक्लेश होते हैं। योग विद्वानों के अनुसार यदि चित्त की वृत्तियों को अक्लिष्ट किया जा सके तथा पंचक्लेशों को तनु अवस्था में ले जाये जा सके तो उससे व्यक्ति के मन को स्थिर किया जा सकता है। इससे व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य में उन्नति की जा सकती है अब प्रश्न उठता है कि वे कौन से योग आधारित तरीके हैं जिनसे पंचक्लेशों के प्रभाव को नियंत्रित किया जा सकता है, चित्त की वृत्तियों को सकारात्मक दिशा दी जा सकती है।

क्रियायोग का नियमित अभ्यास - 

क्रियायोग के नियमित अभ्यास से मानसिक स्वास्थ्य को उन्नत बनाया जा सकता है। क्रियायोग में तीन प्रकार के नियमों का पालन किया जाता है ये नियम हैं तप, स्वाध्याय एवं ईश्वरप्रणिधान।
  1. तप का अभ्यास - तप से तात्पर्य शारीरिक एवं मानसिक ऊर्जा के संदोहन, संरक्षण एवं सदुपयोग से होता है। यह कार्य आहार विहार के नियमितीकरण एवं संयम के माध्यम से सम्पन्न किया जा सकता है। शरीर में एवं मन में पर्याप्त ऊर्जा की उपलब्धि होने से चित्त की वृत्तियॉं अक्लिष्ट स्वरूप की होती हैं जिससे व्यक्ति को मानसिक शांति प्राप्त होती है तथा मानसिक सामथ्र्य में वृद्धि होती है।
  2. स्वाध्याय - स्वाध्याय से तात्पर्य स्व के अध्ययन से हैं जब व्यक्ति नियमित रूप से स्व का अध्ययन करने लगता है तब वह अपनी स्थिति से सर्वथा परिचित रहता है उसकी सामथ्र्य एवं कमियों से वह सुपरिचित होता जाता है। तदनुरूप निर्णय लेता है। उसके निर्णय सही होते हैं। मानसिक उलझने नहीं पनपतीं। परिणामस्वरूप उसका मानसिक स्वास्थ्य उन्नत होता जाता है। 
  3. ईश्वर प्रणिधान- ईश्वर प्रणिधान से तात्पर्य स्वयं के भावसवेगों को ईश्वरोन्मुख करने से होता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार अपने सभी भावों को ईश्वर अर्पित करने से भावनात्मक द्वन्द्वों का शमन होता है। व्यक्ति का भावनात्मक समायोजन मजबूत होता है वह समाज के सदस्यों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध विनिर्मित करने में सक्षम होता है। भावनात्मक बुद्धि बढ़ने एवं सक्रिया होने से उसकी भावनात्मक समझ भी बढ़ी चढ़ी होती है फलत: उसका अपने भावों पर उचित नियंत्रण होता है। इससे उसके मानसिक स्वास्थ्य में निरंतर उन्नति होती जाती है।

प्राणायाम बंध एवं मुद्रा का अभ्यास - 

क्रियायोग के अलावा प्राणायाम का समुचित अभ्यास भी मानसिक स्वास्थ्य को उन्नत बनाने में सहायक होता है। प्राणायाम से व्यक्ति में प्राण का संचार होता है, व्यक्ति की प्राण ऊर्जा में बढ़ोत्तरी होती है तथा बंध एवं मुद्राओं के अभ्यास से यह विस्तारित प्राण शरीर में सम्यक रूप में संचरित होता है। इससे व्यक्ति का स्वास्थ्य उन्नत होता है। प्राण शरीर एवं मन को बॉंधने वाला एक मात्र सूत्र है। इस सूत्र की मजबूती से इससे जुड़े दोनो ही पक्ष भी मजबूत होते हैं।

ध्यान का अभ्यास - 

योगशास्त्रों में ध्यान को उच्चस्तरीय क्रिया माना गया है। ध्यान का अभ्यास संस्कारों को प्रभावित एवं परिवर्तित करता है। व्यक्ति के संस्कार उसके चिंतन, भाव एवं व्यवहार में परिलक्षित होते हैं। ध्यान व्यक्ति के संस्कारों के परिमार्जन के माध्यम से व्यक्ति के चिंतन भाव एवं व्यवहार में बदलाव लाता है। यदि नियमित ध्यान किया जाये तो उसके अभ्यास से व्यवहार में वॉंछनीय एवं अपेक्षित बदलाव लाया जा सकता है। ध्यान के अभ्यास से मानसिक शांति प्राप्त होती है एवं मानसिक स्वास्थ्य उन्नत होता है। व्यक्ति की विभिन्न मानसिक क्षमताओं में वृद्धि होती है जिनके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम बनता है तथा सफलता को प्राप्त करता है।

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