प्राकृतिक चिकित्सा का अर्थ, परिभाषा एवं सिद्धान्त

By Bandey No comments
हमारे पूर्वज एवं ऋषि-मुनियों के द्वारा आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व वर्तमान में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से परिचित हो गये थे। इसी कारण उन्होंने विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की खोज की थी जिससे शरीर में रोग के लक्षण न उत्पन्न हो, और यदि किसी भूल के कारण रोग हो जाए तो प्राकृतिक तत्वों द्वारा जैसे- धूप, मिट्टी, जल, हवा, जड़ी बूटियों आदि द्वारा तुरन्त उन पर नियन्त्रण प्राप्त कर लिया जाय। इसी पद्धति को प्राकृतिक चिकित्सा के नाम से जाना गया है।

प्राकृतिक चिकित्सा में उपचार की तुलना में स्वास्थ्यवर्धन पर अधिक महत्व दिया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा स्वस्थ जीवन जीने की एक कला विज्ञान है। मनुष्य प्रकृति का एक हिस्सा है और उसका शरीर इन्ही पंचतत्वों से बना है पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। प्राकृतिक चिकित्सा का यह अटल सिद्धांत है कि मानव शरीर में स्थित एक ही विजातीय द्रव्य अनेकों रोगों के रूप में तथा विभिन्न नामों से प्रकट होता है। शरीर में रोग केवल एक है जो हमारे शरीर में मल के रूप में जमा है और वही मूलत: रोग की जड़ है, इसकी उपज हमारे अप्राकृतिक जीवन यापन से होती है। अव्यवस्थित जीवन शैली से शरीर में दूषित मल विजातीय द्रव्य एकत्र होने लगते हैं और परिस्थिति वायु प्रकृति (जीवनी शक्ति आदि) के अनुसार अलग-अलग लोगों में इन विजातीय द्रव्यों का बहिष्करण भिन्न भिन्न तरीकों से होता है अर्थात् अलग अलग रोग परिलक्षित होते हैं जैसे बुखार जुकाम आदि। इन सबकी एक ही चिकित्सा है विजातीय द्रव्यों का निष्कासन। वास्तव में आहार विहार एवं रहन-सहन की अनियमितता तथा असंयम के कारण ही रोगों का प्रादुर्भाव होता है। संयमित और नियमित जीवन से मनुष्य रोग मुक्त हो जाता है। वास्तव में प्राकृतिक चिकित्सा एक चिकित्सा पद्धति नहीं अपितु जीवन जीने की कला है जो हमें आहार, निद्रा, सूर्य का प्रकाश, पेयजल, विशुद्ध हवा, सकारामकता एवं योग विज्ञान का समुचित ज्ञान कराती है। प्राकृतिक चिकित्सा से रोग ठीक किये जाते हैं पर यदि प्रकृति के अनुसार जीवन जिया जाय तो रोग होंगे ही नहीं। प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा जीवन निरोगी बनाया जा सकता है। प्राकृतिक चिकित्सा उतनी ही पुरानी है जितनी कि प्रकृति। इसके पॉंच आधार हैं। प्राकृतिक चिकित्सा वास्तव में जीवन यापन की सही पद्धति को कहते हैं। यह ठोस सिद्धांतों पर आधारित एक औषधि रहित रोग निवारक पद्धति है। ‘‘प्राकृतिक चिकित्सा व्यक्ति को उसके शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक तलों पर प्रकृति के रचनात्मक सिद्धांतों के अनुकूल निर्मित करने की एक पद्धति है। इसमें स्वास्थ्य संवर्धन रोगों से बचाव व रोगों को ठीक करने के साथ ही आरोग्य प्रदान करने की अपूर्व क्षमता है।’’

प्राकृतिक चिकित्सा की परिभाषा

प्राकृतिक चिकित्सा सभी चिकित्सा प्रणालियों में सर्वाधिक पुरानी चिकित्सा पद्धति है। प्राचीन काल से पंचमहाभूतों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश तत्व की महत्ता की है। प्राकृतिक चिकित्सा न केवल उपचार की पद्धति है अपितु यह एक जीवन पद्धति है इसे बहुधा औषधि विहीन उपचार पद्धति कहा जाता है। यह पूर्णरूप से प्रकृति के सामान्य नियमों के पालन पर आधारित है।प्राकृतिक चिकित्सा सम्बन्धी विभिन्न विद्वानों का मत-

  1. कुने लुईस 1967- ‘‘प्राकृतिक प्रणाली जिसका कि चिकित्सा के रूप में उपयोग करते हैं तथा जो दूसरी पद्धतियों से गुण में बहुत अच्छी है, बिना औषधि या आपरेशन के उपचार की आधार की शिक्षा है।’’
  2. जुस्सावाला जे0एम0 (1966)-’’प्राकृतिक चिकित्सा एक विस्तृत शब्द है जो रोगोपचार के सभी प्रणालियों के लिये उपयोग किया जाता है जिसका उद्देश्य प्राकृतिक शक्ति एवं शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ सहयोग करना है। यह व्याधि से मुक्त कराने का एक भिन्न तरीका है जिसका जीवन स्वास्थ्य एवं रोग के संबन्ध में अपना स्वयं का एक दर्शन है।
  3. बेनजामिन हेरी– ‘‘प्राकृतिक चिकित्सा व्याधि से मुक्त करने तथा रोग का दर्शन है।’’ प्राकृतिक चिकित्सा शरीर की स्वयं की आंतरिक सफाई एवं शुद्धिकरण की स्वीकृति देती है। इस प्रकार यह अशुद्धता एवं अनुपयोगी पदार्थ जो कि अधिक वर्षों के कारण एकत्र हो गया तथा जो सामान्य कार्य में बाधा उत्पन्न करता था उसें निकाल फेंकता है।
  4. महात्मा गांधी-’’प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति से रोग मिट जाने के साथ ही रोगी के लिये ऐसी जीवन पद्धति का आरम्भ होता है जिसमें पुन: रोग के लिये कोई गुंजाइश ही नहीं रहती।’’
  5. पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य- ‘‘प्राकृतिक चिकित्सा का अर्थ है प्राकृतिक पदार्थों विशेषत: प्रकृति के पांच मूल तत्वों द्वारा स्वास्थ्य रक्षा और रोग निवारक उपाय करना।’’
  6. विलियम ओसलर- प्रकृति जिसे आरोग्य नही कर सकती उसे कोई भी आरोग्य नहीं कर सकता है।
  7. महात्मा गाँधी- ‘‘जिसे हवा, पानी और अन्न का परिणाम समझ में आ गया वह अपने शरीर को स्वस्थ रख सकता है उतना डाक्टर कभी भी नहीं रख सकता।’’
  8. प्रो0 जीसेफ स्मिथ एम.डी.- दवाओं से रोग अच्छा नहीं होता बल्कि केवल दबाता है। रोग हमेशा प्रकृति अच्छा करती हैं।
  9. हिपोक्रेटस- ‘‘प्रकृति रोग मिटाती है, डाक्टर नहीं।

अत: कहा जा सकता है कि प्राकृतिक चिकित्सा रोगों को दबाती नहीं वरन् उसकी जड़ को खत्म करने में सक्षम है।

भारत में प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास

प्राकृतिक चिकित्सा उतनी ही पुरानी है जितनी की प्रकृति स्वयं है और उनके आधार भूत तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। प्रकृति के तत्व जिनसें जीवन की उत्पित्त होती है सदैव वही तत्व रोगों को दूर करने में सहायक रहे। प्राचीन काल से ही तीर्थ स्नान पर घूमना, उपवास रखना, सादा भोजन करना, आश्रमों में रहना, पेड़ पौधों की पूजा करना, सूर्य, अग्नि, तथा जल की पूजा करना आदि कर्म के अंग माने जाते रहे है यदि किसी प्राकृतिक नियमों को तोड़ने में कोई कभी अस्वस्थ हो जाता था तो उपवास, जड़ी-बूटियों तथा अन्य प्राकृतिक साधनों का प्रयोग करके स्वस्थ हो जाता हैै। वेदकाल के वेद तथा अन्य प्राचीन ग्रन्थों में इसके सन्दर्भ मिलते है।


वायु तत्व- ‘‘पद दौ वात ते ग्रेहअमृतस्य निधिर्हित तहोनो देहि जीवसे’’

अर्थात्! हे वायु तेरे घर जो है वे अपूर्व अमृत का खजाना है उसमें से हमारे दीर्घ जीवन के लिए थोड़ा सा भाग प्रदान करे।

सूर्य तत्व-‘‘सवितानु: सवितु सर्वातीत सवितोनाराजतां दीर्घमायु’’

अर्थात्! वह श्रेष्ठ प्रकाश जो विश्व को प्रकाशित कर रहा है हमें सद्बुद्धि और दीघायु प्रादन करे।सूर्य आत्मा जगतस्वस्थश्च। अर्थात् सूर्य संसार के समस्त पदार्थों की आत्मा है।

जल तत्व-‘‘सन्नो देवीर भस्तमायोशवन्तुपीतयेशं शयोरीशभवन्तु’’।(ऋग्वेद 10/4/4)

अर्थात्! हे ईश्वर दिव्य गुण वाला जल हमारे लिए सुखकारी हो जो हमें अभीष्ट पदार्थ प्राप्त कराये। हमारे पीने के लिए ये सम्पूर्ण रोगों का नाश करे तथा रोग से पैदा होने वाले भय को न पैदा होने दे, हमारे सामने बहे।

पृथ्वी तत्व-‘‘अधतेडीप च भूतनित्यन्नत्व मुच्यतेतैित्त्ारीयक वेदान्ते तस्य भावोऽनुचिन्तयताम्अध्यते विधिवद् मुक्तमति भोकतरमन्यथा’’।(तैतरीय उपनिशद)

अर्थात् भोजन जो खाया जाता है और भोजन खाने वाला जो भी खाता है भोजन का यह महत्व विचारणीय है विचित्र रीति से किया गया भोजन खाने वाले द्वारा खाया जाता हैै परन्तु जो गलत विधि से खाया जाता है ऐसा भोजन खाने वाले को खा जाता है पहले प्रकार का भोजन मनुष्य को आयुश एवं स्वास्थ्य प्रदान करता है जबकि दूसरे प्रकार के भोजन का विपरीत प्रभाव पड़ता है। वैदिक सभ्यता के बाद पुराण काल में प्राकृतिक चिकित्सा प्रचलित थी राजा दिलीप ने दुग्ध कल्प, फल जल सेवन (रहना) लाभ प्राप्त किया।

आयुर्वेद के अनुसार-

वायु तत्व- दध्यान्ते ध्यायमाननां धातू नाहि यथा मला:।तर्थोन्द्रयाणि दध्यन्ते दोशा: प्राणस्य निग्रहत।।(ऋग्वेद-10/86/3)

अर्थात्! धातुओं को आग में डालने से जैसे उनके मल नष्ट हो जाते है वैसे ही प्राणायाम से मनुष्य के समस्त रोग दूर हो जाते है। वायु हमारे हृदयों में शक्ति पैदा करे। वह सुख देने वाला होकर हमारे पास बहती रहे जब हमारी आयु को दीर्घ करें।

सूर्य तत्व-‘‘कफीयतोदभवा रोगान वात, रोगास्तथैव च।तत्सवनान्न रोजित्वा जीवेच्च शरदाशतम्।।’’

अर्थात् सूर्य रश्मियों के दैनिक प्रयोग से मनुष्य कफ पित्त व वायु दोश से उत्पन्न सभी रोगों से मुक्त होकर सौ वर्ष तक जीवित रह सकता है। ‘‘ददुविस्फोट कुश्टहन कामला शोध नाशक:।ज्वादि सार शूलना हारको नात्रसंशय:।।’’

अर्थात् सूर्य रश्मियाँ दाद, कुश्टपूर्ण दाने, कोढ़, जलशोथ, अति उदरशूल जैसे रोगों को नष्ट कर देती है इसमें सन्देह नहीं।

जल तत्व- दीपनं वृश्य दृश्टातायुश्यं स्नानमोजो बल।प्रदम् कडमलश्रम स्वेदन्द्रोतऽदाह पायुत।रक्त प्रसादन चापि सवेन्द्रिय विशोधनम्।।

अर्थात् स्नान, ओज, आयु, जीवनी शक्ति को बढ़ाता है। थकावट, पसीना, चर्म रोग, मल और उसकी दुर्गन्ध आलस्य, प्यास, जलन तथा पाप का नाश करता है साथ रक्त को शुद्ध करता है एवं सम्पूर्ण इन्द्रियों को स्वच्छ व निर्मल कर देता है।



पृथ्वी तत्व- पृथ्वी न चाहारसमं किंचिद् भैशज्य मुकलभ्यते।शक्यतेऽयन्नं मात्रेण नर: कुर्त निरामय:।।भेशजो नोपन्नोऽसि निराहारो न शक्यते।तस्याद् भिशग्भिराहारो महा भैशन्यमुच्यते।।

अर्थात्! भोजन से बढ़कर दूसरी दवा नहीं है केवल भोजन सुधार से मनुष्य के सारे रोग दूर हो जाते है दवा कितनी दी जाए पर यदि रोगी के भोजन में उचित सुधार न किया जायेगा तो कुछ लाभ नहीं होगा मनुष्य जो खाता है वह भैशज्य नही महा भैशज्य है। पद्यपथ्यं किमौशधया, यदि पथ्यं किमौशधै:। अर्थात् यदि रोगी का पथ्य ठीक नहीे है तो औशधीय दिये जाने का कोई अर्थ नहीं और यदि ठीक है तब भी औषधि निरर्थक है। भोजन सुधार से मनुष्य के सारे रोग दूर हो जाते है, दवा कितनी ही दी जाए पर रोगी के भोजन में उचित सुधार नहीं किया जायेगा तो कुछ लाभ नहीं होगा। मनुष्य जो खाता है भोजन नहीं महाभैशज है। सदा पथ्यं किमौशधया यदिपथ्यं किमौशधै:। अर्थात् यदि रोगी का पथ्य ठीक नहीं है तो औषधि लिए जाने का कोई अर्थ नहीं और यदि पथ्य ठीक है तो भी औषधि निरर्थक है।

पुराण काल-वेदकाल के बाद पुराण काल में प्राकृतिक चिकित्सा का उपयोग रोगों को दूर करने तथा स्वास्थ्य वर्धन के लिये किया जाता था। प्रारम्भ में कोई औषधि चिकित्सा नहीं थी लोग लंघन (उपवास) को ही अचूक औषधि मानते थे। इस सम्बन्ध प्रसंग आता है कि राजा दिलीप दुग्धकल्प एवं फल सेवन तथा राजा दशरथ की रानियों ने फल द्वारा संतान लाभ प्राप्त किया। उपवास सभी रोगों से मुक्त होने का सहज उपचार माना जाता है।

त्रेतायुग में रावण के समय जड़ी-बूटी का औषधि के रूप में प्रयोग होने लगे क्योंकि भोग-विलासी होने के कारण रावण को प्राकृतिक चिकित्सा में कष्ट होता था उसने वैधों का लघंन (उपवास) के बिना चिकित्सा की विधि खोजने का आदेश दिया तभी से औषधि चिकित्सा का आरम्भ हो गया।

महाबग्ग बौद्ध ग्रन्थ-इस ग्रन्थ में वर्णन किया गया है कि एक बार भगवान बुद्ध श्रावस्ती नगर से राजगृह जाते हुए कलंद निवास नामक संघ मे रूके थे। वहाँ एक बौद्ध भुक्षु को सांप ने काट लिया उसकी सूचना भगवान बुद्ध को मिली उन्होंने सलाह दी कि विष नाश करने के लिए चिकनी मिट्टी, गोबर, गौमूत्र और राख का उपयोग किया जाए इस प्रकार किया जाय इस प्रकार के प्रसंग से ज्ञात होता है कि भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को प्राकृतिक चिकित्सा से सही करते, करवाते थे।

सिन्धुघाटी की सभ्यता- इस काल में भी प्राकुतिक चिकित्सा का उपयोग होता था। मोहन जोदड़ो में पाये गये पुराने स्नानगार जिस में गरम, ठण्डा दोनों ही प्रकार के स्नान का प्रबन्ध था। इससे यह स्पष्ट होता है कि 350 ई0 पूर्व जल चिकित्सा महत्वपूर्ण स्थान रखती थी।

मिस्र यूनानी व यहूदी जातियाँ- जल से चिकित्सा होती थी। 2000 वर्ष यूनान एक व्यक्ति बुकरात ने जल और सूर्य चिकित्सा द्वारा लोगों का ज्वर, रक्तविकार, चर्मरोग आदि को ठीक करने के लिए प्रसिद्ध थे।रोम में 800 वर्ष पूर्व सूर्य चिकित्सा होती थी ।

आधुनिक प्राकृतिक चिकित्सा का जन्म एवं विकास

ईसा के जन्म के 400 वर्ष पूर्व ग्रीस के हिप्पोक्रेटीज प्राकृतिक चिकित्सा के जनक कहे जाते है। उनके समय तक दौ सौ पैसठ औषधियों का अविष्कार हो चुका था ये उनकी लिखी पुस्तकों से ज्ञान होता है लेकिन ये औषधियाँ मुख्यत: कुछ नये रोगों में ही प्रयोग की जाती थी। यदपि हिप्पोक्रेटीज इन औषधियों में विश्वास रखता था , उनकी धारणा थी कि प्रकृति में रोग निवारण शक्ति है। तथा नये-नये रोग स्वयं ही शरीर में एक प्रकृति तरीके से उभार लाकर शरीर के भागों में से एक अधिक के द्वारा विकारों के बाहर कर देते है। उनका कहना था कि चिकित्सक का कर्त्तव्य है कि वह रोगी में आये बदलाव का अनुमान पहले से कर ले जिससे वह उन प्राकृतिक तरीको को सहज सफल होने में सहायता दे तथा रोगी चिकित्सक की मदद से रोग निवारण कर सके।

READ MORE  गैसीय अवस्था

हिप्पोक्रेटीज को जल चिकित्सा का पूरा-पूरा ज्ञान था उन्होंने शीतल तथा उष्ण दोनों प्रकार के जल का उपयोग अल्सर, ज्वर और अन्य रोगों में किया। उन्होंने कहा कि शीतल जल का स्नान लघु कालीन होना चाहिए उसके तुरन्त बाद या घर्षण स्नान करना चाहिए। लघुकालीन शीतल स्नान से शरीर गरम रहता है इसके विपरीत उष्ण जल से स्नान से इसके विपरीत प्रभाव पड़ता है। यूनान के स्पार्टन नामक जाति में शीतल जल से स्नान करने का कानून बना था वहाँ बड़े-बड़े स्नानगार में शीतल और उष्ण वायु स्नान की व्यवस्था की। फादर नीप ने प्राकृतिक चिकित्सा का उपयोग बड़े उत्साह से किया और जड़ी बूटी व जल के प्रयोग सम्बन्धी बहुमूल्य अविष्कार किये। मध्यकाल में अरा के चिकित्सकों ने जल चिकित्सा को महत्व दिया।

रेजेज ने ज्वर के ताप को कम करने के लिए बरफीला जल थोड़ा पानी की सलाह दी।

एवी सेना कब्ज निवारण हेतु शीलत जल का स्नान तथा मिट्टी को लाभकारी बताया।

कुलेन चिकित्सक के रूप में जल के सन्दर्भ में कुछ व्यवस्थिति अवलोकन प्रस्तुत किये। उन्होंने ज्वर के उपचार के लिए जल के सम्बन्ध में कहा कि जब प्रतिक्रिया की दिशा को कम करने के लिए जल का उपयोग किया जाता है तो उसका प्रभाव शान्तिदायक होता है लेकिन जब हृदय और धमनियों के कार्यों को बढ़ाने के लिए तथा सबल देने के लिए जल का उपयोंग किया जाता है तो वह टॉनिक का कार्य करता है। जल रोग निवारण और स्वास्थ्य संवर्धन के लिए उपयुक्त माना जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति भारत की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है किन्तु बीच में इस चिकित्सा प्रणाली के संसार से लोप हो जाने के बाद उसके पुर्नरूथान का श्रेय पाश्चात्य देशों को दी है इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता। प्राकृतिक चिकित्सा के पुनरूथान में मदद देने वाले अनेक प्राकृतिक चिकित्सक थे और ये लोग वह थे जो औषधियों द्वारा रोगों का उपचार करते-करते अपनी आयु के एक बड़े भाग को समाप्त कर देने पर भी शान्ति नहीं पा सके। उनके स्वयं के प्राण प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा बचे थे। इस सम्बन्ध में निम्नवत जानकारी है।

पाश्चात्य देशों में प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास

डाक्टर फ्लायर इग्लैण्ड के लिचफील्ड निवासी थे। लिचफील्ड के एक स्त्रोत के पानी में कुछ किसानों को नहाते देखकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त देखा और इस सम्बन्ध में उन्होंने खोज की और जल चिकित्सा आरम्भ की।
सन् 1667 में सर जान फ्लोयर ‘‘हिस्ट्री आफ कोल्ड बायिंग’’ नामक पुस्तक लिखी जिसमें इन्होंने शीतल जल के महत्व स्नान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहाँ कि शीतल जल के स्नान देने से पहले रोगी को पसीना अवश्य आना चाहिए। इसके लिए रोगी को एक गीला चादर लपेट कर कम्बल से ढक देना चाहिए। इसके बाद पसीना आ जायेगा, तब स्नान कराना चाहिए। उन्होंने इग्लैण्ड के लिचफील्ड में वाटर क्योर केन्द्र बनाया इसमें दो कमरे हुआ करते थे। एक कमरे में रोगी को उष्ण स्नान तथा शुष्क लपेट पसीना लाने के लिए दी जाती थी। दूसरे कमरे में शीतल जल की स्नान करवाया जाता था। दोनों कमरे एक दूसरे से बिल्कुल आस-पास थे।

आधुनिक प्राकृतिक चिकित्सा के प्रणेता विनसेन्ज प्रेविनज माने जाते है। जो कि फादर ऑफ वाटर थरैपी माने जाते है। इनका जन्म जर्मनी के सिलेसियन पहाड़ की तलहटी मे एक गाँव में 1752 में एक गरीब परिवार में हुआ था। बड़े होने पर चरवाहे का काम करते हुए एक लगड़ी हिरनी को बुरी तरह घायल देखा वह हिरनी झरने के नीचे आधे घण्टे पानी में खड़े होने के बाद पानी से निकलकर जिधर से आयी थी उधर ही चली गयी। दूसरे दिन भी वह हिरनी करीब उसी समय आयी और इस बार आधे घण्टे से अधिक समय तक पानी में रहने के पश्चात पुन: चली गयी। प्रिस्निज ने देखा कि तीन सप्ताह तक हिरनी इसी प्रकार आती रही। उन्होंने लगड़ी हिरनी झरने में नहाने से उसकी चोट को ठीक होता हुआ देखकर आश्चर्य चकित हुए।

प्रिस्निज जी सोलह वर्ष के थे जब एक दिन जंगल से लकड़ी काटकर लौटते समय बर्फ गिरने लगी। वह आधी तूफान में फसकर चार पसलियां टूट गयी। उन्होंने अपनी चिकित्सा हिरनी की तरह जल से की। इन्होंने गीली पट्टी बाधकर ठीक किया। सूती कपड़े की गद्दी पानी में भिगोकर अपने अंग पर रखने लगे और गद्दी सूख जाती तो फिर से उसे पानी में भिगोकर रख लेते। इस तरह कुछ समय के पश्चात वह बिल्कुल स्वस्थ हो गये।

इनका जल चिकित्सा पर गहन विश्वास हो गया। इन्होंने 1829 में जल चिकित्सा प्रणाली की स्थापना की। जिससे इनके पास दूर-दूर से रोगी आने लगे। प्रिस्निज की चिकित्सा में विशेष जल के व्यवहार और सादा भोजन था। इनका आधारभूत सिद्धान्त पसीना निकाल कर ठण्डे जल का प्रयोग था। इसके बाद रोगी की प्रतिरोधक क्षमता शक्ति को भी बढ़ाने में सहायता करने लगा। प्रिस्निज के बाद जोहान्स स्क्राथ ने शोध से कार्य को आगे बढ़ाया।

जोहान्स स्क्राथ- प्रिस्निज के काल है इन्होंने एक साधु के उत्साहित करने पर अपनी चोट को जल चिकित्सा से सही किया था बाद में जानवरों पर सिद्धस्य हो जाने पर मनुष्यों पर जल चिकित्सा का प्रयोग किया। इनकी ख्याति बढ़ने पर ऎलोपैथिक चिकित्सा में विश्वास रखने वाले लोगों ने शडयंत्र करके इन्हें जेल भिजवा दिया। जेल से बाहर आकर 1849 में जब एक घायल सिपाही को कुछ ही दिनों में ठीक कर दिया तो इनका यश बढ़ने लगा। इनकी चिकित्सा प्रणाली को ‘‘स्क्राथ चिकित्सा’’ कहते है। इमेन्युल स्क्राथ यह जोहान्स के पुत्र थे इन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा अनेक रोगियों का उपचार किया।

फादर सेबस्टिन नीप जो देवरिया के रहने वाले थे इन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा का बहुत प्रचार किया तथा जल का सफल प्रयोग किया। इन्होंने एक स्वास्थ्य ग्रह 45 वर्ष तक चलाया अनेकों संस्थायें जर्मनी में इस चिकित्सा प्रणाली से चल रही है। जल चिकित्सा पर पुस्तक भी लिखी है।

अर्नाल्ड रिचली एक व्यापारी थे। इन्होंने जब प्राकृतिक चिकित्सा के गुणों को देखा और सुना तो उससे प्रभावित होकर इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया और वायु चिकित्सा, जल चिकित्सा पर कार्य किया।

क्राफोर्ड ने भी 1781 में शीतल जल के शरीर पर प्रभाव का अध्ययन किया तथा उपचार हेतु उपयोग भी किया।
डॉ0 हैलरी बेन्जामिल प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योग दिया। उनके द्वारा रचित पुस्तक इवरी बडी गाइड टू नेचर क्योर एक प्रसिद्ध पुस्तक है।

डॉ0 मेकफेडन ने प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने ‘‘फास्टिंग फार हेल्थ’’ तथा ‘‘मेकफेडन इन्साइक्लोपीडिया फार फिजिकल क्योर’’ जैसी अनेकों पुस्तक लिखी। डॉ0 लाकेट ने अपने अनुभव पर भाप स्नान द्वारा पसीना निकालने की नयी विधि अपनायी गयी। एडोल्फ जूस्ट इन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘‘रीटर्न टू नेचर’’ लिखी। इन्होंने बताया कि मिट्टी के प्रयोग द्वारा समस्त रोगों को दूर किया जा सकता है। इन्होंने अपने आप मालिश करने की क्रिया को भी जन्म दिया।

रावर्ड हावर्ड यह प्राकृतिक आहार के अच्छे ज्ञाता माने जाते है।

सेलमन आपके प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया इनकी लिखी पुस्तक स्वास्थ्य और दीर्घायु आज भी लोकप्रिय है।

डॉ0 केलाग ने रेशनल हाइड्रोथेरेपी पुस्तक लिखी और प्राकृतिक चिकित्सा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ0 केलाग ने मालिश, धूप चिकित्सा, आहार चिकित्सा आदि अनेक विषयों पर अनेकानेक पुस्तक लिखी। सभी चिकित्सा प्रणालियाँ जैसे आहार चिकित्सा, जल चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, विघुत चिकित्सा, द्वारा रोगों का उपचार होता है वहाँ यह भी बताया जाता है कि उत्त्ाम स्वास्थ्य तथा लम्बी आयु कैसे प्राप्त करें।आज अमेरिका में प्राकृतिक चिकित्सा एक चिकित्सा विज्ञान के रूप में कई विश्वविद्यालय में पढ़ाई जा रही है तथा उनके चिकित्सीय महत्पपूर्ण योगदान दे रहे है। डॉ0 जानबेल द्वारा रचित पुस्तक ‘‘बाथ’’ एक प्रसिद्ध कृति है।
स्टैनली लीफ का सन् 1892 ई0 में रूस के एक गाँव में जन्म हुआ। और इनका जीवन दक्षिण अफ्रीका में बीता और जब बड़े हुए तब अमेरिका जाकर मैकफेडन के प्राकृतिक शिक्षालय में भर्ती होकर प्राकृतिक चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त की। इग्लैण्ड से निकलने वाली मासिक पत्र ‘‘हेल्थ फार आल’’ के सम्पादक तथा दो प्रसिद्ध पुस्तक भी लिखी। वेनेडिक्ट लुस्ट अमेरिका के एक जाने माने प्राकृतिक चिकित्सक रहे है उन्होंने ‘‘नीप वाटर क्योर’’ नामक एक मासिक पत्रिका निकाली तथा न्यूयार्क में नैच्यूरोपेथी स्कूल आफ कैरोप्रेिक्ट्स की भी स्थापना की।
आस्ट्रिया के फ्रंन प्रान्त के अन्र्तगत टेल्डास- नामक स्थान पर सन् 1848 ई0 में धूप और वायु का जो संसार में सर्वप्रथम अपने ढंग का प्राकृतिक चिकित्सा भवन या बाद में लगभग सभी प्राकृतिक चिकित्सकों ने इसी आधार पर चिकित्सा ग्रहों का निर्माण कराया। अपने 67 वर्ष की लम्बी आयु का उपयोग किया और मरने के समय तक स्वस्थ और स्फूर्तिवान बने रहे। लुई कुने-प्राकृतिक चिकित्सा को विकास एवं उन्नति के शिखर पर पहुँचाने का श्रेय प्रिस्निज, नीप एवं कूने तीनों को है। परन्तु कुने के विशेष योगदान की वजह से आज प्राकृतिक चिकित्सा को कुने चिकित्सा प्रणाली के नाम से भी जाना जाता है।

लूई कूने का जन्म जर्मनी के लिपजिंग नगर में एक जुलाहे के घर हुआ था। इनके माता पिता की मृत्यु एलोपैथ चिकित्सकों के उपचार के मध्य हुई 20 वर्ष की अल्पायु में ही इन्हे भी मस्तिष्क एवं फुस्फुस के भयंकर रोग के साथ-साथ आमाशय का फोड़ा हो गया जो कि किसी भी डाक्टर से ढीक नहीं हुआ जीवन से ऊबकर अंत में सन् 1864 में इन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा की शरण ली और बहुत जल्दी स्वास्थ्य प्राप्त किया।परिणामत: ये प्राकृतिक चिकित्सा के भक्त बने और निरन्तर अध्ययन मनन के बाद 10 अक्टूबर 1883 ई0 में लिपजिंग स्थित प्लास प्लेट्ज स्थान पर एक निज का स्वास्थ्य ग्रह खोल दिया। कुने की जर्मन भाषा में लिखी अनेक पुस्तकों में the science of facial expression और  New science of healing जिनका हिन्दी रूपान्तर सस्ता साहित्य मंडल दिल्ली एवं आरोग्य मंदिर गोरखपुर ने क्रमश: आकृति से रोगी की पहचान एवं रोगों की नई चिकित्सा नाम से किया है ये पुस्तकें विश्व प्रसिद्ध है। फ्रेच, ग्रीक, इंग्लिश आदि कई भाषा में इन पुस्तकों के अनुवाद हो चुके है तथा अन्य भाषाओं में हो रहे है।कुने प्राकृतिक चिकित्सा सिद्धान्तों में रोगों का कारण एक ही है, शरीर में विजातीय द्रव्य का इक्कठा होना मुख्य कारण है इनके उपचार के तरीकों में सूर्य चिकित्सा, भाप स्नान, कटिस्नान प्रमुख है।

Schweninger ऐलोपैथिक डाक्टर ने बाद में प्राकृतिक चिकित्सा बने। इन्होंने The Doctor नामक एक सुप्रसिद्ध पुस्तक लिखकर वर्तमान में प्रचलित जहरीली तथा प्राण घातक औषधियों द्वारा चिकित्सा विधि की बड़ी कटु आलोचना की।

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्त 

मनुष्य प्रकृति का एक हिस्सा है। उसका शरीर इन्हीं प्रकृति तत्व से बना है। प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्त नितान्त मौलिक है इनके अनुसार प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने से रोग पैदा होते है तथा प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए पुन: निरोग हो सकते है। मनुष्य शरीर में स्वाभाविक रूप एक ऐसी प्रकृति प्रदत्त्ा पायी जाती है जो सदैव भीतरी और बाहरी हानिकारक प्रभावों से मानव की रक्षा करती है जिसको नियमियता कहा जाता है और साधारण लोग जिसे जीवनी शक्ति के नाम से पुकारते है वही शक्ति सब प्रकार के रोगों के कारणों को स्वयंमेव दूर करती है। वह निरन्तर शरीर का पुननिर्माण करती रहती है और जो टूट फूट हो जाती है। उसकी मरमत का भी ध्यान रखती है साथ ही शरीर भीतर से अस्वाभाविक तत्व पैदा हो जाते है या बाहर से पहुँच जाते है उन्हें निकालने का भी प्रयत्न करती रहती है। रोग मनुष्य के लिए अस्वाभाविक अवस्था है जब वह प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन या विरूद्ध मार्ग पर चलने लगता है तो उसके शरीर मे विजातीय द्रव्य की मात्रा बढ़ने लगती है जिसके परिणाम स्वरूप शरीर में तरह-तरह के विष उत्पन्न होने लगते है और वातावरण मे पाए जाने वाले हानिकारक कीटाणुओं का भी उस पर आक्रामण होने लगता है इससे शरीर का पोषण और सफाई करने वाले यन्त्र निर्बल पड़ने लगते है। उनके कायोर्ं में त्रुटि होने लगती है और मनुष्य रोगी हो जाता है। शरीर के भीतर रोग निरोधक शक्ति भरी पड़ी है जिसके द्वारा शरीर मे उत्पन्न हुए अथवा बाहर से प्रवेश पाकर पहुँचे हुए रोग कीटाणुओं का विनाश निरन्तर होता है। उदाहरण-यदि आँख में कोई विष कीटाणु जा पहुँचे तो निरन्तर आँसू निकलता है। इन आँसुओं में लाइसोजीम नामक पदार्थ रहता है जिसकी निरोध शक्ति अद्भूत है।

READ MORE  पुराण के रचयिता, रचना काल एवं पुराणों की संख्या

प्राकृतिक चिकित्सा की मान्यता है कि रोग एक है और उसका इलाज भी एक है अत: कोई भी आसाह्य से असाह्य रोग हो इस चिकित्सा से उसका उचित समय से निराकरण किया जा सकता है। रोगी के ठीक हो जाने पर पुन: उसके रोगी होने की सम्भावना क्षीण हो जाती है। प्राकृतिक चिकित्सा से रोग जड़ से दूर होते है। स्वास्थ्य के सम्बन्धित नियमों का पालन तथा किसी भी काम में अति न करना प्राकृतिक चिकित्सा का मुख्य सिद्धान्त है। प्रकृति के नियमों को तोड़ने से बीमारियाँ पैदा होती है। जबकि प्रकृति के नियमों का पालन करने से हमारे स्वास्थ्य की रक्षा होती है। प्रकृति के नियमों के पालन के लिए आवश्यक होता है कि हमें प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण सिद्धान्तो के बारे में जानकारी हो जो  है- प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धान्त है जीवनशैली मनुष्य रोगी न बने इसके लिए प्राकृतिक चिकित्सा के दस आधार भूत सिद्धान्त  है-

सभी रोग एक हैं, और उनका कारण भी एक ही है, और उनका उपचार भी एक ही है-

सभी रोग, उनके कारण उनकी चिकित्सा भी एक है चोट और वातावरणजन्य परिस्थितियों को छोड़कर सभी रोगों का मूल कारण एक ही है और उसका उपचार भी एक है शरीर में विजातीय पदार्थों की संग्रह हो ताना जिससे रोग उत्पन्न होते है। उनका निष्कासन ही चिकित्सा है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का मौलिक सिद्धान्त वह है। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सभी रोग एक ही है। रोग को अलग-अलग नामों से जाना जाता है जिस प्रकार चांदी से बने आभूशणों के अलग अलग नाम हैं जैसे- कंगन, पायल, अॅंगूठी आदि उसी प्रकार एक ही विजातीय द्रव्य के अलग अलग स्थान पर एकत्र होने के कारण रोग के अनेकों नाम हैं। रोग का एक मात्र कारण विजातीय द्रव्य है। जिसे टॉक्सिक मैटर कहते हैं, शरीर एक मशीन के समान कार्य करता है जिसके कारण हमारे शरीर में विजातीय द्रव्य एकत्र होते रहते हैं और उत्सर्जन तंत्र के माध्यम से बाहर निकाला जाता है। जैसे पसीने के रूप में, मल मूत्र के रूप में और जब यही मल जब शरीर से सुचारू रूप से नहीं निकलता तो शरीर के विभिन्न स्थानों पर जमा होने लगता है, और वही सड़ने लगता है जिसके कारण रोग होते हैं। जैसे आंतों की सफाई न होने पर कब्ज होती है जिसके कारण बवासीर और फिसर जैसे रोग होते हैं अंन्त में इनका व्यापक रूप हमारा रक्त भी दूषित कर देता है जिससे चर्मरोग होता है। हृदय पर ज्यादा दबाव पड़ने से हृदय रोग भी हो जाता है। श्वसन का कार्य बढ़ जाने से श्वांस संबन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। इन सबकी जड़ केवल विजातीय द्रव्य ही होते हैं। इसीलिये जब सारे रोग एक है और उनका कारण भी एक हैं तो उसका उपचार भी एक ही होगा और वह है शरीर से विजातीय द्रव्यों का निष्कासन जिससे शरीर शुद्ध हो और रोग समाप्त हो सकें। विजातीय द्रव्य के समाप्त होने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिवान हो जाता है। इसीलिये प्राकृतिक चिकित्सा में शरीर की शुद्धि को महत्वपूर्ण स्थान दिया है और विभिन्न माध्यमों से शरीर से विजातीय द्रव्यों को बाहर निकाल कर इसका उपचार किया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि सभी रोग एक हैं। क्योंकि वे एक ही प्रकार के कारण से उत्पन्न होते होते हे इसलिये उनका उपचार भी एक मात्र है शरीर से विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालना।

तीव्र रोग शत्रु नहीं मित्र होते हैं-

तीव्र रोग चकि शरीर के एक उपचारात्मक प्रयास है अत: हमारे शत्रु नहीं है। जीर्ण रोग तीव्र रोगों को दबाने से और गलत उपचार से पैदा होते है। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगों को दो श्रेणी में बांटा गया है। 1. तीव्र रोग, 2. जीर्ण रोग। जीर्ण रोग वह होते हैं जो शरीर में दबे रहते हैं और लंबे समय के बाद प्रकट होते हैं जिनके शरीर में रहते हुये हमारा शरीर काम तो करता है लेकिन अंदर से क्षतिग्रस्त होता रहता है और लंबे समय तक शरीर में बने रहते हैं क्योंकि इनकी जड़ें शरीर में जम चुकी होती हैं इसके विपरीत तीव्र रोग वह होते हैं जिनकी अवस्था में शरीर कार्य करने में सक्षम नहीं हो पाता है और यह शरीर में तीव्र गति से आते है और वैसे ही तीव्र गति से चले भी जाते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में तीव्र रोगों को मित्र कहा गया है जिस प्रकार सामने से वार करने वाले से खतरनाक छिपकर वार करने वाला होता है। उसी प्रकार तीव्र रोग सामने से वार करता है इससे व्यक्ति को संभलने का अवसर मिल जाता है।

तीव्र रोग के कारण शरीर से विजातीय द्रव्यों का निष्कासन भी हो जाता है जैसे- उल्टी, दस्त हाने से पेट और ऑंतों की सफाई हो जाती है। जुकाम व बुखार में यही विजातीय द्रव्य पसीने के रूप में बाहर निकलते हैं और जीवनीशक्ति का पुन: विकास होने लगता है। तीव्र रोग हमारे अंदर के विष को बाहर निकालने का कार्य करते हैं किन्तु हम घबराकर औषधियों के माध्यम से उनके कार्य में रूकावट डाल देते हैं जिससे तीव्र रोग कुछ समय बाद जीर्ण रोग का रूप ले लेते हैं। उदाहरण के लिये सामान्य सर्दी जुकाम जो कि मौसम बदलने के कारण हमारे शरीर की प्रतिक्रिया होती है जिसके कारण मल बाहर निकलना चाहता है लेकिन हम औषधियों को खाकर इसे रोक देते हैं और कुछ समय बाद यही अस्थमा, बोंकाईटिस, सायनस जैसी जीर्ण बीमारियों के रूप में सामने आते हैं। तीव्र रोग हमें हमारी भूल का स्मरण कराते हैं। गलत आहार के कारण उल्टी और दस्त ठण्डी चीजों के अधिक सेवन के कारण सर्दी जुकाम आदि इसके उदाहरण हैं। इसलिये ही इन्हें मित्र कहा गया है क्योंकि सच्चा मित्र ही हमें हमारी भूलों की पहचान करा सकता है। जिससे वह भूल दुहराई न जा सके।

रोग का कारण कीटाणु नहीं-

रोग का मुख्य कारण कीटाणु नहीं है। जीवाणु शरीर में जीवनी शक्ति के हास होने के कारण एवं विजातीय पदार्थों के संग्रह के पश्चात् तब आक्रमण कर पाते है जब शरीर में उनके रहने और पनपने लायक अनुकूल वातावरण तैयार हो जाता है अत: मूलकारण विजातीय पदार्थ है जीवाणु नहीं है जीवाणु तो दूसरा कारण है। उपर्युक्त सिद्धांत से स्पष्ट हो जाता है कि रोग का एक मात्र कारण विजातीय द्रव्य हैं तो कीटाणु रोग का कारण कैसे हो सकते हैं। स्वस्थ शरीर में कीटाणुओं का अस्तित्व नहीं रहता लेकिन इसके विपरीत रोगियों में विभिन्न प्रकार के कीटाणु प्रवेश करते रहते हैं और रोगी को जर्जर करते रहते हैं। ऐसा क्यों होता है, यह एक प्राकृतिक नियम है कि सृष्टि में जितने पदार्थ हैं इनके सूक्ष्म परमाणु अनवरत रूप से गतिशील रहते हैं। जिन वस्तुओं के परमाणु एक सी गति रखते हैं उनमें परस्पर आकर्षण होता है। और विरूद्ध गति के परमाणु एक दूसरे से भागते हैं। अत: इस सिद्धांत के अनुसार कीटाणुओं का अस्तित्व उन्ही शरीरों में होता है जिनमें पहले से ही विजातीय द्रव्य विद्यमान हो अथवा जो रोग ग्रस्त है या जीवनी शक्ति कमजोर हो क्योंकि विजातीय द्रव्य के कारण जीवनी शक्ति का ह्रास होता है उस अवस्था में कीटाणुओं का प्रवेश शरीर में होता है।

जिस प्रकार गुड़ के पास ही मक्खियां आती है। ठीक उसी प्रकार गंदगी में ही मच्छर आते हैं क्योंकि कीटाणुओं भी जीवित रहने के लिये उनका आहर चाहिये जो कि स्वस्थ व्यक्ति में उन्हें नहीं मिलता और वे जीवित नहीं रह पाते। इसके विपरीत रोगी के शरीर में उनका चौगुना विकास होता है। यही कारण है कि किसी भी प्रकार के कीटाणुओं के संक्रमण में 100 प्रतिशत लोग प्रभावित नही होते वही उसकी चपेट में आ जाते हैं। जिनका रहन सहन सही नहीं है जीवनी शक्ति प्रबल होती है उनमें कीटाणु जीवित नहीं रह पाते इसीलिये वह स्वस्थ रहते हैं। इससे स्पष्ट है कि रोग के प्रभाव का प्रथम कारण एक मात्र विजातीय द्रव्य ही होते हैं कीटाणु नहीं।

प्रकृति स्वयं चिकित्सक है-

प्रकृति स्वयं सबसे बड़ी चिकित्सा है शरीर में स्वयं रोगों से बचने व अस्वस्थ्य हो जाने पर पुन: स्वस्थ प्राप्त करने की क्षमता विद्यमान है। प्रकृति जीव का संचालन करती है जो प्रत्येक जीवन के पाश्र्व में रहकर उसके जन्म, मरण, स्वास्थ्य एवं रोग आदि का ध्यान रखती है, उस महान शक्ति को जीवनी शक्ति, प्राण आदि कहते हैं। शरीर की समस्त क्रियायें इसी के माध्यम से संपन्न होती हैं। हमारा खाना पीना, बोलना चालना, उठना बैठना सब इसी पर निर्भर है। मां अपने बच्चे के लिये इन सब बातों का जैसे ध्यान रखती है वैसे ही प्रकृति भी हमारा ख्याल रखती है, और जब तक बच्चा मां के पास रहता है वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है। जिस प्रकार खाना खिलाते समय यदि खाना अटक जाये तो मां बच्चे को पीठ पर जोर से मारती है पानी पिलाती है। ठीक इसी प्रकार से प्रकृति भी हर तरह से ध्यान रखती है। जब खाना गलती से श्वांस नली में चला जाता है तो प्रकृति के समान ही तुरंत खांसी उत्पन्न कर उसे बाहर निकाल देती है।

इसी प्रकार जब कोई भी जहरीली चीज मुंह में चली जाती है तो तुरंत उल्टी होने लगती है और जहर बाहर निकल जाता है। घाव हो जाने पर उसे कौन भरता है, हड्डी टूट जाने पर उसे कौन जोड़ता है। चिकित्सक केवल सहारा देता है, लेकिन हड्डी को जोड़ नहीं सकता। यह कार्य केवल और केवल प्रकृति रूप में मां ही कर सकती है। संसार में प्रकृति से बड़ा चिकित्सक कोई नहीं है, प्रकृति ही सभी साध्य व असाध्य रोगों का उपचार करती है। प्राकृतिक चिकित्सा तो प्रकृति के कार्य में सहायक के रूप में कार्यकरता है।

चिकित्सा रोग की नहीं संपूर्ण शरीर की होती है- 

प्राकृतिक चिकित्सा में चिकित्सा रोग की नहीं बल्कि रोगी की होती है। अन्य चिकित्सा पद्धतियों में केवल रोग निवारण पर बल दिया जाता है परन्तु प्राकृतिक चिकित्सा केवल रोग का ही नहीं अपितु संपूर्ण शरीर की चिकित्सा करती है जिससे रोग स्वत: मिट जाता है क्योंकि रोग का मूल कारण तो शरीर में एकत्र विष है। जैसे सिरदर्द होने पर अधिकांश लोग दवाओं का प्रयोग करते हैं जिससे कुछ समय के लिये दर्द समाप्त हो जाता है लेकिन बार बार होता रहता है क्योंकि उसकी जड़ तो कहीं और ही होती है। प्राकृतिक चिकित्सा में पेट तथा आंतों को साफ करके सिरदर्द को पूर्ण रूप से समाप्त किया जाता है।

READ MORE  प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के गुण एवं दोष

इसके साथ ही शरीर के शुद्धि करण से सिरदर्द और अन्यरोग स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में किसी अंग विशेष को रोगी नहीं माना जाता है बल्कि किसी भी रोग में संपूर्ण शरीर ही रोगी हो जाता है जैसे एक साधारण लगने वाली कब्ज के कारण व्यक्ति का संपूर्ण शरीर ही रोगी हो जाता है। कब्ज के कारण अपच अजीर्ण गैस, ऐसीडिटी, बवासीर, फिसर, त्वचा रोग, अस्थमा, हृदय रोग आदि होते है। सभी रोग का कारण आंतों में रूका हुआ मल है जो विष का रूप धारण कर संपूर्ण शरीर में फैल जाता है। सिर की ओर जाने पर सिर दर्द, बेचैनी, घबराहट आदि होती है इसलिये केवल पेट की चिकित्सा और शरीर की सफाई से ये सारे रोग एक के बाद एक करके समाप्त हो जाते हैं इसलिये केवल चिकित्सा न करके संपूर्ण शरीर की चिकित्सा की जाती है।

प्राकृतिक चिकित्सा में निदान की विशेष आवश्यकता नहीं-

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत के अनुसार सभी रोग एक है और उनके कारण भी एक ही हैं ऐसी अवस्था में रोग निदान की विशेष आवश्यकता नही रह जाती है। वर्तमान समय में रोग के निदान के लिये बड़ी बड़ी मशीने व उपकरण प्रयोग में लाये जाते हैं जिनके माध्यम से शरीर में रोग का पता लगाया जाता है जिनके विपरीत प्रभाव रोगी पर देखने को मिलता है। एक्सरे मशीन से ऑंखों की रोशनी प्रभावित होती है। गर्भाशय शिशु पर विपरीत प्रभाव पड़ता है यहॉं तक की बच्चा अपंग पैदा हो सकता है। इस प्रकार की मशीनों के अत्यधिक प्रयोग से रोग निवारण नहीं रोग को बढ़ाया जा रहा है बल्कि शरीर और दूषित होता है इसके अतिरिक्त रोगी पर अत्यधिक आर्थिक दबाव पड़ती है जिससे मानसिक रूप से क्षुब्ध हो जाता है लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा में किसी भी उपकरण की सहायता के बिना आकृति निदान की व्यवस्था है रोगी की आकृति को देखकर सिर्फ यह पता लगाना है कि शरीर के किस भाग पर विजातीय द्रव्य की अधिकता है। चहेरे को देखकर, गर्दन को देखकर और पेट को देखकर ही रोगों का निदान किया जाता है जो एक बहुत ही सरल और सहज प्रकिय्रा है। रोगी को किसी प्रकार की परेशानी नही होती और आर्थिक दबाव बिल्कुल नहीं होता है।

जीर्ण रोगी के आरोग्य में समय लग सकता है-

जीर्ण रोगी का अर्थ है जिसमें रोग लंबे समय से बैठा है। उसे समाप्त करने में समय लगता है। जीर्ण रोग न तो बहुत जल्दी आते है और न ही पलक झपकते ठीक हो सकते हैं। जीर्ण रोग उस पेड़ के समान होते हैं जो कई वर्षो से अपनी जड़े जमाये हुये हैं इसलिये उसकी जड़े जमीन में बहुत अंदर तक चली जाती है। पेड़ को तने से बहुत जल्दी काटा जा सकता है। इसी प्रकार जीर्ण रोग भी शरीर में बहुत जड़ें बना लेते हैं और उन्हें जड़ से मिटाने में थोड़ा समय लगता है।

वर्तमान समय की चिकित्सा पद्धतियां रोग के लक्षणों को मिटाती है जो कुछ समय के लिये होता है और बार बार उभर कर सामने आती रहती है। क्योंकि जल्दी आराम पाने के चक्कर में वे औषधियों के माध्यम से रोग रूपी पेड़ के तने को काटते हैं जिसके कुछ समय बाद फिर अंकुर आकर वही पेड़ बन जाता है लेकिन प्राकृितेक चिकित्सा रोग को जड़ से मिटाने का प्रयास करती है और साथ ही जीवनी शक्ति का विकास करती है जो कि औषधियों के सेवन से नष्ट होती है।

यह मनुष्य का दुर्भाग्य ही है कि वह प्रकृति से दूर होता जा रहा है और कृत्रिम दुनियां में जी रहा है। आज की औषधियां इसी का उदाहरण है जिन्हें खा कर मनुष्य सोचता है कि वह स्वास्थ्य को प्राप्त कर रहा है। परन्तु सत्य यह है कि वह खुशी से जहर खा रहा है जो धीरे धीरे उसे अंदर से खाये जा रहा है जिसका पता उसे कुछ समय बीत जाने के बाद लगता है। जब वह एक रोग को दूर करने के लिये ली गई औषधियों के कारण दूसरे रोग को आमंत्रित कर देता है।

प्राकृतिक चिकित्सा में जीर्ण रोगी के स्वास्थ्य लाभ में समय लगने का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि व्यक्ति हर जगह से थक हार कर इसकी ओर मुड़ता है और फिर अपने साथ जगह जगह से एकत्र किया हुआ औशधीय विष लेकर आता है जो प्राकृतिक चिकित्सक के कार्य को और भी बढ़ा देता है। जिससे रोगी के आरोग्य लाभ में समय लग सकता है। इस लिये रोगी को धैर्यपूर्वक प्राकृतिक चिकित्सा करवानी चाहिये जिससे पूर्ण लाभ मिल सके।

प्राकृतिक चिकित्सा में दबे रोग उभरते हैं-

प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा रोग भी उभर कर ढीक हो जाते है। वर्तमान औशधीय चिकित्सा में जहॉं उभरे रोग दब जाते हैं, उसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सा में दबे रोग उभरते हैं जिसके कारण कई रोगी अविश्वास करने लगते है कि उनकी बीमारियां बढ़ गई हैं। जबकि बीमारियां बढ़ती नहीं हैं बल्कि अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष में आ जाती हैं जिससे उनका उपचार किया जा सकता है। प्राकृतिक चिकित्सा में संपूर्ण शरीर का उपचार किया जाता है जिससे संपूर्ण शरीर के विजातीय द्रव्य बाहर निकलते हैं जिससे शरीर में दबे अन्य रोग भी बाहर निकलते हैं जो उचित उपचार से जल्दी ही चले जाते हैं। उभार को चिकित्सकीय भाषा में रोग का तीव्र रोग की अपकर्शावस्था पुराने रोग का प्रत्यावर्तन रोग उपशन, संकट आदि कई नामों से पुकारते हैं इसका सामान्य अर्थ है कि एक रोग का तीव्र अवस्था में अलग-अलग स्थानों में विष का बाहर निकलना जो उपद्रव कहलाते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में इसे सकारात्मक रूप में लिया जाता है, क्योंकि इसका अर्थ है हमारी जीवनी शक्ति अपना कार्य रही है। जिस प्रकार एक सामान्य ज्वर की चिकित्सा के समय तीव्र सिरदर्द व पेट दर्द एवं दस्त भी हो सकते हैं। क्योंकि सिरदर्द होने पर हम दवा से दबा देते हैं। इसी प्रकार पेटदर्द होने पर भी हम इसे दवा से दबा देते हैं, और दस्त को रोक देते हैं जिससे मल शरीर में ही अलग-अलग स्थानों पर जमा हो जाता है और प्राकृतिक उपचार के समय यह बाहर निकलने का प्रयास करता है जिससे सभी रोग उभर आते हैं।

एक प्राकृतिक चिकित्सक का कर्तव्य है कि इन उभारों की अनदेखी न करें और तत्काल उनकी चिकित्सा करें। जिससे रोगी की जीवनी शक्ति का अधिक क्षय न हो। रोगी को इससे घबराने की आवश्यकता नही है। रोगी को यह सोचना चाहिये कि उनका रोग जड़ से ही समाप्त हो रहा है जिससे उसके दुबारा हाने की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।

प्राकृतिक चिकित्सा में मन, शरीर तथा आत्मा तीनों की चिकित्सा की जाती है-

प्राकृतिक चिकित्सा में शारीरिक मानसिक, आध्यात्मिक तीनों पक्षों की चिकित्सा एक साथ की जाती है। शरीर, मन और आत्मा तीनों के सामंजस्य का नाम ही पूर्ण स्वास्थ्य है क्योंकि शरीर के साथ मन जब तक स्वस्थ नहीं है तब तक व्यक्ति को पूर्ण स्वस्थ नही कहा जा सकता है। और शरीर, मन तभी स्वस्थ रह सकते हैं जब आत्मा स्वस्थ हो, केवल शरीर को ही स्वस्थ रखना मनुष्य का कर्तव्य नहीं है क्योंकि मन और आत्मा शरीर के अभिन्न अंग है। बिना मन के खुश हुये हमारी इंन्द्रियां कैसे खुश रह सकती है। यदि मन स्वस्थ नहीं हैं तो विषाल काय शरीर भी कुछ समय में समाप्त हो जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में इन तीनों की स्वास्थ्योन्नति पर बराबर ध्यान रखा जाता है।

यह प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता है कि प्राकृतिक चिकित्सक मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य को उससे शारीरिक स्वास्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं और आत्मिक स्वास्थ्य या बल को सर्वोपरि मानते हैं, क्योंकि शरीर तभी स्वस्थ होगा जब आत्मा और मन स्वस्थ होता है।

भारतीय दर्शन के अनुसार आध्यात्मिक रूप से मनुष्य ही पूर्ण रूप से स्वस्थ होता है वही, जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। क्योंकि आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही एक स्वस्थ समाज की स्थापना कर सकता है। जहॉं हिंसा, द्वेष, का्रेध, घृणा आदि विकृत मानसिकता न पनप सके। प्राकृतिक चिकित्सा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही महत्-तत्व चिकित्सा, राम नाम चिकितसा पर भी बल देती है जिससे मनुष्य आत्म संयम सीख सके और अपनी जीवन शैली को बदलकर संपूर्ण जीवन को उचित दिशा दे सके।

प्राकृतिक चिकित्सा में उत्तेजक औषधियों के सेवन का प्रश्न ही नहीं-

प्राकृतिक चिकित्सा में औषधियों का प्रयोग नहीं होता है। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार आधार ही औषधि है। औषधि उपचार का सिद्धांत है कि रोग बाहरी चीज है जिसका शरीर पर आक्रमण होता है। अत: इसे औषधियों के माध्यम से दूर करना चाहिये। बाहर से आये कीटाणुओं को औषधियों से समाप्त करना चाहिये। जबकि संपूर्ण प्रकार की औषधियां एक प्रकार का विष हैं जिनसे व्यक्ति ठीक कैसे हो सकता है। एक निर्धारित मात्रा से अधिक लेने पर व्यक्ति की मौत हो सकती है लेकिन विष तो विष है आज नही तो कल अपना प्रभाव दिखायेगा ही। क्योंकि एक ही बार में ली गयी नींद की गोलियां व्यक्ति को तुरंत समाप्त कर देती हैं। लेकिन धीरे धीरे ली गयी गोलियां व्यक्ति को पंगु बनाती हैं शरीर को धीरे धीरे खाती हैं आज मिलने वाली दवा पर कुछ समय बाद प्रतिबंध लग जाता है। सभी दवाओं पर सावधानी के निर्देश दिये रहते हैं। प्रो0 ए0 क्लार्क के अनुसार ‘‘हमारी सभी आरोग्यकारी औषधियां विष हैं और इसके फलस्वरूप औषधि की हर एक मात्रा रोगी की जीवनी शक्ति का ह्रास करती है।’’

फिर भी मनुष्य उनका उपयोग करता रहता है लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा में किसी प्रकार की औषधियों का प्रयोग नहीं किया जाता है। औषधियों को अत्यधिक हानिकारक माना जाता है जिससे रोग कम होने के बजाय बढ़ता जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा मानती है कि शरीर औषधि से नही बल्कि प्रकृति से निर्मित हुआ है इसलिये पंचतत्वीय शरीर की चिकित्सा के लिये पंच तत्वों का ही प्रयोग किया जाता है क्योंकि प्रकृति से बड़ा चिकित्सक और कोई नहीं है। प्रकृति के सभी सप्राण खाद्य पदार्थ ही औषधि है। शुद्ध वायु, धूप, जल आदि ही औषधि हैं जो रोग को दूर करने की क्षमता रखते हैं। अमेरिका के लियेण्डर के अनुसार -’’औषधि विज्ञान को जितनी कीटाणुनाशक दवायें मालूम हैं उनसे कही अधिक सूर्य स्नान कीटाणुनाशक शक्ति को बढ़ाता है।’’ प्राकृतिक चिकित्सा में कृत्रिम औषधियों का प्रयोग वर्जित माना जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में विषैली औषधियों को शरीर के लिये अनावश्यक ही नहीं घातक भी समझा जाता है। प्रकृति चिकित्सक है दवा नहीं। औषधि का काम रोग छुड़ाना नहीं है बल्कि यह वह सामग्री है जो प्रकृति के द्वारा मरम्त के काम में लगाई जाती है। इस लिये प्राकृतिक चिकित्सा में सभी सप्राण खाद्य सामग्री ही औषधि हैं।

| Home |

Leave a Reply