एक्यूपंक्चर के लाभ

अनुक्रम
एक्युप्रेशर में शरीर के कुछ बिन्दुओं पर दबाव देकर उपचार करते हैं। इन बिन्दुओं को Acupoints कहते हैं। इन्हीं बिन्दुओं पर जब सुई डालकर उपचार किया जाता है तो उसे Acupuncture कहते है। इन्हीं बिन्दुओं पर जब मेथी दाना और अन्य seed लगाकर उपचार करते हैं तो इसे Seed therapy कहते हैं। इन्हीं बिन्दुओं पर जब छोटे-छोटे magnet लगाकर उपचार करते हैं तो उसे Magnet therapy कहते हैं। इन्हीं बिन्दुओं पर जब colour लगाकर उपचार करते है तो इसे Colour therapy कहते हैं। उपचार का तरीका कोई भी हो उपचार इन्हीं Acupoints पर दिया जाता है।

एक्यूपंक्चर


एक्युप्रेशर एवं एक्युपंक्चर चिकित्सा पद्धति पुरातन भारत वर्श में पैदा हुई, चीन में पली बढ़ी तथा पाश्चात्य जगत में आधुनिक काल में लोकप्रिय हुई। भारत वर्श में जहाँ महिलायें बिन्दी लगाती हैं, जहाँ माँग भरती है, जहाँ नाक, कान छेदे जाते हैं, जहाँ बिछिया, अणत, चूड़ियाँ आदि पहने जाते हैं ये सब एक्युपंक्चर उपचार के महत्वपूर्ण बिन्दु हैं। महावत का छोटा सा लड़का विशालकाय हाथी का नियंत्रण अंकुश द्वारा हाथी के Acupoints को दबाकर करता है।

विगत पांच हजार वर्षों से चीन में एक्युप्रेशर एवं एक्युपंक्चर चिकित्सा पद्धति से सफलतापूर्वक उपचार किया जा रहा है। समय-समय पर एक्युपंक्चर के विद्वानों ने शोध ग्रन्थ लिखे। ये शोध ग्रन्थ आधुनिक एक्युपंक्चर चिकित्सा का आधार है। चीन में 2500 वर्शों पूर्व Huang Di नामक सम्राट हुए। सम्राट Huang Di एक्युपंक्चर के मर्मज्ञ थे। सम्राट अपने Court physian Bo से एक्युपंक्चर पर चर्चा किया करते थे। ये चर्चाएं अकबर बीरबल संवाद की तरह चीन में बहुत प्रसिद्ध हुई। सम्राट Huang Di चीन में Yellow Emperor के नाम से विख्यात हुए एवं court physion Bo के संवादों को चीन की गीता रामायण के समान है। इसी प्रकार एक्युपंक्चर के विद्वानों ने समय-समय पर अपने अनुभवों को ग्रन्थ रूप में लिखा। भारत वर्श में Ayurvedic Acupuncture पर चरक, सुश्रुत आत्रेय आदि विद्वानों ने महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी। वेदों में भी एक्युपंक्चर यानि मर्मभेदन का विस्तृत वर्णन मिलता है।Acupoints को आयुर्वेद में मर्म बिन्दु कहते हैं। ऊर्जा प्रवाह पथ (Meridian) को आयुर्वेद में नाड़ी कहते हैं।

चीन में 1950 के दशक में चेयरमैन माओं ने लाखों लोगों को एक्युपंक्चर का प्रशिक्षण दिलवाया तथा एक्युपंक्चर किट देकर चीन के गांव-गांव में उपचार करने को भेज दिया। इन एक्युपंक्चर के डाक्टरों के पास पहनने को जूते तक न थे। पाश्चात्य देशों के लोग इनको Bare footed doctors के नाम से पुकारते थे। 1962 में अमेरिका के राश्ट्रपति निक्सन ने चीन की यात्रा की। महामहिम राश्ट्रपति के साथ गये एक पत्रकार के पेट में appendicitis का भयंकर दर्द होने लगा। राश्ट्रपति के डाक्टरों ने पत्रकार के एपेन्डिक्स का तत्काल आपरेशन करने की सलाह दी। चीन के प्रधानमंत्री की सलाह पर पत्रकार को एक्युपंक्चर का उपचार दिया गया। St361/2 बिन्दु पर दाहिने पैर में एक सुई डालते ही पत्रकार का एपेन्डिक्स का दर्द आश्चर्यजनक रूप से ठीक हो गया। राश्ट्रपति निक्सन प्रभावित हुए। लेडी निक्सन ने यात्रा के बाकी तीन दिनों तक एक्युपंक्चर के बारे में विस्तृत जानकारी ली। अमेरिका लैटते समय राश्ट्रपति निक्सन कुछ एक्युपंक्चर विद्वानों को अमेरिका अपने साथ ले गये। इसके बाद धीरे-धीरे चीनी एक्युपंक्चर का ज्ञान पाश्चात्य देशों में फैल गया। अंग्रजी में एक्युपंक्चर की पुस्तकें लिखी जाने लगी। एक्युपंक्चर का विशेश साहित्य पाश्चात्य देशों के माध्यम से भारत में भी आने लगा।

प्राचीन काल से ही हमारे देश में एक्युप्रेशर, एक्युपंचर पद्धति का उपयोग स्वास्थ्य अर्जन हेतु किसी न किसी रूप में सदियों से होता रहा है। ऋषि मुनियों द्वारा शरीर के विभिन्न बिन्दुओं पर दबाव देकर अथवा मालिश द्वारा उपचार किया जाता रहा है। इन बिन्दुओं का उल्लेख हमारे प्रचीन ग्रंथ आयुर्वेद में ‘मर्म’ के रूप में हुआ है। कालांतर में सुची भेदन के द्वारा भी उपचार होता रहा, बाद में यह पद्धति बौद्ध धर्म के अनुयायी द्वारा लंका, चीन व जापान ले जाई गई और इसका सम्पूर्ण एवं सम्यक् विकास चीन देश में हुआ। आज विभिन्न देशों जैसे-अमेरिका में रिफलेक्सोलॉजी, जापान में शियात्सु, चीन में एक्युपंचर, जर्मनी में इलेक्ट्रो एक्युपंचर, कोरिया एवं रूस में सर पार्क जी द्वारा प्रतिपादित सुजोक एक्युपंचर के रूप में।

एक्युपंचर दो शब्दों के योग से बना है। एक्यु ¾ सूचिका एवं पंचर ¾ भेदन। अर्थात शरीरस्थ विभिन्न बिन्दुओं का सूचिका भेदन द्वारा स्वास्थ्य अर्जित करना। इन बिन्दुओं पर अंगुलियों का प्रयोग करके पंचर के स्थान पर दबाव दिया जाना एक्युप्रेशर कहलाता है तथा इन्हीं बिन्दुओं पर केवल रंगों का प्रयोग कर उपचार करना ही रंग चिकित्सा है।

एक्यूपंक्चर की परिभाषा

  1. डॉ. पार्क जे.वु. :- अपनी पुस्तक ‘सुक्ष्म अभिनव एक्युप्रेशर-एक्युपंचर’ में लिखते हैं कि प्रकृति ने हमारे हाथों एवं पैरों की संरचना इस ढ़ग से की है कि उनमें शरीर के सभी अंगों एवं अवयवों से सादृश्यता है। इन सादृश्य केन्द्रों पर दबाव देकर या अन्य माध्यमों से शरीर की ऊर्जा शक्ति को उद्वेलित करके शारीरिक असहजता का निवारण किया जा सकता है।
  2. डॉ0 फिट्जजेराल्ट :- इनका मानना है कि पैरों के तलुवों और हथेलियों में स्थित ज्ञान तन्तु ढक जाते हैं जिससे शरीर की विद्युत चुम्बकीय शक्ति का भूमि से सम्पर्क नहीं हो पाता, किन्तु इस विधि के उपचार से ज्ञान तन्तुओं के छोर पर हुआ जमाव दूर हो जाता है और शरीर की विद्युत चुम्बकीय तरंगों का पुन: मुक्त संचरण होने लगता है।
  3. पं. श्रीराम शर्मा आचार्य :- शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जीवनी शक्ति एक विशेष अदृश्य रेखाओं से आती है जिसका सम्बन्ध सम्पूर्ण शरीर से है। उन बिन्दुओं पर सुई का स्पर्श (एक्युपंचर) या थोड़ा सा दबाव (एक्युप्रेशर) से दर्द या रोग तुरंत समाप्त हो जाता है। जटिल शल्य चिकित्सा से उत्पन्न दर्द को भी इन दबाव से आराम मिल सकता है।
  4. डॉ. जे. पी.अग्रवाल :- ‘एक्युप्रेशर/एक्युपंचर वह विधा है जिसमें शरीर के किसी बिन्दु पर उपचार देकर ऊर्जा का विनिमयन किया जा सके।’
  5. एम.पी. खेमका जी :- शरीर के रक्त (Blood), व Body fluids के स्थानान्तरण की विधा को एक्युप्रेशर/एक्युपंचर कहते हैं।
शरीर के किसी निश्चित बिन्दुुओं पर उपचार देकर ऊर्जा के रुकावट को नियमित करना व ऊर्जा को सन्तुलित कर शरीर को ठीक करने की विधा को एक्युप्रेशर/एक्युपंचर कहते हैं।

एक्युपंक्चर का इतिहास 

जब से मनुष्य का सभ्य समाज के रूप में विकास हुआ है तब से ही चिकित्सक लगातार इस कोशिश में हैं कि अधिक से अधिक प्रभावशाली चिकित्सा पद्धतियों तथा औशधियों की खोज की जाए ताकि मनुष्य लम्बे समय तक निरोग रह सके और अगर रोगग्रस्त हो भी जाए तो शीघ्र स्वस्थ हो सके।

एक्यूपंक्चर सुई


पुरातन काल से लेकर आधुनिक समय तक शरीर के अनेक रोगों तथा विकारों को दूर करने के लिए जितनी चिकित्सा पद्धतियाँ प्रचलित हुई है उनमें एक्युप्रेशर-एक्युपंक्चर सबसे पुरानी तथा सबसे अधिक प्रभावशाली पद्धति है।

एक्युप्रेशर/एक्युपंक्चर चिकित्सा पद्धति का उद्भव स्थल या प्रथम अविष्कारक भारतवर्ष ही है। प्राचीन काल से ऋषि-मुनि इस चिकित्सा पद्धति का प्रयोग करते रहे हैं। एक्युप्रेशर चिकित्सा पद्धति पूर्णतया प्राकृतिक चिकित्सा है। मर्म चिकित्सा या नाड़ी शास्त्र हमारी संस्कृति की अनुपम देन है, इनमें नाड़ियों या मर्म बिन्दुओं के अंतिम, मध्य तथा आरम्भिक बिन्दुओं पर दबाव डालकर नाड़ी तंत्र को उत्तेजित व अनुत्तेजित कर सभी प्रकार के रोगों का इलाज किया जाता था। मालिश चिकित्सा पद्धति का मूल आधार एक्युप्रेशर/एक्युपंक्चर चिकित्सा को ही माना जाता है। इतिहास विदों का मानना है कि भगवान बुद्ध के समय में यह चिकित्सा पद्धति अपनी उन्नति के चरम पर थी। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ इसका भी विस्तार चीन, जापान, कोरिया आदि पूर्वोत्तर देशों में हुआ तथा वे वहाँ के लोगों के रहन-सहन में रस बस गई जो कि एक्युपंचर के नाम से प्रसिद्ध है। यही कारण है कि एक्युपंचर में उन्हीं बिन्दुओं का प्रयोग किया जाता है जो एक्युप्रेशर के मूल में विद्यमान है। विद्वानों का मत है कि लगभग 4000 वर्ष पूर्व यह चिकित्सा भारत वर्ष में अपने सर्वोत्तम विकास पर थी तथा यहाँ से इस चिकित्सा का विकास पूर्वोत्तर देशों में फैला जहाँ पर इसे आधुनिक विकास के साथ जोड़कर एक्युपंचर का नाम दे दिया गया ।

डॉ. एंटन जयसूर्या के अनुसार इस चिकित्सा पद्धति के श्रीलंका तथा भारत में ऐसे शिलालेख तथा प्रमाण मिले हैं जो लगभग 2000 वर्ष से 4000 वर्ष पुराने हैं। ये शिलालेख विभिन्न एक्युपंचर बिन्दुओं को दर्शाते हैं तथा इन शिलालेखों के माध्यम से न केवल मानव मात्र की चिकित्सा के प्रमाण मिलते हैं बल्कि पशुओं की चिकित्सा के भी प्रमाण मिलते हैं जिन्हें युद्ध में घायल हाथी, घोड़ों की चिकित्सा के लिए प्रयोग किया जाता था।

एक्युपंक्चर पद्धति कितनी पुरानी है तथा इसका किस देश में आविश्कार हुआ, इस बारे में अलग-अलग मत हैं। आयुर्वेद की पुरातन ग्रन्थों में प्रचलित एक्युपंक्चर पद्धति का वर्णन है, इसे आयुर्वेद में सुचिभेदन के नाम से जाना जाता है। प्राचीन काल में चीन से जो यात्री भारतवर्श आए, उनके द्वारा इस पद्धति का ज्ञान चीन में पहुँचा जहाँ यह पद्धति काफी प्रचलित हुई। चीन के चिकित्सकों ने इस पद्धति के आश्चर्यजनक प्रभाव को देखते हुए इसे व्यापक तौर पर अपनाया और इसको अधिक लोकप्रिय तथा समृद्ध बनाने के लिए काफी प्रयास किया। यही कारण है कि आज सारे संसार में यह चीनी चिकित्सा पद्धति के नाम से मशहूर है।

डॉ. आशिमा चटर्जी, भूतपूर्व एम.पी. ने 2 जुलाई 1982 को राज्य सभा में यह रहस्योद्घाटन करते हुए कहा था कि एक्युपंक्चर का अविश्कार चीन में नहीं अपितु भारतवर्श में हुआ था। इसी प्रकार 10 अगस्त, 1084 को चीन में एक्युपंचर सम्बन्धी हुई एक राश्ट्रीय संगोश्ठी में बोलते हुए भारतीय एक्युपंचर संस्था के संचालक डॉ. पी.के. सिंह ने तथ्यों सहित यह प्रमाणित करने की कोशिश की थी कि एक्युपंक्चर का अविश्कार निश्चय ही भारतवर्श में हुआ था। समय के साथ जहाँ इस पद्धति का चीन में काफी प्रचार बढ़ा, भारतवर्श में यह पद्धति लगभग लुप्तप्राय सी हो गयी। इसके कई प्रमुख कारण थे। विदेशी शासन के कारण जहाँ भारतवासियों के सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक जीवन में काफी परिवर्तन आया वहाँ सरकारी मान्यता के अभाव के कारण एक्युपंक्चर सहित कई अन्य प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धतियाँ पुिश्पत-पल्वित न हो सकी।

यद्यपि आधुनिक युग में चिकित्सा के क्षेत्र में कई नई पद्धतियाँ प्रचलित हो गई है पर चीन में एक्युपंक्चर काफी लोकप्रिय पद्धति है। गत कुछ वर्शों में चीन से इस पद्धति का ज्ञान संसार के अनेक देशों में पहुँचा है। भारत सहित कई देशों में चिकित्सक इस पद्धति का चीन से ज्ञान प्राप्त करके आए हैं।

ऐसा अनुमान है कि छठी शताब्दी में इस पद्धति का ज्ञान सम्भवत: बौद्ध भिक्षुओं द्वारा चीन से जापान में पहुँचा। जापान में इस पद्धति को शियात्सु (SHIATSU) कहते हैं। शियात्सु जापानी शब्द है जो दो अक्षरों ‘शि’ ‘SHI’ अर्थात अँगुलि तथा ‘ATSU’ आतसु अर्थात दबाव से बना है। शियात्सु पद्धति के अनुसार केवल हाथों के अँगूठों अथवा अँगुलियों के साथ ही विभिन्न मान्यता ‘शियात्सु’ केन्द्रों पर प्रेशर दिया जाता है।

एक्यूपंक्चर के लाभ

  1. इस प्रणाली के कोई दुष्परिणाम नहीं हैं। 
  2. यह औषधि रहित चिकित्सा प्रणाली है। 
  3. इस पद्धति से रोगी की रक्षा व रोग की समाप्ति होती है। 
  4. यह कष्ट रहित चिकित्सा है। 
  5. यह कम खर्चीली चिकित्सा प्रणाली है। 
  6. यह चिकित्सा दूसरे अन्य चिकित्सा पद्धतियों के साथ भी चल सकती है। 
  7. यह एक सहज, सरल एवं प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान है। 
  8. एक्युपंक्चर से हमें तुरन्त ही लाभ मिलता है। 
  9. हर प्रकार के रोगों की चिकित्सा संभव है। 
  10. यह चिकित्सा सर्व सुलभ एवं प्रतिप्रभाव से मुक्त है। 
  11. इसमें समय, श्रम व धन की बचत होती है। 
  12. इसका परिणाम तुरन्त ही प्राप्त होता है। 
  13. शारीरिक व मानसिक प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है। 
  14. शरीर के सम्पूर्ण तन्त्र सुचारू रूप से कार्य करता है। 
  15. शरीर में आवश्यक तत्वों का प्रसार कर मांसपेशियों के तन्तुओं में स्फूर्ति तथा त्वचा में चमक पैदा करता है। 
  16. बिना दवाई की कम खर्चीली चिकित्सा पद्धति है।
  17. यह पीड़ा रहित तथा सुरक्षित चिकित्सा पद्धति है।
  18. इसे आवश्यकतानुसार “ाोधित कर बार-बार उपयोग में लाया जा सकता है। 
  19. चूंकि इस पद्धति में किसी भी प्रकार की औषधि का प्रयोग नहीं होता है, इसलिए इससे कोई भी दुष्परिणाम उत्पन्न नहीं होते तथा यह आर्थिक रूप से किफायती भी होती है। 
  20. हवाई जहाज, रेलवे यात्रा के दौरान, कारखानों, खेतों में कार्य करते समय कहीं पर भी तकलीफ होने पर डॉक्टर की उपलब्धि नहीं होने पर एक्यूपंचर/एक्यूप्रेशर ही एकमात्र पर्याय रहता है। 
  21. अनेक बीमारियों की रोकथाम एवं स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिये दैनंदिनी एक्यूपंचर/एक्यूप्रेशर का प्रयोग किया जा सकता है। 
  22. जीर्ण तथा बड़े रोगों में पहले कुछ दिनों तक एक्यूपंक्चर कराने के बाद चिकित्सक द्वारा बताए गए बिन्दुओं पर प्रेषर देकर घर में ही उपचार चालू रखा जा सकता है। 
  23. एक्यूपंचर एवं एक्यूप्रेशर का उपयोग मोटापा कम करने के लिये एवं सौन्दर्यवृद्धि करने के लिये भी किया जाता है।
  24. कई रोग ऐसे होते हैं जो किसी भी चिकित्सा पद्धति द्वारा ठीक नहीं किए जा पाते हैं। उन रोगों में भी एक्यूप्रेशर से उपचार करने पर कुछ हद तक सफल परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

उपचार के प्रतिप्रभाव एवं बचाव -

  1. एक्युप्रेशर उपचारोपरान्त चक्कर या बेहोशी हो तो किया गया उपचार हटाकर, नाक के नीचे व पैर के तलुवे के गहरे भाग को हल्का दबाव दें। 
  2. उपचारोपरान्त पतले दस्त शारीरिक सफाई का संकेत है,घबराये नहीं। 
  3. शारीरिक व मानसिक स्तर पर तीव्र परिवर्तन होता है। जिससे क्रोध, चिड़चिड़ापन उदासी व आनन्द आदि की घटना-बढ़ना हो सकती है। 
  4. एक्यु उपचार के पश्चात् मूत्र त्याग की मात्रा बढ़ जाती है, कुछ दिनों में ठीक हो जाती है। 
  5. उपचार के तुरन्त बाद नींद का आना, स्वास्थ्य का द्योतक है।

एक्युप्रेशर की सावधनियाँ -

  1. चिकित्सा स्थान - साफ, हवादार, शान्त व अनुकूल वातावरण होना चाहिए। 
  2. उपचार के समय रोगी व चिकित्सक दोनों तनाव रहित, शान्तचित्त स्थिति में हों।
  3. रोगी को बिठाकर अथवा लिटाकर सुविधानुसार ही उपचार करें। 
  4. टूटे-फूटे, चोट या ऑपरेशन वाले स्थान पर चिकित्सा नहीं करनी चाहिए। 
  5. चिकित्सा के दौरान अपने दोनों हाथ को अच्छी तरह से डेटॉल आदि स्वच्छ करें।

एक्युप्रेशर की सीमाएँ -

  1. आपरेशन फोड़े व घाव के स्थान पर 3-6 महिने तक उपचार नहीं करना चाहिए। 
  2. गर्भवती महिलाओं को तीन माह के बाद कुछ विशेष बिन्दुओं पर उपचार नहीं देना चाहिए। 
  3. महिलाओं में मासिक धर्म के समय उपचार नहीं करना चाहिए। 
  4. एक्यु बिन्दुओं पर निडल आदि से उपचार 30 मिनट से 1 घंटे रोगानुसार लगाना चाहिए। 
  5. एक्यु बिन्दुओं पर दिन में दो बार खाली पेट उपचारित करना चाहिए।
  6. एक्युपंक्चर का उपचार भोजन से एक घण्टे पूर्व तथा 2-3 घण्टे बाद ही करवाना चाहिए। 7सात साल से कम उम्र तथा 70 साल से अधिक उम्र के व्यक्तियों का उपचार सावधनी पूर्वक करना चाहिए।

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