बैंकिंग क्या है?

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बैकिंग विनिमय अधिनियम की धारा 5 (b) के अनुसार बैकिंग का अर्थ उधार या निवेश के उद्देश्य के लिये जनता से ली गयी धनराशि है जो कि मांग पर प्रतिदेय या अन्यथा चेक, ड्राफ्ट, आदेश या अन्यथा द्वारा निकाली जा सके। अधिनियम, 1881 के अनुसार, बैंकर के अन्तर्गत बैकिंग का काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति तथा डाकघर बचत बैंक सम्मिलित है। विनिमय पत्र अधिनियम 1882 की धारा 2 के अनुसार बैंकर का अर्थ उन व्यक्तियों की एक संस्था से हैं जो बैंकिंग कारोबार करते हैं चाहे निगमित हो या न हो। बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धारा 5(e) के अनुसार, बैंकिंग कम्पनी वह कम्पनी है जो भारत में बैकिंग का कार्य करती हो। बैंकर या बैकिंग कम्पनी ही बैकिंग सम्बन्धी गतिविधियां चलाती हैं। बैंकर या बैकिंग कम्पनी का अर्थ धारा 5 (b) से समझ सकते हैं जिसके अनुसार- यह एक निगमित निकाय के रूप में,
  1. जनता से जमा स्वीकार करती है 
  2. उधार देना या 
  3. जमा राशि के माध्यम से एकत्रित धन निवेश करना 
  4. मांग पर या किसी अन्य माध्यम से जमा राशि की निकासी की अनुमति देना। 
जनता से स्वीकार की हुई जमा राशि से मतलब है कि बैंक किसी से भी जमा स्वीकार करता है जो किसी उद्देश्य के लिये धन प्रस्तावित करता है। जब तक व्यक्ति का बैंक के पास खाता खुला हुआ न हो, तब तक वह जमा राशि स्वीकार नहीं कर सकता। बैंक में जमा करने के लिये आवश्यक है बैंक से खाता सम्बन्ध होना। बैंक अवांछनीय व्यक्तियों के खाता खोलने से मना कर सकती है। खाता खोलने का अधिकार बैंक के पास है। भारतीय रिजर्व बैंक ने खाता खोलने के लिये कुछ मानदण्ड बनाये हैं ‘‘अपने ग्राहक को जानिये’’ (KYC) दिशानिर्देश तथा बैंकों को कठोरता से इसका पालन करना है। बी आर अधिनियम की धारा 5 (ख) में उल्लिखित गतिविधियों के अलावा अधिनियम की धारा 6 में वर्णित गतिविधियों का भी बैंक संचालन करता है।

बैंक
बैंकों के चिन्ह

ग्राहक को जानिये : दिशा निर्देश और ग्राहक 

  1. रिजर्व बैंक द्वारा जारी किये गये दिशा निर्देशों के अनुसार ‘अपने ग्राहक को जानिये’’ में ग्राहक शब्द का अर्थ है- कोई व्यक्ति या संस्था जो खाता और/ या व्यापार सम्बन्ध बैंक के साथ रखता हो,
  2. एक जिसने किसी की ओर से खाता बनाया रखा हो (यानि लाभकारी मालिक) 
  3. किए गए अन्तरणों के लाभाथ्र्ाी व्यवसायिक बिचौलियों द्वारा जैसे शेयर दलाल, चार्टेड अकाउटेन्ट, वकील इत्यादि जिन्हें विधि के अन्तर्गत इजाजत है।
  4. कोई व्यक्ति या संस्था जो कि लेन-देन से जुड़ी हो, जिसकी महत्वपूर्ण प्रतिष्ठा या अन्य जोखिमों को बैंक के लिये उत्पन्न कर सकती हो जैसे तार (wire) हस्तान्तरण या उच्च मूल्य डिमांड ड्राफ्ट एकल लेन-देन के रूप में। 

बैंक और ग्राहक के बीच के सम्बन्ध

बैंक विश्वास आधारित रिश्ता है। बैंक और ग्राहक के बीच रिश्ते कई तरह के होते हैं। बैंक और ग्राहक के बीच के सम्बन्ध कई प्रकार के लेन-देन पर निर्भर करते हैं। इस प्रकार इनके रिश्ते, अनुबन्ध और निश्चित अवधि व शर्तों पर आधारित होते हैं। इन सम्बन्धों में कुछ अधिकार और दायित्व बैंकर व ग्राहकों को प्रदान होते हैं। हालांकि बैंक और उसके ग्राहकों के बीच व्यक्तिगत सम्बन्ध लम्बे समय तक चलने वाले रिश्ते होते हैं। कुछ बैंकों का यह कहना है कि उनका ग्राहकों के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी बैकिंग रिश्ता है। बैंकर ग्राहक का सम्बन्ध विश्वास पर आधारित है। बैंकर द्वारा सम्बन्धित नियम व शर्ते तीसरी पार्टी को बतायी नहीं जा सकती।

1. सम्बन्धों का वर्गीकरण

बैंक व उसके ग्राहकों के बीच के सम्बन्धों को मोटे तौर पर सामान्य सम्बन्ध व विशेष सम्बन्ध में वर्गीकृत किया जा सकता है। बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धारा 5 (ख) को देखे तो हम नोटिस करेंगे कि बैंक व्यापार उधार के उद्देश्य को पूरा करने के लिये जमा राशि स्वीकारता है। अर्थात दो मुख्य गतिविधियों से उत्पन्न सम्बन्ध, सामान्य सम्बन्ध कहलाते हैं। इन दो गतिविधियों के अलाला भी अन्य कार्यों का आयोजन करता है जो कि बैकिंग विनियमन अधिनियम की धारा 6 में वर्णित है।

2. सामान्य सम्बन्ध 

देनदार-लेनदार जब ग्राहक को खाता खोलना होता है तो वह खाता खोलने का फार्म भरकर व हस्ताक्षर करके बैंक को देता है। फार्म पर हस्ताक्षर करके वह बैंक के साथ एक समझौते/अनुबन्ध में प्रवेश करता है। जब ग्राहक बैंक में अपने खाते में पैसे जमा करता है तो बैंक ग्राहक का ऋणी हो जाता है और ग्राहक लेनदार (creditor) हो जाता है। ग्राहक द्वारा जमा किया हुआ पैसा बैंक की सम्पत्ति बन जाती है और बैंक को अधिकार है कि वह अपनी पसन्द से धन का इस्तेमाल करे। बैंक बाध्य नहीं है जमाकर्ता को सूचित करने के लिये कि वह धनराशि का उपयोग किस तरीके से कर रहा है। बैंक पैसे उधार लेता है और जब जमाकर्ता की मांग हो तब बैंकर को भुगतान करना होता है। बैंक की स्थिति सामान्य देनदारों से काफी अलग है। बैंकर अपने आप से भुगतान नहीं करता क्योंकि बैंकर को स्वेच्छा से कर्ज चुकाना आवश्यक नहीं है। मांग उसी शाखा में जाकर की जा सकती है जहां उनका खाता खुला हुआ है या मौजूद हो व सही तरीके से कार्य दिवसों व कार्य के घण्टों (working hours) में ही किया जा सकता है।

खाता खोलने के समय फार्म पर नियम व शर्तें उल्लिखित होती है जिसका पालन ऋणी (debtor) को करना होता है। यद्यपि नियम व शर्तें खाता खोलने वाले फार्म पर नहीं होती, लेकिन खाता खोलने वाले फार्म पर घोषणा की जाती है कि नियम व शर्तें पढ़ व समझ ली गयी हैं। हालांकि नियम व शर्तों का उल्लेख पासबुक में किया गया है जो केवल खाता खोलने के पश्चात ग्राहक को प्राप्त होती है। कुछ समय पहले, कुछ बैंकों में खाता खोलने समय हस्तलिखित पत्र होता था जिसमें खाता खोलने के फार्म के साथ नियम व शर्तें भी साथ में मिलती थीं। लेकिन कुछ समय बाद इस प्रथा को बंद कर दिया। सुविधा के लिये, कुछ बैंकों ने बेबसाइट के जरिये खाता खोलने का फार्म, नियम और शर्तें और विभिन्न सेवाओं से जुड़ी जानकारी अपलोड कर रखी हैं।डिमांड ड्राफ्ट, मेल/टेलीग्राफिक ट्रान्सफर जारी करते समय, बैंक अपने ही पैसे का ऋणी बन जाता है, भुगतानकर्ता/लाभाथ्र्ाी के लिये।

ऋणदाता (lender) के रूप में

देनदार पैसे उधार देना बैंक की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधियों में से एक है। बैंक द्वारा जुटाये गये संसाधन ऋण देने के लिये उपयोग किये जाते हैं। जो ग्राहक बैंक से उधार लेता है वह बैंक के पैसे का मालिक होता है। किसी भी ऋण/अग्रिम खाते के मामले में, बैंकर लेनदार होता है और ग्राहक ऋणी। व्यक्ति बैंक से जमा किये हुये पैसे को ही उधार के रूप में बैंक से मांगता है। ऋण लेने के लिये दस्तावेजों को कार्यान्वित करना और बैंक को प्रतिभूति के रूप में कुछ रखवाना, ऋण लेने से पहले जरूरी है। जमा/ऋण खाता खोलने के साथ ही बैंक विविध सेवायें उपलब्ध कराता है जो रिश्तों को और अधिक व्यापक व जटिल बनाता है। उपलब्ध करायी गयी सेवाओं और लेन-देन की प्रकृति पर निर्भर करता है कि बैंक निक्षेपग्रहीता (bailee), ट्रस्टी, एजेंट, पट्टेदार, संरक्षक आदि में से किस रूप में कार्य करें।

बैंक न्याय (Trustee) के रूप में

भारतीय न्याय अधिनियम, 1882 की धारा 3 के अनुसार, “’न्यास’ एक दायित्व होता है जो सम्पत्ति के स्वामित्व के साथ ही जुड़ा होता है। यह उस विश्वास से उत्पन्न होता है, जो सम्पत्ति के स्वामी में रखा जा जाता है और सम्पत्ति के स्वामी द्वारा ग्रहण किया जाता है या उसके द्वारा घोषित या ग्रहण किया जाता है और उसका उद्देश्य किसी अन्य व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति तथा सम्पत्ति के स्वामी को लाभ पहुँचाना होता है।’’ अर्थात् लाभाथ्र्ाी की ओर से न्यासी सम्पत्ति का धारक होता है।भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 की धारा 15 के अनुसार, न्यासी बाध्य है कि वह न्यास- सम्पत्ति का सौदा करते समय ध्यान रखे कि व्यक्ति अपनी सामान्य समझ से इस तरह सम्पत्ति का सौदा करे जैसे कि वह स्वयं की है और इसके विपरीत अनुबन्ध के अभाव में, न्यासी जिम्मेदार नहीं होगा, न्यास-सम्पत्ति में हुये किसी भी प्रकार की हानि, विनाष (destruction) या तबाही (deterioration) के लिये। न्यासी को अधिकार है कि वह व्यय की प्रतिपूर्ति करे (भारतीय न्यास अधिनियम की धारा 32)। विश्वास की नजर से देखें तो बैंक ग्राहक सम्बन्ध एक विशेष अनुबन्ध है। जब कोई व्यक्ति विश्वास रखते हुये अपनी मूल्यवान वस्तुयें किसी दूसरे व्यक्ति को सौंपता है इस इरादे से कि मांगने पर वस्तुयें उसे लौटा दी जायेंगी और इस तरह उन दोनों के बीच का सम्बन्ध न्यासी और न्यासकर्ता (trustier) का हो जाता है। ग्राहक कुछ कीमती चीजें या प्रतिभूतियां बैंक के पास सुरक्षित रखवाते हैं या किसी विशिष्ट उद्देश्य से बैंक में पैसे जमा कराते हैं तब ऐसे मामलों में बैंक न्यासी के रूप में कार्य करता है। बैंक सामान को सुरक्षित रखने के लिये शुल्क वसूल करता है।

उपनिहिती -उपनिधाता 

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 148 ‘उपनिधान’, ‘उपनिहिती’ और ‘उपनिधाता’ को परिभाषित करता है। उपनिधान से तात्पर्य, किसी उद्देश्य को पूरा करने के लिये माल का परिदान (delivery of goods) एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को, अनुबन्ध के द्वारा जिसका उद्देश्य पूरा होने पर या तो वापिस कर दिया जायेगा अन्यथा देने वाले व्यक्ति के निर्देशों के अनुसार निपटा दिया जाये। माल पहुँचाने वाले व्यक्ति को ‘उपनिधाता’ (baitor) कहते हैं। जिस व्यक्ति के सुपुर्द किया जाता है, उसे ‘उपनिहिती’ (bailee) कहते हैं। बैंक अपने द्वारा दी गयी अग्रिम को सुरक्षित करने के लिये मूर्त प्रतिभूतियां रखते हैं। कुछ मामलों में प्रतिभूति माल का भौतिक कब्जा (गिरवी), कीमती सामान, बांड आदि रखे जाते हैं। प्रतिभूतियों का भौतिक कब्जा करते समय बैंक उपनिहिती हो जाता है और ग्राहक ‘उपनिधाता’। बैंक ग्राहकों की वस्तु, कीमती सामान, प्रतिभूतियां इत्यादि सुरक्षित धरोहर में रखते हैं और उपनिहिती के रूप में कार्य करते हैं। एक उपनिहिती के रूप में बैंक को जमानती माल की सुरक्षा करनी चाहिये।

पट्टादाता - पट्टेदार 

सम्पत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 105 के द्वारा पट्टादाता, पट्टेदार, प्रीमियम और किराये को परिभाषित किया गया है। धारा के अनुसार ‘अचल सम्पत्ति का पट्टा अंतरण अधिकार है जिसके द्वारा ऐसी सम्पत्तियों का आनन्द लेने का जो कि कुछ समय के लिये बनायी गयी हो, व्यक्त या अव्यक्त या शाश्वत मूल्य का भुगतान या वादा के प्रतिफल में, या धन, फसलों में हिस्सा, सेवा या मूल्य की कोई वस्तु, आविधिक प्रदान की जाने वाली या निर्दिष्ट अवसरों पर अंतरिती द्वारा अंतरणकर्ता को हस्तांतरित किया गया हो, जो कि दी गयी शर्तों पर उसे स्वीकार्य हो।

पट्टादाता, पट्टेदार, प्रीमियम और किराये की परिभाषा 

  1. अंतरणकर्ता को पट्टादाता कहा जाता है। 
  2. अंतरिती को पट्टादाता कहा जाता है। 
  3. कीमत को प्रीमियम कहा जाता है। 
  4. धन, हिस्सा, सेवा या अन्य वस्तुएं जो कि प्रदान की गयीं को किराया कहा जाता है।
ग्राहकों को बैंकों द्वारा सुरक्षित जमा लॉकर उपलब्ध कराना सहायक सेवा (ancillary service) है। अपने ग्राहकों को सुरक्षित जमा प्रदान करने के साथ वाल्ट लॉकर सुविधा उपलब्ध कराने के लिये बैंक को सुरक्षित जमा प्रदान करने के साथ वाल्ट लॉकर सुविधा उपलब्ध कराने के लिये बैंक को अपने ग्राहकों के साथ अनुबंध (agreement) करना होता है। अनुबन्ध को ‘बताने का ज्ञापन’ (memorandum of letting) कहा जाता है और स्टाम्प शुल्क के साथ है। बैंक और ग्राहक के बीच सम्बन्ध पट्टादाता और पट्टेदार का होता है। बैंक अपनी अचल सम्पत्ति पट्टे पर (अपने ग्राहकों के लिये लॉकर किराये पर देना) ग्राहकों को देती है और उन्हें अधिकार देती है कि वह कुछ समय सीमा तक उसका उपयोग कर सकें जैसे- कार्यालय/बैंकिंग कार्यों के समय पर और इस सुविधा के लिये बैंक किराया चार्ज करती हैं। बैंक के पास अधिकार है लॉकर को तोड़ने व खोलने का, अगर लॉकर धारक किराये का भुगतान नहीं करता है। अगर लॉकर में रखी हुई सामग्री का कोई नुकसान होता है तब बैंक किसी प्रकार की देनदारी या जिम्मेदारी ग्रहण नहीं करता है। ग्राहकों द्वारा लॉकर में रखे गये सामान को बैंक बीमा नहीं करवाता है।

अभिकर्ता (Agent) एवं मालिक

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 182 ‘अभिकर्ता’ को परिभाषित करते हुए कहती है जो किसी दूसरे के लिए कार्य करता है या तीसरे के साथ व्यवहार करते हुए दूसरे का प्रतिनिधित्व करता है। जिनके लिये व्यक्ति इस तरह का कृत्य या प्रतिनिधित्व करता है, उन्हें मालिक कहा जाता है। अर्थात अभिकर्ता वह व्यक्ति है जो मालिक की ओर से कार्य करता है और उत्तरार्द्ध के व्यक्त या अव्यक्त अधिकार के अन्तर्गत और ऐसे प्राधिकार के अन्तर्गत किये गये कार्यों के लिये मालिक बाध्य होगा। किसी पक्ष के लिये अभिकर्ता द्वारा किये गये कृत्य के लिये मालिक उत्तरदायी होता है। बैंक धनादेश बिल इत्यादि एकत्र करता है और ग्राहकों की ओर से विभिन्न प्राधिकारियों को भुगतान करता है जैसे किराया, टेलीफोन बिल, बीमा प्रीमियम इत्यादि। अपने ग्राहकों द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन बैंक को भी करना होता है। ऐसे सभी मामलों में बैंक अभिकर्ता के रूप में कार्य करता है अपने ग्राहकों के लिये और सेवाओं के लिये शुल्क भी लेता है। भारतीय संविदा अधिनियम के अनुसार, अभिकर्ता शुल्क प्राप्त करने का अधिकार रखता है। किसी प्रकार का शुल्क स्थानीय धनादेशों की वसूली पर नहीं लगाया जायेगा। शुल्क तभी लगाया जायेगा जब समाशोधन गृह से धनादेश वापिस लौट आये।

अभिरक्षक के रूप में 

अभिरक्षक वह व्यक्ति होता है जो किसी वस्तु के कार्यवाहक के रूप में कार्य करता है। बैंक कानूनी तौर पर ग्राहक की प्रतिभूतियों की जिम्मेदारी लेता है। डीमैट खाता खोलते समय बैंक संरक्षक बन जाता है।

गारन्टर के रूप में 

बैंक अपने ग्राहकों की ओर से गारन्टी देते हैं। गारंटी एक आकस्मिक अनुबंध है। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 31 के अनुसार, गारन्टी एक ‘आकस्मिक अनुबन्ध’ है। आकस्मिक अनुबंध एक अनुबन्ध है, कुछ करने या न करने के लिये, अगर कोई घटना, इस तरह के अनुबन्ध के लिये संपािश्र्वक, होती या नहीं होती है। इस प्रकार यह देखा गया है कि बैंकर - ग्राहक सम्बन्ध एक लेनदेन का सम्बन्ध है।

बैंकर और ग्राहक के बीच रिश्तों का समापन 

बैंकर और ग्राहक के बीच रिश्तों का समापन होता है-
  1. ग्राहक की अगर मौत या वह दिवालिया या पागल हो गया हो, 
  2. ग्राहक सवेच्छा से खाता बंद कर रहा हो (यानी स्वैच्छिक समाप्ति) 
  3. कंपनी का परिसमापन 
  4. बैंक द्वारा खाते का समापन, नोटिस देने के पश्चात 
  5. विशिष्ट लेन-देन या अनुबन्ध का पूरा होना बैंकर और ग्राहक के बीच सम्बन्धों को विकसित करने के लिये दोनों को कुछ कर्तव्य निभाना होता है। 

बैंकर के कर्तव्य 

ग्राहक के लिये बैंकर के कुछ कर्तव्य होते हैं -
  1. ग्राहक के खाते की गोपनीयता बनाये रखना। 
  2. ग्राहकों द्वारा अपने खातों से भुगतान हेतु चेक का आदर करने का कर्तव्य एवं उनके लिए चेक, बिल आदि एकत्र करना। 
  3. बिलों का भुगतान करना इत्यादि का कर्तव्य, ग्राहकों के निर्देशानुसार। घ.उचित सेवायें प्रदान करने का कर्तव्य। 
  4. ग्राहक द्वारा दिये गये निर्देशानुसार कार्य करने का कर्तव्य। अगर निर्देश नहीं दिये जाते तो बैंकर उसी तरह कार्य करें जिस तरह के कार्य की उम्मीद रखी जाती है। 
  5. आवधिक कथन (periodical statements) प्रस्तुत करने का कर्तव्य अर्थात ग्राहकों को उनके खातों की स्थिति की जानकारी देना। 
  6. रखी गयी वस्तुओं को तीसरी पार्टी को जारी नहीं करना बिना ग्राहक की अनुमति से।

गोनीयता बनाये रखने का कर्तव्य

बैंक का कर्तव्य है कि वह ग्राहकों के खातों की गोपनीयता बनाये रखें। गोपनीयता बनाये रखना मात्र नैतिक कर्तव्य ही नहीं है बल्कि बैंक कानूनी तौर पर बाध्य है ग्राहकों के मामलों को गुप्त रखने के लिये। इस कर्तव्य के पीछे यह सिद्धान्त है कि अगर ग्राहक के लेन-देन के बारे में किसी अनाधिकृत व्यक्ति को पता चलता है तो ग्राहक की प्रतिष्ठा को नुकसान हो सकता है और बैंक को इसके लिये जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। गोपनीयता को बनाये रखने का कर्तव्य सिर्फ खाते को बन्द कराना या खाते धारक की मृत्यु पर समाप्त नहीं हो जाता।

बैंकिंग कम्पनियाँ (उपक्रमों का अर्जन तथा अन्तरण) अधिनियम, 1970 की धारा 13 के अनुसार हर नया बैंक निरीक्षण करेगा कानून, प्रथाओं और प्रथागत प्रयोगों जो कि बैंकरों के बीच हो, अन्यथा विधि द्वारा आवश्यक को छोड़कर और विशेष रूप से, किसी भी सम्बन्धित जानकारी का खुलासा नहीं करेगा या उसके घटकों के मामलों को छोड़कर व ऐसी परिस्थितियों को छोड़कर जो कि कानून के अनुसार या बैंकरों में प्रचलित व्यवहार और रीति के अनुरूप हो आवश्यक या संगत हो नये बैंकों की जानकारी प्रकट करने के लिये।ग्राहक की गोपनीयता बनाये रखना अनुबन्ध की शर्तों में निहित है जिसके लिये खाता खोलते समय बैंक ग्राहक के साथ एक रिश्ता बनाता है। बैंक सिर्फ लेन-देन की गोपनीयता नहीं बनाता, बल्कि एटीएम/डेबिट कार्ड द्वारा संचालन के सम्बन्ध में भी गोपनीयता बनाये रखता है। बैंक को 10 पिन की भी देखभाल करनी होती है ताकि वह किसी गलत हाथों में न चला जाये, यह भी गोपनीय रखना जरूरी है।

गोपनीय बनाये रखने में विफलता- धन और प्रतिष्ठा की रक्षा में विफल होने पर बैंक उत्तरदायी है, नुकसान का भुगतान करने के लिये। गोपनीयता बनाये रखने के कर्तव्य को पूरा करने में असफल हो जाये और ग्राहक से सम्बन्धित जानकारी का खुलासा हो जाये या खाते का संचालन किसी अनाधिकृत व्यक्ति द्वारा किया जाये तो बैंक पूर्णरूप से नुकसान की भरपायी करने के लिये उत्तरदायी है।

बैंक तीसरे पक्ष के लिये भी जिम्मेदार हो सकता है अगर गलत तरीके से प्रकटीकरण किया गया हो जिससे तीसरे पक्ष के हित को हानि हो। अगर बैंक जानबूझकर गलत जानकारी देता है तो इसका मतलब गलत प्रस्तुतीकरण से होगा। वह परिस्थितियां जब बैंकर ग्राहक के खाते की जानकारी का खुलासा कर सकता है, वह निम्न प्रकार से है-
  1. कानून की बाध्यता के तहत 
  2. बैंकिंग प्रथाओं के तहत 
  3. राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिये 
  4. बैंक के खुद के हितों की रक्षा के लिये 
  5. ग्राहक की व्यक्त या अव्यक्त सहमति पर 

कानून की बाध्यता के तहत प्रकटीकरण 

बैंक विभिन्न अधिकारियों को जानकारी का खुलासा कर सकता है जिन्हें शक्तियां प्राप्त है अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के अन्तर्गत और बैंक जरूरत पड़ने पर ग्राहक के खाते की जानकारी उपलब्ध करा सकता है, जो कि  है-
  1. बैंकर्स बुक आफ एडवीडेन्स अधिनियम, 1891 की धारा 4 
  2. दिवानी प्रक्रिया संहिता अधिनियम, 1908 की धारा 94(3) 
  3. भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45 (ब) 
  4. बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 26 
  5. उपहार कर अधिनियम 1958 की धारा 36 
  6. आयकर अधिनियम 1961 की धारा 131, 133 7.भारतीय उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1964 की धारा 29 
  7. विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम, 1999 की धारा 120f 
  8. प्रिवेन्शन ऑफ मनी लािन्ड्रंग एक्ट, 2002 की धारा 12 
बैंक उतनी ही जानकारी दे सकता है जितनी (अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध नहीं करायी जाती) किसी व्यक्ति के लिखित अनुरोध पर मांगी जाये जिसको ऊपर लिखे गये अधिनियमों के अनुसार शक्ति प्राप्त हो। ग्राहक को सूचित कर दिया जाता है कि उसके खाते की जानकारी किसी को दी जा रही है।

बैंकिग प्रथाओं के तहत प्रकटीकरण 

व्यक्ति की वित्तीय स्थिति और ऋण पात्रता को जानने के लिये बैंक किसी, दूसरे बैंक से, जहां उसने खाता खोल रखा है, से जानकारी प्राप्त कर सकता है। यह बैंकों के बीच की प्रथा और मौजूदा ग्राहकों की प्रकल्पित सहमति है। क्रेडिट जानकारी कोडिड संदर्भ में दूसरे बैंकों को प्रस्तुत की जाती है, IBA प्रारूप में व बिना हस्ताक्षर के।

समुचित खातों को प्रदान करने का कर्तव्य: बैंकों का कर्तव्य है कि वह ग्राहकों को उनके द्वारा खातों से किये गये लेन-देन की पूर्ण जानकारी दे। बैंक के लिये आवश्यक है कि वह खाते /पासबुक के कथनों की जानकारी ग्राहक को उपलब्ध कराये जिसमें खाते में किये गये डेबिट और क्रेडिट (लेनदेन) स्पष्ट किये गये हों।

चैक भुगतान करने का दायित्व

बैंकर ग्राहकों द्वारा दिये गये चैक भुगतान करने के लिये बाध्य है। अधनियम, 1881 की धारा 31 के अनुसार- ‘‘किसी चैक के आहाथ्र्ाी (drawee) को जिसके पास आहरणकर्ता (drawer) की पर्याप्त निधि जमा है, उस समय चैक का भुगतान करना होगा, जब उससे ऐसा करने के लिये विधिवत कहा जाये और यदि वह भुगतान करने में चूक करे तो उसे ऐसी चूक के कारण आहरणकर्ता को हुई किसी हानि अथवा क्षति के लिये क्षतिपूर्ति करनी होगी।”

इसलिये बैंक का कर्तव्य है कि वह खाता धारक के दिये हुये चैैकों का भुगतान करे यदि  बतायी गयी बातें पूर्ण हों-
चैक ठीक तरीके से तैयार किया गया हो यानी तारीख, शब्दों व अंकों में लिखी गयी राशि ठीक तरह से लिखी हो और न ही पुराना हो, कटा-फटा न हो व उत्तर दिनांकित (Post docted) भी न हो और साथ ही साथ खाताधारक के हस्ताक्षर बैंक में दर्ज नमूने जैसे हों। चैक का भुगतान वहीं से होगा जहां पर खाता खुला हुआ है। (प्रौद्योगिकी और कोर बैंकिग समाधान के कार्यान्वयन की वजह से ग्राहक बैंक की दूसरी शाखाओं में चैक प्रस्तुत कर सकते हैं। आरबीआई ने बैंकों को सलाह देते हुये कहा कि खाता धारकों को मल्टीसिटी चैक जारी किये जायें)।
  1. खाते में पर्याप्त शेष राशि/धन (balance) हो और शेष राशि/धन इतना हो कि चैक के भुगतान ठीक से किये जा सकें। 
  2. भुगतान के लिये चैक को कार्य दिवस व शाखा के कार्य समय में प्रस्तुत किया जाये। 
  3. चेक पर पृष्ठांकन नियमित और समुचित हो। 
  4. आहरणकर्ता के द्वारा भुगतान का चेक रद्द/प्रत्यादेशित (countermanded) न हो। 

चैक भुगतान इन परिस्थितियों में समाप्त हो जाता है-

  1. जब खाता धारक ने चैक का भुगतान न करने के लिये बैंक को निर्देश दिया हो, 
  2. आहरणकर्ता की मृत्यु की सूचना पाने पर, स.(गार्निशी) अनुऋणी आदेश खाते में धन के साथ संलग्न हो या बैंकर के द्वारा आयकर संलग्न आदेश प्राप्त हुआ हो, 
  3. चैक के भुगतान के समय आहरणकर्ता पागल या दिवालिया हो गया हो। 

बैंक इन परिस्थितियों में चैक का भुगतान करने को मना कर सकता है-

  1. जब खाते में पर्याप्त धन न हो, 
  2. जब सम्बन्धित पक्ष की दावेदारी में त्रुटि हो, 
  3. जब चैक में कुछ कमी हो (भुगतान से आगे की तारीख, चुराया, शब्दों और अंकों में अलग-अलग लिखा होना, इत्यादि) 
  4. जब खाते में शेष राशि किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिये निर्धारित हो और बाकी शेष राशि धनादेश का भुगतान करने के लिये पर्याप्त नहीं हो।

बैंकर के अधिकार

ऐसा नहीं है कि बैंक के अपने ग्राहकों की तरफ सिर्फ कर्तव्य है बल्कि उसके पास कुछ अधिकार भी हैं जो कि हैं-
  1. सामान्य धारणाधिकार 
  2. समायोजन का अधिकार
  3. विनियोजन का अधिकार
  4. ग्राहक के आदेश के अनुसार कार्य करने का अधिकार 
  5. ब्याज लगाना, कमीशन, प्रासंगिक प्रभार या शुल्क इत्यादि का अधिकार

1. धारणाधिकार

धारणाधिकार लेनदार (Creditor) को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह ऋण के पुर्नभुगतान के बदले संरक्षा में रखी वस्तुएं, प्रतिभूतियां आदि रोक ले जब तक इसके विपरीत कोई व्यक्त या अव्यक्त अनुबन्ध न हो। यह अधिकार है, विशेष वस्तुओं या प्रतिभूतियों या अन्य चल सम्पत्ति जिनका स्वामित्व किसी दूसरे व्यक्ति में निहित है, को अपने कब्जे में रखने का एवं कब्जा तब तक बनाया जा सकता है जब तक कि स्वामी ऋण उन्मुक्त न हो जाये या कब्जा करने वाले को दायित्व मुक्त न कर दे। लेनदार (बैंक) देनदार की प्रतिभूतियों को रख सकता है, पर उन्हें बेच नहीं कर सकता। धारणाधिकार दो प्रकार के होते हैं- 1. विशेष धारणाधिकार 2. सामान्य धारणाधिकार

(i) विशेष धारणाधिकार

विशेष धारणाधिकार अधिकार देता है कि केवल उन वस्तुओं पर तब तक अपना कब्जा बनाए जा सकता है जब तक उनसे संबंधित राशि बकाया है। अगर बैंक ने किसी विशेष उधारी के लिए कोई विशेष प्रतिभूति प्राप्त की है तो बैंकर का अधिकार विशेष धारणाधिकार में बदल जाता है।

(ii) सामान्य धारणाधिकार 

बैंक के पास सामान्य धारणाधिकार का अधिकार उधार लेने वाले के लिये हैं। बैंक के सामान्य धारणाधिकार में निहित सभी देय राशि आती है न कि कोई विशेष देय राशि। यह बैंक का वैधानिक अधिकार है और संविदा (agreement) के अभाव में भी यह उपलब्ध है लेकिन गिरवी का अधिकार इसमें निहित नहीं है। सामान्य धारणाधिकार के अनुसार एक व्यक्ति अपने कब्जे में आयी हुई दूसरे की सम्पत्ति को तब तक रोक सकता है जब तक दूसरे व्यक्ति के ऊपर उसके सभी दावे सन्तुष्ट नहीं हो जाते। भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 171 के द्वारा बैंक को सामान्य धारणाधिकार का अधिकार प्राप्त है। धारा के अनुसार ‘‘ बेंकर, फैक्टर, घाटवाले, उच्च न्यायालय के अटर्नी और बीमा दलाल अपने को उपनिहित किसी माल को, तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में, समस्त लेखाओं की बाकी के लिये, प्रतिभूति के रूप में रोके रख सकेंगे, किन्तु अन्य किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वे अपने को उपनिहित माल ऐसी बकाया के लिये प्रतिभूति के रूप में रोके रख सके, जब तक कि कोई अभिव्यक्त संविदा उसे प्रभावित न करती हो’’। बैंक को धारणाधिकार का अधिकार तभी है, जब उसने लेनदार के रूप में वस्तुयें व प्रतिभूतियों को प्राप्त किया है। अग्रिम देते समय बैंक अपने पास दस्तावेजों को रख लेता है। यह दस्तावेज साधारण धारणाधिकार को विवक्षित गिरवी में परिवर्तित कर देते हैं। बैंकर धारणाधिकार सामान्य धारणाधिकार से अधिक है क्योंकि यह विवक्षित गिरवी है और उसे किसी व्यातिक्रम की स्थिति में (default) माल को बेचने का अधिकार भी है। धारणाधिकार के अन्तर्गत बैंक को माल की बिक्री का अधिकार है। सीमा की विधि से बैंकरों के धारणाधिकार के अधिकार वर्जित नहीं है (Law of Limitation)।

धारणाधिकार के अधिकार का क्रियान्वयन

  1. बैंक को कानूनी रूप सौंपे गये माल व प्रतिभूतियों पर धारणाधिकार का अधिकार है एवं वह ऋण लेने वाले के नाम पर स्थायी है।
  2. विशेष प्रतिभूति के विरूद्ध लिये गये ऋण के भुगतान कर देने के बाद भी बैंक को धारणाधिकार का अधिकार है कि उसी उधारकर्ता की बकाया राशि बैंक पर देय है। 
  3. धारणाधिकार का अधिकार वचन पत्र, धनादेश, शेयर सार्टिफिकेट, बांड डिबेचंर आदि पर प्रयोग कर सकता है। 
जहाँ धारणाधिकार के अधिकार का क्रियान्वयन नहीं हो सकता 
धारणाधिकार के अधिकार का क्रियान्वयन नहीं हो सकता अगर वस्तुयें सुरक्षित अभिरक्षा के लिये प्राप्त की गई हों, न्यासी के रूप में प्राप्त सम्पत्तियां या ग्राहक के अभिकर्ता के रूप में प्राप्ति या भूलवश बैंक के पास रह गयी हो।

2. समायोजन का अधिकार 

बैंकर के पास अधिकार है कि वह अपने ग्राहकों के खातों को समायोजित कर सके। बैंक को प्राप्त यह एक वैधानिक अधिकार है कि यदि एक ही ग्राहक के कुुछ खातों में ऋणात्मक अवशेष हो (यानी उतने धन के लिये बैंक का ऋणी हो) और कुछ अन्य खातों में ग्राहक का धनात्मक अवशेष हो (यानी उतने धन के लिये बैंक ग्राहक का ऋणी हो), तो बैंक को यह अधिकार होता है कि वह उन सब खातों की धनराशियों को समायोजित कर ले और अन्तिम रूप से पाये गये ऋणात्मक या धनात्मक (जैसी स्थिति हो) अवशेषों को तदनुसार निपटाये अर्थात अन्तिम ऋणात्मक अवशेष को ग्राहक से वसूल कर ले या अन्तिम धनात्मक अवशेष को ग्राहक को वापस कर दें। यह अधिकार एक ही बैंक की अन्य शाखाओं में जमा राशियों पर भी उपलब्ध है। इस अधिकार का प्रयोग मृत्यु के बाद, कंपनी के दिवालिया और विघटित होने पर अनुऋणी/कुर्की आदेश पर प्रयोग किया जा सकता है। समय बाधित ऋण के लिये भी यह अधिकार उपलब्ध है। समायोजन के अधिकार का उपयोग तभी किया जा सकता है जब इसके विपरीत कोई व्यक्त या अव्यक्त अनुबंध न हो। इस अधिकार का प्रयोग उन देयों के सम्बन्ध में किया जाता है जो देय है या देय होने वाले हैं अर्थात् विशेष एवं अनिश्चित नहीं है। यह भविष्य के ऋणों पर उपलब्ध नहीं है। गारन्टर के नाम पर जमाओं को ऋणी के ऋण बैलेन्स से समायोजित नहीं किया जा सकता, जब तक गारन्टर से मांग न की हो एवं उसका दायित्व निश्चित हो गया हो।

समायोजन का स्वत: अधिकार 

कुछ परिस्थितियों में यह अधिकार स्वत: रूप से लागू हो जाता है और इसमें ग्राहक की पूर्व आज्ञा की आवश्यकता नहीं होती। निम्न स्थितियां में समायोजन स्वत: ही हो जाता है यानि ग्राहक की आज्ञा के बिना-
  1. ग्राहक की मृत्यु होने पर, 
  2. ग्राहक के दिवालिया हो जाने पर, 
  3. न्यायालय द्वारा ग्राहक के खाते के कुर्की के आदेश हो जाने पर, 
  4. ग्राहक के धनात्मक अवशेष के बारे में उसके समानुदेशन का नोटिस प्राप्त होने पर। 
  5. प्रतिभूतियों जिन्हें पहले ही बैंक द्वारा शुल्क लिया जा चुका है उस पर द्वितीय शुल्क के नोटिस की प्राप्ति पर। 

समायोजन के अधिकार को लागू करने हेतु आवश्यक शर्तें 

  1. खाते के धारक का स्वामित्व एक के ही नाम होना चाहिये।
  2. ऋण की राशि निश्चित व मापी या गणना योग्य (measurebale) हो। 
  3. इसके प्रतिकूल कोई समझौता नहीं होना चाहिये। 
  4. न्यास खातों में धनराशि (funds) नहीं होनी चाहिये। 
  5. भविष्य या अनिश्चित ऋणों के आधार पर अधिकार लागू नहीं किया जा सकता। 
  6. बैंकर को अधिकार है कि कुर्की के आदेश प्राप्त करने से पहले वह अपने इस अधिकार का प्रयोग करे।

3. विनियोजन का अधिकार

यह ग्राहक का अधिकार है कि वह बैंकर को निर्देशित करे कि उस ऋण (जब एक से अधिक ऋण बकाया हों) के विरूद्ध जो भुगतान उसके द्वारा किया गया है, विनियोजित कराना चाहिए अगर ऐसे कोई दिशा निर्देश नहीं दिये गये हैं, तो बैंक अपने विनियोजन के अधिकार को किसी भी ऋण के भुगतान के लिये प्रयोग कर सकता है। भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारायें 59, 60 और 61 विनियोजन के नियमों के बारे में बताती है।

धारा 59 : ऋणी द्वारा विनियोजन 

यदि ऋणी यह स्पष्ट रूप से या निहित रूप से बैंक को यह सूचित करता है कि उसके द्वारा जमा धनराशि किस ऋण खाते में जमा की जाये। (जब एक से अधिक ऋण बकाया है)

धारा 60 : बैंक द्वारा विनियोजन 

यदि ऋणी धन जमा करते समय यह न बताये कि वह धन किस ऋण खाते में जमा होना है और परिस्थितियों से भी उसका कोई आशय स्पष्ट न होता हो, तो भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 60 के अनुसार ऋणदाता अपने विवेकानुसार ऋणी के किसी भी ऋण खाते में उस धन को जमा कर सकता है। एक बार ऋणदाता द्वारा ऋणी को यह सूचित किये जाने पर, कि उसके द्वारा जमा धन का विनियोजन किस प्रकार कर दिया गया है, के बाद ऋणदाता उस प्रकार को बदल नहीं सकता है।

धारा 61 : कानून द्वारा विनियोजन 

यदि ऋणी अथवा ऋणदाता जमा किये गये धन को किसी ऋण खाते में विनियोजित करने के लिये सुनिश्चित नहीं हो पाता, तो उस धन को सबसे पहले उस ऋण की अदायगी में विनियोजित किया जायेगा, जो सबसे पहले लिया गया था।जब तक कोई प्रतिकूल समझौता न हो, ऋणदाता के द्वारा किसी भुुगतान को पहले ब्याज फिर मूलश् राशि पर लागू किया जायेगा। अगर ग्राहक के पास एक ही खाता है और वह राशि जमा व निकालना उसी से नियमित तौर पर करता है। तो जिस क्रम में लेनदार प्रविष्टि (Credit entry) समायोजित की जाएगी। ऋण प्रविष्टि (debit entry) से वह कालानुक्रमिक होगी, इसे क्लाइटन के नियम (clagton'srule) से जाना जाता है।

क्लाइटन वाद में नियम- यह व्यवस्था देवायनिस बनाम नोबिल एण्ड कं0 के मामले में सामने आई। यकद किसी ग्राहक का चालू खाता हो और उसी में ऋणात्मक अवषेश हो जाने पर ग्राहक की स्थिति ऋणी की हो जाती हो और उसमें धन जमा करते और निकालते रहने पर ऋणात्मक अवषेश बदलता रहता हो, तो यह स्थिति होती है कि उस खाते में से धन निकालने पर नया ऋण उत्पन्न होता है और जमा करने पर इस तरह से उत्पन्न हुए ऋणों में कालानुसार विनियोजन होता है।बैंकर को अधिकार है ब्याज, कमीषन, आनुशांगिक प्रभार इत्यादि प्रभार लेने का।बैंकर का यह गर्भित अधिकार है कि अपने द्वारा दी गई सेवाओं को चार्ज करे व ग्राहक को बेचे। बैंक प्रभारी है अग्रिम राषि पर ब्याज वसूलने, अग्रिम पर प्रभार लगाना, पारित की गई साख सुविधाओं के अनुपयोग पर प्रभार, कमीशन प्रभार इत्यादि को वसूलने के लिए जो कि अग्रिम बैंक द्वारा मासिक/चर्तुमासिक/अर्धवार्शिक या वार्षिक दी गई शर्तो पर निर्भर हो। बैंक चार्ज तब भी लेता है जब निर्देषित की हुई राशि का तुलन (balance) कम हो। अधिकतर बैंक विभिन्न तरीकों से इन प्रभारों के बारे में अपने ग्राहकों को सूचित करते हैं।

नामांकन सुविधा 

व्यक्ति द्वारा की गयी इच्छा की अभिव्यक्ति नामांकन है कि उसकी मृत्यु के बाद नामांकित व्यक्ति को उसकी सम्पतित हस्तांतरित कर दी जाये। नामांकन वसीयत नहीं है लेकिन वसीयत जैसा कार्य करती है। बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949, बैकिंग कम्पनियों (नामांकन) नियम 1985 की धारा 47जेड ए से 45जेड एफ इस संदर्भ में बनायी गयी है। नामांकन सुविधा एक सरल प्रक्रिया है जिसके द्वारा मृतक की जमा राशि और लाकर धारक के दावों को निपटाया जा सकता है एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में जमाकर्ता की मौैत बेैंक को सक्षम बनाती हैै कि वह मृतक द्वारा नामांकित व्यक्ति को भुगतान कर सके, उस राशि का जो जमाकर्ता के खाते में शेष है एवं उसके द्वारा छोड़ा गया समान जो कि बैंक की सुरक्षित अभिरक्षा में है मृतक व्यक्ति द्वारा नामांकित व्यक्ति को दे दिया जाये बिना उत्तराधिकार प्रमाणपत्र या कानूनी वारिस की पुष्टि करे हुये।

नामांकन मृतक की सम्पत्ति के कानूनी वारिस का अधिकार नहीं लेता। नामांकित व्यक्ति बैंक से कानूनी वारिस के न्यासी के रूप में धन प्राप्त करता है। संयुक्त जमा खाते के मामले में नामांकन का अधिकार तभी मिलता है जब सभी जमाकर्ताओं की मौत हो गयी हो। नामांकन सुविधा व्यक्तियों और एकल मालिकाना संबंधित मामलों में ही मिलती है। अगर नामांकित व्यक्ति नाबालिग है तो नामांकन बनाने वाला जमाकर्ता, राशि को प्राप्त करने के लिये किसी व्यक्ति को नियुक्त कर देता है, जो उसकी मृत्यु होने की स्थिति में नामांकित व्यक्ति के नाबालिग होने के दौरान जमाराशि प्राप्त करेगा नावालिग की ओर से। एक व्यक्ति जो कानूनी तौर पर खाते को संचालित करने की शक्ति रखता है वह नाबालिग की ओर से नामांकन दर्ज करा सकता है। नामांकन, खाता खोलने के फार्म में ही या अलग से फार्म पर अपने नामांकित व्यक्ति का नाम व पता लिखकर भी किया जा सकता है। खाताधारक नामांकन किसी भी समय बदल सकते हैं। जमा खाते के लिये केवल एक ही नामांकन होगा चाहे वे एकल या संयुक्त रूप से आयोजित किया गया हो। संयुक्त लॉकर के लिये दो नामांकन किये जा सकते हैं।

नामांकन सुविधा की व्यवहार्यता 

नामांकन सुविधा सभी प्रकार की जमा राशि, सुरक्षित जमा लॉकर और सुरक्षित अभिरक्षा वस्तुओं के लिये उपलब्ध है। यह उन जमाराशियों के लिये भी लागू है जिन पर संचालन सम्बन्धी निर्देश हों ‘‘या तो या उत्तरजीवी’’। नामांकन केवल एक व्यक्ति के पक्ष में किया जा सकता है। संयुक्त खाते के मामले में, नामांकन सभी जमाकर्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है। नामांकन उन खातों पर नहीं किया जा सकता जहां जमा किसी प्रतिनिधित्व क्षमता का हो, जैसे न्यासी खाता, साझेदारी फर्म, कम्पनी, संगठन, क्लबों इत्यादि के खातों में। नामांकन एक नाबालिग के पक्ष में किया जा सकता है। हालांकिन नामांकन करते समय, नामांकित व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को नियुक्त करता है जो कि नाबालिग न हो, ताकि वह नामांकित व्यक्ति की ओर से जमा राशि प्रापत कर सके, जमाकर्ता की मृत्यु की स्थिति में या नामांकित व्यक्ति के नाबालिग होने के दौरान। नाबालिग के जन्म की तारीख प्राप्त हो व नोट की जाये। नामांकन जारी रहेगा सावधि जमा के नवीनीकरण पर जब तक विशेष रूप से रद्द न कर दिया जाये या बदल न दिया जाये। बैंक प्रत्येक सावधि जमा खरीद पर अलग नामांकन फार्म लेते हैं। अनिवासी नामांकित व्यक्ति के मामले में वह मृतक की राशि का हकदार होगा। वह राशि उसके एन आर ओ खाते में जमा होगी। वह जमा राशि को भारत से बाहर प्रेषित नहीं कर सकता।

बैंक मे जमा राशियों का बीमा 

भारतीय निक्षेप बीमा ओर प्रत्यय गारंटी निगम, एक सार्वजनिक लिमिटेड कम्पनी है जो कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रवर्तित है और इसका कार्य है बैंक जमाओं का बीमा करना। निगम की अधिकृत पूंजी 50 करोड़ रूपये है जो कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पूर्ण जारी व समर्थित है। निगम का प्रबन्धन निदेशक मण्डल में निहित है जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर अध्यक्ष के रूप में हैं। निगम जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करता है और बैंक के असफल होने पर जमा राशि पर बीमा प्रदान करता है जिससे कि उनका आत्मविश्वास बना रहे। भारत में कार्यरत सभी विदेशी बैंकों की शाखाओं सहित सभी वाणिज्यिक बैंकों, स्थानीय क्षेत्रों के बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, सभी पात्र सहकारी बैंक निक्षेप बीमा योजना के अन्तर्गत आते हैं। 1,00,000 रूपये की अधिकतम राशि तक जो कि बैंंक की सभी शाखाओं में से किसी की भी जमा राशि का पूर्ण या कोई हिस्सा हो, का बीमा करती है। यह बीमा सभी जमा राशियों को शामिल करता है जैसे बचत, सावधि, चालू, आवर्ती आदि। लेकिन कुछ इसके अन्तर्गत नहीं आते, जैसे,
  1. विदेशी सरकारों की जमा राशियां
  2. केन्द्र/राज्य सरकारों की जमाराशियां 
  3. अन्तर बैंक जमा राशियां 
  4. राज्य सहकारी बैंक के पास राज्य भूमि विकास बैंकों की जमा राशियां 
  5. भारत के बाहर से प्राप्त की गयी राशि या खातों पर देय राशि 
  6. ऐसी राशि जो कि भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व अनुमोदन से, निगम द्वारा विशेष रूप से छूट प्राप्त हो। 
निगम बैंकों से प्रतिवर्ष प्रति रू0 100 के निर्धारणीय पर 10 पैेसे की दर बीमा प्रीमियम के तौर पर वसूल करता है। यह प्रीमियम निर्धारणीय जमा पर साल में दो बार वसूला जाता है। प्रथमत: 31 मार्च व द्वितीय 30 सितम्बर को। हालांकि प्रीमियम जमाकर्ताओं द्वारा बैंक में जमा की पूर्ण राशि पर वसूला जाता है। बीमा अधिकतम 1,00,000 रूपये (मूल राशि व ब्याज दोनों के लिये) का किया जा सकता है। 

परिसमापक से क्लेम की सूची के प्राप्त करने के दो माह के अन्दर परिसमापक के माध्यम से, निगम जमाकर्ता को उसकी दो लाख तक की जमा राशि का भुगतान करता है, यदि किसी बैंक को पुन: संरचित या विलय या संलयन किसी अन्य बैंक में किया जाता है तब जमा की गई पूर्ण राशि या उस समय प्रभावी बीमित राशि जो भी कम हो एवं वह राशि जो पुनसंरचना या संलयन योजना के तहत प्राप्त की है, के मध्य अन्तर (राशि) को अंतरिती बैंक/बीमित बैंक के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, जैसा कि मामले के अनुसार हो, से क्लेम सूची प्राप्त की तिथि से दो माह के भीतर सम्बन्धित बैंक को भुगतान करेगा। बैंकिंग क्षेत्र में सुधार के लिये बनायी गई, नरसिंहमन समिति (अप्रैल 1998) द्वारा दी गई द्वितीय रिपोर्ट के अनुसार यह सुझाव दिया गया है कि निक्षेप बीमा योजना के अन्तर्गत निश्चित दर पर भुगतान देने के स्थान पर परिवर्तित या जोखिम आधारित मूल्यांकन पर भुगतान करना चाहिये। 

मानदण्ड और नकद लेन-देन 

केवाईसी (KYC) के दिशा निर्देशों का उद्देश्य है कि आपराधिक तत्वों द्वारा काले धन की वैध बनाने संबंधी गतिविधियों का जानबूझकर या अनजाने में हिस्सा बनने से बैंकों को रोका जा सके। केवाईसी प्रक्रियाओं से बैंकों को सक्षम बनाया जाता है जिससे कि वह अपने ग्राहकों को और उनके वित्तीय लेन-देन को बेहतर समझ सके। इससे जोखिमों को कम करने में सहायता मिलेगी। एक नया खाता खोलने से पहले जांच करवाना आवश्यक है कि ग्राहक की पहचान किसी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति से तो नहीं मिलती या फिर किसी प्रतिबंधित तत्व जैसे व्यक्तिगत आतंकवादी या आतंकवादी संगठनों से तो जुड़ा हुआ नहीं है और कोई खाता गुमनाम या फर्जी/ बेनामी नामों से तो नहीं खोला जा रहा। बैंकों को खाता खोलते समय केवाईसी मानदण्डों को पूर्णरूप से ध्यान में रखना चाहिये। केवाईसी का उद्देश्य है कि ग्राहक की पहचान को सुनिश्चित करे और संदिग्ध प्रकृति के लेनदेन को निगरानी में रखें। नया खाता खोलते समय बैंक को कुछ महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठी कर लेनी चाहिये जैसे मौजूदा खातेदार के माध्यम से परिचय होना या ग्राहक द्वारा प्रदान किये गये दस्तावेजों के आधार पर। यह दस्तावेज, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस इत्यादि हो सकते हैं। मौजूदा खातेदार के सम्बन्ध में बैंक को शीघ्र अतिशीघ्र ग्राहक की पहचान का कार्य पूरा कर लेना चाहिये। 

नकद लेनदेन की उच्चतम सीमा और निगरानी 

बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35-ए के तहत जारी किये गये भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा निर्देशों के अनुसार- 
  1. बैंक को रू 50,000 या उससे अधिक राशि के यात्रा चैक, डिमांड ड्राफ्ट, मेल ट्रांसफर, टेलिग्राफिक ट्रांसफर केवल ग्राहक के खाते के आधार पर या चैक के विपरीत जारी करने चाहिए नकद के विपरीत नहीं। ऐसी कोई भी खरीद पर खरीददार को अपना स्थायी आयकर खाता नम्बर (PAN) आवेदन पत्र पर जरूर लिखना चाहिए।
  2. 10 लाख से अधिक की जमा या निकासी पर बैंक की कड़ी नजर होनी चाहिये, चाहे वह किसी भी रूप में हो नकद ऋण ओवर ड्राफ्ट खाता इत्यादि और साथ में ऐसे खातों का रिकार्ड एक अलग रजिस्टर में रखना चाहिये। सभी बैकों की शाखाओं द्वारा 10 लाख या अधिक की जमा या निकासी पर एवं संदिग्ध प्रकृति के लेन-देनों की पूर्ण रिपोर्ट प्रत्येक पाक्षिक कथनों के साथ उनके नियन्त्रण कार्यालयों को भेजनी चाहिए। 

बैंकर्स उचित व्यवहार संहिता 

भारतीय बैंक संघ ने एक कोड तैयार किया है वो बैंकों के उचित व्यवहार के लिये मानक प्रस्तुत करता है। इस दस्तावेज के द्वारा व्यापक रूपरेखा देखने को मिलती है। जिसके तहत आम जमाकर्ताओं के अधिकारों को मान्यता दी गयी है। यह एक स्वैच्छिक कोड है जो प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है और बाजार की ताकतों को प्रोत्साहित करता है ताकि उच्च परिचालन मानकों से ग्राहकों को लाभ मिल सके। यह कोड लागू होता है- चालू, बचत और अन्य सभी बचत खातों, बैंकों द्वारा संग्रह और प्रेषण सेवाएं, ऋण और ओवरड्राफ्ट, विदेशी मुद्रा सेवायें, बैंकों द्वारा कार्ड उत्पाद व तीसरे पक्ष उत्पाद इत्यादि के लिये।

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