पशुधन बीमा क्या है?

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पशुधन भी मानव सम्पत्ति का ही एक अंग होता है, और पशु की मृत्यु होने के कारण उसके मालिक को हानि होती है। ऐसी हानि के लिए क्षतिपूर्ति की व्यवस्था करने के उद्देश्य से पशुधन बीमा का प्रारम्भ हुआ था। बीमा के सन्दर्भ में पशुओं से सम्बन्धित बीमे को दो भागो में बांटा जा सकता है। : (1) पशुधन बीमा (LiveStock Insurance), जिसमे केवल घोड़ा की हानि का बीमा किया जाता है, तथा (2) पशु बीमा (Cattle Insurance), जिसमें दुधारू पशुओ एवं अन्य पशुओं की हानि की जोखिम का बीमा किया जाता है। लेकिन इस वर्गीकरण का कोई तात्विक महत्व नहीं हैं, और ‘‘पशुधन बीमा’’ तथा ‘‘पशु बीमा’’ को समानार्थक माना जा सकता है। पशु बीमा में घोड़ा के अतिरिक्त गाय, भंसै , बकरी, आदि पशुओं की जोखिम संवृत की जाती है।

बीमित एवं अपवर्जित जोखिम - 

पशु बीमा पॉलिसी के अन्तर्गत बीमा कम्पनी बीमित पशु की बीमा अवधि में दुर्घटना या रोग के कारण मृत्यु होने पर क्षतिपूर्ति करने का दायित्व ग्रहण करती है। किन्तु बीमित पशु की असमर्थता होने पर या बीमा आरम्भ होने के पूर्व या आरम्भिक 15 दिनो के भीतर किसी रोग द्वारा मृत्यु होने पर कम्पनी के ऊपर काइेर् दायित्व नही होता। यदि परिस्थितियों या कारणों से बीमित पशु की मृत्यु हो तब कम्पनी के ऊपर क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी नहीं होती, क्योंकि इनको अपवर्जित जोखिम (Excluded Risks) माना जाता है -
  1. शल्य -क्रिया (Surgical Operation):- पुंसत्वहरण या दुर्घटना या रोग सम्बन्धी शल्य-क्रिया को छोड़कर। 
  2. पशु को द्वेशवश या जान-बूझकर चोट पहुंचना, उसकी उपेक्षा करना, उस पर जरूरत से अधिक भार लादना, चातुर्यहीन व्यवहार करना, पॉलिसी में उल्लिखित प्रयाजे नों से भिन्न कामो में उपयागे करना। 
  3. जान-बूझकर पशु की हत्या करना (पशु चिकित्सक के प्रमाण पत्र के आधार पर असाध्य पीड़ा से मुक्ति दिलाने या कानूनी आदेशों के अनुपालन मे की गई हत्या छोड़कर)।
  4. दुर्भिक्ष, पशु के जनन-काल और ब्याने का काल। 
  5. वायु या समुद्र मार्ग से परिवहन।
  6. कतिपय विशिष्ट प्रकार के रोगों द्वारा मृत्यु अथवा पशु को स्थायी पूर्ण अशक्तता। 
  7. युद्ध, आक्रमण, गृह-युद्ध, विद्रोह, क्रान्ति, विप्लव आदि के कारण अथवा नाभिकीय शस्त्रास्त्र सामग्री (Nuclear Weapons Material) के कारण पशु की मृत्यु।

बीमा सम्बन्धी निर्णय -

इस बीमा को करते समय पशु की पशु-चिकित्सक से डॉक्टरी परीक्षा कराई जाती है। इस बीमा की जोखिम को आंकने के लिए पशुपालन और पशु-प्रबन्ध (Animal Management) की विशेषताओं पर ध्यान दिया जाता है। प्रीमियम दर निर्धारित करते समय इन बातों पर विचार किया जाता है कि पशु की आयु क्या है, वह किस उपयोग में रखा जाता है, उसे क्या खिलाया जाता है, कैसे पाला जाता है, उसकी पशु-चिकित्सक द्वारा जांच कराने की क्या व्यवस्था है, आदि। बीमादार को पशु की मृत्यु होने पर उसके बाजार भाव के अनुसार क्षतिपूर्ति दी जाती है। चंूि क वह बाजार भाव पशु की नस्ल के अनुसार तथा क्षत्रे और समय के अनुसार परिवर्तित होता रहता है अत: प्रस्ताव स्वीकृति के समय तथा दावे का निपटारा करते समय पशु-चिकित्सक की रिपोर्ट महत्वपूर्ण होती है।

पशु बीमा का प्रसार -

हमारे देश में पशु बीमा का व्यापक प्रसार चल रहा है। इस दिषा में भारात सरकार ने अनेक अभिकरणों और योजनाओं के अधीन पशु बीमा को प्रोत्साहित किया है। कुछ याजे नाएं इन माध्यमों से चल रही है -  (1) स्माल फार्मर्स डेवलपमेंट एजेंसी (SFDA), (2) मार्जिनल फार्मर्स एण्ड एगिक्र ल्चरल लेबरर्स एजेंसी (MFAL) और (3)समन्वित विकास याजे ना, जिसे इंटेग्रेटेड रूरलडेवलपमटें प्रोजेकट (IRDP) कहते हैं। इन याजे ना के अधीन दुर्बल वर्ग के लोगो को पशुओं को क्रय करने के लिए आसान शर्तों पर ऋण अनुदान मिलता है, लेकिन इस हेतु सम्बन्धित पशु का बीमा कराना अनिवार्य होता है। बीमा कम्पनियां प्राय: बैंक ऋण तक की रकम का बीमा करती हैं किन्तु बीमित रकम पशु के बाजार मूल्य के तीन-चौथाई तक (लघु किसानो के सम्बन्ध में दो - तिहाई तक ) हो सकती है। पशुओं का बीमा प्राय: 3 वर्षों तक के लिए होता है इसके बाद पॉलिसी का नवकरण कराया जा सकता है।

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