रेकी चिकित्सा क्या है?

अनुक्रम
रेकी चिकित्सा को पुनर्जीवित करने का श्रेय जापान के डॉ. मेकाओ उशुई को हैं, जिन्होंने 19वीं शताब्दी के मध्य में इस चिकित्सा को नवजीवन प्रदान किया। डॉ. उशई ने कैसे रेकी का पुनरूत्थान किया इससे संबंधित एक घटना है, जिसका विवरण है- डॉ. उशुई जापान के ईसाई कॉलेज में डीन के पद पर कार्यरत थे। एक दिन एक विद्याथ्री ने उनसे प्रश्न किया कि जिस प्रकार ईसामसीह किसी रोगी को स्पर्श मात्र से रोगमुक्त कर देते थे, वर्तमान समय में ऐसा क्यों नहीं होता है? उनके द्वारा उपयोग में ली गई उपचार की तकनीकों को प्रयोग आज हम कर पाने में असमर्थ क्यों है? क्या आप (डॉ. उशुई) वैसा करने में सक्षम है? डॉ. उशुई के अन्तर्मन को यहा छू गई। वे उस समय विद्याथ्री के उस प्रश्न का कोई जवाब नहीं दे सके। इसलिए जापान के नियम के अनुसार उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और यह संकल्प किया कि जब तक वे उस व़िद्याथ्री द्वारा पूछे गये प्रश्न का सटीक उत्तर प्राप्त नहीं कर लेंगे तब तक ईसाई मत के गहन अध्ययन में लगे रहेंगे।

डॉ. उशुई अपनी इस अनुसंधन यात्रा में अमेरिका के शिकागों शहर में पहुँचे और वहाँ पर उन्होंने आत्मविद्या या अध्यात्मविद्या में डॉक्ट्रेट की उपाधि ग्रहण की। डॉ. उशुई ने अनेक ईसाई एवं चीनी धर्मग्रन्थों का अध्ययन किया किन्तु फिर भी उन्हें अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, किन्तु इससे डॉ. उशुई निराश नहीं हुये, वरन इसके बाद वे उत्तर भारत आयें और उन्होंने संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया। इन संस्कृत ग्रन्थों में उन्हें कुछ संकेत प्राप्त हुये।

इसके बाद वे पुन: जापान आ गये और उन्होंने बौद्ध ग्रन्थ के सूत्रों में संस्कृत के प्रतीकों एवं सूत्रों की खोज करना प्रारंभ किया। इन सूत्रों हमें उन्हें अपने प्रश्नों के समाधान नजर आ रहे थे। इस दौरान डॉ. उशुई जापान के क्योटो के मठ में रह रहे थे। बौद्ध भिक्षु से वार्तालाप करने के बाद वे अपने शहर से 16 मील की दूरी पर स्थित कुरीयामा नामक पहाड़ी पर चले गये और यहाँ 21 दिनों तक इन्होंने एकान्त में कठोर तपस्या की इस साधना का उद्देश्य ब्रह्माण्डीय उर्जा के साथ सम्पर्क स्थापित करना था। डॉ. उशुई ने सूत्रों एवं प्रतीकों के रहस्य का पता करने के लिये संस्कृत के प्रतीकों एवं सूत्रों को लिख भी रखा था। 21 दिनों का उपवास रखकर डॉ. उशुई अपनी कठोर तपसाधना में लीन हो गये और वे सतत् उन संस्कृत के मंत्रों का जप भी करते रहे। डॉ. उशुई ने पर्वत की चोटी पर पहुँचने के बाद अपने पास छोटे-छोटे 21 पत्थर के टुकड़ों को रखा। आपके मन में जिज्ञासा उत्पन्न हो रही होगी कि इन पत्थर के टुकड़ों को रखने के पीछे क्या उद्देश्य था। इसका प्रयोजन यह था कि जैसे-जैसे साधना का एक दिन पूरा हो जाता था वैसे-वैसे डॉ. उशुई एक-एक पत्थर फेंक देते थे। साधना के 20 दिन बीत गये और 21 वे दिन की सुबह तक भी डॉ. उशुई को अपनी साधना का अपेक्षित परिणाम नहीं मिला किन्तु अभी सुरज पूरी तरह नहीं निकला था और राित्रा का अंधेरा था। इसी समय डॉ. उशुई को एक तीव्र प्रकाश पुंज अत्यन्त तीव्रगति से अपनी ओर आता हुआ दिखायी दिया और उन्होंने भागने का प्रयास किया किन्तु किसी कारण वश वे रूक गये।

आपको बता दें कि जैसे-जैसे यह प्रकाश पुंज डॉ. उशुई की ओर बढ़ रहा था, वैसे-वैसे उसका आकार और अध्कि बढ़ता ही जा रहा था और अन्तत: वह प्रकाश समूह डॉ. उशुई के माथे के मध्य में (भू्रमध्य या आज्ञाचक्र का स्थान) टकराया। यह प्रकाश पुंज त्रिनेत्र चक्र था। प्रकाश पुंज के टकराने से डॉ. उशुई को ऐसा लगा की अब तो मौत की घड़ी आ गई है और इसके बाद अचानक एक तेज विस्फोट के साथ उन्हें आकाश में नीले, गुलाबी इत्यादि अनेक रंगों वाले असंख्य चमकीले दिखायी दिये और अत्यन्त बड़े आकार में उन्हें श्वेत प्रकाश दिखायी दिया और देखते ही देखते उनकी दृष्टि के समक्ष एक चमकीला स्वर्णिम प्रतीक आकार लेने लगा, जो संस्कृत ग्रन्थ, में दिया गया था और अपनी साध्ना के समय जिसका वे नियमित जप करते थे। उस प्रतीक को देखकर डॉ. उशुई ने अत्यन्त धीमे श्वर में कहा-’’हाँ मुझे याद है’’ इसके बाद वे बेहोश हो गये। यही से उन्हें ब्रह्माण्डीय प्राण उर्जा के उपयोग की विधि का ज्ञान प्राप्त हुआ, जिसे ‘रेगी’ का नाम दिया गया।

अब आप जान गये होंगे कि रेकी विद्या का जन्म किस प्रकार हुआ।

जब डॉ. उशुई होश में आये तो सूर्योदय हो चुका था। आप को यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि 21 दिनों के उपवास के बाद भी डॉ. उशुई अपने भीतर किसी प्रकार की कमजोरी महसूस नहीं कर रहे थे, वरन् उन्हें स्वयं के भीतर पहले से कहीं अधीक उर्जा एवं स्फूर्ति का अहसास हो रहा था।

साधना पूरी करने के बाद डॉ. उशुई जब पहाड़ी से नीचे उतर रहे थे तो उनके पैर के अंगूठे में चोट लग गई और रक्त बहने लगा। इसलिये उन्होंने अपने हथेली से अंगूठे को ढक दिया और जैसे ही उन्होंने हथेली रखी खून बहना एकदम से रूक गया और दर्द भी दूर हो गया। यह देखकर डॉ. उशुई को अत्यन्त आश्चर्य और खुशी हुयी। वे यह अनुभव कर चुके थे कि यह उसी विश्वव्यापी प्राण उर्जा का प्रभाव है। यह रेकी का पहला उपचारात्मक प्रयोग था।

लम्बे समय तक उपवास के कारण डॉ. उशुई को कड़ी भुख लगी थी। इसलिये वे भोजन हेतु एक धर्मशाला में गये। धर्मशाला के मालिक ने डॉ. उशुई की वेशभूषा को देखकर यह अनुमान लगा लिया कि इन्होंने लम्बे समय तक उपवास किया है। अत: उन्होंने उपवास के बाद हल्का नाश्ता लेने की सलाह दी किन्तु डॉ. उशुई ने भरपेट भोजन किया और इससे उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुयी। पाठकों, यह बस प्रचण्ड जीवनीशक्ति का ही कमाल था। इस प्रकार ये रेकी का दूसरा चमत्कारिक प्रभाव था।

रेकी का तीसरा प्रयोग धर्मशाला के मालिक की पौत्री पर किया गया। उसके दांतों में लम्बे समय से दर्द एवं सूजन थी। जैसे ही डॉ. उशुई ने उसके गाल को स्पर्श किया वैसे ही दर्द के साथ सूजन भी दूर हो गयी। यह रेकी की तीसरी उपचार प्रक्रिया थी।

पाठकों, इसके बाद जब डॉ. उशुई अपने मठ में वापस आये तो उनका मित्र जो बौद्ध भिक्षुक था, वह गठिया रोग से पीड़ित था डॉ. उशुई ने उसके पास बैठकर अपने दोनों हाथ अपने मित्र के शरीर पर रख दिये। ऐसा करने पर उनके मित्रा को अत्यन्त आराम महसूस हुआ और कुछ ही समय में वह स्वस्थ हो गया। इस प्रकार डॉ. उशुई निरन्तर इस रेकी विद्या का प्रयोग करके असंख्य लोगों को ठीक करते गये।

इसके उपरान्त डॉ. उशुई क्योटो शहर के स्लम क्षेत्र के भिक्षुगृह में गये और उन्होंने भिखारियों की सेवा करने का निर्णय लिया। उस भिक्षुगृह में सात दिन तक रहकर उन्होंने उनके रोगों का उपचार किया। उपचार के दौरान डॉ. उशुई ने देखा कि वही जाने-पहचाने लोग बार-बार उनके पास क्यों आते है? कारण पूछने पर उन्हें भिखारियों ने जवाब दिया कि गृहस्थ आश्रम में रहकर जीवन व्यतीत करने से कहीं अधिक अच्छा भीख माँगना है। यह बात सुनकर डॉ. उशुई को अत्यन्त दु:ख हुआ और उन्हें लगा कि रेकी के कुछ नियम एवं सिद्धान्त बनाना भी अनिवार्य है। अत: उन्होंने रेकी के नियमों एवं प्रयोगों को विधिवत-विकसित किया।

इसके बाद जब डॉ. उशुई भिक्षुगृह से क्योटो वापस आ गये और एक दिन एक बहुत बड़ी मशाल जलाकर गली के अन्दर खड़े हो गये। पाठकों, आप जानना चाह रहे होंगे कि डॉ. उशुई ने ऐसा क्यों किया होगा। आपके समान ही यह जिज्ञासा राहगीरों को भी हुयी और उन्होंने डॉ. उशुई से जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि ‘‘मुझे ऐसे लोगों की खोज है, जो वास्तव में सत्य का प्रकाश प्राप्त करना चाहते हैं।’’ उनके कहने का आशय था कि जो वास्तव में उस विश्वव्यापी प्राण उर्जा से अपना सम्पर्क स्थापित करना चाहते है, ऐसे लोग मुझे चाहिये। इस प्रकार डॉ. उशुई ने रेकी के प्रचार के लिये अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया और इसे विश्वव्यापी बनाया और अपने शिष्यों को इसका विधिवत् प्रशिक्षण भी प्रदान किया। कुछ समय पश्चात् डॉ. उशुई ने देह का त्याग कर दिया। उनकी पार्थिव देह को क्योटो के मंदिर में दफन किया गया। पाठकों, आपके जानकारी के लिये बता दें कि उनकी कब्र पर जो पत्थर लगे हुये हैं, उन पर डॉ. उशुई की सम्पूर्ण जीवन गाथा को खोदा गया है। डॉ. उशुई कितने अधिक सम्मानित एवं प्रसिद्ध हो चुके थे, इस बात का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि स्वयं जापान के सम्राट ने उनकी कब्र पर जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित किये थे।

डॉ. उशुई के शरीर छोड़ने के बाद डॉ. हयाशी जो उनके नजदीकी सहयोगी थे, वे उत्तराधिकारी बने। इस प्रकार ये दूसरे रेकी गै्रंड मास्टर कहलाये। डॉ. हयाशी सन् 1940 तक टोकियो में सुचारू रूप से रेकी क्लिनिक का संचालन करते रहें, जहाँ पर सामान्य रोगियों के साथ-साथ गंभीर रोगों का इलाज भी किया जाता है। जब कोई व्यक्ति गंभीर रोग से ग्रसित होता था तो दिन-रात रेकी द्वारा उसका इलाज होता था किन्तु धीरे-धीरे द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रभाव के कारण एवं 10 मई 1941 में डॉ. हयाशी की मृत्यु के कारण इस क्षेत्र में आगे विकास की प्रक्रिया थम सी गई। पाठकों, डॉ. हयाशी की मृत्यु के उपरान्त श्रीमती हवायों उनकी उत्तराधिकारिणी बनी जिनका जन्म सन् 1900 में हवाई द्वीप पर हुआ था। इनके माता-पिता जापान के थे, लेकिन फिर भी उन्हें अमेरिका की नागरिकता प्राप्त थी। श्रीमती टकाटा विधवा थी एवं दो बच्चों की माँ भी, साथ ही वह अनेक गंभीर रोगों से पीड़ित थी। बीमारी के दौरान श्रीमती टकाटा को आन्तरिक प्रेरणा मिली कि उन्हें जापान में अपना उपचार करवाना चाहिये।

इसी अन्त: प्रेरणा से प्रेरित होकर वे जापान पहुँची। उपचार के दौरान जब वह ऑपरेशन के लिये टेबल पर लेटी हुयी थी तो उन्होंने महसूस किया कि एकमात्र ऑपरेशन ही रोगों का इलाज नहीं है। इसलिये उनका ऑपरेशन करवाना उतना आवश्यक नहीं है। इसलिये उन्होंने ऑपरेशन के अतिरिक्त अन्य चिकित्सा पद्धतियों के बारे में डॉक्टर से विचार-विमर्श किया। डॉक्टरों ने उन्हें डॉ. हयाशी के रेकी क्लिनिक के बारे में बताया और उपचार के लिये वहाँ जाने का सुझाव दिया। श्रीमती टकाटा रेकी क्लिनिक पहुँची, जहाँ पर दो रेकी चिकित्सक प्रतिदिन उनका रेकी द्वारा इलाज करते थे। नियमित रेकी चिकित्सा के द्वारा वे कुछ महीने में ही पूरी तरह स्वस्थ हो गई।

श्रीमती टकाटा जापान में डॉ. हयाशी की लगभग 1 वर्ष तक शिष्या रही। इसके बाद वह पुन: अपने बच्चों के साथ हवाई द्वीप वापस आ गई। सन् 1938 में डॉ. हयाशी हवाई द्वीप आये और उन्होंने श्रीमती टकाटा को रेकी मास्टर रूप में घोषित कर दिया। श्रीमती टकाटा ने हवाई में रहकर अनेक लोगों का रेकी विधि के माध्यम से इलाज किया। जब श्रीमती टकाटा अपनी उम्र के सातवें दशक में थी, तब उन्होंने रेकी मास्टर बनाना प्रारंभ कर दिया था। 11 दिसम्बर सन् 1980 में श्रीमती टकाटा की भी मृत्यु हो गई। श्रीमती टकाटा के पीछे कनाडा तथा अमेरिका में कुल मिलाकर 22 रेकी ग्रैंड मास्टर थे। आज पूरे विश्व में लगभग 4 हजार रेकी मास्टर हैं, जो रेकी के माध्यम से लोगों का उपचार करके इस विद्या के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दे रहे हैं। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर आप समझ गये होंगे कि, किस प्रकार रेकी विद्या का जन्म एवं विकास हुआ।

रेकी चिकित्सा 

‘रेकी’ शब्द मूलत: जापानी है, जो ‘रे’ (REI) तथा ‘की’ (KI) इन दो शब्दों से मिलकर बना है। जापानी भाषा के अनुसार रे का अर्थ है-सार्वभौमिक या विश्वव्यापी अथवा ब्रह्माण्डव्यापी अर्थात- जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में या सभी जगह विद्यमान हो तथा ‘की’ से तात्पर्य है-उर्जा या शक्ति। इस प्रकार रेकी का अर्थ है- विश्वव्यापी ऊर्जा या सार्वभौमिक शक्ति। भिन्न-भिन्न देशों में इस जीवनीशक्ति को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं। भारतीय इसे ‘प्राण’ के रूप में जानते हैं तो चीनी भाषा में इसी को ‘ची’ नाम से पुकारते है, मुस्लिम देशों में इसी उर्जा को बर्क एवं रूसी विद्वान इसे बाचोप्लाक्मिक उर्जा का नाम देते है। कहने का आशय यह है कि उर्जा या शक्ति मौलिक रूप से एक ही है, जिसके नाम अलग-अलग हैं। क्या आप जानते हैं कि रेकी इस सृष्टि के कण-कण में अर्थात चेतन के साथ-साथ जड़ पदार्थों में भी विद्यमान है। इसी कारण इसे सार्वभौमिक कहा गया है। यह विश्वव्यापी उर्जा अनादि तथा अनन्त है। यह कभी भी नष्ट न होने वाली अपरिमित उर्जा है। विभिन्न प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि उर्जा कभी भी नष्ट नहीं होती है, वरन उसका रूपान्तरण होता है अर्थात् वह एक रूप से दूसरे रूप में बदल जाती है। जैसा कि आप जानते भी होंगे नोबल पुरस्कार से सम्मानित डॉ. अल्बर्ट आइन्सटाइन ने एक समीकरण दिया, जिसके अनुसार निरन्तर उर्जा का पदार्थ में और पदार्थ का उर्जा में रूपान्तरण होता रहता है।

प्राचीन काल से ही उपचार की विभिन्न तकनीकें इस ब्रह्माण्डव्यापी जीवनशक्ति के स्थानान्तरण या प्रक्षेपण पर आधारित रही है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के जीवन एवं पोषण के कारण इस जीवनीशक्ति का सदियों तक उपचार में प्रयोग किया जाता रहा और आज भी जारी है। महात्मा बुद्ध, सन्त ईसा, स्वामी विवेकानंद एवं अन्य आध्यात्मिक गुरूओं एवं महात्माओं से हम भली-भाँति परिचित हैं, जिनके दिव्य स्पर्श मात्र से प्राणी स्वयं में नवजीवन का संचार अनुभव करते थे। यह सब इसी प्राण ऊर्जा के प्रभाव को परिलक्षित करते है। जो व्यक्ति जितना अधिक प्राणवान् या जीवनीशक्ति से भरपूर होता है, वह उतना ही अध्कि शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ होता है। साहस, तेजस्विता, आत्मबल, स्फूर्ति, एकाग्रता, आत्मीयता इत्यादि गुण सहज ही उसमें विकसित होते हैं।

क्या आपने कभी सोचा है कि रात्रि में ठीक प्रकार से नींद आने के बाद जब हम सुबह उठते हैं तो क्यों स्वयं को तरोताजा महसूस करते हैं। देखिये, इसका कारण यह है कि दिन-भर कार्य करने के कारण हमारा शरीर एवं चेतन मन रात्रि में विश्राम करता है अर्थात- सो जाता है किन्तु हमारा अचेतन मन निद्रा की अवस्था में भी कार्य करता है और ब्रह्माण्ड से इतनी उर्जा ग्रहण कर लेता है जिससे शरीर की टूट-फूट की मरम्मत हों सके और आवश्यक कार्यों के लिये वह ऊर्जा शरीर में संचित हो सके। कहने का आशय यह है कि उर्जा ही हमारे जीवन का आधार है। इसी से हमारी समस्त गतिविधियाँ संचालित होती है। हम स्वयं भी इस ऊर्जा से ही बने हैं। हमारा स्थूल या भौतिक शरीर और कुछ भी नहीं वरन् घनीभूत उर्जा ही है। इस स्थूल शरीर के अतिरिक्त हमारा एक ‘उर्जा शरीर’ भी होता है, जिसे रूस के विद्वानों ने ‘बायोप्लाज्मिक बॉडी’ कहा है। हम सामान्य आँखों से इस उर्जा शरीर को नहीं देख सकते। ध्यान की उच्च अवस्था में इसे देखा जा सकता है। वर्तमान समय में किर्लिचन फोटोग्राफी के माध्यम से भी इस ऊर्जा शरीर को देखना संभव है।

रेकी हमारे उर्जा शरीर से जिसे आभामण्डल (ऑरा) भी कहा जाता है, भौतिक शरीर में प्रवेश करती है। उर्जा शरीर में विद्यमान चक्र एवं नाड़ियाँ इस प्राण उर्जा को ग्रहण करते हैं तथा वहाँ से यह भौतिक शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचती हैं। योग-दर्शन के अनुसार हमारे शरीर में 72,000 नाड़ियाँ पायी जाती है, जिनमें प्राण का प्रवाह होता रहता है। एक्यूपंक्चर एवं एक्यूप्रेशर में इन्हीं नाड़ियों को मेरीडियन्स का नाम दिया गया है। इन नाड़ियों में जब तक प्राण का सुचारू प्रवाह होता रहता है तब तक व्यक्ति स्वस्थ्य रहता है और जैसे ही प्राण प्रवाह में अवरोध आता है, वैसे ही प्राण ऊर्जा के असंतुलन के कारण व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाता है क्योंकि प्राण ऊर्जा कहीं कम और कहीं ज्यादा हो जाती है। अवरोध से पहले नाड़ी में प्राण ऊर्जा का घनत्व अधिक हो जाता है और अवरोध के बाद कम। इस प्रकार रोग या बीमारी ऊर्जा शरीर में पहले आती है और बाद में स्थूल या भौतिक शरीर में। अत: यदि उर्जा शरीर में प्राण के अवरोध का किसी तरीके से पता लगा लिया जाये तो स्थूल शरीर को रोगग्रस्त होने से बचाया जा सकता है। रेकी के द्वारा इसी प्राण ऊर्जा का संतुलन किया जाता है। शरीर के जिस भाग में जितनी उर्जा की आवश्यकता होती है, उतनी ऊर्जार् वहाँ तक स्थानांतरित की जाती है। पाठक्ों, आपकी जानकारी के लिये बता दें कि रेकी की अपनी चेतना एवं बुद्धि होती है। इसका आशय यह है कि उसे यह ज्ञात होता है कि आपके किस चक्र नाड़ी एवं उनसे प्रभाविक अंगों में ऊर्जा कम है। अत: वह स्वत: उसी ओर प्रवाहित होना शुरू कर देती है और जब अपेक्षित उर्जा पहुँच जाती है, तो स्वत: उसका प्रवाह रूक भी जाता है। रेकी मास्टर रेकी का केवल माध्यम होता है और वह स्वयं की ऊर्जा नहीं वरन् ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को प्रक्षेपित करने का चैनल बनता है। अत: रेकी को घटाना या बढ़ाना रेकी चिकित्सक के बस की बात नहीं है वरन रेकी स्वयं चेतनायुक्त होने के कारण ऊर्जा का संतुलन कर व्यक्ति को स्वस्थ्य बनाती है।

रेकी के सन्दर्भ में आपको यह तथ्य भी भली-भाँति जान लेना चाहिये कि यह न तो कोई सम्मोहन विद्या है, न ही कोई तांत्रिक शक्ति, न ही किसी सम्प्रदाय से इसका कोई संबंध है, वरन यह तो एक पवित्र जीवनशैली है, जिसके अपने नियम एवं सिद्धान्त हैं, जिनको अपनाकर हम न केवल रोगों से मुक्त होते है, वरन अपना मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक विकास भी कर सकते है।

‘‘प्रेम के समान ‘रेकी’ भी एक अहसास है। प्रेम ही ऐसी शक्ति है जो हमें इस पूरी सृष्टि के साथ एकात्मभाव से मिलाती है। प्रेम में ही आत्मा का मूल वास होता है। व्यापक अर्थों में ‘रेकी’ चिकित्सा पद्धति है। इससे शरीर के विकारों का ही इलाज नहीं किया जाता बल्कि आध्यात्मिक विकास भी होता है। ‘रेकी’ चिकित्सा पद्धति का धर्म, भूत-प्रेत, रहस्य विद्या, तंत्र-मंत्र से कोई वास्ता नहीं है। न ही यह सम्मोहन विद्या है और न ही कोई अन्य मनोवैज्ञानिक तकनीक। (मोहन मक्कड़, रेकीविद्या, 2004)

‘‘रेकी मन एंव इच्छा शक्ति से निर्देशित शक्ति है, जिसे प्यार भरे दिल, सहानुभूति भरे इरादों और पूरे मनोयोग से प्रेषित किया जाये तो हमेशा अपने उद्देश्य में सफलता मिलती है। रेकी सिर्फ एक चिकित्सा पद्धति ही नहीं है, पूरा जीवन दर्शन है, इसके अपने सिद्धान्त है, जिनका पालन कर आप अपने जीवन में अपने इच्छित उद्देश्य प्राप्त कर सकते हैं, चाहे फिर वह आरोग्य, सफलता, आपसी संबंधों की मधुरता, व्यापार वृद्धि ही क्यों न हों’’ (डॉ. देवेन्द्र जैन, रेकी से चिकित्सा कैसे करे?, 2005)

‘‘रेकी दो जापानी शब्दों, रे और की से मिलकर बना है। रे का मतलब है यूनिवर्सल या सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त और की का अर्थ है-शक्ति या उर्जा। रेकी एक स्वयं चेतनायुक्त शक्ति है, जो जड़ एवं चेतन दोनों में मौजूद है।’’ (डॉ. देवेन्द्र जैन, रेकी से चिकित्सा कैसे करे?, 2005)

‘‘रेकी शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है ‘रे’ (REI) तथा ‘की’ (KI)। रे शब्द का अर्थ-’सार्वभौम’, ‘ब्रह्माण्ड, तथा की शब्द का अर्थ- ऊर्जा है।’’ (मोहन मक्कड़, रेकी विद्या, 2004)

‘‘ रेकी मूलत: जापानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है-सार्वभौमिक जैव उर्जा अथवा सर्वव्यापी जीवनशक्ति। यह जैवशक्ति सृष्टि के सभी जीवधारियों में सक्रिय होती है और विद्यमान रहती है।’’ (डॉ. आर. एस. ‘विवेक’, वैकल्पिक चिकित्सा, 2004)

‘‘रेकी एक जापानी शब्द है, जिसका अर्थ है- जीवन उर्जा। यह वैकल्पिक चिकित्सा की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।’’ (डॉ. राजकुमार प्रुथी, वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियाँ, 2005)

‘‘ रेकी हमें स्वास्थ्य से परे पूर्णता की ओर, पवित्रता की ओर ले जाती है। यह वास्तव में पवित्रतावादी उपचार विधि है। रेकी उपचार हमारे असीम उपचारों को विलीन कर देता है और हमें स्व के सभी पक्षों के स्वीकार की दिशा में अग्रसर करता है। यह रूपान्तरण की वह अवस्था है, जिसमें हम अपने स्व तथा स्व परिवेश के साथ सामंजस्य एवं संतुलन साध लेते है।’’ (डॉ. आर. एस. ‘विवेक’, वैकल्पिक चिकित्सा, 2004)

आप सोच रहे होंगे कि हम किस तरह इस रेकी विद्या से लाभान्वित हो सकते है? इसके निम्न दो तरीकों में से आप किसी को भी अपना सकते हैं- (1) स्वयं रेकी चिकित्सक के पास उपचार के लिये जाना। (2) रेकी विद्या का विधिवत अध्ययन करके।

आइये इन दोनों उपायों पर विस्तार से प्रकार डालते हैं-
  1. स्वयं रेकी चिकित्सक के पास उपचार के लिए जाना - रेकी विद्या से लाभान्वित होने का प्रथम उपाय यह है कि जो व्यक्ति रेकी मास्टर अर्थात रेकी के विशेषज्ञ हों, जिन्होंने विधिवत् इस विद्या का प्रशिक्षण प्राप्त किया है, आप उनके पास उपचार के लिये जा सकते हैं। रेकी लेने के उपरान्त व्यक्ति काफी राहत महसूस करता है।
  2. रेकी विद्या का विधिवत् अध्ययन करके - दूसरा उपाय यह है कि जो व्यक्ति इस विद्या में विशेष रूचि रखते हैं वे रेकी से संबंधित विभिन्न पाठ्यक्रमों में सम्मिलित होकर इसका विधिवत् प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं। जब तक इस विद्या का विधिवत् प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया जाता, तब तक व्यक्ति रेकी मास्टर नहीं बन सकता।
उपर्युक्त विवरण के आधार पर आप समझ गये होंगे कि हम किस तरह इस रेकी विद्या का अपने जीवन में उपयोग कर सकते हैं।

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