मनोरोग की परिभाषा एवं मनोरोग के स्वरूप

By Bandey No comments
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जिस प्रकार व्यक्ति विभिन्न प्रकार के शारीरिक रोगों से ग्रस्त रहता है, उसी प्रकार वह अनेक प्रकार के मनोरोगों से भी ग्रसित रहता है और ये मनोरोग शारीरिक रोगों की तुलना में व्यक्ति, परिवार तथा समाज के लिये अधिक कष्टकारी होते है। अब प्रश्न यह उठता है कि मनोरोग क्या है? व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य में ऐसे क्या परिवर्तन आते हैं कि वह मनोरोगी कहलाने लगता है? यदि हम मनोरोग की अवधारणा पर व्यापक ढंग से विचार करें तो यह तथ्य सामने आता है कि मनोरोग या मानसिक बीमारी वातावरण के साथ किया गया कुसमायोजित व्यवहार (Maladaptive behaviour) है। दूसरे शब्दों में हम कहें तो जब व्यक्ति मनोरोग से ग्रस्त होता है तो उसकी समायोजन क्षमता अत्यधिक घट जाती है। वह अपने आन्तरिक और बाह्य दोनों ही वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने में स्वयं को असमर्थ पाता है। मनोरोग एक असंतुलित मनोदशा की अवस्था है, जिसमें व्यक्ति का व्यवहार सामाजिक रूप से अनुकूली नहीं होता है और न ही सामान्य प्रत्याशाओं के अनुकूल होता है। सांवेदिक रूप से भी वह एक मान्य व्यवहार बनाये रखने में समर्थ नहीं होता है। अत: उसमें नैदानिक हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

मनोरोग के स्वरूप

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कोमर के मतानुसार चारडी (Four D’S) के द्वारा मनोरोग के स्वरूप को और अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।

  1. विचलन-मनोरोग की स्थिति में व्यक्ति का व्यवहार असामान्य हो जाता है, जो सामाजिक मानकों के अनुकूल नहीं होता है। इसे ही विचलन की संज्ञा दी गर्इ है।
  2. तकलीफ-मनोरोग की अवस्था में व्यक्ति का व्यवहार ऐसा हो जाता है, जो स्वयं उसके लिये अत्यन्त-दु:खदायी बन जाता है। 
  3. दुष्क्रिया-मानसिक बीमारी की स्थिति में रोगी के शरीर या मन का कोर्इ हिस्सा उस तरह से कार्य नहीं कर रहा होता, जिस तरह से उसे कार्य करना चाहिये। इसके कारण व्यक्ति को अपने दिन-प्रतिदिन के कार्यों को करने में भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और यह स्थिति व्यक्ति को इतना अधिक परेशान कर देती है कि वह साधारण सामाजिक परिस्थितियों और कार्यों में भी अपने आपकों पर्याप्त रूप से समायोजित नहीं कर पाता है।
  4. खतरा-मनोरोग की स्थिति में व्यक्ति द्वारा किया जाना वाले व्यवहार स्वयं अपने लिये तो खतरनाक होता ही है, इसके साथ-साथ दूसरे लोगों के लिये भी खतरा ही उत्पन्न होता है। अनेक मनोरोग ऐसे होते हैं, जिनमें व्यक्ति का व्यवहार अत्यन्त हिंसात्मक हो जाता है। ऐसे लोग स्वयं को भी चोट पहुँचा सकते हैं और दूसरों को भी। इसके अतिरिक्त मनोरोगियों का व्यवहार गलत निर्णय, कुव्यवस्था, द्वेष इत्यादि से ग्रस्त होने के कारण भी खतरनाक होता है।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मनोरोग एक असंतुलित मनोदशा की अवस्था होती है, जिसमें व्यक्ति के शरीर या मन का कोई भाग उस ढंग से कार्य नहीं कर रहा

होता है, जिस ढंग से सामान्य स्थिति में करता है और इसके कारण रोगी सामाजिक एवं सांवेगिक रूप से मान्य व्यवहार बनाये रखने में स्वयं को असमर्थ पाता है अर्थात उसका व्यवहार कुसमायोजी हो जाता है।

अत: इस स्थिति से उत्पन्न भाव, विचार एवं व्यवहार व्यक्ति के लिये अत्यन्त दु:खदायी अथवा विघटनकारी होता है।

मनोरोग की परिभाषा 

मनोरोग के स्वरूप को स्पष्ट करते हुये मनोवैज्ञानिकों ने अनेक परिभाषायें दी है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं-

  1. डेविड मेंकानिक के अनुसार-‘‘मानसिक बीमारी एक तरह का विचलित व्यवहार है। इसकी उत्पत्ति तब होती है जब व्यक्ति की चिंतन प्रक्रियायें, भाव एवं व्यवहार सामान्य प्रत्याशाओं या अनुभवों से विचलित होता है तथा प्रभावित व्यक्ति या समाज के अन्य लोग इसे एक ऐसी समस्या के रूप में परिभाषित करते हैं, जिसमें नैदानिक हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।’’
  2. DSM-IV (1994)- के अनुसार – DSM-IV में प्रत्येक मानसिक विकृति को एक नैदानिक रूप से सार्थक व्यवहारपरक या नैदानिक संलक्षण या पैटर्न जो व्यक्ति में उत्पन्न होता है, के रूप में समझा गया है और यह वर्तमान तकलीफ या अयोग्यता से संबंधित होता है। चाहे वर्तमान समय में व्यक्ति में व्यवहारपरक, मनोवैज्ञानिक या जैविक दुष्क्रिया की अभिव्यक्ति अवश्य माना जाता है। न तो कोर्इ विचलित व्यवहार, (जैसे-राजनैतिक, धार्मिक या लैंगिक) और न ही व्यक्ति तथा समाज के बीच होने वाले संघर्ष को मानसिक रोग माना जा सकता है, अगर ऐसा विचलन या संघर्ष व्यक्ति में दुष्क्रिया का लक्षण न हो।’’
  3. (APA:DSM, 1994, XXI-XXII)
    ब्राउन (1940) के अनुसार
    , ‘‘मनोरोग सामान्य व्यवहार का ही अतिरंजित रूप अथवा विकृत रूप है।’’

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