संचार की प्रक्रिया, तत्व एवं कार्य

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एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक सूचना प्रवाहित करने और उसे समझने की प्रक्रिया संचार है। संचार की प्रक्रिया में 6 आधारभूत तत्व समाहित रहते हैं। यह तत्व हैं- प्रेषक (संकेतक), संदेश, माध्यम, प्रापक (विसंकेतक), शोर व प्रतिपुष्टि। यह तत्व संचार को प्रभावी बनाने में किस प्रकार सहायक हैं और आप इनको किस प्रकार प्रयोग कर सकते हैं इनकी जानकारी होने पर कोई भी व्यक्ति अपना संचार कौशल विकसित कर सकता है।

सबसे पहले प्रेषक संचार की प्रक्रिया की शुरुआत करता है। प्रेषक यह सुनिश्चित करता है कि उसे कौन सा अर्थ प्रेषित करना है। इसके बाद वह उसे ऐसे चिह्नों व संकेतों में परिवर्तित करता है जिनको कि संदेश प्राप्त करने वाला समझ सके। (प्रापक उस अर्थ को कितना ग्रहण कर पाता है, यह उस पर निर्भर करता है, लेकिन प्रेषक यही सोचकर संकेतों का चयन करता है कि वह प्रापक की समझने की भाषा है।) अर्थों को संकेतों में ढालने की यह प्रक्रिया संकेतीकरण कहलाती है। अब प्रेषक के पास संदेश तैयार है। फिर वह तय करता है कि संदेश किस माध्यम से प्रापक तक पहुंचाया जाए। संदेश वह सूचना या अर्थ है, जिन्हें प्रेषक प्रापक तक भेजना चाहता है। संचार का माध्यम बोले गए शब्द, लिखित या मुद्रित सामग्री इत्यादि हो सकता है। मौखिक संचार आमतौर पर अनौपचारिक होता है। आधिकारिक भाषणों, कार्यालयीन सम्मेलनों इत्यादि को छोडकर यह सामान्यतया व्यक्तिगत प्रकृति का होता है। जबकि कार्यालयों या फिर जब संचार काफी लोगों के साथ जुडòा हुआ हो तो इसे लिखित स्वरूप में किया जाता है। इंटर आफिस मेमो इत्यादि को अनौपचारिक पडòताल और जवाब इत्यादि के रिकार्ड के लिए संभाला जाता है। व्यक्तिगत पत्रों के अलावा सभी पत्र काफी औपचारिक प्रकार के होते हैं।

सूचनाओं के आदान-प्रदान व संचार की आवश्यकता को काफी समय तक समय और स्थान की सीमाएं बांध नहीं पार्इं। ई मेल, वायस मेल, फैक्स इत्यादि ने संचार और ज्ञान की सहभागिता को बढòावा दिया है। कम्प्यूटर के माध्यम से लिखित संदेश के प्रसार की प्रक्रिया ई मेल है। वहीं डिजीटल प्रणाली में रिकार्ड आवाज का प्रसारण इत्यादि वायस मेल है। अब तो हमारे पास काफी संख्या में जनमाध्यम भी उपलब्ध हैं।

मौखिक संचार में अनौपचारिक बैठक, सुनियोजित सभा और जनसभा को शामिल किया जाता है। इस संचार में वक्ता की आवाज और प्रस्तुतिकरण की शैली काफी अन्तर पैदा करती है। दैनंदिन कार्य, निर्देशन, सूचनाओं का आदान-प्रदान और अन्तव्यर्ैक्तिक संबंधों में गर्माहट रखने के लिए अनौपचारिक बातें होना काफी आवश्यक है। आजकल सूचना प्रौद्योगिकी ने हम सबके संचार करने के तौर तरीकों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिए हैं। इंटरनेट व अन्य इलैक्ट्रानिक माध्यमों ने हमें किसी भी वक्त किसी भी स्थान से सूचना प्राप्त करने लायक बना दिया है।

यहां इससे संबंधित कुछ शब्दों का विवरण दिया गया है। प्रापक वह व्यक्ति या समूह है, जिसे संदेश पहुंचाने के लिए संचार की सारी कवायद की गई। संचारित संदेश में कुछ खलल पैदा करने वाली सभी चीजों को शोर की श्रेणी में रखा जाएगा। प्रतिपुुष्टि यह सुनिश्चित करती है कि संचार की प्रक्रिया में आपसी सहमति का निर्माण हुआ है। प्रापक से प्रेषक की तरफ कुछ सूचनाएं जाने की प्रक्रिया प्रतिपुष्टि कहलाती है।

संचार के तत्व

हम पहले ही बात कर चुके हैं कि संचार एक प्रक्रिया है और किसी भी प्रक्रिया के पूरे होने में कुछ तत्व सहायक भूमिका निभाते हैं। यहां हम संचार की प्रक्रिया के तत्वों की बात करेंगे। संचार की प्रक्रिया का सबसे पहला तत्व है स्रोत। इसको प्रेषक व संचारकर्ता भी कहा जाता है। लेकिन संचार की प्रक्रिया का अध्ययन करने पर हमें पता चलता है कि प्रेषक सिर्फ संदेश भेजता ही नहीं, बल्कि वह संदेश ग्रहण भी करता है।

संचार की प्रक्रिया का दूसरा तत्व प्रापक है। वह संदेश प्राप्त करता है और उसमें निहीत अर्थ को समझने के लिए उसका विसंकेतीकरण करता है। यहां गौर करने लायक बात यह है कि प्रापक सिर्फ संदेश ग्रहण ही नहीं करता, अपितु वह संदेश भेजता भी है। संचार की चक्रीय प्रकृति के कारण स्रोत व प्रापक के बीच भूमिकाओं की अदला-बदली चलती रहती है। भूमिकाओं की इस अदला-बदली के चलते हम लंबे समय तक स्रोत व प्रापक शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकते। संचार के इन दो तत्वों को दर्शाने के लिए हम प्रतिभागी शब्द का प्रयोग कर सकते हैं। संचार में भाग लेने वाले स्रोत व प्रापक को प्रतिभागी कहने के पीछे कारण यह है कि संचार काफी प्रतिभागी, लोकतांत्रिक व समायोजक प्रकृति का होता है।

संचार का अगला तत्व है संदेश। संदेश शाब्दिक या अशाब्दिक दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। संदेश आमतौर पर ऐसी भाषा में होता है, जिसे सभी प्रतिभागी समझ सकें। यह मौखिक, लिखित, मुद्रित, दृश्य या दृश्य-श्रव्य किसी भी स्वरूप में हो सकता है।

इसके बाद बारी आती है माध्यम की। यह वह माध्यम है, जिससे हम संदेश को प्रसारित करते हैं। डाक या जनसंचार के किसी भी माध्यम से संदेश प्रसारित किया जा सकता है। प्रतिपुष्टि संचार का अगला तत्व है। यह संदेश के प्रापक भागीदार द्वारा व्यक्त की गई प्रतिक्रिया है, जो कि प्रेषक के पास भेजी जाती है। प्रेषक भागीदार को प्रतिपुष्टि या तो उसी माध्यम से भेजी जाती है, जिससे उसने संदेश भेजा था या फिर प्रापक (जो अब प्रेषक की भूमिका में है) अपनी मर्जी से किसी और माध्यम का चुनाव कर सकता है। संचार की प्रक्रिया को निरंतर चलाए रखने में प्रतिपुष्टि काफी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

शोर भी संचार का एक महत्वपूर्ण तत्व है। यह कुछ और नहीं बल्कि संचार की राह में आने वाले अवरोधक हैं। यह अवरोधक भौतिक या बौद्कि दो प्रकार के हो सकते हैं। इनको संदेश में खलल माना जाता है और एक हद तक इनको नियंत्रित भी किया जा सकता है।

अब हम समझ चुके हैं कि संचार चक्रीय व अन्योन्यक्रियात्मक प्रक्रिया है। कभी भी निर्वात में संचार नहीं हो सकता है। इसके लिए विभिन्न तत्वों की आवश्यकता होती है। विभिन्न परिस्थितियों और उनमें संचार के विभिन्न तत्वों की मौजूदगी के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि संचार चार स्तरों पर होता है। संचार के यह चार स्तर इस प्रकार हैं:
  1. अन्त:व्यैक्तिक संचार
  2. अन्तव्र्यैक्तिक संचार
  3. समूह संचार
  4. जनसंचार
संचार के इन चार स्तरों या संदर्भों को आमतौर पर संचार के प्रारूप कहा जाता है। यह चारों स्तर प्रतिभागियों की संख्या, प्रतिभागियों के बीच अपनेपन का भाव, बढती जटिलता और प्रतिपुष्टि की प्रकृति इत्यादि के आधार पर एक-दूसरे से भिन्न हैं।

संचार की प्रक्रिया 

पिछले भाग में आपने संचार के तत्वों के बारे में जानकारी प्राप्त की। संचार के यह तत्व इस प्रकार हैं:
  1. स्रोत या प्रेषक
  2. संदेश
  3. माध्यम
  4. प्रापक
  5. प्रतिपुष्टि
  6. शोर
आइए अब देखते हैं कि संचार की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी होती है। यह प्रक्रिया नीचे दर्शायी गई है।
सूचना का स्रोत या प्रेषक
संचार करने का निर्णय लेता है और
एक संदेश का संकेतीकरण करता है
और उसे किसी माध्यम से प्रसारित करके
प्रापक तक पहुंचाता है।
इसके बाद प्रापक संदेश का विसंकेतीकरण करता है
और संदेश पर उसके मस्तिष्क में क्रिया होती है।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान संदेश में कुछ शोर या खलल भी जुडò जाते हैं।
प्रापक संदेश पर क्रिया के बाद प्रेषक को अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करवाता है।
संदेश पाने वाले की यह प्रतिक्रिया प्रतिपुष्टि होती है।

तो, संदेश का प्रेषक जिसे संकेतक भी कहते हैं, उससे संचार की प्रक्रिया की शुरुआत होती है। संचारकर्ता संदेश को मनचाहा स्वरूप या शक्ल प्रदान करते हुए उसका संकेतीकरण करता है। प्रसारण के माध्यम से संदेश को संचारित किया जाता है।

संदेश प्रसारित करने के लिए एक माध्यम या यंत्र की आवश्यकता होती है। यह माध्यम रेडियो, टीवी, समाचार-पत्र या पत्रिका इत्यादि कुछ भी हो सकता है। संदेश के संकेतीकरण की प्रक्रिया में विचारों व अर्थों को इस अंदाज में जचाया जाता है कि प्रापक उन्हें आसानी से समझ सके। टेलीग्राफ की प्रक्रिया से इतर यहां संकेतक एक आदमी ही होता है। वह संदेश की अन्तर्वस्तु निर्धारित करता है। इसी प्रकार विसंकेतक या प्रापक वह लक्ष्य है, जिसके लिए संदेश का निर्माण किया जाता है। दो संचार शास्त्रियों शैनन व वीवर ने संचार की प्रक्रिया को एक नए स्वरूप में परिभाषित किया। उनके द्वारा बताई गई प्रक्रिया को नीचे दिखाया गया है।
संचारक या प्रेषक
संकेत (संदेश)
भेजता है
एक यांत्रिक या बोधी स्रोत या माध्यम से।
यह संदेश
प्रापक तक पहुंचता है
जो कि इसकी प्रतिपुष्टि
जिसमें कि यांत्रिक व बोधी शोर भी शामिल होता है, वापस भेजता है।
यह प्रक्रिया इसी प्रकार चलती रहती है।
संदेश में पैदा होने वाला कोई भी खलल शोर माना जाएगा। शोर यांत्रिक या बौद्धिक दो प्रकार के हो सकते हैं। संचार की प्रक्रिया के दौरान संदेश का कुछ भाग क्षतिग्रस्त होना अनिवार्य है। यह क्षति मानवीय भूल, अस्त-व्यस्त परिस्थितियां या व्यवस्था में कुछ खामियों के चलते हो सकती है। संदेश में जो भी खलल आया हो प्रापक तो जिस स्वरूप में संदेश का विसंकेतीकरण करता है, उसी स्वरूप में वह उसके मूल्यों और महत्व को समझेगा।

एक अन्य संचार विशारद लारेंस डी. बेरनान का मत है कि ‘विचारों या भावनाओं के संचार की प्रक्रिया में कई तत्व समाहित रहते हैं। उस संचार के प्रेषक और प्रापक, किसी प्रकार की सोच, व्याख्या, संचार में प्रापक पक्ष की तरफ से जताया गया जवाब, प्रेषक और प्रापक को आपस में जोडòने के लिए कोई रिश्ता या माध्यम और संचार शुरू होने के लिए वांछित परिस्थितियां आदि वे तत्व हैं जो कि संचार के दौरान आवश्यक होते हैं।’

संचारकर्ता, प्रापक, उद्देश्य, अभिव्यक्ति, सोच, व्याख्या, जवाब, माध्यम और उचित अवसर इत्यादि वे तत्व हैं जो कि संचार की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आवश्यक होते हैं। जैसा कि हम जानते हैं संचार सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। इसलिए यह आवश्यक है कि प्रेषक जिस बात को कहना चाहता है प्रापक संदेश को उन्हीं अर्थों में ग्रहण करे। अत: संचार प्रेषक से शुरू होता है। संदेश का संकेतीकरण करके प्रेषक संचार की प्रक्रिया को शुरू करता है। यह प्रेषक का ही दायित्व है कि वह सूचनाओं को इस प्रकार जचाए कि प्रापक को वह अच्छी तरह से समझ में आ जाए। संदेश स्पष्ट और संक्षिप्त होना चाहिए और उसमें अनावश्यक रूप से जटिल शब्दावली का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। संकेतीकरण भी कई प्रकार से किया जा सकता है। मौखिक, लिखित, अंकीय, ग्राफिक्स, शारीरिक भाषा इत्यादि कई माध्यम हो सकते हैं, जिनके द्वारा संदेश का संकेतीकरण करके उसे प्रापक तक पहुंचाया जाए। संकेतीकृत संदेश प्रसारण के लिए तैयार होता है।

वह प्रक्रिया जो कि प्रापक तक संदेश पहुंचाने का काम करती है, प्रसारण कहलाती है। इसके भी कई प्रकार हो सकते हैं।
  1. ध्वनि तरंगे, आमने सामने की मौखिक बातचीत
  2. इलैक्ट्रानिक, टेलिफोन, ई मेल इत्यादि
  3. वायु तरंगे, मोबाइल फोन, टीवी इत्यादि
संदेश पहुंचा या नहीं, यह सुनिश्चित करना भी प्रेषक की ही जिम्मेदारी बनती है। वह इस बात की पडòताल करता है कि प्रापक ने संदेश को सही अर्थों में ग्रहण किया है या नहीं। संदेश प्राप्त होने के बाद प्रापक द्वारा उस पर की जाने वाली क्रिया विसंकेतीकरण हैै।

संचार के कार्य 

डेविड बर्लो के अनुसार संचार का मुख्य उद्देश्य मानव को अपनी आधारभूत आवश्यकताओं व दैनंदिन जरूरतों की पूर्ति के काबिल बनाना है। इसमें आदेश देने, प्रार्थना करने व दूसरों की प्रार्थनाओं पर गौर करने की योग्यताएं शामिल हैं।

बर्लो आगे कहते हैं: ‘संचार हमें सामाजिक संगठनों, आर्थिक संबंधों, सांस्कृतिक मूल्यों इत्यादि को समझने की क्षमता प्रदान करता है।’ यह आवश्यक है कि किसी भी संचार का उद्देश्य और उसके संदेश की अन्तर्वस्तु मनुष्यों की आम जिन्दगी के लिए प्रासंगिकता रखने वाले होने चाहिएं। संचार के क्रियात्मक भाग को प्रदर्शित करने के लिए हार्लोल्ड लासवैल ने यह प्रतिमान सुझाया था:
किसने
क्या
किस माध्यम से
किसको
किस प्रभाव के साथ कहा
(हार्लोल्ड लासवैल का संचार का प्रतिमान)
लासवैल ने कहा था कि यह सभी चरण क्रियात्मक स्तर पर संचार की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। प्रभाव पर उनका इतना बल एक बार फिर संचार की क्रियात्मकता को ही दर्शाता है। मोटे तौर पर देखें तो संचार कार्य करता है:
  1. सूचना देना
  2. शिक्षा देना
  3. मनोरंजन
  4. किसी काम के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना 
कई लोग इस शृंखला में ज्ञानोदय के नाम से पांचवां कार्य भी जोडते हैं।
इसके अलावा भी संचार के कुछेक अतिरिक्त कार्य हैं। यह कार्य इस प्रकार हैं:
  1. मूल्यांकन
  2. दिशा निर्देशन
  3. प्रभावित करना
  4. अभिविन्यास करना
कोई भी संचार की रूपरेखा तैयार करते वक्त उपरोक्त में से कुछ कामों को उद्देश्यों में अवश्य शामिल किया जाता है। उपर्युक्त काम सही तरीके से पूरे हों इसके लिए संचार की ऐसी रूपरेखा तैयार करना आवश्यक है जो कि प्रापक का ध्यान अपनी तरफ खींचे। ऐसे चिह्नों और संकेतों का प्रयोग किया जाना चाहिए, जो कि प्रापक को आसानी से समझ में आ जाएं। यह प्रापक में कुछ आवश्यकताएं जागृत करे और उनकी पूर्ति के लिए उसको रास्ता सुझाए। ऐसी अवस्था में ही संचार वांछित परिणाम दे सकता है। हालांकि हमें संचार व जनसंचार में भेद को नहीं भूलना है। संचार व जनसंचार में फर्क है।
  1. सूचनाओं के आदान-प्रदान, सहभागिता इत्यादि की प्रक्रिया को हम संचार कहते हैं।
  2. जनसंचार में पेशेवर संचारकर्ताओं का एक समूह संदेश को लगातार, त्वरित गति से व व्यापक दायरे तक पहुंचाने के लिए जन माध्यमों का प्रयोग करते हैं। इसमें एक व्यापक दायरे में लोगों तक एक संदेश पहुंचाकर उन्हें किसी न किसी स्तर पर प्रभावित करने की चेष्टा की जाती है।
अन्तव्यर्ैक्तिक संचार में सूचनाओं की सहभागिता, कुछ जानकारी देकर या अपने जोरदार पक्ष को रखकर प्रापक को प्रभावित करना मूल उद्देश्य होता है। यदि एक व्यक्ति अपने मत इत्यादि के प्रति किसी को जीतने में कामयाब हो गया है तो संचार को सफल माना जाएगा।

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