विवाह की परिभाषा एवं प्रकार

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मुरडॉक के संदर्भ में बोटोमोर कहते हैं कि एक पति-पत्नी विवाह लगभग सभी समाजों में पाया जाता है। यह इसलिए होता है कि इस विवाह में लैंगिग साथी समान अनुपात में होते हैं। बहु पति प्रथा-एक पत्नी के दो या अधिक पति का अपवाद रूप में मिलता है। मुरडॉक तो इसे नृ-जातीय उत्सुकता कहते हैं। ऐसे विवाह की एक विशेषता यह है कि इसमें बालिका हत्या अधिक होती है। हमारे देश में दक्षिण भारत में जहां टोडा आदिवासी पाये जाते है बहुपति विवाह मिलता है। इस प्रथा का मुख्य कारण पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का अनुपात कम होता है। बहुपति की तरह बहुपत्नी विवाह भी एक ऐसा स्वरूप हैं जो थोड़े बहुत रूप में सभी समाजों में पाया जाता है।

विवाह की परिभाषा 

समाजशास्त्रियों ने, और विशेष करके सामाजिक मानवशास्त्रियों ने विवाह की संस्था पर पर्याप्त कार्य किया है। जहां हम विवाह की कतिपय परिभाषाएं देंगे।
  1. हेरी.एम. जॉनसन : यह एक स्थिर सम्बन्ध है जिसकी अनुमति, समुदाय के मध्य अपनी स्थिति को खोये बिना, पुरुष तथा स्त्री को समाज प्रदान करता है। इस तरह के स्थिर सम्बन्ध की दो और शर्तें है : यौन संतुष्टि तथा बच्चों का प्रजजन।
  2. जी.पी. मुरडॉक : एक साथ रहते हुए नियमित यौन सम्बन्ध और आर्थिक सहयोग रखने को विवाह कहते हैं। इस तरह विवाह के मूलभूत तत्व है : स्त्री तथा पुरुष के बीच में समाज द्वारा अनुमोदित पति-पत्नी के रूप में नियमित यौन सम्बन्ध, उनका एक साथ रहना, बच्चों का प्रजनन, और आर्थिक सहयोग।
  3. बोगारडस : विवाह स्त्री और पुरुष के पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने की एक संस्था है। वास्तव में विवाह की परिभाषा समाज के संदर्भ में की जाती है। उदाहरण के लिए यूरोप और अमेरिका के समाजों में विवाह को सापेक्षिक रूप में कम स्थायी समझते हैं। इन समाजों में विवाह करना आवश्यक हो, ऐसा भी कुछ नहीं है। जैसा कि हमने इस अध्याय के प्रारंभ में कहा समाज में विवाह नहीं करना अपवाद समझा जाता है। भारत और इसके आसपास के देशों में विवाह लगभग स्थायी होता है। यह तो पिछले जन्म में ही तय हो जाता है। कापड़ियां ने हिन्दु विवाह को दो टूक शब्दों में पारिभाषित किया है: हिन्दू विवाह एक संस्कार है, धार्मिक कृत्य है।
ब्राह्मणों, महाकाव्यों और पुराणों में यह आग्रहपूर्वक कहा गया है कि हिन्दुओं में विवाह एक धार्मिक क्रिया है और सामान्यतया अविभाज्य है। हिन्दू जातियां विवाह को धार्मिक इसलिए समझती है कि इसका उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति होता है। इसके बाद दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य सन्तानोत्पति है। सन्तान के बिना पीढ़िया नहीं चलती। यह सब विवरण देने से हमारा तात्पर्य यही बताना है कि विवाह की परिभाषा सर्वसम्मत रूप में नहीं दी जा सकती। इसे पारिभाषित करने के लिए किसी निश्चित समाज का संदर्भ अवश्य देना होता है। जब हम विवाह को पारिभाषित करते हैं तब हमें एक ओर बात कहनी हैं। जहां विवाह का सम्बन्ध समाज से होता है, वहीं विवाह परिवार से भी जुड़ा हुआ है। यह बहुत रुचिकर होगा कि हम यहां विवाह और परिवार के सम्बन्धों की चर्चा करें।

विवाह के प्रकार 

विवाह के प्रकारों को हम पति और पत्नी की संख्या के आधार पर निश्चित करते हैं। सामान्यतया दुनियाभर के समाजों में विवाह के दो प्रकार प्रचलित हैं :
  1. एक विवाह और 
  2. बहु विवाह । 
बहुविवाह के दो भेद हैं : (1) बहुपति विवाह, और (2) बहुपत्नी विववाह।

एक विवाह 

एक विवाह से तात्पर्य है, एक समय में एक व्यक्ति एक ही स्त्री के विवाह करता है। इसके अन्तर्गत वे विवाह भी आते हैं जिनमें एक पत्नी की मृत्यु हो जाने के बाद या विवाह विच्छेद की स्थिति में दूसरी स्त्री से विवाह किया जाता है। एक विवाह या बहुविवाह का सम्बन्ध व्यक्ति से न होकर समाज से होता है। इसका तात्पर्य यह है कि समाज ही एक विवाही या बहुविवाही होता है। इस सम्बन्ध में लूसी मेयर का कहना है : एक विवाही और बहु विवाही शब्द विवाह या समाज के लिए प्रयुक्त होते हैं, व्यक्तियों के लिए नहीं। निष्ठाहीन पति या कामाचारी व्यक्ति को बहु विवाही कहना भाषा के साथ खिलवाड़ करना है, यद्यपि कुछ लोग ऐसा करते हैं।

जहां स्त्री और पुरुष की संख्या में लगभग समान अनुपात होता है एक विवाह प्रचलित होता है। यद्यपि ऐसा हमेशा होना आवश्यक नहीं है। उद्विकासवादियों ने एक विवाह को परिवार एवं विवाह से उद्विकास का अंतिम चरण माना है। आज के समाज में विवाह के विभिन्न भेदों में एक विवाह को सर्वोच्च प्रतिमान के रूप में प्रतिष्ठित किया है। एशिया और अफ्रीका में भी सामान्यतया बहुसंख्यक लोगों में एक विवाह की प्रथा प्रचलित है।

बहुविवाह 

बहुपति विवाह 

इस विवाह में एक ही समय में एक स्त्री एक से अधिक पुरुषों से विवाह करती है। कई बार हमारे यहां इसे बहुपति विवाह भी कहते हैं। रिवर्ज ने जो ब्रिटिश मानवशास्त्री थे, दक्षिण भारत के टोडाओं में काम किया था। वे बहुपति प्रथा को जो टोडाओं में आज भी प्रचलित है, इस भांति पारिभाषित करते हैं : एक स्त्री का कई पतियों के साथ विवाह सम्बन्ध बहुपति विवाह कहलाता है। सामाजिक मानवशास्त्र में मैक्लैनन पहले विद्वान है जिन्होंने बहुपति विवाह की जानकारी दी थी। आज भी कई समाजों में बहुपति विवाह मिलते हैं। उत्तरी अमेरिका की अलस्कान, एस्किमों, अमेरीकन-इण्डियन, मलाया आदि में बहुपति प्रथा मिलती है। भारत में देहरादून, जोनसर बावर परगना तथा शिमला की पहाड़ियों, टिहरी गढ़वाल में रहने वाले खस राजपूतों, नीलगिरी की पहाड़ियों में निवास करने वाले टोडा और मालाबार के नायरों में बहुपति प्रथा प्रचलित है। बहुपति प्रथा के प्रचलन के अनेक कारण है। वेस्टरमार्क का मत है कि बहुपति प्रथा का मुख्य कारण पुरुष व स्त्री के अनुपात में असंतुलन होना है। कई बार असंतुलन के ठीक होने पर भी विवाह का यह विशेष प्रकार का रूप ले लेता है।

बहुपत्नि विवाह 

जब एक ही समय में एक पुरुष एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करता है तो इसे बहुपत्नी विवाह कहते हैं। पिछले दिनों में हमारे देश में राजा-महाराजा एक ही समय में कई स्त्रियों से विवाह करते थे। राजा दशरथ की तीन रानियां थी। मुसलमानों में तो एक व्यक्ति एक ही समय में अधिकतम चार स्त्रियों से विवाह कर सकता है। जहां ये बेंगमे निवास करती है उस स्थान को हरम कहते हैं। जहां रानियां निवास करती थी उसे रनिवास कहते थे।

आज दुनियाभर में बहुपत्नी विवाह समाप्ति के हाशिये पर आ गया है। भारत के आदिवासी जिसमें यह प्रथा सामान्य बात थी, उनमें भी इसका लोप होने लगा है। देखा जाये तो दुनियाभर में थोड़े बहुत अपवाद को छोड़कर एक विवाह सामान्य स्टेण्डर्ड है।

विवाह के नियम 

विवाह का कोई भी प्रकार हो, इसके कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना होता है। सभी समाजों में सामान्यता विवाह के दो नियम पाये जाते हैं :
  1. अन्तर्विवाह और 
  2. बहिर्विवाह। 

अन्तर्विवाह  

इस विवाह में एक जाति, जनजाति, समूह अथवा समुदाय के सदस्य ही समूह में विवाह करते हैं। ब्राह्मण, ब्राह्मणों में विवाह करेगा और संथाल, संथाल जनजाति में। इसी कारण जाति की पहचान अन्तर्विवाह है। कई बार विशेष जाति या जनजाति को अन्र्तवैवाहिकी भी कहते है। अन्तर्विवाह के पीछे सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक समूह अपने समूह की पहचान बनाये रखना चाहता है, उसकी शुद्धता को अखण्ड करना चाहता है। अन्तर्विवाह के कारण समूह की सांस्कृतिक और एथिनक विशेषता बनी रहती है। यह सिद्धान्त समूह की उच्चता और निम्नता की भावना को विकसित करके सामाजिक गैर-बराबरी को बनाये रखता है। हमारे देश में अन्तर्विवाह भावना के कारण ही कई शताब्दियों तक दलित, दलित ही बने रहे। यूरोप और अमेरीका में काले लोगों की पद दलित स्थिति बहुत बड़ी सीमा आज भी विवाह के इसी नियम के कारण बनी हुई है।

बहुर्विवाह 

 विवाह का यह नियम अन्तर्विवाह के एकदम विपरीत होता है। यह होते हुए भी ये दोनों नियम एक साथ प्रजाति और जाति पर लागू होते हैं। जाति व्यवस्था के अन्तर्गत एक जाति के सदस्यों से अपेक्षा की जाती है। कि वे अपनी ही जाति के अन्तर्गत विवाह करें लेकिन इसके साथ ही साथ उनसे बहिर्विवाह की भी अपेक्षा की जाती है कि वे अपने निकट सम्बन्धियों, एक ही रक्त सम्बन्धियों, अपने गोत्र, पिण्ड तथा प्रवर के बीच में विवाह न करें। ऐसी प्रथा जनजातियों कृषकों तथा औद्योगिक समाजों में समान रूप से विद्यमान है। भारत की जनजातियों में तो ग्राम बहिर्विवाह का नियम भी सख्ती से लागू होता है। इस नियम के अनुसार यह आदिवासी अपने गांव से अपने जीवन साथी का वरण नहीं करता। एक बार वेस्टर मार्क ने अपने नाई से पूछा, ‘‘तुम्हारी उम्र बहुत हो गयी है, तुम विवाह क्यों नहीं कर लेतें? तुम्हारें गांव में तो लड़कियों की कोई कमी नहीं है।’’ इसके उत्तर में नाई ने तपाक से कहा : ‘‘इस गांव की लड़कियां? मैं इन सबको जानता हूँ। वे एकदम निकम्मी है।’’ वेस्टरमार्क ने एक आनुभविक दृष्टान्त का प्रमाण भी दिया है। उन्होंने बताया कि लंदन की एक सड़क के दोनों तरफ लड़के-लड़कियों के हाई स्कूल थे। दोनों में सहशिक्षा थी। रुचिकर बात यह थी कि एक स्कूल के लड़के अपनी स्कूल लड़कियों को छोड़कर सामने वाले स्कूल की लड़कियों से प्रेम करते थे। उनके स्वयं के स्कूल में तो लड़कियां थी, वे उनसे प्रेम क्यों नहीं करते? लड़कों का जबाव था : ‘‘हमारे स्कूल की लड़कियां? वे निकम्मी है।’’

तथ्य यह है कि गांव बहिर्विवाह के नियम के पीछे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदमी हमेशा अपने को बहादुर और पुरुषाथ्र्ाी समझता है। दूसरे गांव की लड़की लाना उसकी बहादुरी है। इसके अतिरिक्त दूसरे गांव की लड़की के प्रति या लड़के के प्रति बड़ी उत्सुकता भी होती है। विवाह के उपरोक्त दो नियम सभी समाजों में देखने को मिलते है। इनके अतिरिक्त विवाह करते समय दुनियाभर के समाजों में यह कोशिश की जाती है कि अपने से ऊंची स्थिति के लोगों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये जाये। समाजशास्त्र में इस तरह की विवाह पद्धति को कुलीन विवाह की संज्ञा दी जाती है। कुलीन विवाह की पद्वति जातियों, जनजातियों और प्रजातियों में बराबर देखने मिलती है। विशेष रूप से यह सिद्धान्त लड़की के विवाह के लिए ही व्यवहार में लाया जाता है। बंगाल की उच्च हिन्दु जातियों में कुलीन विवाह की प्रथा कभी प्रचलित थी। कम उम्र की लड़कियों का विवाह कुलीन विवाह की परम्परा के अनुसार वृद्ध लोगों के साथ कर दिया जाता है।

विवाह और परिवार में परिर्वतन 

ऊपरा हमने देखा कि विवाह व्यवस्था के दो बुनियादी सिद्धांत है : (1) अन्तर्विवाह और (2) बहिर्विवाह। अपनी जाति या प्रजाति में विवाह करना अन्तर्विवाह है और अपने गोत्र, पिण्ड या गांव के बाहर विवाह करना बहिर्विवाह है। इन दो सिद्धान्तों में जब परिवर्तन आता है तो यह विवाह में परिवर्तन है। हाल के सामाजिक परिवर्तन और विशेषकर के प्रजातंत्र और आधुनिकता के संदर्भ में विवाह की बुनियादी संरचनाओं में परिवर्तन आया है। हमारे देश में तो आजादी की लड़ाई के दौरान यह जागृति आयी है कि हमें जाति और साम्प्रदायिकता की सीमा से बाहर आकर एक भारतीय की तरह अपनी पहचान बनानी चाहिए। इस तरह की चेतना ने अन्तर्जातीय विवहों को प्रोत्साहित किया। धर्म की दीवारों को भी लाँघा गया और मुसलामानों में विवाह होने लगे। स्वयं मोहम्मद अली जिन्ना एक पारसी लड़की से विवाह किया। हिन्दु और मुसलमानों में भी इस तरह के विवाह हुए जिसे हम अन्तर्जातीय विवाह करते हैं। वह भी विवाह के नियमों का उल्लंघन है। यह अवश्य है कि अब भी निकटाभिगमन पर प्रतिबंध है लेकिन यह एक सामान्य प्रवृत्ति बन गयी है कि लोग अपनी जाति से बाहर विवाह नहीं करते।

विवाह और तलाक 

विवाह की संस्था से जुड़ी हुई जब हम यूरोप और अमेरीका की स्थिति को देखते है तो लगता है कि पिश्मी समाज में विवाह एक समस्या बन गयी है। अमेरिका में तलाक की दर ऊँची दिखायी जाती है। वास्तव में यूरोप और अमेरीका ऊँचे दर्जे के औद्योगिक और पूंजीवादी राष्ट्र है। यहां व्यक्तिवाद अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया है। इस वैचारिक बदलाव के अतिरिक्त इन देशों ने दो बहुत विश्वयुद्ध देखे हैं। इन कारकों के कारण इन देशों में तलाब की दर बढ़ गया है।

हाल में इन पश्चिमी देशों में विवाह का जो साहित्य मिल रहा है, उसके अनुसार यहां विवाहि अस्थिरता बढ़ गयी है। हेरी एम.जॉनसन ने बढ़ती हुई तलाक की दर के कारणों पर विचार किया है। तलाक के कई कारण है। मुख्य कारकों में धार्मिक असहिष्णुता, औद्योगिक में वृद्धि, नगरीकरण, जन्म नियंत्रण की सुविधाएं, बढ़ती भौगोलिक सामाजिक गतिशीलता और जनसंख्या की विभिन्नता मुख्य है।

हमारे देश में और विशेषकर हिन्दु जातियों में विवाह की अवधारणा का विशिष्ट अर्थ लिया जाता है। हमारे यहां सिद्धान्त रूप में विवाह अविभाज्य है। इसमें तलाक की कोई गुंजाइश नहीं है। विवाह के इस धार्मिक चरित्र के होते हुए भी अपवाद रूप में यह सुविधा अवश्य है कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से हिन्दु जातियों में भी विवाह विच्छेद हो सकता है। पति का पागल होना, कहीं उसका अता-पता न लगना या गुमनाम हो जाना, किसी ऐसी बीमारी से पीड़ित होना जो लाइलाज है, विवाह विच्छेद का कारण बन सकता है। इस प्रावधान के होते हुए भी व्यवाहारिक जीवन में कम से कम ऊँची जातियों में विवाह विच्छेद नहीं होता। यह अवश्य है कि निम्न जातियों में विवाह विच्छेद की संभावना अधिक रहती है। हाल में संस्कृतिकरण की सामाजिक परिवर्तन की जो प्रवृत्ति चल रही है, उसके अन्तर्गत निम्न स्तर की जातियों में भी विवाह विच्छेद बहुत काम होने लगा है। जिन जातियों में विवाह विच्छेद का रिवाज है सामान्यतया सांस्कृतिक स्तर पर उनका दर्जा निम्न हो जाता है। हिन्दु विवाह अधिनियम 1955 ने विवाह विच्छेद की स्वीकृति का प्रावधान रखा है।

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