भारत की सामाजिक समस्याएँ

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इस में हम उन प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक
समस्याओं के बारे में पढ़ेंगे जिन पर हमें तुरंत मयान देना होगा यदि हमें अपनी सामाजिक
और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करनी है। कुछ आवश्यक सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याए जिनसे आज निपटना है, वे हैं जातिवाद, दहेज, साम्प्रदायिकता, शराब, मादक द्रव्यों का
सेवन आदि। जिन समस्याओं पर यहा! चर्चा की जा रही हैं वे पर्याप्त नहीं हैं। और भी ऐसी
अनेक समस्याए! हैं जिनका सामना सामान्य रूप से हमारे देश को और विशेष रूप से प्रदेशों
और समुदायों को करना पड़ रहा है जिनके बारे में हमें सोचना चाहिए।

जाति व्यवस्था

जाति व्यवस्था की जड़ें प्राचीन भारत में हैं। जिस प्रकार आश्रम धर्म विश्व में प्रत्येक मनुष्य
के जीवन के विषय में नियम और कर्तव्यों को निर्धारित करता है उसी प्रकार वर्ण व्यवस्था
में भी उस जाति विशेष के लिए जो किसी व्यक्ति की है, नियम निर्धारित किए गए हैं।
पहले वे सभी सामाजिक स्थिति में बराबर समझे जाते थे और किसी भी व्यवसाय को
अपनी इच्छानुसार अपना सकते थे। अन्य व्यवसायों के लोगों के साथ भोजन और विवाह
विषयक कोई बंधन नहीं थे पर वंशानुगत व्यवसाय में निपुण होने के कारण और देसी लोगों
के साथ संपर्क में आने के कारण परिस्थितिया! बदल गई और जाति का निर्णय जन्म से होने
लगा। अत: उस समय में जो वर्णव्यवस्था विकसित हुई वह सामाजिक और आर्थिक
विकास का परिणाम थी परंतु जैसे-जैसे समय गुजरता गया, समाज उच्च वर्ग और निम्न वर्ग
में बंट गया जो एक-दूसरे के साथ संबंध नहीं रखते थे। अंतर्जातीय भोजन या विवाह
निषिण् हो गए। तथाकथित निम्न जाति के लोगों का शोषण होने लगा और धीरे-धीरे समय
के साथ उनकी दशा शोचनीय हो गई। वे निर्धन थे और समाज में समान नहीं समझे जाते
थे। वे गांव में समान कुओं से पानी भी नहीं ले सकते थे, मंदिरों में नहीं जा सकते थे
अथवा तथाकथित उच्च वर्ग के समीप भी नहीं जा सकते थे। इस प्रकार जाति व्यवस्था ने
विभिन्न व्यवसायों के स्वस्थ विकास में बाध डाली क्योंकि एक विशेष व्यवसाय अब जन्म
पर आधरित था न कि योग्यता पर।

जाति-आधारित भेदभाव ने बहुत बार हिंसा को भी भड़काया। जातिव्यवस्था हमारे देश में
प्रजातंत्र की कार्यप्रणाली में भी बाध डालती है। समाज छित्राम वर्गो में बंट जाता है जो
अपनी जाति के व्यक्ति की ही सहायता करना चाहते हैं। वे इस बात की ओर मयान नहीं
देते कि वह योग्य प्रत्याशी भी है या नहीं। यह भारतीय प्रजातंत्र के स्वास्थ्य के लिए
उपयुक्त नहीं है। हमारा देश तब तक वास्तविक उन्नति नहीं कर सकता जब तक इस
व्यवस्था का समूल विनाश न कर दिया जाय।

स्वातन्त्रयोनर काल में अर्थात् 1947 ई. के बाद सरकार ने इन समस्याओं पर मयान दिया और
कानून बनाकर साथ ही सामाजिक रूप से (समाज में नागरिकों के मामयम से एनजीओ-गैर
सरकारी संस्थाए और सामाजिक वर्गो द्वारा इस समस्या से निपटने का प्रयत्न किया गया।
इन कार्यो )से स्थिति में सुधर तो हुआ है परंतु अभी भी बहुत कुछ करना शेष है।
आप किसी ऐसे व्यक्ति के घर जाए! जो आपकी जाति से भिन्न जाति का हो। क्या
आपको उनके जीवन-यापन के और भोजन आदि करने के ढंग में कोई अंतर दिखाई
देता है? समानताओं और विषमताओं से संबंधित एक लघु निबंध् लिखिए।

लिंग भेद

भारत में महिलाओं के साथ अनेक क्षेत्रों में जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, नियुक्ति आदि में भेदभाव
किया जाता है। लड़कियों के सिर पर दहेज का भारी बोझ होता है और उन्हें विवाह के
बाद अपने माता-पिता के घर को छोड़कर जाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त माता-पिता भी
अपनी वृणवस्था की देखभाल के लिए पुत्र को ही पसंद करते हैं। बहुत से गर्भस्थ बालिका
शिशु का गर्भपात करवा दिया जाता है, त्याग दिया जाता है, जान-बूझकर उनकी परवाह
नहीं की जाती और उन्हें पूरा भोजन भी नहीं दिया जाता क्योंकि वे बालिकाए हैं। राजस्थान
में तो अवस्था और भी शोचनीय है परंतु धीरे-धीरे अब इस दिशा में परिवर्तन हो रहा है।
हरियाणा जैसे कुछ राज्यों में जहा बालिका अनुपात बहुत कम है लडकियों की शिक्षा को
बढ़ावा देने हेतु अनेक योजनाएं लायी गयी है। सरकार द्वारा नौकरियों में लड़कियों के लिए
अन्य कई सुविधाओं के अतिरिक्त पदों का आरक्षण और प्रसव के समय छ: माह का
मातृत्व अवकाश भी प्रदान किया जा रहा है।

विश्व बैंक का आलेख ‘महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण के लिए एक नया कार्यव्म
(वाशिंगटन 1995)’ दर्शाता है कि विकासशील देशों में लगभग 450 मिलियन बालिग
युवतिया अपने बचपन से ही प्रोटीन की कमी के कारण विकास की समस्या से जूझती रही
हैं। अनेक समुदायों में स्त्रियों और लड़कियों को पुरुषों एवं लड़कों के मुकाबले कम तथा
निछष्ट भोजन दिया जाता है। जब वे बीमार होती हैं तब भी उन पर कम मयान देते हैं या
जब उनकी बीमारी बहुत ज्यादा गंभीर हो जाती हैं तभी थोड़ा-सा मयान दिया जाता है। पुरुष
एवं स्त्रियों के बीच स्वास्थ्य में तथा चिकित्सा तक उनकी पहु!च में विश्वस्तरीय भिन्नता
पाई गई है।

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अधिकतर देशों में पुरुष के मुकाबले स्त्री की साक्षरता दर बहुत कम है। 66 देशों में, पुरुष
एवं स्त्री की साक्षरता दर का अंतर 10 प्रतिशत बिंदु से भी अध्कि है। 40 देशों में 6-11
वर्ष के आयु वर्ग में यह अंतर 20 प्रतिशत से भी अधिक है? जिस आयु वर्ग में प्राथमिक
शिक्षा का प्रावधन किया जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुष एवं स्त्री की
साक्षरता दर में 16.7 प्रतिशत का अंतर है। उदाहरणत: पुरुष साक्षरता दर 82.14 प्रतिशत
के मुकाबले स्त्रियों की साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत है। सारे विश्व में 60 मिलियन लड़कों
में 16.4 प्रतिशत के मुकाबले लगभग 85 मिलियन में से 24.5 प्रतिशत लड़किया! आज भी
विद्यालय नहीं जा पातीं।

ज्यादातर भारतीय परिवारों में ‘कन्या’ के आने पर खुशी नहीं मनाई जाती। यद्यपि लड़किया छोटी-सी उम्र से ही पूजनीय मानती जाती हैं, यद्यपि आज लड़किया शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर
प्रदर्शन कर रही हैं पिफर भी, परंपरा, रिवाज तथा समाज के कार्यो में लड़कों को ज्यादा
महन्व दिया जाता है, लड़कियों को नहीं, जिनको प्राय: आर्थिक बोझ माना जाता है। समाज
की इस मनोवृनि के कारण बालिकाए अपनी शक्ति के अनुरूप उपलिब्ध्या नहीं कर पातीं।
बालिकाओं के विषय में एक नया आलेख कहता है कि लड़की विश्व का सर्वाध्कि
अपव्ययी उपहार माना जाता है। वे अत्यधिक शक्ति संपन्न बहुमूल्य मानव हैं परंतु इस
संसार में आमतौर पर उनकी मूलभुत आवश्यकाओं को भी पूरा नहीं किया जाता है और
उनके मौलिक अिध्कारों को भी नकार दिया जाता है।

लड़की को खाना, कपड़ा, आश्रय, शिक्षा, चिकित्सा सुविध, पालन-पोषण तथा खेलने का
समय तक अक्सर नहीं दिया जाता। उनको सुरक्षा का अिध्कार (अवसर), उत्पीड़न तथा
शोषण से मुक्ति, उनके पनपने और विकसित होने तथा प्रसन्न होने का अिध्कार भी नहीं
दिया जाता है।

0-6 वर्ष की आयु वाले लिंग अनुपात के आंकड़ों से लड़कियाँ के विरुद्ध भेदभाव बहुत
स्पष्ट और तीक्ष्ण दृष्टिगोचर हो जाता है। 2011 की जनगणना में लिंग अनुपात 2001 की
जनगणना के अनुसार 927 से घटकर 914 ही रह गया है। शिशु लिंग अनुपात 1961 में
967 से लगातार घटता हुआ 2011 में 914 रह गया है।

दहेज व्यवस्था

हमारे समाज की सबसे बड़ी कुप्रथा दहेज प्रथा है जिसने हमारी संस्कृति को प्रभावित
किया है। ‘स्वतंत्रा भारत’ में दहेज प्रथा के विरुण् भारत सरकार ने ‘दहेज प्रतिबंध अधिनियम 1961’ कानूनी धारा बनाई। दहेज का लेना और देना दोनों ही कानून द्वारा निषिण्
हैं और यह दण्डनीय अपराध माने जाते हैं। यह प्रथा हमारी संस्कृति में इस प्रकार घर
कर गई है कि यह खुलेआम चल रही है। ग्रामीण या शहरी लोग खुलेआम इसका
उल्लंघन करते हैं। इससे न केवल दहेज हत्याए की जाती हैं बल्कि ज्यादातर इसी के
कारण मारपीट आदि भी की जाती है तथा महिलाओं को मानसिक एवं शारीरिक यंत्रणा
दी जाती है। स्त्रियों के मूलभूत अिध्कार का भी लगभग प्रतिदिन उल्लंघन किया जाता
है। यह उत्साहवर्धक है कि कुछ लड़किया! साहस से इस बुराई के विरुण् अपने अस्त्रिकारों के लिए खड़ी हो रही हैं। ऐसी लड़कियों को शीघ्र ही सकारात्मक समर्थन प्रदाना
करनी आवश्यक है। साथ ही एक व्यापक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा
प्रशासनिक कार्यवाही करके इस बुराई से समाज को मुक्त करना भी आज की अत्यंत
आवश्यकता है।

आप अपने क्षेत्र में ऐसी बालिका का पता लगाए! जो विद्यालय नहीं जाती है। उसके
माता-पिता को बतायें कि सरकार ने ‘लाड़ली’ योजना शुरु की है और अब वह उन
पर बोझ नहीं रहेगी बल्कि वह बहुमूल्य बन जाएगी। अत: उन्हें लड़की को विद्यालय
भेजना चाहिए।

मादक द्रव्यों का दुष्प्रयोग/व्यसन/लत

नियमित रूप से हानिकारक द्रव्य जैसे शराब, नशीले पेय, तंबाकू, बीड़ी या सिगरेट, डंग्स
आदि का सेवन (निर्धरित चिकित्सा के उद्देश्यों के अतिरिक्त) व्यसन कहलाता है।
जैसे-जैसे मादक पदार्थो की संख्या बढ़ती जाती है, अधिक से अधिक लोग विशेषकर
युवा वर्ग व्यसनी होते चले जाते हैं। युवा तथा प्रौढ़ों को इस नशीले द्रव्य के सेवन के जाल
में पफंसाने वाले और भी तथ्य हैं जो इसके लिए उनरदायी हैं। इन तथ्यों में समान वर्ग
के साथियों का दवाब, अनुत्साहवर्ध्क पारिवारिक वातावरण और तनाव आदि प्रमुख कारण
हैं।

नशे का व्यसन एक ऐसी अवस्था है जिसमें चिकित्सीय तथा मनोवैज्ञानिक सहायता की
आवश्यकता पड़ती है। माता-पिता को अपने बच्चों का विशेष मयान रखना चाहिए
विशेषकर तब जब वह बचपन की अवस्था से किशोर तथा वयस्क हो रहे हों। ऐसी स्थिति
में उनके शरीर में बहुत बदलाव आते हैं। किशोर प्राछतिक रूप से बहुत जिज्ञासु होते हैं।
वे नई दुनिया में, विचारों में तथा रिश्तों में नई उड़ान भरने लगते हैं। कुछ मादक द्रव्य की
ओर भी झुक जाते हैं तथा उनके वातावरण में यदि परिवार, विद्यालय एवं दोस्त उनकी
मादक द्रव्यो से हानियों की ओर सावधन न करे, बहुत संभव है कि वे इस जाल में पफंस
जाए!। शराब और सिगरेट, मादक द्रव्यो में से सबसे ज्यादा प्रचलित और हानिकारक पदार्थ
हैं।

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शराबखोरी समाज की गंभीर समस्या है। यह सरलतम उपाय माना जाता है कि शराब पीयो
और अपनी परेशानियों तथा अवसाद की स्थिति को भूल जाओ, चाहे यह थोड़े ही समय
के लिए ही हो। इस लत के परिणाम बहुत गंभीर होते हैं। थोड़ी आमदनी होने पर भी शराबी
लोग परिवार की आवश्यकाओं को ताक पर रखकर शराब खरीदते हैं। यदि वे महंगी और
अच्छी स्तर की शराब नहीं खरीद सकते तो वे सस्ती शराब पी लेते हैं। वे एक प्रकार का
जहर भी पी जाते हैं। इसको पीने के बाद वे अपने होश खो देते हैं। कभी-कभी इसके
दुष्परिणाम से इनकी मृत्यु भी हो जाती है या स्थायी विकलांगता हो जाती है। शराब पीने
के बाद ज्यादातर समय वे अपनी पत्नी तथा बच्चों के साथ दुव्र्यवहार भी करते हैं।
धूम्रपान बुरी आदत है जो स्वास्थ्य के लिए शराब से भी ज्यादा हानिकारक है। इससे धूम्रपान
करने वालों को ही केवल नुकसान नहीं होता बल्कि उनके आस-पास के लोगों को भी
वातावरण में धुएँ! से हानि होती है। यदि हम दूसरों के अधिकारों का मान करते हैं तो हमें
बस, रेलगाड़ी, बाजार, ऑपिफस आदि सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान नहीं करना चाहिए।
धूम्रपान, प्रदूषण का बड़ा कारण है और इससे गंभीर बीमारिया! जैसे कैंसर, ह्रदय रोग, श्वास
समस्या आदि हो जाती हैं। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (WHO) के अनुसार तंबाकू का प्रयोग
विशेषकर धूम्रपान मृत्यु का सबसे बडा कारक (एक नम्बर मारक) है। संचिय मंत्री परिषद
ने सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर रोक लगा दी है। इसे विद्यालय तथा कॉलेज के पास
बेचना भी मना है। इस उत्पाद को बनाने वाले को निर्देश है कि वे उपभोक्ता को चेतावनी
देते हुए उस उत्पाद के ही । पर उपभोक्ता के लिए चेतावनी अंकित करें।

 साम्प्रदायिकता

भारत विभिन्न धर्मिक आस्थाओं वाला देश है। भारत में हिंदु, मुस्लिम, ईसाई, सिख,
पारसी आदि विभिन्न समुदाय के लोग रहते हैं। एक समुदाय का दूसरे समुदाय के प्रति
आक्रमक व्यवहार तनाव पैदा करता है और दो धार्मिक समुदायों में टकराव उत्पन्न हो
जाता है। सैंकड़ों लोग इन सांप्रदायिक झगड़ों में मारे जाते हैं। यह घृणा और परस्पर संदेह
को जन्म देता है। देश की एक मुख्य सामाजिक समस्या साम्प्रदायिकता है, जिसको
सुलझाना और दूर करना आवश्यक है। यह हमारी उन्नति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। शिक्षा एक महत्वपूर्ण सामान है जिसके मामयम से हम समाज में शांति और एकता
स्थापित कर सकते हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि हम पहले मानव हैं, बाद में किसी
धर्मिक समुदाय के अंश बनते हैं।

हमें सभी धर्मो का आदर करना चाहिए। हमारा देश धर्म-निरपेक्ष है, जिसका अभिप्राय है
कि सभी धर्मो के साथ समान व्यवहार किया जाता है और हर व्यक्ति को अपना धर्म पालन
करने में पूरी स्वतंत्रता है।

किसी भी ध्ूम्रपान करने वाले मादक द्रव्य लेने वाले, शराबी या जुआरी से मिलकर उसे
इन सबके बुरे प्रभाव तथा इससे मुक्त होने के उपाय बताइए।

वृद्धजनों की समस्याएँ

संसार की आबादी बूढ़ी हो रही है। विश्वस्तर पर 1950 में 8% बूढ़े थे, 2000 में 10%
तथा 2050 में बढ़कर यह संख्या 21% होने का अनुमान है। भारत में सन् 1961 में 5.8%
(25-5 मिलियन) वृण्जन थे 1991 में 6.7% (56-6 मिलियन) तथा 2011 में बढ़कर 8.
1% (96 मिलियन) होने का अनुमान है। अब 2021 में इसके 137 मिलियन हो जाने की
आशा है। भारतीय वृद्धजनों (60 वर्ष एवं इससे ज्यादा वाले) की संख्या आगामी कुछ
दशकों में तिगुना होने की उम्मीद है। इन वृद्धजनों को सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक
सहारा देना सामाजिक विकास की मूलभूत समस्या बनकर उभर रही है।

शहरों में संयुक्त परिवारों के टूटने से और ज्यादातर एकाकी परिवारों की अध्किता के
कारण वृद्धजनों  अपने ही परिवार में व्यर्थ सदस्य बनकर रह गए हैं। वृद्धो के लिए
सामुदायिक सहायता की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। हमारी वृद्धजनों के सम्मान की
संस्कृति को युवा वर्ग में पुन: जागृत करना होगा जिससे वृद्धजन आत्मसम्मान से जी सकें।
याद रखिए, वृणें का अवश्य सम्मान करना चाहिए। वे जब युवा थे तो उन्होंने आपकी
देखभाल की और अब उस ण्ण को चुकाने की आपकी बारी है।
आपको अपने वृद्ध दादा-दादी की देखभाल और सेवा करनी चाहिए। किसी वृद्धश्रम
में जाओ और वहा रहने वाले वृद्धजनों से चर्चा करो। सोचो कि तुम किस प्रकार उनके
जीवन में सुविधा और खुशी दे सकते हो।

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गरीबी तथा बेरोजगारी की समस्या

क्षेत्रफल में भारत एक बड़ा देश है। यह विश्व के संपूर्ण क्षेत्रापफल का प्राय: 2.4% है पर
क्या आप जानते हैं कि विश्व की कितने प्रतिशत जनसंख्या यहाँ निवास करती है? जी हाँ।
यह प्राय: 16.7% है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 121 करोड़ है।
इतनी बड़ी जनसंख्या के साथ निश्चित ही कुछ आर्थिक समस्याएं भी विकसित हो जाएंगी।
ये समस्याएं हैं बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी और कीमतों में वृद्धि हमारी जनता का एक बहुत
बड़ा वर्ग गरीबी रेखा से नीचे रह रहा है। भयानक बेरोजगारी है। महंगाई और कीमतों में
वृद्धि ने इस समस्या को ओर भी गंभीर बना दिया है।

जबकि जनता का एक महत्वपूर्ण भाग गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रहा है, इसका
प्रभाव सामाजिक-आर्थिक रूप से त्रस्त परिवारों पर निचले स्तर का जीवन, बीमारियां,
निरक्षरता, कुपोषण और बाल श्रम के रूप में एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। प्राय:
अनुसूचित जाति की जनसंख्या के एक चौथाई लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रहे
हैं। गरीबी एक मूलभूत समस्या है जो विकास के सभी उद्देश्यों की प्राप्ति में रुकावट
डाल रही है।

बेरोजगारी वह स्थिति है जब एक सुयोग्य स्वस्थ मनुष्य जो काम करना चाहता है परन्तु
जीविकोपार्जन के लिए काम नहीं ढूंढ पाता। बेरोजगारी और घोर गरीबी मानवीय
मूल्यों के ेास के लिए उत्तरदायी है। गरीबी की मजूबरी के कारण माता पिता अपने
बच्चों को मजदूरी करने के लिए भेजने में भी नहीं सकुचाते। इस परिदृश्य के कारण
लाखों बच्चे अपने बचपन से वंचित रह जाते हैं। वे अशिक्षित और अज्ञानी रह जाते हैं,
जिसका परिणाम बेरोजगारी या छोटी नौकरी और फलत: गरीबी में परिणत हो जाता है।

भीख मांगना

जहां भी हम जाएं, भिखारियों का दृश्य बहुत करुणाजनक होता है। बाजार में, रेलवे स्टेशन,
हास्पिटल, मंदिर यहां तक कि चौराहों पर भी आप कुछ लोगों को अपनी खुली हथेली
पफैलाए आपके पास आते हुए दिखाई देंगे। वे खाना या पैसा मांगते हैं। हम गलियों में कई
बच्चों को भी भीख मांगते देखते हैं। भारत में भीख मांगना एक प्रमुख सामाजिक समस्या
है। भीख का प्रधन कारण गरीबी और बेरोजगारी है।

आजकल हमारे समाज में कुछ लोग गिरोह बनाकर सुनियोजित ढंग से भीख मंगवाने का
धंधा कर रहे हैं। फिर भी भीख मांगना एक सामाजिक अभिशाप है जिसे देश से समाप्त
करना आवश्यक है। यदि आपको सड़क पर या कहीं भी भिखारी दिखें तो उनको बताएं
कि यह कानूनन दण्डनीय अपराध है और यह नियम भीख लेने वाले तथा भीख देने वाले
दोनों पर ही लागू होता है।

बच्चों की समस्याएं

बच्चों के विकास में पर्याप्त सावधनी के बिना कोई भी देश, विकास नहीं कर सकता। हर
बच्चा देश का भावी नागरिक है। केवल वे ही बच्चे जो स्वस्थ वातावरण में पलते हैं, राष्टं
के निर्माण और विकास में योगदान दे सकते हैं। हमारे देश में बच्चों की बड़ी जनसंख्या
है। इसलिए यह हमारा कर्तव्य है कि हम उनको उनम स्वस्थ्य  व उच्च शिक्षा के लिए
आवश्यक सुअवसर प्रदान करें।

गरीबी के कारण बहुत से बच्चे विद्यालय नहीं जा पाते, या प्रारंभिक शिक्षा समाप्त होने से
पहले ही उनको विद्यालय से निकाल लिया जाता है और जबरदस्ती छोटी और कोमल उम्र
में उन्हें होटलों, ढाबों, भट्टों, कारखानों या दुकानों पर नौकरी पर लगा दिया जाता है। इससे
उनकी शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक सवृण रुक जाती है। वे घृणा तथा पीड़ा में
बड़े होते हैं और राष्टं के योग्य नागरिक बन पाने में असमर्थ होते हैं।

6-14 वर्ष की आयु के बच्चे को विद्यालय में होना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से 200 मिलियन
भारतीय बच्चों में से 11.3 मिलियन बच्चे बाल श्रमिक हैं। एक एन.जी.ओ के आकड़ों
में 60 मिलियन में से 2,00,000 बच्चे घरेलू नौकर की तरह काम करते हैं और इतनी
ही संख्या में बंधुआ मजदूर हैं। ये बच्चे शारीरिक व मानसिक शोषण के शिकार हो जाते
हैं। ये भुखमरी, पिटाई तथा यौन शोषण के शिकार होते हुए भी देखे गए है। यह एक
अत्यंत गंभीर समस्या हैं जिसे ‘‘बाल-उत्पीड़न’’ के नाम से जाना जाता हैं।
‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अनुसार 6-14 वर्ष की आयु वाले सभी बच्चों
को शिक्षा पाने का अिध्कार है। एक बार यह अतिवा×िछत ‘सबके लिए शिक्षा’ का उद्देश्य
पूरा हो जाता है तो हमारे बच्चों की दशा कहीं अधिक अच्छी हो सकेगी।

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