महाभारत के रचयिता कौन है?

अनुक्रम
भारतीय परम्परा के अनुसार महर्षि वेदव्यास ही महाभारत के प्रणेता हैं और इसके प्रमाण ग्रन्थ में उपलब्ध होते हैं। ये कृष्ण द्वैपायन व्यास महाभारत के रचयिता होते हुए भी उसके एक प्रधान पात्रा के रूप में चित्रात हैं ओर कौरवों तथा पाण्डवों के दादा कहे गये हैं। इनका नाम अनेक दार्शनिक एवं साहित्यिक ग्रन्थों के निर्माण के रूप में प्रसिद्ध है। ये चारों वेदों के संकलयिता या विभागकर्त्ता तथा महाभारत और पुराणों के मान्य लेखक हैं। वेदों का विभाग करने के कारण ही इसका नाम व्यास पड़ा है। ये महाभारत के पात्रों के समकालीन एवं उनके निकट के संबन्धी भी थे। वेद का व्यास या विस्तार करने के कारण इनका नाम व्यास पड़ा।

विव्यास वेदान् यस्मात् स तस्मात् व्यास इति स्मृत:। आदिपर्व, 63।88

प्राचीन विश्वास के अनुसार प्रत्येक द्वापर युग में आकर वेद व्यास वेदों का विभाजन करते हैं। इस प्रकार इस मन्वन्तर के अट्ठईस व्यासों के होने का विवरण प्राप्त होता है। वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के 28 द्वापर बीत चुके हैं। ‘विष्णुपुराण’ में 28 व्यासों का मानोल्लेख किया गया है।

अट्ठाईसवें व्यास का नाम कृष्णद्वैपायन व्यास है। इन्होंने महाभारत एवं अट्ठारह पुराणों का प्रणयन किया है।

व्यास नामधारी व्यक्ति के संबंध में अनेक पाश्चात्त्य विद्वानों का कहना है कि यह किसी का अभिधान न होकर प्रतीकात्मक, कल्पनात्मक या छद्म नाम है। मैक्डोनल भी इसी विचार के समर्थक हैं, पर भारतीय विद्वान् इस मत से सहमत नहीं हैं। प्राचीन ग्रन्थों में व्यास का नाम, कई स्थानों पर, आदर के साथ लिया गया है। ‘अहिर्बुध्न्यसंहिता’ में व्यास वेद-व्याख्याता तथा वेदवर्गयिता के रूप में उल्लिखित हैं। इसमें बताया गया है कि वाक् के पुत्रा वाच्यायन या अपान्तरतमा नामक एक वेदज्ञ थे, जो कपिल एवं हिरण्यगर्भ के समकालीन थे। इन तीनों व्यक्तियों ने विष्णु के आदेश से त्रायी (ऋग्यजुसाम), सांख्यशाò एवं योगशाó का विभाग किया था। इससे सिद्ध होता है कि व्यास का नाम कपिल एवं हिरण्यगर्भ की तरह एक व्यक्तिवाचक संज्ञा थी। अत: इसे भाववाचक न मानकर अभिधानवाचक मानना चाहिए। ‘अहिर्बुध्न्य संहिता’ में व्यास का नाम अपान्तरतमा भी प्राप्त होता है और उसकी संगति ‘महाभारत’ से बैठ जाती है। (महाभाारत में) अपान्तरतमा नामक वेदाचार्य ऋषि का उल्लेख है, जिन्होंने प्राचीनकाल में एक बार वेद की शाखाओं का नियमन किया था। ‘महाभारत’ के कई प्रसंगों में अपान्तरतमा नाम को व्यास से अभिन्न मान कर वख्रणत किया गया है।

कतिपय विद्वान् व्यास को उपाधिसूचक मानते हैं। विभिन्न पुराणों के प्रवचनकर्त्ता व्यास कहे गए हैं और ब्रह्मा से लेकर कृष्ण द्वैपायन व्यास तक 27 से लेकर 32 व्यक्ति इस उपाधि से युक्त बताये गये हैं। यदि पुराण ग्रन्थों की बातें सत्य मान जी जायँ तो ‘जय काव्य’ के रचयिता तथा कौरव-पाण्डव के समकालीन व्यास नामक व्यक्ति 32वीं परम्परा के अन्तिम व्यक्ति सिद्ध होते हैं। इस प्रकार व्यास नाम का वैविध्य इसे भारतीय साहित्य की तरह प्राचीन सिद्ध करता है। म.म.पंñ गिरधरशर्मा चतुर्वेदी का कहना है कि ‘‘व्यास या वेदव्यास किसी व्यक्ति-विशेष का नाम नहीं, वह एक पदवी अथवा अधिकार का नाम है। जब जो ऋषि-मुनि वेदसंहिता का विभाजन या पुराण का संक्षेप कर ले वही उस समय व्यास या वेदव्यास कहा जाता है। किसी समय वसिष्ठ और पराशर आदि भी व्यास हुए। इस अट्ठाईसवें कलियुग के व्यास कृष्ण द्वैपायन हैं। उनके रचित या प्रकाशित ग्रन्थ आज पुराण के नाम से चल रहे हैं।’’ उन्होंने इस संबंध में पुन: कहा ऋषि या मुनि जिस प्राणशक्ति का आविष्कारक या दूसरे शब्दों में उपासक रहा, वह उसी शक्ति के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वसिष्ठ, विश्वामित्रा, कश्यप आदि नाम उपास्य शक्ति अनुसार ही प्रसिद्ध है। उनके व्यक्तिगत नाम दूसरे हैं, जो कहीं-कहीं पाये जाते हैं, इसी प्रकार, पुराणों के निर्माता का व्यक्तिगत नाम कृष्णद्वैपायन है और पदवी या अधिकार का नाम व्यास या वेदव्यास। कृष्णद्वैपायन शब्द में भी कृष्ण और द्वैपायन शब्द उत्पत्ति-स्थान के संबंध से विशेषण रूप से जोड़ा गया है।’’ पुराण-परिशीलन, पृñ 48-49 इस कथन से प्रतीत होता है कि व्यास एक उपाधि थी, जो वेदों ओर पुराणों के वर्गीकरण, विभाजन एवं संपादन के कारण प्रदान की जाती थी। आचार्य शंकर ने व्यास के संबंध में एक नवीन मत की उद्भावना की है। ‘वेदान्तसूत्राभाष्य’ में उनका कहना है कि प्राचीन वेदाचार्य अपान्तरतमा ही बाद में (द्वापर एवं कलियुग के सन्धि काल में) भगवान् विष्णु के आदेश से कृष्ण द्वैपायन के रूप में पुनरुद्भूत हुए थे। कृष्ण द्वैपायन व्यास के सम्बन्ध में अश्वघोष ने तीन तथ्य प्रस्तुत किये हैं-
  1. इन्होंने वेदों को पृथक्-पृथक् वर्गों में विभाजित किया। 
  2. इनके पूर्वज वसिष्ठ तथा शक्ति थे
  3. ये सारस्वतवंशीय थे तथा इन्होंने वेद-विभाजन जैसा दुस्तर कार्य सम्पन्न किया था। 
‘महाभारत’ में कृष्ण द्वैपायन को व्यास कहा गया है और इन्हें वेदों का वर्गीकरण करनेवाला माना गया हैµ। इन्हीं कृष्ण द्वैपायन व्यास का नाम बादरायण व्यास भी था। इन्होंने अपनी समस्त ज्ञान-साधना बदरिकाश्रम में की थी, अत: ये बादरायण के नाम से प्रसिद्ध हुए। व्यासप्रणीत ‘वेदान्तसूत्रा’ भी ‘बादरायणसूत्रा’ के ही नाम से लोक-विश्रुत हुआ है। इनका अन्य नाम पाराशर्य भी है। इससे ज्ञात होता है कि इनके पिता का नाम पराश था। अलबेरुनी ने भी इन्हें पराशर का पुत्रा कहा है और पैल, वैशम्पायन, जैमिनि तथा सुमन्तु नामक इनके चार शिष्यों का उल्लेख किया है, जिन्होंने क्रमश: ऋग्, यजु, साम एवं अथर्ववेद का अध्ययन किया था। पाणिनिकृत ‘अष्टाध्यायी’ में ‘भिक्षुसूत्रा’ के रचयिता पाराशर्य व्यास ही कहे गये हैं। ‘भिक्षुसत्रा’ ‘वेदान्तसूत्रा’ का ही अपर नाम है। ‘महाभारत’ के शान्तिपर्व में इनका निवासस्थान उत्तरापथ हिमालय बताया गया है।

व्यास जी की शिक्षा कहाँ हुई, इसका कोई विशेष विवरण प्राप्त नहीं है। पर ‘वंशब्राह्मण’ तथा पुराणों में इनके गुरु ‘जातुकण्र्य’ कहे गए हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार, इनका आश्रय सरस्वती तट पर था, जो कुरुक्षेत्रा से कुछ पश्चिमोत्तर रहा होगा। आधुनिक विद्वान् ‘कृष्ण-द्वैपायन व्यास’ तथा ‘बादरायण व्यास’ को भिन्न-भिन्न व्यक्ति मानकर महाभारतादि ग्रन्थ के निर्माता कृष्ण-द्वैपायन को और ब्रह्मसूत्रा के प्रणेता बादरायण-व्यास को स्वीकार करते हैं। इस विचार का खण्डन करते हुए मñ मñ पंñ गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी का कहना है: ‘‘इस पर हमारा इतना ही वक्तव्य है कि इस प्रकार का भेद मानने का कोई मूल भारतीय वाड़्मय के प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता, न जाने यह भेद मानने की कल्पना आधुनिक ऐतिहासिकों ने किस आधार पर उठाई है। एक ही व्यक्ति के भिन्न-भिन्न कारणों से अनेक नाम हो सकते हैं, जैसा कि हम ऊपर लिख आये हैं कि इनका कृष्ण यह नाम मुख्य था। द्वीप में पैदा होने के कारण द्वैपायन शब्द भी वासुदेव कृष्णआदि से भेद करने के लिए जोड़ दिया गया। इसी प्रकार, बदरी वन में तपस्या करने के कारण बादरायण नाम भी प्रसिद्ध हुआ। जैमिनिसूत्रा और वेदान्तसूत्रों में बादरायण नाम ही उल्लिखित हुआ है, यह ठीक है; किन्तु पुराणादि में भी बादरायण नाम कहीं-कहीं पाया जाता है।

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