मिस्र की सभ्यता का इतिहास

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विश्व के विभिन्न भागों में नवपाषाण काल की समाप्ति पर विभिन्न कृषक बस्तियां धीरे-धीरे नगरों में परिवर्तित हो गई। परिवर्तन की इस प्रक्रिया को कुछ विद्धानों ने शहरी क्रांति का नाम दिया। प्रारंभिक शहरों का विकास नदी घाटियों के किनारे हुआ, जिनमें दजला और फरात की नदी घाटियाँ प्रमुख है इसके अतिरिक्त नील, सिन्धु, तथा चीन की पीली नदि घाटियाँ प्रमुख है। यहाँ सभ्यता के विकास के लिए उपयुक्त अनुकूल परिस्थितियां थी जैसे उपजाऊ मिट्टी, जिसमें कृषक अतरिक्त उत्पादन कर सकते थे। इसके अतिरिक्त सिचांई व्यवस्था पर्याप्त थी, पानी में शिकार के लिए मछलियां मिल जाती थी और अन्य पशु भी पानी के लिए यहां आते थे जो उस काल के मानव के भोजन साम्रगी के लिए प्रयुक्त थे। नदियों का प्रयोग मार्गो के रूप में भी किया गया। कालान्तर में जिसने व्यापार को बढ़ावा दिया। जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ नए क्षेत्रों को कृषि योगय बनाया गया और सिचांई व्यवस्था की जाने लगी। इसके लिए बांध, नहरे, नालियां इत्यादि की व्यवस्था करने की जरूरत महसूस हुई। इसके लिए किसी संगठन की जरूरत थी, इसी से आगे चलकर राज्य सरकार का उद्भव हुआ।

यद्यपि प्रांरभिक नदी घाटी सभ्यताएं विभिन्न क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से विकसित हुई। लेकिन इनमें एक-दूसरे के साथ सम्पर्क विकसित हुए तथ स्थानान्तरण, युद्ध और व्यापार के जरिए विचारों का आदान प्रदान हुआ। इसके साथ ही एक सभ्यता की वस्तुएं दूसरी सभ्यता तक सुलभ हो सकी। इस व्यवस्था में धुम्मकड़ लोगों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही थी।

प्राचीन मिस्र की सभ्यता यूनानी इतिहासकार हेरोडोप्स के अनुसार नील नदी का वरदान है। यह सभ्यता नील नदी के स्वभाव, यहाँ फली-फूली। नील अफ्रीका की बड़ी झीलों अल्बर्ट एवम् विक्टोरिया न्यान्जा से निकलकर 6100 मील बहकर भूमध्यसागर में गिरती है। इस नदी की आरवरी करीब 900 किलोमीटर आस्वन के प्रथम महाप्रताप से समुद्र तक का प्रदेश मिस्र है, इसी के दोनों तरफ का क्षेत्र उपजाऊ है बाकि सब मरूस्थल है। आस्वन से डेल्टा के शुरू के क्षेत्र में नदी पथरीले पठारी क्षेत्र से गुजरती है और यह 800 किलोंमीटर का उपजाऊ क्षेत्र कही पर भी 20 किलोमीटर से चौड़ा नही है, इस क्षेत्र को ऊपरी मिस्र कहा जाता है। मैमफिस के समीप नदी का डेल्टा 100 कि.मी. तक चौडा हो जाता है। मैमफिस तथा डेल्टा का क्षेत्र निचला मिस्र कहलाता है, यह क्षेत्र समतल है जबकि उपरी मिस्र लंबा और संकरा क्षेत्र है तथा निचला मिस्र छोटा और चौड़ा है। ये दोनों क्षेत्र एक दूसरे के समकालीन है। उपरी मिस्र 22 नोम तथा निचला मिस्र 20 नोमों में विभक्त है।

मई के महीने में नदी में सबसे कम पानी होता है और खेत सूख जाते है। जुलाई के आसपास जब नदी में बाढ़ आती तो सबसे पहले वनस्पति भरा हरा पानी एक महीने बाद लाल रंग की मिट्टी वाला पानी जो कि खनिज और पोटाश से भरा आता है यहाँ की मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। अक्टूबर के बाद पानी का स्तर कम होने लगता है। अैबसीनिया से आने वाली काली मिट्टी के कारण मिस्र को काली जमीन भी कहा जाता है। वे इस नदी का हाथी का नाम देते है उनका सब कुछ नदी के स्वभाव पर निर्भर था। नदी में पानी की कमी से अकाल की स्थिति पैदा हो जाती थी तथा अधिक बाढ़ से उनके बांध और नहरें नष्ट हो जाती थी। इसलिए उन्होंने नदी के स्वभाव की गहराई से जांच की तथा प्रति वर्ष नदी के पानी का स्तर नाप कर लगभग 3100 ई.पू. से रिकार्ड रखना शुरू किया। प्रत्येक निवासी ऐसी व्यवस्था करता था कि बांध तथा नालियां सुव्यस्थित रखी जाए। इसके लिए केन्द्रीय सरकार या प्रांतीय प्रशासन द्वारा भी प्रबन्ध किया जाता था। जैसा कि प्रथम इंटरमिडेटरी काल में हुआ। इसके अतिरिक्त नील नदी यातायात का मुख्य मार्ग भी थी। इस काल में फराओं अपनी राजधानी ऐसे स्थान पर बनाते थे जहां से उपरी और निचले मिस्र पर नजर रखी जा सकती थी। इसलिए उन्होंने मैमंफिस का चुनाव किया। लेकिन नए राजवंश काल में नूबिया द्वारा उपनिवेश कायम करने के कारण थे। इस को राजधानी बनाया गया। दोनों क्षेत्रों के सुव्यस्थित प्रबन्ध के लिए अलग-अलग वजीर भी नियुक्त किए जाते थे।

इतिहास के साधन :-

मिस्र की सभ्यता को जानने के अनगिनत प्रमाण पूरी नील घाटी में ऐसे बिखरे पड़े है मानों यह एक संग्रहालय हो। इस सभ्यता की जानकारी के महत्वपूर्ण अवशेष यहां से प्राप्त इमारतें, पिरामिड़, स्फिक्स, समाधियां, मेपिर तथा अनय अवशेष सुरिक्षत और बड़ी मात्रा में प्राप्त हुए है। लेकिन इनके लेखों में मौलिकता की कमी है, इसी कारण इनका कोई प्रसिद्ध इतिहासकार नही हुआ तथा यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस ही मिस्र का प्रथम इतिहासकार था। इसके बाद हेकाप्यूस, स्ट्रेबों, चूयूरिमोन जोसेफस, लुचार्च तथा होरपोले इत्यादि ने मिस्रवासियों के बारे में लिखा। इसके अतिरिक्त पलेरमों अभिलेख, कार्नाक मन्दिर के अभिलेख, अबिडोज तथा सक्करा के लेख, टसूरिन, पेपिरस संग्रहालयो से हमें शासकों के नाम एवम् वंशावली के बारे में जानकारी मिलती हैं, इसकी सबसे महत्वपूर्ण राज वंशावली टॉलमी II (285-47 B.C.) के एक पुजारी मनेथो ने बनाई थी जो बहुत सी त्राुटियों के बावजूद आज भी मिस्र का इतिहास जानने का एक अमुल्य साधन है। इसी के आधार पर इसी आधार पर हम प्रथम राजवंश की स्थापना से प्रांरभ होने वाले युग को वंशीय युग तथा इससे पूर्व को प्राग्यवंशीय युग कहते है। मनेथों की वंशावली से हमें मिस्र के 30 वंशों के राजाओं के इतिहास की जानकारी मिलती है, सूचीबद्ध राजाओं का वर्णन करते हुए कहीं-कहीं उसने वंशावली बताने में गलती की है। उसने पहले काल के राजाओं को बाद के काल में तथा बाद के काल के राजा को पहले काल में डाल दिया। तिथियां भी ठीक नही है। इनके बावजूद मनेथो की रचना इस काल का महत्वपूर्ण स्त्रोत है।

प्रारंभिक इतिहास :-

प्रागस्तिहसिक काल में मिस्र के क्षेत्र से सर्वप्रथम पुरापाषाण काल के अवशेष प्राप्त होते हें जो अफ्रीका और यूरोप की एबेविलियन तथा एशूलियन संस्कृति के समान था। इसके बाद यहां मध्यपुरापाषाण काल के लवलवा तकनीक के फलक पर बने उपकरण प्राप्त होते है। इस संस्कृति को अेटारियन का नाम दिया गया। उतरपुरापाषाण काल की ब्लेड़ संस्कृति का यहां सेबिलिन नाम दिया गया। इस काल के पश्चात् जलवायु में परिवर्तन के कारण संस्कृति में भी परिवर्तन आया, मध्यपाषाण कालीन संस्कृति के बाद यहाँ 6000 ई.पू. नवपाषाण काल की शुरूआत के साथ ही नील घाटी में स्थायी बस्तियों की शुरूआत हुई। जिन्होंने कृषि और पशुपालन की शुरूआत की। अनुमानता: 4500 ई.पू. के आसपास यहां ताम्रपाषाणीय संस्कृतियां अस्तित्व में आई।

मिस्र में नारमेर से प्रथम राजवंश की स्थापना मानी जाती है जबकि कुछ विद्वान इसे मात्रा कल्पना मानते है। प्रथम दो राजवंशों के काल को प्रारंभिक राजवंश या काइनाइट काल भी कहा जाता था। इसका समय 3300 B.C.-2778 B.C. का है, इस काल के लिए मनेथो की वंशावली को सच नही माना जा सकता। उसके अनुसार प्रथम दो राजवंशों से 18 शासक हुए, इसने सभी शासकों का विवरण नही दिया है। नारमेर और दूसरे वंश के शासकों ने अबिडोज के समीप थिस से राज्य का संचालन किया प्रथम दो राजवंशों के काल को थाइनाइर काल कहां जाता है। इन दो कालों में राज्य की प्रशासकनिक, सामाजिक और आर्थिक संगठनों की नींव पड़ी बल्कि इसके साथ लेखन कला की भी शुरूआत हुई। वास्तुकला के क्षेत्र में तृतीय राजवंश के पिरामिडों का आधार भी इसी काल में शुरू हुआ और राज्य के केन्द्रीय प्रभुक्त की स्थापना भी इसी काल में हुई।

नारमेर ने उतरी और दक्षिणी राज्यों को मिलाकर मिस्र की नींव डाली। प्रथम राजवंश का दूसरा राजा अहा था। इसका मकबरा काफी भव्य इमारत था इसे संभवत: सक्करा में दफनाया गया था। इसके 6 उतराधिकारियों को भी उनके निवास स्थान अबिड़ोज के शाही मकबरों के दफनाया गया था। इनके साथ अनेक साम्रगी जैसे तांबे एवम् पत्थर के बर्तन, सोने के आभूषण भी दफनाए गए थे। इन साम्रगी से इनके वैभव के अलावा उनके दूर-दराज क्षेत्रों से व्यापारिक संबध और कुशल कारीगरों के होने के संकेत मिलते है।

प्रथम राजंवश के राजाओं ने लिबिया, नूबिया तथा सिनई पर संयुक्त सैनिक अभियान किए। इन अभियानों का प्रयोजन इन प्रदेशों पर अधिकार कर प्राकृतिक संसाधनों (कच्चा माल व धातुएँ) पर अधिकार करना था क्योंकि मिस्र में इनकी बहुत कमी थी। इस काल के शासक निंरकुश शासक थे यहां से प्राप्त प्रमाण इस ओर संकेत करते है।

द्वितीय राजंवश :-

इस राजवंश के काल में मैमाफिस मिस्र की राजधानी था। पेरिब्सेन तथा सेखुमुइ इस राजवंश के महत्वपूर्ण शासक थे। इसी काल में विभिन्न नोमों (प्रांतो) में कानूनी तथा आर्थिक संगठनों का विकास किया गया। इसके साथ ही राजा के कार्य और कर्त्तव्यों की भी शुरूआत हुई। राजा ने अनेक उपाधियां धारण करना शुरू किया। राज्य में नहरो और बांधों का निर्माण करवाना राजा का मुख्य कार्य था। इसी काल में नील नदी की वार्षिक बाढ़ को मापकर अध्ययन करना आरंभ किया। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रथम दो राजवंशो के काल में मिस्र ने काफी प्रगति कर ली थी।

(पिरामिड युग) :-

तीसरे राजवंश से छठे राजवंश (2778 B.C.-2300 B.C.) का काल प्राचीन राज्यों का काल है। चूंकि इस काल में बहुत से पिरामिड़ों का निर्माण हुआ इसलिए इसे पिरामिड युग के नाम से भी जाना जाता है।

तीसरा राजवंश :- (2778-2723 B.C.)

तीसरे राजवंश का पहला फराओं जोसर था, जो द्वितीय राजंवश के अंतिम शासक खसेखेमुई का पुत्र था। पिरामीड युग का यह महान शासक था सर्वप्रथम इसी के काल में पिरामिडों का निर्माण होना शुरू हुआ और इसने सीढ़ीनुमा पिरामिड़ बनाए। इमहोटेप इसका वजीर था और एक अच्छा वास्तुकार थी। सक्करा के पिरामिड का निर्माण इसी की देख-रेख में हुआ। इस काल में इनकी राजधानी मैम्फिस थी, इसी कारण इस काल काल का मैम्फाइर राज्य भी कहा जाता है। जोसर ने पहले के शासकों की भांति सैनिक अभियान भी किए तथा आसवान से ग्रेनाइट, तुरा से चुना पत्थर तथा सेन्नई से तांबा अपने यहां लाया। एक अभियान उसने दक्षिण के राज्यों के विरूद्ध भी किया और उन प्रदेशों को जीतकर अपने साम्राज्य की सीमा बढ़ाई। दक्षिण के किन-किन प्रदेशों को उसने जीता उनके नामों का उल्लेख नही मिलता। जोसर ने नूबिया पर अधिकार कर वहां शांति व्यवस्था स्थापित की थी। इसने अपने समय में पुरोहितों के प्रभाव को भी कम किया।

जोसर का प्रधानमंत्री अमनहोटेप एक बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति था। वह एक लिपिशास्त्री, चिकित्सक तथा वास्तुकला का महान स्थापत्यकार था। जोसर की सुफलता के पिछे इसी का हाथ बताया जाता है। अमन होटेप के सम्मान में सेमफिस के निकट एक स्मारक भी बनवाया गया था।

जोसर के काल में केवल राज्य-सीमाओं का ही विस्तार नही हुआ बल्कि मिस्र में सभ्यता और संस्कृति का भी विकास हुआ। इसने अनेक देवालया और पिरामिडों का निर्माण करवाया। इसलिए इसे पिरामिडों की कला को विकसित करने वाला तथा पाषाण स्थापव्थ कला का जनक भी कहा जाता है। इसके काल में कच्ची र्इंटों के स्थान पर पकी इंटों का प्रयोग भवन निर्माण में किया जाने लगा। सीढ़ीदार पिरामिड़ वास्तुकला का उतम उदाहरण है।

जोसर के उच्चधिकारियों के बारे में हमें अधिक ज्ञान नही है तथा इस राजवंश का अंत भी अज्ञात है। इसके उतराधिकारियों ने भी पिरामिडों का निर्माण करवाया। इसके एक उतराधिकारी ने दासूर (Dahsur) में दो पिरामिड बनवाएं। तृतीय राजवंश का अन्तिम शासक नेफ्रू था जोकि एक महान विजेता एवम् कला प्रेमी था इसने सिनाई पर सैनिक अभियान कर वहां फैले विद्रोह को शांत किया। उसे पश्चिम की ओर हरे-भरे प्रदेशों को अपने कब्जे में लाने वाला कहा गया है। उसने नूबिया पर भी सैनिक अभियान किया।

चतुर्थ राजवंश : (2723-2563 B.C.)

इस राजवंश का संस्थापक सनोफ्रू था। इसने अपने काल में दो सैनिक अभियान किए। प्रथम नूबिया पर तथा द्वितीय लिबिया पर जिनका विवरण हमें सिचाई की एक चट्टान पर अंकित मिलता है। नूबिया से वह 7000 तथा लिबिया से 11000 युद्धबंदियों को पकड़कर लाया। उसके दहसूर पलेरयो प्रस्तर पर अंकित लेख के अनुसार उसने 2 पिरामिडों का निर्माण करवाया तथा बहुत से देवालयों और किलों का भी निर्माण करवाया। इसने फ्यूनिसिया (Phoenicia) से लकड़ी का आयात किया और वहां एक कालोनी भी स्थापित की। उसने हतनूब पर आक्रमण किया तथा श्वेत खल्ली की खानों में मिस्र के मजदूरों को नियुक्त किया। उसका साम्राज्य उतर-पश्चिम में डेसुक से लेकर पूर्वी डेल्टा में बूबसतीस तथा दक्षिण में हेराकोन पोलीस तक फैला हुआ था। वह एक अच्छा प्रशासक था तथा केन्द्रीय शासन में विश्वास करता था। इसने समस्त प्रशासनिक गतिविधियों पर सरकार का प्रभुत्व एवम् निंयत्राण कायम किया। इसने अपने-अपने विश्वाशनीय और योग्य व्यक्तियों को बड़े पदों पर नियुक्त किया। इसका बड़ा पुत्र न केवल प्रधानमंत्री बल्कि मुख्य न्यायधीश भी था। इसके उतराधिकारियों चियोप्स (Cheops), चेफरेन (Chephren) तथा माइसेरीनस (My Cerinus) के बारे में हमें अधिक जानकारी नही। इनके काल में भी बड़े-बड़े भवनो का निर्माण किया गया, जिनमें गीजा का पिरामिड प्रसिद्ध है। माइसेरीनस का उतराधिकारी डडेफरा था, उसने अबु रोस में पिरामीड़ का निर्माण करवाया। इस वंश का अंतिम राजा शेप्संस्काफ था जिसने हेलिथोपोलिय के सूर्य पुजारियों की बढ़ती शक्ति को ललकारा। उसने सक्करा में पिरामिड़ो के स्थान पर सार केफेगस आकार का चार टागों वाला मस्तबर बनवाया। लेकिन चार वर्ष बाद इन पुजारियों में पांचवे राजवंश की स्थापना की।

पंचम वंश :- (2563-2423 B.C.)

पंचम राजवंश के सभी छह फराओं सूर्य के उपासक थे और अपने नाम के साथ ‘रा’ का प्रयोग करते थे। ऐसा माना जाता है कि इस वशं के पहले तीन फराओं एक पुजारी की पत्नी के सूर्य देव ‘रा’ से पैदा पुत्र थे। इस काल में सूर्य देव के भव्य मन्दिरों का निर्माण किया गया। खफरा, मेनकुरा तथा डडेफरा इस काल के महत्वपूर्ण शासक थे। इस काल में शासकों की धार्मिक तथा प्रजातंत्रात्मक प्रवृतियों के कारण इस वंश का पतन हुआ। क्योंकि इस काल में पुजारियों तथा अन्य उच्च अधिकारियों को बड़े पैमाने पर भूमि दान तथा अन्य साम्रगी दी गई। इस काल में साहुरा के सैनिक अभियान के अतिरिक्त किसी अन्य महत्वपूर्ण अभियान के बारे में जानकारी नही मिलती। साहुरा जो कि यूसरकाफ का पुत्र था, इतिहास में अपनी विजयों के लिए प्रसिद्ध है। उसने सैनिकों की संख्याँ में वृद्धि की तथा नौ सैनिक शक्ति भी बढ़ाई। फिर उसने फिनिशिया तथा पुव्ट पर आक्रमण किए। पुण्ट पर अधिकार करने से मिस्र से गोंद, किसमिस, स्र्वण, रजत और कीमती लकड़ियों भी वहां से लाई गई। इस वंश का अंतिम शासक संभवत: यूनिस था, जिसने दक्षिण दिशा में राज्य विस्तार करने के लिए अपने सैनिक अभियान भेजे। इसकी पुष्टि सीमान्त प्रदेश में पाए गए एक शिलालेख से होती है।

इस राजवंश में पहली बार धर्म और राजनीति का आपसी गठबन्धन देखने को मिलता हैं। सभी शासक ‘रे’ देवता (सूर्य देव) के पुजारी थे इसलिए इसके सम्मान में अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया गया। इन मन्दिरों के विशाल प्रांगण होते थे तथा प्रत्येक दिशा में पूजा के प्रकोष्ठ बने होते थे। पूजा की वेदियों में भी एकरूपता थी। मंदिर की भीतरी दिवारों पर चित्र बने हुए थे। राज्य के पांच अधिकारी इन देखभाल करते थे और उन पर एक निरिक्षक होता था, जो मंदिर की संपति का सरंक्षक था।

छठा राजवंश :- (2423-2300 B.C.)

छठे राजवंश में पेपी I तथा पेपी II दो महत्वपूर्ण शासक हुए। पेपी I ने लगभग 50 वर्षो तक शासन किया और अनेक सैनिक अभियान किए। उसने केवल प्राकृतिक संसाधनों की प्राप्ति के लिए ही सैनिक अभियान नही किए बल्कि अपने साम्राज्य विस्तार के लिए भी फिलीस्तीन तक आक्रमण किए। वेणी इसका प्रसिद्ध सेनानायक था, इस बेडूइन कबीलों के विरूद्ध पांच अभियानों पर भेजा गया। इसने नूबिया पर भी आक्रमण किया तथा पेपी के पुत्र मैरेनरा ने भी अपने पिता की मदद की। पेपी I के काल में बुस्तिस (Butastis) टानिस (Tanis), डेनडेरा (Dendera), कोट्टोस (Koptos) तथा स्बीगेस (Abydos) में मन्दिरों का निर्माण किया।

पेपी I के पश्चात् मेरेनरा शासक बना जिसने 5 वर्ष तक राज्य किया। इसने मेरीरा के एडफू नोमार्क (प्रांतपति) को नूबिया के सैनिक अभियान पर भेजा तथा इलिफन्टाइन के नोमार्क को दक्षिणी नूबिया में यम नामक स्थान पर विजय अभियान के लिए भेजा। इसकी मृत्यु के बाद पेपी II फराओं बना। इसका शासनकाल मिस्र के इतिहास में सबसे लंबा था। इसने अपने काल में उतरी तथा दक्षिणी दिशा में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। लेकिन इसके काल में नूबिया में अनेक विद्रोह हुए। सामाजिक सुधारों के नाम पर नोमार्को ने अनेक मुनाफा कमाया। पुजारियों तथा अन्य अधिकारियों ने भी अपने लिए जमीनें तथा अन्य अधिकार प्राप्त कर लिए जिस कारण राज्य की आर्थिक स्थिति बदहाल हो गई। अव्यवस्था की स्थिति का फायदा उठाते हुए सीमांत प्रदेशों के नोमार्को ने अपनी मनमानी शुरू कर दी और समस्त देश में जगह-जगह विद्रोह होने लगे तथा डेल्टा और मध्य मिस्र में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई। इस प्रकार 2300 B.C. के आसपास पिरामिड़ युग का अंत हो गया।

आर्थिक व्यवस्था :-

पिरामिड़ युग में मिस्र आर्थिक दृष्टि से काफी सम्पन्न था तथा इस काल का आर्थिक आधार कृषि कर्म था। इसके अतिरिक्त फराओं ने अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए व्यापार, उद्योग-धन्धों तथा अन्य आर्थिक साधनों, जैसे खनिजों की प्राप्ति के लिए किए गए सैनिका अभियानों को बढ़ाने में व्यक्तिगत रूची ली। इसी कारण इस काल की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ थी जिसकी पुष्टि इस काल के पिरामिड़ों, मन्दिरों तथ अन्य कलात्मक कृतियों से देखने को मिलती है।

कृषि :-

मिस्रवासियों के जीवन का आधार कृषि था। कृषि कार्यो में नील नदी का बहुत योगदान रहा। नील में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ से पहाड़ों से आई नई उपजाऊ मिट्टी इस प्रदेश में बिखर जाती और कृषक फसलें बो देते। बाढ़ के पानी से स्वयं सिचांई हो जाती तथा जल का स्तर घटने पर बांधो और नहरों द्वारा सिंचाई कार्य होता था। कृषि कार्यो में कृषक कम मेहनत करके अधिक उत्पादन पैदा करते थे। कृषि कार्यो में कृषक कम मेहनत करके अधिक उत्पादन पैदा करते थे। कृषि कर्म में उन्हें प्रशासन की ओर से भरपूर मदद मिलती थी। जैसे सिचांई के लिए पूरे राज्य में नहरें खुदवाना फराओं का महत्वपूर्ण कार्य था। इस काल के बहुत से मितिचित्रों पर राजा को नहर निर्माण के लिए पहला फावड़ा मारकर मिट्टी निकालते चिित्रात किया गया है।

समस्त प्रदेश की जमीन पर स्वामी फराओं स्वंय था, वहीं कृषकों को खेती के लिए भी भूमि देता था। राज्य कृषकों को नील नदी में आने वाली बाढ़ की पूर्व सूचना देता था। इस कार्य के लिए प्रशासन में अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की गई थी। अग्रिम सूचना मिलने पर कृषक होने वाले नुकसान से बच सकते थे। इसके अलावा कृषकों को राज्य की ओर से प्रशिक्षण भी दिया जाता था। कृषि स्थिति की जांच के लिए, अनाज पर नियंत्रण रखने के लिए तथा कर वसूलने के लिए राज्य द्वारा अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। फसल का घनत्व (denisty) तथा ऊंचाई माप कर निर्धारित किए जाते थे। यह कर या लगान आय का 1/5 से 1/10 तक होता था। चूंकि इस काल में मुद्रा प्रणाली अस्तित्व में नही थी इसलिए कर के रूप में अन्न वसूला जाता था। जो कृषक कर की अदायगी नही करता था उसे राज्य की ओर से सिचांई के लिए नहरों का पानी नही दिया जाता था। इस काल में मुख्यत: गेंहू, जौ, तिलहन, विभिन्न दालें तथा मटर की खेती की जाती थी। मिस्र की काली मिट्टी में पैपीरस, पटरसन और कपास की पैदावार प्रचुर मात्रा में होती थी। अनाज के साथ सब्जियां भी पैदा की जाती थी। फलों में खजूर, जैतून, अंजीर और अंगूर की भी खेती की जाती थी इस काल के भित्ति चित्रों में कृषकों को विभिन्न अवस्थाओं में दर्शाया गया है जैसे हल चलाना, अन्न ओसावन, फसल काटना, ढुलाई अन्न निकालना, अन्नागारों में भंडारण के साथ-साथ विभिन्न पशुओं तथा राजकीय कर्मचारियों को फसलों का नाप लेकर निर्धारण करते दिखाया गया हैं।

पशुपालन :-

कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी मिस्र वासियों का दूसरा प्रमुख धन्धा था। पशु कृषि से सम्बद्ध थे इसलिए उनके रखरखाव पर विशेष ध्यान दिया गया। बैल और खच्चर द्वारा हल जोता जाता था तथा वे भारवाहक के रूप में प्रयुक्त होते थे। गाय, भेड़ बकरी इत्यादि दूध, मांस और ऊन के लिए पाले जाते थे। सूअर और मुर्गियों को भी मांस प्राप्ती के लिए पाला जाता था। इस काल में बंदरों को भी पालतू बनाया गया ये विशेषत: ऊंचे पेड़ो से फल तोड़ने में मदद करते थे। नील नदी तथा इससे निकली नहरों से इस काल के लोग मछलियों तथा घड़ियाल का शिकार कर भोजन के रूप में प्रयोग में लाते थे।

उद्योग-धन्धे :-

मिस्र की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि नील नदी के आसपास का क्षेत्र छोड़कर बाकि समस्त क्षेत्र रेगिस्तान है। जहां पर खनिज पदार्थो का काफी अभाव है तथा पेड़-पौधे ज्यादा ना होने के कारण लकडियां भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नही है। इस कमी को पिरामिड युग के फराओं द्वारा काफी हद तक दूर किया गया। शासकों ने सैनिक अभियानों के तहत नूबिया, लिबिया, सिनाई पर आक्रमण कर वहाँ के खनिज पदार्थो का मिस्र मे लाए। इससे न केवल घरेलू उद्योग धन्धो के लिए कच्चे माल की प्राप्ती हुई बल्कि यह राज्य की आय का भी एक स्त्रोत था। इसी प्रकार लकड़ी भी बाहर से आयात की जाती थी। दूर-दराज के प्रदेशों से इन वस्तुओं को मिस्र तक लाने के लिए बड़े जलस्त्रोत विदेशों की यात्रा करते थे।

धातु उद्योग :-

मिस्र का धातु उद्योग काफी विकसित था। इस काल के कारीगर धातुओं के गलाने की कला से परिचित थे। तांबे को पिघलाकर विभिन्न प्रकार के अस्त्रा-शस्त्रा, बर्तन और अन्य उपकरण बनाए जाते थे। सोने के विभिन्न प्रकार के आभूषण बनाए जाते थे। इस काल के अनेक भितिचित्रों में स्वर्णकारों को कार्य करते हुए चिित्रात किया गया है। इस काल के फराओं, सामंत तथा प्रदेश के उच्च अधिकारी स्वर्ण के विभिन्न आभूषणों तथा साज-साम्रगी के लिए तैयार अन्य कलाकृतियों का प्रयोग करते थे। असीरिया और नूबिया से देवदार आबनूस की लकड़ी मंगवाई जाती थी जिनसे िकृतियां, पोत तथा फरनीचर बनाया जाता था। इस काल के पिरामिड़ो में पाई जाने वाली लकड़ी की विभिन्न कलाकृत्तियों तथा आराम कुर्सियों और मेजों इत्यादि से पता चलता है कि काष्ठ उद्योग इस काल में काफी उन्नत था। लकड़ी से दैनिक उपभोग में प्रयुक्त की जाने वाली भी विभिन्न वस्तुओं का निर्माण किया जाता था।

हाथी दांत का विदेशों से आयात किया जाता था और उसकी विभिन्न कलात्मक वस्तुएँ बनाई जाती थी जिन्हें शासक वर्ग तथा समाज के अन्य उच्च वर्ग के लोग अपने घरों में सजावट के लिए रखते थे। हाथी दांत के आभूषण भी बनाए जाते थे। पाषाण उद्योग भी प्रचलित था इसमें संलिप्त कारीगर काफी दक्ष थे। विदेशों से पत्थरों का आयात किया जाता था। पत्थरों को तराशने का कार्य बड़ी निपुणता से किया जाता था। इस काल में बीस-बीस टन भारत के बड़े-बड़े पाषाण खंडों को काटकर तराशा जाता था और इमारतें तैयार की जाती थी। इस काल में निर्मित पिरामिड और मन्दिर जिन्हें बड़े-बड़े पाषाण खंड़ो से जोड़कर बनाया गया है इस काल की उच्च तकनीक और दक्ष शिल्प का उदाहरण है। इसके अतिरिक्त पत्थरों के विभिन्न मृदभांड, सज्जा साम्रगी जैसे फूलदान, तश्तरियां और खिलौने आदि बनाए जाते थे।

मृदभांड कला का भी इस काल में काफी विकास हो चुका था। यद्यपि इस काल के मृदभांड कलात्मक दृष्टि से सुन्दर नही थे, परन्तु वे उपयोगी थे। मृदभांड खाद्य-साम्रगी भर कर रखने तथा तेल और शराब इत्यादि पेय पदार्थ भर के रखने के काम आते थे।

पेपीरस नामक घास से कागज बनान, चमड़े तथा खालों से वस्त्र-निर्माण, रस्सी, चटाइयां और चप्पलें इत्यादि बनाना अन्य उद्योग-धन्धे थे। मकानों का निर्माण करने के लिए कच्ची और पकी इंटों का प्रयोग किया जाता था, इन्हें बनाने का उद्योग भी विकसित था। वस्त्र उद्योग इस काल में काफी विकसित था। सुत कातना और बुनाई का कार्य सामान्यत: घरों की स्त्रियां करती थी। घरों से तकुए और तकलियों प्राप्त हुए है जो इस ओर इशारा करते है। छोटे कृषक और दास भी कारखानों में कार्य करते थे। उच्च वर्ग के लोग उत्तम कोटि के लिनन वस्त्र धारण करते थे। इनके वस्त्र ज्यादातर चमकीले और भडकाऊ होते थे निम्न वर्ग के लोग साधारण वस्त्र पहनते थे।

जैतून का तेल निकालने का उद्योग भी इस काल में महत्वपूर्ण था।

इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की कलात्मक वस्तुओं के निर्माण में भी काफी कारीगर संलिप्त थे। इस काल के कारीगरों की चित्रकारी के प्रमाण हमें पिरामिड़ो तथा मन्दिरों की भीतरी दिवारों पर और इस काल के मृदंभाड़ो पर देखने को मिलती है।

व्यापार प्रणाली :-

चूंकि मिस्र में नील नदी के आसपास का क्षेत्र छोड़कर सारा प्रवेश मरूस्थल है। इसलिए नील नदी और उसकी नहरों द्वारा ही व्यापारिक गतिविधियाँ होती थी। विदेशो से व्यापारी लकड़ियाँ, स्र्वण, रजत , हाथीदांत, मसाले, पत्थर और सुंगधित पदार्थ मंगवाया करते थे। लकड़ियों से नाव और जहाज बनाए जाते थे। सिसली से ग्रेनाइट, अनातोनिया से चांदी, सिनाई से तांबा, हमामात से पत्थर, अभाय से चूना पत्थर मंगवाया जाता था रत्नमीण और रंगों का भी आयात सिनाई प्रायद्वीप से किया जाता था।

निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में अनाज, जैतून का तेल, मिट्टी के पण तथा अन्य कलात्मक वस्तुएं शामिल थी। व्यापार विनिमय प्रणाली (Barlir-system) पर आधारित था जिसमें वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था। इस काल में वस्तुओं की सूची थी निर्धारित होती थी कि अमुक वस्तु के बदले कौन सी वस्तु और कितनी मात्रा में मिल सकती थी। जैसे एक कच्चे बर्तन के बदले एक मछली, एक गुच्छा प्याज के बदले एक पंखा इत्यादि।

पिरामिड़ युग में समस्त व्यापार पर सरकारी नियंत्रण था। व्यापार के लिए जरूरी नियमावली का निर्माण राज्य द्वारा किया गया था। जिसका पालन सरकारी और मुक्त व्यापारियों को करना पड़ता था। इस काल में व्यापर के लिए आपसी लिखित अनुबंधो की शुरूआत हो गई थी। व्यापार के लिए आदेश पत्र खरीदी और बेची साम्रगी की रसीद ली जाती थी। व्यापार संबधी वसीयतनायें भी इस काल में लिए जाते थे। इन कार्यो के लिए बहुत से लिपिक नियुक्त थे जो मिट्टी की पट्टिकाओं और मुद्राकों पर इस प्रकार के अनुबन्ध अंकित करते थे। इस प्रकार के अनेक व्यापारिक अनुबंध लेख, पत्र इत्यादि प्राप्त हुए है। व्यापार के लिए हुण्डियों का प्रयोग भी किया जाता था। व्यापार के लिए सोने-चांदी-तांबे की निश्चित भार वाली अंगूठियों और छल्लों का प्रयोग माध्यम के तौर पर किया जाता था।

चूंकि व्यापार पर राज्य का नियंत्रण था इसलिए मुक्त व्यापार काफी कम था जिसके अभाव में व्यापारी उत्साहपूर्ण व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेते थे कर के रूप में भी उनके लाभ का अंधिकाश भाग राज्य ले लेता था। इसलिए उन्हें उतना मुनाफा नही मिल पाता था। लेकिन इस काल में व्यापिरयों ने अपने संघों का निर्माण कर लिया था ये श्रेणियां या संघ व्यापारियों के हितों की रक्षा करती थी।

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