परमाणु के मौलिक कण क्या है?

अनुक्रम
परमाणु किसी भी तत्व का सबसे छोटा कण है, जो अपने रासायनिक गुणों को बरकरार रखता है। किसी भी तत्व के परमाणु का आकार व द्रव्यमान दूसरे तत्व के परमाणु से भिन्न होता है। इन परमाणुओं को भारतीय व यूनानी दार्शनिकों द्वारा शुरूआत में अविभाज्य माना जाता था। जैसा कि पहले भी बताया गया है कि इसी कारण इसका नाम परमाणु पड़ा, ग्रीक भाषा में इसका अर्थ है ‘‘अविभाज्य कण’’ आज हम जानते हैं कि परमाणु विभाज्य है। परमाणु को उनसे अधिक छोटे कणों में विभाजित किया जा सकता है हालाकि वे इस प्रक्रिया में अपनी रासायनिक पहचान खो देते हैं। लेकिन इसके बाबजूद परमाणु द्रव्य का मूल कण है।

परमाणु का आकार क्या है?

परमाणु बहुत छोटा है। इतना छोटा कि न हम इसकी कल्पना कर सकते हैं और न किसी से तुलना। इसके आकार को हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। अटलाटिक सागर में जितने चम्मच पानी है उसके लगभग तीन गुणा परमाणु एक चम्मच पानी (लगभग 1 मि.ली.) में विद्यमान है। इसके अलावा अगर लाखों परमाणुओं की एक ढेरी बना दी जाये तो भी एक कागज की परत के बराबर मोटी होगी। एक तत्व के परमाणु दूसरे तत्व के परमाणुओं से द्रव्यमान में ही नहीं बल्कि आकार में भी भिन्न हैं जैसा कि डाल्टन द्वारा प्रस्तावित है। अब सवाल यह है कि हम एक परमाणु के आकार, द्रव्यमान, और अन्य गुणों के लिये क्यों परेशान हों। वजह साफ है हमारे चारों ओर मौजूद सभी द्रव्य परमाणुओं से बने हैं। यह आयताकार है, परिपत्रा या गोलाकार? एक परमाणु के वास्तविक आकार की कल्पना करना मुश्किल है लेकिन सभी व्यावहारिक प्रयोजनों के लिये आकार में गोलाकार रूप में लिया जाता है और यही वजह है कि हम इसके ित्राज्या की बात करते हैं। क्योंकि आकार बेहद छोटा है और हमारी आंखों के लिये अदृश्य है हम इसके आकार को नैनोमीटर (1 नै.मी = 10–9 मीटर) के पैमाने पर व्यक्त करते हैं। आप इसके आकार का अनुमान निम्न सारणी से लगा सकते हैं -

सापेक्ष आकार

त्रिज्या (मीटर में)उदाहरण
10–10
10–4
10–1
0.2×10–1
हाइड्रोजन के परमाणु
रेत का कण
तरबूज
क्रिकेट की गेंद


हम परमाणुओं को नग्न आंखों से नहीं देख सकते लेकिन आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करके परमाणुओं की छवि को तत्वों की सतह पर देखा जा सकता है। इस तकनीक को स्कैनिंग टनलिंग माइक्रोस्कॉपी (एस.टी.एम.) के रूप में जाना जाता है।

एस.टी.एम. तकनीक द्वारा कापर की सतह की छवि
एस.टी.एम. तकनीक द्वारा कापर की
सतह की छवि। परमाणु की सतह को बड़े आकार
की छवि में देखा जा सकता है

परमाणु द्रव्यमान

डाल्टन ने परमाणु के द्रव्यमान की अवधारणा को दिया। उनके अनुसार एक ही तत्व के परमाणुओं का एक ही द्रव्यमान होता है। लेकिन विभिन्न तत्वों के परमाणुओं का द्रव्यमान भिन्न होता है। चूंकि डाल्टन के लिये एक परमाणु का द्रव्यमान को मापना सम्भव नही था अत: उसने एक यौगिक में प्रयुक्त तत्वों के सापेक्ष द्रव्यमान को माप का आधार बनाया और सापेक्ष परमाणु भार की प्रस्तुति की। उदाहरण के लिये प्रयोग के द्वारा हम ज्ञात कर सकते हैं कि 1.000 ग्राम हाइड्रोजन व 7.9367 ग्राम ऑक्सीजन के संयोग से पानी बनता है। अगर हमे पानी का सूत्रा ज्ञात हो तो हम आसानी से एक ऑक्सीजन परमाणु का भार हाइड्रोजन परमाणु के सापेक्ष निर्धारित कर सकते हैं। उन दिनों डाल्टन के पास पानी के गठन में संयोग करने वाले तत्वों के परमाणुओं के अनुपात का निर्धारण करने का तरीका नहीं था। उसके अनुमान के अनुसार यह संभावना थी कि हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के परमाणु संख्या में बराबर थे। इस धारणा से यह निष्कर्ष निकला कि ऑक्सीजन के परमाणु का भार हाइड्रोजन के परमाणु के भार के मुकाबले 7.9367 गुणा अधिक होगा। यह तथ्य सही नहीं था। आज हम जानते हैं कि हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या पानी में ऑक्सीजन के परमाणुओं की संख्या (पानी का सूत्रा H2O) से दो गुनी है। अत: ऑक्सीजन के परमाणु का सापेक्ष भार हाइड्रोजन के परमाणु के भार की तुलना में 2 × 7.9367 = 15.873 गुणा अधिक है। डाल्टन के बाद कर्इ वैज्ञानिकों ने बहुत से तत्वों के परमाणुओं के सापेक्ष भार निर्धारित किये। जिसके लिये हाइड्रोजन परमाणु का भार इकार्इ माना गया। बाद में हाइड्रोजन के स्थान पर ऑक्सीजन को परमाणु भार स्केल का मानक चुना गया क्योंकि ऑक्सीजन अपेक्षाकृत अधिक तत्वों से संयोग करके बड़े पैमाने पर यौगिक बनाने में सक्षम है।

सन 1961 में कार्बन तत्व के समस्थानिक कार्बन C-12 (अथवा 12 6C) को परमाणु भार स्केल के मानक के रूप में अपनाया गया। यह स्केल उपकरण, मास स्पेक्ट्रोमीटर द्वारा परमाणु भार की निर्धारण विधि पर निर्भर करता है। मास स्पेक्ट्रोमीटर का अविष्कार 20वीं सदी की शुरूआत में हुआ और इसका प्रयोग परमाणु भार ज्ञात करने के लिये होने लगा। परमाणुओं का भार C-12 परमाणु व्यापक पैमाने के साथ तुलना के द्वारा प्राप्त करते हैं। वास्तव में C-12 समस्थानिक को परमाणु भार की इकार्इ के रूप में माना जाता है और यह एक परमाणु कार्बन C-12 के भार का 1/12 भाग के बराबर होता है। परमाणु भार इकार्इ को संक्षेप में amu द्वारा प्रदर्शित करते हैं। आजकल परमाणु भार इकार्इ amu को एकीकृत भार इकार्इ के रूप में जाना जाता है और इसे अक्षर ‘u’ से चिन्हित करते हैं।

amu में व्यक्त तत्वों के परमाणुओं के सापेक्ष भार परमाणु भार कहलाते हैं। आजकल परमाणु भार की जगह परमाणु द्रव्यमान का उपयोग होता है।

इसके अतिरिक्त आपने देखा कि डाल्टन के अनुसार एक तत्व में सभी परमाणुओं का द्रव्यमान बराबर है लेकिन बाद में पाया गया कि स्वाभाविक रूप से मिलने वाले तत्वों के सभी परमाणुओं का द्रव्यमान एक सा नहीं है। हम निम्न अनुभाग में इस तरह के परमाणुओं के बारे में अध्ययन करेगे। जिस परमाणु द्रव्यमान का हम रासायनिक अभिक्रिया व रासायनिक गणना के लिये प्रयोग करते हैं। वह औसतन परमाणु द्रव्यमान है जो तत्वों के समस्थानिकों के सापेक्ष बहुतायत पर निर्भर करता है।

समस्थानिक और परमाणु द्रव्यमान

डाल्टन के अनुसार परमाणु एक अविभाज्य कण होता है। बाद में शोध से यह साबित हुआ कि परमाणु स्वयं विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म मौलिक कणों से बना है। जैसे कि इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन व न्यूट्रॉन। इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित कण है। प्रोटॉन धनआवेशित कण है। एक परमाणु में इलेक्ट्रॉन व प्रोटॉन की संख्या बराबर होती है। चूकि इलेक्ट्रॉन का आवेश प्रोटॉन के आवेश के सम और विपरीत होता है इसलिये एक परमाणु विद्युत तटस्थ (उदासीन) होता है। प्रोटॉन परमाणु के केन्द्र में नाभिक में रहते हैं और नाभिक ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों से घिरा होता है।

नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था
 (a) हाइड्रोजन (b) कार्बन और (c) ऑक्सीजन परमाणु 

नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या को उस तत्व का परमाणु क्रमांक (Z) कहते हैं। उदाहरण के लिये चित्र में ऑक्सीजन नाभिक में 8 प्रोटॉन, कार्बन नाभिक में 6 प्रोटॉन और हाइड्रोजन नाभिक में केवल 1 प्रोटॉन है। इसलिये ऑक्सीजन, कार्बन और हाइड्रोजन की परमाणु संख्या क्रमश: 8, 6 और 1 है। नाभिक में स्थित उदासीन कणों को न्यूट्रॉन कहा जाता है। एक प्रोटॉन और एक न्यूट्रॉन का द्रव्यमान लगभग एक ही है।

नाभिक का कुल द्रव्यमान = प्रोटॉन का द्रव्यमान + न्यूट्रॉन का द्रव्यमान 

किसी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों की संख्याओं के योग को उस परमाणु की द्रव्यमान संख्या (A) कहते हैं। परंपरा के अनुसार किसी भी तत्व के परमाणु प्रतीक के निचले बायें कोने में उसकी परमाणु संख्या और ऊपरी बायें कोने में द्रव्यमान संख्या लिखी जाती है।

उदाहरण के लिये 12 6C चिन्ह यह संकेत करता है कि यहाँ कुल 12 नाभिकीय कण, कार्बन परमाणु के नाभिक में मौजूद हैं। जिसमें 6 प्रोटॉन हैं। इस प्रकार वहां 6 न्यूट्रॉन होने चाहिये (12 – 6 = 6) इसी प्रकार 16 8O संकेत करता है कि यहा 8 प्रोटॉन और 16 नाभिकीय कण है (द्रव्यमान संख्या) (8 प्रोटॉन + 8 न्यूट्रॉन) क्योंकि परमाणु विद्युत उदासीन है। ऑक्सीजन में 8 प्रोटॉन और 8 इलेक्ट्रॉन है। इसके अलावा परमाणु संख्या (Z) के आधार पर एक तत्व के परमाणु दूसरे तत्व के परमाणु से भिन्न होते हैं।

तत्व को परिभाषित कर सकते हैं कि एक पदार्थ है जिसके सभी परमाणुओं की परमाणु संख्या एक समान होती है।

परन्तु किसी भी तत्व के नाभिक में न्यूट्रॉन की संख्या अलग-अलग हो सकती है। उदाहरण के लिये प्रकृति में पाए जाने वाले ऑक्सीजन में प्रोटान की संख्या स्थिर होती है जो उसे अन्य तत्वों से अलग बनाती है परन्तु उसके नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है। जिस कारण से एक ही तत्व के परमाणुओं का द्रव्यमान अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिये ऑक्सीजन के एक प्रकार के परमाणु में 8 प्रोटॉन व 8 न्यूट्रॉन, दूसरे प्रकार में 8 प्रोटॉन व 9 न्यूट्रॉन तथा तीसरे प्रकार में 8 प्रोटॉन व 10 न्यूट्रॉन मौजूद हैं। हम इन ऑक्सीजन के परमाणुओं को क्रमश: ऐसे दर्शाते हैं 8O, 17 8O, 18 8OA ऐसे परमाणुओं को जिनका परमाणु क्रमांक (Z) समान होता है परन्तु द्रव्यमान संख्या (A) भिन्न होती है, समस्थानिक (isotope) कहते हैं। एक ही तत्व के परमाणु द्रव्यमान में अन्तर को ध्यान में रखते हुये हम तत्वों के औसत परमाणु द्रव्यमान को आधार बनाते हैं। इसकी गणना सभी समस्थानिकों की प्रचुरता पर निर्भर करती है।

डाल्टन का परमाणु सिद्धान्त

अंग्रेजी वैज्ञानिक जॉन डाल्टन पहले वैज्ञानिक नहीं है जिनके द्वारा परमाणुओं के अस्तित्व का वर्णन किया गया। ऐसे विचार बहुत प्राचीन काल में प्रचलित थे हालांकि इसमें डाल्टन का प्रमुख योगदान है क्योंकि उन्होंने इन विचारों को उचित क्रम में व्यवस्थित किया और परमाणुओं के अस्तित्व का सबूत दिया। उन्होंने दिखाया कि लवाइजर और प्राउस्ट द्वारा व्यक्त किया गया द्रव्यमान सबंध (द्रव्यमान के संरक्षण के नियम तथा स्थिर अनुपात के नियम के रूप में) विभिन्न तत्वों की परमाणुओं के अस्तित्व की परिकल्पना के द्वारा सबसे उपयुक्त व्याख्या है।

1808 में डाल्टन ने रासायनिक दर्शन की एक नर्इ प्रणाली प्रकाशित की, जिसके अनुसार निम्नलिखित परमाणु सिद्धान्त का वर्णन है।
  1. द्रव्य सूक्ष्म अविभाज्य परमाणुओं से बना है।
  2. एक रासायनिक तत्व के सभी परमाणुओं के भार व दूसरे गुण एक समान होते हैं।
  3. भिन्न-भिन्न तत्वों के परमाणु एक दूसरे से भिन्न होते हैं तथा उनके परमाणु भार भी भिन्न-भिन्न होते हैं।
  4. परमाणु रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लेते हैं तथा अभिक्रियाओं में विघटित नहीं होते हैं तथा अपनी पहचान बनाये रखते हैं।
  5. विभिन्न तत्वों के परमाणु परस्पर सरल संख्यात्मक अनुपातों में संयोग करते हैं और यौगिक बनाते हैं।
डाल्टन का चौथा सिद्धान्त स्पष्ट रूप से द्रव्य का संरक्षण नियम से संबंधित है। एक तत्व के प्रत्येक परमाणु का एक निश्चित द्रव्यमान होता है। इसके अलावा प्रत्येक रासायनिक प्रतिक्रिया में परमाणु की पुर्नव्यवस्था होती है इसलिये अभिक्रिया के बाद, उत्पाद का भार अपरिवर्तित रहता है। पाँचवाँ सिद्धान्त एक स्थिर अनुपात के नियम की व्याख्या करने का प्रयास है। जब दो तत्व परस्पर संयोग करके यौगिक बनाते हैं तो तत्व के भिन्न-भिन्न भारों में एक सरल अनुपात अवश्य होगा। क्योंकि परमाणु का एक निश्चित द्रव्यमान होता है अत: यौगिक में भी तत्वों के द्रव्यमान का एक निश्चित अनुपात होता है।

डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त ने न केवल द्रव्यमान संरक्षण और स्थिर अनुपात के नियम के बारे में विस्तार से बताया, उन्होंने नये नियम भी बनाये। उन्होंने अपने सिद्धान्त के आधार पर गुणित अनुपात के नियम की रचना की इस नियम के अनुसार: ‘‘जब दो तत्व परस्पर संयोग करके दो या दो से अधिक यौगिक बनाते हैं तो एक तत्व के भिन्न-भिन्न भार, जो दूसरे तत्व के निश्चित भार से संयोग करते हैं, परस्पर सरल अनुपात में होते हैं।’’ उदाहरण के लिये कार्बन व ऑक्सीजन से दो तरह के यौगिक बनते हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड व कार्बन डार्इऑक्साइड। कार्बन मोनोऑक्साइड में कार्बन के प्रत्येक 1.000 ग्राम के साथ 1.3321 ग्राम ऑक्सीजन संयोग करती है। जबकि कार्बन डाइऑक्साइड में कार्बन की 1.000 ग्राम मात्रा के साथ ऑक्सीजन की 2.6642 ग्राम संयोग करती है। दूसरे शब्दों में कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीजन का भार कार्बन मोनोऑक्साइड की तुलना में दोगुणा होता है। (2.6642 ग्राम = 2 × 1.3321 ग्राम) जो कार्बन के एक निश्चित भार से संयोग करता है। परमाणु सिद्धान्त के अनुसार कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीजन के परमाणु की संख्या, एक निश्चित कार्बन परमाणु के लिये कार्बन मोनोऑक्साइड से दो गुनी होती है। गुणित अनुपात के नियम की रचना एक महत्वपूर्ण dne था इसके बाद परमाणु सिद्धान्त की वैधता को सभी वैज्ञानिकों ने स्वीकारा।

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