वैदिक सभ्यता का इतिहास

अनुक्रम
वेदों से प्राप्त समाज एवं उनकी आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन को हम दो प्रमुख भागों में बांट सकते है। प्रथम ऋग्वैदिक संस्कृति का भाग है प्रारिम्भक वैदिक संस्कृति, जिसकों जानने का स्त्रोत ऋग्वेद है जोकि आर्यो का प्राचीनतम ग्रंथ है। उतरवैदिक संस्कृति का ज्ञान हमें यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद इत्यादि से होता है। परन्तु सर्वप्रथम हमें यह जान लेना आवश्यक है कि क्या आर्य भारत के ही मूल निवासी थे या कहीं दूसरे देश से प्रस्थान कर भारत में बस गए थे। इस विवाद की शुरूआत तब हुई जब कलोरेंस के एक व्यापारी ने, जोकि गोआ में 5 वर्ष तक निवास कर (1583-88), वापिस जाते समय यह खोज कर सका कि संस्कृत तथा यूरोप की महत्वपूर्ण भाषाओं में कोई सम्बन्ध है। 1786 ई0 में सर विलियंम जोनस ने सुझाव दिया कि संस्कृत तथा यूरोप की महत्वपूर्ण भाषाओं में संबध का कारण है कि इन भाषाओं को बोलने वाले कभी एक समय में इक्कठें रहे होगें। उन्होनें ग्रीक, लैटिन, गोथिक, सेल्टिक, संस्कृत पर्शियन आदि भाषाओं का उद्गम केन्द्र एक ही माना तथा इन भाषाओं को इण्ड्रों यूरोपियन नाम दिया।

आर्यो के मूल देश के बारे में विभिन्न के मत है। कुछ विद्वान आर्यो को भारत का मूल निवासी मानते है तो कुछ इन्हें विदेशी मानते है जो मूलत: दूसरे देश से आकर भारत में बस गए। अविनाश चन्द्र दास आर्यो को सप्त सैन्धव प्रदेश, महामहोपाध्याय गंगावाभ का इन्हें ब्रह्यर्षि देश, राजबली पांड़े के विचारों अनुसार मध्य देश, श्री एल.डी. कब्ला आर्यो को कश्मीर या हिमाचल प्रदेश, श्री डी एस ित्रवेदी के मतानुसार देविका प्रदेश आदि का मूलनिवासी मानते हैं गाइलण महोदय के मतानुसार आर्यो का मूल निवास स्थान हंगरी श्री बालगंगाधर तिलक आर्यो का आदि देश उतरी ध्रुव मानते हैं। पेंका नामक विद्वान के विचारों से इनका मूल निवास जर्मनी है, डॉ0 मच के अनुसार पश्चिमी बल्टिक क्षेत्र, नेहरिंग के अनुसार रूस आर्यो का मूल निवास स्थान मानते है। परन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि आर्य मध्य एशिया से भारत आए है। क्योंकि इसी क्षेत्र से हमें आर्यो के देवताओं इन्द्र, वरूण, मित्र तथा नस्त्य इत्यादि के प्रमाण एलअमरणा तथा बोगाणकोई नामक स्थलों से मिलते है। इसके अलावा आर्यो के अधिकतर धार्मिक कर्मकाण्डों के प्रमाण भी इसी जगह से मिलते है। जैसे - मृतकों का दाहसंस्कार, अश्व केन्द्रित अल्पतंत्रा, अग्नि पूजा, रथगाड़ी, छोड़ों का प्रथम प्रयोग इत्यादि का प्रमाण मध्य एशिया के स्थलों पर देखने को मिलता है। गांधार श्वाधान संस्कृति के घूसर मृदभांडों पर आर्य मृदभांडों की छाप मिलती है।

आर्य भारत में सर्वप्रथम सरस्वती नदी एवं तथा उसके आस-पास के क्षेत्र तक सीमित थे। इस काल में ये अपने मवेशियों के साथ विभिन्न कबिलों में बंटे हुए थे और इन्हें पूर्वी भारत के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी क्योंकि ऋग्वेद में सरयु, गंगा, नदियों का उल्लेख मात्रा एक या दो बा हुआ है। इस काल में पुरू, युद्ध और तुर्वसु आदि महत्वपूर्ण कबिले थे। लेकिन उतरवैदिक काल में आर्यो ने गंगा-यमुना दोआब के क्षेत्र में अपना प्रसार किया और बड़े-2 नगरों एवं जनपदों की स्थापना की।

ऋग्वैदिक कालीन राज्य सरंचना 

इस काल में हमें राज्य की सरंचना का अधिक ज्ञान, साक्ष्यों के अभाव में नही है। प्रारंभिक वैदिक काल में राज्य का पूर्ण स्वरूप सामने नहीं आया था। इसकी जानकारी हमें प्राचीन स्त्रोतों से मिलती है। प्रसिद्ध सप्ताहंग सिद्धांत के आधार पर यदि हम देखें तो इस काल में ये सातों अंग 1. राजा 2. मंत्री मण्डल 3. क्षेत्र 4. संसाधन 5. किले 6. सेना 7. सहयोगी, में से अधिकतर अंग नही थे। प्रांरभिक वैदिक समाज अलग-अलग कबीलों में विभाजित था, जिन्हें जन या विश कहते थे। इन कबीलों के अनार्यो से परस्पर संघर्ष चलता रहता था इसके अलावा ये आपस में भी युद्ध करते रहते थे। इस काल के प्रमुख कबीले युद्ध, तुरकसु, द्रहयु, अनु और पुरू इत्यादि थे। ये एक स्थान पर टिक कर निवास नहीं करते थे बल्कि जगह-जगह घूमते रहते थे। यानि लंबे अरसे तक कहीं स्थायी निवास नहीं करते थे। इस प्रकार क्षेत्र, जो राज्य का एक महत्वपूर्ण अंग होता है इस काल में नही था। इस काल में ना कोई महत्वपूर्ण शासक था बल्कि प्रत्येक कबीले (जन) का अपना अलग मुखिया होता था जो राजन कहलाता था। यद्यपि यह पद वंशानुगत होता था जिसका प्रमाण हमें दिवोदास तथा सुदास राजाओं से मिलता है। इसके अतिरिक्त ऐसे भी उदाहरण है जब सर्वसम्मती से राजा का चुनाव किया हो तथा आवश्यकता पड़ने पर जनता ने राजा को पदच्युत कर दिया। वंशानुगत राज्याधिकार तभी तक वैध था जब तक जनता उसकों अनुमोदित करती। इस काल ने राज्य के कोई संसाधन नही थे तथ लोगों की सम्पति उनके मवेशी होते थे। जिसके पास ज्यादा गाय होती वह ज्यादा सम्पन्न माना जाता था। राजकोष जो राज्य का एक महत्वपूर्ण अंग होता है इस काल में नही था। इस काल में किले और सैनिकों का महत्व था। सेना स्थायी नही थी, आवश्यकता पड़ने पर आम जनता सैनिक कार्य भी करती थी। सेना में पैदल और घुड़सवार दोनों शामिल थे। राजा या राज्य के सहयोगी राज्य का अन्तिम सांतवा अंग माना जाता है इस काल में सभी जन आपस में झगड़ते रहते थे यद्यपि दश राजाओं के संघ का संयुक्त युद्ध करने का प्रमाण ऋग्वेद में मिलता है।

उपर्युक्त साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि इस काल में राज्य सरंचना अभी नही हुई थी। इस काल में राज्य का स्वरूप कबीलाई संरचना पर आधारित था। जिसमें कबीलें के लोगों के आपसी संबध थे। इस काल के जनों का कोई स्थाई क्षेत्रीय आधार नही था तथा राजन या कबीलें का मुखिया अपने कबीलें के साथ हर समय घूमता रहता था। इस काल में अश्व केन्द्रित राजतंत्र का काफी महत्व था जिनके पास घोड़े थे उन्हें उच्च माना जाता था। राज्य सता के सूचक संघटनों के प्रमाण हमें ऋग्वेद से नही मिलते। ऋग्वेद में वर्णित वृ, वृता, जन, विश, गण, गृह, व्रजा तथा ग्राम इत्यादि शब्दों का उल्लेख जनसमूह अथवा योद्धा समूह के लिए हुआ है। जो इस बात की पुष्टि करता है कि ऋग्वैदिक समाज अस्थाई और घुमक्कड जनसमुदाय था तथा रक्त संबधों पर आधारित जन-जातिय समाज संगठित था।

राजनैतिक इकाइयां 

ऋग्वैदिक काल में सामान्यत: राजतन्त्रात्मक सरकार थी। राजन शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में अनेक बार हुआ है। ऋग्वेद की एक ऋचा में सिन्धु प्रदेश के राजा का उल्लेख है तथा अन्य में सरस्वती पर निवास कर रहे राजा चित्र का उल्लेख है। सुदास का दस राजाओं के संगठन से युद्ध के प्रमाण मिलते है। दान-स्तुतियों में भी राजाओं का उल्लेख मिलता है। ये प्रमाण राजतंत्र की ओर इशारा करते है। इसके अतिरिक्त गण, गणपति तथा ज्येष्ठ का उल्लेख गणतंत्रात्मक स्वरूप होने की ओर इशारा करता है।

ऋग्वैदिक काल में राज्य जनों में विभक्त था और प्रत्येक जन में एक ही कबीले के लोग निवास करते थे जिनका आपस में रक्त- संबध थे। सूपास के साथ युद्ध करने वाले दस राजाओं के संगठन का राजनैतिक स्वरूप कैसा था, इसकी जानकारी हमारे पास नही है।

इस काल में राजा की स्थिति काफी महत्वपूर्ण थी हांलाकि वह अपने कबीलें का मुखिया ही था। लेकिन कुछ राजा कबीलें के मुखिया की स्थिति से उपर थे। सामान्यत: वंशानुगत राजतंत्र के प्रमाण मिलते है। किन्तु ऐसे भी प्रमाण है कि किन्हीं विशेष परिस्थितियों में विश (जो राष्ट्र की एक इकाई थी) राजपरिवार या राजसदस्यों में से राजा का भी चुनाव कर सकते थे।

सभा एवम् समिति

ऋग्वेद में सभा और समिति का अनेक बार उल्लेख हुआ है। सभा और समिति के विषय में विद्वानों में मतभेद है। हिलब्रैण्ड का कथन है कि समिति एक राजनैतिक संस्था थी तथा सभा उसका अधिवेशन स्थल। लुडविंग सभा को उच्चतर सदन तथा समिति को निम्न सदन का नाम देते है। परन्तु ऋग्वेद में इस बात का प्रमाणित करने के उल्लेख कहीं नहीं मिलता। जिमर महोदय का कहना है कि सभा ग्राम संस्था थी तथा समिति केन्द्रीय संस्था। ऋग्वेद में समय शब्द के उल्लेख (सभा के योग्य) से पता चलता है कि सभा का कोई प्रशासनिक उद्देश्य था तथा समिति को वैदिक कबीलों की एक संस्था के रूप में माना जा सकता है। लुडंविग के अनुसार समिति में विश के लोग ब्राह्यण तथा अन्य उच्चवर्ग के व्यक्ति शामिल थे। यद्यपि सभा और समिति के कार्यो में अंतर स्पष्ट करना कठिन है लेकिन प्रतीत होता है कि समिति एक ऐसी संस्था थी, जिसमें कबीलों के प्रमुख कार्य सम्पन्न किए जाते थे तथा राजा उनका अध्यक्ष होता था। तथा सभा समिति की तुलना में कम महत्व की संस्था था जिसमें समाज के सभी वर्ग शामिल थे। यद्यपि हमें सभा और समिति के कार्यो एवम् अधिकारों का अधिक ब्यौरा ऋग्वेद में नही मिलता। लेकिन इन दोनों संस्थओं का समाज में काफी महत्व था तथा ये इस काल में राजा की शक्तियों पर नियंत्रण रखती थी। इन दोनों राजनैतिक संस्थाओं के अतिरिक्त राजा पर पुरोहित का भी काफी प्रभाव था। यह राजा के साथ न केवल युद्धों में जाता था। बल्कि यज्ञ और प्रार्थनांए भी सम्पन्न करता था। इस काल के शक्तिशाली पुरोहितों में वशिष्ठ तथा विश्वमित्र के नाम उल्लेखनीय है जिनका राजा पर काफी नियंत्रण था।

प्रशासनिक संस्थांए

इस काल में सम्पूर्ण कार्य अनेक जनों में विभक्त थे। ऋग्वेद में उल्लिखत पं×चजन उस काल के पंच महत्वपूर्ण कबीलें थे। इनके अतिरिक्त अन्य छोटे कबीलें भी थे। ऋग्वेदि में विश शब्द का उल्लेख अनेक बार हुआ है जिसका उस काल की राजनैतिक संस्था में महत्वपूर्ण स्थान था। सभी कबीलें के सदस्य मिलकर राष्ट्र या कबीलें के मुखिया का निर्माण करते थे। विश, जन तथा गांव में विभक्त थे। सुरक्षा के लिए पुर का निर्माण करते थे। विश, जन तथा गांव में विभक्त थे। सुरक्षा के लिए पुर का निर्माण किया जाता था जो पत्थरों से निर्मित थे। ग्राम एक ही कुल की अलग-अगल इकाईयों के बने थे। जिसमें कुल का प्रशासनिक संगठन में महत्व था। एक स्थान पर कुलपा या कुल का संरक्षक का व्राजपति जो शायद ग्रामणी ही था के साथ एक झण्डें तले लड़ने का वर्णन है। यह वर्णन हमें कुलपा के ग्रामीण के साथ सिविल और सैनिक कार्यो के महत्व को दर्शाता है। सेनानी उस समय का सैनिक अधिकारी था, तथा पुरोहित के समान ही यह महत्वपूर्ण स्थान रखता था। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद में हमें स्पश का भी उल्लेख मिलता है। दूत या संदेशवाहक का कार्य इस काल ने राजा के संदेश लोगों तक या अन्य कबीलों तक पहुंचाना था।

उतरवैदिक कालीन राज्य संरचना

उतरवैदिक काल ने आर्यो का प्रसार पूर्व में गंगा-यमुना देाआब के क्षेत्र में हो चुका था। अथर्थवेद में बहलीक प्रदेश से लेकर मगध तक का उल्लेख हैं इसके अतिरिक्त पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्री तट के बारे में भी उतरवैदिक साहित्य में वर्णन है। इस काल में क्षेत्रीय राज्यों की स्थापना हो चुकी थी तथा कही-कहीं गणराज्यों का भी वर्णन मिलता है।

उतरवैदिक काल में राज्य और साम्राज्य अस्तित्व में आए क्योंकि इस काल में छोटे-2 कबीलें आपस में मिल गए थे। साम्राज्य का संस्थापक सम्राट कहलाता था, जिसके अधीन अन्य छोटे-2 राज्य भी थे। राजा शब्द का प्रयोग यद्यपि छोटे स्वतंत्र राज्य का घोतक है। परन्तु इसे अधिकतर अधिन सामंत राजा के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। इस काल में राजा का दैवीक उत्पति का सिंद्धात भी प्रचलन में आया क्योंकि एक स्थान पर पुरू राजा अपने आपकों इन्द्र तथा वरूण के समान बताता है और उनके द्वारा प्रदान की गई शक्तियों का जिक्र करता है। संहिताओं तथा ब्राह्यण ग्रंथों में भी वाजपेय तथा राजसूय यज्ञ करने के उपरान्त राजा समीकरण प्रजापति से किया गया है। शतपथ ब्राह्यण में इसी प्रकार का उल्लेख है। इस काल में अश्वमेघ तथा राजसूय यज्ञ सम्पन्न करा कर राजा अपने विशाल राज्य का प्रमाण देता था। परन्तु कीथ नामक विद्वान का मत है कि यद्यपि इस काल में ऋग्वैदिक कालीन कुछ राज्य नही था। अथर्ववेद में राजा को अपने चचेरे भाइयों से लड़ते दिखाया गया है तथा अनायोर्ं से युद्धों का भी उल्लेख है।

परन्तु एतरेय ब्राह्यण में पूर्व के शासकों का सम्राट, दक्षिण के शासकों को भोज, उतर के विराट तथा मध्य देश के शासकों को केवल राजन कहा गया है। इसी प्रकार ऐसरात तथा सार्वभौम राजा उसे कहा गया हैं जिसने चारों दिशाओं में शत्राुओं पर विजय हासिल की हो। विजय के उपलक्ष में बाद में अश्वमेघ यज्ञ सम्पन्न किया जाता था। राजसूय यज्ञ के दौरान घोषणाओं द्वारा राजा की उपलिब्धयों की जानकारी दी जाती थी। इन बातों से हमें इस काल में बड़े-बड़े साम्राज्य होने की जानकारी मिलती है।

उतरवैंदिक कालीन साक्ष्यों से पता चलता है कि राजा का पद पैतृक या वंशानुगत था। शतपथा तथा ऐतरेय ब्राह्यण से पता चलता है कि कई राज्य दस पीढियों (पुरूषाम राज्यम) से स्थापित थे। इसके अतिरिक्त राजपुत्र शब्द का अर्थ राजा के पुत्र के रूप में भी इस व्यवस्था का घोतक है। परन्तु अथर्ववेद के एक पथ में राजा के चयन का भी उल्लेख है, जिसमें प्रजा (विश) राजा का चुनाव करती है विश या क्षेत्रीय इकाइयों की अपेक्षा। परन्तु यह चुनाव राजपुत्रों तथा राजपरिवार से ही अपातकाल में होता होगा। इस काल में हमें जनता द्वारा कई अत्याचारी राजा को हटाने के भी प्रमाण मिलते है।

इस काल की समस्त रचनाओं में निंरकुश शासकों की घोर आलोचना की गई है। अथर्ववेद में अधार्मिक राजा के राज्य में वर्षा ने होने तथा उसे समिति और मित्रवर्ग का सहयोग न प्राप्त होने का उल्लेख है। जो राजा निरंकुशतापूर्वक राष्ट्र के साधनों का दुरूपयोग करता था उसे शतपथा ब्राह्यण में राष्ट्री कहा गया है। इस काल में राजा को धर्मानुकूल व्यवहार करने वाला बताया गया है। इसके अतिरिक्त राजा को राज्याभिषेक के समय शपथ लेनी पड़ती थी, कि वह नियमों का पालन करेगा, कोई ंिहंसा नहीं करेगा, प्रजा का पालन करेगा इत्यादि। राजा इन सभी बातों का व्यवहार में पालन करता था। इस कारण भी राजा निरंकुश नही हो सकता था। इसके अतिरिक्त उसे राज्य के एक महत्वपूर्ण अंग रत्नियों (रतनिनि) के प्रति भी सम्मान प्रकट करना पड़ता था और उनका सहयोग तथा अनुमोलन प्राप्त करना आवश्यक समझा जाता था। शतपथ ब्राह्यण में इनकी संख्या 11 दी गई है जो इस प्रकार है 1. सेनानी 2. पुरोहित 3. युवराज 4. महिषी (प्रमुख रानी) 5. सूत (सारथी) 6. ग्रामणी 7. क्षता (प्रतिहारी) 8. संग्रहीता (कोषाध्यक्ष) 9. भागदुध (कर संगहकर्ता) 10. अक्षज्ञप (शंतरज खेल में राजा का साथी) तथा पालागल (राजा का मित्र)

सभा और समिति 

अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुित्रायां कहा गया है। जो हमेंशा राजा को मदद करती थी। प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार राजा अपनी शक्तियों की प्राप्ती इन्हीं से करता है। इस प्रकार राजतंत्र तथा ये दैविक संस्थाए एक ही धरातल पर है। अथर्ववेद में इस बात का वर्णन है कि राजा इनकी सहायता लेने की कोशिश करता था। यदि इनका विश्वास राजा पर ना रहे तो राजा पर विपति आने का उल्लेख है। लेकिन इस काल में राजा की शक्तियों में वृद्धि होने के कारण इस काल में सभा और समिति का महत्व कम हो गया था।

इस काल में सभा के कार्यो तथा कार्य शैली का स्पष्ट उल्लेख नही मिलता। अथर्ववेद के वर्णन से पता चलता है कि सभा ग्राम संस्था थी तथा ग्राम के समस्त स्थानीय विषयों की देखभाल करती थी। एक स्थान पर इसे नरिष्ठा कहा गया है जिसका अभिप्राय है कि यहां वाद-विवाद के बाद निर्णय होते थे। मैत्रायणी संहिता के अनुसार िस्त्रायां सभा की बैठकों में भाग नही लेती थी। सभासद, समाचार इत्यादि शब्दों से सभा के सदस्यों का वर्णन मिलता है। सभा का अध्यक्ष सभापति होता था इस प्रकार हम देखते है कि सभा एक ऐसी संस्था थी जहां राजनैतिक कार्य सम्पन्न किए जाते थे। परन्तु प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर सभा एवं समिति में भेद नही किया जा सकता, न ही उनके कार्यो और क्षेत्रों का स्पष्ट उल्लेख है। डाñ अल्तेकर के अनुसार उतरवैदिक काल में सभा संस्था नही रह गई थी बल्कि वह राज्य संस्था हो गई थी। शतपथ ब्राह्यण के अनुसार राजा सभा में उपस्थित रहता था। ऐतरेय ब्राह्यण के अनुसार सभा के सदस्यों का पद अत्यन्त सम्मान का था।

समिति राज्य की केन्द्रीय संस्था प्राप्त होती हैं अथर्ववेद में उल्लेख है कि ब्राह्यण सम्पति का हरण करने वाले राजा को समिति का सहयोग नही मिलने का उल्लेख हैं एक अन्य स्थान पर राजा के लिए इसके चिर सहयोग की शुभाकांक्षा प्रकट की गई है। प्रत्येक सदस्य समिति के वाद-विवाद में हिस्सा ले कर ख्याति प्राप्त करने का इच्छुक रहता था। जिससे पता चलता है कि समिति में निर्णय वाद-विवाद के पश्चात् ही लिए ही लिए जाते थे।

राज्य की आय 

ऋग्वेद में हमें कर के रूप में सिर्फ बलि शब्द का वर्णन मिलता है। परन्तु इस काल में राज्य द्वारा निश्चित करों के प्रावधान का प्रमाण मिलता है। राजकोष के अधिकारी को संग्रहिता कहा जाता था और कर लेने वाले अधिकारी को भागदुध कहा जाता था सामान्यत: कर वैश्यों से लिए जाते थे। ब्राह्यण साहित्य में उसे बलिकृत कहा गया है। राजकर अन्न तथा पशुओं के माध्यम से वसूल किया जाता था। आय का 1ध्6 भाग राज्य को कर के रूप में मिलता था। प्रजा राजा को करों के अलावा विशेष अवसरों पर उपहार इत्यादि भी भेंट करती थी तथा युद्ध में लूट का हिस्सा भी राजकोष में जाता था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि उतरवैदिक काल में राज्य की संरचना हो चुकी थी और बड़े-बड़े क्षेत्रीय राज्यों की स्थापना हो गई थी। इस काल में राज्य के सातों महत्वपूर्ण अंगों का वर्णन हमें मिलता है। राजा मंित्रमण्डल के रूप में रतमिन, क्षेत्र, संसाधन (करों द्वारा) सेना, सहयोगी सभी का इस काल में सृजन हो चुका था।

प्रारंभिक वैदिक कालीन समाज

प्रारंभिक वैदिक काल में समाज का आधार सगोत्राीय और मुख्यत: कबीलाई संरचना पर आधारित था। जिसमें विभेदीकरण की प्रक्रिया के चिन्ह स्पष्ट रूप से उभर कर सामने नही आए थे। इस काल का समाज कई अर्थो में प्राय: समानतावादी था जिसमें एक ओर पदों के आधार पर अनेक विभिन्नताएँ थी, जो विशेषकर पशुओं की संख्या के आधार पर निर्धारित की जाती थी, इसके अतिरिक्त लिंग और आयु भेद के आधार पर भी सामाजिक स्तर पर असमानताएँ थी। लेकिन दूसरी ओर मनुष्यों के लिए उत्पादक संसाधनों को प्राप्त करने के लिए किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नही था। ऋग्वेद में वर्णित इकाइयाँ-विश, जन, गण-वात आदि कबीलाई संगठन की ओर संकेत करती है। जन और विश सामूहिक उत्पादन की महत्वपूर्ण इकाइयाँ थी। ऋग्वेद में जन और विश शब्दों का कई बार प्रयोग हुआ है, जन विश के रूप में विभक्त था, इनमें से एक का संबध संपूर्ण कबीले से था तथा दूसरे का गोत्रा से । ऋग्वेद में जन का उल्लेख 275 बार तथा विश का 171 बार हुआ है।

परिवारिक जीवन -

इस काल में परिवार का आधार पितृसतात्मक था, उसमें तीन या चार पीढ़ियों का समावेश था। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल मे वर्णित शुनहशेप कहानी से हमें बच्चों पर पिता के पूरे नियंत्रण का पता चलता है। परिवार में अनुशासन बहुत कठोर था तथा इसे तोडने वाले को सजा देने का अधिकार भी पिता को था। जैसा कि उल्लेख है एक जुआरी पुत्र को उसके पिता तथा भाइयों ने दण्ड स्वरूप उसे बेच दिया था। इस सन्दर्भ का तात्पर्य यह नही है कि इस काल में माता-पिता तथा संतान के इसी प्रकार के सम्बन्ध हुआ करते थे, अपितु पिता को एक अच्धा तथा दयालु हृदय बताया गया है। एक ही परिवार में कई पीढ़ियों के इक्कठे रहने के भी प्रमाण मिले है। परिस्थितिवश परिवार में पत्नी की मां के भी रहने का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद के दंसवें अध्याय में एक जुआरी यह शिकायत करता बताया गया है कि घर में उसकी सास उससे नफरत करती थी। अतिथि सत्कार घर में एक धार्मिक कार्य माना जाता था ऋग्वेद में माता-पिता, भाई-बहन, पुत्र और पुत्री के लिए अलग-अलग शब्दावली थी, लेकिन भतीजों, पोत्रों और चचेरे भाइयों के लिए मात्रा एक शब्द नाप्तृ/नपतृ का प्रयोग किया जाता था। परिवार में पुत्र प्राप्ती के लिए ऋग्वेद में विभिन्न स्तुतियों और प्राथनाओं का उल्लेख मिलता है।

विवाह एवम् महिलाओ की स्थिति -

ऋग्वेद से हमें विवाह संबधी जानकारियों का वर्णन मिलता है। सामान्यत: वय: सन्धि के बाद लड़की की शादी की जाती थी आर उन्हें अपने पति के चुनाव के अधिकार की भी स्वंतत्रता थी। अविवाहित लड़कियों का भी वर्णन मिलता है, घोषा इसी की तरह की एक अविवाहित लड़की थी। इसके अतिरिक्त अपने प्रेमियों का लुभाने के लिए कन्याओं का उत्सवों पर गहने पहनने का वर्णन तथा युवकों के अपनी प्रेमिकाओं को भेंट इत्यादि देने के अनेक मंत्रों का वर्णन है। इनका विवाह दस्यु वर्ग या अनार्य लोगों में नही हो सकता था तथा आर्यो में भाई-बहन तथा पिता-पुत्री के विवाह पर प्रतिबन्ध था। विवाह में व्यस्कों को अपने पति और पत्नी चुनने की काफी स्वतंत्रता थी ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नही कि माता-पिता या भाई की सहमति आवश्यक थी। विवाह के दौरान इनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। विवाह के मंत्रों से पता चलता है कि एक नवविवाहिता स्त्री किस प्रकार अपने सास-ससुर, देवर और ज्येष्ठ पर अपने प्यार और स्नेह से राज्य करती थी तथा उनका आदर भी करती थी। वधु विवाह भोज में की सम्मिलित रहती थी। बारातियों का स्वागत इस काल में गाय का मांस खिला कर किया जाता था। वर-वधु का हाथ पकड़ कर अग्नि के पास-पास चक्कर लगाकर प्रणय सूत्रा में बंधते थे। सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए अनेक प्रार्थनाँए की जाती थी, ऋग्वेद में जो प्रार्थनाँए की गई हैं वे पति और पत्नी दोनों की तरफ से है। परिवार में पुत्र और पौत्रा प्राप्ती की कामना के लिए अनेक प्रार्थनाँए की जाती थी। वधु का अपने घर में सम्मान का दर्जा प्राप्त था, ऐसे वर्णन है कि वह अपने पति के पिता, भाई तथा बहनों पर राज करती थी, यह संदर्भ संभवत: उस स्थिति का है जब बड़े पुत्र की शादी हो गई हो तथा लडके का पिता जीवन से मुक्त हो चुका हो। परन्तु प्रतीत होता है कि यह अधिकार प्रेम के कारण ज्यादा था। यज्ञ, विवाह आदि अवसरों पर पति-पत्नी दोनों की उपस्थिति अनिवार्य थी। इस काल में विवाह मुख्य रूप से सन्तानोत्पति (पुत्र की प्राप्ती) के लिए किया जाता था, पुत्री प्राप्ती की कामना के प्रमाण ऋग्वेद में कही नही मिलते। संभवत: पितृसतात्मक समाज में पुत्र की प्राप्ती ही आवश्यक थी। केवल पुत्र ही पिता का अंतिम संस्कार कर सकता था, तथा उसी से वंश आगे बढ़ता था। यघपि पुत्र ना होने की स्थिति में पुत्र गोद लेने के भी प्रमाण है परन्तु यह अधिक प्रचलित नही था।

पितृ सतात्मक समाज के बावजुद स्त्रियों की स्थिति उतरकालीन महिलाओं की अपेक्षा बहुत अच्छी थी। ऋग्वेद में पत्नी का यज्ञ करने और अग्नि में आहुतियाँ देने का स्पष्ट प्रमाण है। वे सभाओं में भाग लेने के लिए स्वंतत्रा थी। ऋग्वेद में ऐसी महिलाओं का जिक्र है जिन्होंने वेदमंत्रो की रचनाएँ की, जिनमें अपाला और विश्वआरा का नाम उल्लेखनीय है। इससे स्पष्ट है कि स्त्रियों शिक्षा ग्रहण करने के लिए स्वतंत्र थी। ऋग्वेद के मंत्रों में पुत्र प्राप्ती के लिए अनेक प्रार्थनाएँ की गई है लेकिन पुत्री के जन्म का कही भी दु:खद नही माना गया है। इस काल में सती प्रथा का कोई स्पष्ट प्रमाण नही है। ऋग्वेद में एक स्थान पर एक विधवा का अपने पति की चिता से नीचे उतर आने का कहे जाने के प्रमाण तो है लेकिन यह सती प्रथा का स्पष्ट प्रभाव नही है। यदि विधवा स्त्री को पुत्र नही है, तो वह अपने देवर के साथ सहवास कर पुत्र प्राप्त कर सकती थी। यह बाद की नियोग प्रथा का ही एक प्रारूप है। इसके अतिरिक्त विधवा पुन:विवाह भी कर सकती थी। साधारणत: हमें एक पत्नी विवाह के प्रमाण मिलते है लेकिन एक पुरूष की एक से ज्यादा पत्नियों के भी प्रमाण है। यह शायद राजभ्य वर्ग में ज्यादा प्रचलित था, साध् ाारण वर्ग में नही। यद्यपि ऋग्वेद में िस्त्रायो की उच्च स्थिति का वर्णन है, परन्तु चोरी -छिपे (विवाह पूर्व) सन्तानोत्पति के भी प्रमाण है। इसके अतिरिक्त प्रजापति की कहानी में पिता-पुत्री तथा यम-यमी की कहानी में बहन-भाई के शारिरिक संबधों का उल्लेख मिलता है, लेकिन ज्यादातर विद्वान इसे मिथ्या मानते है। स्त्रियों को विवाह तक अपने पिता की सुरक्षा में, विवाहोपरान्त पति की, यदि अविवाहित है तो अपने भाई की सुरक्षा में रहना पड़ता था। इसका यह तात्पर्य नही कि वे बाहर स्वेच्छा से घूमने, भोज, नृत्य और उत्सवों से भाग लेने के लिए स्वतंत्र ना हो। उनकी स्वतंत्रता पर कोई बंधन नही था।

भोजन और पहनावा -

प्रांरभिक वैदिक काल में आर्य मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों प्रकार का आहार लेते थे। मुख्यत: पशुपालन पर आधारित अर्थव्यवस्था के कारण दूध और उससे बनी वस्तुओं का वे अधिक सेवन करते थे। घी या घृत का प्रयोग, जौ के आटे को दूध या मक्खन में मिलाकर रोटी बनाने के प्रमाण ऋग्वेद में मिलता है। बैल, भेड और बकरी का माँस इनके भोजन का मुख्य अंग था। अश्वमेघ सम्पन्न होने पर घोडे़ का मांस सामान्य रूप से खाया जाता था, ताकि घोड़े जैसी तेजी प्राप्त कर सकें। यद्यपि गाय को अधन्य माना गया है दूध ने देने वाली गाय के मांस का सेवन भोजन के रूप में किया जाता था। इसके अतिरिक्त अतिथियों को विशेष अवसरों पर गाय का मांस परोसा जाता था। ऋग्वेद में सोमरस पेया का भी वर्णन है, सुरा या शराब पीने का भी उल्लेख हुआ है। इसके अतिरिक्त शहद का भी भोजन में प्रयोग करते थे।

इस काल में पहनावा साधारण था और आर्य मुख्यत: तीन वस्त्र धारण करते थे। नीवी शरीर के मिचले हिस्से में पहनने वाला वस्त्र, वास मध्यभाग में पहनने वाला वस्त्र तथा अधिवास ऊपरी हिस्से पर पहनने वाला वस्त्र था। स्त्री और पुरूष के पहनावे में ज्यादा अन्तर नही था। खाल या चमडे़ का भी प्रयोग वस्त्र के रूप में किया जाता था। मारूत को मृग छाल पहने हुए बताया गया है। इस काल में अट्क भी एक प्रकार का बुना हुआ वस्त्र था। ऊनी वस्त्रों का भी प्रयोग करते थे। कढ़ाई किए गए वस्त्र (पेश्स्) को पहने नतृकी का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। विवाह के अवसर पर वप्पु विशेष वस्त्र (वाधूय) धारण करती थी। सुन्दर वस्त्रों के लिए सुवासस् तथा सुवसन शब्दों का उल्लेख मिलता है। समाज में स्त्री और पुरूष दोनों वर्ग आभूषण धारण करते थे।सोने का कर्णशोभन संभवत: पुरूषों के लिए पहनने वाला आभूषण था। हिरण्यकर्ण सोने का आभूषण था जो देवताओं को पहने दर्शाया गया है। कुरीर वधु के सिर पर पहनने वाला गहना था। हार के रूप में सोने का आभूषण निष्क इस काल में प्रचलित था। मोती और हीरे से निर्मित आभूषण गले में पहने जाते थे। एक ऋचा में अश्विनों को कमल के फूलों से ढ़का बताया गया है। केश श्रंगार के भी शौकिन थे। तेल लगाकर कंघी करने के अतिरिक्त (ओपश) मांग निकालने का वर्णन है। एक स्थान पर एक कन्या को अपने सिर पर चार मांग निकाले हुए बताया गया है। पुरूषों को दाढ़ी और मूँछ रखने का शौक था।

चिकित्सक और दवाईयाँ -

ऋग्वेद में इस काल में चिकित्सा पद्धति का भी प्रमाण है। बिमारियों में दक्षम का भी यदा-कदा वर्णन मिलता है। ऋयाओ में अनेक औषधियों तथा उनके गुणों का वर्णन है। इस काल में टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने की कला से ये परिचित थे। आँखों की रोशनी पु:न प्राप्त करने, अन्धेपन का इलाज, तथा अंगहीनता ठीक करने के प्रमाण इस काल में मिलते है।

शिक्षा एवम् मनोरंजन -

ऋग्वेद के दंसवें मण्डल में शिक्षा प्रणाली पर विशेष जोर दिया गया है, कि शिक्षा द्वारा व्यक्ति अपनी शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक शक्तियों का विकास कर सकता है। ऋग्वेद में उपनयन संस्कार का कोई प्रमाण नही है। ऋग्वेद के मण्डूक सूक्त में हमें शिक्षा प्रणाली के बारे में जानकारी मिलती है, इसमें वर्णन है कि विद्याथ्र्ाी अपने गुरू से मौखिक शिक्षा प्राप्त करते थे और विद्यााथ्र्ाी उसे सामूहिक रूप से दोहराते थे। इस काल में विद्याथ्र्ाी के लिए के लिए ब्रह्यचारी शब्द प्रयुक्त किया जाता था। शिक्षा गुरूकुलों में दी जाती थी। इस काल में महिला शिक्षिकाओं का भी उल्लेख है, मैत्रोयी और गार्गी इस काल की विदुषियां थी।

संगीत का ऋग्वैदिक काल में विशेष महत्व था। वैदिक ऋचाओं का एक संगीतमयी लय में उच्चारण किया जाता था। इसके अतिरिक्त वीणा और ढ़ोला बजाने वालों का भी उल्लेख मिलता है। अविवाहित कन्याओं द्वारा किए जाने वाले नृत्य का भी वर्णन मिलता है। सामाजिक समारोह और उत्सवों में पुरूष और स्त्री दोनों की नृत्य में भाग लेते थे। कीथ नामक विद्वान के अनुसार इस काल में धार्मिक नाटकों का भी प्रचलन था। इसके अतिरिक्त रथदौड़ और घुड़दौड़ मनोंरजन का एक महत्वपूर्ण साधन था। चौपट तथा जुआ खेलने के प्रमाण भी ऋग्वेद की विभिन्न ऋचाओं से मिलते है। आखेट भी मंनोरजन का एक महत्वपूर्ण साधन था।

वर्ण व्यवस्था -

वर्णसमाज की रूपरेखा ऋग्वैदिक काल के अंतिम चरण में आंरम्भ हो गई थी जिसे पुरूष सूक्त ;गण्90द्ध में देखा जा सकता है। इसमें उल्लेख है कि देवताओं ने आदि पुरूष के 4 भाग किए ; ब्राह्यण उसका मुख, राजन्य बाहु तथा जंघा वैश्य हो और शुद्र की उत्पति उसके पैरों से हुई। प्रथम तीनों वर्णो की उत्पति आदि पुरूष से नही हुई बल्कि वे उसके मुख, बाहु और जंघा के समान बताए गए है जबकि शुद्र की उत्पति पैरों से होने का अर्थ यह हुआ कि उसका जन्म तीनों वर्गो की सेवा करने के लिए हुआ है। प्रांरम्भ में शायद वर्ग विभाजन मुख्यत: आर्य और अनार्यो के बीच हुआ होगा क्योंकि दोनों की संस्कृतियाँ भिन्न थी। ऋग्वेद में ‘दास’ और ‘दस्यु’ वर्ग का उल्लेख भी मिलता है जिनके साथ आर्यो के संघर्ष का भी उल्लेख मिलता है। दास और दस्यु इस क्षेत्र के आदिम निवासी (अनार्य) थे जिनसे आर्यो का संघर्ष हुआ। संभवत: युद्ध में हारे जाने पर अनार्यो का बंदी बना कर सेवा कार्य लिया जाता होगा। संस्कृत में वर्ग के लिए वर्ण (रंग) शब्द का प्रयोग किया जाता है। यही वर्ण शब्द विभिन्न रूप-रंगों और विजातीय संस्कृतियों के लोगों के साथ आर्यो के संपर्क के परिणामस्वरूप चार वर्णो के उद्भव की ओर ईशारा करता है। इस काल के अंतिम दौर में समाज चार वर्णो में बँट गया था, लेकिन जात-पात का बखेडा खड़ा नही हुआ थ इस व्यवस्था में लचीलापन था। ऋग्वेद में एक उदाहरण मिलता है कि एक व्यक्ति कहता है। मेरे पिता पुरोहित है माता अनाज पीसती है और पुत्र चिकित्सक है। इससे पता चलता है कि व्यवसायों को अपनाने की स्वतंत्रता थी।

उतरवैदिक कालीन समाज -

उतरवैदिक काल में कृषि प्रणाली, उत्पादन की मात्रा बढ़ने एवम् आर्यो के जीवन में स्थायीत्व आने से राज्य के स्वरूप में भी परिवर्तन आया। कबीलाई व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई और इस काल में छोटे-छोटे जन आपस में मिलकर नगर और जनपद का रूप धारण करने लगे। जैसे: पुरू और भरत कबीला मिलकर कुरू जनपद बना तथा तुर्वश और ऋिवी मिलकर पांचाल जनपद कहलाए। इस काल में गंगा-यमुना दोआब के क्षेत्र में आर्यो ने विस्तार कर लिया था। इस काल के साहित्य में कुरूक्ष्ेात्र, हिस्तानुपर, काशी, अयोध्या, पुष्कलावती और तक्षशिला जैसे नगरों का उल्लेख मिलता है। नगरों और जनपदों के उदय के कारण ऋग्वेदिककालीन कबीलाई संरचना नष्ट हो गई। इस काल की संस्कृति के बारे में विस्तृत जानकारी नष्ट हो गई। इस काल की संस्कृति के बार में विस्तृत जानकारी हमें सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद से मिलती है। ऋग्वेद के पश्चात् सामवेद की रचना हुई क्योंकि बहुत सी रचनाएँ जिनका उल्लेख ऋग्वेद में किया गया है, वे सामवेद में पु:न लिखी गई है। कालक्रम के अनुसार सामवेद के बाद यर्जुवेद की रचना हुई, इसमें कृष्ण यर्जुवेद और शुक्ल यर्जुवेद की वाजसेनीय संहिता शामिल है जो अथर्ववेद से पहले की रचना है। तैत्राीय संहिता को भी कुछ विद्वान इसी काल की रचना मानते है। इनके पश्चात् ब्राह्यण ग्रंथों की रचना की गयी जिनमें शतपथ ब्राह्यण,जैमिनीय ब्राह्यण महत्वपूर्ण हैं। आरण्यकों क रचना ब्राह्यण ग्रंथों के बाद की गयी तथा ये उपनिषद काल के मध्य एक कड़ी थे। आरण्यक तथा उपनिषदों को सामान्यत: वेदान्त (वेदों का अंत) कहा जाता है। इन सभी रचनाओं में वर्णित संस्कृति को उतर-वैदिक संस्कृति का नाम दिया जाता है।

पारिवारिक जीवन -

इस काल में पितृसतात्म परिवार थे, लेकिन पहले काल की अपेक्षा अब पिता की शक्तियों में वृद्धि हुई। पिता अपने पुत्र को कठोर दण्ड़ दे सकता था और सम्पति के अधिकार में भी वह मनमानी करता था। ऐतरेय ब्राह्यण में वर्णित एक कहानी से पता चलता है कि पिता का पुत्र पर पूरा नियन्त्राण होता था। इस कहानी में पिता द्वारा अपने पुत्र शुनेहशेप को बेचने का पता चलता है, लेकिन सामान्य रूप से पिता-पुत्र के संबध स्नेह पर आधरित थे। शांखायन आरण्यक के अनुसार महत्वपूर्ण अवसरों पर पिता व्यस्क पुत्र के सिर को चूम स्नेह का प्रदर्शन करता था। पुत्र ना होने की स्थिति में पुत्र गोद लेने के प्रमाण इस काल में मिलते है। परिवार में पहले बडे-भाई या बहन की शादी की जाती थी, तथा बड़ों से पहले छोटों की शादी की अच्छा नही माना जाता था। परिवार में हमें पौत्रा तथा प्रौपोत्रा होने के भी प्रमाण मिलते है। अतिथियों के सत्कार संबंधी विषय में अनेक ऋचाएँ है। इस काल में हमें कुल शब्द का अर्थ एक वृहत परिवार के रूप में मिलता है। कुल का अर्थ सामान्यत: ‘घर’ या ‘परिवार का घर’ के रूप में होता है। परिवार में व्यावातार पुत्र की उत्पति की कामना की जाती थी।

वर्ण-व्यवस्था -

उतरवैदिक काल में वर्ण व्यवस्था पूरी तरह स्थापित हो चुकी थी। इस काल में वर्ण शब्द सामान्य रूप से जाति के लिए प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेदिक काल के अंतिम चरण में समाज 4 वर्णो में बँट गया था, लेकिन इस काल में वर्ण व्यवस्था जन्म के आध् ाार पर निर्धारित हो गई। इस काल में अनेक उपजातियां तथा दूसरे जाति विभाजन होने लगे जैसे इस काल में विभिन्न श्रेणियाँ अपने पेशे। व्यवसाय में वंशानुगत होने के कारण अलग जाति में विभक्त हो गए। इसी प्रकार रथकार, लोहे, चमडे़ तथा लकड़ी का काम करने वालों की भी अलग जातियाँ बन गई। इस काल में परिवार मे गोत्रा का महत्व बढ़ा तथा सगोत्राीय और गोत्रा से बाहर विवाह के नियम बनने लगे। इस काल में अपनी ही जाति में विवाह करने के नियम बने लगे। इस काल में शूद्रों पर अनेक निरयोग्यताएँ लगा दी गई जैसे : आर्य वर्ण के लोग शूद्र स्त्री से विवाह नहीं कर सकते थे। लेकिन शुद्र या दस्यु वर्ग के लोग आर्य स्त्री से विवाह नहीं कर सकते थे। इसी प्रकार का नियम धीरे-धीरे तीन आर्य वर्णो पर भी लागू होने लगा। जिसमें एक ब्राह्यण, क्षित्राय या वैश्य लड़की से शादी कर सकता था जबकि नीच जाति का पुरूष ऊँची जाति की महिला से शादी नही कर सकता था। इस काल में वैश्य वर्ण जो कि कृषि तथा व्यापारिक गतिविधियों का संचालक था, चौथे वर्ण (शुद्र) के अधिक सम्पर्क में आया और यह आर्यो की सांस्कृतिक शुद्रता को सहेज कर नहीं रख सका।

इस काल में प्रत्येक जाति के काम और उनकी प्राथमिकताएँ तथा सामाजिक स्तर निश्चित कर दिए गए। शतपथ ब्राह्यण में तो चारों जातियों के वर्णानुसार अलग-2 आकार के शमशानों का भी उल्लेख है। शूद्रों की स्थिति सबसे दयनीय थी, उनका कार्य दूसरों की सेवा करना था और उन्हें भू-संपति के अधिकारों से भी वंचित रखा गया।

वैश्य और शूद्र जो इस काल में वास्तविक उत्पादनकर्ता थे, को इन वर्गो (ब्राह्यण, क्षित्राय) को कर देना और इनके सेवा कार्य पड़ते थे। इस वर्ण व्यवस्था में ब्राह्यणों ने उच्च स्थान प्राप्त कर लिया था, क्योंकि इस काल में यज्ञों का महत्व बढ़ गया था। समाज मे उच्चाधिकार के लिए हमें ब्राह्यणों और क्षित्रायों के बीच परस्पर संघर्ष के प्रमाण मिलते है। इस काल में कई क्षित्रायों के ब्राह्यण बनने के भी प्रमाण मिलते है। ब्राह्यण तथा क्षित्राय सामान्यत: दूसरे दोनों वर्णो के मुकाबले प्रभावशाली थी। परन्तु प्रथम दोनों में प्राथमिकता के बारे में भी मतभेद है, सामान्यत: यह माना जाता है कि ब्राह्यण राजा से सर्वोपरि है। इस प्रकार का प्रमाण हमें वाजसेनीय संहिता, शतपथ ब्राह्यण तथा पं×चविश ब्राह्यण में मिलता हैं। जबकि शतपथ ब्राह्यण में एक स्थान पर ऐसा भी वर्णन है कि ब्राह्यण राजा पर आश्रित है, तथा यह उसके साथ नीचे के आसन पर बैठता है। इसी तरह शतपथ बाह्यण में कहा गया है कि क्षित्राय अपनी शक्ति ब्राह्यण के ही कारण पाता है। दूसरी ओर ऐसे भी सन्दर्भ है, जो क्षित्राय को सर्वोपरि मानते है जैसा कि काठक संहिता तथा इसी प्रकार ऐतरेय ब्राह्यण के एक सन्दर्भ में ब्राह्यण को क्षित्राय से निम्न कहा गया है, जो राजा से दान लेने वाला, और सोम रस पीने वाला है तथा जिसे राजा भी हटा सकता है। इस काल में ऐसे भी सन्दर्भ मिले है, जिससे पता चलता है कि कई राजा पढ़े-लिखे थे तथा उन्होंने बहुत सी ऋचाओं की रचना भी की थी तथा कई क्षित्राय ब्राह्यणों के भी शिक्षक रहे थे। इस काल में ब्राह्यण पुरोहित होते थे तथा कुछ राजा के पुरोहित भी थे, जो वंशानुगत होते थे अथर्ववेद से हमें पता चलता है कि कई बार राजा ब्राह्यणों पर अत्याचार भी करते थे और ऐसा राजा कभी फल-फूल नही सकता था। परन्तु आमतौर ब्राह्यणों ने इस काल में अपनी प्रतिष्ठा कायम कर ली थी। इस काल में व्यापारिक गतिविधियों का प्रसार होने के कारण वैश्यों के अनेक वर्ग बन गए जो पशुपालन, कृषि और शिल्पकार इत्यादि गतिविधियों में शामिल थे, ये कर भी अदा करते थे। शतपथ ब्राह्यण में वर्णन है कि यज्ञ करने वाले व्यक्ति का शूद्रों से बात नही करनी चाहिए। ऐतरेय ब्राह्यण में उल्लेख है कि उच्चवर्ग के लोगो को शूद्रों को पीटने का अधिकार है। ब्राह्यण ग्रंथों में शूद्रों के स्पर्श से बचने के लिए जो नियम बनाए थे, बाद में उन्ही से समाज में अस्पृश्यता की शुरूआत हुई थी।

विवाह एवम् महिलाओ की स्थिति -

इस काल में जाति-प्रथा के उद्भव के साथ ही कई सामाजिक मानदंड प्रकट हो गई। एक ही गोत्रा के सदस्यों के विवाह पर रोक लगा दी गई और यह बात विशेष तौर पर ब्राह्यण वर्ग पर लागू हुई, जो अब तक असगोत्राीय विवाह का समर्थन करने वाले दलों में विभाजित हो चुका था। इस काल में सामान्यत: व्यस्क होने पर विवाह किया जाता था और विवाह गोत्रा से बाहर किया जाता था। विधवा विवाह की अनुमति तथा बहुपत्नी विवाह भी प्रचलन में था। मैत्रायणी संहिता में मनु की दस पत्नियों का वर्णन है तथा एक राजा की भी चार पत्नियों का उल्लेख है। अथर्ववेद में ऐसी कन्याओं का उल्लेख है जो अविवाहित थी और अपने माता-पिता के घर रहती थी। परन्तु सामान्यत: अविवाहित रहने की प्रथा नही थी। अविवाहित पुरूष को यज्ञ करने की अनुमति नही थी, बिना स्त्री के उसे स्वर्ग प्राप्ती नही थी। क्योंकि पुरूष को पत्नी के बिना पूर्ण नही माना गया। इन सबसे पता चलता है कि एक पुरूष को एक से ज्यादा पत्नी रखने का भी अधिकार था, लेकिन एक स्त्री के एक से ज्यादा पति नही हो सकते थे। ऐतरेय ब्राह्यण में तो राजा हरीशचन्द्र की सौ पत्नियों का उल्लेख है। लेकिन बहु-पत्नी विवाह के सन्दर्भ ज्यादातर राजाओं तथा अन्य धार्मिक वर्ग तक ही सीमित थे। साधारणत: एक-पत्नी विवाह ही प्रचलन में था।

इस काल में पिता द्वारा पुत्री बेचने के भी प्रमाण है, जिन्हें अच्छा नही माना जाता था। विवाह के समय दहेज देने की प्रथा थी। ऋग्वेदिक काल की भांति इस काल में भी वधु परिवार से मधुर संबध रखती थी। पत्नी शब्द का प्रयोग ब्राह्यण साहित्य में हुआ है, जो उसके अपने पति के साथ सामाजिक एवम् धार्मिक कार्यो में समान अधिकारों का घोतक है। शतपथ ब्राह्यण में उसे पति की अर्धागिनि भी कहा गया है। इस काल में पहले के काल की अपेक्षा स्त्री की स्थिति मे गिरावट आई मैत्रायणी संहिता में तो स्त्री को जुआ और शराब के साथ तीसरी बुराई के रूप में गिना गया है। इसी तरह के संदर्भ तैतिरीय तथा काठक संहिताओं में भी मिलते है।

इस काल में स्त्रियों को राजनीतिक कार्यो में भाग लेने की आज्ञा नही थी। सभाओं और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में वे हिस्सा नही ले सकती थी। स्त्रियो पर ऋग्वेदिक काल की अपेक्षा ज्यादा अंकुश लगा दिए गए। ऐतरेय ब्राह्यण के अनुसार अच्छी स्त्री वह है जो पलट कर जवाब ना दे। शतपथ ब्राह्यण के अनुसार स्त्री को अपने पति के बाद ही भोजन करना चाहिए। इस काल में लड़की के जन्म पर दु:ख अभिव्यक्त किया जाने लगा तथा पुत्र कामना के लिए अनेक प्रार्थनाएँ की गई। अथर्ववेद में भी कन्या के जन्म को बुरा माना गया। इस काल के समाज में पर्दा-प्रथा नही थी, अथर्ववेद असंकृता नारी के सभा में जाने का उल्लेख करता है। इसी प्रकार ऐतरेय ब्राह्यण में पुत्र वधु का अपने श्वसुर को समक्ष ना आने का उल्लेख है जिसे हम पर्दा प्रथा नही मान सकते। स्त्रियों के अधिकारों और उनकी स्थिति में पहले की अपेक्षा गिरावट आई। इस काल में गर्गी और मैत्रोयी जैसी मंत्रा दृष्टा स्त्रियों का वर्णन यह दर्शाता है कि प्रारंभिक वैदिक काल में सभी संतो और ऋषियों की जो परम्परा चली वह कुछ हद तक इस काल में भी विधमान थी।

शिक्षा -

इस काल में रचित साहित्य यज्ञो, बालियों इत्यादि के मंत्रों से संबधित है, जो श्रुति के रूप में था। शिष्य अपने गुरू से मौखिक रूप से शिक्षा ग्रहण करते थे। अथर्ववेद में ब्रह्याचारिन शब्द वैदिक विद्याथ्र्ाी का घोतक है, जिसे अग्निपूजा के लिए लकड़ियाँ तथा गुरू के लिए भीख मांग कर भोजन लाने वाला कहा गया है। इस काल में उपनयन संस्कार पद्धति के बाद शिक्षा शुरू की जाती थी। ब्राह्यणों के अतिरिक्त क्षित्रायों का भी शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार था। राजा जनक न केवल वेदों के ज्ञाता थे बल्कि उस काल के प्रसिद्ध दार्शनिक भी थे। तीनों उच्च वर्णो को उपनयन संस्कार प्रणाली का अधिकार था, लेकिन शूद्र इस अधिकार से वंचित थे। शतपथ ब्राह्यण से हमें उपनयन संस्कार का वर्णन मिलता है। अन्य साहित्य में गुरू सेवा को धर्म माना गया है। तैतिरीय आरण्यन में विद्यार्थियों के अन्य कार्य भी बताए गए है जैसे बारिश में ना भागना तथा बिना वस्त्रों के स्नान ना करना आदि।

स्त्री शिक्षा -

इस काल में समाज के बौधिक जीवन में स्त्रियां भाग लेती थी, यजुर्वेद में शिक्षित स्त्री-पुरूष के विवाह को उपयुक्त माना गया है। अथर्ववेद में उल्लेख है कि ब्राह्यचार्य द्वारा कन्या पति प्राप्ती करती है। इस विवरण से पता चलता है कि लड़कों की भांति कन्याएँ भी ब्रह्याचर्याक्षय में रहकर शिक्षा प्राप्त करती थी। संहिताओं और ब्राह्यण ग्रंथों में स्त्रियों द्वारा संगीत और नृत्य की शिक्षा प्राप्ती के प्रमाण मिलते है। तांडप ब्राह्यण के अनुसार गणित, व्याकरण और काव्य इत्यादि की शिक्षा दी जाती थी और भाषा के ज्ञान पर भी जोर दिया जाता था। शतपथ ब्राह्यण में सामगाान को स्त्रियों का विशेष कार्य बताया गया है। स्त्रियां गान-विद्या के अतिरिक्त मंत्रों को भी समझती थी। अथर्ववेद के अनुसार वे पति के साथ यज्ञ में सम्मिलित होती थी। इस काल के ग्रंथों से पता चलता है कि अनेक विदुषी स्त्रियां भी थी जो वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती थी। जनक की सभा में गार्गी और याज्ञवल्या के वाद-विवाद का उल्लेख है। याज्ञयवल्क्य की पत्नी मैत्रोयी स्वंय एक विदुषी थी। इनके अतिरिक्त स्त्रियां गृहशिक्षा के प्रति भी जागरूक थी। गृहस्थ जीवन में भोजन पकाना नारियों का विशेष कार्य था, शतपथ ब्राह्यण के एक सन्दर्भ से प्रकट होता है कि ऊन और सूत की कताई-बुनाई का कार्य मुख्यत: स्त्रियां करती थी। इस काल में राज्य द्वारा शिक्षा व्यवस्था की सुविधा नहीं करती थी। ब्राह्यण ही ऊपरी तीन वर्णो के विद्यार्थियों को अपने घरों या गुरूकुलों में पढ़ाया करते थे। इसके बदले विद्याथ्र्ाी गुरू की सेवा करते तथा फीस के रूप में गुरूदक्षिणा देते थे। इस प्रकार की व्यवस्था में न केवल साहित्यक ज्ञान दिया जाता था बल्कि अस्त्रा-शस्त्रा और शारिरिक शिक्षा व नैतिक ज्ञान भी दिया जाता था।

मनोरंजन के साधन -

इस काल में वाद्य तथा गायन दोनों तरह का संगीत प्रचलित था; सामवेद में गायन संगीत विज्ञान का एक ग्रंथ माना जाता था। इस काल में बहुत से पेशेवर गायक थे जिनमें बांसुरीवादक, शंखवादक तथा ढोलकिए इत्यादि शामिल हो अथर्ववेद में अघाटी नामक यंत्रा का उल्लेख है जिसे अन्य यन्त्रों के साथ नृत्य में प्रयोग किया जाता था। स्टेज और ड्रामें का भी इस काल में प्रचलन था। सैलूश एक एक्टर तथा नृतक का रूप था। संगीत के अतिरिक्त रथदौड़ तथा घुड़दौड इस काल के मनोरंजन के मुख्य साधन थे। राजसूय यज्ञ के दौरान इस प्रकार की रथों तथा घुड़दौड़ों का आयोजन किया जाता था। जुआ खेलना भी इनके मनोंरजन में शामिल था। यजुर्वेद में नटों का भी उल्लेख मिलता है।

खान-पान -

इस काल में शाकीहारी तथा मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन का उल्लेख है। अपूप चावल या जौं की घी मिश्रित रोटी थी। ओदन खिचड़ी या दलिया था, जिस दूध के साथ सेवन किया जाता था। यवागु जौं से बना भोजन था, करम्य एक प्रकार का अनाज का दलिया था। सेतु खाने की जानकारी भी इस काल के लोगों को थी। दूध से निर्मित वस्तुओं में पनीर (अभिक्षा), दही (दधि), ताजा मक्खन (नवनीत) तथा एक प्रकार के पेय जो फटे दूध में ताजा दूध मिला कर बनाया जाता था जिसे पयस्थ कहा जाता था। इसकाल में मांसाहारी भोजन काफी लोकप्रिय था। शतपथ ब्राह्यण में उल्लेख है कि अतिथि को बैल या बकरी का मीट खिलाना चाहिए।

सूरा एक प्रकार का नशीला पेय था जिसे समारोह के दौरान पिया जाता था। अथर्ववेद में इसे झगड़ों की जड़ तथा अच्छे लोगों को जुआ खेलने की ओर ले जाने के अर्थो में प्रयुक्त किया गया है। विशेष अवसरों के लिए एक विशेष प्रकार की सुरा सौत्रामणी का वर्णन है, जो अनाज और पौधो के मिश्रण से बनाई जाती थी। यजुर्वेद में मासर नामक एक पेय का उल्लेख है जो चावल और भुने जौ से बनता था। इस काल में शहद का भी सेवन किया जाता था, लेकिन कुछ अवसरों पर इसका सेवन विद्यार्थियों और स्त्रियों के लिए वर्जित था।

वेशभूषा तथा आभूषण -

इस काल मे लोग सूती तथा ऊनी दोनों तरह के वस्त्र धारण करते थे। ऊर्जा ऊन थी। इस काल में पहने वाले वस्त्रों पर कढ़ाई और नकाशी का कार्य किया जाता था। मुख्यत: तीन तरह के वस्त्र धारण करने का उल्लेख है। नीवी शरीर के नीचले भाग पर पहना जाने वाला वस्त्र, अधिवास शरीर के मध्य भाग तथा वास ऊपरी हिस्से पर धारण करने वाला वस्त्र था। शतपथ ब्राह्यण से पता चलता है कि यज्ञों के दौरान रेशमी वस्त्र धारण करना अनिवार्य था। इस काल में (उरूषणी) पगड़ी पहने का भी वर्णन है। जिसे पुरूष व िस्त्रांया दोनों धारण करते थे। राजसूम तथा वाजपेय मक्ष के दौरान राजा शाही पगड़ी विशेष रूप से पहनता था। शतपथ बब्राह्यण में उल्लेख है कि जुते तथा सैंड़ल जानवरो की खाल से बने होते थे। जानवरों की खाल से वस्त्र भी बनाए जाते थे प्रघात इस काल एक प्रकार का अच्छी तरह बुना हुआ ऊनी वस्त्र था जिसके चारों तरफ बोर्डर बना हुआ था। शतपथ ब्राह्यण में कैंसर से रंगे वस्त्रों का भी उल्लेख है। इस काल में पुरूष तथा स्त्रियां दोनों आभूषण धारण करते थे। निहक (गले में पहनने वाला सोने का हार), मौतियों की माला व कान मे कुण्ड़ल स्त्री व पुरूष दोनों धारण करते थे। इसके अतिरिक्त मोतियों की माला तथा शंख और सीपियों के बने आभूषण भी पहने जाते थे।

आर्थिक स्थिति

वैदिक युग में भारतीय समाज में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए, क्योंकि इस काल में लोहे के प्रयोग ने भारत के उतरी मैदानों को कृषि योग्य बना दिया जिसके परिणामस्वरूप कृषि प्रणाली एवम् उससे जुड़ी स्थायी जीवन की व्यवस्था स्पष्ट तौर पर उभर कर सामने आई जिसने अन्य पहलूओं - (सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक) को भी प्रभावित किया। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप वैदिक युग को मुख्यत: 2 भागों मे विभाजित किया जा सकता है; प्रथम जिसमें मुख्यत: पशुपालन पर आधारित आर्थिक व्यवस्था पर जोर दिया गया तथा द्वितीय जिसमें कृषि की ओर झुकाव प्रदर्शित होता है।

प्रांरभिक वैदिक कालीन अर्थव्यवस्था -

इस काल की अर्थव्यवस्था में पशु-पालन का सर्वाधिक महत्व था और पशु उनके स्वत्व और संपति के सर्वाधिक मूल्यवान साधन थे। पशुधन की महता की जानकारी पशुओं के लिए की जाने वाली प्राथनाओ से मिलती है। पशुओं के लिए बहुधा (प्राय:) विभिन्न कबीलों में युद्ध होते थे, युद्ध के लिए गविष्टि शब्द का प्रयोग किया जाता था जिसका अभिप्राय है गायों की खाज। ऋग्वेद में कई स्थानों पर गाय के लिए अधन्या शब्द का प्रयोग किया गया है, यानि गाय का वध नही करना चाहिए, इससे उसके आर्थिक महत्व का बोध होता है। गाय और बैल ही इस काल के महत्वपूर्ण पालतू पशु थे, यहीं इस काल का धन थे तथा यज्ञ समापन के बाद दक्षिणा के रूप में इन्हें पुरोहितों का दिया जाता था। गायों को रात के समय तथा दिन की धूप में बाड़ों में रखा जाता था। जबकि अन्य समय में वे स्वत: चरागाहों में चरती रहती थी। शाम के समय गायों को वापिस बाड़ों में लाया जाता था। इन कार्यो के लिए विशेष शब्दों का प्रयोग हमें ऋग्वेद में मिलता है। स्वसर का अभिप्राय सुबह चरगाहों में घास चरने जाने का है जबकि सम्गाव का अर्थ शाम को दूध दाहने के लिए वापिस लाने के लिए प्रयुक्त होता था। लड़कियों के लिए दुहिता शब्द का प्रयोग किया गया है, क्योंकि दूध दोहने का कार्य वे ही किया करती थी। ऋग्वेद में गायों पर आने वाले खतरों का भी उल्लेख मिलता है जैसे: गाय का खो जाना, चोरी हो जाना, पैर टूट जाना इत्यादि। इस काल में पशुओं के कानों पर निशान दाग दिए जाते थे। जिससे उनके स्वामित्व की आसानी से पहचान की जा सकती थी। गाय को इस काल में पवित्रा नही माना गया क्योंकि भोजन के लिए गाय और बैल दोनों का वध किया जाता था। गाय के अतिरिक्त भेड़, बकरियाँ तथा घोड़े पालतू पशुओं की श्रेणियों में आते थे। पशुओं का पालन-पोषण सामूहिक रूप से किया जाता था यानि कबीले के सभी सदस्यों का उन पर समान अधिकार था। पशुओं के महत्व का इस बात से भी पता चलता है कि मुखिया का गोपति अर्थात् पशुओं का स्वामी या सरंक्षक कहा जाता था।

इस काल में सीमित कृषि का प्रमाण मिलता हैं और संभवत: इसका प्रचलन और महत्व अधिक नही था। क्योंकि इस काल में यह पूर्ण रूप से विकसित नही हुई थी। ऋग्वेद के प्रथम और दशम् मण्डल से कृषि का उल्लेख मिलता है। प्रथम मण्डल में वर्णन है कि देवताओं ने मनु को हल चलाना और जौ की खेती करना सीखाया। ऋग्वेद के परवर्ती भाग में जुताई, बुआई, कटाई तथा ओसाई और दवाईयों का उल्लेख मिलता है। संभवत: इस काल में यव अर्थात् जौ नामक एक ही प्रकार का अन्न पैदा किया जाता था और जमीन पर कबीले के सदस्यों का समान अधिकार नही था। ऋग्वेद ये जमीन तथा उसकी माप-प्रणाली के बारे में विस्तृत वर्णन है, लेकिन कही भी किसी व्यक्ति द्वारा जमीन की ब्रिकी, हस्तांतरण, गिरवी अथवा दान का उल्लेख नही मिलता। इससे स्पष्ट होता है कि जमीन पर व्यक्तिगत स्वामित्व का अधिक प्रचलन नही था, कृषि सामान्यत: वर्षा पर ही निर्भर थी परन्तु इस काल में सिंचाई व्यवस्था का विकास हो चुका था। ऋग्वेद में कुल्या’ तथा ‘खनितृमा आप:’ शधो का उल्लेख मिलता है जो इससे इस बात का संकेत मिलता है कि कृषि के लिए सिंचाई व्यवस्था का ज्ञान उन्हें था। इसके अतिरिक्त कूपो द्वारा भी सिंचाई व्यवस्था का उल्लेख है। खेतों में हल जोतने के लिए तथा गाडियाँ खींचने के लिए बैल उपर्युक्त साधन थे।

ऋग्वेद में शिल्प विशेषज्ञों का अपेक्षाकृत कम उल्लेख हुआ है जबकि चर्मकार, बढ़ई, कुम्हार, धातुकर्मियों तथा शिल्पियों का वर्णन मिलता है। शिल्पी कार्यो से जुड़े इन समूहों में से किसी को भी निम्न स्तर का नही माना जाता था इसका कारण संभवत: यह था कि इनमें से कुछ जैसे:- बढ़ई, धातुकर्मी, चर्मकार आदि की रथों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका थी, जो युद्ध में सफलता के लिए उतरदायी होते थे। ऋग्वेद में वर्णित अयस, धातु विवादाग्रस्त है जिसे ताँबे या कांस्य से जोडा गया है हांलाकि इसका अर्थ लोहे से भी लगाया जाता है। इस काल में कृषि में प्रयुक्त किए जाने वाले धातु से बने औजारों का प्रयोग काफी सीमित मात्रा में किया जाता रहा होगा। यह स्पष्ट यह है कि वे धातु गलाने की कला से परिचित थे। इस काल में बुनाई एक घरेलु शिल्प था, जो महिलाओं द्वारा किया जाता था। ऋग्वेद में वस्त्र बनाने वाली स्त्रियों की तुलना रात और दिन से की गई है। बुनाई के लिए ‘तन्तुम’ शब्द का उल्लेख मिलता है। इस काल में जुलाहे भी थे तथा कुम्हार के लिए ‘कुलान’ शब्द का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद में कपास का उल्लेख ना होने से संभवत: ऊनी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। स्पष्टत: इस काल में हस्तशिल्प छोटे स्तर का था जिसका प्रसार उतर वैदिक काल में बढ़ गया था।

प्रांरभिक काल की व्यापारिक गतिविधियों का उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है। इसमें हमें व्यापारियों द्वारा दूर-दराज के क्षेत्रों (विदेशों) में जाकर व्यापार कर लाभ कमाने के कई संदर्भ मिलते है। व्यापार में मुनाफे के लिए अनेक प्राथनाएँ और आहुतियाँ देने के प्रमाण है। ऋग्वेद से आन्तरिक व्यापारिक गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती है। इस काल में होने वाले समुद्री व्यापार के संदर्भ में विद्वान मानते है कि व्यापारी समुद्र तथा समुद्री व्यापार से अनभिज्ञ थे जबकि मैक्समूलर, जिमर तथा लासेन का मत है कि इन्हें समुद्र का पूरा ज्ञान था। इस काल में सरस्वती नदी को समुद्र में गिरने वाली बताया गया है। ऋग्वेद के दसँवें मंडल में पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्र का उल्लेख है तथा इसमें वर्णित भुज्यु की कहानी से हमें समुद्री व्यापारिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है। इस काल के लोगों को न केवल समुद्री यातायात की जानकारी थी। अपितु उनके दूसरे देश से व्यापारिक सम्बन्ध भी थे। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद में नाव, चुप्पुओं वाली नावों एवम् हजार चप्पुओं वाले (श्त्रारित्रा) जहाज का भी वर्णन मिलता ह। इन्हें समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटे की भी जानकारी थी। ऋग्वेद में उल्लेखित बातें इनकी समुद्री व्यापारिक गतिविधियों की जानकारी देते है।

प्रारंभिक वैदिक कालीन चरण में आर्थिक व्यवस्था विस्तृत पैमाने वाली अर्थव्यवस्थ नही थी। कबीलाई अर्थप्रणाली थी जिसमें विनिमय-प्रणाली कीमती वस्तुओं के आदान-प्रदान पर आधारित थी। गाय विनिमय की प्रमुख इकाई थी। संभवत: इसके अतिरिक्त भी कई अन्य इकाइयां रही होगी। इस काल में निष्क का प्रचलन भी व्यापार में होने लगा था। विद्वानों के अनुसार प्रारंभ में निष्क उस काल में गले में पहनने वाला सोने का आभूषण रहा होगा। कई स्थानों पर रूद्र द्वारा निष्क पहनने का संदर्भ मिलता है। ऋग्वेद में इस बात का भी उल्लेख है कि एक कवि ने अपने राजा से 100 निष्क और 100 घोडे़ दान स्वरूप प्राप्त किए। इस काल में पणि वर्ग द्वारा ऋृण लेने और देने की प्रथा का प्रचलन था, जिसकी ऋग्वेद में निन्दा की गई है। लेकिन इस काल की आर्थिक उन्नति में इनके योगदान को नजनअंदाज नही किया जा सकता। प्रारंभिक चरण में बलि कर शक्तिशाली वर्ग के लिए स्वेच्छा से दिया जाने वाला कर था हाँलाकि शत्राु समुदायों के लिए यह स्पष्टत: एक उपहार था जा बलपूर्वक वसूल किया जाता था, इसमें पशु तथा अन्न शामिल थे।

उतरवैदिक अर्थव्यवस्था -

उतरवैदिक काल में उत्पादन की ओर झुकाव की स्थिति स्पष्ट सामने आई, जिसमें खेती आजीविका का मुख्य साधन हो गई और धीरे-धीरे भूमि पर व्यक्तिगत स्वामित्व की भावना मजबूत हो गयी। अथर्ववेद, वाजसेनिय, मैत्रायवी, तैतिरीय तथा काष्ठ संहिता और शतपद ब्राह्यण में खेती के विभिन्न कार्यो से संबधित अनुष्ठानों और हल द्वारा जुताई का विस्तृत विवरण दिया गया है। 6, 8, 12 और 24 बैलों द्वारा जुताई से पता चलता है कि हलों से गहरी जुताई की जाती थी। यद्यपि यह सन्दर्भ इसी रूप में हम न लें तो भी यह स्पष्ट है कि कृषि विस्तृत और गहन दोनो तरह से की जाती थी। बैलों पर जूलों की सहायता से हल जोता जाता था। हल संभवत: लकड़ी के थे। जिनके नाम उदम्बर या खदीरा थे। हलों में लोहे के फाल का प्रयोग पहले की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी था। खेती के बढ़ते महत्व के कारण उतरी मैदानों को लोहे की कुल्हाड़ी एवम् अग्नि की सहायता से साफ किया गया और गंगा-यमुना दोआब का क्षेत्र कृषि के लिए अत्याधिक उपर्युक्त था। इस काल की साहित्यिक संहिता (शतपथ ब्राह्यण) में कृषि कर्म पर एक पूरा अध्याय लिखा गया है जिसमें इस बात का वर्णन है कि बीजों की बुवाई कितनी गहरी और किस प्रकार करनी चाहिए। कृषि की अपज बढ़ाने के लिए पशुओं से प्राप्त खाद का उल्लेख अथर्ववेद में है। शकृत् (गोबर), करीश (उपले) इत्यादि का उल्लेख साहित्य में यदा-कदा मिलता है। हल चलाने वाले के लिए कीनाश शब्द का उल्लेख हुआ है। शतपथ ब्राह्यण में कृषि संबधी कई कार्यो का उल्लेख है जैसे हल जोतना, बीज बोना, फसल काटना, दाने अलग करना इत्यादि पकी हुई फसल को दराती से काटा जाता था। तैंतरीय संहिता में वर्णन है कि जौ सर्दियों में बोए जाते थे और गर्मियों मे पकाई के बाद उनकी कटाई की जाती थी। चावल बरसात के दिनों में खेतों में बोए जाते थे तथा बीन और तेल वाले पौधे गर्मियों में बोए जाते थे जो सर्दियों में पकते थे। अथर्ववेद में सिंचाई के लिए नई नालियाँ और नहरें खोदने का वर्णन है, तथा फसलों की विभिन्न बिमारियों से छुटकारा पाने के लिए अनेक मंत्रा दिए गए है। देवताओं से कृषि में समृद्धि, अच्छी फसल और धन की वृद्धि के लिए अनेक प्रार्थनाएँ की गई है। यव (जौ) के अतिरिक्त गेहँू इस काल की मुख्य फसल थी। व्रीही (चावल) का उल्लेख पहली बार हुआ है। दो प्रकार के धान व्राक्रि तथा तण्डुत का वर्णन है। यजुर्वेद में उडद (माष), मूँग और मसूर की दालों का उल्लेख है इनके अतिरिक्त तिल और सरसों की भी खेती के प्रमाण मिलते है। कृषि कार्यो में वृद्धि होने से पूर्ववर्ती पशुपालन युग की अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गयी, क्योंकि वह बढ़ती हुई जनसंख्या के भोजन को पूरा करने में असमर्थ थी। पशुपालन की कृषि-कर्म के साथ-साथ होता था। अथर्ववेद में गाय के प्रति आदर भाव का उल्लेख है तथा बलि वेदी के बाहर गाय को मारने पर मृत्यु दण्ड़ दिया जाता था, इस तरह इस काल में गाय की पवित्राता शुरू हुई और गाय को अदिति या धरती मां के समान माना जाने लगा। शतपथ ब्राह्यण में एक स्थान पर स्पष्ट उल्लेख है कि गाय और बैल पृथ्वी का धारण करते है अत: उनका मांस ना खाया जाए। अथर्ववेद में एक स्थान पर गाय, बैल और घोड़ों की प्राप्ती के लिए राजा इन्द्र को प्रार्थना करते हुए दिखाया गया है। इन पशुओं के अतिरिक्त भैंस, भेड़, बकरी, सूअर इत्यादि का उल्लेख है। अथर्ववेद में हाथी का भी उल्लेख है। गाड़ी खींचने के लिए कभी-कभी गधों को भी प्रयोग किया जाता था जैसा कि ऐतरेय ब्राह्यण में अश्विन की गाड़ी को गधे द्वारा खींचा जाना दर्शाता है। ऊंट गाड़ी के भी प्रमाण मिलते है। मछली एवम् मुर्गा पालन व्यवसाय भी था, इन्हें भोजन के रूप में भी प्रयुक्त किया जाता था।

उधोग-धन्धे -

कृषि क्षेत्र में विस्तार, जीवन में स्थायीत्व और क्षेत्रीय राज्यों के उदय ने कला-कौशल के क्षेत्र को प्रभावित किया और अनेक शिल्पों को जन्म दिया। संभवत: इस का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन लोहे का उपयोग है। अथर्ववेद में लोहे के लिए श्याम अयस शब्द का उल्लेख हुआ है तथा फसल काटने की दंराती, लोहे के औजार जैसे तीर और भालों की नोकें, चाकू, कुल्हाड़ी, कांटे तथा एक फल वाले हल इत्यादि विस्तृत पैमाने पर बनते थे। लोहे के अतिरिक्त टीन, सीसा तथा ताँबे का भी व्यापक पैमाने पर प्रयोग होता था। अर्थात् इस काल में उन्हें अनेक धातुओं का ज्ञान था और उन्हें पिघलाने की कला से वे परिचित थे। धातुशिल्प के अतिरिक्त बड़े पैमाने पर हस्तशिल्पियों के बारे में जानकारी मिलती है। धातुकर्मियों (सोना, चांदी, तांबा और लोहे का काम करने वाले) के अतिरिक्त बढ़ई लौहार मणिकार, रथकार, ज्योतिष, कुम्हार, सुराकार, नाई धोबी, चर्मकार, कसाई, रंगारेज, मछुआरा तथा वास्तुकार आदि अनेक शिल्प/व्यवसायों की जानकारी मिलती है। इस प्रकार पहले के चरण की अपेक्षा उतरवैदिक काल में शिल्पों की विशेषज्ञता पर विशेष जोर दिया गया।

इस काल में जाति प्रथा के आधार पर अलग-अलग वर्गो के अलग-2 कार्य बँटे हुए थे, जैसे: कृषि एवम् पशुपालन का कार्य वैश्यों के हाथें में था, पठन-पाठन, यज्ञ आदि बाह्यण, युद्ध एवम् राजम्य संबधी कार्य क्षित्राय, और सेवा दास का कार्य चौथे वर्ग शुद्र के हाथो में था। परन्तु यह विभाजन इस काल में वशांनुगत अभी भी नही हुआ था, कभी-कभी एक वर्ग/जाति के लोग दूसरा कार्य भी अपना लेते थे। वाजसेनीय तथा तैित्रारीय संहिता में पुरूष्रामेध के उपलक्ष में विस्तृत वर्णन है। जिससे हमें विशेष प्रकार के द्वारपालों, रथकारों, अनुचरों, ढाल बजाने वाले , बूचड़, ज्योतिष इत्यादि का उल्लेख है। बढ़ई (तक्षण), चटाई बनाने वाले, पक्षी उड़ाने वाले, पशु चराने वाले, टोकरी बनाने एवम् कढाई करने वाली स्त्रियां, सुरा बनाने वाले, हाथी पालक और स्वर्णकार इत्यादि का भी वर्णन है। अन्य व्यवसायों में नाविक, सूद पर पैसा देने वाले, धोबी (मलाग) कुम्हार, खाना बनाने वाला, दूत, रथो के साथ दौड़ने वालों का भी वर्णन है। उतरवैदिक काल में सोने का उल्लेख काफी मिलता है। आर्य हिरण्य का पवित्रा मानते थे। अथर्ववेद तथा संहिताओं में सोने के गहनों का विस्तृत वर्णन है। वस्त्र-निर्माण का कार्य भी बडे़ पैमाने पर होता था। कपास का स्पष्ट उल्लेख नही मिलता लेकिन ऊन (ऊर्णा) तथा शण (सन्) का प्रयोग वस्त्र और बोरियां बनाने के लिए किया जाता था। ब्रह्यचारी एवम् तपस्वी खाल और धर्म के वस्त्र धारण करते थे। शतपथ बाह्यण में उल्लेख है कि सूत कातने का कार्य िस्त्रायाँ करती थी। करघे के लिए ‘वेमन’ शब्द का उल्लेख हुआ है। वस्त्र बुनने वाली स्त्री का वयत्राी कहा जाता था, वस्त्रों पर कढ़ाई का कार्य पेशस्कारी स्त्रियां ही करती थी।

अनेक शिल्पों के प्रसार से व्यापार और वाणिज्य का विकास हुआ और पहले की विनिमय और पुनर्वितरणकी पद्धति में भी परिवर्तन हुआ और व्यापार में विकास हुआ। इस काल के ब्राह्यण साहित्य और संहिताओं में ‘वाणिज’ शब्द का उल्लेख हुआ है जिसका अर्थ व्यापारी था। अथर्ववेद के अनुसार देश के व्यापारी साम्रगी लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते थे। साहित्य में (श्रेष्ठिन) अमीर वैश्यों का वर्णन है, जिन्होंने व्यापार और कृषि कर्म द्वारा संपति एकित्रत की थी। व्यापार सामान्यत: विनिमय पद्धति पर आधारित था तथा गाय भी विनिमय का माध्यम थी। लेकिन मिष्क, शतनाम, कृष्णता पाद नामक सिक्कों के प्रचलन की जानकारी मिलती है। विद्वान इन्हें मुद्रा के रूप में लेते है, परन्तु यह सभी व्यापार में माध्यम के रूप में प्रयुक्त होते थे। ब्याज देना भी इस काल का एक व्यवसाय था। शतपथ ब्राह्यण में कुसीदिन का उल्लेख ब्याज देने वाले तथा तैंतरीय संहिता में कुसीद ब्याज लेने वालों के लिए प्रयुक्त हुआ है। लेकिन ब्याज दर का कोई उल्लेख नही मिलता। व्यापारियों का व्यवसाय वंशानुगत था जोकि हमें वणिज शब्द (जिसका अर्थ वाणिज का पुत्र था) के प्रयोग से मिलता है। व्यापारियों में चीजों के भाव पर वाद-विवादों आम बात थी। इस काल में समुद्री व्यापार का स्पष्ट वर्णन मिलता है। वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए बैलों एवम् घोड़ों की गाड़ियों का प्रयोग किया जाता था। ‘विपथ’ शक का प्रयोग बुरे रास्तों के लिए प्रयुक्त हुआ है जिससे हम अच्छी सड़कों या रास्तों का अन्दाज लगा सकते है। किश्ती तथा जहाज नदी और समुद्र पार सामान ले जाने के लिए प्रयुक्त किए जाते थे। छठी शताब्दी ई.पू. में मध्य भारत में कौंशाबी, अहिधात्रा, विदेह, काशी, वाराणसी और हस्तिनापुर से प्राप्त पुरातत्व के अभिलेखों से प्रमाणित होता है कि नगरीय व्यवस्था की शुरूआत हो चुकी थी, जो शिल्प-निर्माण का केन्द्र होने के साथ-साथ राजनीतिक केन्द्र भी रहे होगें, जो निश्चय ही बढ़ती हुई सामाजिक आर्थिक असमानताओं को दर्शाते है।

ऋग्वैदिक काल की धार्मिक स्थिति -

ऋग्वेद में देव अथवा देवता शब्द का अनेक बार उल्लेख हुआ है। इस काल के प्रांरभ में ‘बहुदेववाद’ के दर्शन होते है। ऋग्वेद में जिन देवताओं की पूजा की गई है, वे प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक है, जिनका मानवीयकरण किया गया है। ऋग्वेदिक देवताओं का वर्गीकरण तीन भागों में किया गया : (i) पृथ्वी के देवता - पृथ्वी अग्नि, सोम, हस्पति तथा नदियों के देवता, (ii) अंतरिक्ष के देवता - इन्द्र, रूद्र, वायु, पर्जन्य, मातरिश्वन आदि, (iii) द्युस्थान (आकाश) के देवता - द्यौस, वरूण, मित्र, सूर्य, सविता, पूषन, विष्णु, उषा आदि। इस काल में ऋषियों ने जिस देवता की प्रार्थना की है, उसे ही सर्वोच्य मानकर उसमें सम्पूर्ण गुणों, ज्ञान और सत्य का आरोपण कर दिया। उन्हें प्रसन्न करने के लिए अनेक ऋचानाएँ लिखी गई। विद्वान मैसमूलर ने इस प्रकृति को ‘डीनोथीज्म’ कहा है। ऋग्वेद से प्रसिद्ध देवता निम्न थे। जैसे ऋग्वेद में सर्वाधिक सूक्त (250) इन्द्र को समर्पित है। इन्द्र को पुरंदर (किले ध्वरूत करने वाला), जितेन्द्र (विजयी), (रथयोद्धा), मधवान (दानी) तथा शांति का देवता बताया गया है। यह आकाशीय देवता युद्ध, शांति और मौसम का देवता था। इन्द्र के पश्चात् सर्वाधिक सूक्त (200) अग्नि को समर्पित हैं यज्ञों के दौरान अग्नि का विशेष महत्व था। यहाँ तक कि ऋग्वेद में उसे पुरोहित, यज्ञिय और होता भी कहां गया है। अग्नि के द्वारा यज्ञ में समर्पित आहुति देवताओं तक पहुँचाई जाती थी, इसलिए इसे देवताओं का मुख भी कहां गया है। अग्नि विवाह संस्कार, यज्ञों तथा दाह संस्कार आदि के लिए अनिवार्य थी। ऋग्वेद के मंत्रों में इसे पिता पथ-प्रदर्शक, और मित्र भी कहा गया है।

मित्रावरूण ऋग्वेद में वरूण का वर्णन विभिन्न प्रकार से किया गया है। वरूण को आकाश, पृथ्वी और सूर्य का निर्माता कहा गया है। सभी देवता उसकी आज्ञा का पालन करते है, नदियाँ उसी के आदेश से प्रवाहित होती हैं। वरूण विश्व की प्राकृतिक व्यवस्था का भी रक्षक था। सर्वशक्तिमान होने के बावजूद वह अनियिन्त्रात और स्वेच्छाचारी नही है। सूर्य को अंधकार दूर कर रोशनी फैलाने वाला माना गया है। ऋग्वेद के अनुसार सूर्य देवों का अनीक (मुख), चर-अचर की आत्मक तथा उनका मित्र और चरूण एवम् अग्नि का नेत्रा था। सवितृ भी सूर्य का ही एक रूप है, और प्रसिद्ध गायत्राी मंत्रा उसी को समर्पित है। सूर्य मनुष्यों के सत्-असत् कर्मो का दृष्टा है तथा वह विश्वकर्मा हैं।

रूद्र आंधी का प्रतीक है। ऋग्वेद में रूद्र से महामारी और महाविनाश से दूर रखने के लिए अनेक प्रार्थनाएँ की गई है। यह अनेक जड़ी-बूटियों का भी सरंक्षण कर्ता था।

इन्द्र शक्ति का स्वामी था जिसकी उपासना शत्राुओं को नष्ट करने के लिए की जाती थी। वह बादलों को देवता था, उससे समय-समय पर वर्षा के लिए प्रार्थनाएँ की जाती थी। बादल और वर्षा (प्राकृतिक नियति) शक्ति से संबधित थे जिसको पुरूष के रूप में मानवीयकरण किया गया और जिसका प्रतिनिधित्व इन्द्र करता था। युद्ध के मुखिया के रूप में भी इसका उल्लेख है। इन्द्र की स्तुति में ऋग्वेद में लगभग 250 ऋचानाएँ है। जिसका अभिप्राय है कि इस वेद की सम्पूर्ण ऋचनाओं का एक चौथाई भाग एकमण इन्द्र की स्तुति से ही भरा है।

ऋग्वेद में अन्य बहुत देवता थे जैसे सोम (जो एक पेय भी था), वायु, विष्णु, घौस (स्वर्ग का देवता और सूर्य का पिता), मरूत (रूद्र का रूप)। ऋग्वेद में पुरूष देवताओं के अलावा अनेक देवियों का भी उल्लेख है जैसे: उषा (प्रभात की देवी), पृथ्वी, अदिति अरण्यनी (वन की देवी), सावित्राी, अप्यरा और पुरामाधि (उर्वरता की देवी) आदि। इनकों सम्बोधित करते हुए ऋग्वेद में अनेक प्रार्थनाएँ और श्लोक लिखे गए।

ऋग्वैदिक धर्म में बलि और यज्ञों का विशेष महत्व था जो प्राय: देवताओं की उपासना करने, युद्ध में विजय, पशुओं तथा पुत्र की प्राप्ती के लिए किए जाते थे। सामान्यत: पुरोहित यज्ञों के सम्पन्न कराते थे। इस काल में यज्ञों में बलि का विस्तृत उल्लेख है, जिस कारण पुरोहतों के महत्व में वृद्धि हुई। बलिदान अनुष्ठानों के कारण गणित और पशु शरीर संरचना ज्ञान के विकास में भी वृद्धि हुई। यज्ञों के दौरान उसमें घी, दूध, चावल और सोमरस आदि वस्तुओं की आहुति दी जाती थी। इस काल में देवताओं की उपासना किसी अर्मूत दार्शमिक अवधारणा के कारण नही बल्कि भौतिक लाभों के लिए की जाती थी इस काल के धर्म में बलिदान या यज्ञों के महत्व में काफी वृद्धि हुई।

उतरवैदिक कालीन धर्म -

इस काल में हुए सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के कारण उतरवैदिक काल में धर्म में भी परिवर्तन हुए। इस काल में एक तो ब्राह्यणों द्वारा प्रतिपादित एवम् पोषित यज्ञ अनुष्ठान एवम् कर्मकांडीय व्यवस्था थी, तो दूसरी तरफ इसके खिलाफ उठाई गई उपनिषदों की आवाज। इस काल में यज्ञों का विकास स्वंतत्रा रूप से हुआ और इस काल के प्रमुख देवता ब्रह्या, विष्णु और महेश थे क्योंकि ये लोगों की उत्पति और उनके पालन-पोषण के लिए जिम्मेदार थे। हाँलाकि ब्राह्यण का इस काल में उत्पादन व्यवस्था में कोई भूमिका नही थी, इसलिए समाज में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए पुरोहित और क्षित्राय वर्ग ने बड़े-बड़े यज्ञ करने शुरू कर दिए जैसे : राजसूय, वाजपेय और अश्वमेघ आदि। जिस प्रकार के कर्मकण्ड इस काल में उभरे, उनमें ब्राह्यणों की निजी स्वार्थ निहित था। यज्ञों का जन कल्याणकारी अर्थात् कृषि उत्पादन बढ़ाने वाले तथा मोक्ष को प्राप्त करने का साधन माना जाने लगा। लेकिन यज्ञों के अवसर पर बलि प्रथा में आई तेजी के कारण लोगों में अंसतोष के स्पष्ट प्रमाण उभरने लगे थे। इस फैलें अंसतोष को कम करने का कार्य उपनिषदों ने किया, जिन्होंने धर्म को सरल शैली से जोड़ कर्मकाण्ड़ों का खण्डन किया।

उतरवैदिक काल में यज्ञ मात्रा उद्देश्य पूर्ति का साधन नही थे बल्कि यज्ञों के जरिए ब्राह्यण और क्षित्राय वर्ग के लोग समाज पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को मजबूत करने लगे। इस काल में यज्ञों को बढ़ावा देने में शासकों ने भी महत्पूर्ण भूमिका निभाई, बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजन कर राजा जनता पर अपनी सता की वैधता स्थापित करने का प्रयास करता था। ब्राह्यण इन यज्ञों के माध्यम से राजा में दैवीय गुणों का आरोपण करता था। जिसके बदले में राजा पुरोहितों को राजसम्मान और धन-संपदा देता था। इस काल में तीन प्रमुख यज्ञ थे; राजसूय, वाजपेय, तथा अश्वमेघ आदि। ऐसे धार्मिक अनुष्णन राजा के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण थे। वस्तुत: ये सारी बातें राजा के पद को वैधता प्रदान करने के लिए ही थी। इस काल की प्रसिद्ध रचना यजुर्वेद, से हमें यज्ञों की विधि और नियमों की विस्तृत जानकारी मिलती है। इस काल में सम्पन्न हुए धार्मिक अनुष्णन पहले के काल की अपेक्षा अधिक पेचिदा और खर्चीलें हो गए थे।

उतरवैदिक काल में होने वाले राजसूय यज्ञ का सम्बन्ध राजा के राज्यारोहण से था। जो कि प्रतिवर्ष चलता रहता था। इस यज्ञ के अवसर पर ही राजा की घोषणा की जाती थी और इसमें कई आनुषंगिक कर्मकांड हुआ करते थे। इस तरह ये बहुत खर्चीले होते थे क्योंकि प्रत्येक क्रिया की दक्षिणा देनी पड़ती थी। इस यज्ञ में पूरे वर्ष चलने वाले अनुष्ठानों का अंत ऐसे यज्ञ से होता था, जिसकी अध्यक्षता ‘इन्द्रशुनासीर’ अर्थात् हलयुक्त इन्द्र करता था और जिसका उद्देश्य ‘पस्त प्रजनन शक्ति का पुन: जागृत करना होता था। दूसरा महत्वपूर्ण यज्ञ वाजपेय था, जो सत्राह दिन से एक वर्ष की अवधि तक चलता था। राजा इस यज्ञ का आयोजन राजसूय यज्ञ के बाद करता था इस यज्ञ का लक्ष्य था, राज्य और शासक की समृद्धि। इस यज्ञ में रथों की दौड़ होती थी, जो एक प्रथा थी। इसका उपयोग शारिरिक शक्ति के आधार पर शासक का चुनाव करने के लिए किया जाता था। इस यज्ञ के दौरान जिन लगभग एक दर्जन रत्निनों (मंत्रियों) के घर राजा जाता था, उनमें से चार िस्त्रायाँ होती थी। यह इस बात की संकेत करता है कि अनार्य जातियों के मातृकुलीय रिवाजों को नजरअंदाज नही किया गया था। इस प्रकार कर्मकांडों ने बृहतर समुदाय के संगठन में सहयोग दिया।

अश्वमेघ यज्ञ के लिए एक वर्ष पूर्व तैयारियाँ शुरू की जाती थी, लेकिन यह यज्ञ तीन दिन तक चलता था। इस यज्ञ के अवसर पर एक विशेष घोड़े का अभिषेक करके उसे एक वर्ष घूमने के लिए छोड़ दिया जाता था। इसके साथ कुछ सैनिक भी होते थे। वर्ष के अंत में विधिपूर्वक यज्ञ करके उस घोड़े की बलि दी जाती थी। इसमें विशिष्ट लोगों की उपस्थिति के अलावा सामान्य जन भी हिस्सा लेते थे। अश्वमेघ के अवसर पर पौराणिक गाथाओं का पाठ होता था। अश्वमेघ यज्ञ का एक उद्देश्य शासक के प्रभुत्व को कायम रखना भी था। उपयुक्त यज्ञों की महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इनमें कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए भी अनुष्ठान होता था। जैसे वाजपेय यज्ञ तो खाद्य और पान से जुड़ा था और राजसूय यज्ञ के अंत में ऐसी ध्वन क्रिया थी जिसका उद्देश्य भूमि की कम हुई उर्वरा शक्ति का पु:न बढाना था।

विशाल यज्ञों के अतिरिक्त अथर्ववेद में अन्य यज्ञों का भी उल्लेख है, जिन्हें लोग अपने घरों में ही विधिपूर्वक करते थे। इन यज्ञों का मुख्य उद्देश्य धन में वृद्धि तथा स्वर्ग की प्राप्ती था। यज्ञ सम्पन्न होन पर पुरोहित को दक्षिणा स्वरूप गाय, बैल, बछड़े, सोना तथा अनाज आदि दान दिया जाता था।

अथर्ववेद से पता चलता है कि यज्ञ-विधि पहले के काल की अपेक्षा अधिक पेचीदा और जटिल हो गई थी और इनमें रहस्यवाद का भी समावेश हो गया था। ब्राह्यण इस काल में मनुष्यों और देवताओं के बीच मध्यस्थ बन गया, जो उनकी प्राथनाँए देवताओं तक पहुंचाने का कार्य करता था। इसलिए समाज में ब्राह्यण वर्ग का वर्चस्व कायम हो गया, क्योंकि कोई भी यज्ञ उनके बिना सम्पन्न नही हो सकता था। हाँलाकि ब्राह्यणों के बढ़ते प्रभुत्व के खिलाफ प्रतिक्रिया उपनिषदों में शुरू हो गइर््र थी। उतरवैदिक कालीन धर्म की दूसरी धारा उपनिषदीय अद्धेत सिंद्धात में स्पष्ट होती है। उस काल में यह ब्राह्यणों के कर्मकांड पर एक गहरा आघात था। उपनिषदीय विचारकों में नए रूप से सिंद्धातों का प्रतिपादन किया, जिनमें कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष मुख्य थे। पुरोहितों की कर्मकाण्डिय व्यवस्था के विरोध का मुख्य कारण विस्तृत पैमाने पर होने वाली कृषि थी, क्योंकि यज्ञों में पशुबलि से कृषि को काफी नुकसान पहुँचता था। यज्ञ प्रक्रिया चूंकि काफी खर्चीली हो गई थी जो आम आदमी की पहुँच से बाहर थी इसलिए इस धार्मिक प्रक्रिया के खिलाफ आवाज उठनी शुरू हुई और यज्ञापि कर्मकाण्डों के खिलाफ पांचाल, विदेह और पूर्वी भारत में जबरदस्त प्रतिक्रिया भी हुई। इस काल में रचे गए उपनिषदों ने इन कर्मकाण्ड़ों को नकार दिया और इन्होंने ब्रह्या और आत्मा के बीच अद्धेत (दोनों एक है) का मत प्रतिपादित किया। इन्होंने मोक्ष प्राप्ती के लिए सद्कर्मो, चार पुरूषार्थो और आत्मिकज्ञान पर बल दिया। इसमें यद्याविद कर्मकाण्डों का कोई स्थान नही था। ज्ञान प्राप्ति के लिए नैतिकता पर बल दिया गया। लेकिन यह इतना गूढ़ ज्ञान था कि उस काल की जनता इसे समझ नही सकी। छन्योग्य उपनिषद और वृहदारण्यक उपनिषदों में जीवन, मरण, पुनर्जन्म के विषय में दार्शनिक चिन्तन बहुत व्यापक और स्पष्ट है। इसमें मनुष्य और परमात्मा के बीच के संबध को समझने की कोशिश थी जिसकी परिणती अद्धेत में हुई, अर्थात् अस्तित्व की एकात्मकता में विश्वास व्यक्त किया गया।

अथर्ववेद से स्पष्ट प्रमाण है कि धर्म में स्थानीय लोक परम्पराओं और विश्वासों का समावेश किया गया। जैसे विभिन्न बिमारियों में वृद्धि और उन्हें दूर करने के लिए अथर्ववेद में मंत्रा है, अपने शत्राु का नाश करने तथा स्वयं लाभ की प्राप्ती के लिए अलग-2 मंत्रा थे। इस काल में प्रचलित विश्वासों और अंधविश्वासों को भी धर्म में शामिल किया गया। देवताओं का इस काल में लौकिकरण किया गया और सामान्य जनता के साथ इस काल के देवताओं को जोड़ा गया। जैसे सूर्य देवता इस काल में भूत-प्रेत भगाता था और पूषण जो ऋग्वैदिक काल में कृषि का देवता था, इस काल में सौहद्य की स्थापना और बच्चों के सरक्षित जन्म के लिए पूजा जाने लगा।

स्पष्ट है कि उतरवैदिक काल में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे। यह कृषि विस्तार, सामाजिक विभेदीकरण, राजतंत्र के उद्भव तथा धार्मिक विश्वासों और कृत्यों में परिवर्तन से प्रमाणित होता है। यह वह काल था जब उतरी भारत के इतिहास में आगे और भी विकास की नींव डाली गयी थी, जो ईसा पूर्व छठी शताब्दी से स्पष्ट होती है।

ई0पू0 छठी शताब्दी का काल धार्मिक दृष्टि से क्रान्ति अथवा महान परिवर्तन का काल माना जाता है। इस समय परम्परागत वैदिक धर्म एवं समाज में व्यापक कुरीतियों, पाखण्डो, छुआ-छात आदि के विरूद्ध आन्दोलन उठ खड़ा हुआ। यह आन्दोलन कोई आकस्मिक घटना नही थी, वरन् चिरकाल से संचित हो रहे असंतोष की परिणति थी। वैदि धर्म के कर्मकाण्डो तथा यज्ञीय विधि-विधानों के विरूद्ध प्रतिक्रिया प्रस्तुत: उतर-वैदिक काल में ही प्रारम्भ हो चुकी थी। वैदिक धर्म की व्याख्या एक नये सिरे से की गई तथा यज्ञ एवं कर्मकाण्डों की निन्दा करते हुए धर्म के नैतिक पक्ष पर बल दिया गया शरीर को मिथ्या बताकर आत्मा की अमरता के सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ।

राजनीतिक क्षेत्र में मगध अपने आस पड़ोस के अन्य राज्यों पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर रहा था। एवं एक विशाल साम्राज्य के रूप में उभर रहा था। उसी समय धार्मिक क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तनों का केन्द्र भी यहीं बना नही बल्कि विश्व स्तर पर भी परिवर्तनों का युग था। इस समय भारत में ही नही बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी प्राचीन मान्यताओं को चुनौती दीजा रही थी। जो काम यूनान में हैरक्लीटस पाईथागोरस, ईरान में जेरूथष्ट और चीन में कन्फयूशियस व लाओत्से (ताओ) कर रहे थे, वही काम इस समय भारत में महावीर स्वामी, महात्मा बुद्ध कर रहे थे। इस मानवतावादी विचारधारा ने भू-मध्य सागर से प्रशान्त महासागर तक मानव मस्तिष्क में खलबली मचा रखी थी। यह विचारधारा स्पष्ट रूप से तत्कालीन धर्म-दर्शन के विरूद्ध असन्तोष को प्रकट कर रही थी। यह स्पष्ट रूकरना कठिन है कि विश्व-भर के इस समाज-सुधारकों में आपस में कोई सम्बन्ध था या नहीं। परन्तु यह स्पष्ट है कि सभी ने प्रचलित धर्मो की उन पुरानी मान्यताओं का विरोध किया जो मानव के विकास में बाधक थी।

इस बौद्धिक क्रान्ति के लिए तात्कालिन सामाजिक व आर्थिक कारण भी कम उतरदायी नही थें। समाज में वर्ग-व्यवस्था का विकृत स्वरूप ‘जाति’ के रूप विकसित हो चुका था। ब्राहमण विशेषाधिकार युक्त तथा शुद्र अधिकार विहिन वर्ग बने हुए थे। किन्तु लोहे के प्रयोग ने कृषि में क्रान्ति ला दी, जिससे उत्पादन बढ़ा, उद्योग धन्धें बढ़े। फलस्वरूप एक शक्तिशाली व्यापारी वर्ग का उदय होता है। दूसरी और क्षित्रायों की राजनीतिक शक्ति में वृद्धि हुई। अब क्षित्राय व वैश्य दोनों ने ब्राहम्णों से सामाजिक प्रतिस्पर्धा शुरू कर की और ब्राहम्णों का विरोध किया। फलत: समाज में नयी विचारधारा का प्रवेश हुआ। कृषि की अपयोगिता बढ़ जाने से पशुओं का महत्व भी बढ़ गया तथा बलि प्रथा एवं अश्वमेघ यज्ञ आदि का विरोध किया गया। परिणामस्वरूप नये सुधारवादी विचारों वाले धर्म का मार्ग प्रशस्त हो गया, जिसकी सफलता ने लोगों को बड़ी शीध्रता से आकर्षित कर लिया। ये नए सुधारवादी धर्म थे-’जैन’ एवं ‘बौद्ध धर्म’।

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