औद्योगिक नीति 1990 क्या है?

अनुक्रम
कांग्रेस सरकार के पतन के पश्चात् जनता पार्टी के शासन में आने पर 30 मई 1990 को तत्कालीन उद्योग मन्त्री श्री अजीत सिंह ने लघु एवं कृषि पर आधारित उद्योगों के विकास पर विशेष ध्यान देने वाली तथा औद्योगिक अनुमोदनों हेतु प्रक्रियाओं में परिवर्तन करने वाली औद्योगिक नीति की घोषणा की। लघु उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन, कृषि पर आधारित उद्योगों को विशेष महत्व, अनुमोदन प्रक्रिया को सरल बनाना, रोजगार के अवसरों को बढ़ाना, निर्यात अभिमुखी उद्योगों के विकास को बढ़ावा, प्राथमिकताओं को पुन: निर्धारण, ग्रामीण क्षेत्र के विकास पर बल, सार्वजनिक क्षेत्र के विकास हेतु विशेष प्रयास, सामाजिक न्याय प्राप्ति पर विशेष ध्यान तथा आर्थिक आत्म-निर्भरता हेतु विशेष प्रयत्न आदि उद्देश्यों की पूर्ति हेतु इस नीति का निर्माण किया गया ।

1990 की औद्योगिक नीति की प्रमुख विशेषताएँ 

  1. कृषि पर आधारित एवं लघु उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन क्योंकि इस औद्योगिक नीति का एक प्रमुख उछेश्य कृषि आधारित एवं लघु उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन देना था, इसलिए इस क्षेत्र पर विशेष बल दिया गया है। इस हेतु इस नीति में कदम उठाये गये हैं-
    1. लघु उद्योगों में संयन्त्र एवं मशीनरी पर विनियोग की सीमा में वृठ्ठि की गयी। लघु उद्योगों के लिए यह सीमा 35 लाख रूपये से बढ़ाकर 60 लाख रूपये एवं सहायक उद्योगों के लिए 45 लाख रूपये से बढ़ाकर 75 लाख रूपये कर दी गयी। उन लघु उद्योगों के लिए भी यह सीमा 75 लाख रूपये कर दी जायेगी (60 लाख के स्थान पर) जो कि तीसरे वर्ष तक अपने उत्पादन का कम से कम 30 प्रतिशत निर्यात करेंगे।
    2. अति लघु उद्योगों के लिए यह विनियोग सीमा 2 लाख रूपये से बढ़ाकर 5 लाख कर दी गयी।
    3. घु उद्योगों के लिए उत्पादन आरक्षित वस्तुओं की संख्या में वृठ्ठि कर दी जायेगी।
    4. उन लघु उद्योगों को केन्द्रीय विनियोग सहायता उपलब्ध कराई जायेगी जो ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों में स्थापित किये गये हैं तथा जो अधिक रोजगार के अवसरों का सृजन करते हों।
    5. इन उद्योगों के आधुनिकीकरण हेतु प्रयास किये जायेंगे।
    6. इन उद्योगों को ऋण प्रदान करने में प्राथमिकता दी जायेगी।
    7. लघु उद्योगों को सही समय पर तथा पर्याप्त ऋण उपलब्ध कराया जायेगा। इस क्रम में लघु उद्योग विकास बैंक की स्थापना पूर्व में ही की जा चुकी है।
    8. उद्यमशीलता के विकास हेतु प्रशिक्षण व्यवस्था की जायेगी। प्रशिक्षण में महिलाओं एवं युवाओं को प्राथमिकता दी जायेगी।
    9. ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत कारीगरों के उत्पाद को विक्रय तथा उनकी जरूरत के कच्चे माल की पूर्ति को सुनिश्चित करने हेतु केन्द्र तथा राज्य स्तर पर विशेष विक्रय संगठन की स्थापना की जायेगी।
    10. इस प्रकार के उद्योगों की स्थापना सहकारी संगठन के अन्तर्गत हो इस हेतु विशेष प्रयास किये जायेंगे। 
  2. लाइसेन्स व्यवस्था से छूट : जो उद्योग पिछड़े क्षेत्र में स्थापित किये जाने हैं तथा जिनका स्थायी सम्पतियों में विनियोजन 75 करोड़ रुपये तक सीमित है एवं जो उद्योग पिछडे़ क्षेत्र में नहीं हैं, उस दशा में 25 करोड़ रुपये विनियोजन तक की दशा में उद्योग स्थापित करने के लिए लाइसेन्स लेने की आवश्यकता नहीं होगी।
  3. शत-प्रतिशत निर्यात करने वाली औद्योगिक इकाइयों की स्थापना की दशा में 75 करोड़ रूपये तक के विनियोजन सीमा तक के उद्योगों को लाइसेन्स व्यवस्था से मुक्त कर दिया गया है।
  4. वर्तमान गैर-अनुज्ञापित योजना, विमुक्त उद्योग योजना तथा डी.जी.टी. पंजीकरण प्रणाली समाप्त कर दी जायेगी। 
  5. उद्यमी, संयन्त्र एवं मशीनी के कुल मूल्य के 30 प्रतिशत तक उधार मूल्य के बराबर पूँजीगत वस्तुओं का आयात कर सकेंगे।
  6. आयात की न्यूनतम सीमा में वृठ्ठि की गयी है। साख पत्रा या आदेश का मूल्य 50 लाख रूपये या अधिक होने पर रिजर्व बैंक की पूर्व अनुमति लेनी होगी। दो लाख रूपये तक के प्राणरक्षक उपकरणों को न्यूनतम सीमा से मुक्त कर दिया गया है।
  7. कच्चे माल तथा उपकरणों के आयात की सीमा कुल उत्पादन के एक्स फैक्ट्री मूल्य के 30 प्रतिशत उधार राशि के मूल्य तक होगी तथा इस सीमा में ओपन जनरल लाइसेन्स के अन्तर्गत आने वाली वस्तुओं को सम्मिलित नहीं किया जायेगा।
  8. तकनीकी हस्तान्तरण के लिए यदि तकनीकों का आयात किया जाता है तथा इस हेतु दिये जाने वाला शुल्क घरेलू विक्रय का 5 प्रतिशत तथा निर्यात का 8 प्रतिशत से अधिक नहीं होने की स्थिति में सरकार से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

कृषि आधारित उद्योगों एवं लघु उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन, तीव्र औद्योगिक विकास, सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार के साथ-साथ निजी क्षेत्र को भी महत्व, शोध एवं अनुसन्धान पर विशेष ध्यान, विदेशी पूँजी को आमन्त्राण, क्षेत्रीय असन्तुलन को दूर करने हेतु विशेष प्रयत्न एवं लाइसेंिन्ंसग नीति को अधिक उदार बनाकर औद्योगिकरण में तेजी हेतु प्रयास आदि इस नीति के उजले पहलू हैं। इस औद्योगिक नीति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने कहा था कि ‘‘भारत उदारवादी आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हो रहा हैं।’’

यह औद्योगिक नीति अपने वांछित लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पायी। कृषि पर आधारित एवं लघु उद्योगों का विकास नही हो पाया। ये इकाइयाँ सरकारी औपचारिकताओं एवं प्रशासनिक कुव्यवस्था के कारण सरकार द्वारा घोषित सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पायीं। वस्तुत: इस औद्योगिक नीति का सर्वाधिक लाभ बड़े औद्योगिक घरानों ने ही उठाया। सार्वजनिक क्षेत्र में सुधार की बात इस नीति मे की गयी, किन्तु सार्वजनिक क्षेत्र में प्रबन्ध व्यवस्था और खराब ही हुई। प्रशासनिक अकुशलता, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार आदि में वृठ्ठि के कारण लोगों का सार्वजनिक क्षेत्र के प्रति अविश्वास बढ़ा।

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