आर्थिक असमानता का अर्थ, प्रकृति एवं विस्तार

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आर्थिक असमानता अथवा आय तथा सम्पत्ति के असमान वितरण से अभिप्राय अर्थव्यवस्था की उस परिस्थितियों से है जिसमें कि राष्ट्र के कुछ लोगों की आय, राष्ट्र की औसत आय से बहुत कम होती है। आय तथा सम्पत्ति के असमान वितरण की समस्या का सम्बन्ध मुख्य रूप से व्यक्तिगत आय के वितरण में विषमताओं से होता है। इससे अभिप्राय यह है कि कुछ व्यक्तियों की आय बहुत अधिक है जबकि अधिकतर लोगों की आय बहुत कम है।

भारत में आर्थिक असमानता की प्रकृति एवं विस्तार

भारत में आर्थिक असमानता निरन्तर बढ़ती जा रही है। भारत में आय के वितरण की जांच करने के लिए सरकार ने सर्वप्रथम प्रो. पी. सी. महालनोबिस की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की थी। इस समिति की रिपोर्ट 1964 में प्रकाशित हुई थी। इस समिति के अतिरिक्त नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च (NCAER), रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया तथा कई अर्थशािस्त्रायों जैसे लाइडल, ओझा और भट्ट, रानाडिवे, अहमद, भट्टाचार्य आदि ने आय के वितरण के सम्बन्ध में जांच की है। भारत में कई प्रकार की आर्थिक असमानताएं पाई जाती हैं। इनमें से इस प्रकार की असमानताएं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
  1. परिसम्पत्ति की असमानता (Inequality of Assets)
  2. आय तथा उपभोग की असमानता (Inequality of Income and Consumption)
  3. क्षेत्रीय असमानता (Regional Inequality)
असमानता के इन तीनों प्रकारों में परस्पर निर्भरता है। उदाहरण के लिए परिसम्पत्तियों की असमानता के फलस्वरूप आय की असमानता उत्पन्न होती है। जिन लोगों के पास धन अधिक होता है वे इसका बैंकों, शेयरों, ऋणपत्रों आदि में निवेश करके अधिक आय प्राप्त अर्जन का प्रयास करते हैं। इसी प्रकार आय की असमानता के फलस्वरूप सम्पत्ति की असमानता में वृद्धि होती है। जिन लोगों की आय अधिक होती है उनकी बचत करने की क्षमता भी अधिक होती है। अत: साधन सम्पन्न वर्ग वे अधिक सम्पत्ति जमा कर पाते हैं। उनकी सम्पत्ति तथा आय एक दूसरे को बढ़ाती जाती हैं। देश के पिछड़े प्रदेशों की आय कम होती है। उनमें पूंजी निर्माण दर भी अत्यन्त निम्न है। अत: उनके विकास की दर भी कम है। इसके विपरीत धनी क्षेत्रों की आय तथा बचत की दर भी अधिक होती है। उनके पूंजी निर्माण की दर अधिक होती है। उनकी वृद्धि दर भी अधिक होती है। इन सभी फलस्वरूप धनी तथा निर्धन क्षेत्रों की असमानता बढ़ने की प्रवृत्ति दर्शाती है। अत: असमानता की समस्या का समाधान सभी प्रकार की असमानताओं को दूर करने से ही सम्भव हो सकता है।

परिसम्पत्ति की असमानता -

भारत में परिसम्पत्ति की असमानता के संबंध में प्राप्त आंकड़े अपर्याप्त तथा अविश्वसनीय हैं। परन्तु उपलब्ध आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत में परिसम्पत्ति की असमानता काफी अधिक एवम् व्यापक है। परिसम्पत्ति की असमानता का अध्ययन दो भागों में किया जा सकता है :

ग्रामीण क्षेत्रो में परिसम्पत्ति की असमानता - 

भारत की लगभग 76 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में निवास करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रा में विद्यमान सम्पत्ति की असमानता दो तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है-
  1. कुल परिसम्पत्ति का असमान वितरण - रिजर्व बैंक द्वारा किये गये अखिल भारतीय ऋण एवम् निवेश सर्वेक्षण (All India Debt and Investment Survey) के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रा में सम्पत्ति के वितरण की असमानता का विस्तार काफी अधिक है। गांवों में निवास करने वाली जनसंख्या का नीचे के 10 प्रतिशत वर्ग का ग्रामीण परिसम्पत्ति में केवल 0.1 प्रतिशत भाग है। जबकि ऊपर के 10 प्रतिशत का लगभग 51 प्रतिशत भाग है। अन्य शब्दों के ऊपर के वर्ग के 10 प्रतिशत लोगों में से एक व्यक्ति के पास इतनी सम्पत्ति है। जितनी नीचे के वर्ग के 510 व्यक्तियों के पास है। सन् 1961 से 1971 तक के 10 वर्षों में इस असमानता में कोई परिवर्तन नहीं आया है।
  2. भूमि के वितरण में असमानता - ग्रामीण क्षेत्रा में भूमि उत्पादन का महत्वपूर्ण साधन है। कृषि के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि के वितरण में काफी असमानता पाई जाती है। इस समय भारत में लगभग 9 करोड़ 77 लाख जोतें या खेत हैं।

शहरी क्षेत्रो में परिसम्पत्ति की असमानता -

भारत के केवल ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं अपितु शहरी क्षेत्रों में भी सम्पत्ति की असमानता बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है। इसे दो तथ्यों से स्पष्ट किया जा सकता है : -
  1. भवन सम्पत्ति का स्वामित्व - शहरों में सम्पत्ति के वितरण की असमानता और भी अधिक है। नेशनल सैम्पल सर्वे के आठवें दौर के अनुसार शहरी क्षेत्रा के ऊपर के 20 प्रतिशत परिवारों के पास शहरी जमीन का 93 प्रतिशत भाग था। इनमें से सबसे अधिक धनी 5 प्रतिशत परिवारों के पास शहरी भूमि का 52 प्रतिशत भाग था। नेशनल कौंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च के अनुसार शहरी क्षेत्र के सबसे उच्च वर्ग के 10 प्रतिशत लोगों के पास 57 प्रतिशत भवन सम्पत्ति केन्द्रीत है। इसके विपरीत नीचे के वर्ग के 10 प्रतिशत लोगों के पास 1 प्रतिशत से भी कम भवन सम्पत्ति है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि शहरी क्षेत्रा में सम्पत्ति के वितरण में काफी असमानताएं पाई जाती हैं।
  2. शेयर सम्पत्ति का स्वामित्व - भारत में शेयर सम्पत्ति से सम्बन्धित असमानताएं और भी अधिक हैं। महालनोबिस समिति के अनुसार आय कर देने वालों में सबसे धनी वर्ग 10 प्रतिशत लोगों को शेयरों के लाभांश से प्राप्त कुल आय का 52 प्रतिशत लाभ मिला था। नीचे के वर्ग के 10 प्रतिशत लोगों का भाग केवल 2.5 प्रतिशत था। इकोनोमिक टाइम्स रिसर्च ब्यूरों के अनुसार भारत में 20 व्यावसायिक घरानों की परिसम्पत्ति 10,000 करोड़ रुपये से भी अधिक है। इन 20 बड़े घरानों का अर्जित लाभ 900 करोड़ रुपये से भी अधिक है। इससे सिद्ध होता है कि देश में आर्थिक शक्ति का केन्द्रीयकरण होने के फलस्वरूप सम्पत्ति की असमानता का विस्तार काफी व्यापक है। 
संक्षेप में, भारत में आय तथा सम्पत्ति की असमानताएं शहरी तथा ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में पाई जाती है। पंचवर्षीय योजनाओं की अवधि में इन असमानताओं में कमी होने के बजाय बढ़ने की प्रवृत्ति पाई गई है।

आय तथा उपभोग व्यय की असमानता

भारत में आय तथा उपभोग में व्याप्त असमानता की समस्या भी अत्यन्त गम्भीर है। भारत में आय तथा उपभोग व्यय की असमानता इन तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है -
  1. आय की असमानता - भारत में आय की असमानता के सम्बन्ध में विभिन्न स्त्रोंतो के आंकड़े एकत्रित किए गए हैं।
  2. उपभोग व्यय की असमानता -  आय की असमानता का ज्ञान उपभोग व्यय के विवरण से किया जा सकता है।

क्षेत्रीय असमानता

भारत में असमानता का एक महत्वपूर्ण रूप क्षेत्रीय असमानता (Regional Inequality) है। क्षेत्रीय असमानता का अभिप्राय है देश के विभिन्न राज्यों के आर्थिक विकास तथा प्रति व्यक्ति आय के स्तर में पाई जाने वाली असमानता। देश के कुछ राज्यों जैसे पंजाब, गोवा, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात आदि के आर्थिक विकास की दर एवम् प्रति व्यक्ति आय बहुत अधिक है। इसके विपरीत कई राज्यों जैसे - बिहार, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, असम आदि के आर्थिक विकास की दर एवम् प्रति व्यक्ति आय काफी कम है। क्षेत्रीय असमानता को यदि नियंत्रित नहीं किया गया तो यह देश के एकीकरण के लिये एक बड़ा खतरा सिद्ध होगी। क्षेत्रीय असमानता को ज्ञात करने के लिए प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) सबसे उपयुक्त माप माना जाता है।

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